शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

एकजुट भारत : वयं पंचाधिकं शतम्

तथाकथित किसान आंदोलन के नाम पर भारत विरोधी ताकतों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने का षड्यंत्र रचा, लेकिन भारत के नागरिकों ने अविलम्ब एकजुट प्रतिकार करके बता दिया कि हम भारत विरोधी किसी भी साजिश को सफल नहीं होने देंगे। यह भारत की शक्ति और उसकी सुंदरता है कि आम और प्रभावशाली, सभी लोगों ने भारत की आवाज को मजबूत किया। महाभारत का एक प्रसंग है, जिसमें संदेश दिया गया है कि – ‘वयं पंचाधिकं शतम्’। जो भारतीय संस्कृति में रचा-बसा है, वह इस संदेश को जीता है। उसे पता है कि भले ही हमारी आपस में असहमति है लेकिन बाहर के लिए हम सब एकजुट हैं। इसलिए अनेक असहमतियों के बाद भी विगत दिवस देश के सभी नागरिकों ने ‘भारत के विरुद्ध रचे गए प्रोपोगंडा’ का एक सुर में विरोध किया। 

सुबह से जो लोग पॉप सिंगर रिहाना, पॉर्न स्टार मिया खलीफा, एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग और कमला हैरिस की भतीजी/भान्जी के ट्वीट पर लहालोट हो रहे थे, उनके प्रोपोगंडा की हवा ‘हम भारत के लोग’ में आस्था रखने वाले भारतीयों ने निकाल दी। भारत की ओर से इस बात पर आपत्ति की गई है कि एक अलग दुनिया में रहने वाले इन लोगों ने जमीनी सच्चाई को जाने बिना ही अपनी नाक भारत के आंतरिक मामले में घुसाई है। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर से लेकर अभिनेता अक्षय कुमार और एक सामान्य भारतीय नागरिक ने कहा कि “भारत की संप्रभुता से समझौता नहीं किया जा सकता। आईए, भारत के विरुद्ध इस प्रोपोगंडा के सामने एकजुट होकर खड़े होते हैं”। विदेश मंत्रालय ने भी उचित ही प्रतिक्रिया दी कि “भारत की संसद ने व्यापक बहस और चर्चा के बाद, कृषि क्षेत्र से संबंधित सुधारवादी कानून पारित किया। ये सुधार किसानों को अधिक लचीलापन और बाजार में व्यापक पहुँच देते हैं। ये सुधार आर्थिक और पारिस्थितिक रूप से सतत खेती का मार्ग प्रशस्त करते हैं”। 

यह सच है कि इन ‘सेलेब्रिटीज’ न तो कृषि सुधार कानूनों की एक पंक्ति पढ़ी है और न ही उन्हें किसानों की माँगों का ही पता है। उन्हें जो ट्वीट और पोस्टर दिया गया, उसे उन्होंने ट्वीट कर दिया। इस कॉपी-पेस्ट कर्म में अनजाने में स्वीडिश एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने इस अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र की पोल खोल दी। ग्रेटा ने भारत में जारी किसान आंदोलन के समर्थन की अपील करते हुए जो ट्वीट किया, उसमें उन्होंने एक ऐसे दस्तावेज को साझा कर दिया, जिससे स्पष्ट होता है कि किसान आन्दोलन एक सोची समझी रणनीति के साथ शुरू किया गया था और 26 जनवरी का उपद्रव भी इसी रणनीति का हिस्सा था। गूगल ड्राइव पर साझा की गई इस फाइल में इस तथाकथित किसान आंदोलन के आगे की रणनीति एवं सोशल मीडिया अभियान का क्रम और अन्य गतिविधियों का ब्योरा दर्ज है। इसके साथ ही इस दस्तावेज में यह तक उल्लेख है कि किसको क्या ट्वीट करना है और किन्हें टैग करना है। दरअसल, प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कृषि सुधार कानूनों की सराहना की है। उन संस्थाओं को टैग करके उन पर दबाव बनाने की योजना भी उजागर हुई है। 

इस दस्तावेज में भारत के कुछ मीडिया संस्थानों का भी जिक्र है, जो इस षड्यंत्र में उनके सहयोगी साबित हो सकते हैं। जैसे ही ग्रेटा ने यह ट्वीट किया, भारत विरोधी ताकतों की कलई खुल गई। आनन-फानन में ग्रेटा से यह ट्वीट हटवाया गया। हालाँकि, तब तक सच सामने आ चुका था। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन इस आंदोलन के पीछे सक्रिय अराजक ताकतों का चेहरा सामने आता जा रहा है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वाभिमान के पर्व ‘गणतंत्र दिवस’ पर हुई अराजकता और हिंसा के बाद से यह तथाकथित किसान आंदोलन अपनी नैतिकता खो चुका है। अब धीमे-धीमे जनसमर्थन और सहानुभूति से भी हाथ धो रहा है।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

