मंगलवार, 20 जनवरी 2026

रहमान का ‘सांप्रदायिक सुर’

भारत के लोगों ने संगीतकार एआर रहमान को वर्षों बिना किसी भेदभाव के अथाह प्रेम दिया है, जबकि सबको पता है कि रहमान कन्वर्टेड मुसलमान हैं। आज तक किसी ने भी रहमान को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है। परंतु, रहमान ने खुद ही स्वयं को लेकर विवाद खड़ा कर लिया है। एक विदेशी मीडिया संस्थान को दिए गए साक्षात्कार में उनका यह कहना कि बॉलीवुड में उन्हें काम न मिलने की वजह ‘सांप्रदायिक’ हो सकती है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। जिस कलाकार को पूरे देश ने बिना किसी धर्म या जाति के भेदभाव के, आंखों पर बिठाया हो, ऐसी विक्टिम हुड (पीड़ित भाव) की बातें करना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। एक प्रकार से कहना होगा कि रहमान के मन में ही कहीं सांप्रदायिक सोच बैठी हुई थी, जो अब जाकर सामने आई है। रहमान जैसे लोगों को इसका जवाब भी देना चाहिए कि अनेक हिन्दू संगीतकार भी बॉलीवुड से बाहर हो चुके हैं, उसका कारण क्या है? क्या उन्हें भी मुस्लिम गिरोहबंदी के कारण काम मिलना बंद हुआ है? भारतीय सिनेमा में मुस्लिम कलाकारों का जिस प्रकार का वर्चस्व है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद भी रहमान हिन्दुओं के माथे पर सांप्रदायिका का लेबल चस्पा करने की कोशिश करे रहे हैं, तो इसे एक प्रकार से बेईमानी ही कहना चाहिए। 

रहमान के विवादित बयान के बाद अनेक साहित्यकारों एवं कलाकारों ने उनकी सोच पर सवाल उठाया है। सुप्रसिद्ध गायक शान ने उचित ही कहा है कि संगीत में कोई ‘अल्पसंख्यक या सांप्रदायिक’ कोण नहीं होता, वहां सिर्फ काम बोलता है। बिना किसी ठोस प्रमाण के इतने गंभीर आरोप लगाना न केवल उद्योग का अपमान है, बल्कि यह समाज में अनावश्यक विभाजन भी पैदा करता है। बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी कहा है कि रहमान को सभी धर्मों के लोग प्यार करते हैं और ऐसी बातें करना उन्हें शोभा नहीं देता। उन्होंने शाहरुख खान, आमिर खान और जावेद अख्तर जैसी हस्तियों का उदाहरण देते हुए कहा कि मशहूर और अमीर लोग किसी भी धर्म या जाति के हों, उन्हें बॉलीवुड में काम करने में मुश्किल नहीं आती। सांप्रदायिकता क्या होती है और उसके कारण क्या हाल होते हैं, रहमान को यह देखना है तो उन्हें तस्लीमा नसरीन के जीवन को देखना चाहिए। इस्लामिक सांप्रदायिकता से बचने के लिए उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी है। आज भी बांग्लादेश में सांप्रदायिक आधार पर हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है। 

एआर रहमान ने विक्की कौशल अभिनीत फिल्म ‘छावा’ को भी ‘विभाजनकारी’ करार दिया। छत्रपति शंभू राजे के बलिदान पर आधारित फिल्म को विभाजनकारी कहना इतिहास और जनभावनाओं की समझ में कमी को दर्शाता है। एक ऐतिहासिक गाथा को, जो शौर्य का प्रतीक है, उसे सांप्रदायिक चश्मे से देखना एक कलाकार की संकीर्ण दृष्टि का परिचायक है। छावा को वही लोग विभाजनकारी फिल्म बता सकते हैं, जो औरंगजेब के साथ स्वयं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ते हैं। 

जब एआर रहमान ने देखा कि उनकी सांप्रदायिक सोच का विरोध सब ओर से हो रहा है, तब उन्होंने इस विवाद से बचकर निकलने के लिए अपनी सफाई में एक वीडियो जारी किया है और कहा है कि उनका इरादा किसी को दु:ख पहुंचाने का नहीं था और भारत उनकी प्रेरणा है। लेकिन सवाल यह है कि एक परिपक्व और वैश्विक स्तर के कलाकार को ऐसे बयानों की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? सफाई देने से वे शब्द वापस नहीं हो जाते, जिन्होंने भारत के बहुसंख्यक समाज का अपमान किया है। रहमान जैसे लोगों को यह समझना होगा कि अनावश्यक सांप्रदायिकता की बातें करके उन्होंने भारत की पंथनिरपेक्ष छवि को चोट पहुँचाई है। 

