बुधवार, 17 जनवरी 2018

भारतीयता की प्रचारक हैं प्रार्थनाएं

 देश  के लगभग एक हजार केंद्रीय विद्यालयों में पढऩे वाले विद्यार्थियों को संस्कृत और हिंदी में प्रार्थना कराई जाती हैं। वर्षों से यह प्रार्थनाएं हो रही हैं। परंतु, आज तक देश में कभी विद्यालयों में होने वाली प्रार्थनाओं पर विवाद नहीं हुआ। कभी किसी को ऐसा नहीं लगा कि प्रार्थनाओं से किसी धर्म विशेष का प्रचार होता है। न ही कभी किसी को यह लगा कि इन प्रार्थनाओं से संविधान की अवमानना हो रही है। यहाँ तक कि केंद्रीय विद्यालय में पढऩे वाले मुस्लिम और ईसाई विद्यार्थियों एवं उनके अभिभावकों ने भी कभी प्रार्थनाओं पर आपत्ति दर्ज नहीं कराई। विद्यालय में पढ़ाने वाले मुस्लिम और ईसाई शिक्षकों को भी कभी ऐसा नहीं लगा कि प्रार्थनाएं किसी धर्म का प्रचार कर रही हैं। किन्तु, अब अचानक से एक व्यक्ति (निश्चित तौर पर उसके साथ भारत विरोधी विचारधारा होगी) को यह प्रार्थनाएं असंवैधानिक दिखाई देने लगी हैं। विनायक शाह नाम के मूढ़ व्यक्ति ने याचिका दाखिल कर कहा है कि केंद्रीय विद्यालयों में 1964 से हिंदी-संस्कृत में सुबह की प्रार्थना हो रही हैं, जो कि पूरी तरह असंवैधानिक हैं। याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के विरुद्ध बताते हुए कहा है कि इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती है। एक ओर न्यायालय में अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वहीं माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 'प्रार्थनाओं' को संवैधानिक मुद्दा मान कर उक्त याचिका पर विचार करना आवश्यक समझ लिया है। बड़ी तत्परता दिखाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और केंद्रीय विद्यालय संगठन से इस संबंध में जवाब माँगा है। 
          अकसर एक बहस देश में चलती है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेज अफसर मैकाले ने ब्रिटिश साम्राज्य के हित में नष्ट कर दिया। ज्ञान के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करने वाले भारत की शिक्षा व्यवस्था आज मैकाले की पद्धति से उबर नहीं पाई है। भारत वह देश है, जहाँ तक्षशिला एवं नालंदा जैसे विश्व विख्यात विश्वविद्यालय थे। परंतु, कालान्तर में जितने भी आक्रमणकारी भारत आए, उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर आघात किया। ब्रिटिश साम्राज्य में यह काम और अधिक योजनाबद्ध ढंग से किया गया। अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त ही नहीं किया, अपितु उसे अपने अनुसार बदल दिया। इसके बावजूद भारत में यह परंपरा बची रही कि विद्या अभ्यास से पूर्व विद्यार्थी माँ सरस्वती एवं ईश्वर का स्मरण करते हैं। शासकीय हों या निजी विद्यालय, सभी में सबसे पहले कतारबद्ध होकर विद्यार्थी प्रार्थना करते हैं। ज्यादातर प्रार्थनाएं भारतीय ज्ञान-परंपरा से ली गई हैं। यह प्रार्थनाएं विद्यार्थियों को हिंदू बनने के लिए नहीं, अपितु नेक इंसान बनने के लिए प्रेरित करती हैं। उनके अंतर्मन को शक्ति एवं शांति प्रदान करती हैं। 
          केंद्रीय विद्यालय में होने वाली प्रार्थना है- 
'ओ3म् असतो मा सद्गमय,
तमसो मा ज्योतिर्गमय,
मृत्योर्मामृतं गमय।'
