शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

सेवागाथा डॉट ओआरजी : सेवा के अनुपम और अनुकरणीय प्रयासों का पता

 राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है। वह समाज के उत्थान के लिए कार्यरत है। लगभग 92 वर्षों की यात्रा में संघ ने समाज में व्यापक स्थान बनाया है। आरएसएस के संबंध में अकसर उसके ही कार्यकर्ता कहते हैं कि संघ में आए बिना संघ को समझा नहीं जा सकता। वास्तविकता भी यही है। संघ विरोधियों और संकीर्ण राजनेताओं के कारण संघ की चर्चा राजनीतिक गलियारे में अधिक होती है, जबकि राजनीति से संघ का लेना-देना बहुत अधिक नहीं है। संघ तो समाज के बाकि क्षेत्रों में अधिक सक्रिय है। सेवा का क्षेत्र भी ऐसा ही है। भला कितने सामान्य नागरिक जानते होंगे कि पूरे देश में आरएसएस के स्वयंसेवक एक लाख 70 हजार से अधिक नियमित सेवा कार्य चलाते हैं। यह सब काम संघ बिना किसी प्रचार के करता है। 'प्रसिद्धि परांगमुखता' संघ का सिद्धाँत है। संघ के लिए सेवा उपकार या पुण्यकार्य की भावना से किया जाने वाला कार्य नहीं है, बल्कि यह तो स्वयंसेवकों के लिए 'करणीय कार्य' है। किंतु, समय की आवश्यकता है कि समाज में यह भरोसा पैदा किया जाए कि देश में बहुत से अच्छे लोग हैं, जो रचनात्मक, सकारात्मक और सृजनात्मक कार्यों में संलग्न हैं। देश का वातावरण ऐसा है कि अच्छाई का प्रचार करने की आवश्यकता आन पड़ी है, ताकि अच्छे कार्यों में और लोग जुटें।

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

संघ के प्रति दुष्प्रचार कांग्रेस का एकमात्र ध्येय

कल्पना परुलेकर को मिली सजा से नहीं लिया सबक, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रेमचंद गुड्डू ने आरएसएस को बदनाम करने फेसबुक पर साझा किया फर्जी चित्र
यह फर्जी फोटो है,
असली फोटो लेख के आखिर में देखें
 राजनीति  में अपने विरोधियों को घेरने के लिए झूठ और तथ्यहीन जानकारियों का उपयोग अमर्यादित ढंग से करने की प्रवृत्ति में बढ़ गई है। यह प्रवृत्ति स्वच्छ राजनीति के लिहाज से कतई अच्छी नहीं है। विरोध करना और अपने विरोधी को घेरना अपनी जगह ठीक है, लेकिन इसके लिए झूठ का सहारा लेकर उनकी छवि बिगाड़ना उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने की आवश्यकता है। इस दिशा में राजनेताओं, पार्टियों और संगठनों ने संज्ञान लेना प्रारंभ किया है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2011 में कांग्रेस की तत्कालीन विधायक कल्पना परुलेकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी तस्वीर का उपयोग किया था। पिछले दिनों ही कांग्रेस की पूर्व विधायक कल्पना परुलेकर को फर्जी फोटो के मामले में न्यायालय ने सजा सुनाई है। किंतु लगाता है कि कांग्रेस के नेता अपनी गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि कल्पना परुलेकर को मिली सजा से सबक न लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी फोटो का सहारा लिया है। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को सलामी देते हुए स्वयंसेवकों का फोटो साझा किया है। यह दो फोटो को मर्फ करके बनाया गया फर्जी फोटो है, जो एबीपी न्यूज चैनल के वायरल सच कार्यक्रम में भी झूठा साबित हो चुका है। संघ के इंदौर विभाग के प्रचार प्रमुख सागर चौकसे ने इस मामले में प्रेमचंद गुड्डू और अन्य के विरुद्ध हीरा नगर थाने (इंदौर) में शिकायत दर्ज कराई है। इसके साथ ही इंदौर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक और इंदौर के पुलिस अधीक्षक को त्वरित कार्रवाई के लिए ज्ञापन दिया है। हालाँकि, पुलिस में शिकायत के बाद और अपने झूठ की पोल खुलने पर कांग्रेस के पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने फर्जी फोटो और आपत्तिजनक संदेश अपने फेसबुक पेज से हटा लिया है।

