रविवार, 5 नवंबर 2017

हिंदी मीडिया के चर्चित चेहरों से मुलाकात कराती किताब

 हम  जिन्हें प्रतिदिन न्यूज चैनल पर बहस करते-कराते देखते हैं। खबरें प्रस्तुत करते हुए देखते हैं। अखबारों और पत्रिकाओं में जिनके नाम से प्रकाशित खबरों और आलेखों को पढ़कर हमारा मानस बनता है। मीडिया गुरु और लेखक संजय द्विवेदी की किताब 'हिंदी मीडिया के हीरो' पत्रकारिता के उन चेहरों और नामों को जानने-समझने का मौका उपलब्ध कराती है। किताब में देश के 101 मीडिया दिग्गजों की सफलता की कहानी है। किन परिस्थितियों में उन्होंने अपनी पत्रकारिता शुरू की? कैसे-कैसे सफलता की सीढिय़ां चढ़ते गए? उनका व्यक्तिगत जीवन कैसा है? टेलीविजन पर तेजतर्रार नजर आने वाले पत्रकार असल जिन्दगी में कैसे हैं? उनके बारे में दूसरे दिग्गज क्या सोचते हैं? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब यह किताब देती है। किताब को पढ़ते वक्त आपको महसूस होगा कि आप अपने चहेते मीडिया हीरो को नजदीक से जान पा रहे हैं। यह किताब पत्रकारिता के छात्रों सहित उन तमाम युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जो आगे बढऩा चाहते हैं। पुस्तक में जमीन से आसमान तक पहुंचने की कई कहानियां हैं। पत्रकारों का संघर्ष प्रेरित करता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे युवाओं को यह भी समझने का अवसर किताब उपलब्ध कराती है कि मीडिया में डटे रहने के लिए कितनी तैयारी लगती है। इस तरह के शीर्षक से कोई सामग्री किताब में नहीं है, यह सब तो अनजाने और अनायस ही पत्रकारों के जीवन को पढ़ते हुए आपको जानने को मिलेगा। 
          यह पुस्तक ऐसे समय में प्रकाशित होकर आई है जबकि मीडिया की चर्चा सब ओर है, नकारात्मक भी और सकारात्मक भी। मीडिया के संबंध में धारणा है कि वह लोकतंत्र में प्रतिपक्ष की भूमिका निभाता है। उसने पिछले कुछ समय से अपनी इस भूमिका के साथ काफी हद तक न्याय किया है। सरकार के घोटालों को उजागर करने के लिए मीडिया की तारीफ हुई है। समाज से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखा गया है। इस सबके बावजूद भी पत्रकारों पर रुपये लेकर खबर छापने-दिखाने के आरोप लग रहे हैं। खबरों को लेकर पक्षपाती होने के आरोप भी मीडिया के माथे आ रहे हैं। 'पैसा फेंको तमाशा देखो' यानी अर्थ के प्रभाव से मीडिया को मैनेज किया जा सकता है, यह भी आम धारणा बना दी गई है। सोशल मीडिया पर परम्परागत मीडिया का 'पोस्टमार्टम' किया जा रहा है। वातावरण ऐसा बना दिया गया है कि सब पत्रकारों को संदिग्ध नजर से देखा जाने लगा है। एक समय में बेहद आदर से देखे जाने वाले पत्रकारों से आज निष्ठुरता से पूछा जा रहा है कि 'ऊपर की कमाई' कितनी हो जाती है? मिशन के जमाने में पत्रकार संदिग्ध नहीं था। उसकी जेब भले ही खाली रहती थी लेकिन समाज का हौसला उसकी कलम को धार देता रहता था। पत्रकारिता आदर्श थी। यह आदर्श आज भी बाकि है। आज भी कई पत्रकार सिद्धांतों की लकीर से इधर-उधर नहीं होते हैं। पत्रकारों की प्रतिष्ठा कुछ कम हो रही है तब पत्रकारों को हीरो की तरह स्थापित करने का काम यह किताब करती है। पत्रकारों के जीवन पर इससे पहले भी कई किताबें आई हैं। उनमें से अधिकतर किताबें एक-एक पत्रकार पर समग्रता से सामग्री प्रस्तुत करती हैं। लेकिन, 'हिन्दी मीडिया के हीरो' की विशेषता है कि यह एक बार में अनेक लोगों के बारे में जानकारी देती है। हम इसे 'बंच ऑफ जर्नलिस्ट प्रोफाइल' यानी पत्रकारों के जीवन का गुलदस्ता भी कह सकते हैं।
           आलोचना की दृष्टि से देखें तो इसमें दूरदराज के कई अच्छे पत्रकारों के नाम शामिल किये जा सकते थे, जो चमक-धमक से दूर खांटी पत्रकारिता कर रहे हैं। इस बात पर भी बहस की गुंजाइश है कि 101 में शामिल कितने पत्रकार आदर्श हैं? यह सूची 101 पत्रकारों की ही क्यों है? कम या ज्यादा क्यों नहीं? हालांकि, इन सबके जवाब संपादक संजय द्विवेदी ने अपनी भूमिका में दिए हैं। फिर भी असहमतियां तो बनी ही रहती हैं। संपादक का कहना है कि किताब में जितने भी पत्रकारों के प्रोफाइल को शामिल किया गया है, मौजूदा वक्त में वे देशभर में हिंदी मीडिया के चेहरे हैं। देश उनके बारे में जानना चाहता है। हीरो शब्द पर विवाद की संभावना अधिक है। इसलिए उन्होंने 'हीरो' शब्द के उपयोग को भी स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि आदर्श अलग चीज है और हीरो अलग। वे मानते हैं कि किताब में आए कई नाम हिन्दी पत्रकारिता के आदर्श नहीं हैं। इसलिए उन्होंने पुस्तक को 'हिंदी मीडिया के हीरो' नाम दिया है, 'हिन्दी पत्रकारिता के आदर्श' नहीं। श्री द्विवेदी लिखते हैं कि हीरो वे हैं जो हिंदी पत्रकारिता के नाम पर जाने-पहचाने जाते हैं। हीरो का मतलब विलेन भी होता है। जैसे डर फिल्म में शाहरुख खान हीरो होते हुए भी विलेन का काम करता है। बहरहाल, इन 101 नामों को चयन करने वाले निर्णायक मंडल में मीडिया के ऐसे दिग्गज शामिल हैं, जिन्होंने बेदाग रहते हुए पत्रकारिता में काफी लम्बा सफर तय किया है।  