          यह प्रसिद्ध श्लोक बृहदारण्यक उपनिषद् से लिया गया है। इस प्रार्थना में कहाँ हिंदू धर्म का प्रचार है? यह प्रार्थना कहाँ कहती है कि हिंदू बनो? बल्कि, यह प्रार्थना तो बिना किसी भेदभाव के सब लोगों को सत्य के पथ पर बढऩे के लिए प्रेरित करती है। 'असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।' यह भावार्थ है, उक्त प्रार्थना का। यही संदेश तो शिक्षा का है। शिक्षा का उद्देश्य क्या है? मनुष्य के जीवन से असत्य को समाप्त करना। उसे सत्य का साक्षात्कार कराना। अज्ञान के अंधकार से मुक्ति देना और ज्ञान के उजाले में ले जाना। ताकि व्यक्ति ज्ञान के प्रकाश से अपने जीवन को रोशन एवं सार्थक कर सके। मृत्यु (डर) से अमरता (साहस) की ओर ले जाने का काम शिक्षा ही तो करती है। क्या वाकई उक्त प्रार्थना धर्म का प्रचार करती है या फिर शिक्षा के उद्देश्य का प्रतिनिधित्व करती है? वर्षों से उक्त प्रार्थना को इसी संदर्भ में देखा गया। किंतु, जिनके मस्तिष्क संकीर्ण हों और औपनिवेशिक दासिता से जकड़े हों, वह बड़ा सोच नहीं सकते। 
          इसी तरह, केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत की एक ओर प्रार्थना कराई जाती है- 
'ओ3म् सहनाववतु
सहनै भुनक्तु
सहवीर्यं करवावहै
तेजस्विनामवधीतमस्तु
मा विद्विषावहै
ओ3म् शान्ति: शान्ति: शान्ति:।। '
          यह प्रार्थना भोजन मंत्र है, जिसे भोजन के पूर्व सामूहिक रूप से गाया जाता है। यह तैतरीय उपनिषद से लिया गया है। इसका अर्थ है- 'हे परमात्मन्! आप हम दोनों गुरु और शिष्य की साथ-साथ रक्षा करें, हम दोनों का पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-साथ शक्ति प्राप्त करें, हमारी प्राप्त की हुई विद्या तेजप्रद हो, हम परस्पर द्वेष न करें, परस्पर स्नेह करें।' क्या याचिकाकर्ता एवं उसके साथ खड़े लोग बता सकते हैं कि इस प्रार्थना से किस धर्म का प्रचार हो रहा है? यह प्रार्थना तो एकता को बढ़ावा देने वाली है। आपस में मिल-जुल कर रहने का संदेश देती है। एक-दूसरे के प्रति द्वेष नहीं अपितु स्नेह करने की सीख देती है। यह प्रार्थना कहाँ सिखाती है कि हिंदू बनो? भोजन के लिए एक-साथ बैठे लोग जब यह प्रार्थना करते हैं, तब वे परस्पर सहयोग से आगे बढऩे के संकल्प को दोहरा रहे होते हैं। प्रार्थना बंद करने से ज्यादा अच्छा होगा कि प्रतिदिन विद्यार्थियों को प्रार्थनाओं का अर्थ भी समझाया जाए। ताकि वह प्रार्थना के मर्म को आत्मसात कर एक सुसंस्कृत समाज के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन करें।
         केंद्रीय विद्यालय में गाई जाने वाली हिंदी की प्रार्थना है- 'दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना। दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना...। ' इस पूरी प्रार्थना में एक बार भी हिंदू शब्द या हिंदू धर्म का उल्लेख नहीं आता है। इस प्रार्थना में एक बार भी किसी हिंदू देवी-देवता का नाम नहीं आता है। फिर किस आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह प्रार्थना किसी धर्म विशेष (हिंदुत्व) का प्रचार करती है? यह प्रार्थना केवल केंद्रीय विद्यालयों में ही नहीं, बल्कि देश के ज्यादातर विद्यालयों में गाई जाती है। क्या याचिकाकर्ता बता सकते हैं कि इस प्रार्थना एवं उक्त श्लोकों के पाठ से अब तक कितने गैर-हिंदुओं ने हिंदू धर्म स्वीकार कर लिया है? कितने लोग मुस्लिम और ईसाई पंथ से हिंदू धर्म में मतान्तरित हुए हैं? याचिकाकर्ता विनायक शाह भले ही अपने तर्क-कुतर्कों से न्यायालय में यह सिद्ध करने का प्रयास करें कि यह प्रार्थनाएं हिंदू धर्म का प्रचार करती हैं, परंतु देश के असंख्य लोग मानते हैं कि यह प्रार्थनाएं भारतीय ज्ञान-परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं और उसी का प्रचार करती हैं। 
