शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

रोहिंग्या मुद्दे पर सरकार का पक्ष राष्ट्रहित में

कश्मीरी पंडितों को उनकी भूमि और न्याय दिलाये बिना, रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए सरकार पर दबाव बनाना, अपने लोगों के साथ बेईमानी है. ये लोग वर्षों से तम्बू में सो रहे हैं, पहले इनके लिए आवाज़ बुलंद करो.
 यह  सुखद है कि राष्ट्रहित में वर्तमान सरकार कठोर कदम उठाने में हिचकिचाती नहीं है। पूर्ववर्ती सरकारें प्रत्येक मामले को पहले वोट की तराजू पर तोलती थीं और उस वजन के आधार पर निर्णय करती थीं। जबकि वर्तमान सरकार ने अनेक अवसरों पर अपने निर्णयों से बताया है कि उसके लिए राष्ट्रहित सबसे पहले है। रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर भी सरकार ने अनेक प्रकार की आलोचनाओं की चिंता न करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपना स्पष्ट पक्ष रखा है। केंद्र सरकार ने बीते सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय से रोहिंग्या मुद्दे पर हस्तक्षेप न करने का आग्रह करते हुए कहा कि उन्हें प्रत्यर्पित करने का निर्णय सरकार का नीतिगत फैसला है। केंद्र सरकार ने बिना लाग-लपेट के कह दिया है कि उनमें से कुछ का संबंध पाकिस्तानी आतंकवादी गुटों से है। 
          शीर्ष न्यायालय रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने जब इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष जानना चाहा, तब केंद्र सरकार ने अपना उक्त पक्ष रखा और कहा कि यह देश हित में लिया गया एक 'आवश्यक कार्यकारी' फैसला है। केंद्र सरकार का कहना गलत नहीं है कि कई रोहिंग्या मुसलमानों का संबंध आतंकवादी समूहों से है। ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं। घोर शांतिप्रिय बौद्ध बाहुल्य देश म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय को लेकर जिस प्रकार का वातावरण बना है, वह भी इस ओर इशारा करता है। शरणार्थियों को आश्रय नहीं देने और संप्रग सरकार के समय में आ चुके रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजने के सरकार के निर्णय की आलोचना करने से पहले हमें यह विचार जरूर करना चाहिए कि आखिर वह कौन-से कारण हैं कि इस्लामिक देश भी रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए तैयार नहीं है।
          सरकार ने बड़ी स्पष्टता से यह भी कहा है कि रोहिंग्या शरणार्थियों का भारत में रहना न केवल अवैध है, बल्कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी गंभीर खतरा है। सरकार के ऐसा कहने के पीछे महज आशंका नहीं है, बल्कि इस संबंध में सरकार के पास प्रमाण भी उपलब्ध हैं। आतंकवाद की घटनाओं और देश विरोधी घटनाओं में जम्मू-कश्मीर में जमकर बैठे रोहिंग्याओं की संलिप्ता सामने आई है। यह ही नहीं बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या संतुलन बिगडऩे से भी अनेक प्रकार के संकट खड़े हो गए हैं। इसलिए जम्मू-कश्मीर में भी रोहिंग्या मुसलमानों का विरोध हो रहा है। गौरतलब है कि पूर्ववर्ती संप्रग सरकार ने वोटों के लालच में उस भूमि पर रोहिंग्या मुसलमानों को बसा दिया था, जहाँ भारत के दूसरे प्रांतों के नागरिकों को बसने का अधिकार नहीं है। जम्मू-कश्मीर में वर्षों से लाखों की संख्या में कश्मीरी पंडित तंबूओं में अपना जीवन गुजार रहे हैं, उनकी चिंता पहले होनी चाहिए थी। किंतु, कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को वोटबैंक की अधिक चिंता थी। वोटों की खातिर उसने राष्ट्रहित भी ताक पर रख दिए थे। निश्चित ही आज यदि कांग्रेस सरकार केंद्र में होती, तब एक बार फिर देशहित की अनदेखी कर रोहिंग्या मुसलमानों को शरण दे दी जाती। ईश्वर का भला है कि केंद्र में मजबूत इरादों वाली सरकार है। 
          मानवता की माला जपने वालों को यह भी विचार करना चाहिए कि हम अपने ही वंचित और पिछड़े वर्गों को गरिमापूर्ण जीवन उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। ऐसे में यदि मानवता के नाम पर रोहिंग्या मुसलमानों को शरण दी जाएगी, तब क्या इस देश के वंचित, पिछड़े और गरीब वर्ग के नागरिकों के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे? उनका हक नहीं मारा जाएगा? सर्वोच्च न्यायालय को केंद्र सरकार के आग्रह पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह मुद्दा सिर्फ भारत की आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा के साथ-साथ यहाँ के नागरिकों के अधिकारों से भी जुड़ा है। आज जरूरी है कि हम पहले अपने देश के वंचित नागरिकों का जीवन स्तर ऊपर उठाएं, तब दूसरों की सुध लें। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन पुण्यतिथि : मंसूर अली खान पटौदी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. बिल्कुल सही। जिन्हें ज्यादा दर्द है वे दो-चार परिवारों को गोद ले उदाहरण क्यों नहीं पेश करते

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