पुस्तक : हिन्दी मीडिया के हीरो
संपादक : संजय द्विवेदी
मूल्य : 695 रुपये (साजिल्द)
पृष्ठ          : 227 
प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस
1/11848 पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, 
दिल्ली-110032
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आप कुछ हिंदी मीडिया के हीरो को इस लिंक पर चटका लगाकर पढ़ सकते हैं-

सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

जम्मू-कश्मीर पर कांग्रेस का अलगाववादी सुर

 कांग्रेस  के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने जम्मू-कश्मीर पर भारत विरोधी टिप्पणी करके अपनी पार्टी को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। जम्मू-कश्मीर पर चिदंबरम का बयान अलगाववादियों और पाकिस्तानियों की बयानबाजी की श्रेणी का है। यदि चिदंबरम का नाम छिपा कर किसी से भी यह पूछा जाए कि जम्मू-कश्मीर की आजादी का नारा कौन लगाता है, तब निश्चित ही उत्तर में अलगाववादियों और पाकिस्तानी नेताओं का नाम ही आएंगे। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का नाम भी अनेक लोग ले सकते हैं। कांग्रेस के शीर्ष श्रेणी के नेता पी. चिदंबरम ने बीते शनिवार को कहा था कि जब कश्मीरी कहें आजादी तो समझिए स्वायत्तता। उन्होंने कहा कि 'कश्मीर घाटी में अनुच्छेद 370 का अक्षरश: सम्मान करने की मांग की जाती है। इसका मतलब है कि वो अधिक स्वायत्तता चाहते हैं। चिदंबरम का यह बयान भारतीय हित को नुकसान पहुँचाता है।

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

गौ-हत्यारों एवं तस्करों के विरुद्ध कब मुखर होंगे हम

 गौरक्षा  के नाम पर पिछले समय में हुई कुछ हिंसक घटनाओं पर देश का तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग एवं मीडिया काफी मुखर रहा है। रहना भी चाहिए। संविधान एवं कानून के दायरे से बाहर जाकर गौरक्षा हो भी नहीं सकती। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं भी गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा का विरोध कर चुके हैं। इसके बाद भी कथित बुद्धिजीवी एवं पत्रकारों ने हिंसा की घटनाओं को आधार बना कर गौरक्षा जैसे पुनीत कार्य और सभी गौरक्षकों को लांछित करने का प्रयास किया है। इसके लिए वह असहिष्णुता, मॉबलिंचिंग और नॉटइनमायनेम जैसी मुहिम चला चुके हैं। परंतु, उनकी प्रत्येक मुहिम संदेहास्पद रही है। उनके प्रत्येक आंदोलन का उद्देश्य और एजेंडा भेदभावपूर्ण रहा है, इसलिए उन्हें सफलता नहीं मिली।