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

विकास की मुख्यधारा में आए गाँव

स्वतंत्रता के बाद सत्तर वर्षों तक गाँव और गरीब की सिर्फ बात ही होती रही, उनकी बेहतरी के लिए कोई कार्ययोजना कभी नहीं बन सकी। ब्रिटिश शासन से सत्ता सीधे कांग्रेस के हाथों में आई थी। कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने महात्मा गाँधी के आग्रह के बाद भी गाँवों की सुध नहीं ली और तब से गाँवों की अनदेखी करने की परंपरा-सी बन गई थी। कांग्रेस ने अपनी राजनीति चलाने के लिए गाँधीजी की विरासत पर स्वामित्व का सदैव दावा किया है, लेकिन उनके सपनों के भारत को साकार करने के प्रयास कभी नहीं किए। यह तथ्य है कि भारत की आत्मा गाँव में बसती है और गाँव का विचार महात्मा गाँधी के चिंतन के केंद्र में रहा। इसलिए जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'स्मार्ट सिटी' की तर्ज पर 'स्मार्ट गाँव' विकसित करने का निर्णय लिया, तब लगा कि गाँधीजी के विचारों की वास्तविक उत्तराधिकारी भारतीय जनता पार्टी है। इस बात को प्रमाणित करने के लिए सरकार की अन्य योजनाओं को भी देख लेना उचित होगा, जिनमें भारत की बुनियादी समस्याओं को दूर करने का उद्देश्य निहित है। भारत सरकार ने जब यह निर्णय किया कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ग्रामीण मिशन के तहत गाँवों का उत्थान किया जाएगा, आदर्श गाँव विकसित किए जाएंगे, तब लगा कि 70 साल में ही सही आखिर गाँवों के अच्छे दिन आ गए हैं। 

आदर्श गाँव के संबंध में विचार और चर्चा करते समय इतना स्पष्ट होना चाहिए कि इस योजना का अभिप्राय गाँवों को शहरों में तब्दील करना कतई नहीं है। जब भी आदर्श गाँव की चर्चा चलती है, तब आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न, संचार के सभी साधनों की उपलब्धता वाले गाँव का विचार मन में आता है। हम कल्पना करते हैं कि गाँव की सड़कें भी शहरों की तरह बेहतरीन हों। चौबीस घंटें बिजली आपूर्ति हो। इंटरनेट उपब्लध हो। ऐसा नहीं है कि गाँव में यह नहीं होना चाहिए। निश्चित ही यह बुनियादी जरूरते हैं, प्रत्येक गाँव में यह सुविधाएँ उपलब्ध होनी ही चाहिए। लेकिन, हमें समझना चाहिए कि गाँव का शहरीकरण ही गाँव का विकास नहीं है। यह अभारतीय विचार है। गाँव की अपनी मौलिकता है, उसे बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है। आदर्श गाँव का विचार करते समय हमें समग्रता से विचार करना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी की सरकार से उम्मीद है कि वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ग्रामोदय के एकात्मिक प्रारूप के आधार पर ही आदर्श गाँव विकसित करेगी। आदर्श गाँव हमारे समृद्ध संस्कृति और जीवन मूल्यों के केन्द्र बनने चाहिए। यह गाँव भारतीय अवधारणा के मुताबिक हमें परिवार से गाँव, गाँव से जिला, जिला से प्रदेश, प्रदेश से देश और देश से विश्व को एकसूत्र में बाँधने वाली इकाई के रूप में विकसित हों। 11 अक्टूबर, 2014 को प्रारंभ की गई सांसद आदर्श ग्राम योजना का उद्देश्य यही है कि गाँव और वहाँ के लोगों में उन मूल्यों को स्थापित करना है, जिससे वे स्वयं के जीवन में सुधार कर दूसरों के लिए एक आदर्श गांव बनें। इस योजना में लोकसभा और राज्यसभा के सभी सांसद शामिल हैं। प्रधानमंत्री ने दूसरे दलों के सांसदों से भी एक-एक गाँव गोद लेने का आग्रह किया है। योजना के मुताबिक प्रत्येक सांसद एक गाँव की जिम्मेदारी लेकर 2016 तक उसका विकास करेगा। बाद में, दूसरे गाँवों की जिम्मेदारी लेकर उन्हें भी विकास की राह पर लेकर आएंगे। 

