शुक्रवार, 17 मार्च 2017

कट्टरपंथ की बुरी नजर से कला-संस्कृति को बचाना होगा

 असम  के 46 मौलवियों की कट्टरपंथी सोच को 16 वर्षीय गायिका नाहिद आफरीन ने करारा जवाब दिया है। नाहिद ने कहा है कि खुदा ने उसे गायिका का हुनर दिया है, संगीत की अनदेखी करना मतलब खुदा की अनदेखी होगा। वह मरते दम तक संगीत से जुड़ी रहेंगी और वह किसी फतवे से नहीं डरती हैं। इंडियन आइडल से प्रसिद्ध हुई नाहिद आफरीन ने हाल में आतंकवाद और आईएसआईएस के विरोध में गीत गाए थे। आशंका है कि कट्टरपंथियों को यह बात चुभ गई होगी। सुरीली आवाज का गला घोंटने के लिए कट्टरपंथियों ने 46 फरमान जारी करते हुए नाहिद को 25 मार्च को संगीत कार्यक्रम की प्रस्तुति नहीं देने के लिए धमकाया है। आफरीन के खिलाफ मंगलवार को मध्य असम के होजई और नागांव जिलों में कई पर्चे बांटे गए, जिनमें असमिया भाषा में फतवा और फतवा जारी करने वाले लोगों के नाम हैं। इन फतवों के अनुसार, 25 मार्च को असम के लंका इलाके के उदाली सोनई बीबी महाविद्यालय में 16 साल की नाहिद को गीत गाना है, जिसे पूरी तरह से शरिया के खिलाफ बताया गया है। फतवों की माने तो संगीत संध्या जैसी चीजें पूरी तरह से शरिया के खिलाफ हैं। दरअसल, इन मौलवियों के दिमाग में जहर भरा हुआ है। यही कारण है कि उन्हें एक बच्ची की प्रतिभा दिखाई नहीं दे रही। इन्हें भारत में इस्लाम और संगीत के रिश्ते की समझ भी नहीं है। 21वीं सदी में आगे बढ़ने की जगह इस्लाम के यह ठेकेदार अपनी कौम को पीछे धकेलने का निंदनीय कृत्य कर रहे हैं। अब भी यह कूपमंढूक बने रहना चाहते हैं। 
          एक समाचार वाहनी (चैनल) पर बहस के दौरान एक मौलवी से अच्छा सवाल मुस्लिम प्रतिभागी ने पूछ लिया- 'इस्लाम में तो चित्र खिंचवाना भी मना है, फिर आप वीडियो कैमरा के सामने क्यों आए? ' शरिया के हिसाब से संगीत और नाहिद की प्रतिभा को अनुचित बताने वाला वह मौलाना इस प्रश्न का जवाब नहीं दे सका। अपनी कट्टर सोच के प्रचार-प्रसार के लिए वह सब साधन इस्तेमाल कर सकते हैं, फिर चाहे वह इस्लाम के मुताबिक हराम हों, लेकिन मासूम नाहिद का गाना, तस्लीमा का लिखना, क्रिकेटर मोहम्मद सामी की पत्नी का फोटो खिंचाना, क्रिकेटर मोहम्मद कैफ का सूर्य नमस्कार करना, प्रख्यात संगीतकार एआर रहमान का संगीत और सना अमीन शेख़ का अभिनय इन्हें पसंद नहीं है। पिछले सप्ताह ही कर्नाटक की सुहाना सईद को एक कन्नड़ रियलिटी शो में हिंदू भजन गाने के कारण सामाजिक माध्यमों पर बलात्कार की धमकी दी गई। सुहाना और उसके परिवार के लिए भद्दी टिप्पणियां लिखी गईं। इसके बावजूद इस कट्टरपंथी सोच के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं हुई। इस तरह की घटनाएं हमारे प्रगतिशील बौद्धिक जगत, अभिव्यक्ति की आजादी का नारा लगाने वाले समूहों और सहिष्णु गैंग के दोगले चरित्र को भी उजागर करती हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी का नारा लगाने वाले समूह इस कट्टर सोच का विरोध करने की जगह उसका बचाव करते नजर आते हैं। मौलानाओं के फरमानों एवं फतवों में तथाकथित प्रगतिशील और बौद्धिक जगत को न तो अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा नजर आता है, न सांप्रदायिकता-कट्टरपंथ और न ही महिला विरोधी सोच नजर आती है।
          नाहिद आफरीन के मामले में 46 मौलानाओं के फरमान का यह कहकर बचाव किया जा रहा है कि नाहिद के खिलाफ कोई 'फतवा' जारी नहीं हुआ है। तकनीकी तौर पर यह सही हो सकता है कि नाहिद के खिलाफ बाँटें गए पर्चे 'फतवा' न हो। लेकिन, क्या इस प्रकार के जहरीले पर्चे किसी फतवे से कम हैं? तथाकथित बुद्धिजीवी इस प्रकार का बचकाना तर्क देकर कट्टरपंथी सोच को प्रोत्साहित और संगीत के क्षेत्र में कदम रखने वाली सैकड़ों मुस्लिम युवतियों को हतोत्साहित करते नजर आ रहे हैं। हमें याद करना होगा कि कट्टरपंथियों के विरुद्ध खड़े नहीं होने के कारण जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम लड़कियों का पहला रॉक बैंड 'प्रगाश' दम तोड़ चुका है। कश्मीर की तीन मुस्लिम लड़कियों ने रॉक बैंड 'प्रगाश' की शुरुआत की थी, जिसे सब ओर से सराहना मिल रही थी। लेकिन, जम्मू कश्मीर के प्रमुख मुफ़्ती बशीरउद्दीन अहमद ने 15-16 साल के आयुवर्ग की तीन लड़कियों के गाने को गैर-इस्लामी करार देकर उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया था। तीनों लड़कियों के खिलाफ उनके बैंड के फेसबुक पेज पर घृणा से भरी और भद्दी टिप्पणियां की गईं, जिसके बाद उन्होंने संगीत से हमेशा के लिए तौबा कर ली। इस बार अच्छी बात यह है कि 16 वर्षीय नाहिद आफरीन इस कट्टरपंथी सोच के खिलाफ साहस के साथ खड़ी हैं। असम की सरकार और देश के अनेक लोग भी उनके साथ खड़े हैं। हम सबको देश, समाज और मानवता के लिए कट्टरपंथी सोच के खिलाफ खड़ा होना ही पड़ेगा।


