शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

हम आलोचना कर रहे हैं या दुष्प्रचार

 प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने लंदन प्रवास के दौरान 'भारत की बात, सबके साथ' कार्यक्रम में बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा- 'आलोचनाएं लोकतंत्र की ब्यूटी होती है।' यह बात दरअसल, इसलिए महत्वूर्ण है, क्योंकि मोदी विरोधी जब-तब यह स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि वर्तमान सरकार ने उनकी अभिव्यक्ति की आजादी को समाप्त कर दिया है। अब कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं। आलोचनाओं के लिए कोई स्थान नहीं बचा है। मोदी विरोधियों के इस प्रकार के प्रयासों के कारण ही यह प्रश्न लंदन में मोदी से पूछा गया। जबकि वास्तविकता क्या है, हम जानते हैं। जो लोग यह कह रहे हैं कि देश में आलोचना के लिए स्थान नहीं बचा है, वह लोग ही खुलकर वह सब कुछ भी बोल रहे हैं, जो आलोचना की श्रेणी में नहीं अपितु दुष्प्रचार की श्रेणी में आता है। यहाँ तक कि घृणा की श्रेणी में भी उसको शामिल किया जा सकता है।
           एक वर्ग मोदी विरोध में इस हद तक पहुँच गया है कि उसे सरकार की आलोचना और देश विरोध में अंतर समझ नहीं आता। लंदन से कुछ चित्र आए, जो प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में थे। कठुआ में मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले को आधार बनाकर उन पोस्टर में भारत को बलात्कारी देश बताने का प्रयास किया गया है। इसके साथ ही अन्य देशों के विमानपत्तन से ऐसे चित्र सामने आए हैं, जिनमें युवा ऐसी टी-शर्ट पहने हुए हैं, जिन पर लिखा है कि अपनी बेटियों/महिलाओं को भारत न भेजें, भारत महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। यह सरकार की आलोचना है या फिर अपने ही देश का विरोध? यदि यह आलोचना है और ऐसी घटनाओं को लेकर विरोध प्रदर्शन करने का तरीका है, तो यह बहुत ही निंदनीय है। 
          दुष्कर्म की घटना को आधार बना कर बहुत से लोगों ने 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' के आह्वान को ही विकृत कर दिया। उन्होंने एक आवश्यक अभियान के नारे के साथ जिस प्रकार का प्रयोग किया, क्या उसे उचित कहा जा सकता है? हम यदि ईमानदारी से विश्लेषण करें तो कथित बुद्धिजीवियों के एक वर्ग के लिए आज आलोचना का अर्थ मोदी विरोध हो गया है। मोदी का विरोध करते समय वह भारत, भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म का अपमान करने में भी संकोच नहीं करते हैं। उनकी आलोचना गलत दिशा में है। यह बात जनता को समझ आती है, इसलिए इतनी 'आलोचनाओं' के बाद भी मोदी को जनता का समर्थन मिल रहा है। 
जम्मू-कश्मीर के कठुआ में एक मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या का मामला सामने आया। इस प्रकार की घटनाएं सभ्य समाज में कलंक हैं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी कहा कि 70 साल बाद भी इस प्रकार की घटनाएं हो रही हैं, यह ठीक नहीं है। दुर्भाग्य है कि यह सब आज भी हो रहा है। उससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि मोदी विरोधी खेमे ने इस शर्मनाक घटना को भी अपना राजनीतिक हथियार बना लिया है। इस मुद्दे पर सिर्फ बच्ची के लिए न्याय की बात होनी चाहिए थी, उस मुद्दे पर वह सबकुछ हो रहा है, जो किसी दुष्कर्म से कम नहीं। 'आलोचना के लिए स्थान नहीं बचा' ऐसा कहने वाले लोग बच्ची की आड़ में 'हिंदू प्रतीकों' को बहुत ही घृणित तरीके से प्रसारित कर रहे हैं। एक प्रोपोगंडा के अंतर्गत प्रसारित किए जा रहे उन चित्रों/पोस्टरों को देखकर कोई भी कह सकता है कि यह बच्ची के लिए न्याय माँगने वाली आवाजें नहीं, बल्कि हिंदू धर्म के प्रति घृणा का वातावरण बनाने का षड्यंत्र है।   
          यदि आलोचनाओं की दिशा सही होगी, आलोचनाओं में वास्तविकता होगी, आलाचनाएं तर्क पर आधारित होंगी, तो सरकार क्या, जनता भी स्वीकार करेगी। स्वस्थ आलोचना में बुद्धिजीवी और मीडिया का एक वर्ग असफल है। प्रधानमंत्री मोदी ने उचित ही कहा कि आलोचना करने के लिए बहुत शोध करना पड़ता है। उसकी बारीकी में जाना पड़ता है। तथ्य और तर्क निकालने पड़ते हैं। दुर्भाग्य से आलोचना ने मर्यादाओं को तोड़ आरोपों का रूप ले लिया है। बहरहाल, लंदन में कही गई बात भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस बात को विपक्षी राजनीतिक दलों और मोदी विरोधियों को भली प्रकार समझना चाहिए। उन्हें आत्ममूल्यांकन भी करना चाहिए कि वह आलोचना कर रहे हैं या दुष्प्रचार? 

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