गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

राष्ट्रगान का सम्मान

 देश  के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रगान के सम्मान में सराहनीय निर्णय सुनाया है। कुछ समय पहले जब इस तरह के मामले सामने आए कि सिनेमाघर या अन्य जगह राष्ट्रगान बजाया गया तब कुछेक लोग उसके सम्मान में खड़े नहीं हुए। इस संबंध में उनका कहना था कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि जब राष्ट्रगान हो रहा हो, तब खड़े होना अनिवार्य है। इसी बीच सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य करने की माँग ने भी जोर पकड़ा। इस माँग के बाद देशभर में राष्ट्रगान के सम्मान और अपमान की बहस ने जन्म लिया था। इस बहस में आ रहे तर्क-कुतर्कों पर उच्चतम न्यायालय ने विराम लगा दिया है। न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा है कि सिनेमाघरों में फिल्मों का प्रदर्शन शुरू होने से पहले राष्ट्रगान अवश्य बजाया जाना चाहिए। साथ ही परदे पर राष्ट्रध्वज की तस्वीर भी दिखाई जानी चाहिए। जिस वक्त राष्ट्रगीत बज रहा हो, वहां उपस्थित लोगों को उसके सम्मान में खड़े रहना जरूरी है। इसके अलावा राष्ट्रगान का किसी भी रूप में व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। इसकी धुन को बदल कर गाने या फिर इसे नाटकीय प्रयोजन के लिए उपयोग नहीं होना चाहिए। 
          न्यायालय के निर्णय के बाद इस अतार्किक बहस को बंद हो जाना चाहिए था कि राष्ट्रगान कहाँ बजाया जाना चाहिए और कहाँ नहीं? राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होना चाहिए या नहीं? लेकिन, ऐसा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है, बल्कि इस बहस ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। तथाकथित बुद्धिजीवी उच्चतम न्यायालय के निर्णय की आलोचना में यहाँ तक कह रहे हैं कि अब इस देश में देशभक्ति थोपी जा रही है। न्यायालय के निर्णय पर उनके कटाक्षों को बारीकी से देखें तो पाएंगे कि उन्होंने न्यायालय और सरकार को एक ही मान लिया है। दरअसल, बुद्धिजीवियों का यह वर्ग बेहद सुविधाजनक है। यह न्यायालय के निर्णयों को भी अपनी सुविधा के हिसाब से स्वीकारता/ नकारता है और उनकी व्याख्या करता है। राष्ट्रगान के बजाये जाने से इस बुद्धिजीवी वर्ग को पीड़ा क्यों है, इसका कारण अज्ञात है। सिनेमाघर में राष्ट्रगीत को बजाने से दर्शकों के मनोरंजन में क्या बाधा उत्पन्न हो जाएगी? राष्ट्रगीत के सम्मान में ५२ से ६० सेकंड तक खड़े होने में एक स्वस्थ व्यक्ति को कितनी तकलीफ पहुँचेगी? आम भारत से कटे इस बुद्धिजीवी वर्ग को संभवत: यह भान नहीं होगा कि हमारी नई पीड़ी में राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के प्रति पुरानी पीड़ी जैसा भाव दिखाई नहीं दे रहा है। दरअसल, इसमें दोष नई पीड़ी का नहीं, बल्कि हमारा ही है। हमने ही उन्हें राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान का संस्कार हस्तातंरित नहीं किया है। 
          उच्चतम न्यायालय में इस प्रकरण को लेकर गए मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के निवासी ७४ वर्षीय श्यामनारायण चौकसे ने जब राष्ट्रगान का उपहास बनते देखा, तब उनके हृदय को अत्यंत पीड़ा हुई और उन्होंने तय किया कि वह राष्ट्रगान को सम्मान दिलाकर रहेंगे। वर्ष २००२ में वह सिनेमाघर में 'कभी खुशी कभी गमÓ फिल्म देखने गए। फिल्म में जब राष्ट्रगान बजने का दृश्य आया, तब वह अपनी कुर्सी से उठकर सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए। उनको ऐसा करते देख, बाकि दर्शकों ने सबक सीखने की जगह उनका मजाक बनाना शुरू कर दिया। तब उन्होंने राष्ट्रगान को सम्मान दिलाने के लिए न्यायालय जाना तय किया। 
           बहरहाल, सिनेमाघर में राष्ट्रगान बजाये जाने और उसके सम्मान में खड़े होने की अनिवार्यता का विरोध करने वाले लोगों को न्यायालय ने आईना दिखाते हुए कहा कि विदेशों में वहाँ के नियम मानने में गुरेज नहीं है, तब यहाँ अतार्किक स्वतंत्रता क्यों चाहिए? लोगों को समझना चाहिए कि देश है तभी हम स्वतंत्रता का लाभ ले पाते हैं। इसलिए राष्ट्रगान के प्रति सम्मान प्रकट करने में हमें गुरेज क्यों होना चाहिए? राष्ट्रगान चूंकि किसी भी देश के सम्मान का विषय है, उसके अनादर को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने बहुत महत्त्वपूर्ण बात कही है कि अब वक्त आ गया है कि देश के नागरिकों को समझना होगा कि यह उनका देश है। उन्हें राष्ट्रगान का सम्मान करना होगा, क्योंकि यह संवैधानिक देशभक्ति से जुड़ा मामला है। न्यायालय ने अपना निर्णय सुना दिया है। अब हमारी बारी है। किसी दण्ड या कानून के भय से नहीं, बल्कि अपने दायित्व बोध के साथ राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना चाहिए। 

