मंगलवार, 24 जनवरी 2017

केरल में जंगलराज

 केरल  में बढ़ती हिंसा इस बात का सबूत है कि वामपंथ से बढ़कर हिंसक विचार दूसरा कोई और नहीं है। वामपंथी विचार घोर असहिष्णु है। असहिष्णुता इस कदर है कि वामपंथ को दूसरे विचार स्वीकार्य नहीं है, अपितु उसे अन्य विचारों का जीवत रहना भी बर्दाश्त नहीं है। इस विचारधारा के शीर्ष विचारकों ने अपने जीवनकाल में हजारों-लाखों निर्दोष लोगों का खून बहाकर उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। जिस वामपंथी नेता ने विरोधियों का जितना रक्त बहाया, उसे उतना ही अधिक महत्त्व दिया गया है। दरअसल, वामपंथी विचारधारा के मूल में हिंसा है, जिसका प्रकटीकरण वामपंथ को मानने वालों के व्यवहार में होता है। तानाशाह प्रवृत्ति की इस विचारधारा ने भारत में मजबूरी में लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया है। यही कारण है कि लोकतांत्रिक मूल्यों में इनकी आस्था दिखाई नहीं देती है। भारत के जिस हिस्से में यह विचार ताकत में आया, वहाँ हिंसा और तानाशाही का नंगा नाच खेला। केरल के वर्तमान हालात इस बात के गवाह हैं। 
          केरल में वामपंथी विचारधारा से शिक्षित कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता और नेता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी से संबंध रखने वाले निर्दोष लोगों को अपनी हिंसा का शिकार बना रहे हैं। राष्ट्रवादी विचार के प्रति आस्था रखने वाले परिवारों और व्यक्तियों को बेरहमी से मौत के घाट उतारा जा रहा है। यहाँ तक कि मासूम बच्चों और महिलाओं के प्रति भी कम्युनिस्ट पार्टी के लोग राक्षसों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। कोझीकोड की घटना किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की आत्मा को रुला दे। दिसंबर में राष्ट्रवादी विचार से संबंध रखने वाले एक समूचे परिवार को आग के हवाले कर दिया। उस परिवार को घर में बंद करके बाहर से आग लगा दी। इस हादसे में भाजपा की मंडल कार्यकारिणी के सदस्य 44 वर्षीय चादयांकलायिल राधाकृष्णन, उनके भाई और भाभी की मौत हो गई। इससे पूर्व केरल में ही एक परिवार कार से कहीं जा रहा था। वह परिवार भी संघ का स्वयंसेवक परिवार था। उनकी गाड़ी को वामपंथी विचार के लोगों ने रोका और उनके दस महीने के बच्चे को पैरों से पकड़ कर गाड़ी से खिंचा और सड़क पर फेंक दिया। 
          वामपंथी विचारधारा के कार्यकर्ताओं की इस पशुता पर देश का राष्ट्रीय मीडिया खामोश है, क्यों? असहिष्णुता का बवंडर खड़ा करने वाले तथाकथित प्रगतिशील भी चुप्पी साध कर बैठे हुए हैं? क्या यह हत्याएं सहिष्णुता की श्रेणी में आती हैं? क्या इन घटनाओं का विरोध नहीं किया जाना चाहिए? क्या इन घटनाओं पर इसलिए चुप्पी साधकर रखी गई है, क्योंकि इन घटनाओं में कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों की संलिप्तता है? केरल में आए जंगलराज पर यह खामोशी बताती है कि इस देश का बौद्धिक धड़ा दोगला है। इस बुधवार को कन्नूर में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता मुल्लाप्रम एजुथान संतोष की हत्या सीपीआई-एम के कार्यकर्ताओं ने उस वक्त कर दी जब वह रात में अपने घर में अकेले थे। भाजपा ने इस घटना के खिलाफ रोष व्यक्त किया है। बुद्ध और गांधी के देश इस वैचारिक हिंसा पर राष्ट्रीय मीडिया और बुद्धिजीवियों की खामोशी न केवल चिंताजनक है, बल्कि निंदनीय भी है। इन घटनाओं के लिए केरल की कम्युनिस्ट सरकार से केंद्र सरकार को जवाब तलब करना चाहिए।

