सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

भावाक्षर : संवेदनाओं और जीवन के यथार्थ की काव्यात्मक अभिव्यक्ति

यह वीडियो ब्लॉग भी देखें : युवा कवि डॉ. कपिल भार्गव के काव्य संग्रह 'भावाक्षर' की समीक्षा


साहित्य का मूल उद्देश्य मनुष्य की संवेदनाओं को शब्द देना है। जब एक संवेदनशील मन अपने परिवेश, राष्ट्र, समाज और निजी अनुभूतियों को शब्दों के धागे में पिरोता है, तो ‘भावाक्षर’ जैसा संग्रह जन्म लेता है। युवा कवि और संस्कृत के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. कपिल भार्गव का काव्य संग्रह ‘भावाक्षर’ महज कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि जीवन के विविध रंगों का एक कोलाज है। जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपने भावों को काव्य के रूप में प्रस्तुत करने का कौशल इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। कुल 77 कविताओं के इस गुलदस्ते में कवि ने सामाजिक सरोकारों से लेकर मानवीय पहलुओं, और राष्ट्रभक्ति से लेकर पर्यटन तक के विषयों को स्पर्श किया है। संस्कृत के विद्वान होने के नाते डॉ. कपिल की भाषा में सहज संयम और संस्कार दिखाई देता है। उन्होंने समाचारपत्र में प्रकाशित बुजुर्ग की तस्वीर पर कविता लिखी है तो प्रकृति पर हो रहे आघात पर अपनी पीड़ा को शब्द दिए हैं, यह उनके संवेदनशील कवि होने का प्रमाण है। ‘महानायक चार्ली चैपलिन’ और ‘विवाह की तृतीय वर्षगाँठ’ जैसी कविताएं बताती हैं कि कवि का मन छोटी-बड़ी हर घटना से प्रभावित होता है।

काव्य संग्रह ‘भावाक्षर’ में राष्ट्रभक्ति का स्वर बहुत मुखर है। ‘अपना भारत’ कविता में कवि शहीदों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए लिखता है- 

"लिखा है शहीदों के लहू से, मौन बलिदान देकर, 

नाम तेरा, 

ओ मेरे भारत!

है असंख्यों का बहा शोणित,

तेरी अक्षुण्णता हेतु!"

ये पंक्तियाँ पाठक के मन में देशप्रेम का ज्वार उठाती हैं और उन अज्ञात बलिदानियों की याद दिलाती हैं, जिनकी नींव पर स्वतंत्र भारत खड़ा है। इसके अलावा भी उन्होंने अपनी अन्य कविताओं में अपने प्यारे देश के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है।

आज के दौर में रोजगार के लिए घर छोड़ना युवाओं की नियति बन गया है। ‘मैं घर से दूर’ कविता में कवि डॉ. कपिल भार्गव ने इस पीड़ा को बहुत ही मार्मिक बिम्बों के माध्यम से उकेरा है। एक पक्षी (मोर) से मनुष्य की तुलना करते हुए कवि की यह वेदना दिल को छू जाती है-  “सोचता हूँ, होता मोर, तो घर रहकर ही नाचता रहता।” यह महज कुछ पंक्तियाँ नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं का अनकहा दर्द है जो ‘दाने’ (आजीविका) के लिए अपने ‘घोंसले’ से दूर हैं।

कवि डॉ. कपिल भार्गव केवल भावुक ही नहीं, बल्कि एक दार्शनिक की भांति शब्दों की सत्ता पर भी विचार करता है। ‘शब्दजाल’ कविता में वे लिखते हैं -

“शब्दों के इस जाल में मानव उलझ गया,

जब तक समझा शब्दों को,

भावों में जीवन बीत गया। 

शब्द बड़े ही सुन्दर ढंग से बोले जाते हैं, 

कभी शब्द आनंदित करते कभी घाव कर जाते हैं।”

डॉ. कपिल भार्गव की यह सहज अभिव्यक्ति हमें अपनी वाणी के प्रति सचेत करती है। उन्होंने संदेश दिया है कि हमें शब्दों को तोल-मोल कर बोलना चाहिए। कहते भी हैं कि चाकू-छुरी के घाव भर जाते हैं लेकिन शब्दों से हुए घाव लंबे समय तक हरे रहते हैं।

