शनिवार, 25 जून 2011

देश बांट कर रहेगी कांग्रेस

'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण अधिनियम-२०११' की आग में जलेगा देश। कांग्रेस काटेगी वोटों की फसल। बहुसंख्यकों पर होगा अत्याचार।

 कां ग्रेस की नीतियां अब देशवासियों की समझ से परे जाने लगी हैं। संविधान की शपथ लेकर उसकी रक्षा और उसका पालन कराने की बात कहने वाली यूपीए सरकार संविधान विरुद्ध ही कार्य कर रही है। उसने देश को एकसूत्र में फिरोने की जगह दो फाड़ करने की तैयारी की है। वोट बैंक की घृणित राजनीति के फेर में कांग्रेस और उसके नेताओं का आचरण संदिग्ध हो गया है। हाल के घटनाक्रमों को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि कांग्रेस फिर से देश बांट कर रहेगी या फिर देश को सांप्रदायिक आग में जलने के लिए धकेलकर ही दम लेगी। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक-२०११' तैयार किया है। लम्बे समय से सब ओर से इस विधेयक का विरोध हो रहा है। लगभग सभी विद्वान इसे 'देश तोड़क विधेयक' बता रहे हैं। इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ माना जा रहा है। इसे कानूनी जामा पहनाना देश के बहुसंख्यकों को दोयम दर्जे का साबित करने का प्रयास है। इसके बावजूद कांग्रेस की सलाहकार परिषद ने बीते बुधवार को इसे संसद में पारित कराने के लिए सरकार के पास भेज दिया।
          'समानांतर सरकार' नहीं चलने देंगे। 'सिविस सोसायटी' को क्या अधिकार है विधेयक तैयार करने का। यह काम तो संसद का है। इस तरह के बहानों से लोकपाल बिल का विरोध करने वाले सभी कांग्रेसी इस विधेयक को पारित कराने के लिए जी जान से जुट जाएंगे। वह इसलिए कि इस विधेयक को उनकी तथाकथित महान नेता सोनिया गांधी के नेतृत्व में तैयार कराया गया है, किसी अन्ना या रामदेव के नेतृत्व में नहीं। इसलिए भी वे पूरी ताकत झोंक देंगे ताकि इस विधेयक के नाम से वे अल्पसंख्यकों के 'वोटों की फसल' काट सकें। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के सुझाव मानने से तो उनकी 'लूट' बंद हो जाती। जबकि यह विधेयक उन्हें भारत को और लूटने में मददगार साबित होगा। कांग्रेस की यह 'दादागिरी' कि हम पांच साल के लिए चुनकर आए हैं हम जो चाहे करेंगे। इससे देश का मतदाता स्वयं को अपमानित महसूस कर रहा है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन में बड़ी भारी संख्या में शामिल होकर उसने कांग्रेस को बताने का प्रयास किया कि उसकी नीतियां देश के खिलाफ हो रही हैं। वक्त है कांग्रेस पटरी पर आ जाए, लेकिन सत्ता के मद में चूर कांग्रेस आमजन की आवाज कहां सुनती है। आप खुद तय कर सकते हैं कि यह विधेयक देश में सांस्कृतिक एकता के लिए कितना घातक है। फिर आप तय कीजिए क्या ऐसे किसी कानून की देश को जरूरत है? क्या ओछी मानसिकता वाली कांग्रेस की देश को अब जरूरत है? क्या यूपीए सरकार की नीतियां और उसका आचरण देखकर नहीं लगता कि शासन व्यवस्था में 'देशबंधु' कम 'देशशत्रु' अधिक बैठे हैं? क्या कांग्रेस नीत यूपीए सरकार को पांच साल तक सत्ता में बने रहने का अधिकार है? क्या इस तरह देश में कभी चैन-अमन कायम हो सकेगा? क्या इससे 'बहुसंख्यक' अपने को कुंठित महसूस नहीं करेगा?

'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक-२०११' कहता है...

