गुरुवार, 24 मई 2018

चर्च की राजनीति-2

भारतीय राजनीति में चर्च का अनुचित हस्तक्षेप
राष्ट्रवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र पर चर्च का हमला
 यह  विचार करने की बात है कि चर्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की सरकार से क्या दिक्कत हो रही है कि पादरियों ने सियासी पत्राचार प्रारंभ कर दिया है। ईसाई संप्रदाय में प्रमुख स्थान रखने वाले आर्कबिशप (प्रधान पादरी) भाजपा सरकार के विरुद्ध खुलकर दुष्प्रचार कर रहे हैं। सबसे पहले गुजरात चुनाव में आर्कबिशप थॉमस मैकवान ने चिट्ठी लिखकर ईसाई समुदाय के लोगों से अपील की है कि वे गुजरात चुनाव में 'राष्ट्रवादी ताकतों' को हराने के लिए मतदान करें। इसके बाद मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा में भी भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए चर्च सक्रिय हुआ। कर्नाटक भी चर्च की राजनीति से अछूता नहीं रहा। अब दिल्ली के आर्कबिशप अनिल काउटो ने अन्य पादरियों को पत्र लिखकर अपील की है- ‘हम एक अशांत राजनैतिक वातावरण देख रहे हैं जो हमारे संविधान में निहित लोकतांत्रिक सिद्धांतों तथा हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के लिए खतरा है। देश तथा राजनेताओं के लिए हमेशा प्रार्थना करना हमारी प्रतिष्ठित परंपरा है, लेकिन आम चुनाव की ओर बढ़ते हुए यह और भी ज़रूरी हो जाता है। अब जब हम 2019 की ओर देखते हैं, जब हमारे पास नई सरकार होगी, तो आइए हम देश के लिए 13 मई से शुरू करते हैं एक प्रार्थना अभियान…’ 
आर्कबिशप अनिल काउटो का पत्र
          आर्कबिशप के इस पत्र पर राजनीति प्रारंभ हो गई है, जो कि स्वाभाविक ही है। जब खुलकर चर्च सियासत करेगा, तो राजनीतिक चर्चा तो होनी ही है। किंतु, आश्चर्य की बात यह है कि पादरी की चिट्ठी पर वह लोग बचाव की मुद्रा में खड़े हैं, जो धर्म को राजनीति से दूर रखने की वकालत करते हैं। कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने चर्च की सियासत पर एकदम से मुँह सिल लिया है। उनमें से कुछ बोल भी रहे हैं, तो चर्च के समर्थन में। वह इस चिट्ठी को सामान्य बता रहे हैं। जबकि आर्कबिशप की यह चिट्ठी सीधेतौर पर सियासत में धार्मिक हस्तक्षेप को प्रोत्साहित कर रही है। सोचिए, यदि ऐसी ही कोई चिट्ठी किसी हिंदू धर्म के प्रमुख ने लिख दी होती, तब कैसा हंगामा खड़ा होता? जो लोग आज चर्च की राजनीति को आड़ दे रहे हैं, वही हिंदू धर्म की धज्जियां उड़ा रहे होते। हिंदू धर्म पर टीका-टिप्पणी करने के लिए वह सदैव अवसर की ताक में बैठे रहते हैं। किंतु, जैसे ही बात दूसरे धर्म की आती है, सेक्युलर जमात मुँह में दही जमा कर बैठ जाती है। बात ईसाइयत और चर्च की निंदा करने की नहीं है, बल्कि राजनीति में इस प्रकार के सीधे हस्तक्षेप को रोकने की है। 
चर्च की पीड़ा का कारण क्या :
आर्कबिशप अनिल काउटो ने अपने पत्र में भारत की राजनीतिक स्थिति को अशांत बताया है। काउटो ने लिखा है कि मौजूदा अशांत राजनीतिक माहौल संविधान में निहित हमारे लोकतांत्रित सिद्धांतों और हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने के लिए खतरा बन गया है। काउटो के पत्र की यह भाषा सीधे तौर पर वर्तमान भारत सरकार, भारतीय पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र पर हमला है। आखिर पंथनिरपेक्ष तानेबाने पर कौन-सा खतरा आ गया है? भाजपा सरकार के आने के बाद से माना जा रहा है कि धर्मांतरण की प्रक्रिया में चर्च को बाधा आ रही है। भारत के वनवासी क्षेत्रों में रहने वाले भोले-भाले हिंदुओं का धर्मांतरण अब चर्च के लिए कठिन हो रहा है। क्या इसलिए चर्च को पीड़ा हो रही है? 
पादरी के पीछे कौन, पोप या राजनीतिक दल :