         यह पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि 1964 से केंद्रीय विद्यालयों में गाई जाने वाली प्रार्थनाओं पर प्रश्न उठाने वाले लोग या तो भारतीय विचार से परिचित नहीं है या फिर उसके विरोधी समूह से हैं। जिन्हें विवाद एवं कलह कराने में आनंद आता है, यह ऐसे ही लोग हैं। याचिकाकर्ता की दलील है कि यह प्रार्थनाएं हिंदू धर्म से जुड़ी हैं, इसलिए उसका प्रचार करती हैं। इस आधार पर वह प्रार्थनाओं को बंद कराने की वकालत सर्वोच्च न्यायालय में कर रहे हैं। तब उन्हें जरा विचार करना चाहिए कि वह क्या-क्या बंद कराएंगे? भारतीयता के दर्शन की छाप तो प्रत्येक जगह उन्हें दिखाई देगी। इस आधार पर तो उन्हें हिंदी भाषा को भी बंद कराना चाहिए। संस्कृत का अध्ययन भी प्रतिबंधित कराना चाहिए, क्योंकि यह भाषा भी तो भारतीयता से संबद्ध है। संस्कृत भाषा भी तो हिंदू संस्कृति एवं धर्म का प्रतिनिधित्व करती है। याचिकाकर्ता को सर्वोच्च न्यायालय की धर्मनिरपेक्षता पर भी प्रश्न उठाने का साहस दिखाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय वाक्य है- 'यतो धर्मस्ततो जय: ' अर्थात् जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है। न्यायपालिका ने यह वाक्य श्रीमद्भगवतगीता से लिया है। महाभारत में इसका अनेक स्थान पर उल्लेख आता है। क्या यह वाक्य किसी धर्म विशेष का प्रचार नहीं करता? देश में किस संस्था या संगठन का ध्येय वाक्य भारतीय ज्ञान-परंपरा से नहीं आता है? केंद्रीय विद्यालय संगठन का ध्येय वाक्य 'तत् त्वं पूषन् अपावृणु' भी हिंदू ज्ञान-परंपरा के वाहक ग्रंथ ईशावस्योपनिषद् से लिया गया है, जिसका अर्थ है- हे सूर्य ज्ञान पर छाए आवरण को हटाएं। देश के अनेक शिक्षा संस्थानों के ध्येय वाक्य भारतीय ग्रंथों से ही लिए गए हैं। इसका क्या यह अभिप्राय है कि यह सब संस्थान हिंदू धर्म के प्रचार के लिए स्थापित किए गए हैं? 
          धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदारों को समझना चाहिए कि इन प्रार्थनाओं से विभेद का संकेत मिलता होता, तब उनके गाए जाने पर प्रश्न उठाना उचित होता। यह प्रार्थनाएं तो जोडऩे की बात कर रही हैं। सामाजिक समरसता एवं परस्पर स्नेह भाव को पुष्ट करने का संदेश दे रही हैं। सत्य तो यह है कि उक्त प्रार्थनाएं किसी धर्म विशेष का प्रचार नहीं, बल्कि भारतीय जीवन मूल्यों का प्रचार कर रही हैं। ये प्रार्थनाएं मानवता की प्रचारक हैं। वितंडावादियों को प्रत्येक मामले में 'धर्म' को घसीटने की अपेक्षा कुछ रचनात्मक दृष्टिकोण का प्रदर्शन करना चाहिए। हर बात को 'धार्मिक चश्मे' से देखकर अपनी सांप्रदायिक सोच को उजागर करना उनके लिए भी ठीक नहीं और शांति से रह रहे समाज के लिए भी ठीक नहीं। वैसे भी सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में हिंदू धर्म की व्याख्या 'संप्रदाय' के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति के रूप में की है। हिंदू ग्रंथों से ली गई उक्त प्रार्थनाएं, श्लोक एवं मंत्र भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि हिंदू धर्म एक जीवन पद्धति है। वह संकीर्ण नहीं है। दुराग्रही नहीं है। जीवन को बांधने वाला नहीं है। यह प्रार्थनाएं हमारी दृष्टि को संकुचित नहीं करतीं, बल्कि मनुष्यता का मार्ग प्रशस्त करती हैं। यह प्रार्थनाएं हमें उदारमना और श्रेष्ठ नागरिक बनाने में सहायक ही नहीं, अपितु आवश्यक हैं। भारतीय विचारदर्शन से चिढऩे वाले खेमे को भी इन प्रार्थनाओं का पाठ नित्य करना चाहिए, ताकि उनके मस्तिष्क की खिड़कियाँ खुलें और मस्तिष्क में शुद्ध एवं ताजी हवा आ सके।
14 जनवरी, 2018 को आज समाज में प्रकाशित.

