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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

'विश्वगुरु भारत' के निर्माण का पाथेय

संघ दर्शन : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष की पूर्णता पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने रखी भविष्य की रणनीति


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में विजयादशमी पर सरसंघचालक के बौद्धिक का विशेष महत्त्व है। चूँकि विजयादशमी संघ की स्थापना का दिन है, इसलिए इस दिन होने वाले उद्बोधन में भविष्य के लिए पाथेय रहता है। इस बार सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण था क्योंकि एक प्रकार से यह संघ के शताब्दी वर्ष की पूर्णता का प्रसंग भी था। विगत एक वर्ष में संघ रूपी राष्ट्रीय आंदोलन की 100 वर्ष की यात्रा पूर्ण होने पर देशभर में संघ शताब्दी वर्ष मनाया गया। शताब्दी वर्ष के बाद संघ की रीति-नीति क्या रहेगी, यह केवल स्वयंसेवकों की जिज्ञासा का विषय नहीं है, अपितु समूचा देश जानना चाहता है कि संघ कार्य किस रूप में आगे बढ़ेगा। सरसंघचालक डॉ. भागवत जी के उद्बोधन में इस संदर्भ में पर्याप्त संकेत मिलते हैं। उनका विजयादशमी बौद्धिक भारत के आत्मबोध, संगठित पुरुषार्थ और भावी दिशा का व्यापक दर्शन प्रस्तुत करता है। उनके पूरे उद्बोधन को सार रूप में प्रस्तुत करना हो तो हम कह सकते हैं कि संघ की यह शतकपूर्ति केवल एक यात्रा का पड़ाव नहीं, बल्कि भारत को उसकी मौलिक अस्मिता (स्व) और वैश्विक उत्तरदायित्व के साथ पुनः प्रतिष्ठित करने का संकल्प-पर्व है।

देखें यह वीडियो : विजयादशमी और आरएसएस - संगठित शक्ति, शस्त्र पूजन और सीमोल्लंघन का वास्तविक अर्थ

सरसंघचालक जी ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में हम स्वयं को ‘हम भारत के लोग’ के रूप में संबोधित करते हैं। यह संबोधन केवल राजनीतिक शब्दावली नहीं, बल्कि विविधताओं से भरे समाज को भावनात्मक रूप से एकरस सूत्र में पिरोने का संकल्प है। भारत की सनातन दृष्टि की विशेषता यही रही है कि इसने सृष्टि की बाह्य विविधता को सहज स्वीकार किया, किंतु उसके भीतर प्रवाहित शाश्वत एकता को अटल सत्य माना। जब-जब हम इस एकात्मता के प्रति सजग रहे, भारत विश्वगुरु पद पर आरूढ़ रहा; और जब आत्मविस्मृति, आपसी फूट और संकीर्णता ने घर किया, तब देश ने सदियों की पराधीनता झेली। आज स्वाधीनता के बाद प्रगति की राह पर बढ़ते हुए हमें उसी आत्मबोध को पुनः जागृत करना होगा।

एक बात उन्होंने यह भी बहुत महत्त्व की कही कि देश की स्वतंत्रता के लिए जितना तप और समर्पण किया गया था, उससे कहीं अधिक की आवश्यकता वर्तमान परिस्थितियों में भारत को आगे ले जाने के लिए पड़ेगी। भारत के भीतर और बाहर की कुछ ताकतें देश को आगे बढ़ते देखना नहीं चाहती हैं। देश को जिस प्रकार से अराजकता में धकेलने का प्रयास किया जा रहा है, उससे भारत के विरुद्ध व्यापक साजिश के संकेत मिलते हैं। देश की युवा शक्ति और अन्य नागरिकों को इस षड्यंत्र से बचाने तथा उनकी ऊर्जा को देश के विकास में लगाने के लिए सबको मिलकर अथक प्रयत्न करने होंगे। इसलिए उनका यह संकेत उचित ही जान पड़ता है कि वर्तमान परिस्थितियों में देश के उत्थान के लिए अधिक तपस्या और समर्पण की आवश्यकता है।

सुनिए शानदार गीत : शत वर्षों की अथक तपस्या, त्याग और बलिदान | RSS Shatabdi Geet | RSS 100 Years Song

युवाओं के लिए संदेश :