बाचा : द राइजिंग विलेज

 देश का पहला गाँव, जिसके हर घर में सोलर इंडक्शन पर पकता है खाना

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले का एक छोटा-सा अनुसूचित जनजाति (शेड्यूल ट्राइब) बाहुल्य गाँव है- बाचा। आजकल यह छोटा-सा गाँव अपने बड़े नवाचारों के कारण चर्चा में बना हुआ है। वर्ष 2016-17 से बाचा ने बदलाव की करवट लेनी शुरू की। आज बाचा न केवल मध्यप्रदेश बल्कि भारत के सभी गाँवों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सकता है। गाँववासियों की लगन, समर्पण, सूझबूझ और वैज्ञानिक समझ ने बाचा गाँव की तस्वीर में रंग भर दिए हैं। एक समय में पानी की समस्या का सामना करने वाले इस गाँव में अब पानी के पर्याप्त प्रबंध हैं। शैक्षणिक संस्था विद्या भारती से जुड़े समाजसेवी मोहन नागर की प्रेरणा से ग्रामवासियों ने परंपरागत ग्राम-विज्ञान के सहारे बारिश के पानी को एकत्र करना प्रारंभ किया। इसके लिए पहाड़ी या ढलान से आने वाले पानी को रेत की बोरियों की दीवार बनाकर एकत्र किया गया, इससे न केवल खेती और पशुओं के लिए पानी जमा हुआ, बल्कि गाँव का भू-जलस्तर (ग्राउंड वाटर लेवल) भी बढ़ गया। गाँववालों ने इस प्रयोग को नाम दिया- बोरी बंधान। 

बोरी बंधान के इस प्रयोग से संग्रहित बारिश के पानी का उपयोग फसलों की सिंचाई में किया जाता है। पशुओं के पेयजल के लिए भी यह पानी उपयोग होता है। एक छोटे से ग्रामीण विज्ञान के प्रयोग से आज बाचा गाँव वह खेत लहलहाते हैं, जो कभी सिंचाई के अभाव में सूखे रह जाते थे। बोरी बंधान से गाँव की लगभग 15 एकड़ जमीन सिंचित की जा रही है। इसके साथ ही समाजसेवी मोहन नागर की योजना से प्रारंभ हुए गंगाअवतरण अभियान के अंतर्गत सभी ग्रामीणों ने आस-पास की पहाड़ियों पर खंती खोद कर बारिश के जल को जमीन के भीतर भेजने का और पौधरोपण करने का अनुपम एवं अनुकरणीय कार्य आरम्भ किया है। पिछले कुछ वर्षों से यह कार्य लगातार जारी है। प्रकृति संवर्धन और जल संरक्षण का यह अभिनव कार्य उस समय भी नहीं रुका जब कोरोना के कारण समूचा देश स्थिर-सा हो गया है। चूंकि गाँव में घरवास (लॉकडाउन) से छूट थी, कोरोना के संक्रमण की दस्तक भी नहीं हुयी थी, इसलिए बाचा और उसके आसपास के ग्रामीणों ने बारिश के जल को संरक्षित करने के लिए मानसून के आने से पहले ही गंगा अवतरण अभियान को प्रारम्भ कर दिया।  

सौर ऊर्जा के प्रयोग के लिए देशभर में चर्चित :

बाचा गाँव ने न केवल स्वच्छता और जलसंरक्षण सहित अन्य महत्व अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, बल्कि प्राकृतिक ऊर्जा का दैनिक जीवन में उपयोग करने के लिए वैज्ञानिक पहल भी प्रारंभ की है। आज बाचा की पहचान देश में ऐसे पहले गाँव के रूप में है, जहाँ हर घर की रसोई में सौर ऊर्जा की सहायता से भोजन तैयार किया जाता है। समाजसेवी मोहन नागर बताते हैं- “जीवाश्म ईंधन से जहाँ पर्यावरण को क्षति पहुँच रही थी, वहीं महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए भी यह ठीक नहीं था। हमने सबसे पहले गाँववालों को सौर ऊर्जा के बारे में जागरूक किया गया। आईआईटी मुंबई के विद्यार्थियों और ओएनजीसी के अधिकारियों के सहयोग गाँव में इलेक्ट्रिक सोलर इंडक्शन लगाए गए हैं। अब गाँव के प्रत्येक घर में सौर्य ऊर्जा का उपयोग कर खाना बनाया जाता है। इसके लिए आईआईटी मुंबर्ई के विद्यार्थियों और ओएनजीसी के अधिकारियों ने गाँव के कुछ लोगों को प्रशिक्षित किया और उन्हें सौर ऊर्जा से बिजली कैसे बनाई जाती है, इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया की जानकारी दी।” 

गाँव वालों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि प्रारंभ में उन्हें न तो सौर ऊर्जा के बारे में पता था और न ही इसके लिए उपयोग में आने वाले उपकरणों की कोई जानकारी थी। इस समस्या का समाधान निकला आईआईटी मुंबई और ओएनजीसी के अधिकारीयों से। उन्होंने बाकायदा सौर ऊर्जा के उपयोग और उसके उपकरणों के रखरखाव के लिए गाँव के ही कुछ लोगों प्रशिक्षित किया। गाँववासियों को समझाया कि सौर ऊर्जा की वैज्ञानिक प्रक्रिया क्या है और उससे कैसे बिजली बनाई जा सकती है। हालाँकि, शुरुआत में तो गांववालों को यह बेहद ही मुश्किल और खर्चीला काम नज़र आया। लेकिन, पुराने अनुभवों और सफलता ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। परिणाम सबके सामने हैं कि आज सौर ऊर्जा ने ग्रामीणों के ईंधन का खर्च तो बचाया ही, महिलाओं को चूल्हे के धुंए से भी बचा लिया है।

