गुरुवार, 28 जनवरी 2021

‘हनुमानजी की भूमिका’ में भारत

आज जब हम 72वां गणतंत्र मना रहे हैं, तब हम गौरव की अनुभूति कर रहे हैं कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका को भी प्राप्त करने की ओर तेजी से अग्रसर है। ‘हम भारत के लोग’ इस बात से रोमांचित होते हैं कि ज्ञान-विज्ञान से लेकर आर्थिक क्षेत्र में कभी हम दुनिया का नेतृत्व करते थे। लंबे समय से हम अपने देश को पुन: विश्वगुरु की भूमिका में देखना चाह रहे थे, उसके लिए प्रयासरत थे। हम चाहते हैं कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा का प्रतिपादक हमारा देश वैश्विक पटल पर ‘विश्व परिवार के मुखिया’ की भूमिका का निर्वहन करे। पिछले पाँच-छह वर्षों में भारत ने उस सामर्थ्य को अर्जित किया है। वैश्विक महामारी ‘कोरोना संक्रमण’ की शुरुआत में ही दुनिया ने भारत की इस भूमिका को देखा कि हमने कमजोर देशों के साथ ही समर्थ देशों की भी सहायता की। अब एक बार फिर भारत में निर्मित कोरोना के टीके जरूरतमंद देशों को भेज कर हम अपनी मानवतावादी आचरण की प्रस्तुति कर रहे हैं। 

भारत ने कोरोना के दो स्वदेशी टीके बनाकर न केवल अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा को सुनिश्चित किया है, बल्कि वह अपने अनेक पड़ोसी देशों को टीके अनुदान के तौर पर देकर एक बड़ी लकीर खींच रहा है। पिछले कुछ दिनों में देसी टीकों की खेप भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, मालदीव, नेपाल, सेशेल्स और मॉरिशस पहुंची है। इसके अलावा सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और मोरक्को को व्यावसायिक तौर पर टीके भेजे जा रहे हैं। इस सूची में अभी कुछ और देश भी जुड़ेंगे। अमेरिकी विदेश विभाग दक्षिण एवं मध्य एशिया ब्यूरो ने पड़ोसी देशों को मुफ्त टीका मुहैया कराने तथा वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए एक बार फिर भारत की प्रशंसा करते हुए उसे ‘सच्चा दोस्त’ बताया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अदनोम घेब्रेयेसस ने महामारी से निजात पाने की कोशिशों में भागीदारी के लिए भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद कहा है।

ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोलसोनारो तो भारत से सहयोग मिलने पर अत्यधिक कृतज्ञ अनुभव कर रहे हैं। उन्होंने भारत के प्रति धन्यवाद प्रकट करते हुए कोरोना वैक्सीन लाते हुए हनुमानजी का पोस्टर ट्वीट किया है। हमें ज्ञात है कि जब भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे, तब हुनमानजी हिमालय से संजीवनी बूटी लेकर आए थे। उसी संजीवनी बूटी ने लक्ष्मणजी के प्राणों की रक्षा की थी। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि ब्राजील के राष्ट्रपति ने भारतीय संस्कृति के आधार ‘रामायण’ के प्रसंग को इस तरह उल्लेख किया। भारत की कोरोना वैक्सीन को उन्होंने ‘संजीवनी’ के रूप में मान्यता दी और भारत को मानवतासेवी बताया है। एक और अच्छी बात यह है कि उन्होंने हिन्दी में भी धन्यवाद ज्ञापित किया है। यह वैश्विक पटल पर भारत के सम्मान एवं उसकी भूमिका को रेखांकित करता है। इन तथ्यों को भारत के विपक्षी राजनीतिक दलों एवं मोदी विरोधी समूह को भी देखना और समझना चाहिए। जिस वैक्सीन को लेकर ‘झूठों का समूह’ दुष्प्रचार कर रहा था, उसके प्रति वैश्विक जगत भारत के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हमारी वैक्सीन समूची मानवता के लिए है। इसलिए यह बात स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि अपने पड़ोसियों और मित्र देशों को टीका देना, केवल कूटनीति या व्यापार का मामला नहीं है बल्कि सदैव से मानवता की चिंता भारत की प्राथमिकता है।


शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

प्रिंट मीडिया पर कोरोना महामारी का प्रभाव

पाठकों के हाथों से दूर हुआ समाचारपत्र, क्या वापस आएगा?

कोविड-19 के कारण पूरी दुनिया में फैली महामारी की चपेट में आने से मीडिया भी नहीं बच सका है। विशेषकर प्रिंट मीडिया पर कोरोना महामारी का गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। प्रिंट मीडिया पर कोरोना के प्रभाव को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। समाचारपत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रभावित हुआ है, उनकी प्रसार संख्या में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है, समाचारपत्रों के आकार घट गए हैं, पत्रकारों की नौकरी पर संकट आया है, संस्थानों के कार्यालयों में कार्य-संस्कृति में आमूलचूल परिवर्तन हुआ है। प्रिंट मीडिया के भविष्य को लेकर भी चर्चा बहुत तेजी से चल पड़ी है। ऐसा नहीं है कि कोरोना संक्रमण के कारण लागू हुए लॉकडाउन एवं आर्थिक मंदी का प्रभाव सिर्फ प्रिंट मीडिया पर ही हुआ है, इलेक्ट्रॉनिक एवं वेब मीडिया भी इससे अछूता नहीं रहा है। इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया के सामने सिर्फ आर्थिक चुनौतियां हैं, जबकि प्रिंट मीडिया के सामने तो पाठकों का भी संकट खड़ा हो गया। लोगों ने डर कर समाचारपत्र-पत्रिकाएं मंगाना बंद कर दीं। लोगों ने समाचार और अन्य पठनीय सामग्री प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया का रुख किया है। इसलिए यह प्रश्न अधिक गंभीर हो जाता है कि क्या भविष्य में प्रिंट मीडिया का यह पाठक वर्ग उसके पास वापस लौटेगा? 