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

'संघ और समाज' के आत्मीय संबंध को समझने में मदद करते हैं मीडिया विमर्श के दो विशेषांक

 लेखक  एवं राजनीतिक विचारक प्रो. संजय द्विवेदी के संपादकत्व में प्रकाशित होने वाली जनसंचार एवं सामाजिक सरोकारों पर केंद्रित पत्रिका 'मीडिया विमर्श' का प्रत्येक अंक किसी एक महत्वपूर्ण विषय पर समग्र सामग्री लेकर आता है। ग्यारह वर्ष की अपनी यात्रा में मीडिया विमर्श के अनेक अंक उल्लेखनीय हैं- हिंदी मीडिया के हीरो, बचपन और मीडिया, उर्दू पत्रकारिता का भविष्य, नये समय का मीडिया, भारतीयता का संचारक : पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति अंक, राष्ट्रवाद और मीडिया इत्यादि। मीडिया विमर्श का पिछला और नया अंक 'संघ और समाज विशेषांक-1 और 2' के शीर्षक से हमारे सामने है। यूँ तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (संघ) सदैव से जनमानस की जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। क्योंकि, संघ के संबंध में संघ स्वयं कम बोलता है, उसके विरोधी एवं मित्र अधिक बहस करते हैं। इस कारण संघ के संबंध में अनेक प्रकार के भ्रम समाज में हैं। विरोधियों ने सदैव संघ को किसी 'खलनायक' की तरह प्रस्तुत किया है। जबकि समाज को संघ 'नायक' की तरह ही नजर आया है। यही कारण है कि पिछले 92 वर्ष में संघ 'छोटे से बीज से वटवृक्ष' बन गया। अनेक प्रकार षड्यंत्रों और दुष्प्रचारों की आंधी में भी संघ अपने मजबूत कदमों के साथ आगे बढ़ता रहा। 

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

त्वरित न्याय

 महिला  अपराधों में लगातार हो रही वृद्धि से मध्यप्रदेश की जनता एवं सरकार, सब चिंतित हैं। अक्टूबर के आखिरी दिन 'बेटी बचाओ' का नारा देने वाले प्रदेश में कोचिंग से पढ़ कर घर जा रही किशोरी के साथ मानसिक तौर पर बीमार लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म कर, मध्यप्रदेश की चिंता को भय में बदल दिया था। घटना के बाद पीडि़त किशोरी ने जिस तरह साहस एवं शक्ति दिखाई थी, उसके ठीक उलट व्यवस्था ने कायरता एवं बेशर्मी का प्रदर्शन किया था। समाज को सुरक्षा एवं न्याय का भरोसा देने वाले पुलिस विभाग ने पीडि़त और उसके अभिभावक के साथ जिस तरह का लापरवाही भरा व्यवहार किया था, उससे प्रदेश के सभी अभिभावक भयभीत हो गए थे। सुरक्षा देने में असफल व्यवस्था पीड़िता का दर्द समझने के लिए भी तैयार नहीं दिखा। बल्कि, अपनी खिलखिहट से पीड़िता के जख्मों पर नमक रगड़ने का काम किया गया। किंतु, साहसी लड़की ने बड़ी हिम्मत और धैर्य दिखाया, उसका परिणाम अब अनुकरणीय उदाहरण बन गया है। न्यायालय ने बहुत तेजी से मामले की सुनवाई करते हुए घटना के मात्र 54 दिन बाद ही चारों आरोपियों को दोषी करार देकर मृत्यु तक सलाखों के पीछे रहने का आदेश सुनाया है।

रविवार, 24 दिसंबर 2017

भारत में 2004 से लेकर 2014 तक की राजनीति का हाल-ए-बयां करती पुस्तक

- विनय कुशवाह 

प्राचीन भारत में सारी सत्ता राजा के इर्द-गिर्द घूमती थी। शासन की प्रणाली प्रजातांत्रिक न होकर राजतंत्र वाली होती थी, जिसमें राजा ही सर्वोपरि होता था। राजा का आदेश ही सबकुछ होता था। राज्य की प्रजा राजा के माध्यम से ही देश के लिए कार्य करती थी। प्रजा से कर वसूला जाता था और राज्य के विकास, राजा के महल और सेना पर बड़ी मात्रा में खर्च किया जाता था। कर की राशि कहां और कितनी खर्च की गई, इसका हिसाब-किताब लगभग नगण्य ही होता था। ना तो उस जमाने में लोकपाल था, ना ही कैग, ना ही ईडी था और ना ही सीबीआई। राजा अपने राज्य में स्वयं ही न्यायालय होता था। यदि ऐसा कुछ आज के समय यानी इक्कीसवीं शताब्दी में हो कि प्रजातंत्र से चुनी गई सरकार अपनी मनमानी करें और शासन को बपौती समझ ले। ऐसा ही कुछ भारत में सन् 2004 से लेकर 2014 तक के शासन में हुआ। इसी समय का हाल-ए-बयां करती एक पुस्तक " देश कठपुतलियों के हाथ में "।