गुरुवार, 16 मार्च 2017

हार की जिम्मेदारी ईवीएम पर

 उत्तरप्रदेश,  पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के इस्तेमाल पर बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। बसपा प्रमुख मायावती ने दूसरी बार प्रेसवार्ता आयोजित करके ईवीएम में छेड़छाड़ कर बेईमानी से चुनाव जीतने के आरोप भारतीय जनता पार्टी पर लगाए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा की जीत ईमानदारी की नहीं है, बल्कि ईवीएम में धांधली करके यह जीत हासिल की है। मायावती ने इस मामले पर उच्चतम न्यायालय जाने और आंदोलन करने की बात कही है। वहीं, बुधवार को ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी एक प्रेसवार्ता में यह आरोप लगाए कि ईवीएम में गड़बड़ी करके पंजाब चुनाव में उनके मत चुराकर अकाली दल और भाजपा के गठबंधन को हस्तांतरित किए गए हैं।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

लाल हिंसा के खिलाफ देशभर में जनाक्रोश

केरल में राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध लोगों की हत्या और कम्युनिस्ट अत्याचार के विरुद्ध देशभर में आम समाज ने बुलंद की आवाज
 केरल  में पिछले 50 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेविका समिति सहित अन्य सभी राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध संगठनों के सामान्य स्वयंसेवकों की हत्या की जा रही है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कार्यकर्ता नृशंसता से अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। दस माह पहले केरल में माकपा की सत्ता आने के बाद से लाल आतंक में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। मई, 2016 से अब तक 20 से अधिक स्वयंसेवकों की हत्याएं माकपा के गुण्डों ने की हैं। केरल राज्य के कन्नूर जिले मंअ स्थितियां और भी भयावह हैं। राज्य के मुख्यमंत्री पी. विजयन सहित माकपा पोलित ब्यूरो के अधिकतम सदस्य कन्नूर जिले से ही आते हैं। लेकिन, हैरानी की बात है कि देश का तथाकथित बौद्धिक जगत और मीडिया का बहुसंख्यक वर्ग इस आतंक पर खामोश है। दिल्ली से उठते अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता के नारे केरल क्यों नहीं पहुंचते? राष्ट्रभक्त लोगों के लहू से लाल हो रही देवभूमि क्यों किसी को दिखाई नहीं दे रही है? तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग और मीडिया की चुप्पी के बीच केरल में भयंकर रूप धारण कर चुके लाल आतंक के खिलाफ अब देश खड़ा हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आह्वान पर देशभर में नागरिक अधिकार, जनाधिकार और मानव अधिकार मंचों के तहत आम समाज एकजुट होकर लाल आतंक के खिलाफ जनाक्रोश व्यक्त कर रहा है। मार्च के पहले सप्ताह में एक, दो और तीन तारीख को देश के प्रमुख स्थानों पर समाज के संवेदनशील नागरिक बंधुओं ने 'संवेदना मार्च' निकाले और धरने आयोजित किए हैं।

बुधवार, 1 मार्च 2017

रामजस पर हल्ला, केरल पर चुप्पी क्यों?

