गुरुवार, 28 अगस्त 2014

नवप्रभात


पत्तों की खडख़ड़ाहट
कोयल की कूक सुनी है। 
नीम के आंचल से 
चारों ओर ठण्डी हवा चली है।

बादल गरजा है
बिजली कड़की है
नृत्यरत मोर देखने 
भीड़ बहुत उमड़ी है। 

बाजे ताल, मृदंग
शंख ध्वनि पड़ी सुनाई है।
बीती काली रात 
नई सुबह आई है। 

चिडिय़ों ने कलरव से
मातृवंदना गाई है।
सूरज की किरणें 
भारत मां के चरण छूने आईं हैं।

हिमालय मां का 
मुकुट बना हुआ है। 
सागर की लहरें 
चरण पखारने आई हैं। 
भारत तेरे अतीत की
गौरव गाथा ऋषि-मुनियों ने गाई है।

मां यशोज्ञान गाएगा जग सारा
ऐसी तेरी महिमा अग-जग में छाई है। 
बाजे ताल मृदंग
शंख ध्वनि पड़ी सुनाई है
बीती काली रात नई सुबह आई है। 

शनिवार, 23 अगस्त 2014

उठ जाग


उठ जाग मातृ भू की सुप्त नव संतान रे।
उठ जाग मातृ भू की वीर संतान रे।। 

क्यों आत्म विस्मृत हो रहा
अपना अस्तित्व पहचान रे।
अपने सुकर्म, स्वधर्म से
कर राष्ट्र का पुनरुत्थान रे।
उठ जाग मातृ भू की राणा-सी वीर संतान रे।। 

कर मातृ भू की सेवा
तन-मन-धन-प्राण से।
ले अंगड़ाई आलस्य निंद्रा त्याग रे
जागेगा तेरा भाग्य रे।
उठ जाग मातृ भू की दिव्य संतान रे। 

उठ खड़ा हो ले शस्त्र हाथ में
शत्रु है बैठा घात में।
कर मातृ भू की रक्षा
मां भारती तेरे साथ में। 
उठ जाग मातृ भू की शिवा-सी वीर संतान रे। 

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

चम्बल में भी है संसद

मितावली स्थित चौसठ योगिनी शिवमंदिर 
 अ तुलनीय भारत का दिल बेहद खूबसूरत है। घुमक्कड़ी के शौकीनों के लिए मध्यप्रदेश में कई ठिकाने हैं। यह अलग बात है कि कई शानदार पर्यटन स्थल अब भी पर्यटकों की बाट जोह रहे हैं। मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित चौसठ योगिनी शिवमंदिर अपनी वास्तुकला और गौरवशाली परंपरा के लिए आसपास के इलाके में तो प्रसिद्ध है लेकिन मध्यप्रदेश पर्यटन के मानचित्र पर जगह नहीं बना सका है। अपने क्रियेटिव विज्ञापनों को लेकर चर्चित मध्यप्रदेश का पर्यटन विभाग चौसठ योगिनी शिवमंदिर की मार्केटिंग ढंग से नहीं कर सका है। आप यदि मितावली आएंगे और नौवीं सदी के इस मंदिर को निहारेंगे तो हैरत से भर उठेंगे। जमीन से करीब ३०० फीट ऊंचाई पर एक पहाड़ी पर बने गोलाकार शिवमंदिर को देखकर अनायास ही आपको मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुटियंस की याद आएगी। सर लुटियंस, जिन्होंने दिल्ली को एक नया रूप, रंग और आकार दिया था। भारत के खूबसरत संसद भवन की रचना के लिए आज भी उन्हें तहेदिल से याद किया जाता है। मितावली में इकंतेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी पहचाने जाने वाला चौसठ योगिनी शिवमंदिर हू-ब-हू हमारी संसद के जैसा दिखता है। मंदिर परिसर में आकर दिमाग की कुछ खिड़कियां खुलने लगती हैं और हवा के साथ कुछ प्रश्न इन खिड़कियों से होकर भीतर घुस आते हैं। क्या वाकई हमारी संसद के भवन की परिकल्पना लुटियंस की मौलिक सोच थी? १२ फरवरी १९२१ को दिल्ली में जिस संसद भवन की आधारशिला रखी गई, क्या उसके वास्तु की प्रेरणा लुटियंस को चम्बल के चौसठ योगिनी शिवमंदिर से मिली थी? ये कुछ सवाल हैं जो इतिहास के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय तो बनते ही हैं। गहन शोध के जरिए ही इन सवालों के सही जवाब भी हमारे सामने आएंगे। तब ही हम गर्व के साथ कह सकेंगे कि दुनिया में अपनी खूबसूरती के लिए विख्यात भारतीय संसद की इमारत की परिकल्पना सर लुटियंस के दिमाग की उपज नहीं बल्कि गौरवशाली भारतीय वास्तुकला का ही एक नायाब नमूना है।

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