प्रश्न यह भी है कि आर्कबिशप 2019 में 'नई सरकार' लाने के लिए प्रार्थना और उपवास किसने कहने पर प्रारंभ कर रहे हैं? क्या इसके पीछे राजनीतिक ताकतों का हाथ है या वेटिकन सिटी का हस्तक्षेप। भारत में इन बिशपों की नियुक्ति सीधे पोप करते हैं। यह बिशप पोप के प्रति जवाबदेह होते हैं। इसलिए माना जा सकता है कि पोप के कहने पर भारत के आर्कबिशपों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रवादी ताकतों को हराने की योजना पर काम करना प्रारंभ किया है। अब इसमें भी विचार करने की दो प्रमुख प्रश्न मन में आते हैं। पोप की क्या रुचि है? पोप यानी चर्च, क्यों राष्ट्रवादी ताकतों को हरा कर अपने मनमुताबिक नई सरकार लाना चाहता है? एक, क्या मतांतरण भर पोप की चिंता है? दो, क्या चर्च भारत के राजनीतिक दलों के आग्रह पर ईसाई वोट का ध्रुवीकरण कर रहा है? 
“हिन्दुओं को बाँटो और राज करो” की साजिश उजागर :
सोनिया गाँधी को लिखा डॉ. एमबी पाटिल का पत्र
देश का एक प्रमुख राजनीतिक दल है, जिसके मुखिया के तार चर्च से जुड़ते हैं। यह आशंका इसलिए है क्योंकि आर्कबिशप की यह चिट्ठी ऐसे समय में आई है, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को रोकने के लिए अनेक प्रकार के प्रयास चल रहे हैं। भाजपा विरोधी राजनेता यह जानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के विजयी रथ को थामने के लिए हिंदू मत को विभाजित करना और बाकी के संप्रदायों के मत का ध्रुवीकरण करना आवश्यक है। कर्नाटक चुनाव के दौरान कांग्रेस सरकार के मंत्री डॉ. एमबी पाटिल का एक पत्र मीडिया के माध्यम से सामने आया। यह पत्र उन्होंने जुलाई, 2017 में कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखा गया था। पत्र में डॉ. पाटिल ने स्पष्ट लिख है कि भाजपा को हराना है तो 'हिंदुओं को तोडऩा होगा।' साथ ही, ईसाइयों और मुसलमानों को धार्मिक भावनाओं के आधार पर एकजुट करना होगा। उन्होंने सोनिया गांधी को लिखा है कि हिंदुओं को बाँटने और ईसाई-मुस्लिम को अपने पक्ष में करने का प्रयास उन्होंने प्रारंभ कर दिया है। इसमें कर्नाटक कांग्रेस ने 'ग्लोबल क्रिश्चियन कॉउंसिल' और 'वर्ल्ड इस्लामिक आर्गेनाईजेशन' से मदद ली है। पाटिल ने लिखा है कि हिंदुओं को जाति (पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजाति) और धर्म में बाँट कर उसे कमजोर किया जा सकता है। कर्नाटक चुनाव में देश ने देखा भी कि किस प्रकार कांग्रेस ने हिंदुओं को जाति और धर्म (लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की मान्यता) के आधार पर बाँट कर कमजोर करने का प्रयास किया। 'बाँटो ओर राज करो' की नीति का लाभ भी कांग्रेस को मिला है। संभव है कि चर्च की मदद से वह अपनी आगे की राह को सुगम करना चाहती है। 
पादरी की चिट्ठी से सामने आई चर्च की नीयत :
जो भी हो, अब जब चर्च खुलकर राजनीति के मैदान में उतर आया है, तब देखना होगा कि हिंदू समाज क्या विचार करता है? मतदान के संदर्भ में उसकी विचार प्रक्रिया पर पादरी की 'चिट्ठी सियासत' का क्या असर होगा? बहरहाल, चुनाव आयोग और समाज के प्रबुद्ध वर्ग को भारतीय लोकतंत्र में चर्च के अनुचित हस्तक्षेप और उसकी राजनीतिक गतिविधि पर संज्ञान लेना चाहिए। यह भारतीय संविधान और न्यायालय की भी अवमानना है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि कोई भी धार्मिक नेता अपने समुदाय के लोगों को किसी उम्मीदवार या पार्टी के समर्थन या विरोध में मतदान करने के लिए नहीं कह सकता। किंतु, यहाँ चर्च का आचरण भारत के संविधान के विरुद्ध है। यहाँ पादरी की चिट्ठी से चर्च की नीयत भी उजागर हुई है।
गुजरात चुनाव के दौरान 'राष्ट्रवादी ताकतों' को हराने के लिए लिखी गई गांधीनगर के आर्चबिशप (प्रधान पादरी) थॉमस मैकवान की चिट्ठी