कला का काम दिलों को जोड़ना है। रहमान जैसे संगीतकार को अपनी कला का इस्तेमाल जोड़ने के लिए करना चाहिए, न कि असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होकर समाज को बांटने वाले बयान देने के लिए। भविष्य में उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अपने सुरों पर ध्यान देंगे, सियासी और विभाजनकारी शोर पर नहीं। भारत का जनमानस ‘सांप्रदायिक’ सोच से बहुत ऊपर है। इसका नवीनतम उदाहरण ‘धुरंधर’ फिल्म का गीत-संगीत है, जिसे बहरीनी रैपरों ने तैयार किया है। अरबी भाषा में लिखे गाने भले ही लोगों को समझ में नहीं आए लेकिन इनकी बीट्स और एनर्जी दर्शकों/श्रोताओं को खूब पसंद आई। भारत के सिनेमाप्रेमियों ने धुरंधर के संगीत को खूब सराहा और प्रेम दिया है। यही भारत के लोगों की पहचान है, वे काम का सम्मान करते हैं, जाति एवं संप्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं करते।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

सनातन की ओर लौटती तरुणाई

श्रीराम मंदिर: भारतीय युवाओं की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय


भारत के युवाओं को लेकर देश में अलग-अलग ढंग से विमर्श चल रहे हैं। कुछ ताकतें चाहती हैं कि भारत का युवा अपनी ही संस्कृति एवं जीवन मूल्यों के विरुद्ध खड़ा हो जाए। धर्म-संस्कृति क्रियाकलापों से युवाओं को दूर करने के लिए यहाँ तक कहा गया कि “जो लोग मंदिर जाते हैं, वही लोग महिलाओं को छेड़ते हैं”। यह भी कि “सरस्वती की पूजा करने से कोई आईएएस नहीं बनता”। योलो और वोकिज्म की रंगीन अवधारणाएं भारत की जेन-जी के दिमाग में उतारने के प्रपंच रचे ही जा रहे हैं। परंतु, भारत विरोधी ताकतों को यह स्मरण नहीं रहता कि भारत की संस्कृति के पोषण में वह ताकत है कि उसकी संतति अधिक समय तक उससे दूर नहीं रह सकती। सब प्रकार के प्रपंचों से थक-हारकर, आत्मा के वास्तविक सुख की प्राप्ति के लिए वह अपनी संस्कृति की गोद में ही लौटता है। आज सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों में युवाओं की जिस प्रकार की सक्रिय उपस्थिति दिखायी दे रही है, उसके गहरे निहितार्थ हैं। पिछले कुछ वर्षों में धर्म के प्रति युवाओं में गहरी रुचि पैदा हुई है। उनकी आध्यात्मिक चेतना को मंदिर में उमड़ रही युवाओं की भीड़ में अनुभव किया जा सकता है। ज्ञान की खोज में आश्रमों एवं गुरुकुलों में पहुँच रहे युवाओं के माथे पर उनकी जिज्ञासाओं को पढ़ा जा सकता है। युवाओं में परिवर्तन की इस लहर का प्रमुख केंद्र श्री अयोध्या धाम में, अपने भव्य मंदिर में विराजे रामलला हैं। भारत की सांस्कृतिक राजधानी श्रीअयोध्या में प्रभु श्रीराम के दिव्य मंदिर के निर्माण, रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा, शिखर पर धर्म ध्वजा की स्थापना, ये सब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, अपितु भारतीय जनमानस की चेतना में युगांतरकारी घटनाएं हैं। कहना होगा कि 22 जनवरी, 2024 के बाद भारत के युवा मन में जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह अभूतपूर्व है। यह घटना सदियों के संघर्ष के विराम के साथ-साथ एक नये और आत्मविश्वास से भरे भारत के उदय का प्रतीक बन गई है। आज श्रीराम मंदिर केवल ईंट-पत्थरों से बना देवालय नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का केंद्र बन गया है।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

पत्रकारिता के खट्टे-मीठे अनुभवों की पोटली

देखें वीडियो : अब मैं बोलूंगी….