यह आलेख 'गाँवों की तरक्की की आदर्श योजना' शीर्षक से वर्ष 2017 में प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय एवं शिवानंद द्विवेदी की पुस्तक 'परिवर्तन की ओर' में शामिल है।

इस बार गाँव आदर्श रूप में विकसित होंगे, इसका भरोसा गाँव के विकास के प्रति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संजीदगी है। यही कारण है कि वे बार-बार सांसदों से उनके गाँव के विकास की रिपोर्ट लेते रहते हैं। भाजपा के जिन सांसदों ने गाँव के विकास में रुचि नहीं दिखाई थी, प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर इस महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए प्रोत्साहित किया था। गैर-भाजपाई सांसदों से भी प्रधानमंत्री ने आग्रह किया है कि वह भी एक गाँव गोद लेकर उसके उत्थान की चिंता करें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रशिक्षण चूंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रचना में हुआ है, इसलिए वे अपनी वाणी की अपेक्षा कर्म से शिक्षा देते हैं। बनारस से 25 किलोमीटर दूर स्थित है गाँव जयापुर इसका उदाहरण है। प्रधानमंत्री ने जयापुर को गोद लिया है। भले ही प्रधानमंत्री स्वयं जयापुर नहीं जा पाते, लेकिन अपने गोद लिए गाँव की चिंता सदैव करते हैं। आज जयापुर सबके सामने आदर्श गाँव के रूप में प्रस्तुत है। प्रधानमंत्री द्वारा गोद लेने से पूर्व गाँव में मूलभूत सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन अब यहाँ न केवल सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था है, बल्कि लोगों के बीच आपसी सहयोग की भावना भी गहरी हो गई है। गाँव के संबंध में जैसी कल्पना रहती है कि वहाँ के लोग आपस में मिलकर ही अपनी समस्याओं और चुनौतियों से निपट लेते हैं, वैसी कल्पना जयापुर में साकार दिखती है। जयापुर के गाँव वासियों से जब यह पूछा जाता है कि अच्छे दिन आ गए क्या? तब वे उत्तर देते हैं कि जयापुर के अच्छे दिन आ गए हैं। अब यहाँ सब सुख है। मोदीजी ने जब से गाँव को गोद लिया है, तब से गाँव की सूरत ही बदल गई है। इस लेख के लेखक का ननिहाल पिपरौआ, मध्यप्रदेश में ग्वालियर से तकरीब 35 किलोमीटर दूर स्थित है। तीन-चार साल पहले बारिश के समय गाँव में जाना मुश्किल हो जाता था। अब कभी भी गाँव जाइए, कोई दिक्कत नहीं। शहर से गाँव तक बेहतर सड़क मार्ग है। पानी की सुविधा है। लगभग प्रत्येक घर में शौचालय है। बिजली चौबीस घंटा तो नहीं, लेकिन पहले से अधिक समय के लिए रहती है। 

गाँव पिपरौआ के विकास का उल्लेख पत्रकार-लेखक लोकेन्द्र सिंह को कोट करते हुए रेनू सैनी ने अपनी पुस्तक 'मोदी सक्सेस गाथा' में किया है।

रेनू सैनी की पुस्तक 'मोदी सक्सेस गाथा- प्रधानमंत्री मोदी के जीवन की 101 प्रेरक कहानियां' से साभार।