 रामजस  महाविद्यालय प्रकरण से एक बार फिर साबित हो गया कि हमारा तथाकथित बौद्धिक जगत और मीडिया का एक वर्ग भयंकर दोगला है। एक तरफ ये कथित धमकियों पर भी देश में ऐसी बहस खड़ी कर देते हैं, मानो आपातकाल ही आ गया है, जबकि दूसरी ओर बेरहमी से की जा रही हत्याओं पर भी चुप्पी साध कर बैठे रहते हैं। वामपंथ के अनुगामी और भारत विरोधी ताकतें वर्षों से इस अभ्यास में लगी हुई हैं। अब तक उनका दोगलापन सामने नहीं आता था, लेकिन अब सोशल मीडिया और संचार के अन्य माध्यमों के विस्तार के कारण समूचा देश इनके पाखण्ड को देख पा रहा है। इस पाखण्ड के कारण आज पत्रकारिता जैसा पवित्र माध्यम भी संदेह के घेरे में आ गया है। पिछले ढाई साल में अपने संकीर्ण और स्वार्थी नजरिए के कारण इन्होंने असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी को मजाक बना कर रख दिया है। रामजस महाविद्यालय का प्रकरण भी इसकी ही एक बानगी है।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

हिंदू आबादी घटने पर विवाद नहीं चिंता करनी चाहिए

 अरुणाचल  प्रदेश में हिंदू जनसंख्या के सन्दर्भ में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के बयान पर कुछ लोग विवाद खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि उनका बयान एक कड़वी हकीकत को बयां कर रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि उनके बयान पर वो लोग हायतौबा मचा रहे हैं, जो खुद को पंथनिरपेक्षता का झंडाबरदार बताते हैं। हिंदू आबादी घटने के सच पर विवाद क्यों हो रहा है, जबकि यह तो चिंता का विषय होना चाहिए। जनसंख्या असंतुलन आज कई देशों के सामने गंभीर समस्या है, लेकिन हमारे नेता इस गम्भीर चुनौती को भी क्षुद्र मानसिकता के साथ देख रहे हैं।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

हिन्दू सम्मलेन का सन्देश

 मध्यप्रदेश  के वनवासी समाज बाहुल्य जिले बैतूल में संपन्न हिन्दू सम्मलेन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संगठित हिन्दू से समर्थ भारत का सन्देश दिया है। अर्थात भारत के विकास और उसे विश्वगुरु बनाने के लिए उन्होंने हिन्दू समाज में समरसता एवं एकता को आवश्यक बताया। उनका मानना है कि दुनिया जब विविध प्रकार के संघर्षों के समाधान के लिए भारत की ओर देख रही है और भारत को विश्वगुरु की भूमिका में भी देख रही है, तब भारत को विश्वगुरु बनाने की जिम्मेदारी इस देश हिन्दू समाज की ही है। यह सही भी है इस देश की संतति ही संगठित नहीं होगी तो देश कैसे विश्व मंच पर ताकत के साथ खड़ा होगा।

जेएनयू की बीमारी, 'देशद्रोह' के प्रोफेसर

 जवाहरलाल  नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) अपने विद्यार्थियों और शिक्षकों के रचनात्मक कार्यों से कम बल्कि उनकी देश विरोधी गतिविधियों से अधिक चर्चा में रहता है। पिछले वर्ष जेएनयू परिसर देश विरोधी नारेबाजी के कारण बदनाम हुआ था, तब जेएनयू की शिक्षा व्यवस्था पर अनेक सवाल उठे थे। यह सवाल भी बार-बार पूछा गया था कि जेएनयू के विद्यार्थियों समाज और देश विरोधी शिक्षा कहाँ से प्राप्त कर रहे हैं? शिक्षा और बौद्धिक जगत से यह भी कहा गया था कि जेएनयू के शिक्षक हार रहे हैं। वह विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने में असफल हो रहे हैं। लेकिन, पिछले एक साल में यह स्पष्ट हो गया है कि जेएनयू के शिक्षक हारे नहीं है और न ही विद्यार्थियों के मार्गदर्शन में असफल रहे हैं, बल्कि वह अब तक जीतते रहे हैं और अपनी शिक्षा को विद्यार्थियों में हस्थातंरित करने में सफल रहे हैं। 