अपने रसोईघर में सौर ऊर्जा से खाना बनाने वाली लता बताती है कि सौर पैनल नहीं लगा था तब हमें लकड़ी लाने के लिए जंगल में दूर तक जाना पड़ता था। हमें डर भी लगता था। इसके साथ ही अब हमें रसोई में धुंए से भी छुटकारा मिल गया है। ग्रामीण शरद बताते हैं कि सौलर ऊर्जा के उपयोग के बाद से गाँव में बहुत परिवर्तन आया है। 

आईआईटी मुंबई के इंजीनियर देवसुख बताते हैं कि बाचा गाँव में 74 घर हैं। इन सभी घरों में एक-एक हजार वॉट के सोलर पैनल सिस्टम लगे हैं। इसमें चार पैनल, चार बैटरी और एक चूल्हा शामिल है। उनका दावा है कि बारिश के मौसम में सूरज की रौशनी नहीं मिलने पर भी बैटरी के बैकअप से 5-6 घंटे तक यह काम करता है। 

‘अन्नपूर्णा मंडपम’ से बचा रहे हैं प्रतिमाह 500 से 1000 रुपये : 

विद्या भारती ने इस गाँव में एक और सार्थक पहल की शुरुआत की है, जिसे “अन्नपूर्णा मंडपम” नाम दिया गया है। इसका अर्थ है घर का किचन गार्डन। गाँव के लगभग हर घर में यह गार्डन है, जिसमें ग्रामीण घर में उपयोग के लिए सब्जी उगा रहे हैं। इससे हर परिवार के महीने के 500-1000 रूपये की बचत हो जाती है। 

प्लास्टिक मुक्त घूरा :

इस गाँव की एक और बड़ी उपलब्धि है कि ग्रामीणों ने अपने घूरों (कचरा एकत्र करने के स्थान) को प्लास्टिक मुक्त कर लिया है। प्लास्टिक मुक्त घूरे में एकत्र कचरे का उपयोग खेत के लिए जैविक खाद बनाने में किया जाता है। वैसे तो इस गाँव में प्लास्टिक का उपयोग कम ही किया जाता है, लेकिन जो भी प्लास्टिक कचरा निकलता है, उसे अलग रखा जाता है। उसे घूरे में नहीं फेंका जाता है।

गाँव पर बनी फिल्म 'बाचा : द राइजिंग विलेज' को मिला राष्ट्रीय पुरस्कार : 


माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक लोकेन्द्र सिंह और प्रोड्यूसर मनोज पटेल ने इस गाँव कहानी सबके सामने लाने के उद्देश्य से एक डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘बाचा : द राइजिंग विलेज’ का निर्माण किया। फिल्म को राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान, हैदराबाद के तत्वावधान में आयोजित ‘नेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑन रूरल डेवलपमेंट’ में द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अलावा इस फिल्म को कोलकाता में आयोजित 5वें अंतरराष्ट्रीय विज्ञान फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीनिंग हेतु भी चुना गया। 

आदर्श गाँव के रूप में बाचा :

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के एक छोटे से अनुसूचित जनजाति गाँव “बाचा” की कहानी सबको प्रेरणा देने वाली है। आधुनिक और पारंपरिक विज्ञान के छोटे-छोटे उपायों को अपनाकर, "बाचा" जैसा कोई भी गाँव एक आदर्श गाँव के रूप में खड़ा हो सकता है। इसी बात को समझाने के लिए हमने इस गाँव पर एक फिल्म बनायी। जिसको लेकर अभी तक काफी अच्छी प्रतिक्रियाएं आई हैं। - मनोज पटेल, निर्देशक-संपादक 

हर कोई जाने बाचा की कहानी :

हम चाहते हैं कि बाचा की कहानी हर कोई जाने, ताकि अन्य गाँव भी आदर्श बनें। बाचा जलसंरक्षण और सौर ऊर्जा का बड़ा सन्देश देता है। “इलेक्ट्रिक सोलर इंडक्शन” और “बोरी बंधन” जैसे अनूठे प्रयोग अनुकरणीय हैं। - लोकेन्द्र सिंह, फिल्म प्रोड्यूसर



बाचा की कहानी साधारण कहानी नहीं है। यह पिछड़े गाँव से आदर्श गाँव तक सीमित रह जाने की कहानी भी नहीं है। ‘बाचा’ की यात्रा अभी रुकी नहीं है। आधुनिक और परंपरागत विज्ञान के छोटे उपायों को अपनाकर बाचा ने सफलता की जो नींव रखी हैं, वह उसे और मजबूत करने के लिए प्रयत्नशील है। यह अन्य गाँव को भी राह दिखा रहा है। निसंदेह यह छोटा गाँव आज सबके बीच न केवल चर्चा का बल्कि प्रेरणा का स्रोत भी बन गया है। 