लेखक एवं मीडिया शिक्षक डॉ. लोकेन्द्र सिंह को अपनी पुस्तक 'भावाक्षर' भेंट करते कवि डॉ. कपिल भार्गव

हिन्दी साहित्य में यात्रा-वृत्तांत प्रायः गद्य में लिखे जाते हैं, लेकिन डॉ. कपिल ने ‘तमिलनाडु दर्शन’ और ‘वेंकटेश्वर धाम’ जैसी कविताओं के माध्यम से पद्य में यात्रा-वृत्तांत लिखकर एक नया प्रयोग किया है। साथ ही, अपने गृह नगर दतिया और ‘हे नर्मदा’ जैसी कविताओं में जड़ों से जुड़ाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। अपने प्यारे शहर दतिया को याद करते हुए कवि लिखता है- 

“जब भी कोई बात करेगा दतिया की पावन माटी की,

सबसे पहले बात करेगा वह शक्ति के संन्यासी की।”

अपनी कविताओं के संदर्भ में कवि डॉ. कपिल भार्गव ने लिखा है कि “कविता वास्तविक रूप से भावनाओं की गहरी अभिव्यक्ति है”। उनका यह कथन इस संग्रह के पन्ने-पन्ने पर चरितार्थ होता है। हमारा अवचेतन मन, हृदय और चित्त, अपने परिवेश में जो भी अच्छा, बुरा, सुंदरतम, नैसर्गिक आदि आनन्द का अनुभव करता है उसे ही वह प्रेम, करुणा, दया भाव से या फिर आक्रोश, क्रोध, रौद्र आदि भावों के साथ व्यक्त करता है। सरल भाषा में यही कविता है, यही काव्य है, यही गाथा है। 

डॉ. कपिल भार्गव ने अपने काव्य संग्रह का विन्यास बहुत सोच-समझकर किया गया है। पहली कविता ‘नारी’ शक्ति और सृजन का प्रतीक है, तो अंतिम कविता ‘पथिक’ जीवन की निरंतरता का संदेश देती है। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित यह कृति हिन्दी काव्य जगत में एक सार्थक हस्तक्षेप है। डॉ. कपिल भार्गव की लेखनी में सरलता है, जो पाठक से सीधा संवाद करती है। यह पुस्तक उन सभी के लिए पठनीय है जो कविताओं में जीवन का प्रतिबिंब देखना चाहते हैं।


पुस्तक : भावाक्षर

कवि: डॉ. कपिल भार्गव

प्रकाशक: ब्लू रोज वन (साहित्य अकादमी म.प्र. के सहयोग से)

पृष्ठ: 90

मूल्य: 200 रुपये

स्वदेश ज्योति में 22 जनवरी, 2026 को प्रकाशित डॉ. कपिल भार्गव की पुस्तक 'भावाक्षर' की समीक्षा

शनिवार, 31 जनवरी 2026

सबके लिए है संघ की शाखा

संघ शताब्दी वर्ष : जिस स्थान पर शाखा लगती है उसे संघस्थान कहते हैं, खेल का मैदान नहीं


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक कहते हैं कि संघ को समझना है तो शाखा में आइए। प्रश्न है कि शाखा कहाँ लगती है और किस शाखा में जाना चाहिए? एक बात तो सभी जानते हैं कि सामान्यतौर पर संघ की शाखा खुले मैदान/स्थान पर लगती है। वरिष्ठ प्रचारक मधुभाई कुलकर्णी लिखते हैं- “जिस स्थान पर शाखा लगती है उसे हम संघस्थान कहते हैं, खेल का मैदान नहीं। संघस्थान तैयार करना पड़ता है। संघ में शाखा यानी भारत माता की आराधना ही है। वह स्थान, जहां भारत माता की प्रार्थना होती है तथा जहां अज्ञान का अंधकार दूर करने वाले भगवा ध्वज की स्थापना होती है, वह स्थान कैसा होना चाहिए? वह स्थान होना चाहिए मंदिर के समान स्वच्छ, पानी से धोकर साफ किया, रेखांकन (रंगोली) से सजा-धजा”।  ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो पार्क या मैदान किसी समय में ऊबड़-खाबड़ थे, संघ की शाखा शुरू होने के बाद स्वयंसेवकों के परिश्रम ने उन्हें व्यवस्थित कर दिया। एक विद्यालय के संचालक संघ शिक्षा वर्ग के लिए स्थान देने को तैयार नहीं थे लेकिन बाद में बहुत आग्रह के बाद उन्होंने स्थान दे दिया। सात दिन के प्राथमिक शिक्षा वर्ग के समापन कार्यक्रम में जब स्कूल संचालक आए और उन्होंने मैदान का कायाकल्प देखा तो हैरान रह गए। बहरहाल, शाखा को संघ की आत्मा कहा जाता है। संघ कार्य का आधार यही शाखाएं हैं, जो खुले मैदान में लगती हैं। यानी संघ का बुनियादी कार्यक्रम एकदम पारदर्शी है। 