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

पूर्व प्रधानमंत्री के 'सम्मान' की लड़ाई

 संसद  में कांग्रेस जिस प्रकार का व्यवहार कर रही है, वह बचकाना है। कांग्रेस का व्यवहार बताता है कि उसे जनहित के मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं है। एक ऐसी घटना के लिए कांग्रेस ने संसद को बाधित किया हुआ है, जिसका पटाक्षेप गुजरात चुनाव के साथ ही हो जाना चाहिए था। किंतु, ऐसा लगता है कि कांग्रेस पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की शालीन छवि को उसी तरह भुनाना चाहती है, जिस प्रकार उनकी 'ईमानदार छवि' को संप्रग सरकार के दौरान भुनाने का प्रयास किया था। परंतु, कांग्रेस को समझना चाहिए कि वह उस समय भी जनता की नजर में पकड़ी गई और आज भी पूरा देश उसके व्यवहार को देख रहा है। कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कथित अपमान को आधार बना कर संपूर्ण संसद को ठप कर दिया है। कांग्रेस के नेताओं की माँग है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अपमान किया है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी को सदन में आकर क्षमा माँगनी चाहिए।

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

सरकार का निर्णय महिलाओं को करेगा सशक्त

 मध्यप्रदेश  के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ी महत्वपूर्ण घोषणा की है। भोपाल में आयोजित महिला स्व-सहायता समूहों के सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने कहा है कि महिला स्व-सहायता समूहों को पाँच करोड़ रुपये तक के ऋण पर गारंटी सरकार देगी और तीन प्रतिशत ब्याज अनुदान भी सरकार ही देगी। इसमें कोई दोराय नहीं कि मध्यप्रदेश सरकार अपनी महिला नीति के अंतर्गत महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में प्रयासरत है। इसमें महिला स्व-सहायता समूहों को प्रोत्साहित करने की नीति भी शामिल है। प्रदेश के मुखिया की इस घोषणा से न केवल महिला स्व-सहायता समूहों को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि महिलाओं के हाथ भी मजबूत होंगे। मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुसार महिला स्व-सहायता समूहों को जब 700 करोड़ रुपये के पोषण आहार का कारोबार मिलेगा, तब महिलाओं को आर्थिक ताकत मिलेगी। एक सबल प्रदेश एवं देश के निर्माण में महिलाओं की उपस्थिति आर्थिक क्षेत्र में बढऩी ही चाहिए।

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

गुजरात में ईवीएम भी जीती

 गुजरात  चुनाव के परिणाम देश के सामने आ गए हैं। परिणाम में भाजपा-कांग्रेस की जीत-हार के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन एवं चुनाव आयोग को भी विजय प्राप्त हुई है। मतगणना से पूर्व चुनाव परिणाम को लेकर आशंकित कांग्रेस एवं उसके सहयोगी ईवीएम पर अतार्किक एवं बचकाने सवाल खड़े कर रहे थे। एक-दो अब भी अपने कुतर्कों पर अड़े हुए हैं। जबकि गुजरात के प्रदर्शन पर कांग्रेस भी प्रसन्न है। कांग्रेस ने अपने प्रदर्शन में सराहनीय सुधार किया है। गुजरात विधानसभा में अब उसकी सीटें 61 से बढ़ कर 77 हो गई हैं। अर्थात् पिछले जनादेश से 16 सीट अधिक। कुछ सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत कम रहा है। वहीं, जिस भारतीय जनता पार्टी पर ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगता है, उसकी सीटें घट कर 115 से 99 पर आ गई हैं। जबकि भाजपा ने 150 सीट जीतने का लक्ष्य तय किया था। गुजरात विजय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर है, परंतु भाजपा मोदी के गृहनगर में हारी है। यदि ईवीएम में छेड़छाड़ संभव होती, तब क्या मोदी के घर में भाजपा को हारने दिया जाता?