मंगलवार, 22 मई 2018

सरकार और जनता के साझे प्रयास से स्वच्छता में सिरमौर बनता मध्यप्रदेश

 मध्यप्रदेश  की औद्योगिक राजधानी इंदौर और प्रशासनिक राजधानी भोपाल ने स्वच्छता सर्वेक्षण में क्रमश: प्रथम और द्वितीय स्थान प्राप्त कर एक सकारात्मक और अनुकरणीय संदेश दिया है। यह लगातार दूसरा वर्ष है जब सबसे साफ शहरों की सूची में इंदौर और भोपाल सबसे ऊपर हैं। पिछले वर्ष भी इंदौर पहले स्थान पर था और भोपाल दूसरे स्थान पर। दोनों शहरों ने अपना स्थान बरकरार रखा है। हमें याद करना होगा कि इससे पहले दोनों शहर स्वच्छता सर्वेक्षण की सूची के अंतिम हिस्से में थे। किंतु, बाद में जनता ने संकल्प लेकर स्वच्छता को अपनी आदत बना लिया। प्रशासन ने भी आवश्यक व्यवस्था उपलब्ध कराने में सक्रियता और गंभीरता से कार्य किया। परिणाम हमारे सामने हैं, मध्यप्रदेश के दो बड़े शहर स्वच्छ शहरों की सूची में शीर्ष पर सुशोभित हैं। यह सब संभव हुआ सरकार और जनता के साझे प्रयास से। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान ने स्वच्छता के मामले में भारत की तस्वीर बदल दी है। 'स्वच्छ भारत अभियान' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशेष उपलब्धि में गिना जाएगा। 
          यह बात सदैव ध्यान में रखने की है कि सरकार अकेले किसी कार्य को स्थायित्व नहीं दे सकती है। वांछित परिणाम भी तब तक प्राप्त नहीं हो सकता, जब तक कि समाज की सक्रिय सहभागिता न हो। समाज और सरकार दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जब दोनों एक लक्ष्य के लिए ईमानदारी से जुटते हैं तो सकारात्मक परिवर्तन आता ही है। भोपाल और इंदौर, दोनों शहर जनसंख्या की दृष्टि से मध्यप्रदेश के बड़े शहर हैं। ऐसा माना जाता रहा कि अत्यधिक जनसंख्या के कारण स्वच्छता रख पाना आसान नहीं होता है। परंतु, इंदौर एवं भोपाल की जनता और प्रशासन ने इस धारणा को खंडित किया है। इंदौर और भोपाल की जनता ने यह संदेश दिया है कि यदि सब ठान लें कि हम यहाँ-वहाँ कचरा नहीं फेंकेंगे, यथासंभव गंदगी को दूर करेंगे, स्वच्छता में पूर्ण सहयोग देंगे, तब जनसंख्या या दूसरी बातें लक्ष्य के आड़े नहीं आती हैं। 
          यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि जनता और सरकार के ईमानदार प्रयासों से आज स्वच्छता के मामले में मध्यप्रदेश सिरमौर बन गया है। यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है। इंदौर और भोपाल की पुरानी तस्वीर और आज की तस्वीर देख कर यह परिवर्तन स्पष्टतौर पर देखा जा सकता है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट कर इसका श्रेय आमजन को दिया है। यह सही भी है। जैसा कि ऊपर भी कहा  कि जनता के सहयोग के बिना सरकार इस प्रकार के सामाजिक लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकती। इसका दूसरा अर्थ यह भी हुआ कि मध्यप्रदेश की जनता अच्छे कार्यों-प्रयासों में शिवराज सरकार के साथ खड़ी है। एक संदेश यह भी कि मध्यप्रदेश सरकार लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'विजन' को धरातल पर उतारने में सबसे आगे है। ग्राम विकास से लेकर डिजिटल इंडिया और स्वच्छ भारत अभियान में मध्यप्रदेश में सराहनीय कार्य हुआ है। 
           प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक आवश्यक और महत्वपूर्ण 'स्वच्छ भारत अभियान' प्रारंभ से ही अपने हाथ में ले लिया था। उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान को केवल नारों तक सीमित नहीं रखा और न ही उसे सरकारी अभियान होने दिया। प्रधानमंत्री जानते हैं कि यह जनांदोलन में तब्दील होगा, तब ही भारत की तस्वीर स्वच्छ नजर आएगी। इसलिए उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान को जनता का आंदोलन बना दिया। प्रधानमंत्री के आग्रह को स्वीकार कर देश की जनता ने स्वच्छ भारत अभियान को अपना अभियान बना लिया। स्वच्छता को लेकर देश में एक अलग प्रकार का दृष्टिकोण और आग्रह देखने में आया है। यह सुखद है। इसी का परिणाम है कि पहले स्वच्छता सर्वेक्षण में पीछे रहने वाले मध्यप्रदेश के शहर अब आगे आ रहे हैं।