1- 'बहुसंख्यक' हत्यारे, हिंसक और दंगाई प्रवृति के होते हैं। (विकीलीक्स के खुलासे में सामने आया था कि देश के बहुसंख्यकों को लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की इस तरह की मानसिकता है।) जबकि 'अल्पसंख्यक' तो दूध के दुले हैं। वे तो करुणा के सागर होते हैं। अल्पसंख्यक समुदायक के तो सब लोग अब तक संत ही निकले हैं।
2- दंगो और सांप्रदायिक हिंसा के दौरान यौन अपराधों को तभी दंडनीय मानने की बात कही गई है अगर वह अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्तियों के साथ हो। यानी अगर किसी बहुसंख्यक समुदाय की महिला के साथ दंगे के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति बलात्कार करता है तो ये दंडनीय नहीं होगा।
3- यदि दंगे में कोई अल्पसंख्यक घृणा व वैमनस्य फैलता है तो यह अपराध नहीं माना जायेगा, लेकिन अगर कोई बहुसंख्यक ऐसा करता है तो उसे कठोर सजा दी जायेगी। (बहुसंख्यकों को इस तरह के झूठे आरोपों में फंसाना आसान होगा। यानी उनका मरना तय है।)
4- इस अधिनियम में केवल अल्पसंख्यक समूहों की रक्षा की ही बात की गई है। सांप्रदायिक हिंसा में बहुसंख्यक पिटते हैं तो पिटते रहें, मरते हैं तो मरते रहें। क्या यह माना जा सकता है कि सांप्रदायिक हिंसा में सिर्फ अल्पसंख्यक ही मरते हैं?
5- इस देश तोड़क कानून के तहत सिर्फ और सिर्फ बहुसंख्यकों के ही खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। अप्ल्संख्यक कानून के दायरे से बाहर होंगे।
6- सांप्रदायिक दंगो की समस्त जवाबदारी बहुसंख्यकों की ही होगी, क्योंकि बहुसंख्यकों की प्रवृति हमेशा से दंगे भडकाने की होती है। वे आक्रामक प्रवृति के होते हैं।
७- दंगो के दौरान होने वाले जान और माल के नुकसान पर मुआवजे के हक़दार सिर्फ अल्पसंख्यक ही होंगे। किसी बहुसंख्यक का भले ही दंगों में पूरा परिवार और संपत्ति नष्ट हो जाए उसे किसी तरह का मुआवजा नहीं मिलेगा। वह भीख मांग कर जीवन काट सकता है। हो सकता है सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का दोषी सिद्ध कर उसके लिए जेल की कोठरी में व्यवस्था कर दी जाए।
८- कांग्रेस की चालाकी और भी हैं। इस कानून के तहत अगर किसी भी राज्य में दंगा भड़कता है (चाहे वह कांग्रेस के निर्देश पर भड़का हो।) और अल्पसंख्यकों को कोई नुकसान होता है तो केंद्र सरकार उस राज्य के सरकार को तुरंत बर्खास्त कर सकती है। मतलब कांग्रेस को अब चुनाव जीतने की भी जरूरत नहीं है। बस कोई छोटा सा दंगा कराओ और वहां की भाजपा या अन्य सरकार को बर्खास्त कर स्वयं कब्जा कर लो।

सोनिया गांधी के नेतृत्व में इन 'देशप्रेमियों' ने 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक-२०११' को तैयार किया है।
१. सैयद शहबुदीन
२. हर्ष मंदर
३. अनु आगा
४. माजा दारूवाला
५. अबुसलेह शरिफ्फ़
६. असगर अली इंजिनियर
७. नाजमी वजीरी
८. पी आई जोसे
९. तीस्ता जावेद सेतलवाड
१०. एच .एस फुल्का
११. जॉन दयाल
१२. जस्टिस होस्बेट सुरेश
१३. कमल फारुखी
१४. मंज़ूर आलम
१५. मौलाना निअज़ फारुखी
१६. राम पुनियानी
१७. रूपरेखा वर्मा
१८. समर सिंह
१९. सौमया उमा
२०. शबनम हाश्मी
२१. सिस्टर मारी स्कारिया
२२. सुखदो थोरात
२३. सैयद शहाबुद्दीन
२४. फरह नकवी

शुक्रवार, 17 जून 2011

‘दूर हट ये फिरंगी, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’

