रविवार, 23 मार्च 2025

भारत को ‘भारत’ ही लिखें और बोलें

देखें यह वीडियो : भारत या इंडिया - संविधान सभा में किस नाम पर बहस


देश के प्राचीन एवं संविधान सम्मत नाम ‘भारत’ का जिस प्रकार विरोध किया जा रहा है, उससे दो बातें सिद्ध हो जाती हैं। पहली, देश में अभी भी एक वर्ग ऐसा है, जो मानसिक रूप से औपनिवेशिक गुलामी का शिकार है। भारत के ‘स्व’ और उसकी सांस्कृतिक परंपरा को लेकर उसके मन में गौरव की कोई अनुभूति नहीं है। दूसरी, वास्तव में यह समूह ‘भारत विरोधी’ है। भारतीयता का प्रश्न जब भी आता है, तब यह समूह उसके विरुद्ध ही खड़ा मिलता है। एक तरह से यह उसका स्वभाव बन गया है। देश की जनता देखकर आश्चर्यचकित है कि ‘भारत’ का विरोध करने के लिए कांग्रेस सहित उसके समर्थक राजनीतिक दल एवं वैचारिक समूह किस स्तर पर पहुँच गए हैं। ‘भारत’ को ‘भारत’ कहने पर आखिर हाय-तौबा क्यों मची हुई है? भारत विरोधी समूह को एक बार संविधान सभा की बहस पढ़नी चाहिए। निश्चित ही उसे ध्यान आएगा कि तत्कालीन कांग्रेसी नेता अपने देश का नाम ‘भारत’ ही रखना चाहते थे लेकिन अंग्रेजी मानसिकता के दास लोगों के सामने उनकी चली नहीं। आखिरकार ‘भारत’ के साथ ‘इंडिया’ नाम भी चिपक गया।

संविधान सभा में जब नाम को लेकर बहस चल रही थी, तब कांग्रेस के वरिष्ठ एवं सम्मानित नेता सेठ गोविंद दास ने कहा था कि वेदों, महाभारत, पुराणों और चीनी यात्री ह्वेन-सांग के लेखों में ‘भारत’ देश का मूल नाम था। इसलिए स्वतंत्रता के बाद संविधान में ‘इंडिया’ को प्राथमिक नाम के रूप में नहीं रखा जाना चाहिए। कला वेंकट राव, बीएम गुप्ता, राम सहाय और गोविंद बल्लभ पंत सहित कई नेताओं ने अपने देश के नामकरण को लेकर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए और ‘भारत’ नाम को प्रतिष्ठा प्रदान करने का आग्रह किया।

इसी बहस में वरिष्ठ नेता कमलापति त्रिपाठी ने कहा, “मैं ऐतिहासिक नाम ‘भारत’ से बहुत प्रभावित हूँ। इस शब्द के उच्चारण मात्र से ही हमारे सामने सदियों पुरानी सुसंस्कृत जीवन की तस्वीर उभर आती है। मेरे विचार से संसार में कोई भी ऐसा देश नहीं है जिसका ऐसा इतिहास, ऐसी संस्कृति और ऐसा नाम हो, जिसकी आयु हमारे देश जितनी सहस्राब्दियों में गिनी जाती हो। संसार में कोई भी ऐसा देश नहीं है जो हमारे देश को इतने दमन, अपमान और लम्बी गुलामी से गुजरने के बाद भी अपना नाम और अपनी प्रतिभा बचाए रख सका हो। हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारा देश ‘भारत’ के नाम से ही जाना जाता है। वैदिक काल से ही यह नाम हमारे साहित्य में आता रहा है। हमारे पुराणों में भी भारत नाम का गुणगान किया गया है। स्वर्ग में देवता भी इस देश का नाम स्मरण करते रहे हैं”। वास्तव में भारत हमारी संस्कृति एवं परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है लेकिन इंडिया शब्द के साथ ऐसी कोई गौरव की अनुभूति करानेवाली बात नहीं जुड़ी है। भारत कहने पर, हमें समृद्धशाली परंपरा का स्मरण होता है। स्वाभाविक ही हम लोग अपनी परंपरा से जुड़ जाते हैं। जब भी किसी ने अपने देश को भावनात्मक आधार पर स्मरण किया है, उसने उसके लिए भारत शब्द ही उपयोग किया है। राष्ट्रगान में ‘इंडिया भाग्य विधाता’ नहीं आता, अपितु ‘भारत भाग्य विधाता’ गाया जाता है। 

