रविवार, 28 जून 2026

लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष

संघ शताब्दी वर्ष : आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया, लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया 

विश्व में भारतीय लोकतंत्र का उदाहरण दिया जाता है। यह सच है कि दुनिया में सबसे अधिक जीवंत और विशाल लोकतंत्र भारत में ही दिखायी देता है। लोकतंत्र भारत की परंपरा में है, इसलिए उसको जीना और संभालना हमें बखूबी आता है। परंतु, 25 जून 1975 वह दिनांक है, जब भारत के लोकतंत्र पर संकट आ गया था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने देश पर आपातकाल थोप दिया। लोकतंत्र को घसीटकर सींखचों के पीछे डाल दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पंख नोंच लिए गए। रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकारी समाप्त कर दिए गए। संविधान और लोकतंत्र पर हुए इस हमले का प्रतिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर किया। श्रीमती गांधी को भी यह ज्ञात था कि लोक संघर्ष समिति के आपातकाल विरोधी जनांदोलन को संगठित रूप से चलाने के पीछे संघ का अनुशासित कार्यकर्ता है। इसलिए उन्होंने 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु, यह प्रतिबंधन संघ के स्वयंसेवकों को आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष एवं सत्याग्रह करने से रोक नहीं सका। संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए जिस प्रकार आगे बढ़कर संघ के स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करते हुए पुलिस की बर्बाता का सामना किया, उसे देखकर संघ से असहमति रखनेवाले नेता एवं विचारकर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुरीद बन गए।

शनिवार, 27 जून 2026

सुशासन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है हिन्दू साम्राज्य दिवस

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी वह तिथि है, जिसने भारत के भाग्य का निर्धारण किया, इसी दिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की घोषणा की 

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के ऐसे अद्वितीय नायक हैं जिन्हें न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य की अनेक पीढ़ियाँ भी स्मरण करेंगी। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्होंने उस युग में, जब आक्रांताओं के अत्याचारों से भारतीय समाज शिथिल हो चुका था, तब हिन्दू समाज में उन्होंने एक नई चेतना जगाई। उसके भीतर विश्वास जगाया कि भारत में स्वराज्य की फिर से स्थापना हो सकती है, जहाँ सब स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जी सकते हैं।

शुक्रवार, 26 जून 2026

ऑस्ट्रेलिया के बाद ब्रिटेन में भी लगाई गई ‘फादर ऑफ सर्जरी’ महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा

भारत की ज्ञान-परंपरा की प्रतिष्ठा : भारत के ज्ञान-विज्ञान की वैश्विक स्वीकृति, प्रत्येक भारतीय के लिए है गर्व की बात

स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग स्थित दुनिया के सबसे पुराने ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ में महर्षि सुश्रुत की भव्य प्रतिमा का स्थापित होना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। अब जरा कल्पना कीजिए कि यदि महर्षि सुश्रुत की यह प्रतिमा स्कॉटलैंड या मेलबर्न के बजाय भारत के एम्स या किसी अन्य प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में स्थापित की जाती, तो क्या होता? यह तय है कि देश के स्वघोषित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, वामपंथी विचारकों और लिबरल जमात के बीच एक भारी ‘हाय-तौबा’ मच जाती। इसे ‘शिक्षा के भगवाकरण’, ‘विज्ञान में धर्म के हस्तक्षेप’ और ‘अंधविश्वास को बढ़ावा देने’ का नाम दे दिया जाता। यह मानसिकता भारत के उस बौद्धिक वर्ग की सबसे बड़ी त्रासदी है, जो अभी तक ‘औपनिवेशिक हैंगओवर’ से बाहर नहीं आ पाया है। इस वर्ग की समस्या यह है कि वे ‘भारतीय ज्ञान-परंपरा’ को केवल कर्मकांडों और मिथकों के चश्मे से देखते हैं। उनका पैमाना यह बन गया है कि जो कुछ भी प्राचीन भारत का है, वह अवैज्ञानिक है; और जो कुछ भी पश्चिम से आता है, वही परम सत्य है। जब तक कोई विदेशी संस्थान या विदेशी वैज्ञानिक हमारे प्राचीन ज्ञान पर अपनी मुहर नहीं लगाता, तब तक हमारे अपने बुद्धिजीवी उसे सिरे से खारिज करते रहते हैं।