यह सिर्फ एक या दो गाँव की कहानियाँ नहीं हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का गाँव अजनास भी तेजी से सुविधा सम्पन्न बन रहा है। देवास जिले के खातेगाँव विधानसभा के अंतर्गत आने वाले अजनास गाँव को नशामुक्त बनाने के प्रयास तेजी से हो रहे हैं। लोक सभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन ने इंदौर से लगभग 55 किलोमीटर दूर स्थित पोटलोद गाँव को गोद लिया है। इस गाँव बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा था। लेकिन, अब यह तेजी से विकास की राह पर चल पड़ा है। इसी तरह गृह मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा चिह्नित गाँव बेंती सोलर एनर्जी से रोशन हो रहा है। गृहमंत्री के गोद लेने के बाद बेंती देशभर में चर्चित हो गया है। पंजाब नेशनल बैंक ने यहाँ सोलर स्ट्रीट लाइट लगवाई हैं। सांसद हेमामालिनी का गोद लिया गाँव रावल (मथुरा), उमा भारती का गाँव पवा (ललितपुर), किरण खेर का गाँव सारंगपुर (चंडीगढ़) और धर्मेन्द्र प्रधान का गाँव लक्ष्मी बिगहा (पटना) सांसद आदर्श गाँव योजना के अनुरूप विकसित होकर नये आयाम प्रस्तुत करेंगे। लगभग सभी भाजपा सांसद पूरी शिद्दत से अपने गोद लिए गाँव की चिंता कर रहे हैं। भले ही वह गाँव में नियमित नहीं पहुँच रहे, लेकिन उनके प्रतिनिधि ग्राम विकास के कार्यों पर पूरी नजर रखे हुए हैं। गुजरात के नवसारी के भाजपा सांसद सीआर पाटिल ने तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आदर्श सांसद गाँव योजना को सबसे पहले जमीन पर उतार दिया है। कावेरी नदी के किनारे बसा चिखली गाँव पहला आदर्श गाँव बन गया है। पाटिल ने महज चार माह में गाँव की तस्वीर बदल दी। चिखली में वाई-फाई है। यहाँ हेलीपेड भी है। सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिन्हें थानों से जोड़ा गया है। ऐसी अनेक आधुनिक सुविधाएँ चिखली में उपलब्ध हैं। 

भाजपा के लिए जिस गाँव के प्रति अधिक लगाव होना चाहिए, वह गाँव है- धानक्या। राजस्थान की राजधानी जयपुर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित धानक्या गाँव पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बचपन का साक्षी रहा है। चूँकि यह वर्ष दीनदयाल उपाध्याय का जन्म शताब्दी वर्ष है। इसलिए इस साल धानक्या को भी पूर्ण आदर्श गाँव में विकसित करके सबके लिए रोल मॉडल बना देना चाहिए। धानक्या की जिम्मेदारी केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने ली है। उन्होंने एक समग्र योजना इसके लिए बनाई है, जिसमें बुनियादी जरूरतें और आधुनिक सुविधाओं को शामिल किया गया है। गाँव में भू-जल स्तर काफी गिर गया है। पानी की समस्या से निपटने के लिए तकरीबन सात किमी दूर बांडी नदी से पाइप लाइन द्वारा गाँव में पानी लाने की योजना है। स्वच्छता के लिए पूरी पंचायत में विशेष प्रयास हुए हैं। यहाँ लगभग प्रत्येक गाँव में शौचालय बन गया है। कहा जा सकता है कि पंचायत खुले में शौच मुक्त हो गई है। सबसे बड़ा प्रस्ताव यहाँ मिनी सचिवालय का है। इसके शुरू होने से चिकित्सक, पटवारी, ग्राम सेवक, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, लोकमित्र और ग्राम सचिव एक ही छत के नीचे गाँव के लोगों की मदद के लिए उपलब्ध होंगे। गाँव वासियों को अपने छोटे-बड़े काम के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। अच्छी शिक्षा और चिकित्सा सुविधा के लिए भी ठोस प्रयास जारी हैं। चूँकि सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह स्वयं खिलाड़ी हैं, इसलिए युवाओं के लिए गाँव में उत्तम खेल सुविधाएँ उपलब्ध हों, इसके लिए खेल मैदान विकसित किया जा रहा है। गाँव में प्रवेश करते ही प्रत्येक व्यक्ति को अहसास हो जाए कि धानक्या में एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता दीनदयाल उपाध्याय का बचपन बीता है, इसके लिए दीनदयाल जी की स्मृति में राष्ट्रीय स्मारक की आधारशिला यहाँ रखी गई है। 