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोटबंदी : नरेन्द्र मोदी का वाजिब सवाल

 प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने आगरा में परिवर्तन रैली को जिस अंदाज में संबोधित किया है, उसे दो तरह से देखा जा सकता है। एक, उन्होंने विपक्ष पर करारा हमला बोला है। दो, नोटबंदी पर सरकार और प्रधानमंत्री को घेरने के लिए हाथ-पैर मार रहे विपक्ष से प्रधानमंत्री ने सख्त सवाल पूछ लिया है। ऐसा सवाल जिसका सीधा उत्तर विपक्ष दे नहीं सकता। नोटबंदी का विरोध कर रहे नेताओं की ओर प्रधानमंत्री मोदी ने नागफनी-सा सवाल उछाल दिया है, जो निश्चित तौर पर उन्हें लहूलुहान करेगा। उन्होंने पूछ लिया कि यह कदम कालेधन वालों के खिलाफ उठाया गया है, फिर आपको परेशानी क्यों हो रही है? यकीनन प्रधानमंत्री का यह सवाल वाजिब है, क्योंकि परेशानी उठा रही आम जनता को भी यह समझ नहीं आ रहा है कि विपक्ष ने आखिर हाय-तौबा किस बात के लिए मचा रखी है? क्या विपक्ष नहीं चाहता कि कालेधन के खिलाफ कार्रवाई हो? क्या विपक्ष नहीं चाहता कि जाली मुद्रा को खत्म किया जाए? आखिर विपक्ष की मंशा क्या है? वह क्यों चाहता है कि नोटबंदी का निर्णय वापस लिया जाए और फिर से 500 और 1000 के पुराने नोट चलन में आएं? प्रधानमंत्री के तर्कसंगत सवाल से विपक्ष कठघरे में खड़े किसी अपराधी से कम नजर नहीं आ रहा है। 
          शारदा चिटफंड घोटाले और टिकट के लिए थैलियों का जिक्र करके प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहे नेताओं की नीयत पर सवाल उठा दिए हैं। मोदी ने अपने पूरे भाषण में किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन शब्दबाण लक्ष्य को भेदने वाले छोड़े। उल्लेखनीय है कि नोटबंदी के खिलाफ सबसे अधिक मुखर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हैं। वह इस मसले पर विपक्ष को एकजुट करने में बड़ी सक्रियता से जुटी हैं। उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल का साथ भी मिल गया है। बहरहाल, प्रधानमंत्री ने किसी लोहार की तरह ममता बनर्जी की नैतिकता पर चोट की है। उन्होंने साफ-साफ कह दिया- 'कैसे-कैसे लोग उन पर सवाल उठा रहे हैं, जिन्होंने नेताओं के दम पर चिटफंड में पैसे लगाए। चिटफंड के कारण सैकड़ों परिवारों को आत्महत्या करनी पड़ी। हमने चिटफंड वालों को सजा दी है। चिटफंड का उनका पूरा धन चला गया है।' शारदा चिटफंड घोटाले में ममता बनर्जी के कई मंत्रियों के नाम सामने आए थे और कई मंत्री तो जेल भी गए। खैर, जो राज्य (पश्चिम बंगाल) जाली मुद्रा के लिए सबसे अधिक कुख्यात है, उसी राज्य की मुख्यमंत्री जाली मुद्रा के अवैध कारोबार को समाप्त करने के कदम का स्वागत करने की जगह उसका विरोध कर रही हैं। क्या यह पर्याप्त कारण नहीं है कि ममता बनर्जी की नीयत पर शक किया जाए? 
          उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी बसपा प्रमुख मायावती के विरोध को भी प्रधानमंत्री ने सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग कहते थे, विधायक/सांसद बनना है तो इतने रुपये लाओ। थैलियों में नोट भर-भरकर रखे थे, उन नोटों का क्या हुआ? देश में यह खेल बंद होना चाहिए, इसलिए हमने कोशिश की है कि गरीबों को हक मिले, मध्यम वर्ग का शोषण मिटे। कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों को भी वह सवालों के दायरे में लाए, क्योंकि सबकुछ जानते हुए भी कांग्रेस ने कुर्सी जाने के डर से जनहित में बड़ा निर्णय नहीं लिया। बहरहाल, प्रधानमंत्री ने संकेत की भाषा में तर्क के आधार जनता को संदेश दे दिया कि नोटबंदी का विरोध कर रहे नेताओं की तिजोरियों में कालाधन पड़ा है। जनता की परेशानी को अपनी ढाल बनाकर वह अपने कालेधन को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वास्तव में उन्हें आम आदमी की परवाह नहीं, बल्कि अपने धन की चिंता है। 