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी ‘भारतमाता कौन है’ व्याख्यायित किया, इंडिया माता नहीं? स्वतंत्रता के आंदोलन में स्वतंत्रता सेनानियों एवं क्रांतिकारियों ने भी ‘भारत माता की जय’ का नारा बुलंद किया। संविधान सभा में जब भारत के नाम को लेकर आए प्रस्ताव पर चर्चा हो रही थी तब प्रसिद्ध गांधीवादी नेता एवं कांग्रेस सरकार के मंत्री महावीर त्यागी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू की दलीलों पर व्यंग्य करते हुए कहा कि “यह (नेहरूजी) हैरो (विलायत) में पढ़े हैं और मैंने केवल एक छोटी-सी पाठशाला में अंग्रेजी पढ़ी है। पर मेरे गुरु नंदराम जी ने छठी क्लास में मुझे बताया था कि व्याकरण के अनुसार ‘प्रोपर नाउन’ (व्यक्तिवाचक संज्ञा) का अनुवाद नहीं होता है, पर जब हैरो की ग्रामर के विद्यार्थी कहते हैं कि नामों का अनुवाद भी हो सकता है, तो मैं अपना संशोधन वापस लेता हूँ। पर मेरे प्रतिष्ठित मित्र को सचेत रहना चाहिए कि कल के अंग्रेजी समाचारपत्रों में यह छप सकता है कि ऑनरेबिल प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया, मिस्टर ‘जैमरैड कैनालू’ के कहने पर त्यागी ने अपना संशोधन वापस लिया”। नेहरूजी ने जब पूछा कि क्या कहा तुमने? तब वाकपटुता के लिए प्रसिद्ध महावीर त्यागी ने कहा- जैम का अर्थ है जवाहर, रैड का लाल और कैनालू का अर्थ है नेहरू। दरअसल, महावीर त्यागी ने ‘इंडिया दैट इज भारत’ प्रस्ताव में एक ऐसी गलती की ओर ध्यान आकर्षित किया था, यदि उसे नहीं सुधारा जाता तो आज संविधान की दुहाई देनेवाले लोग कहते कि अपने देश का नाम न तो इंडिया है और न ही भारत, संविधान के अनुच्छेद-1 के अनुसार हमारे देश का नाम ‘इंडिया दैड इज भारत’ है। महावीर त्यागी का आधा संशोधन मानकर ‘इंडिया दैट इज भारत’ से उद्धरण चिह्न हटा लिए और इंडिया शब्द के बाद कौमा लगा दिया।

बहरहाल, विश्व में शायद ही किसी देश का ऐसा उदाहरण मिले, जिसका उसकी अपनी भाषा में नाम अलग हो और अंग्रेजी में अलग। सबका एक ही नाम चलता है। दुनियाभर में अनेक उदाहरण हैं, जब देशों ने बाह्य पहचान को हटाकर अपने ‘स्व’ का धारण किया और अपना वास्तविक नाम स्वीकार किया है। इनमें हमारे ही पड़ोसी देश म्यांमार और श्रीलंका उदाहरण हैं। भारत में अभी ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया कि उसका नाम अब केवल ‘भारत’ लिखा जाएगा। लेकिन कांग्रेस सहित उसके समर्थित समूह में हलचल मच गई है। अभी कोई नहीं जानता कि संसद के विशेष सत्र में ऐसा कोई प्रस्ताव आएगा या नहीं। यदि आए तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए और इस दिशा में कोई प्रस्ताव नहीं भी आता तब एक संकल्प सबको लेना चाहिए कि जहाँ तक संभव होगा, हम अपने देश का नाम भारत ही लिखें और बोलें। 

नोएडा में 10 मार्च, 2025 को ‘विमर्श भारत का’ पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि “भारत को अंग्रेजी नाम इंडिया नहीं बल्कि ‘भारत’ कहा जाना चाहिए। यह 'कंस्टीटूशन ऑफ इंडिया' है, 'रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया' है...ऐसा क्यों है? ऐसा सवाल उठना चाहिए। इसे सुधारा जाना चाहिए। अगर देश का नाम भारत है, तो इसे इसी नाम से पुकारा जाना चाहिए। भारत एक भौगोलिक इकाई या संवैधानिक ढांचे से कहीं अधिक है; यह एक गहन दर्शन और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है”। 