कोरोना संक्रमण के कारण जब मार्च-2020 में पहला देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया, तब संक्रमण से डर कर बड़ी संख्या में लोगों ने अपने घर में समाचारपत्र-पत्रिकाओं के प्रवेश को भी प्रतिबंधित कर दिया। लोगों के बीच यह भय था कि समाचारपत्र के माध्यम से भी कोरोना संक्रमण फैल सकता है। ऐसा सोचने वाले लोग बड़ी संख्या में थे। स्थिति यहाँ तक बन गई कि कोरोना महामारी से भयग्रस्त एक याचिकाकर्ता ने चेन्नई के उच्च न्यायालय में याचिका लगाई थी कि समाचारपत्रों से कोरोना वायरस फैल सकता है, इसलिए इनका प्रकाशन रोका जाए। न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए समाचारपत्रों के प्रकाशन पर रोक से मना कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि “भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जीवंत मीडिया का बहुत महत्व है। जीवंत मीडिया भारत जैसे किसी भी लोकतांत्रिक देश की थाती है। अतीत में आजादी की लड़ाई के दौरान इसी मीडिया ने अंग्रेजों के शासन के खिलाफ जन-जागरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद आपातकाल के समय भी समाचारपत्रों की उल्लेखनीय भूमिका रही। समाचारपत्रों के प्रकाशन पर यदि रोक लगाई जाती है तो यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत न केवल प्रकाशक और संपादक, बल्कि पाठक के भी मौलिक अधिकारों के हनन के समान होगा”। लोगों के इस भय को दूर करने के लिए लगभग सभी समाचारपत्रों ने कई बार यह सूचना प्रकाशित की कि ‘समाचारपत्र से कोरोना नहीं फैलता है। दुनिया में एक भी प्रकरण ऐसा नहीं आया है, जो समाचारपत्र के माध्यम से संक्रमित हुआ हो। यहाँ तक कि कई शोध में यह बात सामने आई है कि समाचारपत्रों की छपाई तकनीक बिल्कुल स्वच्छ एवं सुरक्षित है। वितरक सैनिटाइजेशन के मानकों का पालन कर रहे हैं। समाचारपत्र छूना सुरक्षित है। इससे कोरोना के फैलने का कोई खतरा नहीं होता। बल्कि समाचारपत्र से कोरोना के संबंध में सही जानकारी पाठकों को मिलती है’। इस अपील/स्पष्टीकरण के प्रकाशन और इलेक्ट्रॉनिक एवं वेब मीडिया में प्रसारण के बाद भी लोगों ने समाचारपत्र से दूरी बना ली। इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया के होने के बाद भी जो लोग समाचारों के लिए प्रिंट मीडिया पर निर्भर थे, उन्होंने भी समाचारपत्रों को छूना बंद कर दिया। वर्षों से सुबह उठकर चाय के साथ समाचारपत्र पढऩे की आदत को कोरोना संक्रमण के भय ने एक झटके में बदल दिया। इसकी पुष्टि एक मार्केट रिसर्च कंपनी की रिपोर्ट भी करती है। ‘ग्लोबल वेब इंडेक्स’ की रिपोर्ट कहती है कि दुनियाभर में ऑनलाइन न्यूज की खपत में तेजी से वृद्धि हुई है। लोग ताजा जानकारियाँ जुटाने के लिए डिजिटल माध्यमों का सबसे अधिक उपयोग कर रहे हैं। कई भारतीय मीडिया संस्थानों ने भी मार्च के तीसरे सप्ताह से ऑनलाइन ट्रैफिक (उपभोक्ताओं) में उछाल दर्ज किया था। 

भारत में मार्च-2020 के पाँच-छह माह बाद यह स्थिति बनी है कि पाठकों के हाथों में अब समाचारपत्र की हार्डकॉपी की जगह ई-पेपर आ गया। पाठक समाचारपत्र पढ़ने की अपनी आदत की संतुष्टि के लिए अब ई-पेपर पर चले गए। तकनीक में दक्ष लोग समाचारपत्र को डाउनलोड कर उसकी पीडीएफ फाइल व्हाट्सएप समूहों पर प्रसारित करने लगे। यानी पहले हॉकर आपके यहाँ समाचारपत्र की प्रति दरवाजे पर छोड़ कर जाता था, तब उसकी डिजिटल कॉपी आपको व्हाट्सएप पर मिलने लगी। मीडिया संस्थानों ने समाचारपत्रों की पीडीएफ फाइल के प्रसार को गंभीरता से लिया और यह तय हुआ कि किसी भी समाचारपत्र की पीडीएफ फाइल प्रसारित करने पर दण्डात्मक कार्यवाही हो सकती है। वेब मीडिया पर बढ़ते ट्रैफिक और ई-पेपर पर क्लिक की बढ़ती संख्या ने मीडिया संस्थानों के कान खड़े कर दिए। उन्हें यह लगने लगा कि यदि पाठकों में ई-पेपर पढ़ने की आदत विकसित हो गई तब भविष्य में स्थितियां सामान्य होने के बाद भी उनकी प्रसार संख्या पूर्व स्थिति में नहीं आ पाएगी। समाचारपत्र की हार्डकॉपी ही लोग पढ़ें इसके लिए ज्यादातर मीडिया संस्थानों ने अपने समाचारपत्रों के ई-वर्जन पढ़ने के लिए सदस्यता शुल्क लेना शुरू कर दिया। जबकि कोरोना काल से पूर्व गिनती के ही समाचारपत्र थे, जो ई-पेपर पढ़ने के लिए पाठकों से शुल्क लेते थे। इसके साथ ही सुबह थोड़ी देर से ई-पेपर अपडेट/उपलब्ध कराए जाने लगे। ई-पेपर का स्क्रीनशॉट या क्लिप लेना प्रतिबंधित कर दिया गया। कुल मिलाकर यह प्रयास किए गए कि पाठक समाचारपत्र की हार्डकॉपी पर ही वापस लौटे। हालाँकि, उनके प्रयास बहुत सफल नहीं हुए। पाठक अब भी समाचारपत्रों की हार्डकॉपी लेने/छूने से बच रहा है और धीरे-धीरे ई-पेपर या वेबसाइट पर ही समाचार पढ़ने की उसकी आदत बन रही है। व्यक्तिगत बातचीत में कई लोगों ने यह स्वीकार किया है कि ई-पेपर एवं वेब पोर्टल्स पर ताजा खबरें मिलने से अब उन्हें अपनी दिनचर्या में समाचारपत्र की अनुपस्थिति खलती नहीं है। ज्यादातर लोगों ने यह भी कहा कि संभव है कि अब वे भविष्य में समाचारपत्र की हार्डकॉपी न मंगाएं। इसलिए यह माना जाने लगा है कि आगे चलकर प्रिंट संकुचित होगा जबकि इंटरनेट आधारित मीडिया का विस्तार होगा और उसके पास अधिक पाठक होंगे। 