सोमवार, 21 मई 2018

जरा सोचिए, लोकतंत्र जीता, या फिर हारा

 कर्नाटक  के राजनीतिक 'नाटक' का फिलहाल पटाक्षेप हो चुका है। हालाँकि, चुनाव परिणाम बाद मजबूरी और भाजपा विरोध में जिस प्रकार का गठबंधन हुआ है, उसके कारण निकट भविष्य में भी 'उठा-पटक' की आशंका बनी हुई है। भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस ने उस पार्टी (जनता दल सेक्युलर) को समर्थन दिया है, जिस पर चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी 'जनता दल (संघ)' कह कर हमला किया था। संघ के प्रति राहुल गांधी का दुराग्रह जगजाहिर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति वह यहाँ तक द्वेष से भरे हुए हैं कि संघ की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए अनर्गल और झूठ बोलने में भी संकोच नहीं करते हैं। 
          विधानसभा में शनिवार को बहुमत परीक्षण से पहले ही मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने त्याग-पत्र दे दिया। कर्नाटक में सबसे अधिक सीट और बहुमत से महज आठ सीट कम जीतने वाली भाजपा अपना बहुमत सिद्ध नहीं कर पाई। ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषक, तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी और कांग्रेस समर्थक, यहाँ तक कि मीडिया का एक वर्ग भी इस घटना को 'लोकतंत्र की जीत' बता रहा है। पिछले कुछ समय से संवैधानिक संस्थाओं, चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर हमलावर यही वर्ग यह भी कह रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भाजपा को मनमर्जी करने से रोक दिया। इसका अर्थ यही है कि निर्णय या परिस्थितियां इनके पक्ष में रहें तो संवैधानिक संस्थाएं जीवित और निष्पक्ष हैं, वरना तो मोदी-शाह ने सबको खरीद लिया है। यह व्यवहार दुर्भाग्यपूर्ण है। मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू। 
          अब जरा ठहरकर सोचिए, क्या वाकई इस पूरे घटनाक्रम में लोकतंत्र की जीत हुई है? क्या जनता ने कांग्रेस को सत्ता में सहभागी होने का जनादेश दिया? जब हम ईमानदारी से आकलन करते हैं तो स्पष्ट होता है कि जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के लिए मतदान किया था। कांग्रेस के शासन से परेशान जनता ने उसे दोबारा सत्ता नहीं सौंपी। किंतु, परिस्थितियों का लाभ उठाकर कांग्रेस सत्ता में सहभागी हो रही है, तब यहाँ लोकतंत्र नहीं जीत रहा, बल्कि जनता हार रही है। नेताओं के स्वार्थपूर्ण गठबंधन के सामने लोकतंत्र घुटने टेक रहा है। किसी को भी बहुमत न मिलने पर सरकार का गठन किस प्रकार हो, इस संबंध में हमारे संविधान में कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं दी गई है। इसलिए ऐसी परिस्थितियों में अनैतिक प्रयास होते दिखाई देते हैं। सोचिए, यदि कांग्रेस ने तीसरे स्थान पर रहने वाली जेडीएस के नेता कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद का लालच नहीं दिया होता, तब क्या यह गठबंधन संभव था? यह स्पष्ट है कि बहुमत के नजदीक पहुँचने वाली पार्टी भाजपा को रोकने के लिए ही दूसरे स्थान पर रहने वाली कांग्रेस ने जेडीएस का पिछलग्गू बनना स्वीकार किया है। 