‘अब मैं बोलूंगी…’ यह पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार स्मृति आदित्य की यादों की पोटली है, जिसमें कुछ खट्टे तो कुछ मीठे संस्मरण शामिल हैं। 15 वर्षों से अधिक फीचर संपादक के रूप में और स्वतंत्र लेखन करते हुए, उन्हें जो अनुभव आए, उन सबको वे अपनी डायरी में दर्ज करती करती गईं। इनमें अखबार के दफ्तर की राजनीति के किस्से, साहित्य चोरी के प्रसंग और अपने मन की अनुभूतियों का ऐसा ब्यौरा दर्ज है, जो सबको सीख देता है। यह पुस्तक मुख्यत: स्मृति आदित्य के उस समय की मन:स्थिति को सामने लाती है, जब उनको पता चलता है कि 15 साल से अधिक की ऑनलाइन पत्रकारिता की उनकी नौकरी अब जा रही है। यह स्थिति किसी को भी विचलित कर सकती है कि जब आपको पता न हो कि आगे क्या करना है? लेकिन खुद पर विश्वास हो तब आप ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में भी स्वयं को संभाल लेते हो। जुलाई से दिसंबर तक लिखी डायरी में उन्होंने पत्रकारिता की अपनी शुरुआत, उससे जुड़े सपनों एवं वहाँ की कठिनाइयों को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि पढ़कर ऐसा लगता है- यह तो मेरी ही कहानी है। इस पुस्तक को ‘शिवना कृति सम्मान-2025’ भी प्राप्त हुआ है।

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

व्यक्ति निर्माण का केंद्र है संघ की शाखा

संघ शताब्दी वर्ष : संघ का आग्रह, संघ को समझना चाहते हैं, तो शाखा आइए… 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सही अर्थों में समझना है और उसे नजदीक से देखना है, तब आपको संघ की शाखा में आना चाहिए। संघ का यह आग्रह उन सभी से रहता है, जो संघ को लेकर जिज्ञासु हैं। किसी प्रतिमा या दृश्य का कोई कितना ही अच्छा वर्णन करे लेकिन उसकी वास्तविक अनुभूति तो उसे समीप से देखकर ही होती है। सुनकर केवल कल्पनाओं के महल ही तैयार किए जा सकते हैं, जिन्हें कभी भी धराशाही किया जा सकता है। परंतु प्रत्यक्ष अनुभूति से बनी धारणा को किसी भी झूठ से खंडित नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि संघ की शाखा के संपर्क में आए महानुभाव समाज में चलने वाले किसी भी नैरेटिव से न तो संघ के बारे में धारणा बनाते और न ही बदलते हैं क्योंकि संघ क्या है, उन्होंने स्वयं शाखा में जाकर अनुभव किया है। हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संपूर्ण रचना को देखते हैं, तब इसके केन्द्र में हमें शाखा दिखाई देती है। भारत के उत्थान के लिए जिस प्रकार के संस्कारित मनुष्य छत्रपति शिवाजी महाराज से लेकर स्वामी विवेकानंद और उनके बाद के महापुरुष खोज रहे थे, वैसे मनुष्यों का निर्माण संघ की शाखा पर होता है। संघ कहता है कि उसकी शाखा खेल-कूद का उपक्रम मात्र नहीं है, अपितु यह तो व्यक्ति निर्माण का केंद्र है। अपने देश में सद्भावना लेकर काम करने वाले अनेक संगठन हैं। लेकिन उनके पास संघ जैसी कार्यपद्धति नहीं है, जिसके कारण संघ सौ वर्षों बाद भी यशस्वी है। संघ की शाखा ही है, जो उसे बाकी अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों से विशिष्ट बनाती है। अनेक प्रकार के झंझावात भी संघ और उसके स्वयंसेवकों को ध्येय से डिगा नहीं सके, तो उसका कारण शाखा रूपी अभिनव पद्धति है। 

रोज शाखा आते हैं तो क्या होता है :