सुबह के आठ बज रहे थे। उस दिन मैं जल्दी जाग गया था। चार बजे उठने वाले लड़के की नींद पत्रकारिता के पेशे में आने के बाद से औसतन 10 बजे खुलने लगी है। खैर, मैं नित्य की तरह शहर के खास समाचार-पत्र पढ़ रहा था। बाहर बच्चे खेल रहे थे। तभी एक जोर की आवाज आई-‘दूर हट ये फिरंगी, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।’ जैसी ही यह सुना, मन गदगद हो गया। मैं तुरंत ही बालकनी में पहुंचा। देखा कि एक छोटी सी बच्ची लकड़ी की तलवार से एक छोटे लड़के से लड़ाई कर रही है। उसके बाद में अपने कमरे में आ गया। अखबार पढ़ने का क्रम जारी रहा। इसी बीच रह-रह कर यह ख्याल जेहन में आ रहा था कि टेलीविजन पर जो प्रसारित हो रहा है उसका असर होता है। दरअसल, जी टीवी चैनल पर वीरांगना लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित कार्यक्रम का प्रसारण किया जा रहा है। मेरा भी यह पसंदीदा कार्यक्रम है। ‘दूर हट ये फिरंगी, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ उसी कार्यक्रम का प्रमुख डायलोग है। निश्चित तौर पर वह बालिका इस कार्यक्रम को देखती होगी।
     इस वाकये के बाद से उन लोगों की बात वजनदार दिख रही थी जो कहते हैं कि टेलीविजन पर अच्छे कार्यक्रम प्रसारित होने चाहिए। घटिया किस्म के कार्यक्रमों को देखने से समाज में विकृतियों का जन्म हो रहा है। वहीं वे लोग झूठे किस्म के लगे जो कहते हैं कि टेलीविजन पर प्रसारित कार्यक्रम तो समाज का ही आईना है। समाज में जो चल रहा है वही हम दिखा रहे हैं। अब भला इस बच्ची को देखकर तो झांसी की रानी के जीवन पर आधारित कार्यक्रम नहीं बनाया गया होगा। सत्य तो यही है कि झांसी की रानी सीरियल को देखकर उसने यह सीखा होगा। वैसे भी सदा से इसी बात पर जोर दिया जाता रहा है कि जो जैसा खाता है, देखता है, सुनता है और जैसा पढ़ता है उसके आचरण में वह झलकता है। परिवार छोटे हो गए हैं। घर में कहानी सुनाने को दादा-दादी है नहीं। मां-पिता दोनों ने अर्थ उपार्जन की जिम्मेदारी संभाल रखी है। ताकि इस महंगाई में गुजर हो सके। बच्चों के पालक मशीनी यन्त्र हो गए हैं। वे या तो कंप्यूटर गेम खेलकर अपना समय व्यतीत करते हैं या फिर टीवी से चिपके रहते हैं। क्या अच्छा है और क्या बुरा। इसकी उन्हें समझ नहीं होती। जो उनके बाल सुलभ मन को अच्छा लगता है वे उसे देखने लगते हैं। लगभग सभी चैनल पर फूहड़ता परोसी जा रही है। ऐसे में जिसे वो देख रहे होते हैं उसका उनके जीवन पर असर होता है। इसलिए टीवी कार्यक्रम निर्माताओं को कार्यक्रम बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका बच्चों और समाज के युवा वर्ग पर विपरीत प्रभाव न पड़े।
     वैसे आज झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की शहादत का दिन है। रानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी नगरी में मोरोपंत तांबे के घर में 19 नवम्बर 1835 को हुआ था। मां का नाम था भागीरथी। जन्म के समय लक्ष्मीबाई का नाम रखा मणिकर्णिका। 14 वर्ष की उम्र में झांसी नरेश गंगाधर राव नेवालकर से उनका विवाह हो गया। विवाह बाद ही उनका नाम रानी लक्ष्मीबाई रखा गया। रानी बचपन से ही अंग्रेजों का विरोध करती रहीं। अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए ही मनु ने बचपन में ही शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा ले ली थी। रानी का जीवन संघर्ष से बीता। लगभग हर एक भारतीय उनकी कहानी से परिचित है। अंग्रेजों के विरूद्ध 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अभूतपूर्व रहा। इसी बीच वह काला दिन आया जब रानी इस दुनिया से चली गईं। 17 जून 1857 को ग्वालियर में अंग्रेजों से युद्ध करते समय रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं। उस महान आत्मा को मेरी ओर से कोटिशः प्रणाम।

