मंगलवार, 18 नवंबर 2014

मध्यप्रदेश की धड़कन है माण्डू

जहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह 
 जि सने माण्डू नहीं देखा, उसने मध्यप्रदेश में देखा क्या? इसलिए भारत का दिल देखने निकलो तो माण्डव जाना न भूलिएगा। बादशाह अकबर हो या जहांगीर, सबको यह ठिया पसंद आया है। अबुल फजल तो सम्मोहित होकर कह गया था कि माण्डू पारस पत्थर की देन है। माण्डू प्रकृति की गोद में खूब दुलार पा रहा है। ऐसा लगता है कि वर्षा ऋतु तो माण्डू का सोलह श्रंगार करने के लिए ही यहां आती है। बारिश में तो यह अल्हड़ नवयौवन की तरह अंगड़ाई लेता नजर आता है। यहां आकर आपका दिल भी आशिक मिजाज हो ही जाएगा। रानी रूपमति के महल से दिखने वाला नैसर्गिक सौंदर्य आपको प्रेम सिखा ही देगा। जहाज महल पर खड़े होकर आप असीम सुकून की अनुभूति करेंगे। हिन्डोला महल में आपका मन डोले बिना नहीं रहेगा। होशंगशाह का मकबरा मन को मोह लेगा और ताजमहल की याद दिलाएगा। आल्हा-ऊदल की कथाएं रोमांच बढ़ा देंगी, आपकी भुजाओं की मछलियां बाहर आने को मचल उठेंगी। ईको प्वाइंट पर खड़े होकर जब आप जोर से अपना नाम पुकारेंगे तो लगेगा कि दुनिया आपको सुन रही है। अद्भुत है माण्डू। रानी रूपमति और बाज बहादुर की खूबसूरत मोहब्बत की तरह माण्डू भी बेहद हसीन है।

सोमवार, 17 नवंबर 2014

दर्द का बयान

 उ नका बचपन गरीबी में बीता। वे मेरठ में रहते थे। मिट्टी का कच्चा घर था। एक बरसात में उनका मकान गिर गया। उनके पास इतने भी पैसे न थे कि उनकी मुरम्मत करा पाते। समाज के वंचित वर्ग का हिस्सा होने के कारण उन्हें हर कदम पर समूची मानवता को लजाने वाला अपमान भी झेलना पड़ता था। उनके हौसले को सलाम है कि इस गरीबी और संघर्ष के बीच भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। चप्पल-जूते भी नहीं थे, उनके पास। स्कूल के लिए नंगे पैर ही आना-जाना पड़ता था। अच्छे कपड़े तो बहुत दूर की बात है, उनके पास स्कूल की गणवेश सिलवाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। दो-दो साल पुराने, फटे और छोटे हो गए कपड़े पहनकर वे स्कूल जाते थे। यहां पर भी संघर्ष ही उनका स्वागत करता था। शिक्षा के मंदिर में उन्हें शिक्षक ही अपमानित करते थे। उन्हें कहा जाता था कि क्या करोगे पढ़-लिखकर जूते-चप्पल ही तो बनाना है। लेकिन, धुन के पक्के मोहनदास नैमिशराय ने हार नहीं मानी। आग से तपकर निकले मोहनदास नैमिशराय आज दलित पत्रकारिता और साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।  
      उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर में 5 सितंबर 1949 को जन्मे बेहद मृदुभाषी, सहज और सरल व्यक्ति के धनी मोहनदास नैमिशराय सामाजिक सरोकारों और वंचित समूह के लिए समर्पित चर्चित पत्रिका 'बयान' के सम्पादक हैं। उन्होंने पांच वर्ष तक भारत सरकार के डॉ. आम्बेडकर प्रतिष्ठा, नई दिल्ली को बतौर सम्पादक और मुख्य सम्पादक अपनी सेवाएं दीं। प्रिंट पत्रकारिता, रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म और नाटक आदि में भी उन्होंने अपने लेखन कार्य से अमिट छाप छोड़ी है। संघर्षशील जीवन में भोगा गया यथार्थ, गरीबी का दंश और तिरस्कार से उपजी वेदना को श्री नैमिशराय ने अपने लेखन में उतारा है। उनका यह दर्द सम्पूर्ण दलित समाज का है। उनका चर्चित उपन्यास 'जख्म हमारे' इसकी बानगी है। उनके लेखन की विशेषता है कि समाज के दु:ख के साथ अपने दु:ख को जोड़ते हैं। वे सार्थक बदलाव की बात करते हैं, भविष्य की बात करते हैं, अतीत को पकडक़र रोते नहीं है, अमानवीय व्यवहार के लिए सवर्णों की भूल पर उन्हें कोसते भी नहीं हैं। 
      महानायक बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर पर पहला ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले मोहनदास नैमिशराय की करीब पचास कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें कहानी संग्रह, कविता संग्रह, विचार-सार, अनुवाद, आत्मकथा, उपन्यास सहित अन्य विद्याओं की कृतियां शामिल हैं। उन्होंने भारतीय दलित आंदोलन का इतिहास चार भागों में लिखा है। 
     हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य के गौरव मोहनदास नैमिशराय को कास्ट एण्ड रेस पुस्तक के लिए डॉ. आम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन पुरस्कार, कनाडा से सम्मानित किया जा चुका है। हिन्दी साहित्य के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्री नैमिशराय को पत्रकारिता के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी नवाजा गया है।
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"मोहनदास नैमिशराय आम्बेडकरवादी धारा के ऐसे लेखक हैं जिनके समूचे लेखन से सामाजिक समरसता की भावना को शक्ति मिलती है।"  
- संजय द्विवेदी, कार्यकारी संपादक, मीडिया विमर्श
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

