मंगलवार, 27 जनवरी 2026

आरएसएस और संविधान : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए सर्वोच्च है संविधान का सम्मान

संघ शताब्दी वर्ष : ऐतिहासिक तथ्य और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बयान बताते हैं कि स्वयंसेवकों ने न केवल संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष किया है अपितु बलिदान भी दिया है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रारंभ से ही भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। संविधान भी ऐसा ही एक प्रतीक है, जिसका सम्मान एवं सुरक्षा संघ के लिए प्राथमिक है। हालांकि, आरएसएस और संविधान के रिश्तों को लेकर अकसर राजनीतिक विमर्श में कई तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं। यह सवाल ज्यादातर उनकी ओर से उठाया जाता है, जिन्हें संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ही संविधान विरोधी कहा था। संविधान सभा में अपने आखिरी भाषण में डॉ. अंबेडकर ने कम्युनिस्टों और समाजवादियों को संविधान की निंदा करने वाला बताया था। उन्होंने कहा था कि कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के अपने सिद्धांत पर आधारित संविधान चाहती है और वे संविधान की निंदा करते हैं क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संविधान के संबंध में ऐतिहासिक तथ्यों और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बयानों का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि संघ ने सदैव ही संविधान के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारत में आरएसएस ऐसा संगठन है, जिसने संविधान की सुरक्षा एवं सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष भी किया और बलिदान भी दिया है। 

महात्मा गांधी की हत्या के संदर्भ में झूठे आरोप लगाकर नेहरू सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगाया लेकिन जब एक भी आरोप प्रमाणित नहीं हो सका, तब सरकार को मजबूरन प्रतिबंध हटाना पड़ा। अपने घोर अलोकतांत्रिक निर्णय का बचाव करने के लिए सरकार की ओर से वर्ष 1949 में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की ओर से सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को भारत के राष्ट्रध्वज और संविधान के प्रति निष्ठावान रहने का सुझाव दिलवाया गया। इसी घटनाक्रम को आधार बनाकर आलोचकों की ओर से यह प्रोपेगेंडा खड़ा किया गया कि संघ की निष्ठा संविधान में नहीं है। जबकि ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि सरदार पटेल के सुझाव से बहुत पहले ही, 2 नवंबर 1948 को ही श्रीगुरुजी राष्ट्रध्वज, संविधान एवं अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति संघ की निष्ठा का लिखित और स्पष्ट प्रमाण दे चुके थे। श्रीगुरुजी ने कई बार दोहराया कि “भारत के प्रत्येक अन्य नागरिक के समान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक देश, उसके संविधान, स्वतंत्रता और गौरव के प्रत्येक प्रतीक के प्रति निष्ठावान है”।

वर्ष 1950 में जब हमने अपने संविधान को आत्मार्पित किया, तब श्रीगुरुजी ने देश को बधाई देते हुए कहा था कि आज ब्रिटिश ताज की जगह ‘अशोक चक्र’ ने ले ली है और हम अपनी इच्छानुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र हैं। श्रीगुरुजी ने इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को हर्ष और उत्सव का प्रसंग बताया था। उन्होंने कहा था कि आज का अवसर हार्दिक आनंद का अवसर है और हमें इस बात के लिए हर्ष होना चाहिए कि यह हमारा महान सौभाग्य है कि हम अपने देश के इतिहास की ऐसी शुभ घडी पर उपस्थित हैं। श्रीगुरुजी के ये विचार संविधान विरोधी व्यक्ति या संगठन प्रमुख के तो नहीं हो सकते। इन विचारों से तो स्पष्ट होता है कि संघ भारत के अपने संविधान के लागू होने के ऐतिहासिक अवसर का प्रसन्नता के साथ स्वागत कर रहा था। इस प्रसंग पर श्रीगुरुजी ने 26 जनवरी, 1930 के उस दिन को भी याद किया जब रावी के तट पर हमने पूर्ण स्वराज्य का संकल्प पारित किया। श्रीगुरुजी ने कहा- “रावी के तट पर 20 वर्ष पूर्व पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव हमारे आज के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा उपस्थित किया गया था और काग्रेस ने उसे स्वीकार किया था। उसके बाद प्रतिवर्ष 26 जनवरी को हम यह दिन ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाते रहे, किंतु हमारे चारों ओर विदेशी प्रभुत्व बना रहा”। ध्यान दें कि श्रीगुरुजी भारतीय संविधान के लागू होने को विदेशी प्रभुत्व से पूर्णत: मुक्ति के रूप में देख रहे थे। कुल मिलाकर कहना है कि संघ की ओर से 26 जनवरी 1950 को उसी प्रकार से आनंद व्यक्त किया गया, जिस प्रकार 26 जनवरी 1930 को ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाने का आदेश देते हुए संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने व्यक्त किया था। 