गुरुवार, 16 जून 2011

कांग्रेस को भारी पड़ेगी यह गलती

कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों को चोट पहुंचाई
 बा बा रामदेव के अनशन को खत्म करने के लिए रात को सोए हुए निर्दोष लोगों पर जिस तरह से लाठियां बरसाई गईं उससे तो इमरजेंसी की याद ताजा हो गई। जलियावाला बाग जैसी घटना है यह। पुलिसिया बर्बरता और अत्याचार की हद हो है। ऐसा तो अंग्रेजों के जमाने में होता था। आखिर कांग्रेस तमाम समस्याओं से घिरे आमजन का दमन कर सिद्ध क्या करना चाहती है। हर ओर यही चर्चा आम है। चार-पांच जून की दरमियानी रात को दिल्ली के रामलीला मैदान में इस घटना को अंजाम दिया गया। मेरी छह-सात जून यानी दो दिन ट्रेन, बस, टेम्पो और आॅटो में सफर में बीते। तब मैंने देखा की हर ओर इस मसले पर कांग्रेस की निंदा हो रही है। सबके अपने-अपने सवाल हैं, जवाब हैं। लेकिन, जहां तक मेरा मानना है अनशन के पूर्व से सरकार जितना घबरा रही थी उससे कहीं अधिक अपने ही मूर्खतापूर्ण कृत्य से कांप रही है। कांग्रेस को इस दफा उसकी चतुराई महंगी पड़ती दिख रही है। बौराई कांग्रेस ने मामले पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए उन सभी राज्यों की सरकारों को बाबा रामदेव के खिलाफ हल्ला बोलने के निर्देश दे दिए, जहां उनकी सरकार है या उनके समर्थन की सरकार है। उनसे कह दिया कि बाबा रामदेव के भाजपा और आरएसएस के रिश्तों पर कुछ भी बोलो। चाहे रिश्ता हो या न हो, लेकिन तुम चीखो जितना चीख सकते हो। बाबा की संपत्ति, चरित्र पर अंगुली उठाओ। कांग्रेस के इस रुख को देखकर लगता है कि या तो कांग्रेस ने अपना आपा खो दिया है या फिर वह हिटलर के प्रोपागण्डा मिनिस्टर जोसेफ गोएबल्स के सूत्र- ‘एक झूठ को सौ बार पूरी ताकत से बोलो तो वह सच जैसा लगने लगता है।’ का पालन कर रही है। 
    कांग्रेस ने हजारों बेगुनाह लोगों पर लाठियां बरसवाकर संविधान का खुला मजाक बनाया है। भारत का संविधान अनुच्छेद 19 के तहत देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। हर किसी को लिखकर, बोलकर या अन्य किसी माध्यम से अपनी बात कहने का मौलिक अधिकार है। बस वह देशद्रोह और सांप्रदायिकता को बढ़ावा न देता हो। अनुच्छेद 19 बी के तहत शांतिपूर्ण और निशस्त्र सम्मेलन करने की आजादी भी दी गई है। इसके अलावा इसी अनुच्छेद के डी उपवर्ग के अनुसार भारत के नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में अबाध संचरण की आजादी मिली हुई है। ये सब व्यवस्थाएं इसलिए की गईं हैं कि ताकि आप अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से देश के किसी भी भू-भाग में जाकर कह सको। बाबा रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ किया शुरू किया गया आंदोलन और अनशन संविधान के मुताबिक जायज है उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता। भ्रष्टाचार की समस्या से आज देश का हर नागरिक परेशान है। हाल ही आई एक रिपोर्ट के मुताबिक देश का हर तीसरा आदमी कभी न कभी भ्रष्टाचार का शिकार होता है। यही कारण है कि बाबा रामदेव के आंदोलन को पूरे देश से इतना समर्थन मिल रहा था। बाबा रामदेव के मामले में सरकार ने इन मौलिक अधिकारों का खुलकर हनन किया है। हजारों उन लोगों के मौलिक अधिकार को चोट पहुंचाई गई है जो उस आंदोलन का हिस्सा हैं। रामदेव के दिल्ली में प्रवेश पर रोक लगाकर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 19 डी का हनन किया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहा यह आंदोलन शांतिपूर्ण था। संविधान अनुच्छेद 19 बी के तहत शांतिपूर्ण तरीके से आयोजन की इजाजत देता है। तब फिर क्यों सरकार ने पुलिस के माध्यम से आधी रात को लाठियां बरसाकर हजारों लोगों को रामलीला मैदान से खदेड़ा। जिनमें महिलाएं, बच्चे और वृद्ध शामिल थे। इसमें मानवाधिकारों और महिला अधिकारों का भी हनन हुआ।
    आंसू गैस के गोले खुले भाग में दागने का नियम है। लेकिन, तमाम नियमों को ताक पर रख पुलिस ने पांड़ाल के भीतर आंसू गैस के गोले छोड़े। इस दौरान मंच पर भी आग लग गई। पुलिस की इस लापरवाही से बड़ा हादसा भी हो सकता था। मैदान में हजारों लोगों की जान मुश्किल में आ सकती थी। धारा 144 भी उपद्रव होने या उसकी आशंका की स्थिति में लागू की जाती है। सवाल उठता है कि निहत्थे और सोते हुए लोग क्या उपद्रव कर सकते थे। कांग्रेस के इशारे पर हुई इस कार्रवाई ने पूरे देश को झझकोर कर रख दिया है। संविधान द्वारा देश के नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों को भी तार-तार कर दिया है। लोगों का आक्रोश देख कर लग रहा है कि भविष्य में कांग्रेस को यह गलती बहुत भारी पड़ेगी।