भारत की सामाजिक परिस्थिति को देखते हुए इस बात से सहमत होना कठिन है कि प्रिंट मीडिया के विस्तार पर वर्तमान नकारात्मक प्रभाव भविष्य में भी बना रहेगा। हमें याद रखना चाहिए कि भारत में जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का आगमन हुआ, तब भी यही कहा जा रहा था कि समाचारपत्र-पत्रिकाओं के दिन अब लदने को हैं। लेकिन, हमने देखा कि प्रिंट मीडिया के कदम ठहरे नहीं, उसका विस्तार ही हुआ। उसके बाद जब इंटरनेट आधारित मीडिया ने जोर पकड़ना शुरू किया तब फिर से उक्त प्रश्र को उठाया जाने लगा। परंतु, ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) और इंडियन रीडरशिप सर्वे (आईआरएस) के आंकड़े बताते हैं कि प्रिंट मीडिया के प्रसार और पठनीयता, दोनों में तेजी से वृद्धि हो रही है। भारत में प्रिंट मीडिया की यह स्थिति तब है, जब दुनिया के अनेक देशों में प्रतिष्ठित समाचारपत्रों का प्रकाशन बंद हो रहा है। कोरोना से पहले भारत में प्रिंट मीडिया का न केवल विस्तार हो रहा था, बल्कि उसकी विश्वसनीयता भी बाकी मीडिया के अपेक्षा अधिक मजबूत हो रही थी। पूर्ण विश्वास के साथ तो नहीं, लेकिन पूर्व स्थितियों के आकलन और भारत की सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखकर यह उम्मीद अवश्य है कि समाचारपत्र पुन: अपनी स्थिति को प्राप्त होंगे और उनका प्रसार भी तेजी से बढ़ेगा। क्योंकि वेब मीडिया अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय समाचारों की भूख को तो शांत कर देते हैं लेकिन अपने आस-पास (स्थानीय) के समाचारों से पाठक अछूता रह जाता है। पाठकों को उस मात्रा में उनके शहर, गाँव, बस्ती, मोहल्ले के समाचार वेब मीडिया पर नहीं मिल रहे, जो उन्हें स्थानीय समाचारपत्र उपलब्ध कराते हैं।  

वर्तमान परिस्थिति में प्रिंट मीडिया को सहायता करने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को महत्वपूर्ण कदम उठाने चाहिए। प्रत्येक परिस्थिति में समाज को जागरूक करने में समाचारपत्र-पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण एवं प्रभावी भूमिका रहती है। हमने कोरोना काल में भी यह अनुभव किया है कि पत्रकारों ने अपना जीवन दांव पर लगाकर सही सूचनाएं नागरिकों तक पहुँचाने में सराहनीय भूमिका का निर्वाह किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से प्रिंट मीडिया के प्रमुखों से बात कर समाचारपत्रों की इस भूमिका की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि “प्रिंट मीडिया का नेटवर्क पूरे भारत में है। यह शहरों एवं गांवों में फैला हुआ है। यह मीडिया को इस चुनौती (कोरोना संक्रमण) से लडऩे और सूक्ष्म स्तर पर इसके बारे में सही जानकारी फैलाने के लिए अधिक महत्वपूर्ण बनाता है”। प्रधानमंत्री मोदी ने जब प्रिंट मीडिया के प्रमुखों से बात की, तब निश्चित ही उन्होंने उनकी समस्याएं भी जानी होंगी। उन्हें सहायता का आश्वास भी दिया होगा। सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी मीडिया की वर्तमान स्थिति का अध्ययन कर रहा होगा। बहरहाल, प्रिंट मीडिया को सहयोग करने के संबंध में विचार करते समय सरकार को यह बात आवश्यक रूप से ध्यान रखनी चाहिए कि उसकी प्राथमिकता में छोटे और मझले, भारतीय भाषाई, क्षेत्रीय समाचारपत्र-पत्रिकाएं भी शामिल हों। बड़े मीडिया संस्थान फिर भी अपने अस्तित्व की लड़ाई स्वयं लड़ लेंगे, लेकिन मझले संस्थानों के सामने अस्तित्व का बड़ा प्रश्न खड़ा है। प्रिंट मीडिया को बचाने के लिए मझले संस्थानों की चिंता सर्वोपरि होनी चाहिए।

(यह आलेख अभिधा बुक्स, दिल्ली से वर्ष 2021 में प्रकाशित डॉ. शैलेन्द्र राकेश की पुस्तक 'कोरोना वाली दुनिया' में शामिल है।) 

शनिवार, 9 जनवरी 2021

लक्ष्य : हार और जीत ही काफी नहीं जिंदगी में...

यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर देखें 


हार और जीत ही काफी नहीं
जिंदगी में मेरे लिए
मीलों दूर जाना है अभी मुझे।
निराशा के साथ बंधी
आशा की इक डोर थामे
उन्नत शिखर की चोटी पर चढ़ जाना है मुझे।
हार और जीत ही....


है अंधेरा घना लेकिन
इक दिया तो जलता है रोशनी के लिए
उसी रोशनी का सहारा लिए
भेदकर घोर तमस का सीना
उस दिये का हाथ बंटाना है मुझे।
हार और जीत ही...


चांद पर पहुंच पाऊंगा या नहीं
ये सोच अभी नहीं रुकना है मुझे
चलता रहा विजय की उम्मीद लिए
तो चांद पर न सही
तारों के बीच टिमटिमाना है मुझे।
हार और जीत ही...

- लोकेन्द्र सिंह -

(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से) 

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

आओ, आत्मनिर्भरता का संकल्प लें

स्वदेशी का विरोध करने वाले असल में भारत विरोधी


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में ‘आत्मनिर्भर भारत का संकल्प’ लेने का बहुत महत्वपूर्ण आह्वान किया है। कोविड-19 ने हमें बहुत नुकसान पहुँचाया है, तो कई महत्वपूर्ण सबक भी दिए हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण है- आत्मनिर्भरता का सबक। देश में जब लॉकडाउन था, तब प्रधानमंत्री मोदी ने देश को ‘लोकल फॉर वोकल’ का नारा दिया था, जिसका असर पिछले कुछ महीनों में देखा गया है। भारत के नागरिकों में स्वदेशी के प्रति भावना प्रबल हुई है। इस वर्ष बड़े त्यौहारों पर भी लोगों ने बाहरी कंपनियों की जगह स्थानीय उत्पाद खरीदने में रुचि दिखाई। यही कारण है कि हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। लॉकडाउन में काम-धंधा बंद होने से स्थानीय व्यावसायी और कामगारों के मन में उपजी निराशा ‘लोकल फॉर वोकल’ के कारण दूर हो रही है। यदि हम ही अपने उत्पादों को प्रोत्साहित नहीं करेंगे, तब देश आर्थिक तौर पर कैसे सशक्त होगा?

