शनिवार, 7 मई 2016

कन्हैया और विवाद, चोली-दामन का साथ

 देशद्रोह के आरोपी कन्हैया कुमार और विवादों का चोली-दामन का साथ हो गया है। जहाँ-जहाँ कन्हैया कुमार जाता है, वहाँ-वहाँ विवाद उनके पीछे पहुंच जाते हैं। इन विवादों के पीछे कितनी हकीकत है और कितना फसाना, इसका आकलन लोग अपने-अपने हिसाब से कर रहे हैं। इस बात में कोई दोराय नहीं है कि जेएनयू में हुई देशद्रोही नारेबाजी के बाद कन्हैया कुमार और उनकी गैंग के खिलाफ आम समाज में गहरी नाराजगी है। कन्हैया कुमार के साथ मारपीट या फिर अन्य तरीकों से दर्ज कराए गए विरोध के पीछे आम आदमी का आक्रोश है। लेकिन, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इन सबके पीछे 'पब्लिसिटी स्टंट' है। विमान में गला दबाने के प्रकरण में यह साबित भी हो चुका है। मुम्बई से पुणे जाते वक्त कन्हैया ने जिस सहयात्री पर गला दबाने का आरोप लगाया था, उसने पलटकर कहा था कि कन्हैया कुमार सस्ती लोकप्रियता हासिल करना चाह रहा है। पुलिस की जाँच में भी यह साबित हुआ था कि कन्हैया कुमार का आरोप निराधार है। आखिर इससे कोई कैसे इनकार कर सकता है कि देशद्रोह के आरोप में अंतरिम जमानत पर जेल से बाहर चल रहा कन्हैया कुमार लोगों की सहानुभूति पाने के लिए इस तरह के प्रोपोगंडा को हवा दे रहा हो। आखिर तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाने में उनकी विचारधारा (वामपंथ) को खासा अनुभव हासिल है। इंच-इंच बात को बिलात भर बनाने में वामपंथी सिद्ध हैं। कन्हैया कुमार के खिलाफ होने वाला विरोध और विवाद महज राजनीतिक प्रोपोगंडा है और कुछ नहीं। इस बात पर यकीन करना इसलिए भी आसान हो जाता है क्योंकि देखने में आता है कि कन्हैया को काले झण्डे दिखाने वाला, उसका गला दबाने वाला या फिर उसकी ओर जूता उछालने वाला कोई भी हो, लेकिन कन्हैया गैंग भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ उसे नत्थी कर देती है। यानी बेतुके विरोध और विवाद को हथियार बनाकर राष्ट्रवादी ताकतों पर हमला किया जाता है। इसलिए यह शंका बलबती होती है कि यह विवाद और विरोध गढ़े तो नहीं जा रहे।
 
