मंगलवार, 29 जून 2010

... तो क्या मुसलमान देशद्रोही है?

क्या मुसलमान ऐसे हिन्दुओं का दिल जीत सकते हैं ?
इस लेख के बाद हो सकता है कुछ खास विचारधारा के ब्लॉगरों की जमात मुझे फास्सिट घोषित कर दे। हो सकता है मुझे कट्टरवादी, पुरातनंपथी, दक्षिणपंथी, पक्षपाती, ढकोसलावादी, रूढ़ीवादी, पुरातनवादी, और पिछड़ा व अप्रगतिशीस घोषित कर दिया जाए। इतना ही नहीं इस पोस्ट के बाद मुझ पर किसी हिन्दूवादी संगठन का एजेंट होने का आरोप भी मढ़ दिया जाए तो कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन मुझे डर नहीं, जो सच है कहना चाहता हूं और कहता रहूंगा। 

एक सीधा-सा सवाल आपसे पूछता हूं क्या देश के शत्रु को फांसी पर लटकाने से देश की स्थिति बिगड़ सकती है? क्या किसी देश की जनता लाखों लोगों के हत्यारे की फांसी के खिलाफ सड़कों पर आ सकती है? पूरी आशा है कि अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो आपका जवाब होगा-देश के गद्दारों को फांसी पर ही लटकाना चाहिए? लेकिन आपकी आस्थाएं इस देश से नहीं जुड़ी तो मैं आपकी प्रतिक्रिया का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।


एक खानदान है इस देश में जिसके पुरुखों ने हमेशा देश विरोधी कारनामों को ही अंजाम दिया। देश में सांप्रदायिकता कैसे भड़के, देश खण्ड-खण्ड कैसे हो? इसके लिए खूब षड्यंत्र किया। उन आस्तीन के सांपों की पैदाइश भी आज उसी रास्ते पर रेंग रहे हैं। मैं बात कर रहा हूं कश्मीर के अब्दुला खानदान की। शेख अब्दुल्ला और फारूख अब्दुल्ला के शासन काल में कश्मीर की कैसी स्थितियां रही सब वाकिफ हैं, कितने कश्मीरी पंडितों को बलात धर्मातरित किया गया, कितनों को उनके घर से बेघर किया गया सब बखूबी जानते हैं। बताने की जरूरत नहीं।
           इसी खानदान का उमर अब्दुल्ला कहता है कि - ''अफजल (देश का दुश्मन, संसद पर हमला और सुरक्षा में तैनात जवानों का हत्यारा) को फांसी न दो, वरना कश्मीर सुलग उठेगा और लोग विरोध में सड़कों पर उतर आएंगे। मकबूल बट्ट की फांसी के बाद कश्मीर में जो आग लगी थी। वह अफजल की फांसी के बाद और भड़क उठेगी।" पढ़ें.....
>>>>>बहुत दिनों बाद भारत भक्तों को सुकून मिला जब कांग्रेस के पंजे में दबी अफजल की फाइल बाहर निकली और उसकी फांसी की चर्चाएं तेज होने लगीं। लेकिन, कुछ देशद्रोहियों को यह खबर सुनकर बड़ी पीड़ा हुई। कुछ तो उसे बचाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं और बहुतेरे अभी रणनीति बना रहे हैं, मुझे विश्वास (किसी के विश्वास बरसों में जमा होता है) है वे भी कूदेंगे जरूर।

>>>>>मैं पूछता हूं क्यों उतरेंगे लोग सड़कों पर एक देशद्रोही के लिए ?  क्या यह समझा जाए कि देश के मुसलमान देश के दुश्मनों के साथ हैं?  ये कौम इस तरह की हरकत करके जता देती है कि इन पर विश्वास न किया जाए। अगर इन्हें इस देश के बहुसंख्यकों के दिल में जगह पाना है और विश्वास कायम करना है तो इस तरह की घटनाओं का विरोध करना चाहिए, जैसा कि ये कभी नहीं करते। इन लोगों को तो इस बात के लिए सड़क पर आना चाहिए था कि देश के दुश्मनों (अफजल, कसाब आदि) को फांसी देने में इतनी देर क्यों? इन्हें तुरंत फांसी पर लटकाया जाए, लेकिन नहीं आए। ये लोग तब भी सड़कों पर नहीं उतरे जब पूरी कश्मीर घाटी को हिंदुओं के खून से रंग दिया गया, उन्हें उनकी संपत्ति से बेदखल कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया। अब तक कश्मीर में करीब २००० से अधिक हिंदुओं की इस्लामी आतंकी हत्या कर चुके हैं। यह दर्द कई लोगों को सालता रहता है। कश्मीर के इस खूनी खेल में अपने पिता को खो चुके बॉलीवुड के संजीदा अभिनेता संजय सूरी ने 'तहलका' के नीना रोले को दिए इंटरव्यू में कुछ इस तरह अपना दर्द बयां किया था- ''१९९० की एक मनहूस सुबह श्रीनगर में मेरे पिता को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी। आखिर उनकी गलती क्या थी? यही कि वो कश्मीर में रह रहे एक हिंदू थे।" उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीर से हिन्दुओं के पलायन के बाद यहां एक ही धर्म बचा है।

>>>>>क्यों करें इस देश के मुसलमानों पर विश्वास-
रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी अपनी प्रसिद्ध किताब 'संस्कृति के चार अध्याय'  में लिखा है - ''इस देश के मुसलमानों में इस्लाम के मौलिक स्वभाव, गुण और उसके ऐतिहासिक महत्व का ज्ञान बहुत ही छिछला रहा है। भारत में मुसलमानों का अत्याचार इतना भयानक रहा है कि सारे-संसार के इतिहास में उसका कोई जोड़ नहीं मिलता। इन अत्याचारों के कारण हिन्दुओं के हृदय में इस्लाम के प्रति जो घृणा उत्पन्न हुई, उसके निशान अभी तक बाकी हैं?"

जरा इनके व्यवहार पर नजर डालें तो-
अपनी छवि को ठीक करने के लिए देश के मुसलमानों को देशद्रोही घटनाओं में संलिप्त मुसलमानों का तीव्र विरोध करना चाहिए था, लेकिन ये उल्टे काम करते रहे।
- अफजल ने जब संसद पर हमला किया और कसाब ने होटल ताज पर तो ये लोग सड़कों पर विरोध करने नहीं आए, हजारों बेगुनाहों के हत्यारों को मौत की सजा हो ऐसी मांग इन्होंने नहीं की। लेकिन, उन्हें बचाने के लिए ये कश्मीर जला देंगे। (मतलब शेष बचे कश्मीरी पंडितों की हत्या कर देंगे)
- जब कहीं मीलों दूर किसी अखबार में किसी मोहम्मद का कार्टून छपा तो इस कौम ने देश-दुनिया और भारत के हर शहर गली-मोहल्ले में हल्ला मचाया। देश के एक पत्रकार आलोक तोमर ने जब इस कार्टून को छाप दिया तो उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया। पढें....  वहीं जब इसी कौम के एक भौंड़े कलाकार एमएफ हुसैन ने हिंदु देवी-देवताओं और भारतमाता का नग्न चित्र बनाया तो ये बिलों में दुबके रहे और हुसैन अपनी करतूतों से बाज नहीं आया, उसे किसी ने जेल नहीं भेजा। उस समय देश के मुसलमान सड़कों पर उतरते तो लाखों दिलों में घर बनाते। ये तो सड़कों पर उतरे भी तो हुसैन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए।
- एक ओर हिन्दू धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरू शंकराचार्य को देश के सबसे बड़े त्योहार दीपोत्सव पर उठाकर सींखचों के पीछे ढकेल दिया वहीं खुले मंच से 'मैं सबसे बड़ा आतंकवादी हूं, मुझे पकड़कर दिखाए कोईÓ कहने वाले का कोई बाल बांका नहीं कर सका।
- बाल ठाकरे की टीका-टिप्पणी से भी नाराजगी जबकि मंत्री पद पर बैठे हाजी याकूब द्वारा किसी की हत्या कर उसका सिर काटकर लाने के आह्वान की भी अनदेखी।
- नरेन्द्र मोदी के शासन में एक बच्चे का अपहरण भी राज्य की दुर्गति का प्रमाणिक उदाहरण, जबकि फारूख अब्दुल्ला के राज में दर्जनों सामूहिक नरसंहारों से भी कोई उद्वेलन नहीं।
- आप ही बताएं क्या इस तरह के दो तरह के व्यवहार से सांप्रदायिक एकता कायम हो सकती है?
- क्या इस तरह की घटनाओं में शामिल रहने पर हिन्दू, मुसलमानों पर भरोसा करें?

65 टिप्‍पणियां:

  1. अफ़ज़ल देशद्रोही है और उसको फाँसी ना देना उसके दुष्कर्म से भी बड़ा देशद्रोह है. मैं तो माँग करता हू कि इसके लिए मनमोहन सिंग को भी फाँसी दी जानी चाहिए. रही अब्दुल्ला परिवार की बात तो वे तो इंग्लेंड में सपरिवार रहते हैं, यहाँ केवल हुकूमत करने आते हैं.

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  2. We have slavery in our blood. We are born to be ruled. We are blind towards the double standards everywhere. We are destined to die like insects.

    My heart bleeds when i see and read all this. Why the people in power are impotent?

    As far as Muslims are concerned, majority of them are selfish. It will be foolish to expect patriotism from them. Humanity has no meaning in their religion.

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  3. " जबरदस्त और विचारोत्तेजक लेख......."

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  4. बहुत खूब लोकेंद्र भैया! आपने अंत में जो सवाल उठाए हैं, उनका एक ही जवाब हो सकता है नहीं। इसका एक जवाब इतिहास में मिल सकता है, मैं आज जो कहूंगा संकेतों में कहूंगा...जो हिंदू या सनातन धर्म और अन्य धर्मों के बीच मौलिक फर्क पैदा करता है वह यह कि हिंदू धर्म के विस्तार के लिए कभी खून नहीं बहाया गया, धर्म की रक्षा के लिए भले ही तलवारे खिंची हों। जबकि इस्लाम धर्म का विस्तार ही तलवार के दम पर हुआ है, बल्कि यह धर्म कम राजनीतिक विचारधारा ज्यादा समझी जा सकती है क्योंकि यह पहला धर्म है जिसमें विचारधारा के नाम पर नहीं संरक्षक बनने के लिए दो फाड़ हुए और कत्लेआम हुए। इससे अनुयाइयों पर ये असर तारी होना आवश्यक ही था। बाद में इसमें गलती सुधारी गई प्रेम को महत्व दिया गया।
    वैसे इस धर्म में जिन चीजों को बचाने के लिए उपाय किए गए तोडऩे मरोडऩे वालों के हथियार बन गए, जिसके लिए उपाय किए गए उसी के गले की फांस बन गए और धर्म चंद लोगों का बंदी... इसमें व्यक्ति का विवेक गिरवी हो गया। एक उदाहरण तत्कालीन समय में पैगंबर ने विधवा विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए एक से अधिक विवाह किए तो इस धर्म में स्त्रियां उपभोग की वस्तु बन गई लादेन एक नहीं पचास विवाह करता है उसको छोडि़ए आज इस्लाम को मानने वाले शौकिया शादियां करते हैं और विवाहिता से तीन तलाक पर बेसहारा जीने मरने पर छोड़ देते हैं और इसमेें बदलाव की बात तो कर ही नहीं सकते कुछ लोग मेरी इस बात से नाराज होकर गुस्से में श्रीकृष्ण का उदाहरण देंगे लेकिन श्रीकृष्ण की विवाहिताओं की स्थिति को भी समझना पड़ेगा विवाह से उनको सम्मान तो मिला लेकिन उसका कोई भी नुकसान किसी महिला को नहीं हुआ होगा और न ही समाज में इसको प्रोत्साहित किया किसी भी विचार को समय विशेष की परिस्थिति में समझा जाय और अपनाया जाय तभी आप उसके साथ न्याय कर सकते हैं। समय बदलने के बाद विचार भी बदलाव की मांग करते हैं।
    खैर बात लंबी होने लगी है तो वापस मूल विषय पर आता हूं जिसे मेरे पहले के विचारों के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है लेकिन आप अपने हिसाब से व्याख्या करने के लिए स्वतंत्र हैं मुझे मालूम है भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म व्यक्ति के विवेक को गिरवी नहीं रखता इस मंच पर संवाद और तर्क के बाद बदलाव की गुंजाइश है। कोई भी धर्म देश को तवज्जो देता है, इस्लाम भी इसकी इजाजत देता है। किसी आतंकी की फांसी से आतंकी ये नेता दुखी होगा क्योंकि आतंकियों का एक आतंकी खत्म होगा और नेता के लिए एक मुद्दा खैर फारुख अब्दुल्ला परिवार किसी का नहीं है न जनता न जनादेश और न ही जन्म स्थान उन्हें तो भूख है इन सब पर शासन की......... ये विशुद्ध सुविधाओं का अर्जन मात्र की कवायद है। एक सवाल इनसे भी कि जब इन्होंने हत्या की तो आप क्या कर रहे थे इनको क्यों हत्या करने से ये रोक नहीं पाए। बहुतेरे मुसलान जो इनसान भी हैं, वो कभी आतंकी की रक्षा की बात नहीं करेंगे, ये तो नेता मुसलमान हैं, जिनमें इंसानियत कम है वो हत्यारों के पक्ष में आवाज बुलंद करते हैं, क्योंकि इसमें इनके गर्हित स्वार्थ इनकी मानवता का चीरहरण कर इनको डरावना बना देते हैं।