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के बौद्धिक का एक बड़ा हिस्सा युवाओं पर केंद्रित रहा। किसी भी देश की युवा शक्ति उसका भविष्य होती है। भारत जिस तरह से आगे बढ़ रहा है, आगे चलकर उसकी बागडोर वर्तमान समय की युवा पीढ़ी को ही थामनी है। इसलिए जरूरी है कि आज की युवा शक्ति संस्कारित, राष्ट्रभक्त और सामर्थ्यवान बने। उन्होंने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में भारत को ‘परमवैभव संपन्न विश्वगुरु’ बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी युवा पीढ़ी के कंधों पर ही आने वाली है। इस ऐतिहासिक चुनौती को स्वीकार करने और उसमें सफल होने के लिए युवाओं को हर दृष्टि से तैयार रहना चाहिए। उन्होंने आज के डिजिटल और सूचना युग में सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध अनियंत्रित सामग्री के प्रति युवाओं को आगाह किया। जानकारी सुलभ होना अच्छा है, किंतु उसमें क्या सही है और क्या गलत, इसका विवेक युवाओं को स्वयं जागृत करना होगा। उन्होंने युवाओं के समक्ष राष्ट्रहित में समर्पण का भाव रखने पर बल दिया और कैप्टन स्मित मच्छार जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए बताया कि राष्ट्र और समाज की रक्षा के लिए तत्पर रहना ही भारतीय युवा का स्वाभाविक संस्कार होना चाहिए। इसी प्रकार, नशे को एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती बताते हुए उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे किसी भी प्रकार के व्यसन या नशीली दवाओं की लत जैसी प्रवृत्तियों से स्वयं को पूरी तरह दूर रखें और चरित्रवान जीवन जिएं। हम देख रहे हैं कि विभिन्न अराष्ट्रीय ताकतें एवं वैचारिक समूह अपने क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिए युवाओं में जाति, भाषा, पंथ और क्षेत्र के आधार पर विभाजन के बीज बो रहे हैं। अगर हमने अपनी राष्ट्रीय पहचान को गौण कर दिया और इन संकीर्ण पहचानों के चक्रव्यूह में उलझ गए, तो हम अपने मार्ग से भटक जाएंगे। इसलिए सरसंघचालक जी ने युवाओं का आह्वान किया कि वे संकीर्ण पहचानों (जाति, भाषा, पंथ या क्षेत्र के अहंकार) और विभेदकारी षड्यंत्रों से बचकर भारत-भक्ति, पूर्वजों के गौरव और सनातन संस्कृति के आधार पर एकजुट होकर संगठित पुरुषार्थ में प्रवृत्त हों।

आचरण से व्यवस्था तक का मार्ग है ‘पंच परिवर्तन’ :

संघ ने समाज-जीवन के सर्वांगीण रूपांतरण के लिए पंच परिवर्तन की रूपरेखा सामने रखी है। यह केवल वार्षिक आयोजनों का विषय नहीं, बल्कि जीवन की दैनिक आदतों और संस्कारों का स्थायी हिस्सा बनना चाहिए। विगत दो वर्षों में, विशेषकर शताब्दी वर्ष में, संघ की ओर से अपने स्वयंसेवकों एवं समाज के अन्य बंधुओं से पंच परिवर्तन के पाँच सूत्रों को अपने आचरण में उतारने का आह्वान किया गया है। सामाजिक समरसता यानी भेदभाव से मुक्त, समतायुक्त और समरस समाज। कुटुम्ब प्रबोधन अर्थात् परिवारों में परस्पर संवाद, स्नेह और सांस्कृतिक मूल्यों का संवर्धन। पर्यावरण संरक्षण यानी प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली। ‘स्व’ का बोध व स्वदेशी के अंतर्गत अपनी भाषा, संस्कृति और स्वदेशी उत्पादन के प्रति आग्रह। और, नागरिक अनुशासन अर्थात् कानून, सार्वजनिक स्वच्छता और नागरिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन। ये बातें ऐसी हैं, जिनका आचरण समाज का कोई भी व्यक्ति कर सकता है। पंच परिवर्तन का विचार किसी भी दलगत या संकीर्ण राजनीति से परे है, इसलिए सभी को इसे अपने जीवन में उतारना चाहिए।

देखिए : क्या है आरएसएस का पंच परिवर्तन का एजेंडा - डॉ. मोहन भागवत, सरसंघचालक  

समग्र व संतुलित विकास का प्रतिमान :

हिमालयी क्षेत्र और नेपाल की हालिया प्राकृतिक त्रासदियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने चेताया कि प्रकृति की अनदेखी कर किया गया एकांगी व उपभोगवादी विकास विनाशकारी सिद्ध होता है। भारत को विश्व के समक्ष ‘एकात्म और समग्र विकास’ का प्रतिमान रखना होगा, जो मनुष्य, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करे। हमारी सनातन संस्कृति (सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा) विश्व को यही समन्वय और संयम का मार्ग दिखाती है।

हिन्दू भाव - सर्वसमावेशी और निस्वार्थ राष्ट्रबोध :

सरसंघचालक डॉ. भागवत जी ने रेखांकित किया कि ‘हिन्दू भाव’ किसी विशेष पूजा-पद्धति, भाषा, खान-पान या प्रांत तक सीमित नहीं है। यह एक जीवन दृष्टि है, जिसमें आध्यात्मिकता, मानवता और विश्वबंधुत्व समाहित है। एक प्रकार से यह उन सबके लिए उत्तर था, जो लगातार हिन्दू विचार पर आघात करते हैं। पिछले दिनों न्यायालय ने भी कहा कि हिन्दू एक सर्वसमावेशी विचार है। जब दुनिया के कई संप्रदाय केवल अपने ही मार्ग को सही मानते हैं, तब भारत का विचार कहता है कि अपने लक्ष्य या सत्य तक पहुँचने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं। सबको साथ लेकर चलना भारत और हिन्दू का सहज स्वभाव है। राष्ट्रबोध कैसा होना चाहिए, इस पर उन्होंने बहुत सुंदर बात कही- “राष्ट्र से हमारा नाता किसी लेन-देन या शर्त पर नहीं, बल्कि हृदय की निष्काम भावना पर आधारित है- तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहे न रहें।”