शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

भारत के विचार की विजय पताका

श्री अयोध्या धाम में श्रीराम मंदिर पर धर्म ध्वजा की प्रतिष्ठा का यह प्रसंग अविस्मणीय है। यह केवल एक मंदिर पर फहराने वाला ध्वज नहीं है अपितु भारत के विचार की विजय पताका है। सदियों की तपस्या, संघर्ष और आस्था एक होकर भव्य श्रीराम मंदिर के शिखर पर धर्मध्वमजा के रूप में साकार हुई है। वास्तव में, 25 नवंबर, 2025 भारत की सांस्कृतिक चेतना के लिए ‘सार्थकता का दिन’ बन गया। जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि “सार्थकता के इस दिन के लिए जितने लोगों ने प्राण न्योछावर किए, उनकी आत्मा तृप्त हुई होगी। आज मंदिर का ध्वजारोहण हो गया। मंदिर की शास्त्रीय प्रक्रिया पूर्ण हो गई। राम राज्य का ध्वज, जो कभी अयोध्या में फहराता था, जो पूरी दुनिया में अपने आलोक से समृद्धि प्रदान करता था, वह आज धीरे-धीरे ऊपर उठते हुए अपनी आंखों से देखा है। इस भगवा ध्वज पर रघुकुल का प्रतीक कोविदार वृक्ष है। यह वृक्ष रघुकुल की सत्ता का प्रतीक है”। 

कहना होगा कि इस दिन को साकार करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। श्रीराम जन्मभूमि पर आक्रांता के चिह्न तथाकथित बाबारी ढांचे को हटाकर उस स्थान पर भव्य श्रीराम मंदिर बनाने के लिए हिन्दू समाज विगत 500 वर्षों से संघर्ष कर रहा था। संघ ने इस आंदोलन को अपने हाथ में लेकर हिन्दू समाज के सामर्थ्य को जगाया और उस सपने को साकार कर दिखाया, जिसके लिए हिन्दुओं की पीढ़ियां खप गई थीं। आज जब श्रीराम मंदिर पर धर्मध्वजा लहरा रही थी, तब करोड़ों हिन्दुओं के मन में भावना की ऊंची लहरें उठ रही थीं। निश्चित ही, यह ऐतिहासिक अवसर था, जो यह बताता है कि विजय पताका उसी की फहराती है, जो सच के साथ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस क्षण को ‘अद्वितीय और अलौकिक’ बताते हुए इसे ‘भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज’ घोषित किया। उन्होंने उचित ही कहा कि “यह केवल एक औपचारिक अनुष्ठान नहीं था; यह सदियों के घावों पर मरहम लगाने, वेदनाओं को विराम देने और एक महान संकल्प की सिद्धि का प्रतीक था। यह धर्मध्व ज, जिस पर रघुकुल का प्रतीक कोविदार वृक्ष अंकित है, दूर से ही रामजन्मभूमि के ध्येय का दर्शन कराएगा और युगों-युगों तक प्रभु श्रीराम के आदर्श संदेश को पूरे विश्व में पहुंचाएगा”। 

स्मरण रहे कि ध्वजारोहण का महत्व केवल राष्ट्रीय या औपचारिक नहीं होता, इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक भाव छिपा होता है। आध्यात्मिकता की दृष्टि से, यह ध्वज स्वाभिमान और आंतरिक जागृति का प्रतीक है। ध्वज को ऊँचाई पर फहराना स्वयं को गौरव, साहस और सत्य के प्रति जागृत करने जैसा है। इसे ‘ऊर्जा का केंद्र’ माना गया है जो नकारात्मक शक्तियों को दूर कर उस स्थान की ऊर्जा को पवित्र रखता है। यह मन में आत्मबल, संकल्प और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, साथ ही मनुष्य को अहंकार छोड़कर धर्म के प्रति समर्पित होने का संदेश देता है। यह श्रद्धा, विनम्रता और आत्मसमर्पण का उच्चतम रूप है। श्रीराम मंदिर पर फहरा यह ध्वज सनातन धर्म, सत्य और सद्गुण की शाश्वत विजय का उद्घोष है।

