शनिवार, 19 अगस्त 2017

नाम बदलने से दिक्कत कब होती है और कब नहीं

 उत्तरप्रदेश  के प्रमुख रेलवे स्टेशन 'मुगलसराय' का नाम भारतीय विचारक 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय' के नाम पर क्या रखा गया, प्रदेश के गैर-भाजपा दलों को ही नहीं, अपितु देशभर में तथाकथित सेकुलर बुद्धिवादियों को भी विरोध करने का दौरा पड़ गया है। मौजूदा समय में केंद्र सरकार के प्रत्येक निर्णय का विरोध करना ही अपना धर्म समझने वाले गैर-भाजपा दल और कथित बुद्धिवादी अपने थके हुए तर्कों के सहारे भाजपा की नीयत को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। साथ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को भी लपेटने का प्रयास कर रहे हैं। 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन' के विरोध में दिए जा रहे तर्क विरोधियों की मानसिकता और उनके वैचारिक अंधत्व को प्रदर्शित करते हैं। उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' को थोप रही है और इसके लिए वह मुगल संस्कृति को मिटाने का काम कर रही है। मुस्लिम समाज में भाजपा के लिए नफरत और अपने लिए प्रेम उत्पन्न करने के लिए विरोधी यह भी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि भाजपा की विचारधारा मुस्लिम विरोधी है, इसलिए चिह्नित करके मुस्लिम नामों को मिटाया जा रहा है। बड़े उत्साहित होकर वह यह भी पूछ रहे हैं कि भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का योगदान क्या है? मजेदार बात यह है कि कांग्रेस, कम्युनिस्ट या दूसरे दलों की सरकारें जब नाम बदलती हैं, तब इस तरह के प्रश्न नहीं उठते। सबको पीड़ा उसी समय होती है, जब भाजपा सरकार नाम बदलती है। भारतीय राजनीति की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाला व्यक्ति भी बता सकता है कि मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलने पर लगाए जा रहे आरोप और पूछे जा रहे प्रश्न, बचकाने और अपरिपक्व हैं। 
          सबसे पहले इस तर्क को कसौटी पर कस कर परखते हैं, जिसमें कहा गया है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर मुस्लिम पहचान को मिटाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि सांस्कृति राष्ट्रवाद कोई बुरी बात नहीं है। कम्युनिस्ट विचारकों के अभारतीय दिमागों ने 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' को गलत अर्थों में प्रस्तुत करने के षड्यंत्र रचे हैं। हालाँकि उनकी तमाम कोशिशें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समक्ष परास्त हुई हैं। भारतीय जनता पार्टी पर यह आरोप इसलिए लगाया जाता है, क्योंकि उसकी पहचान 'हिंदू पार्टी' की है। इसी पहचान के कारण पहली फुरसत में यह आरोप सत्य प्रतीत होता है। लेकिन, यह सच नहीं। सामान्य जीवन में जिस प्रकार की उदारता हिंदू समाज दिखाता है, वही उदारता भाजपा की नीति में भी दिखती है। भाजपा सरकार ने इससे पहले दिल्ली में 'औरंगजेब रोड' का नाम बदला था। अब विचार करें कि क्या भाजपा ने औरंगजेब की जगह सड़क का नाम किसी हिंदू शासक के नाम पर किया? उत्तर है- नहीं। भाजपा ने क्रूर औरंगजेब की जगह उस सड़क को महान व्यक्ति एपीजे अब्दुल कलाम के नाम किया। क्या पूर्व राष्ट्रपति कलाम किसी भी प्रकार औरंगजेब से कम मुसलमान थे? इसके बाद दिल्ली में ही राष्ट्रपति भवन के नजदीक 'डलहौजी रोड' का नाम बदला गया। आश्चर्य की बात है कि आजादी के 70 साल बाद तक देश की राजधानी में एक सड़क उस अंग्रेज गवर्नर जनरल के नाम पर बनी रही, जिसने यहाँ के लोगों पर अत्याचार किया। आजादी के बाद कितने ही नेता उस सड़क से गुजरे होंगे, किंतु किसी का मन आहत नहीं हुआ। दरअसल, यह मानसिक औपनिवेशकता की पहचान है। हमारे लोग अब भी गुलामी की स्मृतियों को कलेजे से लगाए रखने में आनंदित होते हैं। बहरहाल, भाजपा सरकार ने जब 'डलहौजी रोड' का नाम बदला तब भी किसी हिंदू शासक या महापुरुष के नाम का चुनाव नहीं किया। डलहौजी रोड का नाम 'दारा शिकोह मार्ग' करके मुस्लिम समाज के उस शासक की स्मृतियों को संजोया गया, जो उदारमना था। दारा शिकोह हिंदू-मुस्लिम एकता की इमारत को मजबूत करने वाले श्रेष्ठ शिल्पी का नाम है। जबकि भाजपा चाहती तो इस सड़क का नामकरण हिंदू व्यक्ति के नाम पर कर सकती थी। ऐसा करते समय उस पर 'मुस्लिम नाम मिटाने' का आरोप भी नहीं लगता। स्पष्ट है कि भाजपा मुस्लिम नामों को नहीं मिटा रही है, बल्कि उन नामों को हटा रही है, जिन्होंने भारतीय संस्कृति को चोट पहुँचाई थी। भाजपा का यह चेहरा उन लोगों को दिखाई नहीं देगा, जिन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध रखी है। 