अब प्रश्न आता है कि संघ की शाखा में कौन आ सकता है? संघ की शाखा में शामिल होने के लिए किसी भी प्रकार की विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है। किसी भी जाति, संप्रदाय और आयुवर्ग का व्यक्ति संघ की शाखा में आ सकता है। संघ की शाखा सबके लिए है। संघ में किसी प्रकार का पंजीयन नहीं किया जाता है और न ही किसी प्रकार की सदस्यता शुल्क लगती है। संघ का ‘घटक’ बनने के लिए शाखा ही एकमात्र स्थान है। निकटतम स्थान पर लगने वाली शाखा में आकर ही कोई व्यक्ति संघ का स्वयंसेवक बन सकता है। संघ से जुड़ने की प्रक्रिया इतनी ही सरल है। यदि आपको यह जानकारी नहीं है कि आपके आसपास संघ की शाखा कहाँ लगती है, तब आप आरएसएस की अधिकृत वेबसाइट ‘आरएसएस डॉट ओआरजी’ पर जाकर ‘ज्वाइन आरएसएस’ का ऑनलाइन फॉर्म भर सकते हैं। संघ के स्थानीय कार्यकर्ता आपसे संपर्क कर लेंगे। 

सबकी रुचि, प्रकृति और अवस्था को ध्यान में रखते हुए संघ में अलग-अलग प्रकार की शाखाएं लगती हैं। वैसे तो हम किसी भी शाखा में जा सकते हैं। लेकिन यदि हम उचित शाखा का चुनाव करेंगे, तो अधिक आनंद आएगा। ये शाखाएं सामान्यतौर पर आयुवर्ग के आधार पर हैं। इसी आधार पर उन शाखाओं का पाठ्यक्रम है। हमारी आयु अधिक है और हम बच्चों की शाखा में चले गए, तब थोड़ा सामंजस्य बैठाने में कठिनाई आएगी ही। हाँ, उसी शाखा में अधिक आयु के लोगों की संख्या 15-20 है और बच्चों की संख्या भी 15-20 है, तब दोनों आयुवर्ग के अलग-अलग गण बनाकर शाखा के कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। संघ ने शाखाओं को इस प्रकार वर्गीकृत किया है- 

विद्यार्थी संयुक्त : इस शाखा में विद्यालय-महाविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के साथ ही बाल स्वयंसेवक भी शामिल रहते हैं। इसलिए इसे विद्यार्थी संयुक्त शाखा कहा गया है।

विद्यार्थी तरुण : महाविद्यालयीन विद्यार्थियों की शाखा को विद्यार्थी तरुण शाखा कहा जाता है। 

व्यवसायी तरुण : विभिन्न व्यवसायों में सक्रिय एवं नौकरीपेशा युवा स्वयंसेवकों की शाखा का नामकरण व्यवसायी तरुण शाखा किया गया है।

व्यवसायी प्रौढ़ : अधिक आयु के व्यवसायी, नौकरीपेशा या सेवानिवृत्त स्वयंसेवक जिस शाखा में आते हैं, उसे व्यवसायी प्रौढ़ शाखा कहते हैं।

इससे पहले शाखाओं का वर्गीकरण प्रभात शाखा, सायं शाखा, रात्रि शाखा एवं बाल शाखा में किया गया था। प्रभात शाखा में व्यवसायी स्वयंसेवकों की संख्या अधिक रहती थी। सामान्यत: यह सुबह लगती थी। इसलिए इसका नामकरण प्रभात शाखा किया था। इसी प्रकार, विद्यार्थियों के लिए शाम में शाखा लगती थी, जिसे सायं शाखा कहा गया। जो स्वयंसेवक किन्हीं कारणों से सुबह और शाम को नहीं आ सकते, उनके लिए रात्रि में शाखा शुरू की गईं, जिनका नाम रात्रि शाखा पड़ गया था। छोटी उम्र के बच्चों के लिए अलग से शाखाएं चलती हैं, जिन्हें पहले बाल शाखा कहा जाता था। 

