भारत में 'जय श्री राम' कहने पर फतवे जारी होने लगें, तब यह विचार जरूर करना चाहिए कि क्या देश में सब कुछ ठीक चल रहा है? सभी मत-पंथ के प्रवर्तक यह दावा करते हैं कि उनका पंथ सर्व-धर्म सद्भाव की सीख देता है। प्रत्येक संप्रदाय के रहनुमा कहते हैं कि उनके पंथ की प्राथमिक शिक्षाओं में शामिल है कि औरों के धर्म का सम्मान करना चाहिए। अगर इस्लाम के संबंध में भी यह सच है, तब प्रश्न उठता है कि 'जय श्री राम' बोलने वाले बिहार सरकार के मंत्री खुर्शीद आलम के खिलाफ फतवा जारी होना चाहिए था या फिर खुर्शीद आलम के खिलाफ फतवा जारी करने वाले मुफ्ती सोहेल कासमी का बहिष्कार होना चाहिए था? मुफ्ती फतवा जारी करने तक ही नहीं रुका है, बल्कि उसने कहा है कि राम और रहीम एक साथ नहीं रह सकते। यह कैसी अलगाववादी सोच को प्रस्तुत कर रहे हैं? क्या कुरान में यह लिखा है कि दो विभिन्न विचार एक-दूसरे के साथ एक-दूसरे का सम्मान करते हुए नहीं रह सकते?
गुरुवार, 3 अगस्त 2017
मंगलवार, 1 अगस्त 2017
मॉब लिंचिंग और उसका सच
मौजूदा समय में विपक्ष मुद्दा विहीन और भ्रमित दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि बीते सोमवार को संसद में 'मॉब लिंचिंग' जैसे बनावटी मुद्दे पर सरकार को घेरने का असफल प्रयास कांग्रेस ने किया। निश्चित ही भीड द्वारा की जा रही घटनाएं सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं हैं। इनकी निंदा की जानी चाहिए और इस प्रवृत्ति पर कठोरता से कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन, यह जिम्मेदारी किसकी है? क्या केंद्र सरकार 'मॉब लिंचिंग' की घटनाओं के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है? क्या यह राज्यों की कानून व्यवस्था से जुड़ा मसला नहीं है? राज्यों के मामले में केंद्र सरकार का दखल देना क्या उचित होगा? यह भी देखना होगा कि 'मॉब लिंचिंग' की घटनाएं अभी अचानक होने लगी हैं या फिर इस प्रकार की घटनाओं का अपना इतिहास है? जब कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने मॉब लिंचिंग के मुद्दे को संसद में उठाया, तब उनसे सत्ता पक्ष ने इसी प्रकार के प्रश्नों के उत्तर चाहे। स्वाभाविक ही कांग्रेस के पास उक्त प्रश्नों के उत्तर नहीं थे।
शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
राष्ट्रगीत के सम्मान में न्यायालय का निर्णय
भारतीय संविधान में 'वंदेमातरम्' को राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' के समकक्ष राष्ट्रगीत का सम्मान प्राप्त है। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने 'वन्देमातरम्' गीत को देश का राष्ट्रगीत घोषित करने का निर्णय लिया था। यह अलग बात है कि यह निर्णय आसानी से नहीं हुआ था। संविधान सभा में जब बहुमत की इच्छा की अनदेखी कर वंदेमातरम् को राष्ट्रगान के दर्जे से दरकिनार किया गया, तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने वंदेमातरम् की महत्ता को ध्यान में रखते हुए 'राष्ट्रगीत' के रूप में इसकी घोषणा की। बंगाल के कांतल पाडा गाँव में 7 नवंबर, 1876 को रचा गया यह गीत 1896 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गाया गया। गीत के भाव ऐसे थे कि राष्ट्रऋषि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का लिखा 'वंदेमातरम्' स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिवीरों का मंत्र बन गया था। 1905 में जब अंग्रेज बंगाल के विभाजन का षड्यंत्र रच रहे थे, तब वंदेमातरम् ही इस विभाजन और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बुलंद नारा बन गया था। रविन्द्र नाथ ठाकुर ने स्वयं कई सभाओं में वंदेमातरम् गाकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जन सामान्य को आंदोलित किया।
मंगलवार, 25 जुलाई 2017
चीन और कम्युनिस्टों की भाषा एक-सी
पिछले कुछ समय से भारत और चीन के साथ सीमा विवाद गहराया हुआ है। दरअसल, चीन की विस्तावादी नीति के मार्ग में भारत मजबूती के साथ खड़ा हो गया है। चीन सिक्कम क्षेत्र के डोकलाम क्षेत्र में सड़क बनाना चाहता है, जिस पर भारत को बहुत आपत्ति है। यह क्षेत्र भारत, भूटान और चीन को आपस में जोड़ता है। यह स्थल सीमा सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भूटान भी चीन की विस्तारवादी मानसिकता का डटकर विरोध कर रहा है। बहरहाल, सीमा पर भारत के सख्त और स्पष्ट रुख से चीन का मीडिया बौखला गया है। चीनी मीडिया लगातार भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है। चीनी मीडिया ने पहले भारत को 1962 के युद्ध की धौंस दिखाते हुए गीदड़ भभकी दी। चीनी मीडिया ने सोचा था कि भारत उसकी धमकी से डर जाएगा और उसके मार्ग से हट जाएगा। सीमा पर उसको मनमर्जी करने देगा। लेकिन, चीन की यह गीदड़ भभकी किसी काम नहीं आई। उसके बाद भी चीनी मीडिया भारत के संदर्भ में अनर्गल लिखता रहा। लेकिन, अभी हाल में चीनी मीडिया में जिस तरह की टिप्पणी आई है, वह चौंकाने वाली है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है- ''भारत में उभर रहे 'हिंदू राष्ट्रवाद' की वजह से भारत-चीन के बीच युद्ध हो सकता है। राष्ट्रवादी उत्साह में 1962 के युद्ध के बाद से ही चीन के खिलाफ बदला लेने की मांग भारत के भीतर उठ रही है। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को चुने जाने से देश में राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ावा मिला है।''