रविवार, 23 नवंबर 2025

सज्जनशक्ति को साथ ले, संघ के स्वयंसेवकों ने समाज परिवर्तन के प्रयासों को दी गति

संघ शताब्दी वर्ष : संघ विकास यात्रा के चौथा चरण द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ के जन्म शताब्दी वर्ष से शुरू हुआ 

अपने सुदीर्घ सामाजिक यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक-एक कदम आगे बढ़, अपना सामर्थ्य बढ़ाता रहा और उसके अनुरूप देशहित में अपनी भूमिका का विस्तार करता रहा है। संघ के स्वयंसेवक एक गीत गाते हैं- "दसों दिशाओं में जाएं, दल-बादल से छा जाएं, उमड़-घुमड़कर हर धरती को नंदनवन सा लहराएं..."। अपने तीन चरण की यात्रा के साथ संघ अब देशव्यापी संगठन हो चुका था। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में भी भारतीयता का पोषण करने वाला वातावरण बनाने के लिए समविचारी संगठन प्रारंभ हो ही गए थे। अब आवश्यकता थी कि सब कार्यों में समाज की सज्जनशक्ति को जोड़कर उन कार्यों को और अधिक प्रभावी बनाया जाए। किसी भी रचनात्मक एवं सृजनात्मक कार्य की स्थायी सिद्धि के लिए आवश्यक है कि समाज के प्रमुख जन उस कार्य को अपना मानें और उसे यशस्वी बनाने में अपनी भूमिका निभाएं। समाज की सज्जनशक्ति तक पहुंचना और उन्हें संघधारा में लेकर आना, इसके लिए संघ ने अपने द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य 'श्रीगुरुजी' की जन्मशताब्दी वर्ष को सुअवसर के तौर पर देखा।

रविवार, 16 नवंबर 2025

“सेवा है यज्ञकुंड समिधा सम हम जले”

संघ शताब्दी वर्ष : संघ विकास यात्रा के तीसरे चरण में आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार के जन्म शताब्दी वर्ष से मिली सेवा कार्यों को गति

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत कहते हैं कि “सेवा कार्यों की प्रेरणा के पीछे हमारा स्वार्थ नहीं है। हमें अपने अहंकार की तृप्ति और अपनी कीर्ति-प्रसिद्धि के लिए सेवा-कार्य नहीं करना है। यह अपना समाज है, अपना देश है, इसलिए हम कार्य कर रहे हैं। स्वार्थ, भय, मजबूरी, प्रतिक्रिया या अहंकार, इन सब बातों से रहित आत्मीय वृत्ति का परिणाम है यह सेवा।” संघ ने अपने विकास के तीसरे चरण के अंतर्गत 1989 में संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी के जन्मशताब्दी वर्ष के प्रसंग से सेवा कार्यों को अधिक गति और व्यवस्थित रूप देने का निर्णय लिया। आद्य सरसंघचालक के जन्मशताब्दी वर्ष का केंद्रीय भाव या उद्देश्य सेवा कार्य ही था। तत्कालीन सरसंघचालक डॉ. बालासाहब देवरस का इस बात पर अधिक जोर था कि समाज को संभालने के लिए सेवा कार्यों की आवश्यकता है। उस समय तक संघ का सामर्थ्य इतना बढ़ गया था कि उसके कार्यकर्ता व्यवस्थिति ढंग से सेवाकार्यों का संचालन कर सकते थे। तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस की प्रेरणा से 1990 में संघ में विधिवत सेवा विभाग प्रारंभ हुआ। समाज के साथ मिलकर सेवाकार्यों को विस्तार दिया जाए, इस उद्देश्य से सभी प्रांतों में ‘सेवा भारती’ का कार्य प्रारंभ किया गया। हालांकि, दिल्ली में सेवा भारती का गठन 1979 में ही हो गया था। इससे पूर्व 1977 में दिल्ली में सरसंघचालक देवरस जी ने स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए सेवा कार्य करने का आह्वान किया था। उनकी प्रेरणा से स्वयंसेवकों ने 1977 में ही दिल्ली की जहांगीरपुरी में पहला संस्कार केंद्र (बालवाड़ी) का शुभारंभ किया, जिसका उद्घाटन स्वयं सरसंघचालक ने किया। हमें यह याद रखना चाहिए कि संघ के बीज में ही सेवा का भाव निहित था। स्वयंसेवकों के लिए सेवा अलग से करने का विषय नहीं है। संघ का मानना है कि सेवा करणीय कार्य है। यद्यपि डॉ. हेडगेवार की जन्मशताब्दी के अवसर पर सम्पूर्ण समाज को प्रेम और आत्मीयता के आधार पर संगठित करने की दिशा में सेवा कार्यों को गति देना महत्वपूर्ण कदम था।