संघ शाखा, एक ऐसी कार्यपद्धति है, जिसमें स्वयंसेवक एक स्थान पर नित्य एकत्र होते हैं। जहाँ शाखा लगती है, उसे संघ स्थान कहते हैं। जब कोई एक स्थान पर नित्य आता है, तो उसका एक स्वभाव बनने लगता है। संत नामदेव जी ने कहा है कि यदि मन में भक्तिभाव नहीं है फिर भी कोई व्यक्ति भगवान का नाम बिना सूझबूझ से लेता रहा, तो भी उसका मन भगवान से जुड़ जाता है और उसका मानसिक उन्नयन हो जाता है। यही बात शाखा पर स्वयंसेवकों के नित्य एकत्र आने से सिद्ध होती देखी गई है। जब कोई व्यक्ति शाखा पर नियमित आता है, तब संघ का विचार एवं ध्येय उसके मन में गहराई तक स्वत: ही उतर जाता है। संघ के विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी पुस्तक ‘कार्यकर्ता’ में लिखते हैं- “शाखा में आने के बाद व्यक्ति में स्वयं खुद को पता न लगते हुए ही धीरे-धीरे परिवर्तन आता है। एक साथ कार्यक्रम करने से समूहभाव, सामाजिकता विकसित होती है। खेलकूद और अन्य शारीरिक कार्यक्रमों से स्वयंसेवकों की शारीरिक क्षमता बढ़ती है, जो आगे चलकर अपने कार्य के लिए कष्ट उठाने में सहायभूत होती है”। 

समाप्त होता है अहंकार, बढ़ता है कर्तव्य भाव :

जब कोई व्यक्ति संघ की शाखा पर आता है और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खेलता है, मंडल में बैठकर चर्चा करता है, तब वह स्वत: ही भूल जाता है कि अन्य स्वयंसेवक बंधु किस पंथ और किस जाति के हैं। कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह भाव भी समाप्त हो जाता है। हमने यह भी देखा है कि शाखा का मुख्य शिक्षक एक छोटा बालक है, तब भी उसकी आज्ञा का पालन सरसंघचालक करते हैं। यानी शाखा पर पद और दायित्व का बड़प्पन भी नहीं दिखता। सामाजिक व्यवहार में जो बातें बाधक होती हैं, वे कब छूट जाती हैं, नित्य शाखा आनेवाले स्वयंसेवक को पता ही नहीं चलता है। यही है व्यक्ति निर्माण की अभिनव पद्धति, जिसमें व्यक्ति का अहंकार समाप्त होता है और कर्तव्य भाव बढ़ता है। समाज जीवन के लिए आवश्यक गुणों की जागृति संघ की शाखा पर होती है।

समर्थ रामदास के अखाड़े और संघ की शाखा :

नियमित मिलने-जुलने से अपनत्व का भाव आता है। अपने आप ही संगठन की भावना आती है। आत्मविश्वास बढ़ता है। हम सब एकसाथ हैं और समाज की किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं, यह विचार पक्का होता है। समर्थ रामदास जी महाराज ने देशभर में अखाड़ों की शुरुआत क्यों की? उन्होंने अखाड़ों को सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के केन्द्र के तौर पर देखा, जहाँ युवक एकसाथ आएंगे तो उनके मन में अपने राष्ट्र, समाज और धर्म की रक्षा का भाव जागृत होगा। अखाड़े केवल कुश्ती के अभ्यास और शारीरिक बल में वृद्धि के लिए नहीं थे। अपितु इनके माध्यम से समर्थ रामदास जी महाराज ने ‘लोकसंगठन’ (लोगों को एक मंच पर लाना) और ‘धर्मसंगठन’ (आध्यात्मिक चेतना जगाना) तैयार किया, जिसका सहयोग हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना में छत्रपति शिवाजी महाराज को मिला। आधुनिक समय में संघ की शाखा ने समर्थ गुरु रामदास महाराज के अखाड़े की संकल्पना को साकार किया है। संघ के विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी कहते थे कि “संघ की कार्यपद्धति में तथा कार्यक्रमों में कोई धार्मिक या आध्यात्मिक साधना का समावेश नहीं है। लेकिन अगर स्वयं के परे जाना, निजी अहंकार को समष्टि में मिलाना, वयंकार में परिवर्तित करना यही आध्यात्मिकता का बुनियादी आयाम है, तो शाखा व्यवहार से जो बंधुता का, सामूहिकता का, आत्मलोप का, संस्कार होता है वह आध्यात्मिक साधना ही है”। 

सबके लिए खुली है संघ शाखा :

शाखा पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं है। शाखा में आने के लिए न आयु की मर्यादा का सवाल उठता है न किसी विशेष क्षमता का। कोई भी व्यक्ति शिशु अवस्था से लेकर वयोवृद्ध अवस्था तक शाखा आ सकता है। एक ही शाखा पर बच्चे और वयस्क, एकसाथ खेलते हुए हमें दिख जाएंगे। कोई भी व्यक्ति अपनी-अपनी प्रवृत्तियों, मानसिकता, कमजोरियों एवं विशेषताओं के साथ शाखा में शामिल हो सकता है। संघ स्थान सबके लिए खुला है। संघ को अपनी कार्य पद्धति पर पूर्ण विश्वास है कि शाखा आने वाला व्यक्ति समय के साथ स्वयं ही परिष्कृत हो जाएगा। 