स्मरण हो कि इससे पहले 2 सितंबर, 2023 को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी भी यह आग्रह कर चुके हैं कि भारत को भारत ही कहना चाहिए। उन्होंने सकल जैन समाज के एक कार्यक्रम के दौरान उचित ही कहा कि “हमारे देश का नाम सदियों से भारत ही है। भाषा कोई भी हो, नाम एक ही रहता है। हमारा देश भारत है और हमें सभी व्यवहारिक क्षेत्रों में इंडिया शब्द का इस्तेमाल बंद करके भारत शब्द का इस्तेमाल शुरू करना होगा, तभी बदलाव आएगा। हमें अपने देश को भारत कहना होगा और दूसरों को भी यही समझाना होगा”। प्रकांड विद्वान स्वर्गीय राजीव दीक्षित से लेकर सद्गुरु जग्गी वासुदेव तक अनेक महानुभाव यह आग्रह कर चुके हैं कि हमारे देश का नाम भारत होना चाहिए। कांग्रेस में भी जो राष्ट्रभक्त नेता हैं, उनका आग्रह भी भारत नाम के लिए रहा है।

अभी हाल के वर्षों में यानी 2012 में ही कांग्रेस के सांसद रहे शांताराम नाइक ने राज्यसभा में विधेयक प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने प्रस्ताव रखा कि संविधान के अनुच्छेद-1 में और संविधान में जहाँ-जहाँ इंडिया शब्द आया का उपयोग हुआ हो, उसे बदलकर भारत कर दिया जाए। कांग्रेस के सांसद नाइक ने यह भी कहा कि इंडिया शब्द से एक सामंतशाही शासन का बोध होता है, जबकि भारत से ऐसा नहीं है। परंतु आज एक ऐसे नेता के प्रति स्वामी भक्ति प्रकट करने के चक्कर में कांग्रेसी ‘भारत’ का विरोध कर रहे हैं, जो भारत को एक राष्ट्र ही नहीं मानता है। वह चुनौती भी देते हैं कि संविधान में कहीं भी भारत को राष्ट्र नहीं लिखा है, जबकि संविधान की प्रस्तावना में ही भारत को एक संप्रभु राष्ट्र कहा गया है। बहरहाल, देश के नाम शुद्धि के लिए संविधान संशोधन हो या नहीं, हमें संकल्प करना चाहिए कि हम अपने लिखने, पढ़ने और बोलने में ‘भारत’ ही उपयोग करेंगे। यदि ऐसा किया, तब किसी प्रकार के संशोधन की अपेक्षा भी नहीं रह जाएगी। वैसे भी अभी सामान्यतौर पर हम अपने देश के लिए ‘भारत’ नाम का ही उपयोग करते हैं। 

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र 'स्वदेश ज्योति' एवं सांध्यकालीन स्वदेश के 15 एवं 16 मार्च के अंक में प्रकाशित। 

सोमवार, 17 मार्च 2025

छत्रपति महाराज के व्यक्तित्व, स्वराज्य की संकल्पना व दुर्ग की समझ विकसित करती है पुस्तक 'हिन्दवी स्वराज्य दर्शन'

- सौरभ तामेश्वरी (लेखक पत्रकार एवं स्तम्भकार है।)

पुस्तकों का लेखन जितना सरल हो, उतने ही अधिक लोग उसे पढ़ते हैं। पत्रकार, मीडिया शिक्षक एवं बेहतरीन लेखक लोकेंद्र सिंह ने सरल शब्दों में अधिक संदर्भों के सहारे बड़ी ही तथ्यात्मक पुस्तक ‘हिंदवी स्वराज्य दर्शन’ लिखी है। यह पुस्तक हिन्दवी साम्राज्य के संस्थापक एवं स्वराज्य के उद्घोषक श्री शिव छत्रपति महाराज के व्यक्तित्व, स्वराज्य की संकल्पना एवं दुर्गों को समझने में महत्वपूर्ण दस्तावेज है। पुस्तक ‘हिंदवी स्वराज्य दर्शन’ पाठकों से बड़ी ही सहजता से अपने विषय पर संवाद करती है। यात्रा वृतांत के रूप में लिखी गई इस पुस्तक में हिन्दवी स्वराज के दुर्गों के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