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  5. लोकेन्द्र जी , इस सारगर्भित लेख के लिए बधाईयाँ स्वीकार करें..
    जय हिंद जय भारत

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  6. पंचूजी क्या आपको पता है भारत देश-विदेश में किस बात के लिए जाना जाता है। नहीं पता तो मैं बता देता हूं। एकता और अखंडता के लिए। भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, उसमें लिखा है कि किसी भी व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इसका लाभ अगर आप ले सकते हैं तो और कोई क्यों नहीं। तो क्या अब बोलने पर ताला लगाया जाएगा।
    बात जहां तक अफलज और कसाब की है तो साहब उसमें कानून ने अपना काम कर दिया है। देश में एक सरकारी तंत्र है उसके हिसाब से ही सारा काम होना चाहिए और वह हो रहा है। फारुख अब्दुल्ला ने जो कहा है वह उनके व्यक्तिगत विचार हैं। वे भी तो स्वतंत्र भारत में रह रहे हैं। आप भी ब्लॉग के माध्यम से अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं, किसने रोका है। वे नेता हैं तो सार्वजनिक मंच से ऐसा कह रहे हैं आप पत्रकार हैं तो लिख रहे हैं।
    बात जहां तक मुसलमानों की है तो उनके साथ गलत हो रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। और सबसे बड़ी बात आपको और बताऊं देश को खतरा इन हिंदूवादी संगठनों से ही है। आप या फिर यह ब्लॉग पढऩे वाला कोई व्यक्ति मुझे यह बात दे कि 1992 से पहले देश में कितने बम विस्फोट हुए थे, कितने आतंकी हमले हुए थे। 1992 में जब मस्जिद गिराई गई उसके बाद से मुसलमान अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है। असली आतंकी तो वही हैं, उत्प्रेरक का काम किसने किया। और यह बता दीजिए कि मस्जिद के गिरने से क्या मंदिर बन गया। मस्जिद के गिरने से कितने भूखे पेटों को रोटी मिली। मस्जिद गिरने से कितनी मांगों का सिंदूर उजड़ गया। मस्जिद गिरने से क्या-क्या हुआ, इस पर लिखने बैठ जाऊं तो पूरी किताब लिख डालूं। क्या यही राम की भक्ति है। रामभक्तों को यह भी नहीं मालूम की राम क्या हैं वे अपने भक्तों से क्या चाहते हैं।
    याद आता है गोधरा। क्या हुआ वहां, बताने की जरूरत नहीं। उस समय एक शेर कहीं पढ़ा था याद आ रहा है तो लिख रहा हूं
    हमी पर जुल्म ढाया जा रहा है और हमी को मुजरिम बताया जा रहा है,
    जिन्हें मरकर भी जलना नहीं था उन्हें जिन्दा जलाया जा रहा है।
    जी आप और इस ब्लॉग को पढऩे और कमेंट करने वाले भी जानते होंगे की वहां मुसलमानों के साथ क्या हुआ। आपने शुरू में कहा कि पता नहीं मुझ पर क्या क्या ठप्पे लगा दिए जाएं पर अपनी बात कहूंगा जरूर तो अगर आप अपनी बात रख सकते हैं तो दूसरा क्यों नहीं। आप स्वतंत्र हैं आप एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और दूसरे नहीं।
    एक साहब ने कमेंट किया है कि इस्लाम का जन्म ही खून खराबे से हुआ। तो साहब मुझे यह बताइए कि क्यों भारत के बड़ी संख्या में लोग मुसलमान बन गए। इसलिए कि उनके साथ हिन्दू धर्म में भेदभाव किया जाता था। उन्हें नीच समझा जाता था। उनके घर में घुसने पर गंगाजल का छिड़काव किया जाता था। कुल मिलाकर कहें तो उन्हें इंसान नहीं समझा जाता था, इसलिए वे इस्लाम में चले गए। यह गलती किसकी है, हिन्दुओं की ही तो ना। यह बात सच है कि सभी नीची जाति के लोग मुसलमान नहीं बन गए, तो क्या अयोध्या और फैजाबाद, गोधरा में कोई मुसलमान नहीं रह गया। हैं।
    मुसलामनों के साथ भेदभाव हो रहा है। कोई कितना भी मना करे पर यह सच है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आपने देखी है। नहीं देखी होगी, अगर उसे देख लेते तो शायद आप यह बात नहीं कहते कि मुसलमान देशद्रोही हैं। अभी हाल ही में एक रिपोर्ट आई है जिसमें यह पता चला है कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के बाद सरकार सजग हुई है और उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ है। जीवन स्तर में सुधार तभी होगा जब पहले का जीवन स्तर खराब रहा होगा। यह तो मोटी बात है सबकी समझ में आसानी से आ सकती है।
    अगर किसी कारणवश कोई मुसलमान गलत बात कहता है तो क्या पूरा इस्लाम गलत हो जाता है। कुछ लोग मेरा कमेंट पढ़कर मेरा नाम देख रहे होंगे। तो बात दूं कि मैं हिन्दू माता पिता के यहां जन्मा और उच्च कुल का ब्राह्मण हूं। पर उन लोगों का विरोध करता हूं जो किसी अन्य धर्म के लोगों को इंसान नहीं मानते या समझते।
    एक फारुख अब्दुल्ला के बयान को लेकर इतन बवंडर खड़ा करने की क्या जरूरत। जब उन्होंने कहा कि मुसलमान सड़कों पर उतर आएंगे तो क्या किसी ने उनकी हां में हां मिलाई, मुझे नहीं मालूम आप बताइएगा। अगर नहीं मिलाई तो वह खुद ही फ्लॉप हो गए। कुछ करने और कहने की जरूरत ही नहीं। मुसलमान कोई गलत काम करता है तो क्या पूरी कौम गलत हो जाती है, ऐसे तो हिन्दू भी दूध के धुले नहीं हैं।

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    1. शायद आप प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस को भूल रहे हैं

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  7. आपसे व अभी तक टिप्णी कर चुके से देवसूफी राम कु० बंसल ,दिब्या व PRAVIN PANDEY जी से सहमत।
    बंसल जी ठीक कह रहे हैं कि अफजल के साथ-साथ अफजल की फांसी रोकने वाले मनमोहन खान,एंटोनिया व इनके साथियों को भी फांसी पर चढ़ाया जाना चाहिए।
    आओ सेना से देश की बागड़ोर अपने हाथ में लेकर इन गद्दारों से देश को मुक्त करवाकर देशवासियों,सुरक्षाबलों व देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने की विनम्र अपील करें।

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. पंकज जी 1985 में अलकायदा की सथापना से लेकर 1992 तक भारत में मुसलिम आतंकवादी हजारों कत्ल कर चुके थे। अधिक जानकारी के लिए हमारे बलाग पर हिन्दू-मिटाओ हिन्दू भगाओ अभियान जरूर पढ़ें जहां इसका डैटा दिनांक सहित उपलब्ध है।
    अगर फिर भी कम लगे तो हमारे बलाग पर एक और डैटा संग्रैह
    सांप्रदायिक दंगो पर सेकुलर गिरोह की भ्रमित सोच पढ़ने का कष्ट करें।
    हिन्दूओं में जिस छुआछूत की बात आप कर रहे हैं उसके वारे में विस्तार से समझने के लिए
    हमारे बलाग पर हिन्दू एकता सिद्धान्त पढ़ने का कष्ट करें।
    हां रही गुजरात की बात तो अगर मुसलमान ट्रेन में आग न लगाते तो क्या दंगे होते?
    अयोध्या में भगवान श्रीराम के मन्दिर को मुसलिम अक्रांता बाबर ने तोड़ा इस बात को देश का बच्चा-बच्चा जानता है।
    हां अगर आपको मुसलिम आतंकवादियों से इतनी ही हमदर्दी है तो आपको किसने रोका है मुसलमान आतंकवादी बनने से खुलकर कहो कि तुम मुसलिम आतंकवादियों द्वारा किए गए हर नरसंहार के समर्थक हो किसने रोका है आखिर भारत में लोकतन्त्र जो है।

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    1. apne bikul sahi kaha ise musalman ban jana chahie

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  10. पंकज मिश्रा की प्रोफाइल से किया गया कमेन्ट उनका लिखा हुआ नहीं है. यह लेखन शैली, वाक्य विन्यास, भाषा उनकी शैली से एकदम अलग है. यह लखनऊ के ही एक मुस्लिम ब्लॉगर का लिखा लगता है.

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  11. सुनील दत्त जी, आपका नाम एक इतने सुलझे हुए व्यक्तितव पर रखा गया है और आप इतनी उलझी हुई बातें करते हैं। क्षमा कीजिएगा, आपके घर वालों ने आपका नाम सुनील दत्त रखा। फिल्म अभिनेता सुनील दत्त ने एक मुसलमान से विवाह किया था। यह जानते हुए भी की उनका प्रेम प्रसंग किसी और के स ाथ काफी समय तक चला था। उनकी सास कौन थी आप जानते ही होंगे, विद्वान जो हैं। फिर भी सुनील दत्त ने उनसे शादी कर हिन्दू-मुसलमान एकता की एक अनोखी मिसाल पेश की थी।
    खैर नाम की बात नहीं है। आप लिख रहे हैंं कि 1985 से 1992 तक मुसलमान भारत में हजारों का कत्ल कर चुके थे। हो सकता है। मैं ये पूछ रहा हूं कि 1992 से पहले देश में कितने बम विस्फोट हुए और 1992 के बाद कितने बम विस्फोट हुए। इसमें कितने लोग मरे। कोई डाटा है आपके पास। नहीं होगा। हो तो बताइएगा।
    बात जहां तक हिन्दुओं में छुआछूत की मैंने की थी वह कोई झुठला नहीं सकता। दलितों पर आज भी कितने अत्याचार किए जाते हैं सब जानते हैं, जहां दलित मुख्यमंत्री है वहां भी। ऐसा नहीं होता तो सरकार को दलित एक्ट लाने की जरूरत ही क्यों पड़ती। क्या किसी और धर्म में अपने ही लोगों पर कभी कहीं अत्याचार किए गए।
    बात गुजरात की। हर काम के लिए मुसलमान ही दोषी है। अगर मुसलमान ट्रेन में आग नहीं लगाते तो.....। अरे हिन्दू धर्म कहे के लिए जाना जाता है। सहनशीलता के लिए ही तो ना। रावण अगर राम की पत्नी को उठा कर ले गया तो राम भी रावण की पत्नी उठा लाते। बात बराबर। कोई कहता तो कह देते कि रावण अगर राम की पत्नी को न उठाता तो यह सब नहीं होता। एक आदमी गलत काम करे तो क्या पूरी कौम को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। पता कर लेते की ट्रेन में आग किसने लगाई उसके बाद जो करना होता करते। पूरी कौम के खिलाफ ऐसा बर्ताव? खैर।
    अयोध्या में राम मंदिर बाबर ने तोड़ा ठीक है। लेकिन राम का मंदिर बन गया क्या। आप जैसे लोग ही नेताओं की हाथों की कठपुतली बन कर देश को नर्क की ओर झोंक रहे हैं। अगर इतने ही पैरोकार हैं तो पूछिए आडवाणी से, पूछिए अशोक सिंघल से, पूछिए प्रवीण तोगडिय़ा से और पूछिये आपने उन कारसेवक भाइयों से कि कहां है हमारा मंदिर। अरे घर के बाहर जो मंदिर बना है वहां गंदगी पड़ी है उसे तो साफ करते नहीं। अयोध्या में मंदिर बना के तोप चलाएंगे। भारत में ही ये सब ड्रामा चल सकता है तो चला लीजिए और कहीं होते तो पता नहीं क्या हुआ होता।

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    1. 1)मक्का के बारे में पंकज जी एक बार इतना बोल कर देख लीजिये ,तब आपको हिन्दू और मुस्लिम का अंतर पता चल जाएगा .
      2)रही बात आतंकवाद की तो आप दुनिया में नजर उठाहिये ,तो आपको पता चल जाएगा की आतंकवादी गतिविदियो कॉन फेलारहा है ,
      3)अब भी संभल जाओ नहीं तो एक और पाकिस्तान बनने में देर नहीं लगेगी ,और अगर आप हिन्दू है जो आपके विचारो से मुझे लगता नहीं है ,तो फिर एक बार सामान उठा कर हिंदुस्तान से निकल न परेगा .उस समय तो हिंदुस्तान ने शरण दे दी .अब लेकिन और कहा

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    2. ye sala pankaj mishra jaroor kise kate ki paidish hai ,ise jaker pakistan rahana chaihey

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  12. @पंकज जी-खतरनाक लिखते है आप....पर कुछ सच भी लिखते तो सोने पर सुहागा वाली बात हो जाती....आपके मन मानवीय संवेदानाये कूट-कूट कर भरी है पर आप एक जगह से ही उन्हें महसूस कर रहे हो....कभी निष्पक्ष होकर विचार करना.....कुछ अलग महसूस हो तो बेशक हमें मत बताना....बस महसूस करना...अभी थोड़ी जल्दी सो अभी इतना ही....आप स्वयं बहुत अधिक समझदार और बड़े हो...गुस्ताखी के लिए क्षमा वाली बात है.....