उपरोक्त चार प्रकार की शाखाओं के अतिरिक्ति साप्ताहिक एवं मासिक क्रम में भी स्वयंसेवकों के एकत्रीकरण की रचना बनी है। संघ प्रगतिशील संगठन है, वह देश-काल परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालकर कार्य करता है। चूँकि व्यवसाय एवं अन्य कारणों के समाज में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो प्रतिदिन की शाखा नहीं आ सकता। ऐसे लोगों के लिए संघ ने साप्ताहिक एवं मासिक एकत्र आने की रचना खड़ी की। सप्ताह में एक या दो बार लेकिन नियमित होने वाले एकत्रीकरण को मिलन कहा गया है। कुछ लोग सरलता से समझाने के लिए इसे साप्ताहिक शाखा भी कह देते हैं। क्योंकि ‘शाखा’ के साथ स्वयंसेवकों का अधिक आत्मीय संबंध है। अनेक स्थानों पर साप्ताहिक तौर पर समन्वय मिलन या समन्वय शाखा भी चलती हैं। संघ की प्रेरणा से संचालित विभिन्न राष्ट्रीय संगठनों के कार्यकर्ताओं का शाखा में आने का क्रम बना रहे और सबका आपस में मिलना होता रहे, इसके लिए समन्वय मिलन की संकल्पना संघ शाखा रचना में आई है। महानगरों में श्रेणी मिलन भी संचालित किए जा रहे हैं। ये मिलन व्यावसायिक श्रेणी के अनुसार आयोजित होते हैं, जैसे प्राध्यापक मिलन, अधिवक्ता मिलन, चिकित्सक मिलन, श्रमिक मिलन इत्यादि। इसी प्रकार, महीने या पाक्षिक क्रम पर निरंतर आयोजित होने एकत्रीकरण को ‘मंडली’ कहा गया है। मिलन एवं मंडली का स्वरूप नियमित चलने वाली शाखा से थोड़ा अलग होता है। शाखा के पाठ्यक्रम के अतिरिक्त मिलन और मंडली में प्रमुख मुद्दों एवं समसामयिक विषयों पर चर्चा एवं अन्य गतिविधियों का आयोजन भी होता है। इनका स्वरूप शारीरिक प्रधान न होकर बौद्धिक प्रधान होता है।

संघ की शाखा सृष्टि इस प्रकार की है कि उसमें सबकी कठिनाइयों एवं सुविधाओं को ध्यान रखा गया है। जैसी आपकी सुविधा हो, उसके अनुरूप आप संघ शाखा आ सकते हैं। नित्य आना चाहें तो नित्य की शाखा, अन्यथा सप्ताह में एक दिन तो संघ स्थान आ ही सकते हैं। शाखा में आए बिना संघ से परिचय अधूरा ही रहेगा, इसलिए शाखा अवश्य आएं।

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संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 18 जनवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

बुधवार, 28 जनवरी 2026

1963 गणतंत्र दिवस परेड की अनसुनी कहानी, जब राजपथ पर गूंजे संघ के कदम

गणतंत्र दिवस की परेड और आरएसएस : 26 जनवरी, 1963 को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का प्रदर्शन किया 