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

‘हनुमानजी की भूमिका’ में भारत

आज जब हम 72वां गणतंत्र मना रहे हैं, तब हम गौरव की अनुभूति कर रहे हैं कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका को भी प्राप्त करने की ओर तेजी से अग्रसर है। ‘हम भारत के लोग’ इस बात से रोमांचित होते हैं कि ज्ञान-विज्ञान से लेकर आर्थिक क्षेत्र में कभी हम दुनिया का नेतृत्व करते थे। लंबे समय से हम अपने देश को पुन: विश्वगुरु की भूमिका में देखना चाह रहे थे, उसके लिए प्रयासरत थे। हम चाहते हैं कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा का प्रतिपादक हमारा देश वैश्विक पटल पर ‘विश्व परिवार के मुखिया’ की भूमिका का निर्वहन करे। पिछले पाँच-छह वर्षों में भारत ने उस सामर्थ्य को अर्जित किया है। वैश्विक महामारी ‘कोरोना संक्रमण’ की शुरुआत में ही दुनिया ने भारत की इस भूमिका को देखा कि हमने कमजोर देशों के साथ ही समर्थ देशों की भी सहायता की। अब एक बार फिर भारत में निर्मित कोरोना के टीके जरूरतमंद देशों को भेज कर हम अपनी मानवतावादी आचरण की प्रस्तुति कर रहे हैं। 

भारत ने कोरोना के दो स्वदेशी टीके बनाकर न केवल अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा को सुनिश्चित किया है, बल्कि वह अपने अनेक पड़ोसी देशों को टीके अनुदान के तौर पर देकर एक बड़ी लकीर खींच रहा है। पिछले कुछ दिनों में देसी टीकों की खेप भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, मालदीव, नेपाल, सेशेल्स और मॉरिशस पहुंची है। इसके अलावा सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और मोरक्को को व्यावसायिक तौर पर टीके भेजे जा रहे हैं। इस सूची में अभी कुछ और देश भी जुड़ेंगे। अमेरिकी विदेश विभाग दक्षिण एवं मध्य एशिया ब्यूरो ने पड़ोसी देशों को मुफ्त टीका मुहैया कराने तथा वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए एक बार फिर भारत की प्रशंसा करते हुए उसे ‘सच्चा दोस्त’ बताया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अदनोम घेब्रेयेसस ने महामारी से निजात पाने की कोशिशों में भागीदारी के लिए भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद कहा है।

ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोलसोनारो तो भारत से सहयोग मिलने पर अत्यधिक कृतज्ञ अनुभव कर रहे हैं। उन्होंने भारत के प्रति धन्यवाद प्रकट करते हुए कोरोना वैक्सीन लाते हुए हनुमानजी का पोस्टर ट्वीट किया है। हमें ज्ञात है कि जब भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे, तब हुनमानजी हिमालय से संजीवनी बूटी लेकर आए थे। उसी संजीवनी बूटी ने लक्ष्मणजी के प्राणों की रक्षा की थी। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि ब्राजील के राष्ट्रपति ने भारतीय संस्कृति के आधार ‘रामायण’ के प्रसंग को इस तरह उल्लेख किया। भारत की कोरोना वैक्सीन को उन्होंने ‘संजीवनी’ के रूप में मान्यता दी और भारत को मानवतासेवी बताया है। एक और अच्छी बात यह है कि उन्होंने हिन्दी में भी धन्यवाद ज्ञापित किया है। यह वैश्विक पटल पर भारत के सम्मान एवं उसकी भूमिका को रेखांकित करता है। इन तथ्यों को भारत के विपक्षी राजनीतिक दलों एवं मोदी विरोधी समूह को भी देखना और समझना चाहिए। जिस वैक्सीन को लेकर ‘झूठों का समूह’ दुष्प्रचार कर रहा था, उसके प्रति वैश्विक जगत भारत के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हमारी वैक्सीन समूची मानवता के लिए है। इसलिए यह बात स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि अपने पड़ोसियों और मित्र देशों को टीका देना, केवल कूटनीति या व्यापार का मामला नहीं है बल्कि सदैव से मानवता की चिंता भारत की प्राथमिकता है।


शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

प्रिंट मीडिया पर कोरोना महामारी का प्रभाव

पाठकों के हाथों से दूर हुआ समाचारपत्र, क्या वापस आएगा?

कोविड-19 के कारण पूरी दुनिया में फैली महामारी की चपेट में आने से मीडिया भी नहीं बच सका है। विशेषकर प्रिंट मीडिया पर कोरोना महामारी का गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। प्रिंट मीडिया पर कोरोना के प्रभाव को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। समाचारपत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रभावित हुआ है, उनकी प्रसार संख्या में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है, समाचारपत्रों के आकार घट गए हैं, पत्रकारों की नौकरी पर संकट आया है, संस्थानों के कार्यालयों में कार्य-संस्कृति में आमूलचूल परिवर्तन हुआ है। प्रिंट मीडिया के भविष्य को लेकर भी चर्चा बहुत तेजी से चल पड़ी है। ऐसा नहीं है कि कोरोना संक्रमण के कारण लागू हुए लॉकडाउन एवं आर्थिक मंदी का प्रभाव सिर्फ प्रिंट मीडिया पर ही हुआ है, इलेक्ट्रॉनिक एवं वेब मीडिया भी इससे अछूता नहीं रहा है। इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया के सामने सिर्फ आर्थिक चुनौतियां हैं, जबकि प्रिंट मीडिया के सामने तो पाठकों का भी संकट खड़ा हो गया। लोगों ने डर कर समाचारपत्र-पत्रिकाएं मंगाना बंद कर दीं। लोगों ने समाचार और अन्य पठनीय सामग्री प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया का रुख किया है। इसलिए यह प्रश्न अधिक गंभीर हो जाता है कि क्या भविष्य में प्रिंट मीडिया का यह पाठक वर्ग उसके पास वापस लौटेगा? 