हमें ज्ञात है कि हिन्दवी स्वराज्य में दुर्ग केंद्रीय तत्व हैं। जब विदेशी आक्रांताओं के अत्याचारों एवं दासता के अंधकार से देश घिरता जा रहा था, तब हिन्दवी स्वराज के इन्हीं दुर्गों से स्वराज्य का संदेश देनेवाली मशाल जल उठी थी। स्वराज्य की स्थापना हेतु छत्रपति शिवाजी महाराज अपने इन्हीं दुर्गों से गर्जना कर मराठों में आत्मविश्वास और ‘स्व’ से प्रेम जाग्रत करते थे।

पुस्तक ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’ में लेखक अपनी यात्रा के अनुभवों को आधार बनाते हुए हमें दुर्गों के बारे महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं। पुस्तक में पहले ही बताया गया है कि यह अपने इतिहास को, स्वराज्य के लिए हुए संघर्ष एवं बलिदान को समीप से जानने-समझने की एक अविस्मरणीय यात्रा को समर्पित है। पुस्तक पढ़ने से पहले हिन्दवी स्वराज के दुर्गों के बारे में आपकी जो धारणा होगी, उससे अलग और अधिक जानकारी इस पुस्तक में है। दुर्ग, जिन्हें हम किले, गढ़ और कोट के नाम से भी जानते हैं। पुस्तक में दुर्गों के प्रकारों पर प्रकाश डाला गया है। पुस्तक ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’ पढ़ने के बाद दुर्गों के विभिन्न स्वरूपों की समझ विकसित होती है। इस पुस्तक में हिन्दवी स्वराज की प्रतिज्ञाभूमि की स्मृतियां ताजा होंगी। 

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श्रीशिव छत्रपति के राज्याभिषेक से लेकर उनके देवलोकगमन के अवसरों के साक्षी बने ‘श्री दुर्गदुर्गेश्वर- रायगढ़’ के किले की दास्तान सुनने को मिलेगी। मिर्जा राजा जयसिंह और छत्रपति के मध्य हुई ऐतिहासिक और रणनीति पुरंदर संधि की जानकारी प्राप्त होगी। इसमें तानाजी के शौर्य की गाथा कहते सिंहगढ़ की चर्चा होगी तो छत्रपति शंभूराजे की समाधि के महत्व सहित अनेक पहलुओं की बात है।

पुस्तक में छत्रपति शिवाजी महाराज का अपने बच्चों की तरह दुर्गों का ध्यान रखकर उनके प्रति स्नेह दिखता है। साथ ही उनकी चतुराई की समझ का भी ज्ञान होता है, जहां वह दुर्गों की सुरक्षा देखने के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित करवाते थे। महाराज ऐसा क्यों करवाते थे, यह आपको पुस्तक पढ़ने के बाद समझ आएगा। आप लेखक लोकेंद्र सिंह की पुस्तक ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’ को अवश्य पढ़ें। उनकी यह पुस्तक काफी चर्चाएं बटोर रही है। यह पुस्तक अमेजॉन पर उपलब्ध है, जिसे आप आसानी से घर बैठे ही ऑर्डर कर सकते हैं।