सहजता है पहचान

 प त्रकारिता की एक व्याख्या यह भी है कि पत्रकारिता व्यक्ति को कुछ दे या न दे लेकिन घमण्ड इतना देती है कि पैर जमीन पर टिकते नहीं, अचानक ही 'आम लोगों' के बीच का आदमी 'बेहद खास' हो जाता है। सोचिए, यहां सहज और सरल रहना कितना मुश्किल होगा। पत्रकारिता में शानदार 35 साल गुजारकर और पांच साल से भी अधिक समय तक मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में नवदुनिया जैसे प्रतिष्ठित अखबार के सम्पादक रहकर भी गिरीश उपाध्याय बेहद सहज और सरल ही नहीं बल्कि सर्वसुलभ और मिलनसार भी हैं। नई पीढ़ी के पत्रकारों से संवाद को वे सदैव तैयार रहते हैं, हर मसले पर उनके साथ खुलकर बात की जा सकती है। वे प्रेरक और मार्गदर्शक हैं। 
साहित्य और वैचारिकी उन्हें विरासत में मिली। मालवा के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार और हिन्दी की ख्यातनाम साहित्यिक पत्रिका 'वीणा' के सम्पादक रहे मोहनलाल उपाध्याय 'निर्मोही' उनके पिता थे। अपने पिता से गिरीश उपाध्याय ने माटी से जुड़ाव, सामाजिक सरोकार और देशहित में कलम साधना सीखा। वर्ष 1981 में दैनिक स्वदेश, इंदौर से उन्होंने अपने पत्रकारीय सफर की विधिवत शुरुआत की। वर्ष 1983 से 2001 तक समाचार एजेंसी यूनीवार्ता के लिए विभिन्न पदों पर रहते हुए मध्यप्रदेश के भोपाल, ग्वालियर, इंदौर-उज्जैन और राजस्थान की राजधानी जयपुर में एजेंसी पत्रकारिता को नए आयाम दिए। देश के सबसे बड़े रीजनल चैनल ईटीवी की हिन्दी सेवा से 2001 के अंत में जुड़े। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ईटीवी न्यूज चैनल का नेटवर्क खड़ा करने की अहम जिम्मेदारी सफलतापूर्वक पूरी की। यही नहीं हैदराबाद स्थिति ईटीवी के मुख्यालय में भी हिन्दी रीजनल चैनल का सेटअप तैयार कराने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन किया। इसके बाद अमर उजाला अखबार के चंडीगढ़ संस्करण में पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ स्टेट ब्यूरो प्रमुख के नाते काम किया। देश बड़े समाचार-पत्र समूहों में शामिल राजस्थान पत्रिका में 2005 से 2008 तक बतौर डिप्टी एडिटर अखबार के कंटेन्ट पर काम किया। वर्ष 2008 संपादक होकर नवदुनिया, भोपाल चले आए। फिलहाल माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्वामी विवेकानन्द पीठ पर रिसर्च फैलो हैं। 
24 सितम्बर, 1958 को इंदौर में जन्मे गिरीश उपाध्याय लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित हैं। माधवराव सप्रे संग्रहालय भोपाल द्वारा माखनलाल चतुर्वेदी सम्मान और राष्ट्रीय पत्रकार न्यास द्वारा बापूराव लेले सम्मान उन्हें प्रदान किया जा चुका है। वर्ष 2011 में राज्य स्तरीय श्रेष्ठ पत्रकारिता सम्मान और 2012 में बेस्ट एडिटर सम्मान, भोपाल भी उन्हें मिल चुके हैं। चीन, जापान, हांगकांग और मलेशिया की यात्रा कर चुके गिरीश उपाध्याय सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता के हामी हैं। वर्तमान में वे इंडियन मीडिया सेंटर के मध्यप्रदेश चैप्टर के अध्यक्ष हैं और अपने स्तर पर पत्रकारिता में शुचिता और पत्रकारों की बेहतरी के लिए प्रयत्नशील हैं।  
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"गिरीश उपाध्याय हिन्दी पत्रकारिता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनकी पत्रकारिता सनसनीखेज नहीं है। उनकी पत्रकारिता में देश और समाज सबसे पहले हैं। सकारात्मक पत्रकारिता के गुरुकुल हैं गिरीशजी।" 
- लोकेन्द्र पाराशर, संपादक, स्वदेश ग्वालियर 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