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

अयोध्या की दीपावली

 दीपावली  भारत का प्रमुख पर्व है। त्रेता युग में भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन के बाद दीपावली मनाई गई थी। श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर और अत्याचारी रावण का वध कर अयोध्या लौटे थे। समूची अयोध्या उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। कार्तिक अमावस्या के अंधेरे को दूर करने के लिए प्रत्येक अयोध्यावासी ने अपने राजा राम के लिए देहरी-देहरी दीप जलाए थे। अयोध्या जग-मग हो उठी थी। तभी से पूरे देश में दीपावली मनाई जाती रही है। परंतु, दु:ख की बात है कि राम जिस देश की आत्मा हैं, उसी देश में उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है। पहले राम के जन्मस्थल पर बने मंदिर को ध्वस्त कर वहाँ विधर्मियों और आक्रांताओं ने मस्जिद तामीर करा दी थी। अब वहाँ मस्जिद तो नहीं है, परंतु मंदिर भी नहीं है। अपने ही घर में राम तंबू में हैं। सहिष्णु और उदार हिंदू समाज न्याय के मंदिर की ओर अपेक्षा से देख रहा है। उसे न्याय की प्रतीक्षा है। केन्द्र और राज्य में सरकार बदलने से जनमानस में एक भरोसा पैदा हुआ है। सरकार की ओर से भी मंदिर निर्माण पर सकारात्मक संकेत दिए जा रहे हैं। हालाँकि, सभी पहले न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

सेवागाथा डॉट ओआरजी : सेवा के अनुपम और अनुकरणीय प्रयासों का पता

 राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है। वह समाज के उत्थान के लिए कार्यरत है। लगभग 92 वर्षों की यात्रा में संघ ने समाज में व्यापक स्थान बनाया है। आरएसएस के संबंध में अकसर उसके ही कार्यकर्ता कहते हैं कि संघ में आए बिना संघ को समझा नहीं जा सकता। वास्तविकता भी यही है। संघ विरोधियों और संकीर्ण राजनेताओं के कारण संघ की चर्चा राजनीतिक गलियारे में अधिक होती है, जबकि राजनीति से संघ का लेना-देना बहुत अधिक नहीं है। संघ तो समाज के बाकि क्षेत्रों में अधिक सक्रिय है। सेवा का क्षेत्र भी ऐसा ही है। भला कितने सामान्य नागरिक जानते होंगे कि पूरे देश में आरएसएस के स्वयंसेवक एक लाख 70 हजार से अधिक नियमित सेवा कार्य चलाते हैं। यह सब काम संघ बिना किसी प्रचार के करता है। 'प्रसिद्धि परांगमुखता' संघ का सिद्धाँत है। संघ के लिए सेवा उपकार या पुण्यकार्य की भावना से किया जाने वाला कार्य नहीं है, बल्कि यह तो स्वयंसेवकों के लिए 'करणीय कार्य' है। किंतु, समय की आवश्यकता है कि समाज में यह भरोसा पैदा किया जाए कि देश में बहुत से अच्छे लोग हैं, जो रचनात्मक, सकारात्मक और सृजनात्मक कार्यों में संलग्न हैं। देश का वातावरण ऐसा है कि अच्छाई का प्रचार करने की आवश्यकता आन पड़ी है, ताकि अच्छे कार्यों में और लोग जुटें।