आश्चर्य होता है कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को स्वदेशी को बढ़ावा देने से चिढ़ क्यों होती है? वे विदेशी कंपनियों के पक्षधर और स्वदेशी कंपनियों के विरोधी नजर आते हैं। स्वदेशी कंपनियों के विरुद्ध नकारात्मक वातावरण बनाने में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सदैव अग्रणी रहता है। उनके इस विमर्श को समझने की आवश्यकता है। यह मानसिक गुलामी की स्थिति है या फिर विदेशी फंडिंग का प्रभाव? दोनों ही स्थितियां त्याज्य हैं। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के निर्माताओं और उद्योग जगत से आग्रह किया है कि “देश के लोगों ने मजबूत कदम आगे बढ़ाया है, वोकल फॉर लोकल आज घर-घर में गूंज रहा है। ऐसे में अब यह सुनिश्चित करने का समय है कि हमारे उत्पाद विश्वस्तरीय हों। जो भी वैश्विक स्तर पर श्रेष्ठ है, उसे हम भारत में बनाकर दिखाएं। इसके लिए हमारे उद्यामी साथियों को आगे आना है। स्टार्टअप को भी आगे आना है”। प्रधानमंत्री मोदी के इस आह्वान में देश को आर्थिक शक्ति बनाने का बड़ा संकल्प शामिल है। आत्मनिर्भर भारत के शुभ संकल्प की पूर्ति में भारत के आम नागरिकों एवं सज्जनशक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है। स्वदेशी के विरुद्ध चलने वाले सभी प्रकार के नकारात्मक विमर्शों को निष्प्रभावी करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में आगे बढऩा होगा। अपने स्थानीय एवं स्वदेशी उद्यमियों को प्रोत्साहित करना होगा। 

एक जनवरी पर नये कैलेंडर वर्ष के लिए संकल्प लेने का चलन बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने एक सकारात्मक विचार हमारे सामने रखा है कि क्या हम नये वर्ष में भारत में बने उत्पादों का उपयोग करने का संकल्प ले सकते हैं? उन्होंने कहा- “मैं देशवासियों से आग्रह करूंगा कि दिनभर इस्तेमाल होने वाली चीजों की आप एक सूची बनाएं। उन सभी चीजों की विवेचना करें और यह देखें कि अनजाने में कौन-सी विदेश में बनी चीजों ने हमारे जीवन में प्रवेश कर लिया है तथा एक प्रकार से हमें बंदी बना दिया है। भारत में बने इनके विकल्पों का पता करें और यह भी तय करें कि आगे से भारत में बने, भारत के लोगों के पसीने से बने उत्पादों का हम इस्तेमाल करें”।

   

         स्वदेशी जागरण मंच का नारा है- ‘चाहत से देसी, जरूरत से स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी’। स्वदेशी के इस सूत्र को ध्यान में रखकर हमें एक सूची बनानी चाहिए कि इस वर्ष हम किन स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करेंगे? यह भी सूची बना सकते हैं कि किन वस्तुओं को भारत में बनाए जाने की अपेक्षा आप भारत के निर्माताओं, उद्योग जगत और स्टार्टअप से करते हैं। इससे भारत का उद्योग जगत आपकी अपेक्षाओं से भी अवगत हो सकेगा। यदि हम सही में भारत को सशक्त करना चाहते हैं, तब हमें स्वदेशी के विचार को न केवल मजबूत बनाना होगा, बल्कि अपनी जीवन में भी उतारना होगा।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

ये चाय बहुत खास है

भारत में कुछ बुद्धिजीवियों ने गाय को विवाद विषय बना दिया है, जबकि गाय तो प्रेम और वात्सल्य की मूर्ति है। यह तो दिलों का मेल कराती है। 

गाँव में अपरिचित परिवार में सुबह-सुबह यह चाय गाय माता ने ही नसीब कराई है। 

हुआ यह कि हम पांच लोग इंदौर से ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए निकले।

एक गाँव से गुजर रहे थे तो सड़क किनारे एक घर देखा, वहां चार-पांच गाय थी। सुबह का समय था तो गांव के शुद्ध वातावरण में गाय के शुद्ध दूध की चाय पीने का मन हुआ। हमने गाड़ी रोकी। हमारे साथ अभियंता श्री संजय चौधरी थे, उन्होंने गाड़ी से उतर कर सूर्य देवता को नमन किया। इसी क्रम में अपन राम ने गाड़ी में बैठे-बैठे गाय माता को प्रणाम किया। 

संजय जी ने आंगन में पहुंच कर आवाज दी। घर से एक पुरुष बाहर निकल कर आया। संजय जी ने उसको निवेदन किया कि "भाई साहब, यदि गाय के दूध की चाय मिल जाये तो दिन बन जायेगा"। उन सज्जन ने कहा कि हम चाय बनाने का काम नहीं करते हैं। हालांकि, सड़क किनारे घर होने से कई बार लोग पूछते हैं। हम सबको मना कर देते हैं। लेकिन, आपको अवश्य पिलायेंगे"। यह कहते हुए उस सज्जन के चेहरे पर आत्मीयता और आतिथ्य का भाव स्पष्ट दिख रहा था। 

हम उनकी यह बात सुनकर हैरान हुए कि ये किसी चाय नहीं बनाते, लेकिन हमारे लिए बना रहे हैं। ऐसा क्यों है? 

हम सबकी चाय पीने की इच्छा पूरी हो रही थी। ऐसे में यह प्रश्न बेमानी था कि वे हमारे लिए चाय बनवाने के लिए तैयार क्यों हुए? परंतु मैं अपनी इस जिज्ञासा को अधिक देर तक दबा नहीं सका। 

मैंने उत्सुकता दिखाते हुए पूछ ही लिया कि "आपकी इस कृपा का कारण क्या है"?

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- "यह मेरी कृपा नहीं, बल्कि गाय माता की कृपा है। मैंने आपको गाय को प्रणाम करते हुए देख लिया था। मन में विचार आया कि ये भले लोग हैं जो गाय के प्रति श्रद्धा रखते हैं। अन्यथा, आजकल तो लोग गाय का मांस खाने की होड़ लगाते हैं। जब मैंने अपनी पत्नी को कहा कि दो गाड़ियां हमारे घर बाहर आकर खड़ी हुई हैं। उसमें बैठे लोगों ने हमारी गायों के सामने झुककर हाथ जोड़े हैं। उसे भी अच्छा लगा"। 

हमारी बातचीत चल ही रही थी कि उस किसान की पत्नी और घर की मालकिन बाहर ट्रे में चाय के कप लेकर निकलीं। कप से उठ रही वाष्प के साथ अदरक और इलायची की सुगंध भी बता रही थी कि यह चाय बहुत विशेष है। 

हम सबने उस गोसेवी किसान परिवार के आंगन में बैठकर चाय की चुस्कियां लीं। बाद में, जब हम जाने लगे तो संजय जी ने उन सज्जन को सौ रुपये देना चाहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। संजय जी ने घर की मालकिन को अपनी बहन मानते हुए उसको पैसे देने का प्रयास किया तो उसने भी कह दिया- "भला कोई बहन चाय के बदले अपने भाइयों से पैसे लेगी"। 

हम सबके लिए वह क्षण एक आत्मीय और मन को आनंदित करने वाला बन गया। यकीनन, भारत गांव में बसता है। गांव और गाय, हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। 

गो-माता की जय... 