संघ केवल शाखा चलाता है :

संघ कार्य में शाखा का क्या महत्व है? इस संदर्भ में सरसंघचालकों के बौद्धिकों को पढ़ा जाना चाहिए। संघ की ओर से अकसर कहा जाता है कि संघ का कार्य केवल शाखा चलाना है। पांचजन्य और ऑर्गेनाइजर के विशेषांकों (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 वर्ष की यात्रा) के विमोचन प्रसंग पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भी कहा है कि “संघ केवल एक ही काम करता है, शाखा चलाना एवं मनुष्य निर्माण करना, लेकिन स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ता। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें स्वयंसेवक कार्य न कर रहा हो। संघ का कार्य एवं विचार सत्य पर आधारित है, किसी के प्रति विरोध या द्वेष पर नहीं”। अन्य अवसरों पर भी वे यह बात कह चुके हैं। इस कथन में संघ की शाखा की विशेषता एवं सामर्थ्य छिपा है। संघ की शाखा से निकले व्यक्तियों ने समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक से बढ़कर एक संगठन खड़े कर दिए हैं, जो राष्ट्रीय विचार के वाहक हैं। एक प्रसंग पर भगिनि निवेदिता ने भी मार्गदर्शन किया है- “सभी हिन्दू लोग अगर हररोज एक घंटे के लिए कोई विशेष निमित्त न रखते हुए भी इकठ्ठा हो जाएं तो भी कार्य के ऊँचे पहाड़ खड़े हो सकते हैं”। उनके इस विचार को संघ की शाखा ने सिद्ध करके दिखाया है। संघ की शाखा पर एकत्र आए हिन्दू समाज ने विभिन्न क्षेत्रों में अनूठे संगठनों की रचना करके अभूतपूर्व कार्य खड़े किए हैं। 

एक घंटे की शाखा को समाज में 23 घंटे जीना :

कुछ लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि संघ की शाखा मतलब- किसी स्थान पर एकत्र होकर एक घंटे खेलना-कूदना। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने प्रारंभ से ही इस संबंध स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया है कि “स्वयंसेवक की यह सोच नहीं होनी चाहिए कि एक घंटा संघ के लिए, बाकी तेईस घंटे संघेतर व्यवहार के लिए”। संघ के प्रचारक रहे बाबासाहेब आप्टे भी कहते थे कि “हम एक घंटा संघस्थान पर आते हैं। बाकी तेईस घंटों में संघ का काम हमने कितना किया, उसका यह एक घंटा मापदण्ड है। हमारा संघ चिंतन चौबीस घंटों का होना चाहिए। अपनी नौकरी-व्यवसाय, अध्ययन-अध्यापन और अन्य प्रकार की सामाजिक सक्रियता के दौरान स्वयंसेवक को अपने आचरण से संघ को अभिव्यक्त करने के साथ ही योग्य लोगों का चयन करके संघ के राष्ट्रीय कार्य में सहभागी बनाना चाहिए। सबको साथ लेकर चलना संघ दृष्टि है”। कहने का अभिप्राय है कि संघ का स्वयंसेवक संघ स्थान पर जो संस्कार अर्जित करता है, उसे वह अपने साथ समाज में लेकर भी जाता है। 

कुल मिलाकर संघ ने अपने ध्येय की पूर्ति के लिए साधन के रूप में जिस दैनंदिन शाखा पद्धति को विकसित किया है, वह अत्यंत सरल, सुलभ, स्वाभाविक और प्रभावी है।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 11 जनवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