        पटना में रविवार (एक मई) को हुए घटनाक्रम को देखें तो पुन: यह बात साबित हो जाती है कि कन्हैया कुमार को गरीबों, मजदूरों, पीडि़तों, शोषितों और दलितों की कोई फिक्र नहीं है बल्कि वह तो राजनीति का आनंद ले रहे हैं। कन्हैया गैंग जिस आजादी की बात कर रही है, उसे सिर्फ अपने लिए चाहती है। वरना क्या कारण था कि कन्हैया के विरोध में काले झण्डे दिखाने वाले और भारत माता की जय के नारे लगाने वाले दो युवकों को जमकर पीटा जाता है। सैकड़ों की तादात में कन्हैया समर्थक युवकों पर इस कदर पिल पड़ते हैं कि पीट-पीटकर उनके कपड़े तक फाड़ देते हैं। क्या यह असहिष्णुता नहीं है? क्या दोनों युवकों को पकड़कर आसानी से सभागार से बाहर नहीं किया जा सकता था। उन्हें पीटना क्यों जरूरी था? यदि विरोध कर रहे युवकों को पीटना जायज है तब फिर भारत माता के टुकड़े-टुकड़े करने की मंशा पालकर बैठे लोगों का साथ देने वाले कन्हैया के साथ वकीलों की पिटाई को गलत कैसे ठहराया जा सकता है? मजेदार बात देखिए कि ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन और ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन की ओर से एसके मेमोरियल हॉल में आयोजित 'आजादी' कार्यक्रम में ही 'विरोध की आजादी' को कुचलने का प्रयास किया गया। विरोध करने का अधिकार क्या सिर्फ कन्हैया गैंग को ही है? 
        इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की उच्च स्तरीय जाँच समिति की पड़ताल में दोषी साबित हुए कन्हैया कुमार बिहार आकर क्या कर रहा है? सरकारी सुविधा का आनंद लेने में कन्हैया इतना व्यस्त हो गया कि उसे नीतीश कुमार के शासन में दलितों पर हो रहा अत्याचार दिखाई नहीं दे रहा है। बिहार में अचानक तेजी से बढ़े अपराध से उसे कोई दिक्कत नहीं है। भ्रष्टाचार से आजादी माँगने वाला कन्हैया कुमार चारा घोटाले में दोषी साबित हो चुके लालू प्रसाद यादव के चरणों में शरणागत होता हुआ सबको दिख रहा है। यह वामपंथ की अवसरवादिता का ही एक उदाहरण है। भ्रष्टाचार के पर्याय बन चुके लालू प्रसाद यादव के चरणों में लहालोट होते वक्त कन्हैया कुमार के वामपंथी आदर्श कहाँ फुर्र हो गए थे? लालू के साथ खड़े होकर कन्हैया कुमार किस भ्रष्टाचार से आजादी का नारा बुलंद करेगा? बिहार में कन्हैया कुमार सिर्फ राजनेताओं से ही नहीं मिल रहा है बल्कि वह शराब कारोबारियों से भी घंटों बतिया रहा है। शराब कारोबारी विनोद जायसवाल और कन्हैया कुमार की मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे हैं। वैसे कन्हैया स्वयं भी मानता है कि किसी को शराब पीने से रोकना अच्छी बात नहीं है। कन्हैया को उन महिलाओं से पूछना चाहिए कि जिनके पति शराब पीकर न केवल उनके साथ मारपीट करते हैं बल्कि समूचे घर को बर्बाद कर देते हैं। बिहार की यह महिलाएं बताएंगी कि शराब पीना अच्छी बात है या नहीं? 
        बदनाम होकर ही सही, नाम तो हो रहा है। विवादों के जरिए भले ही कन्हैया कुमार सुर्खियां बटोर रहा हो, लेकिन एक बात समझ लेनी चाहिए कि इस तरह वह लोगों की सहानुभूति नहीं पा रहा है। लोगों के बीच यह धारणा पुष्ट हो रही है कि वह देश विरोधी होने के साथ-साथ ड्रामेबाज, अवसरवादी और चालाक भी है। इस बात की तस्दीक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में जाकर की जा सकती है। अब कन्हैया कुमार का विरोध जेएनयू के बाहर ही नहीं हो रहा है, जेएनयू के भीतर से भी विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं। राजनीति को एन्जॉय करने के लिए कन्हैया कुमार जेएनयू में भूख हड़ताल पर बैठे अपने साथियों को छोड़कर पटना आया है। यह कोई और नहीं कह रहा बल्कि उनके साथी ही कह रहे हैं। देशविरोधी गतिविधियों और अनुशासनहीनता के दोषी पाए गए छात्रों पर जेएनयू प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई के विरोध में छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने ही भूख हड़ताल शुरू कराई है। लेकिन, अब खुद ही वहाँ से भागकर बिहार में सत्ता का सुख लेने के लिए दौड़ा चला आया है। एक तरफ उसके साथी भूख हड़ताल पर बैठे हैं, दूसरी तरफ वह सियासी आवभगत का आनंद ले रहा है। बहरहाल, इतना सच है कि इन सब विवादों के दौरान कन्हैया कुमार की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा भी खुलकर धीरे-धीरे सबके सामने आ रही है और अपनी सियासत को चमकाने में उसे विवादों से नाता जोडऩे में भी कोई असुविधा नहीं है।

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