कांग्रेस से लोकतंत्र है या लोकतंत्र से कांग्रेस

 संसद  में कांग्रेस की ओर से दावा किया गया है कि उसके कारण भारत में लोकतंत्र बचा हुआ है। कांग्रेस की ओर से संसद में उसके नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने कहा कि कांग्रेस को देश में लोकतंत्र बनाए रखने का श्रेय मिलना चाहिए, जिसके कारण एक गरीब परिवार से आने वाले नरेंद्र मोदी भी भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा पाए। संसद में यह भाषण करते वक्त खडग़े भूल गए कि कांग्रेस ने १९७५ में लोकतंत्र का गला घोंटने की पूरी कोशिश की थी। आजादी के आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाली कलम पर पहरा बैठा दिया गया था। विरोधी विचारधारा के लोगों को पकड़-पकड़ कर जेलों में ठूंसा गया और उनको यातनाएं दी गईं। लेकिन, जनशक्ति के सामने कांग्रेस की तानाशाही टिक नहीं सकी और इस देश में लोकतंत्र को खत्म करने के षड्यंत्र में कांग्रेस कामयाब नहीं हो सकी। आजादी के बाद से अब तक ७० साल में कांग्रेस ने जितने घोटाले किए हैं, उनके आधार पर उसे सत्ता मिलनी ही नहीं चाहिए, लेकिन यह लोकतंत्र है कि देश में भ्रष्टाचार का नाला बहाने के बाद भी कांग्रेस आज न केवल अस्तित्व में है, बल्कि कुछेक राज्यों में सत्तासीन भी है। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को समझना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र उनके कारण नहीं बचा है, बल्कि लोकतंत्र के कारण वह बची हुई है। 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

'भगवान के घर' में वामपंथ का आतंक

 'ईश्वर  का अपना घर' कहा जाने वाला प्राकृतिक संपदा से सम्पन्न प्रदेश केरल लाल आतंक की चपेट में है। प्रदेश में लगातार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है। केरल वामपंथी हिंसा के लिए बदनाम है, लेकिन पिछले कुछ समय में हिंसक घटनाओं में चिंतित करने वाली वृद्धि हुई है। खासकर जब से केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) सरकार आई है, तब से राष्ट्रीय विचार से जुड़े निर्दोष लोगों और उनके परिवारों को सुनियोजित ढंग से निशाना बनाया जा रहा है। संघ और भाजपा का कहना है कि प्रदेश में मार्क्सवादी हिंसा को मुख्यमंत्री पी. विजयन का संरक्षण प्राप्त है। अब तक की घटनाओं में स्पष्टतौर पर माकपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं की संलिप्तता उजागर हुई है। लेकिन, राज्य सरकार ने हिंसा को रोकने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठाए हैं, बल्कि घटनाओं की लीपापोती करने का प्रयास जरूर किया है। इसलिए मुख्यमंत्री पी. विजयन सहित समूची माकपा सरकार संदेह के घेरे में है।

सोमवार, 30 जनवरी 2017

इतिहास को विकृत करने की जिद

 भारतीय  फिल्म उद्योग में जब भी किसी ऐतिहासिक घटना या व्यक्तित्व पर फिल्म बनाने का विचार प्रारंभ होता है, तब उसके साथ विवाद भी उत्पन्न हो जाते हैं। दरअसल, हमारे निर्देशकों में एक बड़ी बीमारी है कि वह इतिहास को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत न करके अपने ढंग से छेड़छाड़ करके प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। जहाँ मान्य सत्य के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास किया जाता है, वहीं विवाद खड़ा होता है। निर्देशक अपने चश्मे से इतिहास को देखने और दिखाने की जिद में समाज को आहत करने की गलती कर बैठते हैं। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक-निर्माता संजय लीला भंसाली को थप्पड़ मारने की घटना इसी आहत समाज के आक्रोश का प्रकटीकरण है। करणी सेना के लोगों ने जयपुर में 'पद्मावती' फिल्म के शूटिंग स्थल पर पहुंच कर विरोध किया और भंसाली को थप्पड़ मार दिया। करणी सेना के इस कृत्य की निंदा की जानी चाहिए। लेकिन, जितनी निंदा करणी सेना की करना जरूरी है, उससे कहीं अधिक निंदा और आलोचना संजय लीला भंसाली की भी करना  आवश्यक है।

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