           राजनीतिक विश्लेषक और कांग्रेस के नेता इस प्रकार के गठबंधन को 2019 के लिए एक प्रयोग मान कर संभावनाएं टटोल रहे हैं। किंतु, यहाँ उन्हें इससे संभावित खतरों के बारे में भी विचार कर लेना चाहिए। कांग्रेस के इस कदम से क्षेत्रीय पार्टियों में यह बात घर कर सकती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस उनकी पिछलग्गू पार्टी बन सकती है। उत्तरप्रदेश के चुनाव पूर्व गठबंधन, उपचुनाव में गठबंधन और अब कर्नाटक में चुनाव बाद के गठबंधन से जो तस्वीर बनती दिख रही है, उसमें कांग्रेस और राहुल गांधी नेतृत्व की भूमिका में दिखाई नहीं दे रहे। कांग्रेस और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने अब क्षेत्रीय दलों के पीछे-पीछे चलने का खतरा उत्पन्न हो गया है। कांग्रेस अपनी इस स्थिति से कैसे उबरेगी, यह देखना होगा।

शनिवार, 19 मई 2018

कांग्रेस अपने गिरेबां में भी तो झांके

 पूर्व  प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सहित कांग्रेस के दूसरे नेताओं ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को चिट्ठी लिखकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाषण-शैली पर आपत्ति दर्ज कराई है। कर्नाटक के हुबली में दिए गए भाषण को आधार बनाकर पत्र में उन्होंने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वह प्रधानमंत्री को कांग्रेस नेताओं या अन्य किसी पार्टी के लोगों के खिलाफ अवांछित और धमकाने वाली भाषा का इस्तेमाल करने से रोकें। इसके साथ ही डॉ. मनमोहन सिंह और अन्य नेताओं ने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी का व्यवहार प्रधानमंत्री पद की मर्यादा के अनुकूल नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाषा की मर्यादा और संयम पर चिंतित हो रहे हैं, यह अच्छी बात है। राजनेताओं को अपने प्रतिद्वंद्वी नेताओं के प्रति मर्यादित भाषा का उपयोग करना चाहिए। देश का सामान्य व्यक्ति भी यही मानता है और चाहता है कि हमारे नेता भाषा में संयम बनाएं। किंतु,  विचार करने की बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेसी नेताओं को अब जाकर यह चिंता हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाषण-शैली पर आपत्ति दर्ज कराने वाले पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेसी नेता क्या अपने वक्तव्यों के लिए खेद प्रकट करेंगे? कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध जिस प्रकार के अपशब्दों को उपयोग किया है, क्या उन सबके लिए मनमोहन सिंह खेद प्रकट करेंगे?