          ऐसा नहीं है कि भारत में नाम बदलने की परंपरा का शुभारंभ भाजपा सरकारों ने किया है। कांग्रेस, कम्युनिस्ट और अन्य दल की सरकारें भी अपनी सुविधा के हिसाब से नाम बदलती रही हैं। किंतु उस दौरान किसी ने इस तरह हाय-तौबा नहीं मचाई। कांग्रेस ने ज्यादातर अवसरों पर 'नेहरू परिवार' के नाम पर पट्टिकाएं ठोंकी हैं। देशभर की इमारतें, सड़कें, बस अड्डे, विमानपत्तन, शहरों में बस्तियों के नाम और सरकारी योजनाओं के नाम इस बात की गवाही देते हैं। दिल्ली में ही कनॉट सर्कल का नाम इंदिरा गांधी चौक और कनॉट प्लेस का नाम राजीव चौक किया गया। जब नेहरू परिवार पर जगहों के नामकरण हुए, कहीं कोई प्रखर विरोध का सुर नहीं आया। जहाँ-तहाँ कम्युनिस्टों की सरकारें रहीं, वहाँ नामकरण की परंपरा देख लीजिए। अभारतीय नामों पर सड़क और भवन मिल जाएंगे। पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने अमेरिका को चिढ़ाने के लिए ही एक सड़क का नामकरण वियतनाम के राष्ट्रपति 'हो ची मिन्ह सरानी' के नाम पर कर दिया। दरअसल, उस सड़क पर अमेरिकी वाणिज्यिक दूतावास था। नाम परिवर्तन का निर्णय लेने में इससे अधिक अपरिपक्वता क्या हो सकती है? गैर-भाजपा सरकारों के इन निर्णयों पर उस तरह से कभी भी विरोध नहीं हुआ, जैसा कि भाजपा सरकारों के निर्णयों पर होता है। विदेशी नामों पर आपत्ति दर्ज नहीं करने वाले लोगों को आखिर भारतीयता के प्रतीकों पर पीड़ा क्यों होती है? क्या यह माना जाना चाहिए कि उनकी निष्ठा भारतीय संस्कृति में नहीं है? गैर-भाजपाई राजनीतिक दलों का यह व्यवहार ही भारत के प्रति उनकी निष्ठा को संदिग्ध बनाता है।  
          मुगलसराय के नाम पर छाती पीट रहे लोग क्या यह बता सकते हैं कि 'मुगलसराय' नाम के साथ कौन-सा गौरव का विषय जुड़ा है? मुगलसराय के प्रति भावनात्मक लगाव का कारण क्या है? क्या यह लोग बता सकते हैं कि उन्हें भारतीय राजनीति में शुचिता के प्रतीक पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से क्या दिक्कत है? दुनिया को 'एकात्म मानवदर्शन' जैसा अद्भुत विचार देने वाले अजातशत्रु महापुरुष दीनदयाल उपाध्याय की हत्या करके वैचारिक विरोधियों ने उनका शव इसी मुगलसराय स्टेशन के पोल क्रमांक-1276 फेंक दिया था। मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर भाजपा ने कोई अस्वाभाविक काम नहीं किया है। यह कार्य कांग्रेस सरकार को ही वर्ष 1968 में या उसके तत्काल बाद कर लेना चाहिए था। परंतु, खुद को उदारवादी पार्टी कहने वाली कांग्रेस ने अपनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन नहीं किया। उसके लिए गाँधी-नेहरू परिवार के बाहर कोई महापुरुष नहीं हुए, जिनकी स्मृति को चिरस्थायी करने के प्रयास किए जाते। बहरहाल, अपने प्रेरणा पुरुष को श्रद्धांजलि देने के लिए भाजपा को 49 वर्ष का लम्बा इंतजार करना पड़ा। कितना अच्छा होता कि वैचारिक असहिष्णुता का प्रदर्शन करने वाले दल और बुद्धिवादी दीनदयाल उपाध्याय जैसे नाम का सम्मान करते और सरकार के इस निर्णय पर बेकार की बहस खड़ी करने से बचते। किन्तु, इसके लिए उदार और बड़े दिल की जरूरत होती है। राज्यसभा में इस बहस का जवाब देते समय अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने उचित ही कहा- 'यह लोग मुगलों के नाम पर स्टेशन का नाम रख लेंगे, लेकिन दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर नहीं रखेंगे।' भारतीयता के विरोध की यह आवाजें नक्कारखाने में तूती की तरह गूँज रही हैं, जिन्हें देश में कोई सुनने को तैयार नहीं हैं। भारत बदलाव के दौर से गुजर रहा है। यह बदलाव 'भारतीयता' के अनुरूप है।
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सोमवार, 14 अगस्त 2017