विकास के पथ पर आगे बढ़ते इन गाँवों कहानियाँ हमें बताती हैं कि ग्रामवासिनी भारत माता के अच्छे दिन आ गए हैं। विकास की अवधारणा में पहली बार ईमानदारी से गाँव शामिल हुए हैं। 70 साल के इंतजार के बाद अब गाँव तक विकास की किरणें पहुँचनी शुरू हुईं हैं। उम्मीद की जा सकती है कि वह दिन दूर नहीं, जब गाँव से न शिक्षा के लिए पलायन होगा, न स्वास्थ्य के लिए। रोजगार की तलाश में किसी को भी गाँव छोड़कर शहर आने की आवश्यकता नहीं होगी।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास


विजयादशमी उत्सव के उद्बोधन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि निर्भयतापूर्वक सज्जनशक्ति को आगे आना होगा, समाज को निर्भय, सजग और प्रबुद्ध बनना होगा
 विश्व  के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए विजयादशमी उत्सव का बहुत महत्त्व है। वर्ष 1925 में विजयादशमी के अवसर पर ही संघ की स्थापना स्वतंत्रतासेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। विजयादशमी के अवसर पर होने वाला सरसंघचालक का उद्बोधन देश-दुनिया में भारतवंदना में रत स्वयंसेवकों के लिए पाथेय का काम करता है। इस उद्बोधन से संघ की वर्तमान नीति भी स्पष्ट होती है, इसलिए स्वयंसेवकों के अलावा बाकी अन्य लोग भी सरसंघचालक के उद्बोधन को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। इस दशहरे पर संघ के वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में महत्त्वपूर्ण विषयों पर संघ के दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। अपने इस उद्बोधन में उन्होंने समाज की सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास किया है। समाज में सज्जन लोगों का प्रतिशत और उनकी शक्ति अधिक है, लेकिन महावीर हनुमान की तरह समाज को अपनी सज्जनशक्ति का स्मरण नहीं है। रामकथा में माता सीता की खोज पर निकले हनुमान सहित अन्य वीर जब समुद्र के विस्तार को देखते हैं, तब उनका उत्साह कम हो जाता है। तब जामवन्त ने हनुमान को उनके पराक्रम से परिचित कराया था। जब पराक्रमी हनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण होता है, तब 100 योजन विशाल समुद्र भी उनके मार्ग में बाधा नहीं बन सका। जब समाज की सज्जनशक्ति को अपने बल का परिचय प्राप्त हो जाएगा, तब भारत को विश्वगुरु की खोयी हुई प्रतिष्ठा प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता। 

शनिवार, 23 सितंबर 2017

ममता सरकार के तुष्टीकरण को न्यायालय ने दिखाया आईना

 माननीय  न्यायालय में एक बार फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की नीति का सच सामने आ गया। ममता बनर्जी समाज को धर्म के नाम पर बाँट कर राजनीति करने वाले उन लोगों/दलों में शामिल हैं, जो अपने व्यवहार और राजनीतिक निर्णयों से घोर सांप्रदायिक हैं लेकिन, तब भी तथाकथित 'सेकुलर जमात' की झंडाबरदार हैं। मुहर्रम का जुलूस निकालने के लिए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना, क्या यह सांप्रदायिक निर्णय नहीं था? क्या तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस फैसले मं  तुष्टीकरण और वोटबैंक की बदबू नहीं आती? क्या यह स्पष्टतौर पर दो समुदायों को दुश्मन बनाने वाला फैसला नहीं था? यकीनन उत्तर है- हाँ। न्यायालय में भी यही सिद्ध हुआ है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध के निर्णय के विरुद्ध सुनवाई करते हुए कलकत्ता न्यायालय ने ममता सरकार को जो आईना दिखाया है, उसमें उनकी राजनीति की असल तस्वीर बहुत स्पष्ट नजर आ रही है। न्यायालय ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए एक गंभीर प्रश्न पूछा - 'सौहार्द खतरे में होने की आशंका जता कर क्या सांप्रदायिक विभेद पैदा नहीं किया जा रहा है?' इस प्रश्न का जो उत्तर है, वह सब जानते हैं। सरकार भी जानती है, लेकिन उसका उत्तर देने की ताकत उसमें नहीं है। न्यायालय के मात्र इसी प्रश्न ने ममता सरकार की समूची राजनीति को उधेड़ कर रख दिया।