          राजनीति में शतरंज की बिसात बिछाकर बैठे नरेन्द्र मोदी की चालों को इस समय देखें, तब साफ दिखाई देता है कि उनका लक्ष्य क्या है? अपनी एक चाल से वह कई लक्ष्य साधते हैं। अब देखिए, नोटबंदी के निर्णय से उन्होंने कालेधन, जालीनोट और आतंकियों की फंडिंग पर चोट की है। खैर, सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विरोधियों को 'शह-मात' में उलझाकर अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। इस भाषण में उन्होंने इस बात के स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह भारतीय जनता पार्टी और अपनी सरकार को गरीब और मध्यम वर्ग के नजदीक ले जाना चाहते हैं। वह भाजपा को 'बनियों की पार्टी' छवि से मुक्त करना चाहते हैं। यहाँ बनियों से आशय किसी जाति विशेष से नहीं, बल्कि सम्पन्न वर्ग से है। भाजपा पर यह तोहमत लगाई जाती है कि वह अमीरों की पार्टी है। अंबानी और अडाणी, प्रधानमंत्री मोदी के दोस्त हैं। इसीलिए विपक्ष यह भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहा है कि नोटबंदी का निर्णय लेकर नरेन्द्र मोदी ने देश के गरीबों को बैंक और एटीएम के सामने कतार में खड़ा कर दिया है, जबकि अमीर अपने घरों में आराम से बैठे हैं। 
          प्रधानमंत्री भली प्रकार समझते हैं कि भाजपा को अपना दायरा बढ़ाने के लिए इस झूठी छाप से बाहर निकलना होगा। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी खुलकर कहते हैं- 'नोटबंदी के निर्णय में सबसे ज्यादा आशीर्वाद गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों ने दिया है, जिन्हें मैं सिर झुकाकर नमन करता हूँ।' अपने भाषण में उन्होंने यह भी कहा कि गरीबों का हक मारने वालों को उन्होंने कड़ा दण्ड दिया है। अमीरों की तिजोरी से निकलकर बैंक में आए धन को गरीबों और जरूरतमंदों को उपलब्ध कराया जाएगा। भले ही मोदी विरोधी यह स्वीकार न करें, लेकिन सच यही है कि नोटबंदी के निर्णय का सबसे अधिक स्वागत इसी गरीब और मध्यम वर्ग ने किया है, जो नोट बदलवाने के लिए कतार में खड़ा है। अब तक आए ज्यादातर सर्वेक्षण भी इस बात की हामी भरते हैं कि तकरीबन 85 प्रतिशत जनता कष्ट उठाकर भी इस निर्णय के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ है। जनता का यह समर्थन इसलिए है, क्योंकि मोदी उसे यह समझाने में सफल रहे हैं कि यह सरकार गरीबों और मध्यम वर्ग की सरकार है। इस परिवर्तन रैली में भी मोदी ने प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना का शुभारम्भ किया, जो इसी वर्ग को समर्पित है। बहरहाल, यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि जनता की भावनाओं और आकाक्षांओं को समझने में नरेन्द्र मोदी का मुकाबला विपक्ष का कोई भी नेता नहीं कर पा रहा है। यदि ऐसा होता, तब नोटबंदी का विरोध करने के लिए विपक्षी नेताओं को कुतर्क ढूंढकर लाने की जरूरत नहीं पड़ती। नोटबंदी के मुद्दे पर विपक्ष पूरी तरह चूक गया है। जबकि प्रधानमंत्री मोदी भारत के बहुसंख्यक वर्ग (गरीब एवं मध्यम वर्ग) में अपनी पैठ को मजबूत बनाते जा रहे हैं।

