जरूर देखिए - विश्व के प्रेरणा स्रोत हैं भगवान राम | दुनियाभर में हैं राम को माननेवाले लोग
श्रीराम भारतीय जनमानस की चेतना में केवल एक ऐतिहासिक चरित्र नहीं, बल्कि मर्यादा, कर्तव्य और आदर्श के शाश्वत प्रतीक हैं। इसलिए भारत और भारत के बाहर भी, राम पर विपुल लेखन हुआ, सिनेमा एवं नाट्य रचे गए, कला-संस्कृति में भी श्रीराम के संदेश की छाप है। हम कह सकते हैं कि आधुनिक साहित्य, सिनेमा और दृश्य कलाओं में नए सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोणों के साथ रामकथा पुनर्परिभाषित हुई है। राम की कहानी है ही ऐसी कि हम सब जितनी बार सुनते, देखते और पढ़ते हैं, उतनी बार जीवन के वास्तविक आनंद की अनुभूति होती है। इसी अलौकित आनंद की अनुभूति के लिए हम बार-बार रामकथा में डूबना चाहते हैं।
आधुनिक साहित्य एवं लेखन :
भगवान श्रीराम पर कितना विपुल लेखन किया जा चुका है। आनंद की बात है कि श्रीराम पर आज भी खूब लिखा जा रहा है और आगे भी लिखा जाता रहेगा। आधुनिक लेखकों ने नये ढंग से और अपने ढंग से राम कहानी सुनाने का प्रयास किया है। वे श्रीराम को अलौकिक ईश्वर के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही उनको एक संघर्षशील मानव, संवेदनशील शासक और अंतर्द्वंद्वों से जूझते नायक के रूप में भी दिखाने का प्रयास किया गया है। ‘राम की शक्ति-पूजा’ में सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने राम को सामान्य मनुष्य के रूप में चित्रित किया जो युद्धक्षेत्र में रावण की महाशक्ति से मुकाबला करते हुए संशय और निराशा के दौर से गुजरते हैं। आत्मशक्ति की खोज करते हैं। श्रीराम का यह रूप मानव संघर्ष, आत्मसंशय पर विजय और राष्ट्र जागरण का प्रतीक बन जाता है। इसी प्रकार, प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. नरेंद्र कोहली ने रामकथा को पारंपरिक धार्मिक या भक्तिकाव्य के रूप में नहीं, बल्कि एक यथार्थवादी, वैज्ञानिक और आधुनिक मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। उनकी रामकथा में ऋषि-मुनि केवल पूजा-पाठ करने वाले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें वैज्ञानिक, रणनीतिकार और समाज को आत्मनिर्भर बनाने वाले बुद्धिजीवी के रूप में दिखाया गया है। उनके अनुसार राक्षस कोई अलग जीव नहीं थे, बल्कि समाज का शोषण करने वाली और मानवीय शांति में बाधक बनने वाली 'प्रवृत्ति' के प्रतीक थे, जिसे उन्होंने आज के अखबारों की घटनाओं से जोड़कर समझाया है। युवाओं के प्रिय लेखक अमीश त्रिपाठी ने ‘रामचंद्र शृंखला’ में राम को नियमों के पालनकर्ता, कानून के प्रति प्रतिबद्ध और समाज सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया है।
देखें यह वीडियो : श्रीराम तीर्थ वाल्मीकि मंदिर, अमृतसर | Shri Ram Tirath Valmiki Mandir Amritsar | यही लिखी गई थी रामायण
चित्रपट एवं दृश्य माध्यम (सिनेमा व टेलीविजन) :
भगवान श्रीराम और उनकी कहानी के अन्य पात्रों पर सिनेमा, धारावाहिक और नाटकों की एक लंबी शृंखला है। रामकथा पर सिनेमा रचने में केवल भारतीय ही शामिल नहीं है, अपितु विदेशी निर्माता भी शामिल हैं। रामानंद सागर ने ‘रामायण’ पर अमर चित्रपट बनाकर इतिहास रच दिया। दूरदर्शन पर प्रसारित इस धारावाहिक में अरुण गोविल द्वारा निभाया गया राम का शांत, सौम्य और करुणामय रूप भारतीय जनमानस में स्थायी रूप से अंकित हो गया। रामानंद सागर ने एक ऐसी लकीर खींची है कि उसके आगे जाना मुश्किल हो रहा है। अभी दो-तीन वर्ष पहले कुछ निर्माताओं ने रामायण पर अपने ढंग से फिल्म बनाई। उनके प्रयोगों को दर्शकों ने नकार दिया। अब नयी टीम मैदान में है, 4000 करोड़ के बजट के साथ रामायण की कहानी सुनाने आ रहे हैं।
जापानी फिल्म निर्माता युगो साको ने बच्चों के लिए ‘रामायण: द लीजेंड ऑफ प्रिंस राम (1992)’ का निर्माण किया। लेकिन यह केवल बच्चों को नहीं, अपितु सबको पसंद आई। इसे जापानी एनीमेशन और भारतीय कथा के अनूठे समन्वय के तौर पर देखा गया।