    कांग्रेस नीत यूपीए सरकार का इस कार्रवाई से दोगला चेहरा भी उजागर होता है। एक ओर सरकार दिल्ली में आकर देशद्रोह और अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले लोगों का संरक्षण करती दिखती है। वहीं दूसरी ओर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी परेशानी बयां सकते लोगों का दमन करते दिखती है। इसी सरकार ने कश्मीर को लेकर दिल्ली में ही जहर उगलते लोगों पर एक एफआईआर तक दर्ज नहीं की। कश्मीर के पत्थरबाजों को शांत करने के लिए 100 करोड़ का राहत पैकेज जारी किया। जबकि वे देशहित में पत्थर कतई नहीं बरसा रहे थे, भाड़े पर और आईएसआई के कहने पर सेना पर पत्थरबाजी कर रहे थे। इतना ही नहीं सरकार इससे भी चार कदम आगे चली गई। सुप्रीम कोर्ट में देशद्रोह का मामला विचाराधीन होने के बावजूद बिनायक सेन को राष्ट्रीय योजना आयोग की समिति में शामिल कर लिया गया। हमेशा नक्सलियों से वार्ता का आतुर सरकार ने इन निर्दोश लोगों पर लाठियां क्यों चलाईं समझ से परे है। इसी कांग्रेस के कुछ नुमाइंदे दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी ओसामा बिन लादेन की मौत पर विधवा विलाप करते हैं और उसे ‘आप’ व ‘जी’ लगाकर संबोधित करते हैं वहीं देशहित में आवाज उठा रहे बाबा रामदेव को ठग कह रहे हैं। आश्चर्य है।
    आश्चर्य इस पर भी है कि मानवता के पैरोकार और गरीबों के मसीहा राहुल गांधी पूरे एपीसोड में कहीं नजर नहीं आ रहे। जबकि भट्टा परसौल में महिलाओं पर हुए अत्याचार पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने खूब प्रलाप किया किया था। लेकिन, यहां आधी रात को हुई पुलिसिया कार्रवाई में महिलाओं और बच्चों की दुर्दशा पर एक आंसू तक नहीं टपकाया। एक लाइन बोलकर भी पूरे घटनाक्रम का विरोध नहीं किया। वहीं हमारे प्रधानमंत्री ने इस पर भी अपनी मजबूरी जाहिर कर दी। वैसे उनसे देश की जनता को और दूसरे बयान की उम्मीद भी नहीं थी।
    अनशन के प्रारंभ से लेकर इस काण्ड तक बाबा रामदेव की भी कुछ गलतियां रहीं। यथा: जब सरकार बाबा से बात करने स्वयं आ रही थी तो बाबा को उसके पास स्वयं जाने की जरूरत नहीं थी। बाबा को बातचीत के लिए एक प्रतिनिधि मंडल भेजना चाहिए था, खुद को हर काम में आगे नहीं रखना था। बाबा ने अन्ना हजारे की भी चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने साफ कह दिया था कि यह सरकार दगाबाज है। कभी भी सरकार पीठ में छुरा घोंप सकती है। बाबा भूल गए कि उनका मुकाबला सरकार की चालाक चौकड़ी से था। कपिल सिब्बल सरकार ऐसे चतुर वफादार सिपाही है जिसने दुनिया की आंखों में धूल झौंकने की पूरी कोशिश की थी। कपिल सिब्बल ने पता नहीं गणित के किस नायाब फार्मूला से सिद्ध कर दिया था कि 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ ही नहीं है। ऐसे चुतर लोगों की चाल में बाबा फंस गए थे। लेकिन, पता नहीं किसकी मति ने फेरी खाई और रात में सोते हुए लोगों पर आंसू गैस के गोले छुड़वा दिए, लाठियां चलवा दीं। इनमें हजारों की संख्या में महिलाएं और उनके साथ आए बच्चे शामिल थे। कल्पना करिए कि ऐसी अफरा-तफरी में वृद्धों, महिलाओं और बच्चों की क्या हालत हुई होगी। वह भी दिल्ली जैसे शहर में आधी रात को। बताया जा रहा है कि पांच हजार लोग अभी तक अपने सगे-संबंधियों से बिछड़े हुए हैं।
    लाख विरोध के बाद भी कांग्रेस अभी तक अपनी इस कार्रवाई को जायज ठहरा रही है। घटना के बाद कांग्रेस ने बाबा रामदेव की संपत्ति का हिसाब-किताब लगाने में, उनकी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी से संबंध की खोज-खबर लेने में ओर बाबा रामदेव के कारोबार को सूचीबद्ध करने में जितनी सक्रियता दिखाई है, अगर उतनी कालाधन वापस लाने में दिखाई होती तो देश का कुछ भला होता। भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में और भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई ठोस कानून बनाने में तत्परता दिखाई होती तो शायद लोगों को इतने बड़े आंदोलन में शामिल होने की नौबत ही नहीं आती। लेकिन, कांग्रेस की मंडली में जमा भ्रष्ट नेताओं की ऐसी मंशा है ही नहीं। खैर, अभी तो इसे आंदोलन की शुरुआत ही माना जाना चाहिए। अगर बाबा रामदेव सरकार को माफ करके अनशन वापस भी ले ले तो जल्द ही कोई न कोई एक नया अन्ना हजारे या बाबा रामदेव भ्रष्टाचार, महंगाई, बेलगाम होती कानून व्यवस्था से पीड़ित जनता का नेतृत्व करने आ सामने आ ही जाएगा। 
यह लेख भोपाल से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र एलएन स्टार के ११ जून को प्रकाशित अंक में भी पढ़ा जा सकता है.

