शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नक्सली हिंसा पर खामोशी

 देश  में असहिष्णुता और हिंसा पर आजकल बहुत बहस हो रही है। विशेषकर, जब किसी कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े या विशेष समुदाय के व्यक्ति के साथ हिंसा होती है, तब असहिष्णुता का भूत अचानक से प्रकट होता है। जबकि अन्य हत्याओं पर न हमें असहिष्णुता दिखाई देती है और नहीं किसी प्रकार हमारे माथे पर बल पड़ता है। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार में हिंदू समाज के साथ हो रही ज्यादती भी असहिष्णुता की श्रेणी में नहीं आती है और केरल में एक के बाद एक राष्ट्रीय विचारधारा से संबंद्ध व्यक्तियों की हत्याएं भी हमें विचलित नहीं करती हैं। नक्सली हिंसा पर तो तमाम बुद्धिजीवी गजब की खामोशी साध जाते हैं। अनेक अवसर पर तो प्रसन्नता भी जाहिर करते हैं। नक्सलियों द्वारा 76 जवानों की हत्या के दौरान अपने यह कम्युनिस्टों को जश्न मनाते देखा है। कम्युनिस्ट विचारधारा के नेता, लेखक एवं पत्रकार नक्सलियों की हिंसा का बचाव करते दिखते हैं। जबकि यह खूंखार किस्म के असहिष्णु हैं। कम्युनिस्ट नक्सलियों का बचाव इसलिए करते हैं, क्योंकि वैचारिक रूप से दोनों सहोदर हैं। नक्सलियों की बर्बरता को देखकर इन्हें किसी भी प्रकार आतंकवादियों से कमतर नहीं माना जा सकता। बीते रविवार झारखंड के गुमला में पति-पत्नी को गोलियों से भूनकर इस बात को सिद्ध कर दिया है।
          प्रतिबंधित नक्सली संगठन 'पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया' के 15 नक्सलियों ने कामडारा के कोनसा बड़काटोली गाँव में रविवार रात घर में घुस कर 45 वर्षीय आमुस केरकेट्टा और उनकी पत्नी कथरीना केरकेट्टा की गोली मार कर हत्या कर दी। पति-पत्नी दोनों उस समय सो रहे थे। नक्सलियों ने सबसे पहले आमुस को पकड़ा और उसे लात-घूंसो एवं लाठियों से पीटा। उसके बाद उसके सिर में कई गोलियां उतार दीं। यही वहशी तरीका उन्होंने कथरीना को मारने के लिए अपनाया। उन पर पुलिस का मुखबिर होने का संदेह था। पति-पत्नी की इस बर्बर हत्या को तीन दिन बीत गए हैं, लेकिन अब तक विरोध तो दूर इसकी चर्चा तक नहीं हुई है। छोटी से छोटी और आपसी विवाद की घटनाओं को असहिष्णुता के नाम परोसने वाले पत्रकार भी बेकसूर दंपति की हत्या पर खामोश हैं। नक्सली आतंकियों की बर्बरता को धिक्कारने के लिए उनके पास न समय है और स्थान। 
          यह दंपति उस वंचित और वनवासी समाज से आते हैं, जिसके नाम पर देश में अनेक गैर-सरकारी संगठन अपनी दुकानें चला रहे हैं। उन्हें भी इनकी चीख-पुकार सुनाई नहीं दी। आमुस और कथरीना के पीछे उनकी इकलौती बेटी बसिया छूट गई है। वह अनाथ हो गई। यदि वह घर पर होती तब निश्चित ही नक्सली उसको भी मौत के घाट उतार देते। छात्रावास में रहकर अध्ययन करने के कारण से उसका जीवन बच गया। किंतु, उसका संसार नक्सली आतंकियों ने छीन लिया है। कम्युनिस्ट नक्सलियों की इस बर्बरता पर कुछ बोलेंगे, इसकी उम्मीद किसी को नहीं है। सवाल सिर्फ इसलिए उठाया ताकि असहिष्णुता और हिंसा पर उनकी चिंता की वास्तविकता को समझा जा सके। किंतु, केंद्र में मजबूत इरादों की सरकार से अवश्य अपेक्षा है कि वह नक्सलियों के खात्मे के लिए कोई ठोस योजना बनाए। 

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