सोमवार, 23 जनवरी 2017

सीमारेखा लांघते केजरीवाल

 देश  में रचनात्मक राजनीति का दावा करने वाले आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल निरंतर अमर्यादित राजनीति के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका राजनीतिक आचरण किसी भी प्रकार रचनात्मक और सकारात्मक दिखाई नहीं देता है। यह कहना अधिक उचित ही होगा कि कई अवसर पर उनका आचरण निंदनीय ही नहीं, अपितु आपत्तिजनक भी होता है। यह भी स्थापित हो चुका है कि केजरीवाल की राजनीति आरोपों से शुरू होकर आरोपों पर ही खत्म होती है। आरोप दागने की अपनी तोप के निशाने पर वह किसी को भी ले सकते हैं, क्योंकि उन्हें यह भी गुमान है कि समूची भारतीय राजनीति में उनके अलावा कोई दूसरा नेता ईमानदार नहीं है। यहाँ तक कि वह संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ भी मुँह खोलने से पहले विचार नहीं करते हैं। चुनाव आयोग की फटकार से सबक सीखने की बजाय आयोग को ही न्यायालय में चुनौती देने का दंभ उनके इसी आचरण की बानगी है।

सोमवार, 16 जनवरी 2017

तस्वीर की जगह गांधी विचार पर बहस होनी चाहिए

 कैलेंडर  और डायरी पर महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर से उत्पन्न विवाद बेवजह है। यह इसलिए, क्योंकि भारत में इस बात की कल्पना ही नहीं की जा सकती है कि किसी कागज के टुकड़े पर चित्र प्रकाशित नहीं होने से गांधीजी के व्यक्तित्व पर पर्दा पड़ जाएगा। यह तर्क तो हास्यास्पद ही है कि गांधीजी के चित्र की जगह प्रधानमंत्री का चित्र इसलिए प्रकाशित किया गया है, ताकि गांधी की जगह मोदी ले सकें। गांधीजी की जगह वास्तव में कोई नहीं ले सकता। आश्चर्य की बात यह है कि गांधीजी के चित्र को लेकर सबसे अधिक चिंता उन लोगों को हो रही है, जिन्होंने 70 साल में गांधीजी के विचार को पूरी तरह से दरकिनार करके रखा हुआ था। सिर्फ राजनीति की दुकान चलाने के लिए ही यह लोग गांधी नाम की माला जपते रहे हैं। वास्तव में आज जरूरत इस बात की है कि गांधीजी के विचार पर बात की जाए। इस बहस में इस पहलू को भी शामिल किया जाए कि आखिर इस देश में गांधीजी के विचार को दरकिनार करने में किसकी भूमिका रही है? आखिर अपने ही देश में गांधीजी कैलेंडर, डायरी, नोट और दीवार पर टंगे चित्रों तक ही सीमित क्यों रह गए? उनके विचार को व्यवहार में लाने की सबसे पहले जिम्मेदारी किसके हिस्से में आई थी और उन्होंने क्या किया?

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

सांप्रदायिक निर्णय के बाद भी कांग्रेस सेक्युलर!

 जुमे  की नमाज के लिए मुस्लिम कर्मचारियों को 90 मिनट का अवकाश देकर उत्तराखंड सरकार ने सिद्ध कर दिया है कि कांग्रेस ने सेक्युलरिज्म का लबादा भर ओढ़ रखा है, असल में उससे बढ़ा सांप्रदायिक दल कोई और नहीं है। कांग्रेस के साथ-साथ उन तमाम बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों के सेक्युलरिज्म की पोलपट्टी भी खुल गई है, जो भारतीय जनता पार्टी या किसी हिंदूवादी संगठन के किसी नेता की 'कोरी बयानबाजी' से आहत होकर 'भारत में सेक्युलरिज्म पर खतरे' का ढोल पीटने लगते हैं, लेकिन यहाँ राज्य सरकार के निर्णय पर अजीब खामोशी पसरी हुई है। उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के घोर सांप्रदायिक निर्णय के खिलाफ तथाकथित प्रगतिशील और बुद्धिजीवी समूहों से कोई आपत्ति नहीं आई है। सोचिए, यदि किसी भाजपा शासित राज्य में निर्णय हुआ होता कि सोमवार को भगवान शिव पर जल चढ़ाने के लिए हिंदू कर्मचारियों-अधिकारियों को 90 मिनट का अवकाश दिया जाएगा, तब देश में किस प्रकार का वातावरण बनाया जाता? सेक्युलरिज्म के नाम पर यह दोगलापन पहली बार उजागर नहीं हुआ है। यह विडम्बना है कि वर्षों से इस देश में वोटबैंक की राजनीति के कारण समाज को बाँटने का काम कांग्रेस और उसके प्रगतिशील साथियों ने किया है, लेकिन सांप्रदायिक दल होने की बदनामी समान नागरिक संहिता की माँग करने वाली भारतीय जनता पार्टी के खाते में जबरन डाल दी गई है।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