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

समाज-राष्ट्र को समर्पित पत्रकारों से परिचित कराती है 'अनथक कलमयोद्धा'

चित्र में - गिरीश उपाध्याय (वरिष्ठ पत्रकार), जे. नन्दकुमार (राष्ट्रीय संयोजक, प्रज्ञा प्रवाह), बल्देव भाई शर्मा (अध्यक्ष, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास), राम पाल सिंह (मंत्री, लोक निर्माण विभाग, मध्यप्रदेश शासन), अशोक पाण्डेय (मध्य भारत प्रान्त सह संघचालक, आरएसएस)
 हम  सब जानते हैं कि विश्व संवाद केंद्र, भोपाल पत्रकारिता के क्षेत्र में भारतीय मूल्यों को लेकर सक्रिय है। विश्व संवाद केंद्र का प्रयास है कि पत्रकारिता में मूल्य बचे रहें। प्रबुद्ध वर्ग में चलने वाले विमर्शों को आधार माने तब पत्रकारों के दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता प्रतीत होती है। व्यावसायिक प्रतिस्पद्र्धा ने उनके मन में कुछ बातें बैठा दी हैं। आज विशेष जोर देकर पत्रकारों को यह सिखाया जा रहा है कि 'समाचार सबसे पहले' और 'समाचार किसी भी कीमत पर' ही किसी पत्रकार का धर्म है। परंतु, क्या प्रत्येक परिस्थिति में पत्रकार के लिए इस धर्म का निर्वहन आवश्यक है? एक प्रश्न यह भी कि क्या वास्तव में यही पत्रकार का धर्म है? इन दोनों प्रश्नों का विचार करते समय जरा हमें पत्रकारिता के पुरोधाओं के जीवन को देखना चाहिए। उनकी कलम से बहकर निकलने वाली पत्रकारिता की दिशा को समझना चाहिए।

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

रसातल में पहुंची राजनीतिक बयानबाजी

 गुजरात  का चुनावी महासंग्राम विकास पर बहस के साथ प्रारंभ हुआ था। किंतु, जैसे-जैसे यह बहस आगे बढ़ी, विकास के मुद्दे कहीं गायब हो गए। भाषा का स्तर लगातार गिरता गया। कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर का बयान इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक बयानबाजी पूरी तरह से रसातल में पहुंच चुकी है। मणिशंकर अय्यर कोई अनपढ़ नेता नहीं है, बल्कि बेहतरीन संस्थानों में पढ़े-लिखे और कांग्रेस के प्रबुद्ध वर्ग में शुमार हैं। किंतु, नरेन्द्र मोदी के प्रति उनकी नफरत एवं घृणा, उनके भाषाई स्तर को निम्नतम स्तर पर पहुंचा देती है। अय्यर ने देश के प्रधानमंत्री के लिए जिस प्रकार के शब्द का उपयोग किया है, वह न केवल घोर आपत्तिजनक है, बल्कि आपराधिक भी है। 'नीच' शब्द को गाली के रूप में उपयोग किया जाता है। अय्यर ने प्रधानमंत्री को 'नीच' और 'असभ्य' कह कर अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया है। उन्होंने यह भी बताया है कि वह प्रधानमंत्री मोदी से किस हद तक घृणा करते हैं।

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

ध्रुवीकरण का ओछा प्रयास है पादरी की चिट्ठी

 गुजरात  चुनाव में चर्च ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सीधा प्रयास किया है। गांधीनगर के आर्चबिशप (प्रधान पादरी) थॉमस मैकवान ने चिट्ठी लिखकर ईसाई समुदाय के लोगों से अपील की है कि वे गुजरात चुनाव में 'राष्ट्रवादी ताकतों' को हराने के लिए मतदान करें। यह स्पष्टतौर पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय एवं चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी वर्ष जनवरी में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) की नए सिरे से व्याख्या करते हुए निर्णय दिया था कि कोई भी धर्म, जाति, समुदाय या भाषा इत्यादि के आधार पर वोट नहीं माँग सकता। यहाँ तक कि धार्मिक नेता भी अपने समुदाय को किसी उम्मीदवार या पार्टी के पक्ष में मतदान करने के लिए नहीं कह सकता। किंतु, जिनकी आस्थाएं भारत के संविधान की जगह कहीं और हों, उन्हें संविधान या संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की चिंता नहीं होती। बल्कि, उन्हें उनकी चिंता अधिक रहती है, जो उनके स्वार्थ एवं धार्मिक एजेंडे को पूरा करने में सहयोगी होते हैं।

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