बुधवार, 24 जून 2026

संविधान हत्या दिवस : इतिहास से सीखकर संविधान की रक्षा का संकल्प दिवस

लोकतंत्र और संविधान के महत्व को समझने के लिए 25 जून की तारीख बहुत महत्वपूर्ण है। भारत सरकार ने 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाने की अधिसूचना जारी की है। दरअसल, 1975 में 25 जून को ही देश पर आपातकाल थोप दिया गया था। जिसके कारण रातों-रात आम नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे, मीडिया की स्वतंत्रता पर ताले जड़ दिए गए थे, और सवाल पूछने पर लोगों को बिना किसी अपील और दलील के जेल में डाल दिया गया था।

'संविधान हत्या दिवस' मनाने का उद्देश्य किसी पुरानी पीड़ा को कुरेदना नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाना है कि जब संविधान की रक्षा नहीं होती, तो लोकतंत्र कैसे तानाशाही में बदल जाता है। यह दिन एक चेतावनी है और एक संकल्प भी, कि हम दोबारा अपने देश में ऐसा अंधकार कभी नहीं आने देंगे।

पाकिस्तान की गीदड़ भभकियां

पाकिस्तान के बड़बोले रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सिंधु नदी का पानी नहीं मिलने पर भारत पर हमला करने की धमकी दी है, उनका यह बयान पाकिस्तान की गहरी निराशा और बौखलाहट को ही दर्शाता है। इस समय पाकिस्तान अनेक प्रकार की आंतरिक चुनौतियों से घिरा हुआ है। इसलिए वह अपने देश की आवाम का ध्यान भटकाने के लिए कभी परमाणु बम की धमकी देते हैं तो कभी कभी जल युद्ध की हुंकार भरते हैं। दुनिया जानती है कि यह पाकिस्तान की गीदड़ भभकियां हैं। जो देश ऑपरेशन सिंदूर से घबराकर अमेरिका के चरणों में जाकर भारत से बचाने की गुहार लगा चुका हो, उसे इस प्रकार की बातें शोभा नहीं देती हैं। गीदड़ भभकी देने वाले पाकिस्तान को भी पता है कि यह नया भारत है, जो अपने नुकसान की कीमत ब्याज सहित वसूल करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत केवल रक्षात्मक रुख नहीं अपनाता बल्कि आक्रामक जवाब देना भी जानता है।

सोमवार, 22 जून 2026

करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिलों में है आरएसएस का पंजीयन

संघ शताब्दी वर्ष : भारत का संविधान अपने नागरिकों को संगठन, आंदोलन, विचार समूह बनाने का अधिकार देता है। इसके लिए राज्य से पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पंजीकृत क्यों नहीं है? यह अपने आय-व्यय का हिसाब-किताब क्यों नहीं देता है? आरएसएस पारदर्शिता नहीं रखता है। ये ऐसे सवाल हैं, जो संघ को बदनाम करने या उसके प्रति समाज में संदेह पैदा करने के लिए अकसर उछाले जाते हैं। हालांकि, इन सवालों का कोई औचित्य नहीं है। समाज से लेकर न्यायालय तक इन्हें खारिज कर चुके हैं। मजेदार और हास्यास्पद बात यह है कि जो लोग संविधान लहराते हुए घूम रहे हैं, उन्हें यह भी नहीं पता है कि संविधान ही यह अधिकार देता है कि भारत के नागरिक बिना किसी पंजीयन के संगठन, समिति, समूह बनाकर समाज में काम कर सकते हैं। इसलिए कहा जाता है कि संविधान लहराने की वस्तु नहीं है, अपितु उसका अध्ययन करना चाहिए और पालन भी। लेकिन नहीं, उन्हें तो प्रोपेगेंडा खड़ा करने में ही आनंद आता है। जरा सोचिए, यदि आरएसएस के लिए पंजीयन अनिवार्य होता तब क्या कांग्रेस बिना पंजीयन संघ को इतने वर्ष चलने देती? कांग्रेस की सरकारों ने संघ को तीन बार प्रतिबंधित किया लेकिन उसको पंजीयन के लिए कभी बाध्य नहीं किया। महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर जब संघ पर प्रतिबंध लगाया था, तब उसके विरुद्ध स्वयंसेवकों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया। सरकार को बिना शर्त संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। सरकार ने अपने आपको शर्मिंदगी से बचाने के लिए संघ से उसके संविधान की लिखित कॉपी तो मांगी, लेकिन उस समय भी पंजीयन नहीं माँगा। यह स्थिति तब है जबकि उस समय की सरकार येन-केन-प्रकारेण संघ को कुचलना या उस पर अपना नियंत्रण चाहती थी। बहरहाल, उसके बाद भी सरकार ने कभी संघ का पंजीयन नहीं माँगा। हाँ, संघ को रोकने के सारे हथकंडे अवश्य अपनाए गए, आज भी अपनाए जा रहे हैं। लेकिन समाज का विश्वास जीतकर संघ अजेय शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है। इस मामले में सच यह है कि आज भी पंजीयन की माँग नहीं होती अपितु इस फर्जी प्रश्न की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का प्रयास किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में प्रारंभ से यह स्पष्ट किया जाता रहा है कि संघ भारत के सभी कानूनों का सम्मान करता है और उनके दायरे में रहकर ही कार्य करता है।