    कुंवर जी,

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  13. पंकज जी सही कहा आपने सुनील दत्त हिन्दू होने के नाते उदारवादी था इसलिए एक मुसलिम से शादी की परिणाम एक आतंकवादी का जन्म ।संयज दत्त जिसने 1993 के मुंबई stock excange में बम्म हमलों में प्रमुख भूमिका निभाई।
    भारत का माननीय न्यायलय उसे आतंकवादी सिद्ध कर चुका है।
    पंकज जी जब तक हिन्दूओं में आप जैसे ... जिन्दा हैं तब तक हिन्दूओं को कोई नहीं बचा सकता ।
    बैसे हम आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हमारा मानना है कि हिन्दूओं को मुसलिम आतंकवादियों से कहीं अधिक क्षति जयचन्द के बंसज सेकुलर गद्दारों ने पहुंचाई है.
    अगर जयचन्द के बंसज ये सेकुलर गद्दार न होते तो मुसलिम आतंकवाद का अन्त परमपूजनीय गुरूगोविन्द सिंह जी ने ही कर दिया होता।
    हां अगर आपको लगता है कि हिन्दूओं में अभी भी बराबरी नहीं है तो जाईए सिख बनकर जात-पात से छुटकारा पाईए किसने रोका है पर कातिल मुसलिम आतंकवादियों का पक्ष लेकर आप क्या सिद्ध करना चाह रहे हैं हमारी समझ से परे है।
    आपने कहा कि सिर्फ दलितों ने धर्मांतरण कर इसलाम अपनाया जो कि सरासर गलत है इसलाम व इसाईयत अपनाने वाले कायरों और लालचियों में सभी जातियों के लोग सामिल हैं बैसे भी लालचियों और कायरों का कोई धर्म नहीं होता उन्हें जहां से टुकड़ा मिलता है उस तरफ दुम हिलाना शुरू कर देते हैं।
    रही दलितों पर हमलों की बात तो इसके लिए जाति के नाम पर बैमनस्य फैलाने वाले आप जैसे लोग जिम्मेदार हैं।
    अगर हो सके तो जो लेख हमने बताए हैं उन्हें पढ़ लेना आपको मुसलिम आतंकवादियों की शराफत के सब प्रमाण एक साथ मिल जायेंगे।
    गन्दगी मन्दिरों में नहीं आपके जहन में है उससे छुटकारा पाकर खुद को हिन्दू एकता के काम में लगाओ। फूट डालने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।
    रही हिन्दू धर्म की बात तो परम् पूजनीय भगवत गीता में कहा गया है कि जब पापी के 99 पाप पूरे हो जायें तो उसका खात्मा जरूरी है।
    हिन्दू धर्म कहीं भी ,कभी भी कायरता की शिक्षा नहीं देता।

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    1. आज कल यह कहने का फैशन सा चल पड़ा है कि..₹. हिन्दू कायर और डरपोक होते हैं...|

      लेकिन .₹.. कई बार सच हमारे सामने होता है ....परन्तु हम उसे देख नहीं पाते....|

      भारत पर इस्लामी आक्रमणों के बारे में कुछ ऐसा ही हुआ है.
      अपनी स्थापना के चन्द दशकों के भीतर इस्लाम ने तलवार के जोर से सारे अरब, अफ्रीका, आधे यूरोप को जीत लिया.
      इतिहास में ऐसा जोश तथा आतंक और कहीं नज़र नहीं आता है ... जो मुहम्मद ने इस्लाम के नाम पर दुनिया को दी है...|

      इससे पहले न कोई ऐसा सम्प्रदाय बना और न बनने की अब उम्मीद है... जो दुनिया को इस तरह आतंक के साये में जीने को मजबूर कर सके...|

      ऐसी जुनूनी और लुटेरी मजहब.... भारत पर सन 700 (मीर कासिम) के बाद से एक हज़ार साल तक हमले करता रहा पर उसे सफलता न मिली.
      700 साल के लम्बे संघर्ष के बाद जाकर .... लुटेरे कुछ सफल हुए ........ जब बाबर दिल्ली में गद्दी पर बैठा...|

      क्या कायर हिंदुस्तान और हिन्दू700 साल तक निरंतर खूनी संघर्ष जैसा .... यह कमाल कर सकता था.......?
      आपको यह जानकर काफी आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी होगी कि.... दुनिया में........... हमारे हिंदुस्तान के अलावा और कोई देश नहीं है.... जो जो इस लुटेरी और आतातायी इस्लाम के आगे टिका सका..!

      जबकि हम हिन्दू ... न सिर्फ इन लुटेरों के आगे ना सिर्फ टिके रहे ... बल्कि ....अपनी पहचान को भी बनाए रख सका....!

      क्या दुनिया में... और कोई कर सका यह कमाल........... ..??????
      फिर, हम हिन्दू कायर कैसे हैं...........? ???????

      हर कोई इस बात को अच्छे से समझ लें कि...... भारत में अपने आगमन से अपने शासन की समाप्ति तक एक भी मुस्लिम शासक ऐसा नहीं था.... जिसका, पूरे भारत देश पर राज्य स्थापित हो सका हो.
      भारत में एक भी ऐसा कोई विदेशी शासक नहीं हुआ जो एक रात भी चैन की नीद सोया हो.
      एक भी दिन उसके शासन का ऐसा नहीं जब उसके राज्य में आज़ादी के लिए युद्ध या संघर्ष न हुआ हो.
      एक भी दिन ऐसा नहीं जिस दिन भारत के देशभक्तों का रक्त आज़ादी पाने के लिए न बहा हो.

      दुनिया के इतिहास में हमारे हिंदुस्तान और हिन्दुओं को छोड़कर एक भी उदाहरण नहीं है ... जब किसी समाज ने मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ इतना लंबा संघर्ष किया हो और अपनी पहचान, अपनी संस्कृती को बना कर तथा बचाकर रखा हो.
      इतनी लम्बी आजादी की लड़ाई लड़ने का और कोई एक भी उदाहरण संसार में नहीं मिलता.

      यहाँ सबसे बड़ी बात यह है कि.......... यदि हम सदा हारते रहे, हम हिन्दू कायर थे ...तो, फिर अरबी आक्रामकों को भारत में घुसने में 500-600 सौ साल कैसे लग गए....?????????

      हज़ार साल तक विदेशी आक्रमणकारियों के साथ कोई कायर लड़ सकता है क्या....... ?????????

      जो मुस्लिमों को बहादुर होने का तमगा देते हैं.... ये बात वे ठीक से समझ लें कि.... उनके इस्लाम कि मात्र इतनी ही ताकत है कि...... मुहम्मद के एक कार्टून मात्र तथा एक दो भंडाफोडू लेख मात्र से मुस्लिमों की फट जाती है ... और उनका इस्लाम खतरे में आ जाता है...!

      यह..... वो सच्चाई है.... जो सामने होते हुए भी अधिकांश लोगों को नज़र नहीं आती है ....!!

      आज एक बार फिर से समय आ गया है कि.... हिन्दू अपने गौरवशाली इतिहास को पहचाने और दुश्मनों को उसकी औकात याद दिला दे....!

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  14. लोकेंद्र जी, मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूं। ये गलत है कि आपकी पोस्ट को पढ़कर कोई आपको पक्षपाती, ढकोसलावादी या अन्य प्रकार की उपाधियों से नवाजेगा। एक सच्चे देशभक्त, हिंदू और सच्चे हिंदुस्तानी के ह्दय में ऐसी भावनाएं होना लाजिमी है। अगर ऐसी न होता तो भगत सिंह, सुखदेव, गांधी, सुभाष, झांसी की रानी नहीं होती। सच पूछिए तो, आज देश में स्थितियां हैं वह अपने धर्म के प्रति सच्ची निष्ठा और समर्पण भाव के अभाव के कारण हैं। यदि मुसलमानों की बात करें तो उनसे सीखें कि अपने धर्म के प्रति कैसी निष्ठा होनी चाहिए। एक बात कहूं कि यदि हम अपने घर में खुश नहीं हैं तो कैसे उम्मीद करें कि दूसरे के घर में खुशी होंगे। यही बात यहीं पर लागू होती है। यदि अफजल गुरू, अजमल कसाब, हाफिज सईद की बात करें तो ये हिंदूओं के दुश्मन ही नहीं बल्कि पूरी मुसलमान कौम के नाम पर बदनुमा दाग हैं। कुरान कतई हिंसा नहीं सिखाता। 'मोहम्मद पैगंबर एक बार कहीं गए थे, वहां गीता के कुछ श्लोक लिखे हुए थे। जब उन्होंने उन्हें पढ़ा और अपने बंदे से कहा ये तो कुरान की आयतों जैसी है। इसका मतलब दोनों का अर्थ और उद्देश्य समान हैÓ। कहावत है कि 'एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती हैÓ। ऐसे ही चंद लोग पूरी मुसलमान कौम को गंदा किए हुए हैं। इनकी एवज में पूरी मुसलमान कौम बदनाम होती है। इन लोगों ने अपने फायदों के लिए कुरान का अर्थ ही बदल डाला। नहीं तो मुसलमानों में बाबा फरीद, सांईं बाबा जैसे महान् संत भी हुए हैं। मैं आपको बता दूं कि खुद पर कट्टर मुसलमान का नकली चोला चढ़ाकर लोगों के सामने सच्चा मुसलमान होने का दावा करते हैं। ये ही चंद लोग हैं, जो कश्मीरी पंडितों पर जुल्म कर रहे हैं, देश में जहर घोल रहे हैं। खैर, एक समझदार मंत्री को इसका विरोध करना चाहिए। लेकिन अफसोस, उन्होंने भी कुरान पढ़ी होगी, समझी नहीं। वैसे, हिंसा का कोई मजहब नहीं होता। देश के मंदिर पर हमला करने वाले, निर्दोषों की जान लेने वाले, बर्बादी करने वाले चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। इन आस्तीन के सांपों को ऐसी मौत देनी चाहिए कि फिर कोई देश का दुशमन फन न उठा पाए। मैं चाहता हूं कि किसी खास कौम की बात न की जाए तो बेहतर होगा। वे सिर्फ अपना धर्म निभा रहे हैं, हमें चाहिए कि हम अपना धर्म निभाएं। एक महत्वपूर्ण बात और कि यदि कोई हमें डिगाने की कोशिश करता है तो वहां हमारी परीक्षा होती है कि हम अपने देश के प्रति कितने समर्पित हैं, यदि वह सफल होता है तो वह जीता और यदि नहीं तो हम जीते। 'क्योंकि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिंदी हैं वतन है हिंदोस्तां हमाराÓ।

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  15. सुनील दत्त साहब। सबसे पहले तो आपकी जानकारी दुरुस्त कर दूं। संजय दत्त आतंकवादी नहीं है। यह बात मैं नहीं कह रहा। यह बात अदालत कह चुकी है। संजय को इसलिए दंडित किया गया था क्योंकि उनके घर में एके 47 मिली थी। ना कि इसलिए कि वह आतंकवादी है। देश में अभी भी अधिकतर लोगों को न्यायपालिका पर भरोसा है। आपका पता नहीं। अगर आप अपने आप को न्यायपालिका से ऊपर समझते हैं तो कोई बात ही नहीं। नहीं तो अपनी जानकारी ठीक कर लीजिए।
    आपको अभी भी लगता है कि संजय आतंकवादी है तो दम है तो मार दीजिए उसे गोली। ब्लॉग पर क्या लिख रहे हैं संजय दत्त को गोली मार दीजिए और ले लीजिए बदला देशवासियों के खून का।
    सुनील जी इतिहास की बातें मत कीजिए। जयचंद की बातें मत कीजिए। आज की बात कीजिए। आज को समझिए। पहले क्या हुआ। हुआ होगा। आज क्या हो रहा है, उसे देखिए। तब समझ में आएगा कि क्या सही है और क्या गलत।
    बात जहां तक जात की है। तो मैं नहीं जानता की आपकी क्या जात है, अगर आप उच्च जाति के हैं तो क्या अपने घर में चमार को, धोबी को, धानुक को सोफे पर बिठा के खाना खिलाते हैं। बताइएगा। मैं इंतजार कर रहा हूं। अगर हां। तो मैं आऊंगा आपके यहां। फिर मत बदलिएगा।
    एक और बात मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं मुसलमान आतंकियों का समर्थन नहीं कर रहा। मैं सिर्फ मुसलमानों की बात कह रहा हूं। मैं कह रहा हूं कि हर मुसलमान आतंकी नहीं होता। आतंकी कोई हिन्दू भी हो सकता है। सभी धर्म और जातियों में अच्छाईयां बुराईयां होती हैं। अच्छा और बुरा कोई धर्म नहीं होता। आप शायद मेरी बात अभी तक समझ ही नहीं पाए। हिन्दू भी बुरा हो सकता है और मुसलामान भी। इस पर ज्यादा विस्तार से अवधेश जी की टिप्पणी में देखें।
    बात जहां तक हिन्दू एकता और अखंडता की है। जनाब पहले इंसान बनिए। उसके बाद हिन्दू और मुसलमान बन जाइएगा। आप तो इंसान ही नहीं लगते। इंसान होते तो दूसरे इंसान के खिलाफ इतनी आग नहीं उगलते। पहले अपने मन को साफ करिए उसके बाद मंदिर में जाइएगा। मंदिर में जाकर आप जैसे लोग क्या करते हैं मैं जानता हूं। परम पूज्य गीता आपने पूरी पढ़ी है न भगवान कृष्ण ने कहा है कि जब पापी के 99 पाप पूरे हो जाएं तो उसका खात्मा जरूरी है। तो निकलिए तलवार लेकर, मार डालिए हर पापी को। किसने रोका है। अदालत में बता दीजिएगा कि गीता में लिखा है, इसलिए किया। अदालत बाइज्जत छोड़ देगी आपको। डरते किससे हैं ईश्वर की वाणी हैं निकलिए। रही बात हिन्दू धर्म में कायरता की, तो जनाब भगवान राम ने बाली को कैसे मारा, कृष्ण ने कौरवों के साथ कितने खेल खेले। राम ने अपनी पत्नी के सााथ क्या किया, पांडवों ने अपनी पत्नी को कहां दांव पर लगा दिया था। यह बताइए। बहुत सारी बातें हैं। बहुत महान है हिन्दू धर्म को चाटिए हिन्दू धर्म को। चाटिए गीता, रामायण को। जला दीजिए सारी दुनिया की कुरानों को। है हिम्मत?