कोरोना संक्रमण के कारण जब मार्च-2020 में पहला देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया, तब संक्रमण से डर कर बड़ी संख्या में लोगों ने अपने घर में समाचारपत्र-पत्रिकाओं के प्रवेश को भी प्रतिबंधित कर दिया। लोगों के बीच यह भय था कि समाचारपत्र के माध्यम से भी कोरोना संक्रमण फैल सकता है। ऐसा सोचने वाले लोग बड़ी संख्या में थे। स्थिति यहाँ तक बन गई कि कोरोना महामारी से भयग्रस्त एक याचिकाकर्ता ने चेन्नई के उच्च न्यायालय में याचिका लगाई थी कि समाचारपत्रों से कोरोना वायरस फैल सकता है, इसलिए इनका प्रकाशन रोका जाए। न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए समाचारपत्रों के प्रकाशन पर रोक से मना कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि “भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जीवंत मीडिया का बहुत महत्व है। जीवंत मीडिया भारत जैसे किसी भी लोकतांत्रिक देश की थाती है। अतीत में आजादी की लड़ाई के दौरान इसी मीडिया ने अंग्रेजों के शासन के खिलाफ जन-जागरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद आपातकाल के समय भी समाचारपत्रों की उल्लेखनीय भूमिका रही। समाचारपत्रों के प्रकाशन पर यदि रोक लगाई जाती है तो यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत न केवल प्रकाशक और संपादक, बल्कि पाठक के भी मौलिक अधिकारों के हनन के समान होगा”। लोगों के इस भय को दूर करने के लिए लगभग सभी समाचारपत्रों ने कई बार यह सूचना प्रकाशित की कि ‘समाचारपत्र से कोरोना नहीं फैलता है। दुनिया में एक भी प्रकरण ऐसा नहीं आया है, जो समाचारपत्र के माध्यम से संक्रमित हुआ हो। यहाँ तक कि कई शोध में यह बात सामने आई है कि समाचारपत्रों की छपाई तकनीक बिल्कुल स्वच्छ एवं सुरक्षित है। वितरक सैनिटाइजेशन के मानकों का पालन कर रहे हैं। समाचारपत्र छूना सुरक्षित है। इससे कोरोना के फैलने का कोई खतरा नहीं होता। बल्कि समाचारपत्र से कोरोना के संबंध में सही जानकारी पाठकों को मिलती है’। इस अपील/स्पष्टीकरण के प्रकाशन और इलेक्ट्रॉनिक एवं वेब मीडिया में प्रसारण के बाद भी लोगों ने समाचारपत्र से दूरी बना ली। इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया के होने के बाद भी जो लोग समाचारों के लिए प्रिंट मीडिया पर निर्भर थे, उन्होंने भी समाचारपत्रों को छूना बंद कर दिया। वर्षों से सुबह उठकर चाय के साथ समाचारपत्र पढऩे की आदत को कोरोना संक्रमण के भय ने एक झटके में बदल दिया। इसकी पुष्टि एक मार्केट रिसर्च कंपनी की रिपोर्ट भी करती है। ‘ग्लोबल वेब इंडेक्स’ की रिपोर्ट कहती है कि दुनियाभर में ऑनलाइन न्यूज की खपत में तेजी से वृद्धि हुई है। लोग ताजा जानकारियाँ जुटाने के लिए डिजिटल माध्यमों का सबसे अधिक उपयोग कर रहे हैं। कई भारतीय मीडिया संस्थानों ने भी मार्च के तीसरे सप्ताह से ऑनलाइन ट्रैफिक (उपभोक्ताओं) में उछाल दर्ज किया था। 

