शनिवार, 17 अगस्त 2013

नैतिक मूल्य के बिना भौतिक विकास घातक

 ज ब एक पक्ष को भूलकर समाज आगे बढ़ता है तो वह विकलांग हो जाता है या फिर विकलांग होने की स्थिति में पहुंच जाता है। सब जानते हैं कि वर्तमान युग भौतिक विकास का है। सब देश और जाति-वर्ग भौतिक विकास के पीछे पूरा जोर लगाकर भाग रहे हैं। इस रेस में मनुष्य के नैतिक विकास पर कोई ध्यान नहीं दे रहा, स्वयं मनुष्य भी नहीं। यही कारण है कि हम देखते हैं कि भौतिक विकास से फायदे कम नुकसान ज्यादा हो रहे हैं। ईमानदारी से कहा जाए तो नैतिक मूल्यों के बिना भौतिक विकास संभव नहीं है। हां, नैतिक मूल्यों के बिना भौतिक विकास तो नहीं विनाश जरूर संभव है। आज अपराध, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और तमाम प्रकार की शारीरिक एवं सामाजिक बीमारियां नैतिक मूल्यों के पतन का ही कारण हैं। 
भौतिक विकास बाह्य है जबकि नैतिक विकास मनुष्य की आंतरिक क्रिया है। बाह्य विकास को साधने और उसके उपभोग के लिए नैतिक रूप से मजबूत एवं स्पष्ट होना जरूरी है। भौतिक विकास की बदौलत मनुष्य के हाथ में शक्तिशाली मशीनगन तो आ गई है, अब यदि मनुष्य के पास नैतिक मूल्य नहीं होंगे तो वह मशीनगन का सदुपयोग ही करेगा, यह कहा नहीं जा सकता। नैतिक मूल्यों के अभाव में वह मशीनगन से लोगों की हत्या भी कर सकता है। नैतिक मूल्य सशक्त और स्पष्ट हैं तो हथियार के कई सदुपयोग हो सकते हैं। मोबाइल फोन को ही ले लीजिए, एक सर्वे के मुताबिक मोबाइल फोन के आविष्कार के बाद से लोगों में झूठ बोलने की प्रवृत्ति अधिक बढ़ी है। इस तथ्य के आधार पर हम यह तो नहीं कह सकते कि मोबाइल फोन का आविष्कार झूठ बोलने के लिए किया गया था। जाहिर-सी बात है मोबाइल फोन का आविष्कार इसके लिए तो कतई नहीं किया गया था बल्कि लोगों के बीच संवाद आसान करने के लिए मोबाइल फोन का आविष्कार किया गया था। चूंकि मनुष्य भौतिक विकास की अंधीदौड़ में नैतिक रूप से पतित हो चुका है ऐसे में भौतिक वस्तुओं का वह उपयोग नहीं दुरुपयोग अधिक कर रहा है। 
देश हो, समाज या फिर मनुष्य, सबके सर्वांगीण विकास  के लिए केवल भौतिक विकास नाकाफी है, इसके साथ-साथ नैतिक विकास भी जरूरी है। महात्मा गांधी का पूरा जोर इसी बात पर था कि भौतिक विकास के साथ-साथ मनुष्यों को नैतिक रूप से सुदृढ़ करें। भारत के प्राचीन इतिहास के पृष्ठ पलटें तो हम देखते हैं कि यह देश सदैव से नैतिक मूल्यों का हामी रहा है। महान संत-ऋषि लम्बी तपस्या के बाद कोई सिद्धि प्राप्त करते थे। सरल शब्दों में कहें तो वे लम्बे समय के शोध और मेहनत के बाद कोई बड़ा आविष्कार करते थे। लेकिन, भारत के महान वैज्ञानिक ऋषि कुछ स्वर्ण मुद्राओं या शक्ति प्राप्ति की आकांक्षा में अपने आविष्कार को बेचते नहीं थे और न ही हर किसी के सामने उसको उद्घाटित करते थे। आविष्कार करने में वे जितना शोध और मेहनत करते, उतनी ही मेहनत योग्य व्यक्ति को तलाशने में करते, जो उस आविष्कार का उपयोग समाज हित में कर सके। दरअसल, उन्हें स्पष्ट था कि नैतिक रूप से पतित किसी व्यक्ति को अपना आविष्कार दे दिया तो न समाज बचेगा और न देश। भारत में तो सूक्ति भी प्रचलित है कि 
जिसका धन गया, समझो कुछ नहीं गया।