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  16. sree man pnkj mishra jaise logo ke karn hi to aaj hinduon ki yh dsha hai kyon ki hindon ka kdm 2 pr apman ho rha hai aur pnkj ji bansuri bja rhe hain
    khtm ho jayengi vo kaum jo apni aatm rksha nhi krengi
    pnkjji to aatm rksha to door hindoon ko sans bhi nhi lene dena chahte hain
    aap ke purkhe dhrm rksha ki ksm khate 2 blidan ho gye pr aap un ke apman se bhi baj nhi aa rhe hain
    btayen kya muslman alpsnkhyk hain nhi to fir yh rag kyo hj ke liye aarthik shayta kyon kya bimar bchchonn ke dva ,pdhai school aadi jroori hain ya hj ke liye kroron ki chhoot
    pr aap ko yh bat pdhne me hi achchhi nhi lg rhi hogi
    kya aap apnme vicharon pr gaur krenge
    dhnyvad
    ved vyathit

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  17. पंकज जी तो आपके विचार में ए के 47 अबैध रूप से शरीफ लोग रखते हैं। हां एक बात और बतादूं सिर्फ एके 47 नहीं हथियारों का पूरा जखीरा हमले से पहले सेकुलर सुनील दत्त के वेटे संजय दत्त के घर में रखा गया था। नयायालय ने उसे आतंकवादी मानकर सजा सुनवाई है ये बात अलग है कि गद्दार नेता जिस तरह आतंकवादी अफजल की फांसी रोके हुए हैं उसी तरह संजय दत्त को भी बचाने के प्रयत्न कर रहे हैं । पर आप क्यों मानेंगे सेकुलर जो ठहरे।

    हो सकता है आपकी और हमारी जाती एक ही हो हमें तो आज तक कभी जाति की बजह से अपमानित नहीं होना पड़ा क्योंकि हम दूसरों का सम्मान करते हैं आप दूसरों को गाली निकालते हैं निसचित रूप से आपको भी दूसरे गाली निकालेंगे ही।
    बैसे आपका कभी भी स्वागत है असलियत देखने के लिए।आप अपना सथाई पता भेंजे हम आपके आने की ब्यबस्था खुद कर देंगे। संपर्क करें sdsbtf@gmail.com पर।
    बैसे भी अगर आप सच में ही जाति से दुखी हैं तो आज ही गुरूद्वारे जाकर सिख बन जाईए पर ध्यान रखना कि सिख बनकर जैसी बातें आप हिन्दू होते हुए हिन्दूओं के लिए कर रहे हैं बैसी बातें सिख बनकर अगर सिखों के लिए करोगे तो सिर धड़ से अलग मिलेगा।
    हां अगर आप मुसलिम बने तो या तो मुहाजिर के नाम पर कत्ल किए जाओगे या फिर अहमदिया के नाम पर बच निकले तो फिर तालिवान या अमेरिका नहीं छोड़ेगा और अगर कहीं भारत में कहीं tit for tat शुरू हो गया तो यहां भी मुसलिम आतंकवादियों का बच निकलना मुसकिल है ।आपतो जानते ही हैं हिन्दू बात-बात पर प्रतिक्रिया नहीं करते पर अब आतंकवादी हमलों की इनतहां हो चुकी है कुछ तो करना पड़ेगा जनता को और जनता जो भी करेगी अब निर्णायक ही होगा।
    बैसे आपने सही कहा किहम मानबताबादी नहीं । बैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें आज जिस तरह से मानबता व धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर आदमखोर आतंकवादियों का बचाब किया जा रहा है कौन अपने आपको कलंकित करना चाहेगा ऐसे गद्दारों ले अपना नाम जोड़कर।
    रही बात गोली से उड़ाने की तो आपके मुंह में घी शकर । बस धैर्य से इन्तजार करें।
    अन्त में हमें अच्छा नहीं लगा रहा कि किसी के बलाग को हम अपनी बहस के लिए उपयोग कर उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे से लोगों का ध्यान बंटबायें इसलिए वेहतर होगा आप आगे की चर्चा या तो हमारे बलाग पर करें या फिर अपने बलाग पर।
    बहुत जल्दी हम इस विषय पर चर्चा शुरू करेंगे।

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  18. @avadheshgupta
    इस्लाम हिंसा का धर्म है. आप जिन सूफी संतों की बात कर रहे हैं, मुल्ला उनको मुस्लमान नही मानते. देवबंद स्वयं कहता है की सूफियो ने इस्लाम को सबसे अधिक हानि पहुंचाई है. जो मुस्लमान हैं वे आतंक का ही समर्थन करते हैं. पहले कुरान को पढिये.


    {महमूद एंड कम्पनी ,मरोल पाइप लाइन ,मुंबई द्वारा हिंदी में प्रकाशित कुरान मजीद से ऊदत } इस्लाम के अनुसार इस्लाम के प्रति इमान न रखने वाले ,व बुतपरस्त( देवी -देवताओ व गुरुओ को मानने वाले काफिर है ) 1................मुसलमानों को अल्लाह का आदेश है की काफिरों के सर काट कर उड़ा दो ,और उनके पोर -पोर मारकर तोड़ दो (कुरान मजीद ,पेज २८१ ,पारा ९ ,सूरा ८ की १२ वी आयत )! 2.....................जब इज्जत यानि , युद्द विराम के महीने निकल जाये ,जो की चार होते है [जिकागा ,जिल्हिज्या ,मोहरम ,और रजक] शेष रामजान समेत आठ महीने काफिरों से लड़ने के उन्हें समाप्त करने के है !(पेज २९५ ,पारा १० ,सूरा ९ की ५ वी आयत ) 3...................जब तुम काफिरों से भिड जाओ तो उनकी गर्दन काट दो ,और जब तुम उन्हें खूब कतल कर चुको तो जो उनमे से बच जाये उन्हें मजबूती से केद कर लो (पेज ८१७ ,पारा २६ ,सूरा ४७ की चोथी आयत ) 4............निश्चित रूप से काफिर मुसलमानों के खुले दुश्मन है (इस्लाम में भाई चारा केवल इस्लाम को माननेवालों के लिए है ) (पेज १४७ पारा ५ सूरा ४ की १०१वि आयत ) .........................क्या यही है अमन का सन्देश देने वाले देने वाले इस्लाम की तस्वीर इसी से प्रेरित होकर ७१२ में मोह्हम्मद बिन कासिम ,१३९८ में तेमूर लंग ने १७३९ में नादिर शाह ने १-१ दिन मै लाखो हिन्दुओ का कत्ल किया ,महमूद गजनवी ने १०००-१०२७ में हिन्दुस्तान मै किये अपने १७ आक्रमणों मै लाखो हिन्दुओ को मोट के घाट उतारा मंदिरों को तोड़ा,व साढ़े ४ लाख सुंदर हिन्दू लड़कियों ओरतो को अफगानिस्तान में गजनी के बाजार मै बेच दिया !गोरी ,गुलाम ,खिलजी ,तुगलक ,लोधी व मुग़ल वंश इसी प्रकार हिन्दुओ को काटते रहे और हिन्दू नारियो की छीना- झपटी करते रहे {द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया एस टोल्ड बाय इट्स ओवन हिस्तोरिअन्स,लेखक अच् ,अच् एलियार्ड ,जान डावसन }यही स्थिति वर्तमान मै भी है सोमालिया ,सूडान,सर्बिया ,कजाकिस्तान ,अफगानिस्तान ,अल्जीरिया ,सर्बिया ,चेचनिया ,फिलिपींस ,लीबिया ,व अन्य अरब देश आतंकवाद के वर्तमान अड्डे है जिनका सरदार पाकिस्तान है क्या यह विचारणीय प्रश्न नहीं की किस प्रेरणा से इतिहास से वर्तमान तक इक मजहब आतंक का पर्याय बना है ???????????????

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  19. अब तो ब्लोग जेहाद शुरु हो चूका है. हमारी अंजुमन, लखनऊ ब्लोगर एसोसियेशन व इनके मुसलमान सदस्य ब्लोग बना- बनाकर हिन्दू धर्म को गालियाँ दे रहे हैं तथा इस्लाम की सैक्सियत (शरीयत) का खुला प्रचार कर रहे हैं. सैक्सियत के नाम पर चार विवाह करने का लालच देकर पुरुषों को इस्लाम अपनाने के लिए उकसाया जा रहा है. इस्लाम का जन्मदाता देश अरब सैक्सियत की खुली छूट दे चुका है. वहाँ मिस्यार की आड़ में व्यभिचार को सरकार की मान्यता प्राप्त है. अरब एक बड़ा चकला बनकर सामने आया है. मुस्लमान उम्र के नाम पर अपनी बहन बेटियों का मिस्यार करा रहे हैं. हैदराबाद में बूढ़े शेखो को अपनी बेटियां परोसने वाले मुसलमानों से क्या आशा की जा सकती है? जो अपनी बहन - बेटियों को इज्ज़त नीलम करते हों वो भारत माता का क्या सम्मान करेंगे.

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  20. लोकेंद्रजी, आपके लेख का एक-एक शब्द पढने, सोचने और समझाने लायक है. जिस तार्किक ढंग से आपने सेकुलरो की बखिया उधेड़ी है वह लाजवाब है. जाहिर है पंकज मिश्रा जैसे जीवो को तकलीफ होगी ही. लेकिन फ़िक्र न करे ऐसे दम्भी सेकुलरो को लोग जान गए हैं. यदि देश हित और जनहित की बात करने पर कोई सिरफिरा या बिकाऊ सेकुलर हमें फासिस्ट कहे, तो हमें फासिस्ट होने पे गर्व है. चलो भाई हम फासिस्ट ही सही, देश के लिए कम से कम 'अनिष्ट' तो नहीं है. ऐसे ही लिखते रहे.

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  21. सबसे पहले तो वेद व्यथित जी।
    आप सबसे पहले ये बताइए कि आप अपने देश को इतना ही प्रेम करते हैं तो अंग्रेजी में क्यों लिख रहे हैं। हिन्दी या संस्कृत में लिखिए। आप ठीक से अंग्रेजी में भी नहीं लिख पा रहे हैं। किस शब्द की स्पेलिंग क्या होती है। यह समझिए। किसी भाषा के साथ दुष्कर्म मत कीजिए। अपनी भाषा में बात कीजिए तब आइएगा।
    अब हमारे प्यारे सुनील दत्त जी।
    मैंने यह तो नहीं कहा कि संजय दत्त शरीफ हैं। उन्होंने जो अपराध किया था उसके लिए उन्हें सजा मिल चुकी है। देश की न्यायपालिका उन्हें सजा दे चुकी है। अब भी आप संतुष्ट नहीं तो क्या किया जा सकता है। और आप जिन गद्दार नेताओं की बात कर रहे हैं, चुनाव के वक्त आप उन्हीं को वोट देते हैं ना। कौन सा दल है जिसमें गद्दार नहीं। आप क्यों नहीं अपना संगठन बना लेते। बनाइए बगैर गद्दारों का संगठन।
    आप दूसरों का कितना सम्मान करते हैं यह बात आपकी पिछली टिप्पणियां बता रही हैं। और आप कह रहे हैं कि मैं दूसरों को गालियां निकलाते हैं? आप अपनी पिछली टिप्पणियों को देखिए और बताइए कि गाली कौन दे रहा है। कौन कह रहा है कि मुसलामनों को जीने का अधिकार नहीं। मुसलमान आतंकवादी होते हैं। मैंने किसके लिए गाली निकाली बताइए जरा। रही बात सिख बन जाने की। तो धर्म परिवर्तन करके क्या होगा। जो व्यक्ति दूसरों को तकलीफ नहीं समझता वह किसी भी धर्म में चला जाए क्या फर्क पड़ता है। जहां हूं वहीं रहकर इंसानियत के लिए लड़ूंगा जो कोई जो कुछ कर पाए कर ले। मैं धर्म सम्प्रदाय में वैसे भी विश्वास नहीं करता। इंसान हूं और इंसान ही रहूंगा।
    आतंकी हमलों की इंतहा हो चुकी है तो निकलिए सड़क पर और कीजिए आंदोलन। आजाद देश के नागरिक हैं आप। कम्प्यूटर के सामने बैठकर टिप्पणी लिखने से कुछ नहीं होगा। सड़क पर निकलना पड़ता है। बैठे बैठे तो कोई भी लिख देगा।
    आप धैर्य की बात कर रहे हैं। धैर्य है मुझमें, लेकिन धैर्य के नाम पर आप जैसे लोग कायरता का परिचय देते हैं। जल्द कीजिए नहीं तो बहुत देर हो जाएगी।
    बात अगर किसी के ब्लॉग को बहस का मंच बनाने की तो जनाब याद कीजिए इसकी शुरुआत आपने की थी। मैंने तो पंचूजी के ब्लॉग पर सामान्य रूप से अपनी प्रतिक्रिया दी थी। आपने मुझे निशाना बना लिया। जब शुरुआत आपने की थी तो बंद भी आप ही कीजिए। अभी कुछ व्यस्तता चल रही है जल्द ही आपके ब्लॉग पर आकर पूरी बात करूंगा।
    इसके बाद भी बहुत सारी टिप्पणियां आई हैं। मैं उनका जवाब देना नहीं चाहता, क्योंकि जो अपना नाम देकर आपनी बात नहीं रखता मैं ऐसे कायरों से बात नहीं करता। मैदान में आइए और मुखर होकर अपनी बात रखिए, नाम के साथ। आपकी हर एक बात का जवाब दिया जाएगा।