सोमवार, 10 नवंबर 2014

खोज का जुनून

 प्र त्येक पत्रकार की इच्छा होती है कि वह राजनीतिक या फिर अपराध पत्रकारिता में सबसे चर्चित नाम बन जाए। मीडिया जगत में उसकी धमक हो। बड़े से बड़ा राजनेता या फिर अंडरवर्ल्ड के कुख्यात गुण्डे सबसे पहले उससे बात करें। लेकिन, इस मुकाम तक पहुंचने के लिए बड़ी मेहनत तो लगती ही है, यहां कदम जमाए रखना भी रोज कुंआ खोदकर पानी पीने जैसा है। दीपक शर्मा एक ऐसा ही नाम है, जो देश के सबसे बड़े और उलझे सूबे उत्तरप्रदेश की राजनीति की डोर को सुलझाकर हमारे सामने रखते हैं। केन्द्र सरकार की भी छोटी-बड़ी सब खबरों पर उनकी पैनी नजर रहती है। बात अगर इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिज्म की हो तो दीपक शर्मा हिन्दी के बहुमुखी खोजी पत्रकारों में से एक हैं। उनके तेजतर्रार जोश को देखकर लगता नहीं, सबसे तेज होने का दावा करने वाले न्यूज चैनल आजतक की रफ्तार कभी धीमी होगी।
       मिलनसार, सहज और सरल स्वभाव के दीपक शर्मा ने वर्ष 2002 में विशेष संवाददाता के रूप में आजतक ज्वाइन किया। अभी वे एडीटर के रूप में आजतक में ही विशेष खोजी टीम का नेतृत्व करते हैं। इससे पहले वे दैनिक जागरण, पायोनियर और इंडिया टुडे में भी काम कर चुके हैं। भारत में आतंकी नेटवर्क और माफिया गिरोहों के विषय में वो गहरी अंतर्दृष्टि रखते हैं। चाहे तालिबान, मिलिशिया के साथ सीधी बातचीत करना हो या फिर कराची स्थित अंडरवल्र्ड सरगना दाऊद के गुर्गों के साथ बातचीत, दीपक शर्मा ने हमेशा अपने चैनल को आगे रखा है।
       अमूमन बड़ी खबरों को सबसे पहले ब्रेक करने वाले दीपक शर्मा अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए हाल ही काफी चर्चित भी हुए हैं। उनकी एक रिपोर्ट ने यूपीए सरकार में मंत्री रहे सलमान खुर्शीद को सिर के बल खड़ा कर दिया तो मुजफ्फरनगर के दंगों का सच दिखाने पर, उन्हें हिन्दुवादी पत्रकार होने का आरोप झेलना पड़ा। साहसिक पत्रकारिता के लिए जीने वाले श्री शर्मा तमाम तोहमत और जोखिम के बाद भी सच दिखाने से कभी पीछे नहीं रहे। सच के लिए लडऩे-भिडऩे का जुनून उनके भीतर उबाल मारता रहता है।
       देश के लिए ओलंपिक में पदक जीतने वाले पद्मश्री जमनालाल शर्मा के सपूत दीपक शर्मा जितने अच्छे पत्रकार हैं उतने ही उम्दा स्पोर्ट्स मैन भी हैं। वे राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी रहे हैं। खबरों से खेलने के बीच में जब भी खाली वक्त मिलता है, वे गोल्फ खेलना पसंद करते हैं। इन सबके अलावा सोशल मीडिया पर सक्रियता, फेसबुक पर अलग-अलग विषय पर शॉर्टनोट लिखना, बड़े ही सहज अंदाज में आम आदमी से बात करना, लोगों से सीधे कनेक्ट रहना भी उनकी दिनचर्या में शुमार है।
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"दीपक शर्मा जुनूनी पत्रकार हैंl कब्र खोदकर खबर लाने की अद्भुत क्षमता वाले दीपक भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के खतरनाक दुश्मन हैंl वे बहुत प्यारे दोस्त हैंl"
-सईद अंसारी, सीनियर एंकर, आजतक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

