गुरुवार, 22 अगस्त 2019

आरक्षण और संघ के विरुद्ध दुष्प्रचार


किसी भी अच्छे विचार पर अनावश्यक राजनीतिक विवाद कैसे खड़ा किया जाता है, इसका सटीक उदाहरण है- सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी विचार पर खड़ा किया गया नकारात्मक विमर्श। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति दुराग्रह रखने वाला वर्ग संघ के विचार को गंभीरता से सुने बिना ही कौव्वा कान ले गयाकी तर्ज पर हो-हल्ला करने लगता है। इससे यही सिद्ध होता है कि यह वर्ग आरएसएस को ऐन-केन-प्रकारेण विवाद में घसीटने की ताक में बैठा रहता है। भारत में राजनीतिक स्वार्थ ने आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न को विवादास्पद बना दिया है। यह एक संवेदनशील विषय है। हमने देखा है कि पूर्व में कैसे टुकड़े-टुकड़े गैंगने आरक्षण पर अफवाह और भ्रम फैलाकर हिंदू समाज को तोडऩे के प्रयास किए हैं। विभाजनकारी सोच ने सामाजिक मुद्दे का इस तरह से राजनीतिकरण किया है कि अच्छी बात कहना भी कठिन हो गया है। परंतु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामने किसी प्रकार का राजनीतिक जोखिम नहीं है, क्योंकि राजनीति न तो उसके काम का आधार है और न ही लक्ष्य, इसलिए वह बार-बार आरक्षण पर सकारात्मक समाधान प्रस्तुत करने को तैयार रहता है। दिल्ली में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा आयोजित ज्ञानोत्सव-2076’ के समापन सत्र में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा भी कि आरक्षण पर पहले भी उनके कथन को गलत ढंग से प्रस्तुत कर राजनीतिक विवाद खड़ा किया गया, लेकिन संघ इस प्रकार के विवाद से डरता नहीं है। आरक्षण पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते समय सरसंघचालक को यह कल्पना थी कि उनके वक्तव्य को तोड़-मरोड़ कर एक बार फिर से विवाद खड़ा किया जाएगा, किंतु उन्होंने विवाद की चिंता न करते हुए महत्वपूर्ण विषय पर समाज का मार्गदर्शन किया।
            किंतु, तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी-पत्रकार, कम्युनिस्ट सहित अन्य राजनीतिक दल तो तैयार बैठे रहते हैं, संघ को दलित विरोधी, आरक्षण विरोधी सिद्ध करने के लिए। इस बार भी उन्होंने यही प्रयास किया, लेकिन वह भूल जाते हैं कि समय बदल गया है। अब झूठ चलता नहीं। पारदर्शी जमाना है। डिजिटल युग में सच तक आम आदमी की पहुँच हो गई है। इसलिए उसके दिमाग में पहले की तरह झूठ नहीं बैठाया जा सकता। इस वर्ग के द्वारा बार-बार यह राग आलापना मूर्खता ही कहा जाएगा कि संघ आरक्षण का विरोधी है और वह आरक्षण खत्म करना चाहता है, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बार-बार पूर्ण स्पष्टता के साथ कह चुका है कि वह अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का पूर्ण समर्थन करता है। एक बार फिर से संघ ने इस विषय पर अपना विचार स्पष्ट किया है कि वह कमजोर वर्ग को दिए जा रहे आरक्षण का पूर्ण समर्थन करता है।


            अब यहाँ यह जानना आवश्यक है कि सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा क्या था कि उसे आरक्षण समाप्त करने का संघ का मंतव्य बताया जा रहा है। अपने संबोधन में सरसंघचालक ने कहा-आरक्षण के प्रश्न का हल सद्भावना में ही है। आरक्षण के पक्ष के लोग, आरक्षण के विपक्ष के लोगों का विचार करके जब कुछ बोलेंगे-करेंगे और आरक्षण के विपक्ष में जो लोग हैं, वो आरक्षण के पक्ष के लोगों का विचार करके कुछ करेंगे-बोलेंगे, तब इसका हल एक मिनट में निकल आएगा। बिना कानून के, बिना नियम के। इस प्रकार की सद्भावना जब तक संपूर्ण समाज में खड़ी नहीं होती, इस प्रश्न का हल कोई नहीं दे सकता। यह सद्भावना खड़ा करने का प्रयास करना पड़ेगा, जो कि संघ कर रहा है।




