शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

समाज-राष्ट्र को समर्पित पत्रकारों से परिचित कराती है 'अनथक कलमयोद्धा'

चित्र में - गिरीश उपाध्याय (वरिष्ठ पत्रकार), जे. नन्दकुमार (राष्ट्रीय संयोजक, प्रज्ञा प्रवाह), बल्देव भाई शर्मा (अध्यक्ष, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास), राम पाल सिंह (मंत्री, लोक निर्माण विभाग, मध्यप्रदेश शासन), अशोक पाण्डेय (मध्य भारत प्रान्त सह संघचालक, आरएसएस)
 हम  सब जानते हैं कि विश्व संवाद केंद्र, भोपाल पत्रकारिता के क्षेत्र में भारतीय मूल्यों को लेकर सक्रिय है। विश्व संवाद केंद्र का प्रयास है कि पत्रकारिता में मूल्य बचे रहें। प्रबुद्ध वर्ग में चलने वाले विमर्शों को आधार माने तब पत्रकारों के दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता प्रतीत होती है। व्यावसायिक प्रतिस्पद्र्धा ने उनके मन में कुछ बातें बैठा दी हैं। आज विशेष जोर देकर पत्रकारों को यह सिखाया जा रहा है कि 'समाचार सबसे पहले' और 'समाचार किसी भी कीमत पर' ही किसी पत्रकार का धर्म है। परंतु, क्या प्रत्येक परिस्थिति में पत्रकार के लिए इस धर्म का निर्वहन आवश्यक है? एक प्रश्न यह भी कि क्या वास्तव में यही पत्रकार का धर्म है? इन दोनों प्रश्नों का विचार करते समय जरा हमें पत्रकारिता के पुरोधाओं के जीवन को देखना चाहिए। उनकी कलम से बहकर निकलने वाली पत्रकारिता की दिशा को समझना चाहिए।
          यदि हम पूरी निष्ठा के साथ कलमयोद्धाओं के पत्रकारीय जीवन का अध्ययन करेंगे तो हम पाएंगे कि एक पत्रकार के लिए उसका धर्म 'समाचार सबसे पहले' नहीं, अपितु 'राष्ट्र सबसे पहले' होना चाहिए। क्योंकि, हम सबने अनुभव किया है कि समाचार सबसे पहले के चक्कर में हम कई बार अपने समाज और राष्ट्र को हानि पहुंचा बैठते हैं। मुंबई के प्रसिद्ध ताज होटल पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान सबसे पहले और सबसे तेज की होड़ में हमने अपने दुश्मनों की सहायता की। हमारे मीडिया कवरेज को देखकर पाकिस्तान में बैठे आतंकियों के आकाओं ने उन्हें निर्देशित किया, जिसके कारण हमें बहुत अधिक जनहानि उठानी पड़ी। कारगिल युद्ध के समय सीधे प्रसारण पर भी आज प्रश्न उठते हैं। विश्लेषक मानते हैं कि उस समय भी हमारी दिग्भ्रमित पत्रकारिता का लाभ दुश्मनों ने उठाया। 
          अमेरिका में 9/11 का आतंकी हमला हम सबके ध्यान में आज भी है। आतंकियों ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की गगनचुंबी इमारत में यात्री विमान घुसेड़कर दुनिया को दहला दिया था। अमेरिका पर यह सबसे बड़ा हमला था। इस हमले की घटना के साथ हमें यह भी ध्यान आता है कि हमले के बाद अमेरिका में अफरा-तफरी और बर्बादी के समाचार किसी पत्रकार ने नहीं लिखे। वीभत्स चित्रों को किसी मीडिया ने नहीं दिखाया। अमेरिकी मीडिया के जरिए सारी दुनिया ने दो ही दृश्य देखे, पहला हवाई हमले का और दूसरा मृतकों को श्रद्धांजलि देने का। किंतु, वहीं सारी दुनिया ने उसी अमेरिकी मीडिया के जरिए मई-2011 के उस ऑपरेशन को जरूर देखा, जिसमें वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के जिम्मेदार ओसामा बिन लादेन को मौत के घाट उतारा गया। स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस ऑपरेशन को संचालित किया, यह बात भी अमेरिकी मीडिया ने पूरे गर्व से बताई। यह अंतर हमें समझना होगा। 
          पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यहाँ यह कहने का अभिप्राय कदापि नहीं है कि भारत का मीडिया अमेरिका के मीडिया से कम राष्ट्रभक्त है। स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका है। इतिहास के पृष्ठों पर उसका योगदान स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। किंतु, हमें अपने दिल को टटोलना होगा कि उन स्वर्णिम पृष्ठों को कब से हमने नहीं पलटा है? उनको पढ़ कर सीखने का अभ्यास कब से हमने छोड़ दिया है? इसके अलावा अनेक अवसर पर पत्रकारबंधु सबसे तेज के चक्कर में समाचार की प्रामाणिकता का परीक्षण भी नहीं करते हैं। इसका परिणाम कई बार निर्दोष व्यक्तियों, संस्थाओं और समाज को भुगतना पड़ता है। अनेक अवसरों पर मीडिया की रिपोर्टिंग से समाज का सौहार्द भी गड़बड़ाया है। एकतरफा और पक्षधर रिपोर्टिंग के कारण समाज को सच से दूर रखने का भी प्रयास आज कई पत्रकार बंधु करते हैं। 
          बहरहाल, इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही विश्व संवाद केंद्र, भोपाल ने अपने वार्षिक विशेषांक का विषय 'अनथक कलमयोद्धा' तय किया। इस विषय के चयन के पीछे हम सबके मार्गदर्शक एवं क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख श्री नरेन्द्र जी जैन की प्रेरणा थी। विश्व संवाद केन्द्र के न्यासी मंडल एवं हमसे संबद्ध प्रबुद्ध वर्ग ने 'अनथक कलमयोद्धाओं' के नाम सुझाए। उनके सुझाव के आधार पर इस विशेषांक में मध्यप्रदेश के ऐसे पत्रकारों पर आलेख शामिल किए गए हैं, जिन्होंने 1920 से 2000 तक के कालखण्ड में समाजहितैषी पत्रकारिता की। इनमें मामा माणिक चंद वाजपेयी, रामशंकर अग्निहोत्री, माखनलाल चतुर्वेदी, लाला बलदेव सिंह, माधवराव सर्पे, सिद्धनाथ माधव आगरकर, कन्हैया लाल वैद्य, भाई अब्दुल गनी, मिस्टर ताजुद्दीन, मास्टर बल्देव प्रसाद, ओमप्रकाश कुंद्रा, पंडित भगवतीधर वाजपेयी, बबन प्रसाद मिश्र, डॉ. ओम नागपाल, बनवारी लाल बजाज एवं काशीनाथ चतुर्वेदी जैसे नाम शामिल हैं। 
          हमारा मन्तव्य इतना ही है कि आज के पत्रकार पत्रकारिता के इन पुरोधाओं के जीवन दर्शन एवं उनकी कलम की दिशा से परिचित हों। उपरोक्त सभी प्रकार के प्रश्नों के उत्तर और पत्रकार के वास्तविक धर्म को इन कलमयोद्धाओं की पत्रकारिता में खोजने का प्रयास करें। निश्चित ही उत्तर मिलेंगे और पत्रकारिता के धर्म की सीख भी प्राप्त होगी। हमने यथासंभव प्रयास किया कि अधिक से अधिक कलमयोद्धाओं को इस विशेषांक में स्थान मिल सके, किंतु फिर भी अनेक महानुभाव छूट गए होंगे। सुधी पाठक हमें इस संबंध में ध्यान कराएंगे, ताकि भविष्य में ऐसे कमलकारों पर दूसरा विशेषांक भी तैयार किया जा सकेगा। ऐसे व्यक्तित्वों को समाज के सामने लाना समय की आवश्यकता है। उसी क्रम में एक छोटा-सा प्रयास विश्व संवाद केंद्र, भोपाल ने किया है। इस महत्वपूर्ण विशेषांक का संपादन करने की महती जिम्मेदारी का निर्वहन ऊर्जावान पत्रकार डॉ. मंयक चतुर्वेदी जी ने किया है। 

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