रविवार, 5 जून 2011

आप को कुछ कहने का अधिकार नहीं!

 आ प अपना काम करें, देश की समस्याओं पर बोलने का कोई अधिकार आपको नहीं है। अगर आप डाक्टर हैं तो लोगों का इलाज करें। शिक्षिक हैं तो सिर्फ वही पढ़ाएं जो किताबों में लिखा है। इंजीनियर है तो बिल्डिंग बनाएं, देश निर्माण करने की आवश्यकता नहीं। यही संदेश दिया है कांग्रेस ने चार-पांच जून की दरमियानी रात रामलीला मैदान में योग गुरु बाबा रामदेव के अनशन पर बर्बर कार्रवाई कर। कांग्रेस और उनके नेताओं ने मीडिया के सामने खुलकर कहा कि हमने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन कर रहे इस देश के नागरिकों पर आंसू गैस के गोले दागकर और लाठियां भांज कर एकदम सही किया है। इतना ही नहीं उन्होंने उन तमाम लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई करने का मन बना लिया है, जिन्होंने बाबा रामदेव का साथ दिया है या जिन्होंने भ्रष्टाचार के विरोध में अपनी आवाज उठाने का प्रयास किया। पूरी कांग्रेस और उनके बड़बोले नेता बकबक करने में लगे हैं कि बाबा रामदेव योग गुरु हैं, उन्हें लोगों को सिर्फ योग सिखाने का काम ही करना चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश जागरण की जरूरत नहीं। उनकी मंशा साफ देश को लूटने की दिखती है। वे चाहते हैं कि हम आराम से भ्रष्टाचार करते रहें और कोई हमें कुछ न कहे। उन्हें पता है जनता जाग गई तो हमने देश में जो लूट-खंसोट मचा रखी है वह बंद करनी पड़ेगी। मुझे आज तक यह समझ नहीं आया कि यह कौन सा तर्क है कि आप जो काम कर रहे हैं वही करें। देश की समस्याओं के बारे में कुछ भी कहने का आपको अधिकार नहीं। अरे, इस देश के हर एक नागरिक का अधिकार है कि वह देश में चल रही गड़बड़ियों को उजागर कर सके, उनके खिलाफ आवाज बुलंद करे। इस देश में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में राजपाठ में साधु-संतो, शिक्षिकों और उपदेषकों ने हमेशा से मार्गदर्शन दिया है। इस देश के इतिहास में तो इसकी लम्बी परंपरा है।
          कांग्रेस और उसके नेताओं ने 60 सालों में इस देश को जमकर लूटा है। अब जनता जाग रही है तो उसे डर लग रहा है कि उसका गोरखधंधा कैसे जारी रहेगा। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ठग है, धोखेबाज, बर्बर है। उसने पहले अन्ना हजारे को धोखा दिया और अब बाबा रामदेव के अनशन पर बल प्रयोग किया है। वैसे हमेशा से ही कांग्रेस के शासनकाल में जनआंदोलनों का यही हश्र होता आया है। आपातकाल में भी लाखों लोगों पर अनगिनत अत्याचार किए गए। पांच जून की दरमियानी रात जो हुआ उसका सारे देश में सब ओर से विरोध हो रहा है। कांग्रेस के इशारे पर रात में सोते हुए लोगों पर लाठीचार्ज जैसी दमनात्मक कार्रवाई की गई। पांडाल में हजारों महिलाएं अपने छोटे बच्चों के साथ सो रहीं थीं। वृद्ध साधु-संन्यासी और देशभर से आए हजारों आमजन दिनभर की थकान के बाद गहरी नींद में थे। ऐसे वक्त की गई बर्बर पुलिया कार्रवाई की तुलना जलियांवाला बाग से की जा रही है। जो कि अतिश्योक्ति कतई नहीं। कल्पनामात्र से ही आंखें भर आती हैं कि अपरा-तफरी में छोटे-छोटे बच्चों की क्या हालत हुई होगी। गरीबों का मसीहा बनने का ढोंग करने वाला राहुल गांधी इन्हें देखने नहीं आया और न ही का बयान जारी किया कि यहां महिलाओं के साथ कांग्रेस के इशारे पर कितनी बर्बता बरती गई। लेकिन, उस दयालु, करुणा के प्रतीक, मानवता के रक्षक राहुल गांधी का कहीं कोई अता-पता नहीं।
...... ये कैसी सरकार है जो एक और तो भ्रष्टाचारियों और आतंकवादियों के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं कर रही है वहीँ निर्दोष और समस्याओं से घिरे लोगों पर आसू गैस के गोले दाग कर अत्याचार कर रही है... क्या ये सरकार समाजकंटकों के बचाव और देश भक्तों के विरोध में है...???