अकसर संघ पर आरोप लगाया जाता है कि वह संविधान को बदलना चाहता है। वास्तविकता यह है कि संघ ने संविधान में उन सब बदलावों का विरोध किया है, जो उसे कमजोर करने हैं। स्वतंत्र भारत की पहली सरकार ने संविधान लागू होने के कुछ समय बाद से ही संविधान में संशोधन प्रारंभ कर दिए। श्रीगुरुजी संविधान में बार-बार किए जा रहे संशोधनों को लेकर चिंतित थे। उनका मानना था कि संविधान देश को संगठित और शक्तिशाली बनाने का आधार है। उनका कहना था कि सरकार द्वारा बार-बार संशोधन करने से संविधान की प्रतिष्ठा कम होती है। उनकी पीड़ा यह थी कि संविधान के प्रति जो ‘पवित्रता का भाव’ होना चाहिए, उसका उल्लंघन किया जा रहा है और जनता को यह संदेश जा रहा है कि संविधान के साथ मनचाहा खिलवाड़ संभव है। श्रीगुरुजी चाहते थे कि शासक वर्ग संविधान का पर्याप्त आदर करे ताकि वह जनता के लिए सदैव पूजनीय बना रहे।

जब हमारी सरकार ने तुष्टीकरण की राजनीति के चलते जम्मू-कश्मीर में ‘दो निशान, दो विधान, दो प्रधान’ की व्यवस्था को स्वीकार करके भारत के राष्ट्रध्वज और संविधान के प्रतिष्ठा के साथ समझौता किया, तब आरएसएस ही था, जिसने संपूर्ण भारत के समान जम्मू-कश्मीर में भी ‘एक निशान, एक विधान, एक प्रधान’ का आंदोलन चलाया। संविधान की सर्वोच्चता स्थापित करने की सबसे पहली और बड़ी यह लड़ाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने ही लड़ी थी।  श्रीगुरूजी ने उस समय कड़े शब्दों में कहा था, “कश्मीर को सुरक्षित रखने का एकमात्र तरीका उसका भारतीय संघ में पूर्ण विलय है। अनुच्छेद-370 के साथ-साथ पृथक ध्वज एवं पृथक संविधान को समाप्त करना आवश्यक है”। भारत की एकता और संविधान की सार्वभौमिकता को पूरे देश में (कश्मीर सहित) लागू करवाने के इस अभियान में संघ के अनेक स्वयंसेवकों ने अपना बलिदान दिया और अंततः एक निर्णायक वैचारिक विजय प्राप्त की।

जब 1975 में देश को आपातकाल के गहन अंधकार में धकेला गया, तब लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन संघ के स्वयंसेवकों ने ही चलाया। आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल 1,30,000 सत्याग्रहियों में से 1,00,000 से अधिक स्वयंसेवक थे। मीसा के अधीन जो 30,000 लोग बंदी बनाए गए, उनमे से 25000 से अधिक संघ-संवर्ग के थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 कार्यकर्ता अधिकांशतः बंदीग्रहों और कुछ बाहर आपातकाल के दौरान बलिदान हो गए। इसी प्रकार, मार्च 1984 में, जब पंजाब में अलगाववाद चरम पर था और अकाली दल के कुछ तत्वों ने संविधान की प्रतियाँ जलाई थीं, तब संघ ने इसका कड़ा विरोध किया था। संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने प्रस्ताव पारित कर कहा था कि स्वर्ण मंदिर में खालिस्तानी झंडा फहराना और संविधान जलाना ‘निंदनीय और राष्ट्रद्रोही कार्य’ है, जिससे किसी भी देशभक्त का चिंतित होना स्वाभाविक है। संविधान के प्रति अप्रतिम निष्ठा रखनेवाले ही उसके सम्मान के लिए इस प्रकार मैदान में उतर सकते हैं। 