रविवार, 9 नवंबर 2025

“गाड़ी मेरा घर है कह कर, जिसने की दिन रात तपस्या”

संघ की विकास यात्रा : दूसरे चरण में श्रीगुरुजी के नेतृत्व में संपूर्ण भारत में संघ कार्य का विस्तार हो गया, इसके लिए उन्होंने 33 वर्ष के कार्यकाल में 66 बार देश की परिक्रमा की

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विकास यात्रा का दूसरा चरण प्रारंभ होता है, जिसमें संघ कार्य का विस्तार संपूर्ण भारत में होता है। पहले चरण में संघ ने राष्ट्रीय कार्य की मजबूत नींव तैयार की, ताकि उस पर बनने वाला राष्ट्रीयता का दिव्य मंदिर किसी प्रकार के आघात को झेल सके। जड़ें गहरी हों तो वृक्ष का खूब विस्तार होता है। संघ विचारक श्रद्धेय रंगा हरि जी लिखते हैं कि “अगर पहले चरण में संघ एक ‘संस्था’ के तौर पर आकार ले रहा था तो दूसरे चरण में वह एक ‘अभियान’ के तौर पर उभर रहा था। अगर पहले चरण में उसने संस्था की सेवा, पोषण और उसे शक्तिसम्पन्न किया तो दूसरे चरण में उसने हमारे बहुरंगी समाज की जरूरत और माँग को पूरा करने के लिए कठोर श्रम किया”। संघ के संस्थापक एवं आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के निधन के बाद सरसंघचालक का दायित्व माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ को मिला। जब श्रीगुरुजी को सरसंघचालक का दायित्व मिला, उस समय उनकी उम्र केवल 34 वर्ष थी। श्रीगुरुजी ने अंतिम श्वांस तक कुल 33 वर्ष तक सरसंघचालक के रूप में संघ रूप राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया। जून, 1940 से श्रीगुरुजी के नेतृत्व में संघ की वैचारिक यात्रा के साथ-साथ संगठनात्मक विस्तार भी प्रारंभ हुआ। संघ कार्य को देश के कोने-कोने में पहुँचाने के लिए श्रीगुरुजी ने पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं (प्रचारकों) की नयी पद्धति को विकसित किया। वर्ष 1941-42 में उन्होंने कार्यकर्ताओं से प्रचारक के रूप में अपना जीवन संघ को देने का आग्रह किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में प्रचारक आगे आए। ये प्रचारक देश के विभिन्न हिस्सों में गए और संघ कार्य को प्रारंभ किया। संपूर्ण देश में संघ के कार्य का विस्तार हो, इसके लिए स्वयं श्रीगुरुजी ने भी देशभर में प्रवास किया। कहते हैं कि उन्होंने अपने 33 वर्ष के कार्यकाल में 66 बार देश की परिक्रमा की। अपने स्वास्थ्य को दांव पर लगाकर भी उन्होंने अपने प्रवास जारी रखे। उन्हें एक ही धुन थी कि संघ कार्य अपने विराट स्वरूप को प्राप्त हो। उनके बराबर देश का भ्रमण शायद ही किसी और नेता ने किया हो। उनके लिए गीत लिखा गया- “गाड़ी मेरा घर है कहकर, जिसने की दिन-रात तपस्या”।