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  22. पंकज जी, आपकी बातों से मैं सहमत नहीं हूं। देश की एकता की बात मैं करता हूं और लगता है आप भी शायद करते ही हैं, लेकिन आपको लगता है कि एक कौम जिस पथ पर है उस से एकता आएगी। अखंडता बनी रहेगी इस देश की। मैं नहीं मानता और न ही इतिहास इसका गवाह है। पन्ने पलटें इतिहास के वो खुद-ब-खुद कह देगा कि ये देश क्यों खण्ड-खण्ड होता जा रहा है। जहां-जहां मुसलमान बहुसंख्यक हुए देश का वह हिस्सा टूट गया। अब आपकी कुछ बातों का जवाब लिख रहा हूं शायद आप सहमत हो जाएं या स्वीकार कर लें-
    - इस देश में १९९२ से पहले भी मुसलमानों ने कायराना हरकत की हैं। पहले उनके पास बम नहीं थे तो तलवारों से ही हत्या करते थे। जोगिन्दर सिंह के अनुसार १९८८ (१९९२ से पहले आता है) से लेकर २००१ तक जम्मू काश्मीर में इस्लामी जेहादियों ने ४७,२३५ खूनी वारदातों को अंजाम दिया। इनमें १५,२४६ आतंकवादी, ११,३७७ सामान्य जन और ४,१०२ सुरक्षाकर्मियों की मृत्यु और १२५ से अधिक सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या की गई।
    - जिन्ना के डायरेक्टर एक्शन प्लान के अंतर्गत १६ से १९ अगस्त १९४६ तक धर्मांध मुसलमानों ने कलकत्ता में २०,००० निरपराध हिन्दुओं की हत्या कर दी थी।
    - १९२१ में जिहादियों ने मोपलाकांड में ५००० से अधिक हिन्दुओं की हत्या कर दी थी। मोपला कांड के चश्मदीद गवाह रहे केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पहले अध्यक्ष और स्वतंत्रता सेनानी माधवन नॉयर अपनी किताब 'मालाबार कलपमÓ में लिखते हैं कि मोपलाकांड में हिन्दुओं का सिर कलम कर थूवूर के कुओं में फेंक दिया गया।
    -गुजरात के अहमदाबाद में पहली बार १८५३ में मुसलमानों ने सांप्रदायिक हिंसा भड़काई थी।
    - प्रसिद्ध पत्रकार तरूण विजय के अनुसार जिहादी उन्मादियों ने गत २० वर्षों में ५०,००० हिन्दुओं की हत्या कर दी और २,००,००० से अधिक लोगों को अपना घर छोडऩे पर मजबूर कर दिया। काश्मीर में जिहाद के कारण तीन लाख काश्मीरी पंडितों को घर से बेदखल कर दिया गया और हजारों की हत्या व हजारों का बलात् धर्मांतरण कर दिया गया।
    - इस्लामी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश में तो उदार व करूणामय (?) मुसलमानों को हिन्दू (कथित दुष्ट जाति जिसके कारण मुसलमानों को घुट-घुट कर जीना पड़ रहा है) से कोई भय नहीं है, लेकिन वहां बेचारे हिन्दुओं की क्या स्थिति है। यह इस्लामिक मानसिकता और स्वभाव को प्रदर्शित करता है।
    बड़ा सवाल- आपके अनुसार १९९२ की घटना से मुसलमान को अथाह दुख पहुंचा। जिसके कारण मुसलमान बम विस्फोटों की घटनाओं में शामिल हुए। तथाकथित एक घाव से मुसलमान इतना आहत है कि हजारों हजार बेगुनाह हिन्दुओं की जान लेने पर उतारू है तो जरा उन हिन्दुओं का सोचो जिनके हृदय पर हजारों हरे घाव हैं... लेकिन उन्होंने ऐसा खून कभी नहीं बहाया जैसे मुसलमान बहा रहे हैं।
    मैं भी चाहता हूं कि दोनों कौम शांति से इस देश में रहे और इसे अपना राष्ट्र मानकर राष्ट्रभक्ति के पथ पर अग्रसर हों ताकि देश विकास कर सके। लेकिन दोस्त ताली एक तरफ से नहीं बजती। जैसे हिन्दू हजारों हजार घाव सहकर भी मित्रता का हाथ आगे किए खड़ा है उसे थामने के लिए मुसलमानों को आगे आना होगा। मुसलमानों को आत्ममंथन करने की जरूरत है कि उन्हें राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए दोषी क्यों ठहराया जाता है? इस कलंक को धोना है हो जो गलत है उसका विरोध करने के लिए उन्हें सड़कों पर उतरना होगा न कि जो गलत है उसके समर्थन में और राष्ट्रद्रोहियों के बचाव में।

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  23. लोकेंद्र जी सबसे पहले तो आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आप दो दिन बाद ही सही, लेकिन मैदान में आए। बेचारे सुनील दत्त जी दो दिन से परेशान थे। अब आप आ गए हैं तो उन्हें शायद कुछ बल मिलेगा।
    आपका कमेंट देखकर लगता है कि शायद आपको इतना डाटा एकत्र करने में इतना समय लग गया। खैर कोई बात नहीं यह तो अच्छा ही है, आपकी भी जानकारी बढ़ी और मेरी भी। साथ ही आपके ब्लॉग पर आने वाले हर शख्स की भी।
    बात आगे की करते हैं। आपने अच्छा डाटा प्रस्तुत किया है। पर आपने यह नहीं बताया कि 1992 के बाद कितने लोग मारे गए। जरा यह भी बताएं। आपने जिन लोगों के मुखारबिंदु से लिखे शब्द यहां लिखे हैं वे सब के बस डकोसलेबाज और साम्प्रदायिक हैं। उनकी बातों में तवज्जो देकर मैं उन्हें इस देश का हीरो बनने नहीं देना चाहता। रही बात एकता की। तो ये बताइए आप अपने ब्लॉग के माध्यम से क्या कर रहे हैं। क्या लिख रहे हैं। क्या इससे एकता आएगी। किसी का खून भड़काकर कर एकता लाई जा सकती है। आप मुझे एक तमाचा मारिये , मैं आपके एक तमाचा मारूंगा आप फिर मुझे मारिए, मैं फिर आपको मारूंगा। यही चलता रहेगा। इससे एकता आएगी। सभी लोग खुश रहे सकेंगे। पता नहीं आप कैसे एकता लाने की बात कर रहे हैं। जितनी भी साम्प्रदायिक ताकतें हैं देश की जनता ने उन्हें जवाब दे दिया है। पिछले दो लोकसभा चुनावों से उन्हें कैसी मुंह की खानी पड़ रही है। यह आप देख ही रहे हैं। भारत में कभी भी साम्प्रदायिक ताकतें राज नहीं कर सकती। एक आध बार गलती हो गई थी तो उन्होंने राज कर लिया। यह बात उन ताकतों को भी समझ आ गई है। इसलिए आडवाणी जिन्ना की तारीफ करते हैं और जिन जिन्ना को अच्छा बताने पर जसवंत सिंह को पार्टी से निकाला गया था उन्हें बाइज्जत वापस पार्र्टी में लाया जाता है। यह साम्प्रदायिक ताकतों की हार है।
    आप लिखते कुछ और करते कुछ और हैं। आप लिखते हैं कि मैं भी चाहता हूं कि सभी कौमें शांति से रहें। आपके लेख से तो ऐसा नहीं लगता। ऐसा लगता है कि मुसलमानों को देश से निकला देना चाहिए। पता नहीं आप किस शांति की बात कर रहे हैं।
    अगर मुसलमानों को आत्म मंथन करने की जरूरत है तो हिन्दू भी आत्ममंथन करें। एक समय पर सभी को आत्म मंथन की जरूरत होती है। आप खुद और अपने आसपास के लोगों से कहें कि वे आत्ममंथन करें। मुसलमान भी चाहते हैं कि देश प्रगति के पथ पर अग्रसर हो, कुछ मुसलमान अगर गलत करते हैं उसकी सजा पूरी कौम क्यों भुगते। कुछ लोगों को विरोध कीजिए मैं आपके साथ हूं पर पूरी कौम को गलत कहेंगे तो आज नहीं मैं हमेशा आपका और आपके जैसे लोगों का विरोध करता रहूंगा। आप अगर कहेंगे कि हिन्दू दूध का धुला है औ मुसलमान चोर और आतंकी है तो यह गलत है और गलत रहेगा।

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  24. लोकेन्द्र जी धन्यवाद ... बिलकुल सटीक और सार्थक विश्लेषण.

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  25. कुछ लम्बी-लम्बी टिप्पणी देखकर आश्चर्य भी हुआ की कैसे कुछ भारतीय सेकुलर लोग एक-तरफ़ा बात किये जा रहे हैं. ऐसे लोग ढेर सारी बात भूल कर बस एक रत लगाये रहते हैं की मुसलामानों के साथ अन्याय हो रहा है. विश्व में एक्का-दुक्का गैर इस्लामिक राष्ट्र ही होंगे जो इस्लामिक आतंकवाद से पीड़ित नहीं होगा, शायद वहां भी कोई बाबरी मस्जिद जैसा कुछ हुआ रहेगा जिसका ज्ञान हमें नहीं?

    * किसी भी इस्लामिक राष्ट्र के ले लीजिये गैर इस्लामियों की सख्या दिन-बी-दिन घट रही हैं चाहे वो पाकिस्तान हो या बंगला देश . और हमारे देश में इस्लामिक आबादी दिन-दुनी रात चौगुनी बढ़ रही है.
    * शायद ही कोई इस्लामिक राष्ट्र हो जहाँ हज के लिए सरकार पैसे नहीं देती हो, हमारे देश गर्व से हज के लिए सरकार पैसे देती है.
    * अपने ही देश में मुसलामानों को धर्म के नाम पे आरक्षण की सुरुआत हुई है.
    * देश के कई ऐसे प्रान्त हैं जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक ना होते हुए भी मुस्लिम मुख्यमंत्री हुए हैं, रास्ट्रपति तक हुए हैं. पर जम्मू-कश्मीर में हिन्दू मुख्यमंत्री की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.
    * सड़कों पे नमाज पढने के लिए पूरा ट्राफिक रोक दिया जाता है. इस्लामिक रास्ट्र में भी ऐसा शायद ही कहीं होता होगा.
    .......

    फिर भी कहते हैं मुसलामानों के साथ अन्याय हो रहा है ... क्या कहें

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  26. शायद ओसामा बिन लादेन और अन्य इस्लामिक आतंकवादी भी १९९२ के बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद ही ज्यादा सक्रीय हुए होंगे, क्यूँ?

    पंकज मिश्रा जी इसमें कोई शक नहीं की भारत में मुसलामानों का समुचित विकास नहीं हुआ है ... पर मुसलामानों के साथ-साथ हिन्दुओं या सिक्खों या बोद्ध धर्मावलम्बियों का भी समुचित विकास नहीं हुआ है. अन्य धर्मावलम्बियों ने जहाँ विकास के लिए स्कूलों, कोलेजों की राह पकड़ अपना विकास कर रहे हैं वही मुसलामानों को मुल्ला और सेकुलर नेताओं ने मदरसे में ही रखा. आज भी मुसलामानों को वोट बैंक बना कर रखा गया है ताकि सेकुलर अपनी रोटी सेंकते रहें.

    ये कहना सरासर गलत है की मुसलामानों के साथ भारत में नाइंसाफी हो रही है |

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  27. Amal Srivastava.. New Delhi...1 जुलाई 2010 को 1:37 am

    aap ki soch se mai 100 pratisat sahmat hu .jyada kuch n kahte hue bus itna kahna chahuga ki isme bhi kahi n kahi galti hmari he hai hm napunsak hote ja rhe hai.agr ab bhi hindu yuva na chete to ye desh se jald he hindu ka astitv mit jayega...meri subhkamnaye aap k sath hai aap apni lekhni is prakar he tej krte rhe..