संविधान के प्रति संघ का यह दृष्टिकोण प्रारंभ से अब तक अक्षुण्ण है। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी संविधान के प्रति सम्मान को नागरिकों का प्रमुख कर्तव्य मानते हैं। उन्होंने अकसर अपने भाषणों में संविधान के प्रति संघ की भावना को स्पष्ट रूप से सबके सामने रखा है। पंच परिवर्तन में ‘नागरिक कर्तव्यों का पालन’ संविधान की भावना को जन-जन तक पहुँचा ही है।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 25 जनवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

रहमान का ‘सांप्रदायिक सुर’

भारत के लोगों ने संगीतकार एआर रहमान को वर्षों बिना किसी भेदभाव के अथाह प्रेम दिया है, जबकि सबको पता है कि रहमान कन्वर्टेड मुसलमान हैं। आज तक किसी ने भी रहमान को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है। परंतु, रहमान ने खुद ही स्वयं को लेकर विवाद खड़ा कर लिया है। एक विदेशी मीडिया संस्थान को दिए गए साक्षात्कार में उनका यह कहना कि बॉलीवुड में उन्हें काम न मिलने की वजह ‘सांप्रदायिक’ हो सकती है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। जिस कलाकार को पूरे देश ने बिना किसी धर्म या जाति के भेदभाव के, आंखों पर बिठाया हो, ऐसी विक्टिम हुड (पीड़ित भाव) की बातें करना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। एक प्रकार से कहना होगा कि रहमान के मन में ही कहीं सांप्रदायिक सोच बैठी हुई थी, जो अब जाकर सामने आई है। रहमान जैसे लोगों को इसका जवाब भी देना चाहिए कि अनेक हिन्दू संगीतकार भी बॉलीवुड से बाहर हो चुके हैं, उसका कारण क्या है? क्या उन्हें भी मुस्लिम गिरोहबंदी के कारण काम मिलना बंद हुआ है? भारतीय सिनेमा में मुस्लिम कलाकारों का जिस प्रकार का वर्चस्व है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद भी रहमान हिन्दुओं के माथे पर सांप्रदायिका का लेबल चस्पा करने की कोशिश करे रहे हैं, तो इसे एक प्रकार से बेईमानी ही कहना चाहिए।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

सनातन की ओर लौटती तरुणाई

श्रीराम मंदिर: भारतीय युवाओं की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय


भारत के युवाओं को लेकर देश में अलग-अलग ढंग से विमर्श चल रहे हैं। कुछ ताकतें चाहती हैं कि भारत का युवा अपनी ही संस्कृति एवं जीवन मूल्यों के विरुद्ध खड़ा हो जाए। धर्म-संस्कृति क्रियाकलापों से युवाओं को दूर करने के लिए यहाँ तक कहा गया कि “जो लोग मंदिर जाते हैं, वही लोग महिलाओं को छेड़ते हैं”। यह भी कि “सरस्वती की पूजा करने से कोई आईएएस नहीं बनता”। योलो और वोकिज्म की रंगीन अवधारणाएं भारत की जेन-जी के दिमाग में उतारने के प्रपंच रचे ही जा रहे हैं। परंतु, भारत विरोधी ताकतों को यह स्मरण नहीं रहता कि भारत की संस्कृति के पोषण में वह ताकत है कि उसकी संतति अधिक समय तक उससे दूर नहीं रह सकती। सब प्रकार के प्रपंचों से थक-हारकर, आत्मा के वास्तविक सुख की प्राप्ति के लिए वह अपनी संस्कृति की गोद में ही लौटता है। आज सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों में युवाओं की जिस प्रकार की सक्रिय उपस्थिति दिखायी दे रही है, उसके गहरे निहितार्थ हैं। पिछले कुछ वर्षों में धर्म के प्रति युवाओं में गहरी रुचि पैदा हुई है। उनकी आध्यात्मिक चेतना को मंदिर में उमड़ रही युवाओं की भीड़ में अनुभव किया जा सकता है। ज्ञान की खोज में आश्रमों एवं गुरुकुलों में पहुँच रहे युवाओं के माथे पर उनकी जिज्ञासाओं को पढ़ा जा सकता है। युवाओं में परिवर्तन की इस लहर का प्रमुख केंद्र श्री अयोध्या धाम में, अपने भव्य मंदिर में विराजे रामलला हैं। भारत की सांस्कृतिक राजधानी श्रीअयोध्या में प्रभु श्रीराम के दिव्य मंदिर के निर्माण, रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा, शिखर पर धर्म ध्वजा की स्थापना, ये सब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, अपितु भारतीय जनमानस की चेतना में युगांतरकारी घटनाएं हैं। कहना होगा कि 22 जनवरी, 2024 के बाद भारत के युवा मन में जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह अभूतपूर्व है। यह घटना सदियों के संघर्ष के विराम के साथ-साथ एक नये और आत्मविश्वास से भरे भारत के उदय का प्रतीक बन गई है। आज श्रीराम मंदिर केवल ईंट-पत्थरों से बना देवालय नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का केंद्र बन गया है।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