रविवार, 13 दिसंबर 2020

‘आरएसएस 360’: संघ की पूर्ण प्रतिमा

इस वीडियो ब्लॉग में देखें 'आरएसएस 360' की जानकारी


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस, 2025 में अपनी यात्रा के 100 वर्ष पूरे कर लेगा। यह किसी भी संगठन के लिए महत्वपूर्ण बात होती है कि इतने लंबे कार्यकाल में उसका निरंतर विस्तार होता रहे। अपने 100 वर्ष की यात्रा में संघ ने समाज का विश्वास जीता है। यही कारण है कि जब मीडिया में आरएसएस को लेकर भ्रामक जानकारी आती है, तब सामान्य व्यक्ति चकित हो उठता है, क्योंकि उसके जीवन में आरएसएस सकारात्मक रूप में उपस्थित रहता है, जबकि आरएसएस विरोधी ताकतों द्वारा मीडिया में उसकी नकारात्मक छवि प्रस्तुत की जाती है। संघ ने लंबे समय तक इस प्रकार के दुष्प्रचार का खण्डन नहीं किया। अब भी बहुत आवश्यकता होने पर ही संघ अपना पक्ष रखता है। दरअसल, इसके पीछे संघ का विचार रहा है कि- ‘कथनी नहीं, व्यवहार से स्वयं को समाज के समक्ष प्रस्तुत करो’। 1925 के विजयदशमी पर्व से अब तक संघ के स्वयंसेवकों ने यही किया। परिणामस्वरूप, सुनियोजित विरोध, कुप्रचार और षड्यंत्रों के बाद भी संघ अपने ध्येय पथ पर बढ़ता रहा। इसी संदर्भ में यह भी देखना होगा कि जब भी संघ को जानने या समझने का प्रश्न आता है, तब वरिष्ठ प्रचारक यही कहते हैं- ‘संघ को समझना है तो शाखा में आना होगा’। अर्थात् शाखा आए बिना संघ को नहीं समझा जा सकता। यह सत्य है कि किसी पुस्तक को पढ़ कर संघ की वास्तविक प्रतिमा से परिचित नहीं हुआ जा सकता। किंतु, संघ को नजदीक से देखने वाले लेखक जब कुछ लिखते हैं, तब उनकी पुस्तकें संघ के संबंध में प्राथमिक और सैद्धांतिक परिचय करा ही देती हैं। इस क्रम में सुप्रसिद्ध लेखक रतन शारदा की पुस्तक ‘आरएसएस 360’ हमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के और नजदीक ले जाती है। यह पुस्तक संघ पर उपलब्ध अन्य पुस्तकों से भिन्न है। दरअसल, पुस्तक में संघ के किसी एक पक्ष को रेखांकित नहीं किया गया है और न ही एक प्रकार के दृष्टिकोण से संघ को देखा गया है। पुस्तक में संघ के विराट स्वरूप को दिखाने का प्रयास लेखक ने किया है। 

लेखक रतन शारदा (Ratan Sharda)

लेखक रतन शारदा ने संघ की अविरल यात्रा का निकट से अनुभव किया है। उन्होंने संघ में लगभग 50 वर्ष विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया है। इसलिए उनकी पुस्तक में संघ की यात्रा के लगभग सभी पड़ाव शामिल हो पाए हैं। चूँकि संघ का स्वरूप इतना विराट है कि उसको एक पुस्तक में प्रस्तुत कर देना संभव नहीं है। इसके बाद भी यह कठिन कार्य करने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक भ्रम के उन जालों को भी हटाने का महत्वपूर्ण कार्य करती है, जो हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबल्स की संतानों ने फैलाए हैं। आज बहुत से लोग संघ के संबंध में प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसे जिज्ञासु लोगों के लिए यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। स्वयं लेखक ने लिखा है कि “इस पुस्तक का जन्म मेरी उस इच्छा से हुआ था कि जो लोग संघ से नहीं जुड़े हैं या जिनको जानकारी नहीं है, उन्हें आरएसएस के बारे में बताना चाहिए”। पुस्तक पढ़ने के बाद संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध वर्ग की प्रतिक्रियाएं भी इस बात की पुष्टी करती हैं कि पुस्तक अपने उद्देश्य की पूर्ति करती है। सुप्रसिद्ध लेखिका मधु पूर्णिमा किश्वर ने पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है। उन्होंने भी उन ताकतों की ओर इशारा किया है, जो संघ के विरुद्ध तो दुष्प्रचार करती ही हैं, संघ की प्रशंसा करने वाले लोगों के प्रति भी घोर असहिष्णुता प्रकट करती हैं।