रविवार, 20 नवंबर 2016

नोटबंदी पर एक से बढ़कर एक कुतर्क

 कालेधन  के विरुद्ध लड़ाई में नोटबंदी के निर्णय पर प्रतिपक्ष के नेता एक से बढ़कर एक कुतर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। उनके कुतर्क यह भी साबित कर रहे हैं कि वह जमीन से जुड़े नेता नहीं हैं। उन्हें भारतीय जन के मानस की बिल्कुल भी समझ नहीं है। विपक्षी नेताओं के बयानों को सुनकर यह समझना मुश्किल हो रहा है कि वह आम जनता के शुभचिंतक हैं या फिल कालेधन वालों के? उनकी बौखलाहट देखकर संदेह यह भी है कि उनके पास भी कालेधन का भंडार है। वरना क्या कारण है कि नोटबंदी की वापसी के लिए चेतावनी जारी की जा रही हैं? साफ नजर आ रहा है कि विपक्षी नेता आम जनता की परेशानी की आड़ में अपने कालेधन की चिंता कर रहे हैं? तथाकथित पढ़े-लिखे नेता चौराहों की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं। कुतर्क देखिए कि पाँच सौ और दो हजार रुपये का नया नोट चूरन की पुडिय़ा में निकलने वाले नकली नोट जैसा है। आश्चर्य है इनकी समझ पर।

शनिवार, 19 नवंबर 2016

दुर्भाग्य है नायसमंद की घटना

 नये  दौर में छूआछूत और भेदभाव की घटना किसी भी समाज के लिए कलंक से कम नहीं हैं। यह समूची मनुष्य जाति का दुर्भाग्य है कि समाज में कुछ लोग, कुछ लोगों को अपने से कमतर मानते हैं। उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं। किसी मनुष्य के खेत में पैर रखने से क्या सफल सूख सकती है? क्या उसके छूने से पवित्रता समाप्त हो सकती है? यदि इसका प्रश्न हाँ है तब समूची धरती तथाकथित सवर्णों के लिए रहने लायक नहीं है। समूची धरती एक है और उसका स्पर्श हजारों हजार तथाकथित निम्न जाति के लोग करते हैं। उस भूमि को वह अपनी माता मानते हैं। यह अधिकार और ज्ञान तथाकथित सवर्ण समाज को किसने दिया कि एक वर्ग विशेष नजरें उठाकर नहीं चल सकता, उनकी औरतें-बेटियाँ सज-धज नहीं सकतीं, उन्हें होटल या धर्मशाला में पानी चुल्लू में लेकर पीना चाहिए?