किसने क्या कहा -

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी - इस घटना को रामलीला मैदान में रावण लीला करार दिया।
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी - बाबा रामदेव की गिरफ्तारी और लोगों पर लाठीचार्ज की तुलना जलियांवाला बाग कांड और आपातकाल की।
गाधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे - बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर कल मध्यरात्रि को हुई पुलिस कार्रवाई देश की लोकशाही पर कलंक की तरह है और इस कार्रवाई के लिए सरकार को सबक सिखाने वाला आदोलन करने की जरूरत है।
भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी - शनिवार को बाबा रामदेव के खिलाफ की गई कार्रवाई इमर्जेंसी के दिनों की याद दिलाती है। पार्टी अध्यक्ष ने कहा, ' यह लोकतंत्र को कलंकित करने वाली घटना है , जिसे सोनिया गांधीऔर मनमोहन सिंह के इशारे पर अंजाम दिया गया। पुलिस और आरएएफ ने लोकतांत्रिक तरीके से अनशन कर रहे निहत्थे लोगों पर अत्याचार किया , जो दुखद है।
संतोष हेगड़े - कर्नाटक के लोकायुक्त और लोकपाल विधेयक मसौदा समिति में समाज की ओर से शामिल सदस्य संतोष हेगड़े ने कहा कि बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर की गई पुलिस कार्रवाई आपातकाल के दिनों की याद दिलाती है। पुलिस ने रामलीला मैदान पर धारा 144 लगा दी। धारा 144 तब लगाई जाती है जब कानून व्यवस्था से जुड़ी स्थिति बिगड़ने की आशंका होती है। लेकिन जब पुलिस कार्रवाई हुई तब रामदेव, उनके समर्थक, महिलाएं और बच्चे सो रहे थे। सोते लोग कैसे कानून व्यवस्था से जुड़ी स्थिति बिगाड़ सकते हैं।
शांति भूषण - पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई से आपातकाल की याद आ जाती है। उन्होंने कहा कि यह काफी निंदनीय है और प्रधानमंत्री को इस मुद्दे पर इस्तीफा देना चाहिए।
बीजेपी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर - सभी को इसका विरोध करना चाहिए। उन्होंने इसे आजादी और लोकतंत्र, दोनों पर हमला बताया है।
आरएसएस प्रवक्ता राम माधव - सरकार का रवैया हैरान करने वाला है। सरकार भ्रष्टाचारियों से डर गई है, जिस कारण आंदोलन को जबरन खत्म करवाया गया। स्वामी अग्निवेश ने भी पुलिस कार्रवाई की निंदा करते हुए कहा कि वे इसका विरोध करेंगे।
अरविंद केजरीवाल - केंद्र सरकार ने बाबा और अन्ना दोनों को धोखा दिया है।
बाबा रामदेव - हरिद्वार पहुंचने के बाद कहा कि यूपीए सरकार मेरे एन्काउंटर की साजिश कर रही थी। उन्होंने प्रेस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अनशन से पहले होटल में केंद्रीय मंत्रियों के साथ मीटिंग के दौरान भी उन्हें अनशन न करने के लिए धमकी दी गई थी। सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि यूपीए अध्यक्ष के निर्देश पर ही रामलीला मैदान में जमा महिलाओं और बच्चों बर्बर कार्रवाई की गई।