पुस्तक की सामग्री को तीन मुख्य भागों में बाँटा गया है। भाग-1 को ‘आत्मा’ शीर्षक दिया गया है, जो सर्वथा उपयुक्त है। लेखक ने इस भाग में संघ के संविधान का सारांश प्रस्तुत किया है और संघ की आवश्यकता को रेखांकित किया है। इसी अध्याय में उस पृष्ठभूमि का उल्लेख आता है, जिसमें डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना की और संघ की स्थापना के उद्देश्य को स्पष्ट किया। संघ का उद्देश्य क्या है? अकसर इस बात को लेकर कुछेक लोगों द्वारा खूब अपप्रचार किया जाता है। संघ का उद्देश्य उसकी प्रार्थना में प्रकट होता है, जिसे संघ स्थान पर प्रतिदिन स्वयंसेवक उच्चारित करते हैं। उस प्रार्थना के भाव को भी इस अध्याय में समझाने का प्रयत्न किया गया है। भाग-2 ‘स्वरूप’ शीर्षक से है, जिसमें संघ के विराट स्वरूप को सरलता से प्रस्तुत किया गया है। शाखा का महत्व, आरएसएस की संगठनात्मक संरचना और प्रचारक पद्धति पर लेखक ने विस्तार से लिखा है। यह अध्याय हमें संघ की बुनियादी संरचना और जानकारी देता है। ‘अभिव्यक्ति’ शीर्षक से भाग-3 में आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों की जानकारी है, जिससे हमें पता चलता है कि वर्तमान परिदृश्य में संघ के स्वयंसेवक कितने क्षेत्रों में निष्ठा, समर्पण और प्रामाणिकता से कार्य कर रहे हैं। ‘राष्ट्र, समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ में लेखक रतन शारदा ने संघ के उन कार्यों का उल्लेख किया है, जिनको अपना कर्तव्य मान कर संकोचवश संघ बार-बार बताता नहीं है। 1947 में विभाजन की त्रासदी में लोगों का जीवन बचाने का उपक्रम हो, या फिर 1948 और 1962 के युद्ध में सुरक्षा बलों का सहयोग, संघ के स्वयंसेवक सदैव तत्पर रहे। देश में आई बड़ी आपदाओं में भी संघ ने आगे बढ़ कर राहत कार्य किए हैं। कोरोना महामारी का यह दौर हमारे सामने है ही, जब सबने देखा कि कैसे संघ ने बड़े पैमाने पर सेवा और राहत कार्यों का संचालन किया। बहरहाल, सामाजिक समरसता और सेवा के क्षेत्र में किए गए कार्यों का प्रामाणिक विवरण ‘आरएसएस 360’ में हमें मिलता है। इसके अतिरिक्त ‘आपातकाल में लोकतंत्र के लिए संघ की लड़ाई’ और ‘संघ कार्य में मील के पत्थर’ जैसे महत्वपूर्ण विवरण के साथ पुस्तक का आरंभ होता है और अंत में पाँच अत्यंत महत्वपूर्ण परिशिष्ट शामिल किए गए हैं। इनमें संघ के अब तक के सरसंघचालकों की संक्षिप्त जानकारी, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ की भूमिका, 1948 में संघ पर प्रतिबंध की पृष्ठभूमि, प्रतिबंध के विरुद्ध सत्याग्रह के साथ ही संघ, पटेल और नेहरू के पत्राचार को शामिल किया गया है। 

निस्संदेह लेखक रतन शारदा की पुस्तक ‘आरएसएस 360’ पाठकों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में न केवल आधारभूत जानकारी देती है बल्कि उसके दर्शन, उसकी कार्यपद्धति और उसके उद्देश्य का समीप से परिचय कराती है। आरएसएस के संघर्षपूर्ण इतिहास के पृष्ठ भी हमारे सामने खोलती है। समाज, देश और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में संघ के कार्यों का विवरण भी देती है। पूर्व में यह पुस्तक अंग्रेजी में ‘सीक्रेट्स ऑफ आरएसएस डिमिस्टिफायिंग-संघ’ शीर्षक से आई थी, जिसे बहुत स्वागत हुआ। हिन्दी जगत में ऐसी पुस्तक की आवश्यकता थी, इसलिए यहाँ भी यह भरपूर सराही जाएगी। पुस्तक का प्रकाशन ब्लूम्सबरी भारत ने किया है। पुस्तक में लगभग 350 पृष्ठ हैं और इसका मूल्य 599 रुपये है।

स्वदेश में प्रकाशित 

बुधवार, 25 नवंबर 2020

'स्व' की ओर बढ़ते भारत को 'पाथेय'



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है। अपनी स्थापना के प्रारंभ से ही विजयादशमी पर सरसंघचालक के उद्बोधन की परंपरा है। वैसे तो विजयादशमी का उद्बोधन स्वयंसेवकों के लिए पाथेय होता है परंतु यह संघ के दृष्टिकोण को भी प्रकट करता है और भविष्य की राह की ओर इंगित करता है। इसलिए संघ के स्वयंसेवकों का ही नहीं अपितु देश के प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान भी सरसंघचालक के विजयादशमी के उद्बोधन पर रहता है। 25 अक्टूबर को वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जो उद्बोधन दिया, वह बहुत महत्वपूर्ण है। भारत अपने 'स्व' की ओर बढ़ रहा है, इस बात की आश्वस्ति उनके संबोधन में थी और भविष्य की चुनौतियां की ओर संकेत और उनसे निपटने की तैयारियों का आग्रह भी। इसलिए उनके इस उद्बोधन की देशव्यापी चर्चा होनी चाहिए। भारत हितचिंतकों के वर्ग में विमर्श होने चाहिए। शासन स्तर पर भी उनकी विचारों के अनुपालन में नीतियां बनाई जा सकती हैं। भारत के संदर्भ में 2020 महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक वर्ष है। ऐसा वर्ष, जिसे ऐतिहासिक घटनाओं, उपलब्धियों और सामर्थ्य के लिए याद किया जाएगा। किंतु, कोरोना संक्रमण के कारण गौरव की अनुभूति कराने वाले अवसरों की चर्चा अधिक नहीं होने दी। सरसंघचालक ने उचित ही ध्यान दिलाया कि पिछली विजयादशमी से अब तक बहुत महत्व की बातें देश में हुई हैं। भारत के स्वाभिमान के प्रतीक श्रीराम मंदिर पर निर्णय, श्रीरामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण हेतु भूमिपूजन, पड़ोसी देशों में धार्मिक आधार पर उत्पीडऩ झेल रहे हिन्दुओं को भारत की नागरिकता एवं स्वाभिमान से जीने का अधिकार देने वाले कानून का निर्माण, यह सब इसी बीच में हुआ। शैव दर्शन की भूमि पर अलगाव का कारण और विकास में अवरोध बने अस्थायी अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी करने वाला निर्णय हालांकि कुछ पहले ही हो चुका था, लेकिन इस बीच ऐतिहासिक निर्णय का असर भी दिखा। 

अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने के लिए भारत के लोग उसी दिन से संघर्ष कर रहे थे जब एक आक्रांता ने हमारे गौरव को पददलित करने की मानसिकता से श्रीराम मंदिर को ध्वस्त किया और तथाकथित मस्जिद का ढांचा खड़ा कर दिया। भारतीय समाज कितना सहिष्णु है, यह आंदोलन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऐसा कोई विरला ही समाज/देश होगा, जिसने अपने ही मानबिंदु को प्राप्त करने के लिए धैर्यपूर्वक संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया। वर्षों की प्रतीक्षा पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर किसी प्रकार की उत्तेजना को प्रकट न करते हुए संयमित व्यवहार प्रदर्शित किया। भूमिपूजन के दिन 'भारत का नियति से भेंट का अवसर' का स्वागत भी शांत, सौम्य, सात्विक, पवित्र और स्नेहिल वातावरण में किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जब इस ऐतिहासिक अवसर का वर्णन कर रहे थे, तब भारत के मूल स्वभाव का बखूबी चित्रण जनमानस में पहुंचा। 