दु:खद है बच्चों की मौत

 गोरखपुर  के बाबा राघव दास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज में छह दिनों के भीतर 60 से ज्यादा बच्चों की मौत हमारी अव्यवस्थाओं की सच्चाई है। एक ओर हम आजादी की 71वीं वर्षगाँठ मनाने की तैयारियां कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हमारे बच्चे मर रहे हैं। बच्चों की जिंदगी इस तरह जाया होना, हमारे लिए कलंक है। देश में बीमारी या अभावों के कारण एक भी बच्चे की मृत्यु '70 साल के आजाद भारत' के लिए चिंता की बात है। किसी भी प्रकार का तर्क हमें बच्चों की मौत की जिम्मेदारी से नहीं बचा सकता। अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से या फिर किसी बीमारी से ही क्यों न हो, इस तरह बच्चों या किसी भी उम्र के व्यक्ति की मौत हो जाना, बहुत दु:खद और दर्दनाक है। गोरखपुर की इस घटना ने देश को हिला कर रख दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चाहिए कि बच्चों की मौत के मामले पर मन में पूरी संवेदनशीलता रखें और व्यवहार में कठोरता। संवेदनशीलता, बच्चों और उनके परिवार के प्रति। कठोरता, लापरवाह और भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति। दोषियों को दण्डित करना जरूरी है। वरना कभी न कभी फिर से हम पर दु:खों का पहाड़ टूटेगा।

रविवार, 13 अगस्त 2017

वैचारिक संघर्ष नहीं, केरल में है लाल आतंक

राजेश के शरीर पर 83 घाव बताते हैं कि केरल में किस तरह लाल आतंक हावी है, केरल में दिखाई नहीं देता क़ानून का राज

 केरल  पूरी तरह से कम्युनिस्ट विचारधारा के 'प्रैक्टिकल' की प्रयोगशाला बन गया है। केरल में जिस तरह से वैचारिक असहमतियों को खत्म किया जा रहा है, वह एक तरह से कम्युनिस्ट विचार के असल व्यवहार का प्रदर्शन है। केरल में जब से कम्युनिस्ट सत्ता में आए हैं, तब से कानून का राज अनुपस्थिति दिखाई दे रहा है। जिस तरह चिह्नित करके राष्ट्रीय विचार के साथ जुड़े लोगों की हत्याएं की जा रही हैं, उसे देख कर यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि केरल में जंगलराज आ गया है। लाल आतंक अपने चरम की ओर बढ़ रहा है। 'ईश्वर का घर' किसी बूचडख़ाने में तब्दील होता जा रहा है। 29 जुलाई को एक बार फिर गुण्डों की भीड़ ने घेरकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राजेश की हत्या कर दी। हिंसक भीड़ ने पहले 34 वर्षीय राजेश की हॉकी स्टिक से क्रूरता पिटाई की और फिर उनका हाथ काट दिया। राजेश तकरीबन 20 मिनट तक सड़क पर तड़पते रहे। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, किंतु उनका जीवन नहीं बचाया जा सका। राजेश के शरीर पर 83 घाव बताते हैं कि कितनी नृशंता से उनकी हत्या की गई।

