गुरुवार, 23 नवंबर 2023

अपनी नियति की ओर बढ़ता भारत

अर्चना प्रकाशन, भोपाल की स्मारिका-2023 में प्रकाशित संपादकीय


हम अवश्य ही 1947 में ब्रिटिश उपनिवेश के चंगुल से स्वतंत्र हो गए परंतु औपनिवेशिकता से मुक्ति की ओर हमने अब जाकर अपने कदम बढ़ाए हैं। हम कह सकते हैं कि भारत नये सिरे से अपनी ‘डेस्टिनी’ (नियति) लिख रहा है। यह बात ब्रिटेन के ही सबसे प्रभावशाली समाचार पत्र ‘द गार्जियन’ ने 18 मई, 2014 को अपनी संपादकीय में तब लिखा था, जब राष्ट्रीय विचार को भारत की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ विजयश्री सौंपी थी। गार्जियन ने लिखा था कि अब सही मायने में अंग्रेजों ने भारत छोड़ा है (ब्रिटेन फाइनली लेफ्ट इंडिया)। आम चुनाव के नतीजे आने से पूर्व नरेन्द्र मोदी का विरोध करने वाला ब्रिटिश समाचार पत्र चुनाव परिणाम के बाद लिखता है कि भारत अंग्रेजियत से मुक्त हो गया है। अर्थात् एक युग के बाद भारत में सुराज आया है। भारत अब भारतीय विचार से शासित होगा। गार्जियन का यह आकलन सच साबित हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अब तक के कार्यकाल में हम देखते हैं कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की जा रही है। अर्थात् लंबे समय बाद देश में यह अवसर आया है जब सभी क्षेत्रों में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का अभ्युदय दिख रहा है। प्रत्येक क्षेत्र में सांस्कृतिक पुनर्जागरण दिखायी दे रहा है। वर्तमान में जिस विचार के हाथ में शासन के सूत्र हैं, वह भारतीयता से ओत-प्रोत है। उसके मस्तिष्क में कोई द्वंद्व नहीं, उसे अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व है। उसका विश्वास है कि जिस संस्कृति के लोग नित्य प्रार्थना में कहते हों- ‘प्राणियों में सद्भावना हो और विश्व का कल्याण हो’, समाज जीवन के विविध क्षेत्र उसी संस्कृति के मूल्यों से समृद्ध होने चाहिए। भारत का स्वदेशी समाज आज धर्म, संस्कृति, सभ्यता, भाषा के विरुद्ध स्थापित पूर्वाग्रह से मुक्त हो रहा है।

अमृतकाल में ‘स्व’ से जुड़ने का जब आह्वान हुआ, तो उसका प्रभाव समाज में दिखायी दिया। शासन स्तर पर भी ऐसे निर्णय लिए गए जो ‘स्व’ के अनुकूल थे। यह समझने एवं प्रशंसा की बात है कि वर्तमान शासन व्यवस्था को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के साथ दिखने में कोई संकोच नहीं अपितु गर्व की अनुभूति ही होती है। एक दौर था जब सत्ताधीश इफ्तार पार्टी में लजीज भोजन का लुत्फ तो उठाते थे लेकिन नवरात्रि के कन्याभोज से परहेज करते थे। अब यह संकोच समाप्त हो गया। अब उपेक्षा किसी की नहीं है, अपितु ‘सबके साथ’ का वातावरण बना है, जो भारतीय मूल्यों के प्रकटीकरण का द्योतक है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से लेकर भारत के अनेक मान बिन्दु वर्षों से अपने उद्धार के लिए उसी प्रकार प्रतीक्षारत थे, जिस प्रकार शिलाखंड बनी अहिल्या को भगवान श्रीराम की प्रतीक्षा थी। देश के विभिन्न हिस्सों के साथ ही भारत के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश में भी सांस्कृतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना को देखा जा सकता है। मध्यप्रदेश के उज्जैन में महाकाल लोक में भारतीय संस्कृति के रंगों की छंटा दिखायी देती है। निकट भविष्य में ओरछा में राजाराम कॉरिडोर एवं वनवासी राम लोक, जाम सावली में हनुमान धाम, सलकनपुर में देवी लोक, दतिया में माई पीताबंरा धाम और ओंकारेश्वर में एकात्म धाम सांस्कृतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा के केंद्र बनेंगे। मध्यप्रदेश की धरती ने ही अनुसूचित जनजाति समाज के विरुद्ध चलनेवाले षड्यंत्र को विफल करके भारतीय समाज को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ की संकल्पना दी। होशंगाबाद ‘नर्मदापुर’ और इस्लाम नगर ‘जगदीशपुर’ के रूप में अपनी मूल पहचान को प्राप्त हो गया। ऐसे अनेक अभूतपूर्व निर्णय हमें दिखायी देते हैं, जिनकी कल्पना दस वर्ष पूर्व तक नहीं थी।  