हम सबने देखा कि कोरोना संक्रमण के कारण देश-दुनिया में सबकुछ ठप हो गया। एक निराशा का वातावरण बनने लगा, मानो अब सब समाप्त हो जाएगा। भारत में तो अपने ही समाज के एक बड़े वर्ग के सामने जीवनयापन और दो वक्त की रोटी का संकट उपस्थित हो गया। तब दुनिया ने 'भाव' को अनुभूत किया। 'खुद दर्द में होते हुए दूसरों के जख्मों को सिलते हुए' भारत को दुनिया ने बहुत करीब से देखा। सरसंघचालक जी ने इस ओर भी सबका ध्यान आकर्षित किया। यह अनुकरणीय बात है और संघ के विराट लक्ष्य को प्रकट करता है कि देश में सबसे अधिक सेवा और राहत कार्यों का संचालन करने वाले संगठन के मुखिया ने इसका श्रेय स्वयं के संगठन को न देकर, सेवाभावी भारतीय समाज को दिया। इस संदर्भ में उनका वह उद्बोधन भी सबको स्मरण में रखना चाहिए, जो घरवास (लॉकडाउन) के समय में उन्होंने दिया था। तब उन्होंने संघ के सेवाकार्यों की स्पष्ट संकल्पना प्रस्तुत की थी। संघ के स्वयंसेवकों के लिए सेवाकार्य कोई उपकार या यश प्राप्त करने का प्रयोजन नहीं है, बल्कि उनके लिए तो सेवा 'करणीय कार्य' हैं। सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कोरोनयोद्धाओं के सेवाभाव, कर्तव्य परायणता और समर्पण की स्तुति करते हुए कहा कि "प्रशासन के कर्मचारी, विभिन्न उपचार पद्धतियों के चिकित्सक तथा सुरक्षा और सफाई सहित सभी काम करने वाले कर्मचारी उच्चतम कर्तव्यबोध के साथ रुग्णों की सेवा में जुटे रहे। स्वयं को कोरोना वायरस की बाधा होने की जोखिम उठाकर उन्होंने दिन-रात अपने घर परिवार से दूर रहकर युद्ध स्तर पर सेवा का काम किया। नागरिकों ने भी अपने समाज बंधुओं की सेवा के लिए स्वयंस्फूर्ति के साथ जो भी समय की आवश्यकता थी, उसको पूरा करने में प्रयासों की कमी नहीं होने दी। समाज की मातृशक्ति भी स्वप्रेरणा से सक्रिय हुई। महामारी के कारण पीडि़त होकर जो लोग विस्थापित हो गए, जिनको घर में वेतन और रोजगार बंद होने से विपन्नता का और भूख का सामना करना पड़ा, वह भी प्रत्यक्ष उस संकट को झेलते हुए अपने धैर्य और सहनशीलता को बनाकर रखते रहे। अपनी पीड़ा व कठिनाई को किनारे करते हुए दूसरों की सेवा में वे लग गए, ऐसे कई प्रसंग अनुभव में आए। विस्थापितों को घर पहुंचाना, यात्रा पथ पर उनके भोजन विश्राम आदि की व्यवस्था करना, पीडि़त विपन्न लोगों के घर पर भोजन आदि सामग्री पहुँचाना, इन आवश्यक कार्यों में सम्पूर्ण समाज ने महान प्रयास किए। एकजुटता एवं संवेदनशीलता का परिचय देते हुए जितना बड़ा संकट था, उससे अधिक बड़ा सहायता का उद्यम खड़ा किया।" सरसंघचालक ने इस ओर भी सबका ध्यान आकर्षित किया कि भौतिकवाद की अंधी दौड़ में व्यस्त इस दुनिया को कोरोना महामारी ने भारतीय संस्कृति की सर्वोच्चता और उसकी आवश्यकता से परिचित कराया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में स्वच्छता, स्वास्थ्य तथा रोगप्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाली अपनी कुछ परंपरागत आदतें एवं आयुर्वेद जैसे शास्त्र भी इस समय उपयुक्त सिद्ध हुए। अब तो यह चिकित्सकीय प्रक्रिया से भी सिद्ध हुआ कि कोरोना मरीजों को सबसे अधिक लाभ आयुर्वेद से हुआ है। 

संघ सिर्फ तात्कालिक परिस्थिति में सक्रिय नहीं होता है, बल्कि उससे सीखकर आगे की योजना-रचना भी करता है। निसंदेह कोरोना के कारण बहुत नुकसान हुआ है। भारत अब उससे उबरता दिख भी रहा है। स्थितियों को सामान्य बनाने के लिए अब सबके सहयोग की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने आह्वान किया है कि "इस परिस्थिति से उबरने के लिए अब दूसरे प्रकार की सेवाओं की आवश्यकता है। विद्यालयों का प्रारम्भ, शिक्षकों के वेतन तथा बच्चों की शिक्षा के लिए कुछ सेवा सहायता करनी पड़ेगी। विस्थापन के कारण रोजगार चला गया, नए क्षेत्र में रोजगार पाना है। अत: रोजगार का प्रशिक्षण व रोजगार का सृजन करना पड़ेगा। इस सारी परिस्थिति के चलते घरों में एवं समाज में तनाव बढऩे की परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में अपराध, अवसाद, आत्महत्या आदि कुप्रवृत्तियां ना बढ़ें, इसलिए समुपदेशन की व्यापक आवश्यकता है।" सरसंघचालक के उद्बोधन के इस हिस्से में वे वृहद समाज के सचेत अभिभावक के रूप में नज़र आये। 

पर्यावरण की चिंता करने का आग्रह भी उनके उद्बोधन में दिखा। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे हमने अपनी प्रकृति को नुकसान पहुंचाया है। इसकी अनुभूति भी कोरोना काल में हुई है। उन्होंने कहा- "कोरोना महामारी की परिस्थिति के चलते जीवन लगभग थम सा गया। कई नित्य की क्रियाएं बंद हो गईं। उनको देखते हैं तो ध्यान में आता है कि जो कृत्रिम बातें मनुष्य जीवन में प्रवेश कर गई थीं, वे बंद हो गईं और जो मनुष्य जीवन की शाश्वत आवश्यकताएं हैं, वास्तविक आवश्यकताएं हैं, वे चलती रहीं। कुछ कम मात्रा में चली होंगी, लेकिन चलती रहीं। अनावश्यक और कृत्रिम वृत्ति से जुड़ी हुई बातों के बंद होने से एक हफ्ते में ही हमने हवा में ताजगी का अनुभव किया। झरने, नाले, नदियों का पानी स्वच्छ होकर बहता हुआ देखा। खिड़की के बाहर बाग-बगीचों में पक्षियों की चहक फिर से सुनाई देने लगी। अधिक पैसों के लिए चली अंधी दौड़ में, अधिकाधिक उपभोग प्राप्त करने की दौड़ में हमने अपने आपको जिन बातों से दूर कर लिया था, कोरोना परिस्थिति के प्रतिकार में वही बातें काम की होने के नाते हमने उनको फिर स्वीकार कर लिया और उनके आनंद का नए सिरे से अनुभव लिया। उन बातों की महत्ता हमारे ध्यान में आ गई। नित्य व अनित्य, शाश्वत और तात्कालिक, इस प्रकार का विवेक करना कोरोना की इस परिस्थिति ने विश्व के सभी मानवों को सिखा दिया है। विश्व के लोग अब फिर से कुटुम्ब व्यवस्था की महत्ता, पर्यावरण के साथ मित्र बन कर जीने का महत्त्व समझने लगे हैं। यह सोच कोरोना की मार की प्रतिक्रिया में तात्कालिक सोच है या शाश्वत रूप में विश्व की मानवता ने अपनी दिशा में थोड़ा परिवर्तन किया है यह बात तो समय बताएगा। परन्तु इस तात्कालिक परिस्थिति के कारण शाश्वत मूल्यों की ओर व्यापक रूप में विश्व मानवता का ध्यान खींचा गया है, यह बात निश्चित है।" 