शनिवार, 12 अगस्त 2017

अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाए हामिद साहब

दैनिक समाचार पत्र राजएक्सप्रेस में प्रकाशित
 निवर्तमान  उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जाते-जाते ऐसी बातें कह गए, जो संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को नहीं कहनी चाहिए थी और यदि कहना जरूरी ही था तो कम से कम उस ढंग से नहीं कहना था, जिस अंदाज में उन्होंने कहा। असहिष्णुता के मुद्दे पर किस प्रकार 'बड़ी और गंभीर' बात कहना, इसके लिए उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के भाषणों को सुनना/पढऩा चाहिए था। असहिष्णुता के मुद्दे पर पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी ने भी अनेक अवसर पर अपनी बात रखी, लेकिन उनकी बात में अलगाव का भाव कभी नहीं दिखा। जबकि हामिद साहब के अतार्किक बयान के बाद उपजा विवाद बता रहा है कि उनके कथन से देश को बुरा लगा है। यकीनन जब कोई झूठा आरोप लगाता है तब बुरा तो लगता ही है, गुस्सा भी आता है। राज्यसभा टीवी को दिए साक्षात्कार को देख-सुन कर सामान्य व्यक्ति को भी यह समझने में मुश्किल हो रही है कि आखिर किस दृष्टिकोण से भारत में मुस्लिम असुरक्षित हैं। जब भी किसी ने मुस्लिमों के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की है, तब उसके विरोध में सबसे अधिक आवाज देश के बहुसंख्यक समाज की ओर से उठी हैं। मुसलमान भी किसी इस्लामिक देश की अपेक्षा भारत में अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। वे पाकिस्तान जाने की अपेक्षा भारत में ही रहना पसंद करते हैं। भारत में जितनी आजादी मुसलमानों को है, क्या उतनी कहीं और है? मान सकते हैं कि लोकतंत्र की सफलता इस बात से तय होती होगी कि वहाँ अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं? हामिद साहब भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित ही नहीं है, बल्कि सफलताएं भी अर्जित कर रहे हैं। भारत के प्रत्येक क्षेत्र में मुस्लिम शीर्ष तक पहुँचे हैं। लोकप्रियता अर्जित की है। राजनीति के क्षेत्र में भी अपना नेतृत्व दिया है। हामिद अंसारी साहब का परिवार और वे स्वयं भी भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय भी पूरे आनंद के साथ भारत-भूमि पर जीवन जी रहे हैं। उपराष्ट्रपति जैसे पद को सुशोभित करने वाले और उच्च शिक्षित व्यक्ति को ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, जिससे देश के विभिन्न समुदायों में नकारात्मक भाव उत्पन्न हों। उन्हें मुस्लिम समाज को प्रेरित और सकारात्मकता की ओर अग्रेषित करने का प्रयास करना चाहिए था। जाते-जाते बड़प्पन दिखाना चाहिए था। बतौर उपराष्ट्रपति अपने अंतिम वक्तव्य में सकारात्मक बात कहनी चाहिए थी।

शनिवार, 5 अगस्त 2017

पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' जरूरी

 मौजूदा  दौर में समाचार माध्यमों की वैचारिक धाराएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब आम समाज यह बात कर रहा है कि फलां चैनल/अखबार कांग्रेस का है, वामपंथियों का है और फलां चैनल/अखबार भाजपा-आरएसएस की विचारधारा का है। समाचार माध्यमों को लेकर आम समाज का इस प्रकार चर्चा करना पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए ठीक नहीं है। कोई समाचार माध्यम जब किसी विचारधारा के साथ नत्थी कर दिया जाता है, जब उसकी खबरों के प्रति दर्शकों/पाठकों में एक पूर्वाग्रह रहता है। वह समाचार माध्यम कितनी ही सत्य खबर प्रकाशित/प्रसारित करे, समाज उसे संदेह की दृष्टि से देखेगा। समाचार माध्यमों को न तो किसी विचारधारा के प्रति अंधभक्त होना चाहिए और न ही अंध विरोधी। हालांकि यह भी सर्वमान्य तर्क है कि तटस्थता सिर्फ सिद्धांत ही है। निष्पक्ष रहना संभव नहीं है। हालांकि भारत में पत्रकारिता का एक सुदीर्घ सुनहरा इतिहास रहा है, जिसके अनेक पन्नों पर दर्ज है कि पत्रकारिता पक्षधरिता नहीं है। निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है। कलम का जनता के पक्ष में चलना ही उसकी सार्थकता है। बहरहाल, यदि किसी के लिए निष्पक्षता संभव नहीं भी हो तो न सही। भारत में पत्रकारिता का एक इतिहास पक्षधरता का भी है। इसलिए भारतीय समाज को यह पक्षधरता भी स्वीकार्य है लेकिन, उसमें राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती नहीं होनी चाहिए। किसी का पक्ष लेते समय और विपरीत विचार पर कलम तानते समय इतना जरूर ध्यान रखें कि राष्ट्र की प्रतिष्ठा पर आँच न आए। हमारी कलम से निकल बहने वाली पत्रकारिता की धारा भारतीय स्वाभिमान, सम्मान और सुरक्षा के विरुद्ध न हो। कहने का अभिप्राय इतना-सा है कि हमारी पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव जागृत होना चाहिए। वर्तमान पत्रकारिता में इस भाव की अनुपस्थिति दिखाई दे रही है। हिंदी के पहले समाचार पत्र उदंत मार्तंड का ध्येय वाक्य था- 'हिंदुस्थानियों के हित के हेत'। अर्थात् देशवासियों का हित-साधन। वास्तव में यही पत्रकारिता का राष्ट्रीय स्वरूप है। राष्ट्रवादी पत्रकारिता कुछ और नहीं, यही ध्येय है। राष्ट्र सबसे पहले का असल अर्थ भी यही है कि देशवासियों के हित का ध्यान रखा जाए।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