गुरुवार, 20 जुलाई 2017
कितना आसान है हिंदुत्व का अपमान
अपनी ही भूमि पर हिंदुत्व का अपमान आसानी से किया जा सकता है, इस बात को एक बार फिर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता नरेश अग्रवाल ने सिद्ध कर दिया। राज्यसभा में बुधवार को उन्होंने हिंदुओं के भगवान राम, माता जानकी और भगवान विष्णु को लेकर अमर्यादित टिप्पणी कर दी। गली-चौराहे के नेता की तरह बोलते हुए उन्होंने हिंदुओं की आस्था के केंद्र राम, माता जानकी और विष्णु को शराब से जोड़ दिया। उनकी टिप्पणी सरासर हिंदुत्व का अपमान है। क्या यह सीधे तौर पर हिंदू आस्थाओं पर चोट नहीं है? बिना विचार किए कही गई अपनी इस टिप्पणी को लेकर नरेश अग्रवाल को तनिक भी अफसोस नहीं हुआ। उन्हें कतई यह नहीं लगा कि उन्होंने देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने अग्रवाल के बयान पर आपत्ति जताते हुए उनसे माफी की माँग की तब उन्होंने साफ-तौर पर इनकार कर दिया। बाद में, बे-मन से कहा कि अगर उनकी टिप्पणी से किसी की भावना को ठेस पहुंची है, तो वह उसे वापस लेते हैं। स्पष्ट है कि उन्हें अपनी गलती के लिए कोई मलाल नहीं था।
बुधवार, 19 जुलाई 2017
एक राष्ट्र-एक ध्वज की कल्पना के विरुद्ध है कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की मंशा
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार राज्य के लिए अलग झंडा बनाने की ओर बढ़ रही है। उसने कर्नाटक का ध्वज तय करने के लिए नौ सदस्यों की एक समिति भी गठित कर दी है। यह समिति झंडा का आकल्पन और उसके संवैधानिक पहलुओं की पड़ताल करेगी। फिलहाल तो केंद्र सरकार ने संविधान का हवाला देकर कर्नाटक के एम. सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की गैरजरूरी माँग को ठुकरा दिया है। राज्य के लिए अलग ध्वज की माँग न केवल बेतुकी है, बल्कि यह अलगाव और विभेद की भावना को उत्पन्न करने वाला अविवेक से भरा कदम भी है। हमने देखा है कि हिंदी भाषा के समानांतर भारतीय भाषाओं की अस्मिता के प्रश्न जब राजनीतिक दृष्टिकोण से उठाए गए, तब भारतीय भाषाओं का आपसी सौहार्द कैसे द्वेष में बदल गया?
रविवार, 16 जुलाई 2017
कम्युनिज्म से अध्यात्म की यात्रा-2
तुष्टीकरण की आग में जल रहे हैं पश्चिम बंगाल के हिंदू
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| कबीर चबूतरा में लेखक लोकेन्द्र सिंह |
रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस और रविन्द्र नाथ ठाकुर की जन्मभूमि पश्चिम बंगाल आज सांप्रदायिकता की आग में जल रही है। वहाँ हिंदू समुदाय का जीना मुहाल हो गया है। यह स्थितियाँ अचानक नहीं बनी हैं। बल्कि सुनियोजित तरीके से पश्चिम बंगाल में हिंदू समाज को हाशिए पर धकेला गया है। यह काम पहले कम्युनिस्ट सरकार की सरपरस्ती में संचालित हुआ और अब ममता बनर्जी की सरकार चार कदम आगे निकल गई है। आज परिणाम यह है कि पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में हिंदू अल्पसंख्यक ही नहीं हुआ है, अपितु कई क्षेत्र हिंदू विहीन हो चुके हैं। राजनीतिक दलों की देखरेख में बांग्लादेशी मुस्लिमों ने सीमावर्ती हिस्सों में जो घुसपैठ की जा रही है, उसके भयावह परिणामों की आहट अब सुनाई देने लगी है। मालदा, उत्तरी परगना, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर जैसे इलाकों में जब चाहे समुदाय विशेष हंगामा खड़ा कर देता है। घर-दुकानें जला दी जाती हैं। थाना फूंकने में भी उग्रवादी भीड़ को हिचक नहीं होती है। दुर्गा पूजा की शोभायात्राओं को रोक दिया जाता है। पश्चिम बंगाल की यह स्थिति बताती है कि सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से समृद्ध यह राज्य सांप्रदायिकता एवं तुष्टीकरण की आग में जल रहा है। सांप्रदायिकता की इस आग से अब पश्चिम बंगाल का हिंदू झुलस रहा है। अपने उदारवादी स्वभाव के कारण इस प्रकार के षड्यंत्रों को अनदेखा करने वाले हिंदू समाज का मानस अब बदल रहा है। भविष्य में पश्चिम बंगाल में इस बदलाव के परिणाम दिखाई दे सकते हैं। आप इस संस्मरण से भी समझ सकते हैं कि कैसे पश्चिम बंगाल का हिंदू जाग रहा है। उसे अपने हित-अहित दिखाई देने लगे हैं।
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