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

लोकमंथन : नए भारत निर्माण की राह

 लोकहित  में चिंतन और मंथन भारत की परंपरा में है। भारत के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं, जिनमें यह परंपरा दिखाई देती है। महाभारत के कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद से लेकर नैमिषराण्य में ज्ञान सत्र के लिए 88 हजार ऋषि-विद्वानों का एकत्र आना, लोक कल्याण के लिए ही था। भारत में चार स्थानों पर आयोजित होने वाले महाकुम्भ भी देश-काल-स्थिति के अनुरूप पुरानी रीति-नीति छोडऩे और नये नियम समाज तक पहुंचाने के माध्यम थे। ज्ञान परंपरा से समृद्ध भारत और उसकी संतति का यह दुर्भाग्य रहा कि ज्ञात-अज्ञात कारणों से उसकी यह परंपरा कहीं पीछे छूट गई थी और यह सौभाग्य है कि अब फिर से वह परंपरा जीवित होती दिखाई दे रही है। भारत की चिंतन-मंथन की ऋषि परंपरा को आगे बढ़ाने का सौभाग्य भी विचारों की उर्वर भूमि मध्यप्रदेश को प्राप्त हुआ है। पिछले चार-पाँच वर्षों से ज्ञान सत्र आयोजित करने में मध्यप्रदेश की अग्रणी भूमिका रही है। अंतरराष्ट्रीय धर्म-धम्म सम्मेलन, मूल्य आधारित जीवन पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, सिंहस्थ महाकुंभ की धरती पर विचार महाकुंभ का आयोजन और अब 'राष्ट्र सर्वोपरि' की भावना से ओतप्रोत विचारकों एवं कर्मशीलों का राष्ट्रीय विमर्श 'लोकमंथन : देश-काल-स्थिति' का आयोजन, यह सब आयोजन नये भारत के निर्माण की राह तय करने वाले हैं। बौद्ध धर्म के गुरु एवं तिब्बत सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री सोमदोंग रिनपोछे भी मानते हैं कि लोकमंथन से भारतीय इतिहास में नये युग का सूत्रपात हुआ है। निश्चित ही लोकमंथन 'औपनिवेशिक मानसिकता' से मुक्ति और भारतीयता की अवधारणा को पुष्ट करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।

बुधवार, 16 नवंबर 2016

जनता प्रसन्न, विपक्ष परेशान क्यों?

 केन्द्र  सरकार के नोटबंदी के निर्णय को आम आदमी सकारात्मक ढंग से ले रहा है। लेकिन, विपक्षी दलों के नेताओं की तकलीफ समझ पाना मुश्किल हो रहा है। वह कह रहे हैं कि लोग परेशान हो रहे हैं, लोगों को बैंक और एटीएम में कतार में लगना पड़ रहा है। छोटे नोट की कमी के कारण जनता हलाकान हो रही है। यह सच है कि जनता परेशान हो रही है। लेकिन, उसकी परेशानी देश से बड़ी नहीं है। यह बात आम आदमी जानता है। इसलिए कतार में खड़ा देशभक्त आदमी कह रहा है कि वह राष्ट्रहित के लिए थोड़ी-बहुत परेशानी उठाने के लिए तैयार है। सरकार के निर्णय का समर्थन करने के लिए अनेक स्वयंसेवी कार्यकर्ता भी जरूरतमंदों की मदद के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। यह लोग बैंक से पैसा निकालने में लोगों की मदद कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपानीत सरकार का विरोध करने को अपना धर्म समझने वाले आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, बसपा प्रमुख मायावती और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी सामान्य व्यक्ति की भावना को समझने में भूल कर रहे हैं। इसे समझने के लिए इन दलों और नेताओं को 'इनशॉर्ट' की ओर से कराए गए सर्वेक्षण का अध्ययन करना चाहिए।

बेईमानों के लिए मुश्किल भरे रहेंगे ५० दिन

 पाँच  सौ और हजार रुपये के नोट बंद करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर अपने भाषण से भ्रष्टाचारी और बेईमान लोगों की नींद उड़ा दी है। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने का भरोसा दिलाते हुए जनता से कुछ वक्त और मांगा है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि 'मुझे सिर्फ 50 दिन दीजिए। यदि उसके बाद मैं सफल नहीं हो सका तो जो सजा आप देंगे वह मुझे मंजूर होगी।' प्रधानमंत्री ने अपने इस भाषण में बेनामी संपत्ति के खिलाफ भी बड़ी कार्रवाई के संकेत देकर भ्रष्टाचारियों को तनाव दे दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि वह ३० दिसंबर के बाद भी चुप नहीं बैठेंगे। यह बात कहने में कोई गुरेज नहीं कि बाजार से लेकर सत्ता में घुसपैठ करके बैठे भ्रष्टाचारियों की नींद छीनने के लिए वाकई बड़े जिगर की जरूरत थी।