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  28. पंकज जी , आप जैसे हिदुओं के रहते किसी मुस्लिम आतंकवादी की इस देश को क्या जरुरत है ?आप को सादर नमन

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  29. जितेन्द्र दवे, मुम्बई1 जुलाई 2010 को 5:00 pm

    सिंह साहब,
    जय माताजी,
    सबसे पहले तो मैं आपके 'सिंह-सामान' साहस को सलाम करता हूँ.
    आज जब देशद्रोह और हिन्दू-द्रोह को ही सेकुलरिज्म मानने का फेशन चल पडा है, ऐसे में राष्ट्रहित और जनहित की बात करना घोर पाप हो गया है. आज हमारा मीडिया और तथाकथित बुद्धीजीवी किस विचित्र दुनिया में जी रहे हैं, उससे आप वाकिफ हैं. अब तो प्रात: स्मरणीय पृथ्वीराज चौहान, राणा प्रताप और शिवाजी और श्री रामचंद्र जी जैसे प्रखर राष्ट्र नायको का चरित्र हनन करना सेकुलरिज्म हो गया है. तुगलक, तैमूरलंग और औरंगजेब का महिमा मंडन करना सेकुलरिज्म हो गया है. इसी कारण संसद बचाते हुए अपनी जान गंवाने वाले रण बाँकुरे नानकचंद की विधवा दर-दर भटक रही है. और अफजल गुरू सरकारी दामाद बनकर बिरयानी खा रहा है. महेशचंद्र शर्मा देश के लिए शहीद होकर भी अपमानित होते है. और वोटो के कारण अमरसिंह और दिग्गी राजा जैसे जयचंद आतंकियों के घर सिजदा करने जाते हैं.
    आज हर कोई ऐरा-गैरा पत्रकार-लेखक खुद को सेकुलर-प्रगतिशील साबित करने के लिए हिन्दुस्तान के प्रतीकों, हितो और मान्यताओं के खिलाफ अपनी कलम भांज रहा है.
    ऐसे में आप जैसे कलमकार आशा की किरण जगाते हैं. आप ने बेहद धारदार तरीके से मुद्दों को छुआ है. अच्छी पोल खोली है आपने सेकुलर जमात की.
    आपकी शैली और रिसर्च दोनों ही लाजवाब है. निरंतरता बनाए रखे. क्योंकि आपको बार-बार पढने को मन करता है.
    सादर शुभकामनाये.

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  30. you are absolutely right but...hindu ko samajh hi nahi aata.

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  31. I find some of the words/sentences used in your article too harsh to read..................

    I am an Indian, A hindu and a Brahmin..... and have no hatred towards Muslims.... their contribution towards nation building is no less than any Hindu........

    The problem with mindset like your's is, you start using one Abdulla or Imam Bukhari as the SOUND of entire Muslim population.................thats ridiculous....and absurd ......

    We have millions of Muslims who love this country and are doing their bit to make it stronger... Don't start colouring everyone with same paint............................ If this new generation of our's start thinking this way, we'll never come-out of this black era...........

    Hanging Afzal is a politically sensitive issue, you cant deny it, because Kashmir is reeling under severe voilence and this hanging may act as an catalyst.....

    Mr. Omar Abdulla as a CM has huge responsibilities, and unlike us he cant just sit in swanky office and type anything and everyhting on hi laptop............... he has to think about all the issues..................so plz dont blame him..........

    I am no journalist, nor a social worker, i am young (27) working professional who likes to see a new India with upward mindset, an India where people live together in peace..........

    Lets live like friends ....and respect each other's religion and believes!!!!

    Thank You...

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  32. अब तो लगता है पंकज मिश्रा जी परेशान हो गए और मैदान छोड़ कर भाग गए.

    वैसे no politics जी ने बिलकुल सही कहा है - "पंकज जी, आप जैसे हिदुओं के रहते किसी मुस्लिम आतंकवादी की इस देश को क्या जरुरत है ?"

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  33. अब तो लगता है पंकज मिश्रा जी परेशान हो गए और मैदान छोड़ कर भाग गए.

    वैसे no politics जी ने बिलकुल खरी बात कही है - "पंकज जी, आप जैसे हिदुओं के रहते किसी मुस्लिम आतंकवादी की इस देश को क्या जरुरत है?"

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  34. कहना तो नहीं चाहता था, लेकिन गुरुजी(पंकज जी) के समझाए हुए सिद्धांतों की मर्यादा के लिए मुझे जवाब देना पड़ रहा है।
    कमाल है पंकज जी आप बौद्धिक हो गए ..........? धन्यवाद आप देश के अन्य छद्म पंथ निरपेक्ष लोगों की ही तरह समदर्शी होने का गुण ही खो बैठे, जबकि पत्रकार को समदर्शी होना चाहिए। आप ने बुद्धिजीवी बनने में इतनी जल्दबाजी दिखाई की मुद्दा तो भूल गए औरों की तरह एक पंथ विशेष के पैरोकार बन गए, जबकि आपसे आशा थी कि आप नीर क्षीर के विवेक के साथ विश्लेषण करेंगे, आप तो छद्म बौद्धिकों की तरह आस्था (राम) पर ही तोहमत लगाने लगे, जबकि मैंने अपनी पोस्ट पर किसी मुद्दे की मीमांसा समय और परिस्थितियों के आलोक में करने का आग्रह किया था। लेकिन आप तो इतनी जल्दबाजी में थे, कि इतिहास को झुठलाने के चक्कर में आस्था से भी भिड़ गए।
    आपने अपनी पोस्ट में बताया है कि भारत विश्व में अपनी एकता अखंडता के लिए जाना जाता है, लेकिन कुछ चीजों को आप भूल गए कि एकता के लिए एक तरफा प्रयास किया जा रहा है। पीओके और अक्साई चीन हमारी अखंडता को मुंह चिढ़ाते हैं। एक चीज और कि हम जख्म सहने के लिए विश्व में प्रसिद्ध हैं, जिन आतंकियों की तरफदारी आप कर रहे हैं वही कहते हैं कि हम अपनी कायरता के लिए प्रसिद्ध हैं। वैसे हम भारत के सभी इस्लाम धर्मावलंबियों की बात नहीं कर रहे हैं, क्योंकि हर वर्ग में अच्छे बुरे लोग रहते हैं, लेकिन इस डर से कि सच कह देने से तथाकथित पंथनिरपेक्ष और विद्वान मुझे सांप्रदायिक कहेंगे, मैं सच को नहीं कह कर अन्याय का साथ दूं मुझे हिंदू धर्म ने नहीं सिखाया। रही अभिव्यक्ति की आजादी की बात तो आप तो विद्वान आप क्यों बौखला गए आप को प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया करने जरूरत क्यों पड़ी ? कसाब की बात पर यदि सब काम कानून से होना है तो इनके तरफदार ठेकेदार क्यों बनने लगते हैं? दंगा किसी कौम को नहीं देखता पीड़ा, बेकारी भुखमरी जाति और वर्ग पूछकर नहीं आती, उत्पात दोनों पक्षों के 'राक्षसÓ लोग मचाते हैं फिर किसी वर्ग के एक आंसू पर सारे विद्वान बेजार हो उठते हैं और दूसरे के आंसुओं में डूबने पर भी लोगों का दिल क्यों नहीं रोता, उनमें सच कहने का साहस क्यों नहीं आता और गोधरा का उदाहरण आपने दिया वहां क्या हुआ क्या आप भी भूल गए? जिनको आप कोस रहे हैं उनमें से कितनों ने उनका साथ दिया क्या बहुसंख्यक होना अपराध है क्या केवल इसी देश में कोई वर्ग बहुसंख्यक है? पाकिस्तान में क्या होता है आपको नहीं मालूम, लादेन कौन है आपको क्या याद नहीं? क्या वीर अब्दुल हमीद को हम सम्मान नहीं देते या अभी हाल में पाकिस्तान सीमा के अंदर दीवार किस तरह से रंगे गए हैं आप ने खबर नहीं पढ़ी वो किस सहिष्णुता का उदाहरण है। हमारे देश में अल्पसंख्यकों के पक्ष में बोलने वालों की कमी नहीं बल्कि कई बार होड़ में बहुसंख्यक नेपथ्य में चले जाते हैं। आपने पूछा कि १९९२ से पहले कितने बिस्फोट हुए, कितने कत्लेआम हुआ। जब आतंकियों की पहुंच में जिस तरह के हथियार थे उनसे इन्होंने मानवता का कत्लेआम किया है, क्या सीधी लड़ाई के बाद कत्लेआम किसने शुरू किया स्वतंत्रता के बाद कत्लेआम कौन भूल सकता है? जुर्म की इंतहा भी होती है और प्रतिक्रिया भी, यही नहीं इसके और भी उदाहरण हैं। रूढिय़ां सभी धर्मों में आती हैं लेकिन हमारा धर्म उसमें सुधार की गुंजाइश देता है और दूसरे में नहीं। दलितों से भेदभाव की बात की तो यह भी उस समय के तथाकथित बौद्धिकों ने यह जहर समाज में घोला था, राम ने तो शबरी (दलित) के झूठे बेर खाए थे, सीता मां के लिए टिप्पणी की थी तो यह की राम ने जनता के लिए अपनी प्यारी पत्नी का त्याग किया था और जाहिर है जनता शब्द एक-दो या समाज के किसी छोटे टुकड़े का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वैसे आप मेरे लिए श्रद्धेय हैं मैं व्यक्ति के तौर पर वरिष्ठ के तौर पर लेकिन नमन के साथ आपका जवाब दूंगा जरूर.........

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  35. कहना तो नहीं चाहता था, लेकिन गुरुजी(पंकज जी) के समझाए हुए सिद्धांतों की मर्यादा के लिए मुझे जवाब देना पड़ रहा है।
    कमाल है पंकज जी आप बौद्धिक हो गए ..........? धन्यवाद आप देश के अन्य छद्म पंथ निरपेक्ष लोगों की ही तरह समदर्शी होने का गुण ही खो बैठे, जबकि पत्रकार को समदर्शी होना चाहिए। आप ने बुद्धिजीवी बनने में इतनी जल्दबाजी दिखाई की मुद्दा तो भूल गए औरों की तरह एक पंथ विशेष के पैरोकार बन गए, जबकि आपसे आशा थी कि आप नीर क्षीर के विवेक के साथ विश्लेषण करेंगे, आप तो छद्म बौद्धिकों की तरह आस्था (राम) पर ही तोहमत लगाने लगे, जबकि मैंने अपनी पोस्ट पर किसी मुद्दे की मीमांसा समय और परिस्थितियों के आलोक में करने का आग्रह किया था। लेकिन आप तो इतनी जल्दबाजी में थे, कि इतिहास को झुठलाने के चक्कर में आस्था से भी भिड़ गए।
    आपने अपनी पोस्ट में बताया है कि भारत विश्व में अपनी एकता अखंडता के लिए जाना जाता है, लेकिन कुछ चीजों को आप भूल गए कि एकता के लिए एक तरफा प्रयास किया जा रहा है। पीओके और अक्साई चीन हमारी अखंडता को मुंह चिढ़ाते हैं। एक चीज और कि हम जख्म सहने के लिए विश्व में प्रसिद्ध हैं, जिन आतंकियों की तरफदारी आप कर रहे हैं वही कहते हैं कि हम अपनी कायरता के लिए प्रसिद्ध हैं। वैसे हम भारत के सभी इस्लाम धर्मावलंबियों की बात नहीं कर रहे हैं, क्योंकि हर वर्ग में अच्छे बुरे लोग रहते हैं, लेकिन इस डर से कि सच कह देने से तथाकथित पंथनिरपेक्ष और विद्वान मुझे सांप्रदायिक कहेंगे, मैं सच को नहीं कह कर अन्याय का साथ दूं मुझे हिंदू धर्म ने नहीं सिखाया। रही अभिव्यक्ति की आजादी की बात तो आप तो विद्वान आप क्यों बौखला गए आप को प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया करने जरूरत क्यों पड़ी ? कसाब की बात पर यदि सब काम कानून से होना है तो इनके तरफदार ठेकेदार क्यों बनने लगते हैं? दंगा किसी कौम को नहीं देखता पीड़ा, बेकारी भुखमरी जाति और वर्ग पूछकर नहीं आती, उत्पात दोनों पक्षों के 'राक्षसÓ लोग मचाते हैं फिर किसी वर्ग के एक आंसू पर सारे विद्वान बेजार हो उठते हैं और दूसरे के आंसुओं में डूबने पर भी लोगों का दिल क्यों नहीं रोता, उनमें सच कहने का साहस क्यों नहीं आता और गोधरा का उदाहरण आपने दिया वहां क्या हुआ क्या आप भी भूल गए? जिनको आप कोस रहे हैं उनमें से कितनों ने उनका साथ दिया क्या बहुसंख्यक होना अपराध है क्या केवल इसी देश में कोई वर्ग बहुसंख्यक है? पाकिस्तान में क्या होता है आपको नहीं मालूम, लादेन कौन है आपको क्या याद नहीं? क्या वीर अब्दुल हमीद को हम सम्मान नहीं देते या अभी हाल में पाकिस्तान सीमा के अंदर दीवार किस तरह से रंगे गए हैं आप ने खबर नहीं पढ़ी वो किस सहिष्णुता का उदाहरण है। हमारे देश में अल्पसंख्यकों के पक्ष में बोलने वालों की कमी नहीं बल्कि कई बार होड़ में बहुसंख्यक नेपथ्य में चले जाते हैं। आपने पूछा कि १९९२ से पहले कितने बिस्फोट हुए, कितने कत्लेआम हुआ। जब आतंकियों की पहुंच में जिस तरह के हथियार थे उनसे इन्होंने मानवता का कत्लेआम किया है, क्या सीधी लड़ाई के बाद कत्लेआम किसने शुरू किया स्वतंत्रता के बाद कत्लेआम कौन भूल सकता है? जुर्म की इंतहा भी होती है और प्रतिक्रिया भी, यही नहीं इसके और भी उदाहरण हैं। रूढिय़ां सभी धर्मों में आती हैं लेकिन हमारा धर्म उसमें सुधार की गुंजाइश देता है और दूसरे में नहीं। दलितों से भेदभाव की बात की तो यह भी उस समय के तथाकथित बौद्धिकों ने यह जहर समाज में घोला था, राम ने तो शबरी (दलित) के झूठे बेर खाए थे, सीता मां के लिए टिप्पणी की थी तो यह की राम ने जनता के लिए अपनी प्यारी पत्नी का त्याग किया था और जाहिर है जनता शब्द एक-दो या समाज के किसी छोटे टुकड़े का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वैसे आप मेरे लिए श्रद्धेय हैं मैं व्यक्ति के तौर पर वरिष्ठ के तौर पर लेकिन नमन के साथ आपका जवाब दूंगा जरूर.........