शनिवार, 8 नवंबर 2025

रील्स और शॉर्ट्स से बनाएं दूरी, पुस्तकों से करें दोस्ती

रील खा रही आपका कीमती समय, 
पुस्तकों की ओर लौटने का है समय

Gemini AI द्वारा निर्मित छवि

रील्स और शॉर्ट वीडियो अब सामाजिक विमर्श का हिस्सा हो गए हैं। समाज का प्रबुद्ध वर्ग लघु वीडियो के बढ़ते उपभोग और उसके प्रभावों को लेकर चिंतित है। यह चिंता स्वभाविक भी है। जिनका बचपन और किशोरवय कहानी-कविताओं की किताबों के पन्ने पलटाते हुए बीता हो, वे जब देखते हैं कि नयी पीढ़ी की अंगुलियां किताब के पन्नों पर नहीं अपितु मोबाइल पर 10-15 सेकंड के वीडियो को स्क्रॉल करने में व्यस्त हैं, तब उनके मन में प्रश्नों की झड़ी लग जाती है। लोगों का इस तरह किताबों से दूर होना अच्छी बात नहीं है। हमारे बुजुर्ग कहते थे कि जीवन में सबसे अच्छी दोस्त पुस्तकें होती हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे बहुत से कारण थे। किताबें वास्तविक ज्ञान की स्रोत होने के साथ ही स्वस्थ मनोरंजन का साधन भी हैं। जब हम कहानियां या अन्य पाठ्य सामग्री पढ़ते हैं तब हमारा मस्तिष्क अधिक क्रियाशील होता है। पुस्तकें हमारी कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं। हमारी जिज्ञासा को जगाती हैं। एक पुस्तक या लेख पढ़ते समय हमारा मस्तिष्क पढ़ी गई सामग्री का विश्लेषण करता है और उसे मौजूदा ज्ञान से जोड़ता है। जबकि रील्स हमें सूचना को ‘उपभोग’ करने के लिए प्रेरित करती हैं, न कि ‘चिंतन’ करने के लिए। इससे हमारी अंतर्दृष्टि और गहन अनुभूति की क्षमता क्षीण होती जाती है। यह सच स्वीकार करना चाहिए कि 10-15 सेंकड के वीडियो हमें किसी भी विषय पर पर्याप्त जानकारी नहीं दे पाते। हमें सटीक और यथार्थ जानकारी चाहिए तब रील्स की आदत को छोड़कर पुन: किताबों से दोस्ती करनी होगी। हमें किताबों की गरिमा को वापस स्थापित करना होगा, क्योंकि किताबें हमें दुनिया को देखने के लिए आँखें नहीं, बल्कि उसे समझने के लिए विवेक और हृदय देती हैं। हमारे बुजुर्गों की कहावत आज भी प्रासंगिक है कि “पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं”।

सोमवार, 3 नवंबर 2025

जब आरएसएस के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने कहा- “मैं अपनी आँखों के सामने लघु भारत देख रहा हूँ”