मणिरत्नम की फिल्म रावण (2010) जैसे प्रयोगों में राम, सीता और रावण के प्रतीकों को आधुनिक पुलिस अधिकारी, बंधक और विद्रोही के जटिल द्वंद्व के रूप में प्रस्तुत किया गया। तमिल, तेलगू, गुजराती, मराठी और कन्नड सहित अन्य भारतीय भाषाओं में भी रामकथा पर सिनेमा रचा गया है।
![]() |
| मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित 'अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक सम्मेलन' में यह विषय प्रस्तुत किया। |
तेलुगू सिनेमा : संपूर्ण रामायणमु (Sampoorna Ramayanamu, 1958) – एन. टी. रामाराव (श्रीराम)। सीताराम कल्याणम (Seetha Rama Kalyanam, 1961) – एन. टी. रामाराव (रावण) और हरनाथ (राम)। लव कुश (Lava Kusa, 1963) – यह तेलुगू सिनेमा की मील का पत्थर मानी जाने वाली रंगीन फिल्म है, जिसमें एन. टी. रामाराव ने श्रीराम और अंजलि देवी ने सीता का अभिनय किया था। श्री राम राज्यम (Sri Rama Rajyam, 2011) – बापू द्वारा निर्देशित, जिसमें नंदमुरी बालकृष्ण (श्रीराम) और नयनतारा (सीता) मुख्य भूमिका में थे।
तमिल सिनेमा : सीता कल्याणम (Seetha Kalyanam, 1934) – प्रभात टॉकीज और मुरुगादास द्वारा निर्देशित प्रारंभिक काल की प्रसिद्ध फिल्म।
कन्नड़ सिनेमा : वाल्मीकि (Valmiki, 1963) – महर्षि वाल्मीकि के जीवन और रामायण रचना पर केंद्रित फिल्म (डॉ. राजकुमार मुख्य भूमिका में)। श्री राम पूजा (Sri Rama Pooja, 1955)। दशहरा (Dashavatara, 1960) – भगवान विष्णु के दशावतारों में रामावतार प्रसंग।
मराठी सिनेमा : लंका दहन (Lanka Dahan, 1917) – दादा साहेब फाल्के द्वारा निर्मित ऐतिहासिक मूक फिल्म, जिसमें अन्ना सालुंके ने श्रीराम और सीता दोनों की भूमिका निभाई थी। सेतु बंधन (Setu Bandhan, 1932) – बाबूराव पेंटर और भालजी पेंढारकर द्वारा निर्देशित। रामराज्य (Ram Rajya, 1943) – विजय भट्ट द्वारा मराठी और हिंदी दोनों में एक साथ बनाई गई। यह एकमात्र ऐसी फिल्म मानी जाती है जिसे महात्मा गांधी ने देखा था।
गुजराती सिनेमा : संपूर्ण रामायण (Sampoorna Ramayan, 1970 के दशक) – गुजराती में डब व रूपांतरित रूप में प्रदर्शित। सीता हरण / सती सीता (Sati Sita) – गुजराती धार्मिक सिनेमा के दौर में निर्मित।
मलयालम : कंचन सीता (Kanchana Sita, 1977) – जी. अरविंदम द्वारा निर्देशित समांतर (Parallel) सिनेमा की विश्वप्रसिद्ध कलात्मक फिल्म, जो सी. एन. श्रीकंटन नायर के नाटक पर आधारित है। इसमें प्रकृति को सीता का रूप मानकर राम के अंतर्द्वंद्व को दिखाया गया है। सीता स्वयंवरम (Seetha Swayamvaram, 1976)।
बंगाली : सीता (Seeta, 1933/1934) – देबकी बोस द्वारा निर्देशित, जो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह (वेनिस) में सम्मानित होने वाली प्रारंभिक भारतीय फिल्मों में से एक थी। मेघनाद वध (Meghnad Badh) – माइकल मधुसूदन दत्त के प्रसिद्ध महाकाव्य पर आधारित विभिन्न नाट्य और सिनेमाई रूपांतरण।
असमिया / ओड़िया : सीता बिबाह (Seeta Bibaha, 1936) – ओड़िया सिनेमा की पहली सवाक (बोलती) फिल्म, जो पूरी तरह श्रीराम और सीता के विवाह प्रसंग पर ही आधारित थी।
![]() |
| अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक सम्मेलन में मंचस्थ अतिथि- डॉ. लोकेन्द्र सिंह, फिल्म अभिनेता राजा बुंदेला, वीर भारत न्यास के सचिव श्रीराम तिवारी और थाईलैंड के संस्कृत विद्वान डॉ. चिरापत प्रपंडविद्या |
कला एवं आधुनिक चित्रांकन :
परंपरागत लघुचित्र शैलियों (कांगड़ा, मेवाड़, मधुबनी) से आगे बढ़कर आधुनिक चित्रकारों ने रामकथा को नए कैनवास पर उकेरा। श्री अयोध्या धाम के नवीन राम मंदिर में स्थापित अरुण योगीराज द्वारा निर्मित 'बालक राम' की श्याम शिला मूर्ति पारंपरिक शिल्पशास्त्र (होयसल शैली के प्रभाव) और आधुनिक सूक्ष्म मानवीय भावों का उत्कृष्ट उदाहरण है।
आधुनिक युग में श्रीराम का स्वरूप केवल उपासना तक सीमित न रहकर न्याय, मर्यादा, मानवीय करुणा और कर्तव्यबोध के ऐसे जीवंत आदर्श के रूप में विकसित हुआ है, जो हर नए माध्यम के साथ प्रासंगिक बना रहता है।


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
पसंद करें, टिप्पणी करें और अपने मित्रों से साझा करें...
Plz Like, Comment and Share