'जय श्री राम' पर फतवा

 भारत  में 'जय श्री राम' कहने पर फतवे जारी होने लगें, तब यह विचार जरूर करना चाहिए कि क्या देश में सब कुछ ठीक चल रहा है? सभी मत-पंथ के प्रवर्तक यह दावा करते हैं कि उनका पंथ सर्व-धर्म सद्भाव की सीख देता है। प्रत्येक संप्रदाय के रहनुमा कहते हैं कि उनके पंथ की प्राथमिक शिक्षाओं में शामिल है कि औरों के धर्म का सम्मान करना चाहिए। अगर इस्लाम के संबंध में भी यह सच है, तब प्रश्न उठता है कि 'जय श्री राम' बोलने वाले बिहार सरकार के मंत्री खुर्शीद आलम के खिलाफ फतवा जारी होना चाहिए था या फिर खुर्शीद आलम के खिलाफ फतवा जारी करने वाले मुफ्ती सोहेल कासमी का बहिष्कार होना चाहिए था? मुफ्ती फतवा जारी करने तक ही नहीं रुका है, बल्कि उसने कहा है कि राम और रहीम एक साथ नहीं रह सकते। यह कैसी अलगाववादी सोच को प्रस्तुत कर रहे हैं? क्या कुरान में यह लिखा है कि दो विभिन्न विचार एक-दूसरे के साथ एक-दूसरे का सम्मान करते हुए नहीं रह सकते?

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

मॉब लिंचिंग और उसका सच

 मौजूदा  समय में विपक्ष मुद्दा विहीन और भ्रमित दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि बीते सोमवार को संसद में 'मॉब लिंचिंग' जैसे बनावटी मुद्दे पर सरकार को घेरने का असफल प्रयास कांग्रेस ने किया। निश्चित ही भीड द्वारा की जा रही घटनाएं सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं हैं। इनकी निंदा की जानी चाहिए और इस प्रवृत्ति पर कठोरता से कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन, यह जिम्मेदारी किसकी है? क्या केंद्र सरकार 'मॉब लिंचिंग' की घटनाओं के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है? क्या यह राज्यों की कानून व्यवस्था से जुड़ा मसला नहीं है? राज्यों के मामले में केंद्र सरकार का दखल देना क्या उचित होगा? यह भी देखना होगा कि 'मॉब लिंचिंग' की घटनाएं अभी अचानक होने लगी हैं या फिर इस प्रकार की घटनाओं का अपना इतिहास है? जब कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने मॉब लिंचिंग के मुद्दे को संसद में उठाया, तब उनसे सत्ता पक्ष ने इसी प्रकार के प्रश्नों के उत्तर चाहे। स्वाभाविक ही कांग्रेस के पास उक्त प्रश्नों के उत्तर नहीं थे।

