बुधवार, 5 अप्रैल 2017

तुम्हें समझ नहीं आएंगे श्रीकृष्ण

 प्रख्यात  अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भगवान श्रीकृष्ण को 'ईव टीजर' कह कर अपने बौद्धिक स्तर का परिचय दिया है। श्रीकृष्ण के संदर्भ में प्रशांत भूषण का ट्वीट नि:संदेह निंदनीय और अशोभनीय है। यह सरासर देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाकर सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का हथकंडा है। प्रशांत भूषण के बयान को अभिव्यक्ति की आजादी कतई नहीं कहा जा सकता। यदि यह अभिव्यक्ति की आजादी है, तब कमलेश तिवारी जेल में क्यों है? आज यह प्रश्न देश के तमाम नागरिक पूछ रहे हैं। क्या इस देश में हिंदुओं की आस्थाओं का कोई मोल नहीं है? उनके आराध्य और प्रतीकों पर बेहूदा टिप्पणी करने पर कठोर सजा क्यों नहीं है? प्रशांत भूषण के कुतर्क पर देश में गहरी नाराजगी है। यह भूषण का सौभाग्य है कि उन्होंने उस समाज के आराध्य का अपमान किया है, जो न केवल सहिष्णु है बल्कि दूसरों का सम्मान करना जानता है। यदि इसी प्रकार की टिप्पणी वकील भूषण ने किसी और पंथ के पैगम्बर के संबंध में की होती, तब उन्हें समझ आता कि वास्तव में असहिष्णुता क्या है और अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा क्या है? जबकि बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाकर जनता के सामान्य से गुस्से को भी प्रशांत भूषण के समर्थक असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे की तरह देख रहे हैं। दरअसल, प्रशांत भूषण की विचारधारा वाला बुद्धिजीवी वर्ग अभिव्यक्ति की आजादी का ठेका सिर्फ अपने पास रखना चाहता है, वह देश के सामान्य नागरिकों को सहज प्रतिक्रिया भी देने से रोकने का पक्षधर है।
           देश का बड़ा और नामी वकील यदि रोमियो का पक्षधर बनने के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण को कठघरे में खड़ाकर कुतर्क प्रस्तुत करेगा, तब वह स्वयं ही जनता की अदालत में दोषी साबित होगा। पश्चिम परस्त प्रशांत भूषण को 'एंटी रोमियो दल' में रोमियो नाम का उपयोग करने पर इतनी ही दिक्कत थी, तब वह अपनी आपत्ति बिना श्रीकृष्ण का नाम लिए भी दर्ज करा सकते थे, जैसा कि बाकि लोग विरोध कर रहे हैं। लेकिन, वह मर्यादा भूल गए। दरअसल, प्रशांत भूषण और कम्युनिस्टों को हिंदू धर्म पर ओछी टिप्पणी करने में सुख मिलता है। यह उनका स्वभाव बन गया है। अपने स्वभाव के अनुसार ही भूषण ने ट्वीट किया कि ''रोमियो ने अपने जीवन में केवल एक ही लड़की से प्यार किया, जबकि कृष्ण तो प्रसिद्ध 'ईव टीजर' हैं। क्या आदित्यनाथ अपने मुस्तैद दस्ते का नाम 'एंटी कृष्ण स्क्वॉड' रखेंगे?'' यह हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी और तर्कवादी व्यक्ति का मानसिक स्तर है, जो शेक्सपीयर के 'रोमियो' के नाम उपयोग से आहत होकर करोड़ों हिंदुओं के आराध्य श्रीकृष्ण का अपमान कर रहा है। भूषण यहाँ रोमियो से श्रीकृष्ण की तुलना मात्र नहीं कर रहे, बल्कि उनको एक काल्पनिक पात्र से भी बदतर स्थिति में सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। भूषण श्रीकृष्ण को लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करने वाला और उनको परेशान करने वाला मनचला सिद्ध करना चाह रहे हैं। 
          दरअसल, उन्हें हिंदू धर्म के साथ-साथ देश और उत्तरप्रदेश में आ रहा बदलाव भी पसंद नहीं आ रहा है। इस टिप्पणी से प्रशांत भूषण ने श्रीकृष्ण और हिंदू समाज का ही अपमान नहीं किया है, बल्कि उत्तरप्रदेश की उस जनता का भी अनादर किया है, जिसने 'एंटी रोमियो दल' बनाने के वायदे पर योगी आदित्यनाथ को बहुमत दिया है। एंटी रोमियो दल अचानक गठित नहीं हुआ है, यह भाजपा के घोषणा पत्र में था। अर्थात् जनता ने भाजपा की इस घोषणा पर भरोसा जताया है। वातानुकूलित कक्षों में बैठे प्रशांत भूषण सरीखे बुद्धिजीवी जनता के मर्म और दर्द को नहीं समझ पाते हैं। महिला अपराध के लिए कुख्यात उत्तरप्रदेश की जनता 'एंटी रोमियो दल' का स्वागत कर रही है। महिला अपराध को कम करने के लिए सरकार के इस कदम का जनता में कोई विरोध नहीं है, बल्कि स्वागत ही किया गया है। इस दल से यदि किसी को आपत्ति है तो सिर्फ वातानुकूलित कक्षों में बैठे बुद्धिवादियों को है। 
          बहरहाल, प्रशांत भूषण को भारतीय इतिहास का अध्ययन करना चाहिए और श्रीकृष्ण के चरित्र को समझने का प्रयास करना चाहिए। कम्युनिस्ट विद्वानों की किताबों से भारतीय संस्कृति की महानता को समझने की कोशिश करेंगे, तब प्रशांत भूषण अनेक जगह इसी प्रकार जनता के आक्रोश का शिकार बनेंगे। उन्हें लाल चश्मा उतारकर निर्मल बुद्धि से श्रीकृष्ण के चरित्र का अध्ययन करना चाहिए, ताकि वह समझ सकें कि श्रीकृष्ण 'प्रसिद्ध ईव टीजर' नहीं, बल्कि योगेश्वर और नारी अस्मिता के रक्षक हैं। 

4 टिप्‍पणियां:

  1. अभिषेक सिंह6 अप्रैल 2017 को 12:44 am

    जिन श्री कृष्ण ने सात दिन की आयु में पूतना को मारा था । पाँच वर्ष की आयु में रहस्य लीला की जिसमें पार्वती जी और शिव जी भी गये थे (स्त्री भेष में ) । जो इन जैसे लोगों के समझ से परेय है ।

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  2. प्रशांत भूषण को नरेन्द्र कोहली द्वारा लिखी गयी "अभिज्ञान" पढ़नी चाहिए। जिससे उन्हें यह जानकारी तो मिल ही जाएगी की कृष्ण नारी अस्मिता के रक्षक हैं।

    नरेन्द्र कोहली का अभिज्ञान गीता के कर्म सिद्धांत का अत्यंत रोचक विवेचन है।

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’सौन्दर्य और अभिनय की याद में ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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