आज भी हम 1962 के भारत-चीन युद्ध को भूल नहीं पाते हैं। चीन ने भारत के विश्वास का कत्ल किया था। ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के हमारे नारे को धुंए में उड़ाकर चीन की कम्युनिस्ट सत्ता ने भारत पर अप्रत्याशित युद्ध थोप दिया था। हमारी सेना ने यथासंभव प्रतिकार किया। चीन को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया। भारतीय सेना के शौर्य को देखकर चीन को अपने कदम रोकने पड़े। हालांकि, इस युद्ध में हमने बहुत कुछ खो दिया था। राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी चीन के साथ खड़ी थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण संदेश दिया। संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिक अनुशासन, प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सहयोग, घायल जवानों के प्राणों की रक्षा के लिए रक्त की आपूर्ति, युद्ध क्षेत्र में सैन्य रसद पहुँचाने में सहयोग एवं हवाई पट्टियों की सुरक्षा सहित कई महत्वपूर्ण कार्यों में आगे बढ़कर सहयोग किया। संकट के समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति को देखकर संघ के विरोधी रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का हृदय भी परिवर्तित हो गया। यही कारण रहा कि सरकार ने 26 जनवरी, 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए अन्य नागरिक संगठनों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समविचारी संगठन भारतीय मजदूर संघ को राजपथ पर आमंत्रित किया। संघ के स्वयंसेवकों ने गणवेश पहनकर जब राजपथ पर राष्ट्रीय परेड में हिस्सा लिया, तब स्वयंसेवक न केवल सबके बीच आकर्षण का केंद्र बने अपितु उन्होंने राष्ट्रीय एकजुटता के लिए अपने कर्तव्यों के निर्वहन का संदेश भी दिया।

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

आरएसएस और संविधान : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए सर्वोच्च है संविधान का सम्मान

संघ शताब्दी वर्ष : ऐतिहासिक तथ्य और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बयान बताते हैं कि स्वयंसेवकों ने न केवल संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष किया है अपितु बलिदान भी दिया है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रारंभ से ही भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। संविधान भी ऐसा ही एक प्रतीक है, जिसका सम्मान एवं सुरक्षा संघ के लिए प्राथमिक है। हालांकि, आरएसएस और संविधान के रिश्तों को लेकर अकसर राजनीतिक विमर्श में कई तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं। यह सवाल ज्यादातर उनकी ओर से उठाया जाता है, जिन्हें संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ही संविधान विरोधी कहा था। संविधान सभा में अपने आखिरी भाषण में डॉ. अंबेडकर ने कम्युनिस्टों और समाजवादियों को संविधान की निंदा करने वाला बताया था। उन्होंने कहा था कि कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के अपने सिद्धांत पर आधारित संविधान चाहती है और वे संविधान की निंदा करते हैं क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संविधान के संबंध में ऐतिहासिक तथ्यों और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बयानों का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि संघ ने सदैव ही संविधान के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारत में आरएसएस ऐसा संगठन है, जिसने संविधान की सुरक्षा एवं सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष भी किया और बलिदान भी दिया है।

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

रहमान का ‘सांप्रदायिक सुर’

भारत के लोगों ने संगीतकार एआर रहमान को वर्षों बिना किसी भेदभाव के अथाह प्रेम दिया है, जबकि सबको पता है कि रहमान कन्वर्टेड मुसलमान हैं। आज तक किसी ने भी रहमान को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है। परंतु, रहमान ने खुद ही स्वयं को लेकर विवाद खड़ा कर लिया है। एक विदेशी मीडिया संस्थान को दिए गए साक्षात्कार में उनका यह कहना कि बॉलीवुड में उन्हें काम न मिलने की वजह ‘सांप्रदायिक’ हो सकती है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। जिस कलाकार को पूरे देश ने बिना किसी धर्म या जाति के भेदभाव के, आंखों पर बिठाया हो, ऐसी विक्टिम हुड (पीड़ित भाव) की बातें करना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। एक प्रकार से कहना होगा कि रहमान के मन में ही कहीं सांप्रदायिक सोच बैठी हुई थी, जो अब जाकर सामने आई है। रहमान जैसे लोगों को इसका जवाब भी देना चाहिए कि अनेक हिन्दू संगीतकार भी बॉलीवुड से बाहर हो चुके हैं, उसका कारण क्या है? क्या उन्हें भी मुस्लिम गिरोहबंदी के कारण काम मिलना बंद हुआ है? भारतीय सिनेमा में मुस्लिम कलाकारों का जिस प्रकार का वर्चस्व है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद भी रहमान हिन्दुओं के माथे पर सांप्रदायिका का लेबल चस्पा करने की कोशिश करे रहे हैं, तो इसे एक प्रकार से बेईमानी ही कहना चाहिए।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

सनातन की ओर लौटती तरुणाई

श्रीराम मंदिर: भारतीय युवाओं की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय


भारत के युवाओं को लेकर देश में अलग-अलग ढंग से विमर्श चल रहे हैं। कुछ ताकतें चाहती हैं कि भारत का युवा अपनी ही संस्कृति एवं जीवन मूल्यों के विरुद्ध खड़ा हो जाए। धर्म-संस्कृति क्रियाकलापों से युवाओं को दूर करने के लिए यहाँ तक कहा गया कि “जो लोग मंदिर जाते हैं, वही लोग महिलाओं को छेड़ते हैं”। यह भी कि “सरस्वती की पूजा करने से कोई आईएएस नहीं बनता”। योलो और वोकिज्म की रंगीन अवधारणाएं भारत की जेन-जी के दिमाग में उतारने के प्रपंच रचे ही जा रहे हैं। परंतु, भारत विरोधी ताकतों को यह स्मरण नहीं रहता कि भारत की संस्कृति के पोषण में वह ताकत है कि उसकी संतति अधिक समय तक उससे दूर नहीं रह सकती। सब प्रकार के प्रपंचों से थक-हारकर, आत्मा के वास्तविक सुख की प्राप्ति के लिए वह अपनी संस्कृति की गोद में ही लौटता है। आज सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों में युवाओं की जिस प्रकार की सक्रिय उपस्थिति दिखायी दे रही है, उसके गहरे निहितार्थ हैं। पिछले कुछ वर्षों में धर्म के प्रति युवाओं में गहरी रुचि पैदा हुई है। उनकी आध्यात्मिक चेतना को मंदिर में उमड़ रही युवाओं की भीड़ में अनुभव किया जा सकता है। ज्ञान की खोज में आश्रमों एवं गुरुकुलों में पहुँच रहे युवाओं के माथे पर उनकी जिज्ञासाओं को पढ़ा जा सकता है। युवाओं में परिवर्तन की इस लहर का प्रमुख केंद्र श्री अयोध्या धाम में, अपने भव्य मंदिर में विराजे रामलला हैं। भारत की सांस्कृतिक राजधानी श्रीअयोध्या में प्रभु श्रीराम के दिव्य मंदिर के निर्माण, रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा, शिखर पर धर्म ध्वजा की स्थापना, ये सब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, अपितु भारतीय जनमानस की चेतना में युगांतरकारी घटनाएं हैं। कहना होगा कि 22 जनवरी, 2024 के बाद भारत के युवा मन में जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह अभूतपूर्व है। यह घटना सदियों के संघर्ष के विराम के साथ-साथ एक नये और आत्मविश्वास से भरे भारत के उदय का प्रतीक बन गई है। आज श्रीराम मंदिर केवल ईंट-पत्थरों से बना देवालय नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का केंद्र बन गया है।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

पत्रकारिता के खट्टे-मीठे अनुभवों की पोटली

देखें वीडियो : अब मैं बोलूंगी….


‘अब मैं बोलूंगी…’ यह पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार स्मृति आदित्य की यादों की पोटली है, जिसमें कुछ खट्टे तो कुछ मीठे संस्मरण शामिल हैं। 15 वर्षों से अधिक फीचर संपादक के रूप में और स्वतंत्र लेखन करते हुए, उन्हें जो अनुभव आए, उन सबको वे अपनी डायरी में दर्ज करती करती गईं। इनमें अखबार के दफ्तर की राजनीति के किस्से, साहित्य चोरी के प्रसंग और अपने मन की अनुभूतियों का ऐसा ब्यौरा दर्ज है, जो सबको सीख देता है। यह पुस्तक मुख्यत: स्मृति आदित्य के उस समय की मन:स्थिति को सामने लाती है, जब उनको पता चलता है कि 15 साल से अधिक की ऑनलाइन पत्रकारिता की उनकी नौकरी अब जा रही है। यह स्थिति किसी को भी विचलित कर सकती है कि जब आपको पता न हो कि आगे क्या करना है? लेकिन खुद पर विश्वास हो तब आप ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में भी स्वयं को संभाल लेते हो। जुलाई से दिसंबर तक लिखी डायरी में उन्होंने पत्रकारिता की अपनी शुरुआत, उससे जुड़े सपनों एवं वहाँ की कठिनाइयों को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि पढ़कर ऐसा लगता है- यह तो मेरी ही कहानी है। इस पुस्तक को ‘शिवना कृति सम्मान-2025’ भी प्राप्त हुआ है।