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

राष्ट्रगीत के सम्मान में न्यायालय का निर्णय

 भारतीय  संविधान में 'वंदेमातरम्' को राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' के समकक्ष राष्ट्रगीत का सम्मान प्राप्त है। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने 'वन्देमातरम्' गीत को देश का राष्ट्रगीत घोषित करने का निर्णय लिया था। यह अलग बात है कि यह निर्णय आसानी से नहीं हुआ था। संविधान सभा में जब बहुमत की इच्छा की अनदेखी कर वंदेमातरम् को राष्ट्रगान के दर्जे से दरकिनार किया गया, तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने वंदेमातरम् की महत्ता को ध्यान में रखते हुए 'राष्ट्रगीत' के रूप में इसकी घोषणा की। बंगाल के कांतल पाडा गाँव में 7 नवंबर, 1976 को रचा गया यह गीत 1896 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गाया गया। गीत के भाव ऐसे थे कि राष्ट्रऋषि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का लिखा 'वंदेमातरम्' स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिवीरों का मंत्र बन गया था। 1905 में जब अंग्रेज बंगाल के विभाजन का षड्यंत्र रच रहे थे, तब वंदेमातरम् ही इस विभाजन और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बुलंद नारा बन गया था। रविन्द्र नाथ ठाकुर ने स्वयं कई सभाओं में वंदेमातरम् गाकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जन सामान्य को आंदोलित किया। 

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

चीन और कम्युनिस्टों की भाषा एक-सी

 पिछले  कुछ समय से भारत और चीन के साथ सीमा विवाद गहराया हुआ है। दरअसल, चीन की विस्तावादी नीति के मार्ग में भारत मजबूती के साथ खड़ा हो गया है। चीन सिक्कम क्षेत्र के डोकलाम क्षेत्र में सड़क बनाना चाहता है, जिस पर भारत को बहुत आपत्ति है। यह क्षेत्र भारत, भूटान और चीन को आपस में जोड़ता है। यह स्थल सीमा सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भूटान भी चीन की विस्तारवादी मानसिकता का डटकर विरोध कर रहा है। बहरहाल, सीमा पर भारत के सख्त और स्पष्ट रुख से चीन का मीडिया बौखला गया है। चीनी मीडिया लगातार भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है। चीनी मीडिया ने पहले भारत को 1962 के युद्ध की धौंस दिखाते हुए गीदड़ भभकी दी। चीनी मीडिया ने सोचा था कि भारत उसकी धमकी से डर जाएगा और उसके मार्ग से हट जाएगा। सीमा पर उसको मनमर्जी करने देगा। लेकिन, चीन की यह गीदड़ भभकी किसी काम नहीं आई। उसके बाद भी चीनी मीडिया भारत के संदर्भ में अनर्गल लिखता रहा। लेकिन, अभी हाल में चीनी मीडिया में जिस तरह की टिप्पणी आई है, वह चौंकाने वाली है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है- ''भारत में उभर रहे 'हिंदू राष्ट्रवाद' की वजह से भारत-चीन के बीच युद्ध हो सकता है। राष्ट्रवादी उत्साह में 1962 के युद्ध के बाद से ही चीन के खिलाफ बदला लेने की मांग भारत के भीतर उठ रही है। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को चुने जाने से देश में राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ावा मिला है।''

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

कितना आसान है हिंदुत्व का अपमान

 अपनी  ही भूमि पर हिंदुत्व का अपमान आसानी से किया जा सकता है, इस बात को एक बार फिर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता नरेश अग्रवाल ने सिद्ध कर दिया। राज्यसभा में बुधवार को उन्होंने हिंदुओं के भगवान राम, माता जानकी और भगवान विष्णु को लेकर अमर्यादित टिप्पणी कर दी। गली-चौराहे के नेता की तरह बोलते हुए उन्होंने हिंदुओं की आस्था के केंद्र राम, माता जानकी और विष्णु को शराब से जोड़ दिया। उनकी टिप्पणी सरासर हिंदुत्व का अपमान है। क्या यह सीधे तौर पर हिंदू आस्थाओं पर चोट नहीं है? बिना विचार किए कही गई अपनी इस टिप्पणी को लेकर नरेश अग्रवाल को तनिक भी अफसोस नहीं हुआ। उन्हें कतई यह नहीं लगा कि उन्होंने देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने अग्रवाल के बयान पर आपत्ति जताते हुए उनसे माफी की माँग की तब उन्होंने साफ-तौर पर इनकार कर दिया। बाद में, बे-मन से कहा कि अगर उनकी टिप्पणी से किसी की भावना को ठेस पहुंची है, तो वह उसे वापस लेते हैं। स्पष्ट है कि उन्हें अपनी गलती के लिए कोई मलाल नहीं था।

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