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के विकास का पहला चरण


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज जिस विराट स्वरूप में दिखायी देता है, ऐसा स्वरूप उसके बीज में ही निहित था। यह बात संघ के संस्थापक आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को पहले दिन से पता थी। संघ सृष्टि और संघ दृष्टि सब डॉक्टर साहब की दूरदृष्टि में शामिल थी। संघ के विकास के लिए जिस प्रक्रिया की आवश्यकता थी, उसी के अनुरूप उन्होंने संघ का वातावरण तैयार किया। शिक्षा के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि “शिक्षा मनुष्य में पहले से ही विद्यमान पूर्णता की अभिव्यक्ति है”। विद्यार्थी को केवल उपयुक्त वातावरण की आवश्यकता होती है। संघ कार्य के बारे में डॉक्टर साहब ने भी कहा है कि “मैं कोई नया कार्य प्रारंभ नहीं कर रहा हूँ। यह पहले से हमारी संस्कृति में है। परंपरा से चले आ रहे व्यक्ति निर्माण का कार्य करने के लिए यह तंत्र अवश्य नया है”। हनुमानजी में असीम शक्तियां पहले से विद्यमान थी लेकिन उन्हें भान नहीं है। जामवंत जी ने हनुमान जी से कहा, “कवन सो काज कठिन जग माहीं” (ऐसा कौन-सा कार्य है जो इस दुनिया में कठिन है), जो आपसे नहीं हो सकता है। उन्होंने रामकाज के लिए हनुमान जी को उनकी शक्ति और बुद्धि का स्मरण कराया। इसी प्रकार हिन्दू समाज सब प्रकार से सामर्थ्यवान है, उसे बस बीच-बीच में जागृत करना पड़ता है। हिन्दू समाज को उसका सामर्थ्य याद दिलाने के लिए समय-समय पर अनेक महापुरुष आए और उन्होंने अपने दृष्टिकोण से कार्य किया। इसलिए डॉक्टर साहब ने कहा कि वह कोई नया कार्य प्रारंभ नहीं कर रहे हैं। लेकिन यह याद रखना होगा कि संघ कार्य की पद्धति बाकी सबसे अलग है, जिसका विकास देश-काल परिस्थिति के अनुरूप हुआ है। जैसे-जैसे संघ का सामर्थ्य बढ़ा, संघ ने अपने कार्य का विस्तार किया है। यह भी कह सकते हैं कि समाज को जब जिस प्रकार की आवश्यकता रही, संघ ने उसके अनुसार अपना कार्य विस्तार किया है। जब हम आरएसएस की 100 वर्ष की यात्रा का सिंहावलोकन करते हैं तो संघ के विकास के पाँच चरण प्रमुखता से दिखायी देते हैं- 

1. संगठन (1925 से 1950) 

2. कार्य विस्तार (1950 से 1988)

3. सेवाकार्यों को गति (1989 से 2006) 

4. समाज की सज्जनशक्ति के साथ कदमताल (2006 से 2025)

5. समाज ही बने संघ (शताब्दी वर्ष से आगे की योजना)

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

आरएसएस की पहली शाखा में 6 स्वयंसेवक और आज 83 हजार से अधिक दैनिक शाखाएं

संघ शताब्दी वर्ष : संघ के विकास की तस्वीर


नागपुर के मोहिते के बाड़े में लगी आरएसएस की पहली शाखा (Chat GPT और Google Gemini से निर्मित छवि)

आज संघ कार्य का विस्तार समूचे भारत में है। जन्मजात देशभक्त डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने जब नागपुर में संघ की स्थापना की थी, तब उनके अलावा शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह बीज एक दिन वटवृक्ष बनेगा। नागपुर में मोहिते के बाड़े में 6 लोगों के साथ पहली शाखा प्रारंभ हुई, जिनमें 5 छोटे बच्चे थे। इस कारण उस समय में लोगों ने हेडगेवार जी का उपहास उड़ाया था कि बच्चों को लेकर क्रांति करने आए हैं। परंतु डॉक्टर साहब लोगों के इस उपहास से विचलित नहीं हुए। व्यक्ति निर्माण के अभिनव कार्य को स्थापित करने के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। बच्चों की शाखा देखकर संघ कार्य का उपहास उड़ा रहे लोगों को ही नहीं अपितु संघ कार्य के प्रति सद्भावना रखनेवाले बंधुओं ने भी सोचा नहीं होगा कि मोहिते के बाड़े से निकलकर संघकार्य देश-दुनिया में फैल जाएगा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन बन जाएगा।