            आरोप लगाने वालों से पूछना चाहिए कि इस वक्तव्य में सरसंघचालक या आरएसएस ने आरक्षण खत्म करने की बात कहाँ कही है? लेकिन अपनी आदत से मजबूर सेक्युलर, लिबरल, वामपंथी और कांग्रेस नेताओं, पत्रकारों ने संघ के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू कर दिया। पूर्व की घटनाओं की भांति मोहन भागवत जी के कथन को अपनी सुविधा अनुसार तोडऩा शुरू कर दिया। सरसंघचालक के भाषण के एक हिस्से पर जो अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। याद करना होगा कि लगभग एक साल पहले ही नयी दिल्ली के विज्ञान भवन में आरएसएस की ओर से एक व्याख्यान माला का आयोजन किया गया था। इस तीन दिवसीय आयोजन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने स्वयं पूरे समय उपलब्ध रह कर संघ के बारे में फैलाये जाने वाले भ्रमों को दूर किया। उस समय भी आरक्षण के प्रश्न पर सरसंघचालक ने कहा था कि संघ का मानना है कि सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए आरक्षण की जो व्यवस्था हमारे संविधान में की गयी है, वह जारी रहनी चाहिए।

विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यान माला 'भविष्य काभारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' में सरसंघचालक ने क्या कहा था, सुनिए (1:27:23 मिनट पर) –


            राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सर्वोच्च समिति अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’, जो संघकार्य-विचार की दिशा-नीति तय करती है, उसने भी आरक्षण पर बाकायदा प्रस्ताव पारित किया है। संघ में सर्वसम्मति से पारित यह प्रस्ताव भी आरक्षण पर प्रोपोगंडा करने वालों को पढऩा चाहिए। 1981 में जब गुजरात और अन्य प्रदेशों में आरक्षण की मांग के कारण तनावपूर्ण स्थितियां निर्मित हुईं थी, तब संघ ने आरक्षण पर चिंता व्यक्त की थी। उससे पहले भी आरक्षण संघ के विमर्श का हिस्सा रहा है। 1981 में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में आरक्षण पर एक प्रस्ताव पारित हुआ था। उस प्रस्ताव में कहा गया था- ‘संघ यह मानता है कि शताब्दियों से सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए बंधुओं को शेष समाज के समकक्ष लाने के लिए आरक्षण व्यवस्था को अभी बनाये रखना आवश्यक है।

            आरएसएस के विरुद्ध व्यापक स्तर पर दुष्प्रचार होने के बाद भी संघ के विचार की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है, उसका कारण है कि समाज 94 वर्षों से संघ को नजदीक से देख-समझ रहा है, इसलिए उसे संघ को लेकर कोई भ्रम नहीं है। संघ के प्रति समाज का जो भरोसा बना है, उसके ही कारण संघ को लेकर जो लोग/वर्ग दुष्प्रचार करते हैं, उनके सब प्रयत्न बेकार जाते हैं। संघ ने अपने आचार-व्यवहार से लंबे समय में समाज का विश्वास अर्जित किया है। उसको इस प्रकार क्षति नहीं पहुँचाई जा सकती है। विरोधियों की इस प्रकार की हरकतों से संघ के प्रति तो अविश्वास का वातावरण नहीं बनता, बल्कि यह वर्ग स्वयं ही झूठा और समाजद्रोही साबित हो जाता है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को कृष्णाजन्माष्टमी के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं!!


    ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 24/08/2019 की बुलेटिन, " कृष्णाजन्माष्टमी के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. लोकेन्द्र सिंह जी, बहुत अच्छा लगा क‍ि कोई है जो संघ के पक्ष को रख रहा है वरना लेखकों में अध‍िकांशत: ये फैशन है क‍ि संघ की बात की नहीं क‍ि हमें बड़ी तत्परता से दक्ष‍िणपंथी या पोंगापंथी ठहरा द‍िया जाता है ... आपका लेख बहुत अच्छा लगा...साथ ही द‍िए गए ल‍िंंक भी ...

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