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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

दुष्प्रचार में जुटा 'झूठों का समूह'

प्र धानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चिंता जताई है कि जब भाजपा सत्ता में होती है, झूठों का समूह दुष्प्रचार में जुट जाता है। मुंबई में डॉ. भीमराव आम्बेडकर के स्मारक का शिलान्यास करते हुए उन्होंने यह चिंता 'आरक्षण विवाद' के संदर्भ में जताई है। उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी के समय भी यह समूह दुष्प्रचार में सक्रिय था। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है कि भाजपा आरक्षण को खत्म नहीं करेगी। प्रधानमंत्री ने 'झूठों के समूह' में निश्चिततौर पर उन्हीं तथाकथित प्रगतिशीलों को चिन्हित किया होगा, जो वर्षों से भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रति अछूतों की तरह व्यवहार करते आए हैं। इस समूह को राष्ट्रवादी विचारधारा का विरोधी समूह भी कहा जा सकता है। या कहें कि 'झूठों का समूह' की अपेक्षा 'राष्ट्रवाद विरोधी समूह' कहना अधिक उचित होगा।

रविवार, 26 जुलाई 2015

विरोध तो विचारधारा का ही है

 भा रतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) के अध्यक्ष पद पर अभिनेता गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति से उठा विवाद शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। कुछ विद्यार्थियों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। वे चौहान को संस्थान के अध्यक्ष के रूप में देखना नहीं चाहते हैं। उनका आरोप है कि गजेन्द्र चौहान के पास फिल्मों का अच्छा अनुभव नहीं है। उनका ज्ञान बहुत ही सीमित है। चौहान ने 'सी' और 'बी' ग्रेड फिल्मों में ही काम किया है। उनकी योग्यता यही है कि वे सत्तारूढ़ पार्टी (भारतीय जनता पार्टी) के कार्यकर्ता हैं। अत: वे भावी फिल्मकार तथा कलाकार गढऩे वाले इस संस्थान के मुखिया होने के काबिल नहीं हैं। ऋषि कपूर, रणवीर कपूर, कुंदन शाह और अनुपम खेर भी छात्रों के साथ खड़े हो गए हैं। अब तक दिखाई जा रही 'फिल्म' को एक दृष्टिकोण से देखने पर तो यही लगता है कि गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति ठीक नहीं है। न तो छात्र उनके साथ हैं और न ही फिल्म जगत से जुड़ी प्रमुख हस्तियों का समर्थन उन्हें मिल पा रहा है। सब विरोध में हैं। लेकिन, इस फिल्म का दूसरा पहलू दिखाने की कोशिश कोई नहीं कर रहा है। छात्रों की हड़ताल जारी है, इसी बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर में गजेन्द्र चौहान के समर्थन में एक लेख आया है। इस लेख में बताया गया है कि छात्रों का विरोध गजेन्द्र चौहान से नहीं बल्कि राष्ट्रवादी विचारधारा और हिन्दुत्व से है। छात्रों को ढाल बनाकर कुछ दूसरे लोग भी आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। उन्हें संस्थान की चिंता नहीं है बल्कि वे लोग अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं। अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश। ये लोग एफटीआईआई में अपनी अवैध घुसपैठ को बनाए रखना चाहते हैं।