कालेधन के खिलाफ सर्जीकल स्ट्राइक

 प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को देश के नाम संबोधन में कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा निर्णय लेकर जता दिया है कि उनकी सरकार जनहित में बड़े से बड़ा निर्णय बेहिचक ले सकती है। प्रधानमंत्री को यह भी भरोसा था कि देशहित के इस निर्णय में परेशानी उठाकर भी जनता उनके साथ आएगी। सामान्य जन से जो रुझान आ रहा है, वह इस भरोसे की हामी भरता है। जनता ने 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने के साहसी निर्णय का स्वागत किया है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि पिछले 70 वर्षों में कालेधन के खिलाफ यह पहला लक्षित हमला (सर्जीकल स्ट्राइक) है। भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ जारी लड़ाई में यह निर्णय सरकार को प्रभावी जीत दिलाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भ्रष्टाचारियों और कालाधन दबाकर बैठे लोगों को संभलने का कोई मौका नहीं दिया। इतना बड़ा फैसला और किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई, यह इस बात का भी प्रमाण है कि प्रधानमंत्री मोदी की प्रशासन पर गहरी पकड़ है।

शनिवार, 5 नवंबर 2016

आज की आवश्यकता है एकात्म मानवदर्शन

 राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ का मानना है कि भारतीय चिंतन के आधार पर प्रतिपादित विचार 'एकात्म मानवदर्शन' ही दुनिया को सभी प्रकार के संकटों का समाधान दे सकता है। संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल ने हैदराबाद की बैठक में इस आशय का प्रस्ताव रखा है। संघ का मानना है कि आज विश्व में बढ़ रही आर्थिक विषमता, पर्यावरण-असंतुलन और आतंकवाद मानवता के लिए गंभीर चुनौती का कारण बन रहे हैं। अनियंत्रित पूँजीवाद और वर्ग-संघर्ष की साम्यवादी विचारधाराओं को अपनाने के कारण ही विश्वभर में बेरोजगारी, गरीबी और कुपोषण की समस्याएं सुलझ नहीं सकी हैं। विविध देशों में बढ़ते आर्थिक संकट और विश्व के दो-तिहाई से अधिक उत्पादन पर चंद देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आधिपत्य आदि समस्याएं अत्यन्त चिंताजनक हैं। एकात्म मानवदर्शन के अनुसरण से संसार के इन संकटों का समाधान सहजता से संभव है। संघ ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि चर-अचर सहित समग्र सृष्टि के प्रति लोक-मंगल की प्रेरक एकात्म दृष्टि के साथ सम्पूर्ण जगत के पोषण का भाव ही 'एकात्म मानवदर्शन' आधार है।

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

बांग्लादेश पर दबाव बनाए सरकार

 भारत  सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि उसके पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में लगातार हिंदुओं को लक्षित करके हमले किए जा रहे हैं। बांग्लादेश में बढ़ रही जेहादी मानसिकता और कट्टरवाद को रोकने के लिए भारत को हर संभव प्रयास करना चाहिए। यदि बांग्लादेश में इस्लामिक जेहादी मानसिकता हावी हो गई, तब भारत के लिए अनेक चुनौतियाँ उत्पन्न हो जाएंगी। विकराल हो चुके कट्टरवाद से तब शायद निपटना आसान भी न होगा। इसलिए भारत सरकार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना पर दबाव बनाएं कि इन हमलों को रोकने के ठोस प्रबंध किए जाएं और हिंदुओं की सुरक्षा की चिंता भी गंभीरता से करें। पिछले कुछ सालों में बांग्लादेश में चरमपंथी गुटों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों को सुनियोजित ढंग से निशाना बनाया, ताकि उनके मन में खौफ पैदा किया जा सके। अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला भी इसी कड़ी का हिस्सा है, जिसके तहत स्वतंत्र सोच रखने वाले लेखकों, पत्रकारों, ब्लॉगरों और सामान्य लोगों की हत्याएँ की जा रही हैं।

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