लेखक लोकेंद्र सिंह की बहुचर्चित पुस्तक ‘हिंदवी स्वराज्य दर्शन’ की चर्चा

बुधवार, 5 मार्च 2025

रोहित का मोटापा नहीं, उनके रिकॉर्ड्स देखिए

भारतीय क्रिकेट टीम आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में बेहतरीन खेल का प्रदर्शन कर रही है, लेकिन कांग्रेस की नेता डॉ. शमा मोहम्मद ने देश और खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाने की जगह भारतीय क्रिकेट दल के कप्तान रोहित शर्मा की सेहत को लेकर ओछी टिप्पणी करके विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. शमा मोहम्मद ने भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रोहित शर्मा के शरीर को लेकर आपत्तिजनक एवं निंदनीय बयान दिया है। यही कारण है कि कांग्रेस ने तत्काल उनके बयान से किनारा किया। डॉ. शमा ने लिखा कि “रोहित शर्मा एक खिलाड़ी के तौर पर मोटे हैं। उन्हें वजन कम करने की जरूरत है। निश्चित रूप से यह भारत का अब तक का सबसे निराशाजनक कप्तान”। कोई भी सभ्य नागरिक किसी के शरीर को लेकर इस प्रकार की टिप्पणी नहीं कर सकता। दरअसल, ऐसा लगता है कि नफरत और नकारात्मकता की आग कांग्रेस के खेमे में इस हद तक फैल गई है कि उसके दायरे में अब केवल भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नहीं है अपितु उसके निशाने पर कोई भी आ सकता है। कांग्रेस की प्रवक्ता की इस टिप्पणी के बाद उनकी जमकर आलोचना हो रही है। डॉ. शमा को भी मजबूरी में यह टिप्पणी हटानी पड़ी है। हालांकि अपनी ओछी एवं संकीर्ण मानसिकता के लिए उन्होंने अब तक सार्वजनिक रूप से माफी नहीं माँगी है। यह बताता है कि उन्होंने अपने नेताओं के दबाव में पोस्ट तो हटा ली लेकिन उनका मौलिक दृष्टिकोण नकारात्मक ही है।

शनिवार, 1 मार्च 2025

अब नहीं चलेगी हिन्दी विरोध की राजनीति

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बहाने तमिलनाडु में फिर से हिन्दी विरोध की राजनीति होते देखना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और उनके पुत्र उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए हिन्दी विरोध की राजनीति को हवा देना शुरू कर दिया है। उनको लगता है कि राज्य में अपनी प्रासंगिकता को बचाने और भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यही एक रास्ता है। आश्चर्यजनक बात यह है कि इस संबंध में मुख्यमंत्री स्टालिन झूठ का सहारा लेने में भी संकोच नहीं कर रहे हैं। जब भारत के दक्षिणी हिस्से से उन्हें हिन्दी विरोध में कोई खास समर्थन मिलता नहीं दिखा तो उन्होंने अपनी कुटिल मानसिकता का प्रदर्शन करते हुए बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल सहित अन्य राज्यों में भाषायी संघर्ष का विस्तार करने की दृष्टि से बयानबाजी प्रारंभ कर दी है। एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति क्षुद्र राजनीति करने के लिए ऐसे मूखर्तापूर्ण बयान दे रहा है कि उससे उसकी ही जगहंसाई हो रही है।

शनिवार, 22 फ़रवरी 2025

छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के हथियार और उनकी विशेषताएं

रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता का मंत्र देनेवाले छत्रपति शिवाजी महाराज

सिंहगढ़ किले पर तानाजी मालुसरे और अन्य मावलों की अलग-अलग हथियारों के साथ प्रतिमाएं बनी हुई हैं।

एक उन्नत राष्ट्र के लिए रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर होना आवश्यक है। शासन में ‘स्व बोध’ की स्थापना करनेवाले छत्रपति शिवाजी महाराज ने रक्षा उत्पादन में भी स्वदेशी के महत्व को स्थापित किया। उन्होंने पैदल सैनिकों के हथियारों से लेकर नौसेना के लिए लड़ाकू जहाज तक स्वदेशी तकनीक पर तैयार कराए थे। सैन्य उपकरणों एवं हथियारों के निर्माण में छत्रपति की दृष्टि अत्यंत सूक्ष्म थी, वे देश-काल-परिस्थिति को ध्यान में रखकर हथियारों के डिजाइन को अंतिम रूप देते थे। छत्रपति ने विदेशी नौकाओं एवं जहाजों की होड़ करके वैसे ही बड़े जहाज नहीं बनवाए बल्कि उन्होंने अपने समुद्री तटों पर तेजी से चलनेवाली छोटी नौकाओं पर जोर दिया। इन्हीं छोटी लड़ाकू नौकाओं ने अंग्रेजों, पुर्तगालियों और मुगलों के हथियारों से सुसज्जित सैन्य जहाजों को हिन्द महासागर के किनारे पर डुबो दिया था। हिन्दवी स्वराज्य की नौसेना के बेड़े में बड़े आकार के जहाज भी शामिल थे।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2025