पत्रकारिता के खट्टे-मीठे अनुभवों की पोटली

देखें वीडियो : अब मैं बोलूंगी….


‘अब मैं बोलूंगी…’ यह पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार स्मृति आदित्य की यादों की पोटली है, जिसमें कुछ खट्टे तो कुछ मीठे संस्मरण शामिल हैं। 15 वर्षों से अधिक फीचर संपादक के रूप में और स्वतंत्र लेखन करते हुए, उन्हें जो अनुभव आए, उन सबको वे अपनी डायरी में दर्ज करती करती गईं। इनमें अखबार के दफ्तर की राजनीति के किस्से, साहित्य चोरी के प्रसंग और अपने मन की अनुभूतियों का ऐसा ब्यौरा दर्ज है, जो सबको सीख देता है। यह पुस्तक मुख्यत: स्मृति आदित्य के उस समय की मन:स्थिति को सामने लाती है, जब उनको पता चलता है कि 15 साल से अधिक की ऑनलाइन पत्रकारिता की उनकी नौकरी अब जा रही है। यह स्थिति किसी को भी विचलित कर सकती है कि जब आपको पता न हो कि आगे क्या करना है? लेकिन खुद पर विश्वास हो तब आप ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में भी स्वयं को संभाल लेते हो। जुलाई से दिसंबर तक लिखी डायरी में उन्होंने पत्रकारिता की अपनी शुरुआत, उससे जुड़े सपनों एवं वहाँ की कठिनाइयों को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि पढ़कर ऐसा लगता है- यह तो मेरी ही कहानी है। इस पुस्तक को ‘शिवना कृति सम्मान-2025’ भी प्राप्त हुआ है।

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

व्यक्ति निर्माण का केंद्र है संघ की शाखा

संघ शताब्दी वर्ष : संघ का आग्रह, संघ को समझना चाहते हैं, तो शाखा आइए… 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सही अर्थों में समझना है और उसे नजदीक से देखना है, तब आपको संघ की शाखा में आना चाहिए। संघ का यह आग्रह उन सभी से रहता है, जो संघ को लेकर जिज्ञासु हैं। किसी प्रतिमा या दृश्य का कोई कितना ही अच्छा वर्णन करे लेकिन उसकी वास्तविक अनुभूति तो उसे समीप से देखकर ही होती है। सुनकर केवल कल्पनाओं के महल ही तैयार किए जा सकते हैं, जिन्हें कभी भी धराशाही किया जा सकता है। परंतु प्रत्यक्ष अनुभूति से बनी धारणा को किसी भी झूठ से खंडित नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि संघ की शाखा के संपर्क में आए महानुभाव समाज में चलने वाले किसी भी नैरेटिव से न तो संघ के बारे में धारणा बनाते और न ही बदलते हैं क्योंकि संघ क्या है, उन्होंने स्वयं शाखा में जाकर अनुभव किया है। हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संपूर्ण रचना को देखते हैं, तब इसके केन्द्र में हमें शाखा दिखाई देती है। भारत के उत्थान के लिए जिस प्रकार के संस्कारित मनुष्य छत्रपति शिवाजी महाराज से लेकर स्वामी विवेकानंद और उनके बाद के महापुरुष खोज रहे थे, वैसे मनुष्यों का निर्माण संघ की शाखा पर होता है। संघ कहता है कि उसकी शाखा खेल-कूद का उपक्रम मात्र नहीं है, अपितु यह तो व्यक्ति निर्माण का केंद्र है। अपने देश में सद्भावना लेकर काम करने वाले अनेक संगठन हैं। लेकिन उनके पास संघ जैसी कार्यपद्धति नहीं है, जिसके कारण संघ सौ वर्षों बाद भी यशस्वी है। संघ की शाखा ही है, जो उसे बाकी अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों से विशिष्ट बनाती है। अनेक प्रकार के झंझावात भी संघ और उसके स्वयंसेवकों को ध्येय से डिगा नहीं सके, तो उसका कारण शाखा रूपी अभिनव पद्धति है। 