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

संघ के प्रति दुष्प्रचार कांग्रेस का एकमात्र ध्येय

कल्पना परुलेकर को मिली सजा से नहीं लिया सबक, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रेमचंद गुड्डू ने आरएसएस को बदनाम करने फेसबुक पर साझा किया फर्जी चित्र
यह फर्जी फोटो है,
असली फोटो लेख के आखिर में देखें
 राजनीति  में अपने विरोधियों को घेरने के लिए झूठ और तथ्यहीन जानकारियों का उपयोग अमर्यादित ढंग से करने की प्रवृत्ति में बढ़ गई है। यह प्रवृत्ति स्वच्छ राजनीति के लिहाज से कतई अच्छी नहीं है। विरोध करना और अपने विरोधी को घेरना अपनी जगह ठीक है, लेकिन इसके लिए झूठ का सहारा लेकर उनकी छवि बिगाड़ना उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने की आवश्यकता है। इस दिशा में राजनेताओं, पार्टियों और संगठनों ने संज्ञान लेना प्रारंभ किया है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2011 में कांग्रेस की तत्कालीन विधायक कल्पना परुलेकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी तस्वीर का उपयोग किया था। पिछले दिनों ही कांग्रेस की पूर्व विधायक कल्पना परुलेकर को फर्जी फोटो के मामले में न्यायालय ने सजा सुनाई है। किंतु लगाता है कि कांग्रेस के नेता अपनी गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि कल्पना परुलेकर को मिली सजा से सबक न लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी फोटो का सहारा लिया है। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को सलामी देते हुए स्वयंसेवकों का फोटो साझा किया है। यह दो फोटो को मर्फ करके बनाया गया फर्जी फोटो है, जो एबीपी न्यूज चैनल के वायरल सच कार्यक्रम में भी झूठा साबित हो चुका है। संघ के इंदौर विभाग के प्रचार प्रमुख सागर चौकसे ने इस मामले में प्रेमचंद गुड्डू और अन्य के विरुद्ध हीरा नगर थाने (इंदौर) में शिकायत दर्ज कराई है। इसके साथ ही इंदौर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक और इंदौर के पुलिस अधीक्षक को त्वरित कार्रवाई के लिए ज्ञापन दिया है। हालाँकि, पुलिस में शिकायत के बाद और अपने झूठ की पोल खुलने पर कांग्रेस के पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने फर्जी फोटो और आपत्तिजनक संदेश अपने फेसबुक पेज से हटा लिया है।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास


विजयादशमी उत्सव के उद्बोधन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि निर्भयतापूर्वक सज्जनशक्ति को आगे आना होगा, समाज को निर्भय, सजग और प्रबुद्ध बनना होगा
 विश्व  के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए विजयादशमी उत्सव का बहुत महत्त्व है। वर्ष 1925 में विजयादशमी के अवसर पर ही संघ की स्थापना स्वतंत्रतासेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। विजयादशमी के अवसर पर होने वाला सरसंघचालक का उद्बोधन देश-दुनिया में भारतवंदना में रत स्वयंसेवकों के लिए पाथेय का काम करता है। इस उद्बोधन से संघ की वर्तमान नीति भी स्पष्ट होती है, इसलिए स्वयंसेवकों के अलावा बाकी अन्य लोग भी सरसंघचालक के उद्बोधन को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। इस दशहरे पर संघ के वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में महत्त्वपूर्ण विषयों पर संघ के दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। अपने इस उद्बोधन में उन्होंने समाज की सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास किया है। समाज में सज्जन लोगों का प्रतिशत और उनकी शक्ति अधिक है, लेकिन महावीर हनुमान की तरह समाज को अपनी सज्जनशक्ति का स्मरण नहीं है। रामकथा में माता सीता की खोज पर निकले हनुमान सहित अन्य वीर जब समुद्र के विस्तार को देखते हैं, तब उनका उत्साह कम हो जाता है। तब जामवन्त ने हनुमान को उनके पराक्रम से परिचित कराया था। जब पराक्रमी हनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण होता है, तब 100 योजन विशाल समुद्र भी उनके मार्ग में बाधा नहीं बन सका। जब समाज की सज्जनशक्ति को अपने बल का परिचय प्राप्त हो जाएगा, तब भारत को विश्वगुरु की खोयी हुई प्रतिष्ठा प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता। 

शनिवार, 23 सितंबर 2017

ममता सरकार के तुष्टीकरण को न्यायालय ने दिखाया आईना

 माननीय  न्यायालय में एक बार फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की नीति का सच सामने आ गया। ममता बनर्जी समाज को धर्म के नाम पर बाँट कर राजनीति करने वाले उन लोगों/दलों में शामिल हैं, जो अपने व्यवहार और राजनीतिक निर्णयों से घोर सांप्रदायिक हैं लेकिन, तब भी तथाकथित 'सेकुलर जमात' की झंडाबरदार हैं। मुहर्रम का जुलूस निकालने के लिए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना, क्या यह सांप्रदायिक निर्णय नहीं था? क्या तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस फैसले मं  तुष्टीकरण और वोटबैंक की बदबू नहीं आती? क्या यह स्पष्टतौर पर दो समुदायों को दुश्मन बनाने वाला फैसला नहीं था? यकीनन उत्तर है- हाँ। न्यायालय में भी यही सिद्ध हुआ है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध के निर्णय के विरुद्ध सुनवाई करते हुए कलकत्ता न्यायालय ने ममता सरकार को जो आईना दिखाया है, उसमें उनकी राजनीति की असल तस्वीर बहुत स्पष्ट नजर आ रही है। न्यायालय ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए एक गंभीर प्रश्न पूछा - 'सौहार्द खतरे में होने की आशंका जता कर क्या सांप्रदायिक विभेद पैदा नहीं किया जा रहा है?' इस प्रश्न का जो उत्तर है, वह सब जानते हैं। सरकार भी जानती है, लेकिन उसका उत्तर देने की ताकत उसमें नहीं है। न्यायालय के मात्र इसी प्रश्न ने ममता सरकार की समूची राजनीति को उधेड़ कर रख दिया।