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  36. पंकज जी कौन ढकोसलावादी है तरूण विजय जैसे पत्रकार या फिर रामधारी दिनकर या फिर पूर्व सीआईडी प्रमुख जोगिंदर सिंह या फिर कांग्रेस केरल के माधवन नॉयर? मैंने सभी की बात को रखा। हो सकता है बाकी के नामों पर सेक्यूलरों की तरह आपको आपत्ती हो। आप भी उनकी सही बात को गलत मानकर चलते हों। लेकिन दोस्त रामधारी सिंह दिनकर को तो आप ढकोसलावादी और सांप्रदायिक नहीं कह सकते। और आपने लिखा की एक चांटा वो मारे तो दूसरा तुम मारो ऐसे तो आ गई एकता, लेकिन दोस्त ऐसे भी तो नहीं आ सकती कि एक चांटे पर चांटा मारता रहे और दूसरा सहता रहे। हिंदुओं ने तो उनके दिए हजारों दंश झेले हैं, फिर भी दोस्ती का पैगाम देते हैं, लेकिन वे कहां सुनते हैं। मैंने तो अपनी पूरी पोस्ट के माध्यम से यह अपील की थी कि- जो सच्चे मुसलमान हैं वे सही बात के लिए सड़कों पर उतरें। जैसे कट्टरपंथी (जिन्हें आप चंद लोग मानते हैं) देश और समाज तोडऩे के लिए सड़कों पर उतरते हैं, वैसे देश और समाज जोडऩे के लिए, गलत बात का विरोध करने के लिए ये उदारवादी और सद्चरित्र मुसलमान क्यों सामने नहीं आते? मेरी अपील है मुसलमानों को राष्ट्र विरोध कामों और बातों का विरोध करने के लिए सामने आना पड़ेगा वरना एकता संभव नहीं दिखती.....

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  37. भई वाह। क्या कहने। सबसे पहले तो लोकेंद्र जी को बधाई कि उन्होंने एक ऐसी पोस्ट लिखी, जिस पर लोग टिप्पणी पर टिप्पणी दे रहे हैं। कुछ लोगों के पास कोई काम नहीं है तो वे इसी में मजा ले रहे हैं।
    कुछ लोग यहां टिप्पणी करके ही देश भक्त होने का तमगा हासिल कर लेना चाहते हैं। कुछ लोग टिप्पणी करके अपनी भड़ास निकाल रहे हैं तो कुछ बिंदुवार वर्णन करके यह जता रहे हैं कि वे बहुत विद्वान हैं। कुछ लोगों की शुद्ध हिन्दी लिखनी नहीं आती, लेकिन देश की बात करते हैं, कुछ लोग अंग्रेजी में हिन्दुस्तानी होने की बात कहते हैं। कुछ लोग बिना अपना नाम बताए ही कायरों की भांति टिप्पणी कर रहे हैं और कह मुझे चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। इनके लिए मैं इतना ही कहूंगा पहले ठीक से लिखना सीखों, हिंदी में लिखना सीखो और अपना नाम लिखकर खुलकर सामने आओ। मैं कायरों की बात का कोई जवाब नहीं देता।
    बात जहां तक मुसलमानों की पैराकारी का है। कई लोगों ने यह बात ठीक ही लिखी है कि मैं उनकी तरफदारी कर रहा हूं। अगर मुझ जैसे लोग न होते तो आप लोग अभी तक मुसलमानों के साथ पता नहीं क्या कर चुके होते। है दम तो उन पर अंगुली उठाकर दिखाइये। अंगुली नहीं पूरा हाथ तोड़ दिया जाएगा। एक आदमी की वजह से पूरी कौम पर बदनुमा दाग मैं नहीं लगने दूंगा। कभी नहीं। जिन लोगों ने इस बात का वर्णन किया है कि मुसलमानों को हिन्दुस्तान में बहुत सारी सहूलियतें दी जा रही हैं उनसे मैं यही कहना चाहूंगा कि देश की तरक्की मेें मुसलमानों का भी पूरा हाथ है, इसलिए सरकार उन्हें सुविधा देकर कोई अहसान नहीं कर रही। केवल हिन्दुओं की बदौलत देश आज शिखर पर नहीं पहुंच गया। जो लोग कह रहे हैं कि मेरे रहते देश को आतंकियों की क्या जरूरत, वे यह सुन लें कि आतंकी उन्हीं की मानसिकता की वजह से पैदा हो रहे हैं। ओसामा बिद लादेन और अलकायदा ने 1992 से पहले भारत को निशाना नहीं बनाया, उनकी लड़ाई अमेरिकियों से है वे निपटें। एक बात और मैं लगातार कह रहा हूं और फिर कह देना चाहता हूं कि मैं आतंकियों की पैरवी नहीं कर रहा। मैं मुसलमानों की पैरवी कर रहा हूं। जिसने गलत काम किया है उन्हें सजा मिलनी चाहिए और कानून उन्हेंं दंडित कर भी रहा है। शोर मचाने से कुछ नहीं मिलने वाला।
    प्रवीण जी की बात करें तो वे लगता है किसी रौ में बह गए हैं। जो कहना चहते थे कह नहीं पाए। वे अच्छा लिखते हैं अच्छा विश्लेषण करते हैं लेकिन इस बार लगता है कहीं भटक गए। राम ने सबरी के यहां बेर खाए तो राहुल गांधी और नितिन गडकरी भी दलित के यहां खाना खाते हैं तो क्या वे भी भगवान हो गए। सवाल तो मैंने बहुत किए थे पर उन्होंने सिर्फ एक का ही जवाब दिया है। जिस राम को अपनी पत्नी पर भरोसा नहीं वह किस पर भरोसा करेगा। वह तो घट घटवासी है। सब कुछ जानता है, अंतरयामी है। वह यह नहीं जान पाया कि मेरी पत्नी सही कह रही है या गलत। जिसने इतने दिनों तक रावण की लंका में रहकर मेरा इंतजार किया वह मेरे द्वारा ठुकराने पर कहां जाएगी। ऐसा भगवान होता है। मुझे तो नहीं लगता, होता हो तो भई आपको मुबारक।
    अंत में एक बात। गलत काम का विरोध करना चाहिए लेकिन उस गलत काम के लिए किसी कौम को बदनाम मत कीजिए। जिसे भी मैदान में आना हो तर्क के साथ अपना नाम बता कर आए स्वागत है, लेकिन कायरों का जवाब इस ब्लॉग पर नहीं दिया जाएगा।

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  38. लोकेंद्र जी। किस तरुण विजय की बात कर रहे हैं। वे कितने बड़े पत्रकार हैं आप भी जानते हैं और मैं भी। किसी एैरी गैरी मैग्जीन के संपादक हो जाने से कोई पत्रकार नहीं हो जाता। ऐसे मैग्जीन और अखबार निकालने वाले पत्रकार और सम्पादक देश में हजारों नहीं बल्कि लाखों होंगे। सबकी बात को इतनी तबज्जो दी जाने लगी तो हो गया कल्याण। जोगिन्दर सिंह। क्या किया उन्होंने। आप और पूरा देश जिस भोपाल गैसकांड की त्रासदी आज झेल रहा है उसमें उनकी भी संलिप्ता पाई गई है हालांकि अभी स्पष्ट नहीं है फिर भी नाम तो आ ही रहा है। किसी अखबार में बड़ी बड़ी बात लिख देने से कुछ नहीं होता। यह देखिए कि वे कितने पाक साफ हैं। केरल कांग्रेस के माधवन साहब क्या बेचते हैं मैं नहीं जानता। ऐसे पता नहीं कितने लोग हैं। बात जहां तक दिनकर जी की है, कवि तो कवि होता है। वह सबकी बात रखता है। जब दिनकर जी ने यह बात कही होगी तब की स्थितियों में और आज की स्थितियों में बहुत फर्क आ चुका है। आज कौन सा महान कवि है जो मुसलमानों के बारे में ऐसी टिप्पणी करता है। यह मत कहिएगा कि आज कोई उस स्तर का कवि नहीं है। हर जगह कोई न कोई अपवाद होता है दिनकर जी हो भी गए तो क्या आपको मुसलमानों को गाली देने का हक मिल गया।
    हिन्दुओं ने हजारों दंश झेले हैं तो क्या मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों ने नहीं झेले। आप मुसलमानों से अपील कर रहे हैं कि वे सड़कों पर उतरें। गर्मी के दिनों में एसी में कुर्सी पर बैठकर कम्प्यूटर पर लिखकर। आप कभी सड़कों पर उतरे। क्या किया है आपने अपने देश, सम्प्रदाय और इंसानियत के लिए। कट्टरपंथी अगर सड़क पर उतरते हैं तो क्या उनके प्रयास के देश टूट गया। अगर ऐसा होता तो अब तक देश के इतने टुकड़े हो गए होते कि आप गिन भी नहीं पाते। आप मुसलमानों से सारी उम्मीद करते हैं खुद क्यों नहीं कुछ करते। कुर्सी पर बैठकर लिखना छोडि़ए और निकलिए तिरंगा लेकर आतंकियों के विरोध में। अगर आपको मेरा सहयोग न मिला तो कहिएगा।

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  39. पंकज जी, माफ करना दोस्त मैं एसी में बैठकर नहीं लिखता और मैंने देश के लिए क्या किया और कब-कब सड़कों पर उतरा हूं, इसकी लिस्ट मैं न तो आपको देना चाहूंगा और न किसी और के मेरी देशभक्ति पर अंगुली उठाने पर दूंगा। मैं जो करता हूं गाने-बगाने के लिए नहीं करता। खैर छोडि़ए, आप तर्कों से परे चले जाते हैं... बात समानता की कीजिए तो ठीक है। अगर इस देश में हिन्दुओं जितने प्रहार मुसलमानों पर होते तो उनकी जनसंख्या भारत में दिन-दूनी और रात-चौगनी नहीं बढ़ती। मुसलमानों के देश में हिन्दुओं की क्या गत होती है इसका विश्लेषण करना है तो पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं की जनसंख्या का विश्लेषण कर लीजिए। हर किसी की बात को आप खारिज कर रहे हैं, जो हिन्दुओं की बात करे वो आपके लिए ऐरा-गैरा हो गया, चाहे रामधारी सिंह दिनकर जैरा कवि ही हो।
    ..... आप उनको सड़कों पर उतरने से क्यों रोकना चाहते हो वहीं मुझे और अन्य टिप्पणीकारों को सड़कों पर उतरने का आह्वान कर रहे हो। अगर वो अच्छे काम के लिए आगे आते हैं तो आप भी उनके आगे आगे चलना और मैं भी चलूंगा साथ में।
    ..... रही बात यह कि अगर आप जैसे लोग उनकी पैरवी न कर रहे होते तो हिन्दुस्तान के हिंदुओं ने उनके साथ न जाने क्या कर दिया होता, तो हिन्दु उनकी तरह निर्दयी नहीं है।

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  40. पंकज मिश्र जी आपके द्वारा कहे गए कुछ बातों पे मेरे कुछ सवालों का उत्तर देने की कोशिश कीजियेगा -
    "कुछ लोग यहां टिप्पणी करके ही देश भक्त होने का तमगा हासिल कर लेना चाहते हैं। कुछ लोग टिप्पणी करके अपनी भड़ास निकाल रहे हैं तो कुछ बिंदुवार वर्णन करके यह जता रहे हैं कि वे बहुत विद्वान हैं।"
    सवाल : जनाब ज़रा ये बताने की कृपा करेंगे की आप क्या हासिल करना चाहते हैं यहाँ? सबसे ज्यादा विद्वता तो आप अपनी झाड रहे हैं.

    "कुछ लोगों की शुद्ध हिन्दी लिखनी नहीं आती, लेकिन देश की बात करते हैं, कुछ लोग अंग्रेजी में हिन्दुस्तानी होने की बात कहते हैं।"
    सवाल: मिश्रा जी तो क्या जिन्हें (लाखों - करोड़ों लोग) शुद्ध हिन्दी लिखनी नहीं आती वो देश के बारे में बात नहीं कर सकते? देश के शासक सोनिया मैडम, राहुल गांधी, प्रणव दा, मन मोहन जी किसी को शुद्ध हिन्दी लिखनी-बोलनी नहीं आती.... एक पत्राकार होने के नाते उनसे क्यूँ नहीं कहते की चुकी आपको शुद्ध हिंदी नहीं आती इसलिए आपको देश के बारे में बात करने का आधिकार नहीं?

    "किस तरुण विजय की बात कर रहे हैं। वे कितने बड़े पत्रकार हैं आप भी जानते हैं और मैं भी"
    ये वही तरुण विजय हैं जिनके आलेख देश के लगभग सभी पड़े पत्र-पत्रिकाओं (Times Of India, दैनिक जागरण, जनसता......) में छपते रहे हैं. पंकज जी, तरुण जी पे ऊँगली उठाने से पहले आप अपनी गिरेबान तो झांक लेते ..... चलिए लगे हाथों ये भी बता दीजिये की आप कितने बड़े पत्रकार है, थोड़ा परिचय तो दे दीजिये...