जिसका स्वास्थ्य गया, समझो कुछ गया।
जिसका चरित्र गया, समझो उसका सबकुछ गया।
स्पष्ट है कि चरित्र जाने (नैतिक मूल्यों के पतन) के बाद मनुष्य के पास कुछ शेष नहीं रह जाता। ऐसे मनुष्य के लिए भौतिक विकास भी सही मायने में निरर्थक रह जाता है। वर्तमान में भी भारत ही नहीं वरन दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिक, उद्योगपति जिनका नाम हम सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नैतिक मूल्य बहुत स्पष्ट हैं। आज भी जो अपने नैतिक मूल्यों से डिगता है, भौतिक विकास से अर्जित संपूर्ण शक्ति गंवा बैठता है। कुछ लोग प्रश्न कर सकते हैं कि क्या भौतिक विकास के प्रभाव में नैतिक मूल्य तिरोहित हो रहे हैं? इसका एक शब्द का जवाब है- नहीं। दरअसल, मनुष्य अपने दोष छिपाने के लिए तमाम बहाने गढ़ लेता है, यह उसकी फितरत है। यह सवाल और दलील भी एक बहाना ही है कि भौतिक विकास के कारण ही उनके संस्कार, परंपराएं और नैतिक मूल्य प्रभावित हो रहे हैं। अगर हम सहृदय से स्वीकार करने की मनस्थिति में तो हमें मानना होगा कि प्राचीन भारत भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही नजरिए से समृद्ध राष्ट्र था। तब भौतिक विकास के बावजूद नैतिक मूल्यों का बोलबाला था। जब-जब कोई भी भौतिक विकास में डूबा, उसका विनाश हो गया। स्वर्णमयी लंका का स्वामी रावण प्रकांड विद्वान था और ऋषिकुल में पैदा हुआ था। लेकिन, जैसे ही रावण सांसारिक प्रसाधनों के भोग में डूब गया और नैतिक मूल्यों की अनदेखी कर दी, वह समाजकंटक बन गया। अंहकारी होकर रावण ने भौतिक संसाधनों का उपयोग समाज पर अत्याचार करने में किया। आखिर में नैतिक मूल्यों के स्वामी मर्यादापुरुषोत्तम राम को उसका अंत ही करना पड़ा। यही स्थिति कंस के साथ हुई। आचार्य चाणक्य ने भी एक साधारण से बालक को महान सम्राट चंद्रगुप्त बनाकर नैतिक मूल्य खो चुके मगध के राजा घनानंद का दंभ धूल में मिलाया। वर्तमान राजनीति व्यवस्था में भी यही देखने को मिलता है, चारित्रिक रूप से भ्रष्ट हो चुके नेताओं का राजनीतिक कॅरियर जनता खत्म कर देती है। बहरहाल, बात इतनी-सी है कि भौतिक विकास देश और मानव समाज के लिए जितना जरूरी है उससे कहीं अधिक नैतिक मूल्यों का विकास और सुदृढ़ीकरण जरूरी है। एक पंक्ति की बात है - नैतिक मूल्यों के बिना भौतिक विकास लोक कल्याणकारी नहीं हो सकता।  

5 टिप्‍पणियां:

  1. सारगर्भित आलेख!

    नैतिकता बची रहे, तो रास्ते स्वयं खुलेंगे!

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  2. जिस प्रकार पेट में गये अन्न से सारा शरीर पोषण पाता है, उसी प्रकार देश और समाज भी चलने चाहिये।

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  3. एक एक बात सत्य है । मूल्य खो रहे हैं इसलिये हर क्षेत्र में गिरावट आई है । और आगे वह गिरना ही है ।और इसके बाद चाहे कितनी ही आर्थिक उन्नति होजाए लेकिन मानसिक तृप्ति व शान्ति नही मिलेगी ।

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  4. आपकी बात से एकदम सहमत हूँ लोकेन्द्र जी। नैतिक सुदृढता के बिना भौतिक उन्नति एक छलावा ही है।

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