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नक्सली हिंसा पर खामोशी

 देश  में असहिष्णुता और हिंसा पर आजकल बहुत बहस हो रही है। विशेषकर, जब किसी कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े या विशेष समुदाय के व्यक्ति के साथ हिंसा होती है, तब असहिष्णुता का भूत अचानक से प्रकट होता है। जबकि अन्य हत्याओं पर न हमें असहिष्णुता दिखाई देती है और नहीं किसी प्रकार हमारे माथे पर बल पड़ता है। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार में हिंदू समाज के साथ हो रही ज्यादती भी असहिष्णुता की श्रेणी में नहीं आती है और केरल में एक के बाद एक राष्ट्रीय विचारधारा से संबंद्ध व्यक्तियों की हत्याएं भी हमें विचलित नहीं करती हैं। नक्सली हिंसा पर तो तमाम बुद्धिजीवी गजब की खामोशी साध जाते हैं। अनेक अवसर पर तो प्रसन्नता भी जाहिर करते हैं। नक्सलियों द्वारा 76 जवानों की हत्या के दौरान अपने यह कम्युनिस्टों को जश्न मनाते देखा है। कम्युनिस्ट विचारधारा के नेता, लेखक एवं पत्रकार नक्सलियों की हिंसा का बचाव करते दिखते हैं। जबकि यह खूंखार किस्म के असहिष्णु हैं। कम्युनिस्ट नक्सलियों का बचाव इसलिए करते हैं, क्योंकि वैचारिक रूप से दोनों सहोदर हैं। नक्सलियों की बर्बरता को देखकर इन्हें किसी भी प्रकार आतंकवादियों से कमतर नहीं माना जा सकता। बीते रविवार झारखंड के गुमला में पति-पत्नी को गोलियों से भूनकर इस बात को सिद्ध कर दिया है।

रोहिंग्या मुद्दे पर सरकार का पक्ष राष्ट्रहित में

कश्मीरी पंडितों को उनकी भूमि और न्याय दिलाये बिना, रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए सरकार पर दबाव बनाना, अपने लोगों के साथ बेईमानी है. ये लोग वर्षों से तम्बू में सो रहे हैं, पहले इनके लिए आवाज़ बुलंद करो.
 यह  सुखद है कि राष्ट्रहित में वर्तमान सरकार कठोर कदम उठाने में हिचकिचाती नहीं है। पूर्ववर्ती सरकारें प्रत्येक मामले को पहले वोट की तराजू पर तोलती थीं और उस वजन के आधार पर निर्णय करती थीं। जबकि वर्तमान सरकार ने अनेक अवसरों पर अपने निर्णयों से बताया है कि उसके लिए राष्ट्रहित सबसे पहले है। रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर भी सरकार ने अनेक प्रकार की आलोचनाओं की चिंता न करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपना स्पष्ट पक्ष रखा है। केंद्र सरकार ने बीते सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय से रोहिंग्या मुद्दे पर हस्तक्षेप न करने का आग्रह करते हुए कहा कि उन्हें प्रत्यर्पित करने का निर्णय सरकार का नीतिगत फैसला है। केंद्र सरकार ने बिना लाग-लपेट के कह दिया है कि उनमें से कुछ का संबंध पाकिस्तानी आतंकवादी गुटों से है। 
          शीर्ष न्यायालय रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने जब इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष जानना चाहा, तब केंद्र सरकार ने अपना उक्त पक्ष रखा और कहा कि यह देश हित में लिया गया एक 'आवश्यक कार्यकारी' फैसला है। केंद्र सरकार का कहना गलत नहीं है कि कई रोहिंग्या मुसलमानों का संबंध आतंकवादी समूहों से है। ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं। घोर शांतिप्रिय बौद्ध बाहुल्य देश म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय को लेकर जिस प्रकार का वातावरण बना है, वह भी इस ओर इशारा करता है। शरणार्थियों को आश्रय नहीं देने और संप्रग सरकार के समय में आ चुके रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजने के सरकार के निर्णय की आलोचना करने से पहले हमें यह विचार जरूर करना चाहिए कि आखिर वह कौन-से कारण हैं कि इस्लामिक देश भी रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए तैयार नहीं है।