भारत में मार्च-2020 के पाँच-छह माह बाद यह स्थिति बनी है कि पाठकों के हाथों में अब समाचारपत्र की हार्डकॉपी की जगह ई-पेपर आ गया। पाठक समाचारपत्र पढ़ने की अपनी आदत की संतुष्टि के लिए अब ई-पेपर पर चले गए। तकनीक में दक्ष लोग समाचारपत्र को डाउनलोड कर उसकी पीडीएफ फाइल व्हाट्सएप समूहों पर प्रसारित करने लगे। यानी पहले हॉकर आपके यहाँ समाचारपत्र की प्रति दरवाजे पर छोड़ कर जाता था, तब उसकी डिजिटल कॉपी आपको व्हाट्सएप पर मिलने लगी। मीडिया संस्थानों ने समाचारपत्रों की पीडीएफ फाइल के प्रसार को गंभीरता से लिया और यह तय हुआ कि किसी भी समाचारपत्र की पीडीएफ फाइल प्रसारित करने पर दण्डात्मक कार्यवाही हो सकती है। वेब मीडिया पर बढ़ते ट्रैफिक और ई-पेपर पर क्लिक की बढ़ती संख्या ने मीडिया संस्थानों के कान खड़े कर दिए। उन्हें यह लगने लगा कि यदि पाठकों में ई-पेपर पढ़ने की आदत विकसित हो गई तब भविष्य में स्थितियां सामान्य होने के बाद भी उनकी प्रसार संख्या पूर्व स्थिति में नहीं आ पाएगी। समाचारपत्र की हार्डकॉपी ही लोग पढ़ें इसके लिए ज्यादातर मीडिया संस्थानों ने अपने समाचारपत्रों के ई-वर्जन पढ़ने के लिए सदस्यता शुल्क लेना शुरू कर दिया। जबकि कोरोना काल से पूर्व गिनती के ही समाचारपत्र थे, जो ई-पेपर पढ़ने के लिए पाठकों से शुल्क लेते थे। इसके साथ ही सुबह थोड़ी देर से ई-पेपर अपडेट/उपलब्ध कराए जाने लगे। ई-पेपर का स्क्रीनशॉट या क्लिप लेना प्रतिबंधित कर दिया गया। कुल मिलाकर यह प्रयास किए गए कि पाठक समाचारपत्र की हार्डकॉपी पर ही वापस लौटे। हालाँकि, उनके प्रयास बहुत सफल नहीं हुए। पाठक अब भी समाचारपत्रों की हार्डकॉपी लेने/छूने से बच रहा है और धीरे-धीरे ई-पेपर या वेबसाइट पर ही समाचार पढ़ने की उसकी आदत बन रही है। व्यक्तिगत बातचीत में कई लोगों ने यह स्वीकार किया है कि ई-पेपर एवं वेब पोर्टल्स पर ताजा खबरें मिलने से अब उन्हें अपनी दिनचर्या में समाचारपत्र की अनुपस्थिति खलती नहीं है। ज्यादातर लोगों ने यह भी कहा कि संभव है कि अब वे भविष्य में समाचारपत्र की हार्डकॉपी न मंगाएं। इसलिए यह माना जाने लगा है कि आगे चलकर प्रिंट संकुचित होगा जबकि इंटरनेट आधारित मीडिया का विस्तार होगा और उसके पास अधिक पाठक होंगे। 

भारत की सामाजिक परिस्थिति को देखते हुए इस बात से सहमत होना कठिन है कि प्रिंट मीडिया के विस्तार पर वर्तमान नकारात्मक प्रभाव भविष्य में भी बना रहेगा। हमें याद रखना चाहिए कि भारत में जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का आगमन हुआ, तब भी यही कहा जा रहा था कि समाचारपत्र-पत्रिकाओं के दिन अब लदने को हैं। लेकिन, हमने देखा कि प्रिंट मीडिया के कदम ठहरे नहीं, उसका विस्तार ही हुआ। उसके बाद जब इंटरनेट आधारित मीडिया ने जोर पकड़ना शुरू किया तब फिर से उक्त प्रश्र को उठाया जाने लगा। परंतु, ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) और इंडियन रीडरशिप सर्वे (आईआरएस) के आंकड़े बताते हैं कि प्रिंट मीडिया के प्रसार और पठनीयता, दोनों में तेजी से वृद्धि हो रही है। भारत में प्रिंट मीडिया की यह स्थिति तब है, जब दुनिया के अनेक देशों में प्रतिष्ठित समाचारपत्रों का प्रकाशन बंद हो रहा है। कोरोना से पहले भारत में प्रिंट मीडिया का न केवल विस्तार हो रहा था, बल्कि उसकी विश्वसनीयता भी बाकी मीडिया के अपेक्षा अधिक मजबूत हो रही थी। पूर्ण विश्वास के साथ तो नहीं, लेकिन पूर्व स्थितियों के आकलन और भारत की सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखकर यह उम्मीद अवश्य है कि समाचारपत्र पुन: अपनी स्थिति को प्राप्त होंगे और उनका प्रसार भी तेजी से बढ़ेगा। क्योंकि वेब मीडिया अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय समाचारों की भूख को तो शांत कर देते हैं लेकिन अपने आस-पास (स्थानीय) के समाचारों से पाठक अछूता रह जाता है। पाठकों को उस मात्रा में उनके शहर, गाँव, बस्ती, मोहल्ले के समाचार वेब मीडिया पर नहीं मिल रहे, जो उन्हें स्थानीय समाचारपत्र उपलब्ध कराते हैं।  

वर्तमान परिस्थिति में प्रिंट मीडिया को सहायता करने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को महत्वपूर्ण कदम उठाने चाहिए। प्रत्येक परिस्थिति में समाज को जागरूक करने में समाचारपत्र-पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण एवं प्रभावी भूमिका रहती है। हमने कोरोना काल में भी यह अनुभव किया है कि पत्रकारों ने अपना जीवन दांव पर लगाकर सही सूचनाएं नागरिकों तक पहुँचाने में सराहनीय भूमिका का निर्वाह किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से प्रिंट मीडिया के प्रमुखों से बात कर समाचारपत्रों की इस भूमिका की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि “प्रिंट मीडिया का नेटवर्क पूरे भारत में है। यह शहरों एवं गांवों में फैला हुआ है। यह मीडिया को इस चुनौती (कोरोना संक्रमण) से लडऩे और सूक्ष्म स्तर पर इसके बारे में सही जानकारी फैलाने के लिए अधिक महत्वपूर्ण बनाता है”। प्रधानमंत्री मोदी ने जब प्रिंट मीडिया के प्रमुखों से बात की, तब निश्चित ही उन्होंने उनकी समस्याएं भी जानी होंगी। उन्हें सहायता का आश्वास भी दिया होगा। सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी मीडिया की वर्तमान स्थिति का अध्ययन कर रहा होगा। बहरहाल, प्रिंट मीडिया को सहयोग करने के संबंध में विचार करते समय सरकार को यह बात आवश्यक रूप से ध्यान रखनी चाहिए कि उसकी प्राथमिकता में छोटे और मझले, भारतीय भाषाई, क्षेत्रीय समाचारपत्र-पत्रिकाएं भी शामिल हों। बड़े मीडिया संस्थान फिर भी अपने अस्तित्व की लड़ाई स्वयं लड़ लेंगे, लेकिन मझले संस्थानों के सामने अस्तित्व का बड़ा प्रश्न खड़ा है। प्रिंट मीडिया को बचाने के लिए मझले संस्थानों की चिंता सर्वोपरि होनी चाहिए।