भरोसेमंद नाम

 बा जार की होड़ के साथ-साथ सामाजिक प्रतिबद्धता, पाठकों की रुचि और बेहतर मापदंडों के बीच कोई समाचार-पत्र कैसे संतुलन कायम रख सकता है, यह साबित करके दिखाया था हिन्दी पत्रकारिता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर अभय छजलानी ने। पिछले 40-50 वर्षों में अखबार मालिक से लेकर संपादक तक उन्होंने नईदुनिया को भारतीय भाषायी पत्रकारिता में एक अलग पहचान दिलाई। उनके संपादकीय कार्यकाल में नईदुनिया हिन्दी का शब्दकोश बन गया था। हर आयु वर्ग के पाठक नईदुनिया के नशे में पागल थे। पाठक नईदुनिया को इतनी मोहब्बत करते थे कि इंदौर से मीलों दूर जाने के बाद भी नईदुनिया उनके जीवन का हिस्सा बना रहा, वे डाक से नईदुनिया के आने का एक दिन तक इंतजार करते थे। नईदुनिया के साथ सुबह की चाय की चुस्कियां कुछ ज्यादा ही मीठी जाया करती थीं। 
      सामाजिक सरोकारों को पत्रकारिता का धर्म मानने वाले अभय छजलानी का जन्म 4 अगस्त, 1934 को इंदौर में हुआ। उन्होंने वर्ष 1965 में दुनिया के श्रेष्ठ संस्थानों में शामिल थॉम्सन फाउंडेशन, कार्डिफ (यूके) से पत्रकारिता में प्रशिक्षण प्राप्त किया। हालांकि अभयजी 1955 में ही पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए थे। 1963 में नईदुनिया के कार्यकारी संपादक हो गए और बाद में लंबे अरसे तक नईदुनिया के प्रधान संपादक रहे। 
      पत्रकारिता से जुड़े उच्च आदर्शों और मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयास करने वाले पत्रकारों की पहली पंक्ति में अभय छजलानी का नाम आता है। आजादी के बाद की हिन्दी पत्रकारिता के संरक्षण और संवर्धन में श्री छजलानी की अहम भूमिका रही है। हिन्दी पत्रकारिता में उनके योगदान को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। हिन्दी पत्रकारिता अपने हीरो अभय छजलानी के भारतीय भाषाई समाचार पत्रों के शीर्ष संगठन इलना के तीन बार अध्यक्ष रहने के लिए भी गौरव का अनुभव करती है। अभयजी 2004 में भारतीय प्रेस परिषद के लिए मनोनीत किए गए। इसके अलावा उन्हें 1986 का पहला श्रीकांत वर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। ऑर्गनाइजेशन ऑफ अंडरस्टैंडिंग एंड फ्रेटरनिटी की ओर से वर्ष 1984 में गणेश शंकर विद्यार्थी सद्भावना अवॉर्ड दिया गया। विशेष योगदान के लिए उन्हें 1997 में जायन्ट्स इंटरनेशनल पुरस्कार और इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी पुरस्कार से भी नवाजा गया। 
      पत्रकारिता बेहद जोखिमभरा कार्यक्षेत्र है। किसी भी पत्रकार को कभी यह भरोसा नहीं रहता कि कल नौकरी उसके हाथ रहेगी या नहीं। घोड़ा दौड़ रहा है तो मालिक बोली लगाएगा वरना तो नमस्ते लंदन तय है। लेकिन, सरल, सहज और सुलभ स्वभाव के धनी अभय छजलानी के अखबार में कर्मचारी स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करते रहे। पत्रकारों का यह भरोसा ही हिन्दी पत्रकारिता के हीरो अभय छजलानी की सबसे बड़ी पूंजी है। 
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"अभय जी का जीवन निरंतर संघर्ष की दास्तान है। संघर्ष- अपना स्थान पाने के लिए, मालिक-संपादक की छवि से, अपने लोगों से, अपने आप से और हालात से। सतत संघर्ष।" 
- जयदीप कर्णिक, संपादक, वेबदुनिया
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