ऐसा नहीं है कि यह सांस्कृतिक जागरण निर्विरोध हो रहा है। ऋषियों के यज्ञों में जिस प्रकार आसुरी शक्तियां विघ्न पैदा करती थीं, वैसे ही भारत के सांस्कृतिक जागरण में अभारतीय ताकतें, जिन्हें भारत विरोधी ताकतें भी कहा जाता है, यथासंभव विघ्न पैदा करने का प्रयास कर रही हैं। परंतु अच्छी बात यह है कि भारत की सज्जनशक्ति देशहित में अपनी भूमिका को पहचान कर, अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रही है। यही कारण है कि अभारतीय ताकतें पूरा जोर लगाने के बाद भी उभरती सांस्कृतिक पहचानों को धूमिल नहीं कर पा रही हैं। 

यह जो सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो रहा है, यह देश-प्रदेश की सर्वांगीण उन्नति का आधार भी बनेगा। भारत की एकता एवं अखंडता का सूत्र भी हमारी संस्कृति है। प्राचीन इतिहास के पृष्ठ भी जब हम उलटकर देखते हैं, तब हमें ध्यान आता है कि आचार्य चाणक्य से लेकर आचार्य शंकर तक ने भारत को शक्ति सम्पन्न एवं एकजुट करने के लिए संस्कृति का ही आधार लिया। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने भी अपने समय में देश को जोड़ने और एकात्म स्थापित करने के लिए सांस्कृतिक पक्ष पर ही काम किया। ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध देशभर में चल रहे आंदोलनों का प्राण भी संस्कृति थी। भारत भूमि के साथ उत्तर से दक्षिण एवं पूर्व से पश्चिम तक जो हमारा नाता है, उसका भी आधार संस्कृति है। दुनिया में भारत की संस्कृति ने ही सबसे पहले कहा था कि सबके मूल में एक ही तत्व है। जड़-चेतन में एक ही ब्रह्म है। इसलिए ही भारत में बाहरी तौर पर तो विविधता दिखाई देती है, किंतु अंदर से सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। क्योंकि, सब मानते हैं कि सबमें एक ही तत्व है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत ने विश्व में जो सम्मान प्राप्त किया है, वह आर्थिक प्रगति से कहीं अधिक अपनी सांस्कृतिक विरासत एवं सांस्कृतिक जीवनमूल्यों के नाते किया है। यदि भारत अपनी संस्कृति को ही संभालकर नहीं रख सका, तब उसकी पहचान क्या रह जाएगी? विश्व में भारत राष्ट्र की पहचान उसकी संस्कृति से रही है। संस्कृति भारत की आत्मा है। भारत की एकता का मुख्य आधार भी संस्कृति ही है। भारत की जो आत्मा है, जिसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने चिति कहा है, वह इस देश की संस्कृति है। गांधीवादी चिंतक धर्मपाल ने भी अपनी पुस्तक ‘भारतीय चित्त, मानस और काल’ में भारत के सांस्कृतिक पक्ष को रेखांकित करते हुए उसके मूल को समझाने का प्रयास किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब तक हम भारत के चित्त को नहीं समझेंगे, उसे जानेंगे नहीं और उससे जुड़ेंगे नहीं, तब तक हम भारत को ‘भारत’ नहीं बना सकते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य कहते हैं कि भारत को समझने के लिए चार बिन्दुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। सबसे पहले भारत को मानो, फिर भारत को जानो, उसके बाद भारत के बनो और सबसे आखिर में भारत को बनाओ। 

अर्चना प्रकाशन, भोपाल को साधुवाद की उसके संपादकीय मंडल ने अपनी स्मारिका को ‘अमृतकाल में सांस्कृतिक अभ्युदय’ पर केंद्रित किया है और हृदय से धन्यवाद कि इसके संपादन की महती जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए मुझ अकिंचन पर विश्वास जताया। यह कार्य पूरा नहीं हो पाता यदि अर्चना प्रकाशन के संपादकीय मंडल एवं देश के प्रतिष्ठित लेखकों का यथोचित सहयोग प्राप्त नहीं हुआ होता। लेखकों के साथ ही इसके आकल्पन में अपना योगदान देनेवाले बंधुओं के प्रति सदैव कृतज्ञ रहूँगा। विश्वास है कि अर्चना प्रकाशन की यह स्मारिका समाज का प्रबोधन करने में सफल होगी। देश की प्रगति की आकांक्षा रखनेवाले प्रबुद्ध वर्ग में चलनेवाले विमर्श को गति देने का काम करेगी। हमने बड़े जतन से यह स्मारिका तैयार की है, अब प्रबुद्ध समाज के सामने मूल्यांकन/समीक्षा एवं सुझाव हेतु प्रस्तुत है…. 



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