(यह आलेख अभिधा बुक्स, दिल्ली से वर्ष 2021 में प्रकाशित डॉ. शैलेन्द्र राकेश की पुस्तक 'कोरोना वाली दुनिया' में शामिल है।) 

शनिवार, 9 जनवरी 2021

लक्ष्य : हार और जीत ही काफी नहीं जिंदगी में...

यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर देखें 


हार और जीत ही काफी नहीं
जिंदगी में मेरे लिए
मीलों दूर जाना है अभी मुझे।
निराशा के साथ बंधी
आशा की इक डोर थामे
उन्नत शिखर की चोटी पर चढ़ जाना है मुझे।
हार और जीत ही....


है अंधेरा घना लेकिन
इक दिया तो जलता है रोशनी के लिए
उसी रोशनी का सहारा लिए
भेदकर घोर तमस का सीना
उस दिये का हाथ बंटाना है मुझे।
हार और जीत ही...


चांद पर पहुंच पाऊंगा या नहीं
ये सोच अभी नहीं रुकना है मुझे
चलता रहा विजय की उम्मीद लिए
तो चांद पर न सही
तारों के बीच टिमटिमाना है मुझे।
हार और जीत ही...

- लोकेन्द्र सिंह -

(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से) 

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

आओ, आत्मनिर्भरता का संकल्प लें

स्वदेशी का विरोध करने वाले असल में भारत विरोधी


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में ‘आत्मनिर्भर भारत का संकल्प’ लेने का बहुत महत्वपूर्ण आह्वान किया है। कोविड-19 ने हमें बहुत नुकसान पहुँचाया है, तो कई महत्वपूर्ण सबक भी दिए हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण है- आत्मनिर्भरता का सबक। देश में जब लॉकडाउन था, तब प्रधानमंत्री मोदी ने देश को ‘लोकल फॉर वोकल’ का नारा दिया था, जिसका असर पिछले कुछ महीनों में देखा गया है। भारत के नागरिकों में स्वदेशी के प्रति भावना प्रबल हुई है। इस वर्ष बड़े त्यौहारों पर भी लोगों ने बाहरी कंपनियों की जगह स्थानीय उत्पाद खरीदने में रुचि दिखाई। यही कारण है कि हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। लॉकडाउन में काम-धंधा बंद होने से स्थानीय व्यावसायी और कामगारों के मन में उपजी निराशा ‘लोकल फॉर वोकल’ के कारण दूर हो रही है। यदि हम ही अपने उत्पादों को प्रोत्साहित नहीं करेंगे, तब देश आर्थिक तौर पर कैसे सशक्त होगा?

आश्चर्य होता है कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को स्वदेशी को बढ़ावा देने से चिढ़ क्यों होती है? वे विदेशी कंपनियों के पक्षधर और स्वदेशी कंपनियों के विरोधी नजर आते हैं। स्वदेशी कंपनियों के विरुद्ध नकारात्मक वातावरण बनाने में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सदैव अग्रणी रहता है। उनके इस विमर्श को समझने की आवश्यकता है। यह मानसिक गुलामी की स्थिति है या फिर विदेशी फंडिंग का प्रभाव? दोनों ही स्थितियां त्याज्य हैं। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के निर्माताओं और उद्योग जगत से आग्रह किया है कि “देश के लोगों ने मजबूत कदम आगे बढ़ाया है, वोकल फॉर लोकल आज घर-घर में गूंज रहा है। ऐसे में अब यह सुनिश्चित करने का समय है कि हमारे उत्पाद विश्वस्तरीय हों। जो भी वैश्विक स्तर पर श्रेष्ठ है, उसे हम भारत में बनाकर दिखाएं। इसके लिए हमारे उद्यामी साथियों को आगे आना है। स्टार्टअप को भी आगे आना है”। प्रधानमंत्री मोदी के इस आह्वान में देश को आर्थिक शक्ति बनाने का बड़ा संकल्प शामिल है। आत्मनिर्भर भारत के शुभ संकल्प की पूर्ति में भारत के आम नागरिकों एवं सज्जनशक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है। स्वदेशी के विरुद्ध चलने वाले सभी प्रकार के नकारात्मक विमर्शों को निष्प्रभावी करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में आगे बढऩा होगा। अपने स्थानीय एवं स्वदेशी उद्यमियों को प्रोत्साहित करना होगा। 