हिन्दुओं के मानवाधिकारों पर वैश्विक चुप्पी

गरिमामयी जीवन जीने के लिए मनुष्य होने के नाते हमारे कुछ अधिकार हैं। वैश्विक स्तर पर मनुष्यों के अधिकारों की रक्षा हो सके, इस उद्देश्य के साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर, 1948 को ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ की। यह दस्तावेज मानव जीवन, स्वतंत्रता, विचार की अभिव्यक्ति, धर्म, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को परिभाषित करता है। भारत के संविधान में भी कई अनुच्छेद मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। मानवाधिकारों का हनन रोकने, उनकी निगरानी करने एवं इससे जुड़े अन्य मामलों पर हस्तक्षेप करने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएँ भी गठित की गई हैं। परंतु, विडंबना यह है कि इन संस्थाओं को अन्य समुदायों के मानवाधिकारों की चिंता तो होती है, लेकिन हिंदुओं के मानवाधिकार इन्हें संभवतः दिखाई ही नहीं देते। विश्व के विभिन्न देशों में हिंदुओं के मानवाधिकारों का खुलेआम हनन हो रहा है, लेकिन कहीं कोई घोर आपत्ति सुनाई नहीं देती। एक प्रकार से वैश्विक चुप्पी छाई हुई है। यह स्थिति चिंताजनक है। यह चुप्पी हिंदू समाज के मन में आक्रोश पैदा करती है और सांप्रदायिक भेद भी बढ़ाती है।

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बांग्लादेश में निशाने पर हिन्दू

बांग्लादेश से आ रहे समाचार न केवल विचलित करने वाले हैं, बल्कि पड़ोसी देश में कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और विशेष रूप से हिन्दू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। बांग्लादेश के जेस्सोर जिले में पत्रकार राणा प्रताप बैरागी की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या और अगले ही दिन एक हिन्दू दुकानदार शरत चक्रवर्ती मणि की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई। 18 दिन में 6 हिन्दुओं की हत्याओं की घटनाएं सामने आई हैं। मारपीट और शोषण के मामले भी सामने आ रहे हैं। ये घटनाएं महज आंकडे नहीं हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक सोच के गवाह हैं, जिसने पिछले कुछ हफ्तों में वहां के हिन्दू समुदाय को दहशत के साये में जीने को मजबूर कर दिया है। घटनाओं की प्रकृति और उनमें अपनाए गए तरीके अत्यंत बर्बर और अमानवीय हैं। एक तरफ जहां राणा प्रताप को सरेआम गोली मारी गई, वहीं शरीयतपुर में व्यापारी खोकन चंद्र दास के साथ जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला है। धारदार हथियारों से हमला करना और फिर पेट्रोल डालकर जिंदा जला देना, अपराधियों के मन में बैठे गहरे सांप्रदायिक जहर को दर्शाता है।

रविवार, 4 जनवरी 2026

किसी की प्रतिक्रिया या विरोध में शुरू नहीं हुआ संघ

संघ शताब्दी वर्ष : संपूर्ण हिन्दू समाज को एकजुट कर, भारत को परमवैभव पर पहुँचाने के संकल्प से जन्मा है संघ 

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा का अवलोकन करने पर बहुत रोचक और आश्चर्यजनक बातें सामने आती हैं। संघ को लेकर जितने प्रकार के नैरेटिव समाज में चलते हैं, उनमें से ज्यादातर संघ विरोधियों ने फैलाए हैं। यानी जो संघ को जानते नहीं है, मानते नहीं हैं, उन्होंने समाज को बताने का प्रयास किया कि संघ क्या है और कैसा है। अनेक अवसरों पर संघ के हितैषी भी संघ की वास्तविक प्रतिमा समाज के सामने रखने में चूके हैं। शताब्दी वर्ष के प्रसंग को निमित्त मानकर संघ ने तय किया है कि समाज के सामने संघ को संघ के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाए। संघ के बारे में वास्तविक और अधिकृत जानकारी रखी जाए, ताकि समाज पर छाए भ्रम के बादल कुछ हद तक छंट जाएं। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक एवं सरकार्यवाह के प्रवास देशभर में हो रहे हैं। देश के चार प्रमुख केंद्रों- दिल्ली, बेंगलुरू, कोलकाता और मुम्बई में तो सरसंघचालक जी की विशेष व्याख्यानमालाएं हो रही हैं। इसके अलावा अन्य स्थानों पर भी समाज के विभिन्न वर्गों के साथ उनका संवाद हो रहा है। इसी क्रम में 2-3 जनवरी, 2026 को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का प्रवास हुआ। इस अवसर पर वे चार कार्यक्रमों- युवा संवाद, प्रमुख जन गोष्ठी, सामाजिक सद्भाव बैठक और शक्ति संवाद में सम्मिलित हुए। अपने इस प्रवास में उन्होंने महत्वपूर्ण तथ्य समाज के सामने रखे, जो निश्चित ही संघ के बारे में देखने का नया नजरिया देते हैं।