जनप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज के 11 वर्ष

 मध्यप्रदेश  के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के यशस्वी कार्यकाल को 29 नवम्बर को 11 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। निश्चित ही उनकी यह यात्रा आगे भी जारी रहेगी। इंदौर में आयोजित 5वीं ग्लोबल इन्वेस्टर समिट-2016 के समापन समारोह में उन्होंने कहा भी है कि अगली इन्वेस्टर समिट 2019 में उनकी ही सरकार कराएगी। मुख्यमंत्री के इस बयान को कुछ लोग उनका आत्मविश्वास कह सकते हैं और कुछ लोग अति विश्वास भी कहने से नहीं चूकेंगे। वास्तव में यह जनता का भरोसा है, जिसके आधार पर शिवराज यह कह गए। अपनी इस यात्रा में शिवराज बड़ों को आदर देकर, छोटों को स्नेह देकर और समकक्षों को साथ लेकर लगातार आगे बढ़ रहे हैं। यह उनके नेतृत्व की कुशलता है। उनका व्यक्तित्व इतना सहज है कि जो भी उनके नजदीक आता है, उनका मुरीद हो जाता है। शिवराज के राजनीतिक विरोधी भी निजी जीवन में उनके व्यवहार के प्रशंसक हैं। सहजता, सरलता, सौम्यता और विनम्रता उनके व्यवहार की खासियत है। उनके यह गुण उन्हें राजनेता होकर भी राजनेता नहीं होने देते हैं। वह मुख्यमंत्री हैं, लेकिन जनता के मुख्यमंत्री हैं। 'जनता का मुख्यमंत्री' होना उनको औरों से अलग करता है। प्रदेश में पहली बार शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री निवास के द्वार समाज के लिए खोले। वह प्रदेश में गाँव-गाँव ही नहीं घूमे, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को मुख्यमंत्री निवास पर बुलाकर भी उनको सुना और समझा। अपने इस स्वभाव के कारण शिवराज सिंह चौहान 'जनप्रिय' हो गए हैं। मध्यप्रदेश में उनके मुकाबले लोकप्रियता किसी मुख्यमंत्री ने अर्जित नहीं की है।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

नर्मदा संरक्षण का बड़ा प्रयास

 मध्यप्रदेश  के मुध्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार ने नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने का संकल्प लिया है। यह शुभ संकल्प है। मध्यप्रदेश के प्रत्येक नागरिक को प्रार्थना करनी चाहिए कि मुख्यमंत्री का यह संकल्प पूरा हो, बल्कि उचित होगा कि अधिक से अधिक नागरिक इस संकल्प की पूर्ति में अपना योगदान दें। क्योंकि नर्मदा नदी प्रदेश की जीवनरेखा है। यह प्रदेश को आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न बना रही है। यह पेयजल, सिंचाई और बिजली देती है। वृक्षों के कटने और प्रदूषण से नर्मदा के जलप्रवाह पर प्रभाव हुआ है। इसलिए समय की आवश्यकता है कि नर्मदा नदी को प्रदूषण से मुक्त किया जाए। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की संवेदनशीलता है कि उन्होंने इस संबंध में 'नमामि देवी नर्मदे' यात्रा जैसा महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है। अपने कार्यकाल के 11 साल पूरे होने पर उन्होंने इस यात्रा की घोषणा करते हुए कहा था कि वे नर्मदा की गोदी में पले-बढ़े हैं। यह यात्रा माँ नर्मदा का कर्ज उतारने का प्रयास है। हालाँकि, किसी सरकार और एक मुख्यमंत्री के बूते नर्मदा को प्रदूषण मुक्त बनाना संभव नहीं है। हाँ, यह सुखद और सकारात्मक है कि सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस कार्य के लिए आगे आए हैं। हम सब मध्यप्रदेश के निवासी भी आगे आएं और इस अभियान की सफलता सुनिश्चित करें, क्योंकि नर्मदा का जितना कर्ज मुख्यमंत्री पर है, उतना ही हम सब लोगों पर भी है। इस ऋण से उऋण होना संभव नहीं, लेकिन कुछ लौटाने का प्रयास तो करना ही चाहिए।

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

राष्ट्रगान का सम्मान

 देश  के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रगान के सम्मान में सराहनीय निर्णय सुनाया है। कुछ समय पहले जब इस तरह के मामले सामने आए कि सिनेमाघर या अन्य जगह राष्ट्रगान बजाया गया तब कुछेक लोग उसके सम्मान में खड़े नहीं हुए। इस संबंध में उनका कहना था कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि जब राष्ट्रगान हो रहा हो, तब खड़े होना अनिवार्य है। इसी बीच सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य करने की माँग ने भी जोर पकड़ा। इस माँग के बाद देशभर में राष्ट्रगान के सम्मान और अपमान की बहस ने जन्म लिया था। इस बहस में आ रहे तर्क-कुतर्कों पर उच्चतम न्यायालय ने विराम लगा दिया है। न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा है कि सिनेमाघरों में फिल्मों का प्रदर्शन शुरू होने से पहले राष्ट्रगान अवश्य बजाया जाना चाहिए। साथ ही परदे पर राष्ट्रध्वज की तस्वीर भी दिखाई जानी चाहिए। जिस वक्त राष्ट्रगीत बज रहा हो, वहां उपस्थित लोगों को उसके सम्मान में खड़े रहना जरूरी है। इसके अलावा राष्ट्रगान का किसी भी रूप में व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। इसकी धुन को बदल कर गाने या फिर इसे नाटकीय प्रयोजन के लिए उपयोग नहीं होना चाहिए।