रविवार, 13 मई 2018

राहुल गांधी देख रहे हैं एक हसीन ख्वाब

 कांग्रेस  के अध्यक्ष राहुल गांधी ने अंतत: अपने मन की इच्छा देश की जनता के सामने खुलकर प्रकट कर दी है। कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने साफ कहा कि यदि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस बड़ी पार्टी बन कर सामने आती है, तो वह प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे। राहुल गांधी की इस स्वाकारोक्ति में कुछ भी आश्चर्य जैसा नहीं है। सब जानते हैं कि राहुल गांधी भारत का प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य होने के नाते उनकी स्वाभाविक सोच यही है कि भारत का प्रधानमंत्री बनना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के आपत्तिजनक बयान 'देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है' की तर्ज पर राहुल गांधी के मन में यह बात गहरे बैठी है कि 'कांग्रेस की ओर से संगठन और सत्ता के शीर्ष पद पर पहला हक उनके परिवार का है।'

शुक्रवार, 11 मई 2018

झूठ क्यों बोलते हैं राहुल गांधी?

 कांग्रेस  के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकारों का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में अध्ययन ठीक नहीं है। इसलिए जब भी राहुल गांधी संघ के संबंध में कोई टिप्पणी करते हैं, वह बेबुनियाद और अतार्किक होती है। संघ के संबंध में वह जो भी कहते हैं, सत्य उससे कोसों दूर होता है। एक बार फिर उन्होंने संघ के संबंध में बड़ा झूठ बोला है। अब तक संघ की नीति थी कि वह आरोपों पर स्पष्टीकरण वक्तव्य से नहीं, अपितु समय आने पर अपने कार्य से देता था। संचार क्रांति के समय में संघ ने अपनी इस नीति को बदल लिया है। यह अच्छा ही है। वरना, इस समय झूठ इतना विस्तार पा जाता है कि वह सच ही प्रतीत होने लगता है। झूठ सच का मुखौटा ओढ़ ले, उससे पहले ही उसके पैर पकड़ कर पछाडऩे का समय आ गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में राहुल गांधी के हालिया बयान पर संघ ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।

रविवार, 6 मई 2018

कौन हैं भारत में जिन्ना के प्रेमी?

 अलीगढ़  मुस्लिम विश्वविद्यालय में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर क्यों लगाई गई है? यह प्रश्न बहुत वाजिब है। यह आश्चर्य का विषय भी है कि स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद तक भारत विभाजन के प्रमुख गुनहगारों में शामिल जिन्ना की तस्वीर एक शिक्षा संस्थान में सुशोभित हो रही है। मोहम्मद अली जिन्ना सिर्फ भारत विभाजन का ही गुनहगार नहीं है, बल्कि हजारों लोगों की हत्या का भी दोषी है। भाजपा के सांसद सतीश गौतम ने विश्वविद्यालय के उपकुलपति तारिक मंसूर को पत्र लिखकर उचित ही प्रश्न पूछा है कि क्या मजबूरी है कि जिन्ना की तस्वीर विश्वविद्यालय में लगाई गई है? उन्होंने पत्र में यह भी कहा है कि अगर वह विश्वविद्यालय में कोई तस्वीरें लगाना चाहते हैं तो उन्हें महेंद्र प्रताप सिंह जैसे महान लोगों की तस्वीर संस्थान में लगानी चाहिए, जिन्होंने विश्वविद्यालय बनाने के लिए अपनी जमीन दान में दी थी।