रोज शाखा आते हैं तो क्या होता है :

संघ शाखा, एक ऐसी कार्यपद्धति है, जिसमें स्वयंसेवक एक स्थान पर नित्य एकत्र होते हैं। जहाँ शाखा लगती है, उसे संघ स्थान कहते हैं। जब कोई एक स्थान पर नित्य आता है, तो उसका एक स्वभाव बनने लगता है। संत नामदेव जी ने कहा है कि यदि मन में भक्तिभाव नहीं है फिर भी कोई व्यक्ति भगवान का नाम बिना सूझबूझ से लेता रहा, तो भी उसका मन भगवान से जुड़ जाता है और उसका मानसिक उन्नयन हो जाता है। यही बात शाखा पर स्वयंसेवकों के नित्य एकत्र आने से सिद्ध होती देखी गई है। जब कोई व्यक्ति शाखा पर नियमित आता है, तब संघ का विचार एवं ध्येय उसके मन में गहराई तक स्वत: ही उतर जाता है। संघ के विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी पुस्तक ‘कार्यकर्ता’ में लिखते हैं- “शाखा में आने के बाद व्यक्ति में स्वयं खुद को पता न लगते हुए ही धीरे-धीरे परिवर्तन आता है। एक साथ कार्यक्रम करने से समूहभाव, सामाजिकता विकसित होती है। खेलकूद और अन्य शारीरिक कार्यक्रमों से स्वयंसेवकों की शारीरिक क्षमता बढ़ती है, जो आगे चलकर अपने कार्य के लिए कष्ट उठाने में सहायभूत होती है”। 

समाप्त होता है अहंकार, बढ़ता है कर्तव्य भाव :

जब कोई व्यक्ति संघ की शाखा पर आता है और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खेलता है, मंडल में बैठकर चर्चा करता है, तब वह स्वत: ही भूल जाता है कि अन्य स्वयंसेवक बंधु किस पंथ और किस जाति के हैं। कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह भाव भी समाप्त हो जाता है। हमने यह भी देखा है कि शाखा का मुख्य शिक्षक एक छोटा बालक है, तब भी उसकी आज्ञा का पालन सरसंघचालक करते हैं। यानी शाखा पर पद और दायित्व का बड़प्पन भी नहीं दिखता। सामाजिक व्यवहार में जो बातें बाधक होती हैं, वे कब छूट जाती हैं, नित्य शाखा आनेवाले स्वयंसेवक को पता ही नहीं चलता है। यही है व्यक्ति निर्माण की अभिनव पद्धति, जिसमें व्यक्ति का अहंकार समाप्त होता है और कर्तव्य भाव बढ़ता है। समाज जीवन के लिए आवश्यक गुणों की जागृति संघ की शाखा पर होती है।

समर्थ रामदास के अखाड़े और संघ की शाखा :