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोटबंदी : नरेन्द्र मोदी का वाजिब सवाल

 प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने आगरा में परिवर्तन रैली को जिस अंदाज में संबोधित किया है, उसे दो तरह से देखा जा सकता है। एक, उन्होंने विपक्ष पर करारा हमला बोला है। दो, नोटबंदी पर सरकार और प्रधानमंत्री को घेरने के लिए हाथ-पैर मार रहे विपक्ष से प्रधानमंत्री ने सख्त सवाल पूछ लिया है। ऐसा सवाल जिसका सीधा उत्तर विपक्ष दे नहीं सकता। नोटबंदी का विरोध कर रहे नेताओं की ओर प्रधानमंत्री मोदी ने नागफनी-सा सवाल उछाल दिया है, जो निश्चित तौर पर उन्हें लहूलुहान करेगा। उन्होंने पूछ लिया कि यह कदम कालेधन वालों के खिलाफ उठाया गया है, फिर आपको परेशानी क्यों हो रही है? यकीनन प्रधानमंत्री का यह सवाल वाजिब है, क्योंकि परेशानी उठा रही आम जनता को भी यह समझ नहीं आ रहा है कि विपक्ष ने आखिर हाय-तौबा किस बात के लिए मचा रखी है? क्या विपक्ष नहीं चाहता कि कालेधन के खिलाफ कार्रवाई हो? क्या विपक्ष नहीं चाहता कि जाली मुद्रा को खत्म किया जाए? आखिर विपक्ष की मंशा क्या है? वह क्यों चाहता है कि नोटबंदी का निर्णय वापस लिया जाए और फिर से 500 और 1000 के पुराने नोट चलन में आएं? प्रधानमंत्री के तर्कसंगत सवाल से विपक्ष कठघरे में खड़े किसी अपराधी से कम नजर नहीं आ रहा है।

रविवार, 20 नवंबर 2016

नोटबंदी पर एक से बढ़कर एक कुतर्क

 कालेधन  के विरुद्ध लड़ाई में नोटबंदी के निर्णय पर प्रतिपक्ष के नेता एक से बढ़कर एक कुतर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। उनके कुतर्क यह भी साबित कर रहे हैं कि वह जमीन से जुड़े नेता नहीं हैं। उन्हें भारतीय जन के मानस की बिल्कुल भी समझ नहीं है। विपक्षी नेताओं के बयानों को सुनकर यह समझना मुश्किल हो रहा है कि वह आम जनता के शुभचिंतक हैं या फिल कालेधन वालों के? उनकी बौखलाहट देखकर संदेह यह भी है कि उनके पास भी कालेधन का भंडार है। वरना क्या कारण है कि नोटबंदी की वापसी के लिए चेतावनी जारी की जा रही हैं? साफ नजर आ रहा है कि विपक्षी नेता आम जनता की परेशानी की आड़ में अपने कालेधन की चिंता कर रहे हैं? तथाकथित पढ़े-लिखे नेता चौराहों की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं। कुतर्क देखिए कि पाँच सौ और दो हजार रुपये का नया नोट चूरन की पुडिय़ा में निकलने वाले नकली नोट जैसा है। आश्चर्य है इनकी समझ पर।

शनिवार, 19 नवंबर 2016

दुर्भाग्य है नायसमंद की घटना

 नये  दौर में छूआछूत और भेदभाव की घटना किसी भी समाज के लिए कलंक से कम नहीं हैं। यह समूची मनुष्य जाति का दुर्भाग्य है कि समाज में कुछ लोग, कुछ लोगों को अपने से कमतर मानते हैं। उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं। किसी मनुष्य के खेत में पैर रखने से क्या सफल सूख सकती है? क्या उसके छूने से पवित्रता समाप्त हो सकती है? यदि इसका प्रश्न हाँ है तब समूची धरती तथाकथित सवर्णों के लिए रहने लायक नहीं है। समूची धरती एक है और उसका स्पर्श हजारों हजार तथाकथित निम्न जाति के लोग करते हैं। उस भूमि को वह अपनी माता मानते हैं। यह अधिकार और ज्ञान तथाकथित सवर्ण समाज को किसने दिया कि एक वर्ग विशेष नजरें उठाकर नहीं चल सकता, उनकी औरतें-बेटियाँ सज-धज नहीं सकतीं, उन्हें होटल या धर्मशाला में पानी चुल्लू में लेकर पीना चाहिए?

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