बुधवार, 2 मई 2018

पत्रकारिता के दार्शनिक आयाम का आधार है 'आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन'

 भारत  में प्रत्येक विधा का कोई न कोई एक अधिष्ठाता है। प्रत्येक विधा का कल्याणकारी दर्शन है। पत्रकारिता या कहें संपूर्ण संचार विधा के संबंध में भी भारतीय दर्शन उपलब्ध है। देवर्षि नारद का संचार दर्शन हमारे आख्यानों में भरा पड़ा है। हाँ, यह और बात है कि वर्तमान में संचार के क्षेत्र में 'भारतीय दर्शन' की उपस्थिति दिखाई नहीं देती है। उसका एक कारण तो यह है कि लंबे समय तक संचार माध्यमों पर कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों को दबदबा रहा है। यह उजागर तथ्य है कि कम्युनिस्टों को 'भारतीय दर्शन' स्वीकार नहीं, वह प्रत्येक विधा को कार्ल मार्क्स या फिर विदेशी विचारकों के चश्मे से देखते हैं। अब यह स्थिति बदल रही है। देशभर में विभिन्न विषयों को भारतीय दृष्टिकोण से देखने की एक परंपरा विकसित हो रही है। उन लोगों को प्रोत्साहन मिल रहा है, जो ज्ञान-विज्ञान एवं संचार विषयों में भारतीय पहलू की पड़ताल कर रहे हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के मालवीय पत्रकारिता संस्थान के निदेशक प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने देवर्षि नारद को शोध का विषय बनाकर संचार के भारतीय दर्शन को सामने लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है। देवर्षि नारद पर गहन अध्ययन के बाद संचार के भारतीय पक्ष पुस्तक 'आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन' के रूप में हमारे सामने आया है। यह पुस्तक निश्चित तौर पर भारतीय पत्रकारिता को एक दिशा देने का कार्य कर सकती है।

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

महाभियोग की तुच्छ राजनीति

 मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग लाने का निर्णय कर कांग्रेस ने न्यायपालिका पर आखिरकार सीधा हमला कर ही दिया है। अपने इस निर्णय से कांग्रेस ने देश की जनता में ही नहीं, बल्कि अपने भीतर भी किरकिरी करा ली है। भले ही कांग्रेस ने भाजपा पर हमला करने के लिए महाभियोग को राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया है, किंतु इस बार यह हथकंडा कांग्रेस को भारी पड़ सकता है। जज बीएच लोया की कथित संदिग्ध मौत के मामले को खारिज करते समय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि इस मामले की आड़ में न्यायपालिका की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता पर प्रहार करने का प्रयास किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय का यह अंदेशा सत्य साबित हुआ। 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा मत करो महाराज

 देश  में राजनीतिक विरोध का ऐसा माहौल पहले कभी नहीं देखा गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के बीच अपनी राजनीतिक लड़ाई हारे हुए समस्त विपक्षी दल अब भाजपा और केंद्र सरकार को घेरने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को भी निशाना बनाने में संकोच नहीं कर रहे हैं। जज बीएच लोया की कथित संदिग्ध मौत के मामले में जाँच की माँग को जब सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया, तो कांग्रेस सहित विपक्षी दलों एवं उनके समर्थक कथित बुद्धिजीवियों ने जिस प्रकार न्यायपालिका पर अविश्वास जताया है, वह घोर आश्चर्यजनक तो है ही, निंदनीय भी है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर अन्य प्रमुख नेताओं ने न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करने का प्रयत्न किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं यह माना है कि इस प्रकरण के माध्यम से न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर हमला बोला गया है। सर्वोच्च न्यायालय का यह कथन कांग्रेस नेताओं के वक्तव्यों ने सही साबित कर दिया।

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