सरसंघचालक ने 'देशविरोधी ताकतों' को भी आड़े हाथ लिया और देशभक्त जनता को उनके षड्यंत्रों से सावधान रहने का आग्रह किया। पड़ोसी देशों में कट्टरता और धार्मिक अत्याचार से पीड़ित हिन्दू समाज सहित अन्य अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने का कानून भारत सरकार ने बनाया, जिसके विरोध में दिल्ली के 'शाहीनबाग' से लेकर देशभर में निर्लज्ज प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों की आड़ में साम्प्रदायिक ताकतों ने देश को हिंसा में झौंकने का षड्यंत्र रचा। देश के सौहार्द को बिगाड़ने के लिए असामाजिक तत्व सक्रिय हो गए। भारतीय मुसलमानों के मन में द्वेष और भय पैदा करने का प्रयास किया। देशवासियों ने इस सबको नज़दीक से देखा। भविष्य में ऐसी ताकतें फिर से सिर न उठाएं का समाज विभाजन पैदा करने के षड्यंत्र न रच पाएं, इसके लिए सरसंघचालक ने बाबा साहब अंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा- "25 नवम्बर, 1949 के संविधान सभा में दिये अपने भाषण में श्रद्धेय डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने ऐसे तरीकों को 'अराजकता का व्याकरण' कहा था। ऐसे छद्मवेषी उपद्रव करने वालों को पहचानना एवं उनके षड्यंत्रों को नाकाम करना तथा भ्रमवश उनका साथ देने से बचना समाज को सीखना पड़ेगा।" 

विपक्षी राजनैतिक दलों के लिए भी उन्होंने मार्गदर्शन दिया। वर्तमान परिस्थितियों में उनके विचार को सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को सुनना और उस पर चिंतन करना चाहिए। आखिर राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का व्यवहार और नीति कैसी होनी चाहिए? सरसंघचालक कहते हैं- "सत्ता से जो वंचित रहे हैं, ऐसे सत्ता चाहने वाले राजनीतिक दलों के पुन: सत्ता प्राप्ति के प्रयास, यह प्रजातंत्र में चलने वाली एक सामान्य बात है। लेकिन उस प्रक्रिया में भी एक विवेक का पालन अपेक्षित है कि वह राजनीति में चलने वाली आपस की स्पर्धा है, शत्रुओं में चलने वाला युद्ध नहीं। स्पर्धा चले, स्वस्थ चले, परंतु उसके कारण समाज में कटुता, भेद, दूरियों का बढऩा, आपस में शत्रुता खड़ी होना, यह नहीं होना चाहिए। ध्यान रहे, इस स्पर्धा का लाभ लेने वाली, भारत को दुर्बल या खण्डित बनाकर रखना चाहने वाली, भारत का समाज सदा कलहग्रस्त रहे इसलिए उसकी विविधताओं को भेद बता कर, या पहले से चलती आई हुई दुर्भाग्यपूर्ण भेदों की स्थिति को और विकट व संघर्षयुक्त बनाते हुए, आपस में झगड़ा लगाने वाली शक्तियां, विश्व में हैं व उनके हस्तक भारत में भी हैं। उनको अवसर देने वाली कोई बात अपनी ओर से ना हो, यह चिंता सभी को करनी पड़ेगी।" 

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में स्वदेशी के विचार पर प्रकाश डाला। उसकी आवश्यकता को रेखांकित किया। चीन के सामने पूर्ण सामर्थ्य के साथ खड़े होने के लिए सरकार की नीति की सराहना की। उन्होंने दोहराया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सम्पूर्ण देश में बंधुता, पुरुषार्थ तथा न्याय, नीतिपूर्ण व्यवहार का वातावरण चतुर्दिक खड़ा करने का प्रयास अपनी स्थापना के समय से कर रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि अपने संविधान को यशस्वी करने के लिए पूरे समाज में स्पष्ट दृष्टि, परस्पर समरसता, एकात्मता की भावना तथा देश हित सर्वोपरि मानकर किया जाने वाला व्यवहार इस संघ कार्य से ही खड़ा होगा। इस पवित्र कार्य में प्रामाणिकता से, निस्वार्थ बुद्धि से एवं तन-मन-धन पूर्वक देशभर में लक्षावधि स्वयंसेवक लगे हैं। आपको भी उनके सहयोगी कार्यकर्ता बनकर देश के नवोत्थान के इस अभियान के रथ में हाथ लगाने का आवाहन करता हूँ।" 

निस्संदेह, सरसंघचालक मोहन भागवत का यह उद्बोधन देश की सज्जन शक्ति के मध्य विमर्श का विषय बनना चाहिए। उनके विचारों को आधार बनाकर 'विश्वगुरु भारत' की राह बनानी चाहिए। संगठित होकर देश को मजबूत करने की आधारशिला रखनी चाहिये। उनके आग्रह/आह्वान को अपने जीवन में उतार कर श्रेष्ठ भारत के नवनिर्माण के प्रयत्न करने चाहिए। संघ के इस 'ईश्वरीय कार्य' में सहस्त्रों राष्ट्रभक्त नागरिकों के सहयोग की आवश्यकता है। अपने उद्बोधन को उन्होंने प्रेरक गीत की दो पंक्तियों के साथ पूरा किया- 

"प्रश्न बहुत से उत्तर एक, कदम मिलाकर बढ़ें अनेक।

वैभव के उत्तुंग शिखर पर, सभी दिशा से चढ़ें अनेक।