सोमवार, 3 नवंबर 2014

राष्ट्रवादी तेवर

 जि सकी कथनी-करनी-लेखनी में राष्ट्र सबसे पहले रहा और है। न्यूजरूम में जिसने कागद कारे करने से पहले राष्ट्र का चिंतन किया और करता है। दमदार लेखनी, स्पष्ट सोच, अनथक श्रम करने का माद्दा, घुमक्कड़ी और मिलनसार स्वभाव, ये कुछ गुण हैं जो हितेश शंकर को भीड़ से अलग पहचान दिलाते हैं। 
      महज 36 वर्ष की उम्र में देश के सबसे पुराने हिंदी साप्ताहिक, दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन के वैचारिक मुखपत्र कहे जाने वाले पाञ्चजन्य का, सम्पादक हो जाना कोई मामूली बात नहीं है। पाञ्चजन्य का संपादकत्व संभालने के लिए ध्येयनिष्ठ पके-पकाए आदमी की तलाश होती है। पाञ्चजन्य के पहले संपादक थे श्री अटल बिहारी वाजपेयी और तब से आज तक इस पद के लिए खोज अमूमन पचास बसंत देख चुके अनुभवी पत्रकार पर ही पूरी होती रही है। सम्भवत: यह पहली बार है जब व्यावसायिक पत्रकारिता के मुकाबले राष्ट्रवाद का स्वर प्रखर करने, भारतीय स्वाभिमान और शौर्य का उद्घोष करने के लिए 'पाञ्चजन्य' युवा 'कृष्ण' के हाथ में है। हिन्दुस्तान अखबार के लिए उत्तरप्रदेश में विभिन्न संस्करण जमाने में महती भूमिका निबाहने, एनसीआर के पांच संस्करणों की सफलतापूर्वक संभाल करने के बाद जब हितेश शंकर मेट्रो एडिशन की सम्पादकीय धुरी बने हुए थे तब किसी ने नहीं सोचा था कि देश-दुनिया की समझ रखने वाला बेहद सम्भावनाशील डिप्टी न्यूज एडिटर मुख्यधारा के बड़े ब्रांड की चमक छोड़कर पाञ्चजन्य का रुख करेगा।
      हितेश शंकर का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्र को आगे रखे बिना पत्रकारिता संभव ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि अन्य संस्थान राष्ट्रवादी पत्रकारिता से दूर हैं, हां उनके बरक्स पाञ्चजन्य राष्ट्रीयता का मजबूत और शाश्वत प्रहरी है। यानी कह सकते हैं कि दैनिक जागरण, इंडिया टुडे और हिन्दुस्तान सहित पत्रकारिता की तमाम राहों के बाद अब हितेश शंकर को मनमाफिक मार्ग चलने के लिए मिला है। हालांकि यह भी सच है कि इतनी कम उम्र में इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने चलना तब शुरू कर दिया था जब कई दिग्गज घर से निकले भी नहीं थे। कॉलेज में पढ़ाई के साथ ही उन्होंने पत्रकारिता शुरू कर दी थी। दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर करने के बाद हितेश एमफिल के लिए जेएनयू कैम्पस पहुंचे लेकिन वहां का माहौल रास नहीं आया। बाद में विज्ञापन और विपणन प्रबंधन की शिक्षा ली। लेकिन विज्ञापन बाजार की चकाचौंध से पीठ फेर पूर्णकालिक पत्रकारिता में कूद पड़े। काबिलियत के दम पर हितेश पत्रकारिता में सोपान-दर-सोपान चढ़ते रहे। बालपन से यात्राओं और अध्ययन में लगे रहे हितेश शंकर पत्रकारिता शुरू करने से पहले पूरे भारत को बेहद करीब से देख चुके थे। वैसे उनका मानना है कि समझ विकसित करने के लिहाज से एक कोस चलना, सौ पेज पढऩे से ज्यादा कारगर होता है। पन्नों और पगडंडियों से अर्जित यही अनुभवजन्य पाथेय पत्रकारिता में उनकी पूंजी है और ताकत भी। वे देश की बोलियों, समाज, संस्कार और संस्कृति को बेहद नजदीक से समझते हैं। 
      हितेश सिर्फ कलमकार ही नहीं बल्कि एक अच्छे चित्रकार रहे हैं और इसीलिए डिजाइन की बारीकियां भी समझते हैं। प्रबंधन के विद्यार्थी होने के नाते बाजार की नब्ज भी पहचानते हैं। उनके आने के साथ पाञ्चजन्य की पाठ्य सामग्री पहले की अपेक्षा ज्यादा धारदार ही नहीं हुई बल्कि इसका कलेवर भी बदला गया है। उनकी ही युवा सोच का नतीजा है कि पाञ्चजन्य अब आधुनिक प्रबंधकीय अपेक्षाओं के अनुरूप टेबलॉइड की काया त्याग कर पत्रिका के रूप में व्यावसायिक पत्रिकाओं से मुकाबला करने के लिए मोर्चाबंदी कर रहा है। वे अभी और नई ऊंचाइयां छूएंगे, नए आसमान रचेंगे, हिन्दी मीडिया उनसे ये उम्मीद कर रहा है। 
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"हिन्दी पत्रकारिता में हितेश शंकर का अपना वजूद है। वह सबसे अलग है। खबरों पर पैनी नजर रहती है। वे छोटे-बड़े मुद्दों की गहरी समझ रखते हैं। हितेश जितने मजबूत संपादन में है, उतनी ही गहरी समझ उन्हें मार्केटिंग की भी है। सही मायने में वे ऑलराउण्डर हैं।" 
- मोहम्मद वकास, पत्रकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शनिवार, 1 नवंबर 2014