पाश्चात्य मीडिया के भारत विरोध नैरेटिव को उजागर करने वाले पत्रकार

 भारतीय पक्ष का पहरुआ पत्रकार : उमेश उपाध्याय

छवि निर्माण में मीडिया की प्रभावी भूमिका होती है। इसलिए मीडिया का कार्य बहुत जिम्मेदारी और जवाबदेही का है। मीडिया से अपेक्षा की जाती है कि वह पत्रकारिता के सिद्धांतों एवं मूल्यों का पालन करते हुए समाचारों एवं अन्य सामग्री का प्रसार करे। समाचारों के निर्माण, प्रकाशन एवं प्रसारण में निष्पक्षता, संतुलन एवं सत्यता जैसी बुनियादी बातों का पालन करे। परंतु ध्यान आता है कि मीडिया का एक हिस्सा अपने निहित एजेंडा को लेकर कार्य करता है। भारत में ही नहीं अपितु विदेश में भी मीडिया का एक वर्ग ऐसा है, जो भारत के प्रति दुराग्रहों से भरा हुआ है। विदेशी मीडिया में भारत विरोधी नैरेटिव पर वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय बारीक नजर रखते थे। उन्होंने अपने विश्लेषणों से सिद्ध किया कि भारत के संदर्भ में रिपोर्टिंग करते समय विदेशी मीडिया की कलम तंगदिली से चलती है। भारत के ऐसे पत्रकारों को विदेशी मीडिया खूब स्थान देती है, जो भारत की छवि को बिगाड़ने के लिए वास्तविक तथ्यों की अनदेखी करके लेखन करते हैं। इसी वर्ष (2024) उनकी पुस्तक ‘वेस्टर्न मीडिया नैरेटिव ऑन इंडिया: फ्रॉम गांधी टू मोदी’ प्रकाशित होकर आई थी, जिसने पत्रकारिता एवं अकादमिक जगत में सबका ध्यान आकर्षित किया। अगस्त, 2024 में जब भोपाल में उनसे भेंट हुई, तब मैंने आग्रह किया कि यह पुस्तक हिन्दी पाठकों के लिए भी अनुवादित होकर आनी चाहिए। हिन्दी दुनिया के पाठकों को भी विदेशी मीडिया की संकीर्ण मानसिकता के बारे में जानकारी होनी चाहिए। मीडिया को परिभाषित करते हुए पाश्चात्य विद्वानों ने इसे ‘वॉचडॉग’ कहा है। उमेश जी के विश्लेषण पढ़ने के बाद ध्यान आता है कि इस ‘वॉचडॉग’ की निगरानी भी आवश्यक है। अन्यथा यह किसी के प्रभाव में बहककर निर्दोष को अपना शिकार बना सकता है। पुस्तक लिखने से पूर्व भी उमेश जी भारत के संदर्भ में पाश्चात्य मीडिया के पक्षपाती दृष्टिकोण को अपने लेखों एवं व्याख्यानों के माध्यम से लगातार उजागर करते रहे हैं।

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2025

परीक्षा में फेल-पास से बड़ा है जीवन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक जिम्मेदार अभिभावक की भांति देश के भविष्य के साथ संवाद का एक क्रम बनाया है- परीक्षा पे पर्चा। उनके इस प्रयास का अनुकरण सभी परिवारों में होना चाहिए। परीक्षा के तनावपूर्ण वातावरण को समाप्त करने के लिए अभिभावक अपने बच्चों से इसी प्रकार संवाद करें और उनके भीतर आत्मविश्वास एवं सकारात्मकता जगाएं। अधिकतम अंक पाने की दौड़ में हमने परीक्षा में सफलता को जीवन से बड़ा बना दिया, जिसके कारण कई होनहार विद्यार्थी किन्हीं कारणों से कम अंक पाने पर अवसाद में चले जाते हैं या फिर इसे अपनी विफलता मानकर जीवन को ही समाप्त करने का गलत निर्णय कर बैठते हैं। परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए विद्यार्थी के मन में भाव जागृति करना अपनी जगह है, लेकिन उसे ही सफलता के रूप में स्थापित कर देना ठीक बात नहीं है।