नियमित मिलने-जुलने से अपनत्व का भाव आता है। अपने आप ही संगठन की भावना आती है। आत्मविश्वास बढ़ता है। हम सब एकसाथ हैं और समाज की किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं, यह विचार पक्का होता है। समर्थ रामदास जी महाराज ने देशभर में अखाड़ों की शुरुआत क्यों की? उन्होंने अखाड़ों को सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के केन्द्र के तौर पर देखा, जहाँ युवक एकसाथ आएंगे तो उनके मन में अपने राष्ट्र, समाज और धर्म की रक्षा का भाव जागृत होगा। अखाड़े केवल कुश्ती के अभ्यास और शारीरिक बल में वृद्धि के लिए नहीं थे। अपितु इनके माध्यम से समर्थ रामदास जी महाराज ने ‘लोकसंगठन’ (लोगों को एक मंच पर लाना) और ‘धर्मसंगठन’ (आध्यात्मिक चेतना जगाना) तैयार किया, जिसका सहयोग हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना में छत्रपति शिवाजी महाराज को मिला। आधुनिक समय में संघ की शाखा ने समर्थ गुरु रामदास महाराज के अखाड़े की संकल्पना को साकार किया है। संघ के विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी कहते थे कि “संघ की कार्यपद्धति में तथा कार्यक्रमों में कोई धार्मिक या आध्यात्मिक साधना का समावेश नहीं है। लेकिन अगर स्वयं के परे जाना, निजी अहंकार को समष्टि में मिलाना, वयंकार में परिवर्तित करना यही आध्यात्मिकता का बुनियादी आयाम है, तो शाखा व्यवहार से जो बंधुता का, सामूहिकता का, आत्मलोप का, संस्कार होता है वह आध्यात्मिक साधना ही है”। 

सबके लिए खुली है संघ शाखा :

शाखा पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं है। शाखा में आने के लिए न आयु की मर्यादा का सवाल उठता है न किसी विशेष क्षमता का। कोई भी व्यक्ति शिशु अवस्था से लेकर वयोवृद्ध अवस्था तक शाखा आ सकता है। एक ही शाखा पर बच्चे और वयस्क, एकसाथ खेलते हुए हमें दिख जाएंगे। कोई भी व्यक्ति अपनी-अपनी प्रवृत्तियों, मानसिकता, कमजोरियों एवं विशेषताओं के साथ शाखा में शामिल हो सकता है। संघ स्थान सबके लिए खुला है। संघ को अपनी कार्य पद्धति पर पूर्ण विश्वास है कि शाखा आने वाला व्यक्ति समय के साथ स्वयं ही परिष्कृत हो जाएगा। 

संघ केवल शाखा चलाता है :

संघ कार्य में शाखा का क्या महत्व है? इस संदर्भ में सरसंघचालकों के बौद्धिकों को पढ़ा जाना चाहिए। संघ की ओर से अकसर कहा जाता है कि संघ का कार्य केवल शाखा चलाना है। पांचजन्य और ऑर्गेनाइजर के विशेषांकों (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 वर्ष की यात्रा) के विमोचन प्रसंग पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भी कहा है कि “संघ केवल एक ही काम करता है, शाखा चलाना एवं मनुष्य निर्माण करना, लेकिन स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ता। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें स्वयंसेवक कार्य न कर रहा हो। संघ का कार्य एवं विचार सत्य पर आधारित है, किसी के प्रति विरोध या द्वेष पर नहीं”। अन्य अवसरों पर भी वे यह बात कह चुके हैं। इस कथन में संघ की शाखा की विशेषता एवं सामर्थ्य छिपा है। संघ की शाखा से निकले व्यक्तियों ने समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक से बढ़कर एक संगठन खड़े कर दिए हैं, जो राष्ट्रीय विचार के वाहक हैं। एक प्रसंग पर भगिनि निवेदिता ने भी मार्गदर्शन किया है- “सभी हिन्दू लोग अगर हररोज एक घंटे के लिए कोई विशेष निमित्त न रखते हुए भी इकठ्ठा हो जाएं तो भी कार्य के ऊँचे पहाड़ खड़े हो सकते हैं”। उनके इस विचार को संघ की शाखा ने सिद्ध करके दिखाया है। संघ की शाखा पर एकत्र आए हिन्दू समाज ने विभिन्न क्षेत्रों में अनूठे संगठनों की रचना करके अभूतपूर्व कार्य खड़े किए हैं। 

एक घंटे की शाखा को समाज में 23 घंटे जीना :