    मिश्र जी आपकी भाषा से तो यही प्रतीत हो रहा है की आप अपना आपा खो कर टिप्पणी कर रहे हैं....

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  41. "गर्मी के दिनों में एसी में कुर्सी पर बैठकर कम्प्यूटर पर लिखकर। आप कभी सड़कों पर उतरे। क्या किया है आपने अपने देश, सम्प्रदाय और इंसानियत के लिए। .."
    सवाल : भाई साहब आप ये बताने का कस्ट करेंगे की आपने अपने देश, सम्प्रदाय और इंसानियत के लिए क्या-क्या किये हैं? आखिर "एसी में कुर्सी पर बैठकर कम्प्यूटर पे लिखने वालों से इतनी चिड कैसी? आप भी तो कुर्सी पर बैठकर कम्प्यूटर पे लिख रहे होंगे (एसी का पता नहीं), क्यूँ?

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  42. Lokendraji,

    Sabse Badi kami Hum "Hinduon" me hai.. ahamre Gharo me "VIBHISHAN" baite hai jo Bharat roopi lanka dhahane ka kaam kar rahe hai..
    Fir bhi EK JABARDAST LEKH..

    AAPKO BADHAI HO...

    Shadhuvaad---

    (Hindutvaa & Rastravaad)
    JAI HIND, JAI HINDU...

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  43. @ Lokendraji,

    ये हमारे देश कि "तुरीन और सेकुलर" रीढ़ विहीन सरकार कि नपुसंकता ही है कि जिसे देखो इस देश में घुसा चला आ रहा है.. लेकिन दुःख इस बात का है कि कुछ "हिन्दू नेता" भी भारत बेचने कि इस " इटली कि बेटी" कि मुहीम में शामिल हो गए.. लेकिन लोकेन्द्र जी हममें से किसी न किसी को इसके खिलाफ आवाज़ उठानी पड़ेगी..

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  44. अफजल की फांसी के विरोध के लिए मुसलमानों को लपेटना गलत है. ऐसे अनेक हिंदू विचारकों ने जो कांग्रेस में नहीं हैं वरन स्वतंत्र पत्रकार हैं अफजल की फांसी का विरोध किया. इन में से वे तमाम हिंदू वकील भी थे जिन्होंने कहा कि अफज़ल को बहुत सस्ता सरकारी वकील मिला जब कि एस.ए.आर गिलानी का मुकदमा राम जेठमलानी ने लड़ा. अफज़ल के मुक़दमे की कानूनी समीक्षा भी हिंदू वकीलों ने की जिन्होंने ने मुक़दमे से कई मीन-मेख निकले. सो आप मुसलमानों को ही फांसी विरोधी लोगों में क्यों गिनते हैं? (क्रमशः)

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  45. हमारे देश में ऐसी कई मिसालें हैं जिन में खतरनाक मुजरिमों को राजनयिक या राजनीतिक कारणों से छोड़ा गया. बताइये, चार्ल्स शोभराज को क्यों छोड़ा गया जबकि वह कई लोगों के क़त्ल व अनेक धोखाधादियों का मुजरिम था? जब पुरुलिया में हवाई जहाज़ से हथियार गिरे तो छः विदेशी जेल में ठूंस दिए गए. लेकिन कुछ तो बीमारी के बहाने कुछ अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के तहत छोड़ दिए गए. जिस दिन रूस से लादिमीर पुतीन आ रहे थे, उस से एक दिन पहले फटाफट बाकी दो बचे मुजरिम भी रिहा कर दिए गए. अब अफज़ल गुरु को ले कर प्रश्न ये भी उठाए जा रहे हैं कि जब वह कश्मीर टास्क फ़ोर्स के कब्ज़े में तो दिल्ली पहुंचा कैसे? अफज़ल गुरु सन् 88 में हुए चुनावों की रिगिंग के दौरान हुए प्रदर्शनों में पकड़ा गया था जब वह मेडिकल के पहले वर्ष में था. जेल से निकला तो आजाद कश्मीर जा कर हथियार ले आया. पर यह अदालती रिकार्ड में है कि उसने वे हथियार कभी इस्तेमाल नहीं किये. फिर एक समय आया कि उसने स्वयं ही बिना किसी दबाव के वे हथियार समर्पित कर दिए. यहीं से उस की मुसीबतें शुरू हुई. जिन्होंने कभी हथियार समर्पित नहीं किये वे आज भी आतंकवादी बने हुए हैं, जब कि हथियारों का इस्तेमाल न करने व उन्हें समर्पित करने वाला 'कश्मीर टास्क फ़ोर्स' के कब्ज़े में सड़ने लगा! अब अगर देश के हिंदू बुद्धिजीवी भी यह मानते हैं कि कश्मीरमें आतंकवाद अब नगण्य हो गया है तो ऐसे में यह फांसी आग में घी डाल देगी तो ऐसे में क्या विकल्प है? क्या भारत सरकार पाकिस्तान से सरबजीत जिसे फांसी की सजा मुक़र्रर हो चुकी है, उस के लिए कोशिश नहीं कर रही? न तो इस लेख के लेखक हिंदुत्व वादी हैं और न मैं मुसलमान हूँ. फिर भी मैं और कई अन्य बुद्धिजीवी मानते हैं कि यह फांसी कशमीर के संवेदनशील इतिहास को देखते हुए नहीं लगनी चाहिए. क्या यह कहने मात्र से मैं मुसलमान बान गया?

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  46. हमारे देश में ऐसी कई मिसालें हैं जिन में खतरनाक मुजरिमों को राजनयिक या राजनीतिक कारणों से छोड़ा गया. बताइये, चार्ल्स शोभराज को क्यों छोड़ा गया जबकि वह कई लोगों के क़त्ल व अनेक धोखाधादियों का मुजरिम था? जब पुरुलिया में हवाई जहाज़ से हथियार गिरे तो छः विदेशी जेल में ठूंस दिए गए. लेकिन कुछ तो बीमारी के बहाने कुछ अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के तहत छोड़ दिए गए. जिस दिन रूस से लादिमीर पुतीन आ रहे थे, उस से एक दिन पहले फटाफट बाकी दो बचे मुजरिम भी रिहा कर दिए गए. अब अफज़ल गुरु को ले कर प्रश्न ये भी उठाए जा रहे हैं कि जब वह कश्मीर टास्क फ़ोर्स के कब्ज़े में तो दिल्ली पहुंचा कैसे? अफज़ल गुरु सन् 88 में हुए चुनावों की रिगिंग के दौरान हुए प्रदर्शनों में पकड़ा गया था जब वह मेडिकल के पहले वर्ष में था. जेल से निकला तो आजाद कश्मीर जा कर हथियार ले आया. पर यह अदालती रिकार्ड में है कि उसने वे हथियार कभी इस्तेमाल नहीं किये. फिर एक समय आया कि उसने स्वयं ही बिना किसी दबाव के वे हथियार समर्पित कर दिए. यहीं से उस की मुसीबतें शुरू हुई. जिन्होंने कभी हथियार समर्पित नहीं किये वे आज भी आतंकवादी बने हुए हैं, जब कि हथियारों का इस्तेमाल न करने व उन्हें समर्पित करने वाला 'कश्मीर टास्क फ़ोर्स' के कब्ज़े में सड़ने लगा! अब अगर देश के हिंदू बुद्धिजीवी भी यह मानते हैं कि कश्मीरमें आतंकवाद अब नगण्य हो गया है तो ऐसे में यह फांसी आग में घी डाल देगी तो ऐसे में क्या विकल्प है? क्या भारत सरकार पाकिस्तान से सरबजीत जिसे फांसी की सजा मुक़र्रर हो चुकी है, उस के लिए कोशिश नहीं कर रही? न तो इस लेख के लेखक हिंदुत्व वादी हैं और न मैं मुसलमान हूँ. फिर भी मैं और कई अन्य बुद्धिजीवी मानते हैं कि यह फांसी कशमीर के संवेदनशील इतिहास को देखते हुए नहीं लगनी चाहिए. क्या यह कहने मात्र से मैं मुसलमान बान गया?

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  47. अपने देश में ऐसे देश द्रोही बहुत से हैं जो अपने छोटे छोटे स्वार्थों के चलते देश की एकता अखंडता की बाजी लगाते रहते हैं .... लगभग आज के सभी नेता इस श्रेणी में आते हैं .... वैसे जो सबसे ज़्यादा मुखर हैं उन के बहिष्कार से शुरुआत करनी चाहिए

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  48. @पंकज मिश्रा जी आपने जो बातें उठाई हैं उसी सम्बन्ध में मेरे कुछ सवालों का जवाब आपसे अपेक्षित हैं. कभी समय मिले तो जवाब देने का कस्ट कीजिएगा.

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  49. Mr.Pankaj Mishra Tum tou ek number ke chutia insaan ho......Na ghar ke ho Na ghat ke ho....Badi Badi Baten karte ho....Yadi aisi baat hai to Musalmaano ka Deemag theek karo...aur yahan apna time waste mat karo.....
    kisi ek musalman ko theek ker do aur phir yahan badi badi baate kerna.....varna Chutia ki upadhi tumhare upar theek lagti hai........

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  50. दोगुलेपन को बयान करता हुआ एक सार्थक लेख...

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  51. कमियाँ सभी धर्म के अनुयायियों में हैं, यदि आदर्श को लोकजीवन में नेक भी स्थान मिल पाता तो विश्व के किसी भी देश में विसंगतियाँ न होतीं। हिन्दू धर्म में यदि बुराइयाँ हैं तो मिश्र जी को उसकी आलोचना करने के स्थान पर उन्हें दूर करने का उत्तरदायित्व निभाना चाहिये। लोकेद्र जी ने जिस विषय को उठाया था उससे इतर विषय पर मिश्र जी ने चर्चा प्रारम्भ कर दी है। लोकेन्द्र जी कहना चाह रहे थे कि मुस्लिम गुनहगारों की सज़ा पर मुसलमान बिरादरी ने अपने राष्ट्रीय कर्तव्य की उपेक्षा की और हिन्दुओं के करीब आने का अवसर खो दिया। वे तो विश्वास अर्जित करने की बात कर रहे हैं..। जबकि पंकज मिश्र जी एक पक्षीय चर्चा किये जा रहे हैं। 1992 के बाद बम विस्फ़ोट हुये होंगे किंतु इससे पहले न जाने कितनी बार हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो चुके हैं, बटवारे के समय क्या हुआ था? इन बातों की अनदेखी क्यों हो रही है? अभी पिछले दिनों, क्वेटा के मुस्लिम नेता ने अपने प्रांत के लोगों से कहा है कि यदि वे सुख चैन से जीना चाहते हैं तो उन्हें हिन्दू बनना होगा और अपना पृथक राष्ट्र बनाना होगा, पाकिस्तान में रहकर मुसलमान सुरक्षित नहीं है। क्या वहाँ भी हिन्दुओं ने उनके साथ पक्षपात किया और उनका विकास नहीं होने दिया? पाकिस्तान के जो मुसलमान अमेरिका में हैं, उन्हें जब अपने किसी स्वजन के अपने ही वतन में मारे जाने की ख़बर मिलती है तो वे जिन्ना को कोसते हैं, पूछते हैं कि पाकिस्तान बनाकर वहाँ की अवाम को क्या मिला? मुसलमान जितने चैन से भारत में है उतने चैन से पाकिस्तान में नहीं है। यह हम नहीं कहते भारत आने वाले पकिस्तानी मुसलमान कहते हैं और इसीलिये वे यहाँ कानूनी या गैर कानूनी ढ़ंग से बस जाना चाहते हैं। भाईचारे की मिसाल वाले धर्म के देश पाकिस्तान में कोई हिन्दू या ईसाई जाकर बसने की बात सोच भी नहीं सकता। सीधी सी बात है क्या अफज़ल और कसाब के मुद्दे पर मुसलमानों को देश के पक्ष में नहीं आना चाहिये था?
    हम पंकज मिश्र जी के एकांगी विचारों से बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं। प्रारम्भिक टिप्पणी में दिव्या ने जो लिखा है वह एकांगी सोच से दुखी होकर ही लिखा है। ऐसे संवेदनशील विषयों पर किसी एक पक्ष की चर्चा विवाद को बढ़ाने का कार्य ही करती है। यह ध्यान रखा जाना चाहिये कि टिप्पणियों में संयत और भद्र भाषा का ही प्रयोग किया जाय ।

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  52. 1947 मे पाकिस्तान से आये हिन्दुओं को अभी तक जम्मु काश्मीर की नागरिकता नहीं मिली है। उन्हे जम्मु काश्मीर मे न तो जमीन खरीदने का अधिकार है, न नौकरी करने का, विधान सभा के चुनाव मे वोट देने तक का अधिकार नही है, हाँ वे लोक सभा क चुनाव में वोट दे सकते है। राज्य सरकार का कोई सुविधा उन्हे नही मिलती है। इस विषय पर कोई भी पार्टी कुछ नही बोलता। भरत के किसी कोने मे हमारे किसी मुस्लिम भाई को कोई असुविधा हुई तो सारे तथाकथित सेक्युलर पार्टीयां शोर मचाने लगती है।
    आखिर आजादी के 65 वर्ष के बाद भी उन्हें राज्य की नागरिकता क्यों नहीं मिली।
    भारत मे ही हिन्दुओं के साथ भेद भाव के उपर कोई भी पार्टी कुछ नही बोलती आखिर उन्हे सबसे ज्यादा डर मुस्लिम वोटो से ही तो लगता है।

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