शनिवार, 20 जून 2026

श्रीगुरुजी के सरसंघचालक बनने की कहानी

संघ शताब्दी वर्ष : “सरसंघचालक का दायित्व विक्रमादित्य के सिंहासन जैसा है। अगर कोई अज्ञानी लड़का भी इस पर बैठता है, तो वह भी इस पर बैठकर एक बराबर न्याय करेगा” - श्रीगुरुजी


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर साहब) के बाद इस राष्ट्रीय विचार के आंदोलन की बागडोर कौन संभालेगा? अगला सरसंघचालक कौन होगा? यह प्रश्न जब किसी के मन में भी नहीं आया था, तब से डॉक्टर साहब ने सरसंघचालक के लिए योग्य व्यक्ति की खोज प्रारंभ कर दी थी। यह बहुत आवश्यक था कि संघ का नेतृत्व ऐसे व्यक्तित्व को सौंपा जाए, जिसके प्रति श्रद्धा हो। जिसके नेतृत्व में संघ सरिता का वेग बढ़े, न कि उसमें बहता पानी ही सूख जाए। डॉक्टर साहब की आँखों के सामने से ऐसे अनेक संगठनों की कहानियां गुजर रही थीं, जो एक व्यक्ति की संकल्पना के साथ शुरू हुए और उनके जाने के साथ ही धुंधले पड़ गए। हालांकि, डॉक्टर साहब ने राष्ट्रीय आंदोलन की जो कहानी लिखी थी, उसके बीज उन्होंने अनेक लोगों के मन में बो दिए थे। अब भारत को परम वैभव पर पहुँचाने का संघ का सपना केवल डॉक्टर साहब का सपना नहीं रह गया था, यह सपना सबका अपना सपना बन गया था। डॉ. हेडगेवार व्यक्तियों के बड़े पारखी थे। कोई हीरा व्यापारी भी असली हीरा पहचानने में धोखा खा सकता है लेकिन डॉक्टर साहब व्यक्ति की पहचान में सिद्ध थे। संन्यास जीवन से वापस सामाजिक क्षेत्र में लौटे माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को अपना उत्तरदायित्व सौंपने का निर्णय वे अपने मन में कर ही चुके थे। डॉक्टर साहब ने संघ में सामूहिक निर्णय की कार्यपद्धति का निर्माण किया था, इसलिए उन्होंने अपने निर्णय को संघ पर थोपा नहीं अपितु उस समय के अन्य दायित्ववान कार्यकर्ताओं से भी इस संबंध में परामर्श किया। श्रीगुरुजी के संबंध में जो विचार डॉक्टर साहब के थे, अन्य साथियों के मन में भी उन्होंने वही भाव पाया।