शुक्रवार, 3 जून 2011

कुछ अपना-सा, कुछ बेगाना-सा शहर भोपाल

षि गालव की तपोस्थली ग्वालियर (ग्वाल्हेर) से राजा भोज की नगरी भोपाल (भोजपाल) आए हुए तकरीबन 25 दिन हो गए हैं। भोपाल प्रदेश की राजधानी है। राजधानी में रहने का सुख पाना बहुतों का सपना होता है। मेरा भी था। लेकिन, अब तक मुझे भोपाल में सुखद अनुभूति नहीं हो सकी है। हां, ग्वालियर से बिछुडने की पीड़ा जरूर है। ग्वालियर मुझे रोज याद आता है। आबाद भोपाल में रहने के लिए अब तक एक ठिकाना नहीं ढूंढ सका हूं। शायद इसलिए भी कि मुझे आफिस के नजदीक ही रहना है और अपना जेब भी छोटी है। वो तो शुक्र है कि यहां मेरे कुछ अजीज रहते हैं, जिनसे हौसला कायम है। वरना मैं अब तक उल्टे पैर ग्वालियर भाग लिया होता। दीपक जी सोनी, प्रमोद जी त्रिवेदी, मुकेश जी सक्सेना, अनिल जी सौमित्र। इन सबसे मेरे दिल के तार बहुत गहरे जुड़े हैं। भोपाल में ये सब मेरा सबसे बड़ा सहारा हैं। इनके अलावा कुछ और भी हैं जिन पर मैं अपना अधिकार रखता हूं। कुछ नए दोस्त भी बने हैं। इन सबकी वजह से पहाड़ सी परेशानियां भी बौनी नजर आती हैं।
              यह पहली दफा नहीं है कि मैं घर से बाहर रह रहा हूं। फर्क इतना है पहले पता रहता था कि दो-तीन महीने गुजरने के बाद वापस घर पहुंच जाउंगा। इस बार आने का तो पता था, लेकिन घर कब जाऊंगा यह नहीं पता। शायद इसलिए ही रह-रहकर ग्वालियर की बहुत याद आती है। बात इतनी सी नहीं है। दरअसल सुना है कि यहां चूना बहुत लगाया जाता है। यहां एक जगह का तो नाम ही चूना भट्टी है। भोपाल आते ही एक साहित्यक पत्रिका के माध्यम से साहित्यकार ने आगाह कर दिया कि भैया भोपाल में संभलकर रहना। न जाने कब कोई भोपाली सूरमा (सूरमा भोपाली) मिल जाए और मजाक-मजाक में चूना लगा जाए। इस बात पर विश्वास करने के अलावा कोई और चारा भी नहीं था। साहित्यकार आला दर्जे का था और खुद चूनाभोगी (भुक्तभोगी) था। सो गुरू बहुत डर बैठा है मन में। अपुन ठहरे बाबा भारती कोई भी डाकू सुल्तान ठग सकता है।
            वाहन विहीन हूं। आफिस जाते वक्त चेतक ब्रिज मिलता है। दरअसल आफिस चेतक ब्रिज के पास ही है। पुल के ठीक बीच जाकर खडा हो जाता हूं। वहां से नीले और लाल रंग की लम्बी-लम्बी ट्रेनें गुजरती हैं। मन करता है कि हीरो की माफिक पुल से सीधे ट्रेन पर कूद सवार हो जाऊं और घर पहुंच जाऊं। लेकिन, यह भी संभव नहीं। खैर, थकहार कर फिर से एक अदद ठौर की तलाश में जुट जाता हूं। माना कि कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली। लेकिन, ये भी सही है कि एक दिन तेली के दिन भी फिरेंगे और राजा भोज अपनी नगरी में उसे ससम्मान स्थान देंगे।

  फिलहाल खाली दिमाग की उपज एक कविता और झेलिए.....

ग्वालियर तू बहुत याद आता है।

गोपाचल पर्वत पर शान से खडा
आसमान का मुख चूमता ‘दुर्ग’
नदीद्वार, जयेन्द्रगंज, दौलतगंज
नया बाजार से कम्पू को आता रास्ता
वहां बसा है मेरा प्यारा घर
मुझे बहुत भाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।

सात भांति के वास्तु ने संवारा
सबको गोल घुमाता ‘बाड़ा’
दही मार्केट में कपडा, टोपी बाजार मे जूता
गांधी मार्केट में नहीं खादी का तिनका
पोस्ट आफिस के पीछे नजरबाग मार्केट में
मेरा दोस्त कभी नहीं जाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।

सन् 57 के वीरों की विजय का गवाह
शहर की राजनीति का बगीचा ‘फूलबाग’
बाजू से निकली स्वर्णरेखा नाला
कईयों को कर गया मालामाल
चैपाटी की चाट खाने
शाम को सारा शहर जाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है

चाय की दुकान, कालोनी का चैराहा
यहां सजती दोस्तों की महफिल
देष की विदेष की, आस की पड़ोस की
बातें होती दुनिया जहान की
मां की ममता, पिता का आश्रय
पत्नी का प्यार बुलाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।

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