कुछ लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि संघ की शाखा मतलब- किसी स्थान पर एकत्र होकर एक घंटे खेलना-कूदना। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने प्रारंभ से ही इस संबंध स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया है कि “स्वयंसेवक की यह सोच नहीं होनी चाहिए कि एक घंटा संघ के लिए, बाकी तेईस घंटे संघेतर व्यवहार के लिए”। संघ के प्रचारक रहे बाबासाहेब आप्टे भी कहते थे कि “हम एक घंटा संघस्थान पर आते हैं। बाकी तेईस घंटों में संघ का काम हमने कितना किया, उसका यह एक घंटा मापदण्ड है। हमारा संघ चिंतन चौबीस घंटों का होना चाहिए। अपनी नौकरी-व्यवसाय, अध्ययन-अध्यापन और अन्य प्रकार की सामाजिक सक्रियता के दौरान स्वयंसेवक को अपने आचरण से संघ को अभिव्यक्त करने के साथ ही योग्य लोगों का चयन करके संघ के राष्ट्रीय कार्य में सहभागी बनाना चाहिए। सबको साथ लेकर चलना संघ दृष्टि है”। कहने का अभिप्राय है कि संघ का स्वयंसेवक संघ स्थान पर जो संस्कार अर्जित करता है, उसे वह अपने साथ समाज में लेकर भी जाता है। 

कुल मिलाकर संघ ने अपने ध्येय की पूर्ति के लिए साधन के रूप में जिस दैनंदिन शाखा पद्धति को विकसित किया है, वह अत्यंत सरल, सुलभ, स्वाभाविक और प्रभावी है।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 11 जनवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

हिन्दुओं के मानवाधिकारों पर वैश्विक चुप्पी

गरिमामयी जीवन जीने के लिए मनुष्य होने के नाते हमारे कुछ अधिकार हैं। वैश्विक स्तर पर मनुष्यों के अधिकारों की रक्षा हो सके, इस उद्देश्य के साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर, 1948 को ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ की। यह दस्तावेज मानव जीवन, स्वतंत्रता, विचार की अभिव्यक्ति, धर्म, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को परिभाषित करता है। भारत के संविधान में भी कई अनुच्छेद मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। मानवाधिकारों का हनन रोकने, उनकी निगरानी करने एवं इससे जुड़े अन्य मामलों पर हस्तक्षेप करने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएँ भी गठित की गई हैं। परंतु, विडंबना यह है कि इन संस्थाओं को अन्य समुदायों के मानवाधिकारों की चिंता तो होती है, लेकिन हिंदुओं के मानवाधिकार इन्हें संभवतः दिखाई ही नहीं देते। विश्व के विभिन्न देशों में हिंदुओं के मानवाधिकारों का खुलेआम हनन हो रहा है, लेकिन कहीं कोई घोर आपत्ति सुनाई नहीं देती। एक प्रकार से वैश्विक चुप्पी छाई हुई है। यह स्थिति चिंताजनक है। यह चुप्पी हिंदू समाज के मन में आक्रोश पैदा करती है और सांप्रदायिक भेद भी बढ़ाती है।

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बांग्लादेश में निशाने पर हिन्दू

बांग्लादेश से आ रहे समाचार न केवल विचलित करने वाले हैं, बल्कि पड़ोसी देश में कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और विशेष रूप से हिन्दू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। बांग्लादेश के जेस्सोर जिले में पत्रकार राणा प्रताप बैरागी की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या और अगले ही दिन एक हिन्दू दुकानदार शरत चक्रवर्ती मणि की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई। 18 दिन में 6 हिन्दुओं की हत्याओं की घटनाएं सामने आई हैं। मारपीट और शोषण के मामले भी सामने आ रहे हैं। ये घटनाएं महज आंकडे नहीं हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक सोच के गवाह हैं, जिसने पिछले कुछ हफ्तों में वहां के हिन्दू समुदाय को दहशत के साये में जीने को मजबूर कर दिया है। घटनाओं की प्रकृति और उनमें अपनाए गए तरीके अत्यंत बर्बर और अमानवीय हैं। एक तरफ जहां राणा प्रताप को सरेआम गोली मारी गई, वहीं शरीयतपुर में व्यापारी खोकन चंद्र दास के साथ जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला है। धारदार हथियारों से हमला करना और फिर पेट्रोल डालकर जिंदा जला देना, अपराधियों के मन में बैठे गहरे सांप्रदायिक जहर को दर्शाता है।