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नक्सली हिंसा पर खामोशी

 देश  में असहिष्णुता और हिंसा पर आजकल बहुत बहस हो रही है। विशेषकर, जब किसी कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े या विशेष समुदाय के व्यक्ति के साथ हिंसा होती है, तब असहिष्णुता का भूत अचानक से प्रकट होता है। जबकि अन्य हत्याओं पर न हमें असहिष्णुता दिखाई देती है और नहीं किसी प्रकार हमारे माथे पर बल पड़ता है। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार में हिंदू समाज के साथ हो रही ज्यादती भी असहिष्णुता की श्रेणी में नहीं आती है और केरल में एक के बाद एक राष्ट्रीय विचारधारा से संबंद्ध व्यक्तियों की हत्याएं भी हमें विचलित नहीं करती हैं। नक्सली हिंसा पर तो तमाम बुद्धिजीवी गजब की खामोशी साध जाते हैं। अनेक अवसर पर तो प्रसन्नता भी जाहिर करते हैं। नक्सलियों द्वारा 76 जवानों की हत्या के दौरान अपने यह कम्युनिस्टों को जश्न मनाते देखा है। कम्युनिस्ट विचारधारा के नेता, लेखक एवं पत्रकार नक्सलियों की हिंसा का बचाव करते दिखते हैं। जबकि यह खूंखार किस्म के असहिष्णु हैं। कम्युनिस्ट नक्सलियों का बचाव इसलिए करते हैं, क्योंकि वैचारिक रूप से दोनों सहोदर हैं। नक्सलियों की बर्बरता को देखकर इन्हें किसी भी प्रकार आतंकवादियों से कमतर नहीं माना जा सकता। बीते रविवार झारखंड के गुमला में पति-पत्नी को गोलियों से भूनकर इस बात को सिद्ध कर दिया है।

रोहिंग्या मुद्दे पर सरकार का पक्ष राष्ट्रहित में

कश्मीरी पंडितों को उनकी भूमि और न्याय दिलाये बिना, रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए सरकार पर दबाव बनाना, अपने लोगों के साथ बेईमानी है. ये लोग वर्षों से तम्बू में सो रहे हैं, पहले इनके लिए आवाज़ बुलंद करो.
 यह  सुखद है कि राष्ट्रहित में वर्तमान सरकार कठोर कदम उठाने में हिचकिचाती नहीं है। पूर्ववर्ती सरकारें प्रत्येक मामले को पहले वोट की तराजू पर तोलती थीं और उस वजन के आधार पर निर्णय करती थीं। जबकि वर्तमान सरकार ने अनेक अवसरों पर अपने निर्णयों से बताया है कि उसके लिए राष्ट्रहित सबसे पहले है। रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर भी सरकार ने अनेक प्रकार की आलोचनाओं की चिंता न करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपना स्पष्ट पक्ष रखा है। केंद्र सरकार ने बीते सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय से रोहिंग्या मुद्दे पर हस्तक्षेप न करने का आग्रह करते हुए कहा कि उन्हें प्रत्यर्पित करने का निर्णय सरकार का नीतिगत फैसला है। केंद्र सरकार ने बिना लाग-लपेट के कह दिया है कि उनमें से कुछ का संबंध पाकिस्तानी आतंकवादी गुटों से है। 
          शीर्ष न्यायालय रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने जब इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष जानना चाहा, तब केंद्र सरकार ने अपना उक्त पक्ष रखा और कहा कि यह देश हित में लिया गया एक 'आवश्यक कार्यकारी' फैसला है। केंद्र सरकार का कहना गलत नहीं है कि कई रोहिंग्या मुसलमानों का संबंध आतंकवादी समूहों से है। ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं। घोर शांतिप्रिय बौद्ध बाहुल्य देश म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय को लेकर जिस प्रकार का वातावरण बना है, वह भी इस ओर इशारा करता है। शरणार्थियों को आश्रय नहीं देने और संप्रग सरकार के समय में आ चुके रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजने के सरकार के निर्णय की आलोचना करने से पहले हमें यह विचार जरूर करना चाहिए कि आखिर वह कौन-से कारण हैं कि इस्लामिक देश भी रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए तैयार नहीं है।

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