मिशनरी पत्रकार

 व्या वसायिक पत्रकारिता के दौर में भी पत्रकारिता किसी के लिए मिशन बनी रही तो वह नाम है जयकिशन शर्मा का। सामाजिक चेतना और सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए पत्रकारिता को औजार बनाने वालों में जयकिशन शर्मा का नाम ऊपर आता है। उनका स्पष्ट मानना है कि पत्रकार का मूल कार्य है समाज जागरण करना। पत्रकारिता ही एक ऐसा जरिया है जिससे समाज को उसके अधिकारों, कर्तव्यों और संभावित खतरों के प्रति सचेत किया जा सकता है। 
      समाजोन्मुखी पत्रकारिता के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले जयकिशन शर्मा बताते हैं कि व्यावसायिकता अखबार चलाने के लिए जरूरी है। पत्रकारिता के व्यावसायिक होने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन जब पत्रकार व्यवसायी हो जाता है तब पत्रकारिता को खतरा होता है। यह पत्रकार को तय करना है कि जो कलम उसने उठाई है, उसका दुरुपयोग नहीं बल्कि जनकल्याण के लिए उसका सदुपयोग हो। 
       62 वर्षीय जयकिशन शर्मा ने अपने 45 वर्षीय पत्रकारिता के कार्यकाल में अनेक पत्रकारों को प्रशिक्षित और संस्कारित किया। ऊर्जा से भरे नौजवानों को पत्रकारिता सिखाने के लिए उन्होंने 'स्वदेश' को 'पाठशाला' बना दिया और स्वयं इस पाठशाला के आचार्य की भूमिका में रहे। सच कहें तो स्वदेश और जयकिशन शर्मा दोनों ही पत्रकारिता की पाठशाला हो गए। उनके सानिध्य में पत्रकारिता सीखे लोग आज हिन्दी मीडिया में अहम पदों पर कार्यरत हैं। सरल हृदय के जयकिशन शर्मा जी सबकी चिंता करते हैं। ग्वालियर में जिस परिसर में स्वदेश का दफ्तर और मशीन लगी है, उसी परिसर में श्री शर्मा का आवास था। युवा पत्रकार अखबार छूटने तक उनके साथ रहकर पत्रकारिता की बारीकियां सीखा करते थे। काम की अधिकता के कारण कई बार कुछ पत्रकार खाना खाने घर नहीं जा पाते थे। जैसे ही यह बात श्री शर्मा को पता चलती तो वे अपने घर पर ही उसके भोजन का प्रबंध करते थे। 
        दैनिक भास्कर के मुकाबले स्वदेश को शीर्ष पर पहुंचाने वाले जयकिशन शर्मा ने सन् 1969 में ग्वालियर से प्रकाशित 'हमारी आवाज' से पत्रकार जीवन की शुरुआत की। 'हमारी आवाज' ही आगे चलकर 'स्वदेश' हो गया। इसके बाद वे रांची चले गए। यहां कुछ वक्त 'रांची एक्सप्रेस' में बिताया। लेकिन, स्वदेश का मोह फिर से खींच लाया। इसके बाद उन्होंने स्वदेश और हिन्दी पत्रकारिता की सेवा को ही अपना ध्येय बना लिया। जयकिशन शर्मा ने करीब 42 वर्ष तक स्वदेश में रहकर हिन्दी पत्रकारिता में अभूतपूर्व योगदान दिया। उन्होंने हिन्दी के शुद्धिकरण के प्रयास किये। अखबारों में मानक हिन्दी का उपयोग हो, इसके लिए विशेष आग्रह किया। 
      अखबारों को अपना दायरा बढ़ाना चाहिए। नए-नए संस्करण प्रारंभ करने चाहिए। यह विचार जयकिशन शर्मा के मन में आया। इसे मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने स्वदेश के अलग-अलग संस्करण शुरू कराए। प्रयोगधर्मी और नवाचार में विश्वास करने वाले जयकिशन शर्मा ने बाबरी विध्वंस की खबरें पाठकों तक सबसे पहले पहुंचाने के लिए उस दिन सांध्य स्वदेश ही निकाल दिया। स्वदेश के प्रधान संपादक के पद से सेवानिवृत्त होकर वे 11 फरवरी 2014 से मध्यप्रदेश शासन के सूचना आयुक्त की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं। 
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"जयकिशन जी उस परंपरा के पत्रकार हैं, जिन्होंने पत्रकारिता, राष्ट्र और समाजोत्थान के लिए सर्वस्व त्याग दिया। हिन्दी पत्रकारिता की उन्होंने बहुत सेवा की है। युवा पीढ़ी के लिए वे आदर्श पत्रकार और प्रेरणास्रोत हैं।"
- भुवनेश तोमर, वरिष्ठ पत्रकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" के विशेषांक "हिंदी मीडिया के हीरो" में प्रकाशित आलेख