एक जनवरी पर नये कैलेंडर वर्ष के लिए संकल्प लेने का चलन बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने एक सकारात्मक विचार हमारे सामने रखा है कि क्या हम नये वर्ष में भारत में बने उत्पादों का उपयोग करने का संकल्प ले सकते हैं? उन्होंने कहा- “मैं देशवासियों से आग्रह करूंगा कि दिनभर इस्तेमाल होने वाली चीजों की आप एक सूची बनाएं। उन सभी चीजों की विवेचना करें और यह देखें कि अनजाने में कौन-सी विदेश में बनी चीजों ने हमारे जीवन में प्रवेश कर लिया है तथा एक प्रकार से हमें बंदी बना दिया है। भारत में बने इनके विकल्पों का पता करें और यह भी तय करें कि आगे से भारत में बने, भारत के लोगों के पसीने से बने उत्पादों का हम इस्तेमाल करें”।

   

         स्वदेशी जागरण मंच का नारा है- ‘चाहत से देसी, जरूरत से स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी’। स्वदेशी के इस सूत्र को ध्यान में रखकर हमें एक सूची बनानी चाहिए कि इस वर्ष हम किन स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करेंगे? यह भी सूची बना सकते हैं कि किन वस्तुओं को भारत में बनाए जाने की अपेक्षा आप भारत के निर्माताओं, उद्योग जगत और स्टार्टअप से करते हैं। इससे भारत का उद्योग जगत आपकी अपेक्षाओं से भी अवगत हो सकेगा। यदि हम सही में भारत को सशक्त करना चाहते हैं, तब हमें स्वदेशी के विचार को न केवल मजबूत बनाना होगा, बल्कि अपनी जीवन में भी उतारना होगा।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

ये चाय बहुत खास है

भारत में कुछ बुद्धिजीवियों ने गाय को विवाद विषय बना दिया है, जबकि गाय तो प्रेम और वात्सल्य की मूर्ति है। यह तो दिलों का मेल कराती है। 

गाँव में अपरिचित परिवार में सुबह-सुबह यह चाय गाय माता ने ही नसीब कराई है। 

हुआ यह कि हम पांच लोग इंदौर से ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए निकले।

एक गाँव से गुजर रहे थे तो सड़क किनारे एक घर देखा, वहां चार-पांच गाय थी। सुबह का समय था तो गांव के शुद्ध वातावरण में गाय के शुद्ध दूध की चाय पीने का मन हुआ। हमने गाड़ी रोकी। हमारे साथ अभियंता श्री संजय चौधरी थे, उन्होंने गाड़ी से उतर कर सूर्य देवता को नमन किया। इसी क्रम में अपन राम ने गाड़ी में बैठे-बैठे गाय माता को प्रणाम किया। 

संजय जी ने आंगन में पहुंच कर आवाज दी। घर से एक पुरुष बाहर निकल कर आया। संजय जी ने उसको निवेदन किया कि "भाई साहब, यदि गाय के दूध की चाय मिल जाये तो दिन बन जायेगा"। उन सज्जन ने कहा कि हम चाय बनाने का काम नहीं करते हैं। हालांकि, सड़क किनारे घर होने से कई बार लोग पूछते हैं। हम सबको मना कर देते हैं। लेकिन, आपको अवश्य पिलायेंगे"। यह कहते हुए उस सज्जन के चेहरे पर आत्मीयता और आतिथ्य का भाव स्पष्ट दिख रहा था। 

हम उनकी यह बात सुनकर हैरान हुए कि ये किसी चाय नहीं बनाते, लेकिन हमारे लिए बना रहे हैं। ऐसा क्यों है? 

हम सबकी चाय पीने की इच्छा पूरी हो रही थी। ऐसे में यह प्रश्न बेमानी था कि वे हमारे लिए चाय बनवाने के लिए तैयार क्यों हुए? परंतु मैं अपनी इस जिज्ञासा को अधिक देर तक दबा नहीं सका। 

मैंने उत्सुकता दिखाते हुए पूछ ही लिया कि "आपकी इस कृपा का कारण क्या है"?

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- "यह मेरी कृपा नहीं, बल्कि गाय माता की कृपा है। मैंने आपको गाय को प्रणाम करते हुए देख लिया था। मन में विचार आया कि ये भले लोग हैं जो गाय के प्रति श्रद्धा रखते हैं। अन्यथा, आजकल तो लोग गाय का मांस खाने की होड़ लगाते हैं। जब मैंने अपनी पत्नी को कहा कि दो गाड़ियां हमारे घर बाहर आकर खड़ी हुई हैं। उसमें बैठे लोगों ने हमारी गायों के सामने झुककर हाथ जोड़े हैं। उसे भी अच्छा लगा"। 

हमारी बातचीत चल ही रही थी कि उस किसान की पत्नी और घर की मालकिन बाहर ट्रे में चाय के कप लेकर निकलीं। कप से उठ रही वाष्प के साथ अदरक और इलायची की सुगंध भी बता रही थी कि यह चाय बहुत विशेष है। 

हम सबने उस गोसेवी किसान परिवार के आंगन में बैठकर चाय की चुस्कियां लीं। बाद में, जब हम जाने लगे तो संजय जी ने उन सज्जन को सौ रुपये देना चाहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। संजय जी ने घर की मालकिन को अपनी बहन मानते हुए उसको पैसे देने का प्रयास किया तो उसने भी कह दिया- "भला कोई बहन चाय के बदले अपने भाइयों से पैसे लेगी"। 

हम सबके लिए वह क्षण एक आत्मीय और मन को आनंदित करने वाला बन गया। यकीनन, भारत गांव में बसता है। गांव और गाय, हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। 

गो-माता की जय...