शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

अंतिम संस्कार


 'या र अखिल तेरे पास मैसेज आया क्या? समाजसेवी रूपेन्द्र गुप्ता की मां का निधन हो गया है। कल सुबह १० बजे शवयात्रा है।' सुनील शर्मा ने अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन के भीतर झांकते हुए कहा। 
         सब स्तब्ध रह गए। टीवी सेट के सीमित वोल्यूम के बावजूद न्यूज चैनल का वो दाड़ी और चोटी वाला एंकर जरूर चीख-चीखकर लोगों को चड्ढी-बनियान चोर गिरोह से सावधान कर रहा था। वरना तो दफ्तर के जिन कर्मचारियों के कानों तक सुनील की आवाज पहुंची, उनके सिर खामोशी से सुनील की ओर मुड़ गए। तमाम चेहरों ने प्रश्नवाचक चिह्न का आकार धारण कर लिया था। समाजसेवी रूपेन्द्र गुप्ता की मां की मृत्यु के समाचार पर जो सन्नाटा खिंच गया था, अमूमन ऐसा न्यू मीडिया चैनल के दफ्तर में दिखता नहीं था। कई लोगों को कुछ सूझ नहीं आ रहा था तो कई लोग कब, कैसे और कहां हुई रूपेन्द्र गुप्ता की मां की मौत, यह जानने के लिए सवाल उछालने ही वाले थे कि चार और साथियों के मोबाइल फोन पर मैसेज ट्यून की आवाज सुनाई दी। फिर चार-पांच और लोगों के मोबाइल फोन पर भी एसएमएस आया। थोड़ी ही देर में सभी के मोबाइल फोन के मैसेज इनबॉक्स में यही पहला संदेश था- रूपेन्द्र गुप्ता की मां की लंबी बीमारी की वजह से मृत्यु हो गई है। वे ७० वर्ष की थीं। कल सुबह १० बजे गुप्ता सदन से गोराघाट स्थित मुक्तिधाम के लिए शवयात्रा जाएगी। अब पूछने के लिए किसी के पास कोई सवाल नहीं था। हां, सब रूपेन्द्र गुप्ता के संबंध में अपनी-अपनी जानकारी एक-दूसरे से साझा करने की प्रक्रिया में लग गए। रूपेन्द्र गुप्ता शहर के बड़े व्यवसायी हैं। शहर के लगभग सभी पत्रकारों के साथ उनका उठना-बैठना है। शहर में समाजसेवी के रूप में भी उनकी पहचान है। उनका एनजीओ वरिष्ठ लोगों के हित में अच्छा काम कर रहा है। घर में पुरानी चीजों की तरह उपेक्षा के शिकार बुजुर्गों के मनोरंजन तक की चिंता भी उनका एनजीओ करता है। बुजुर्गों के सम्मेलन, हारी-बीमारी में मदद-देखभाल, शहर के आस-पास धार्मिक, ऐतिहासिक महत्व के स्थल के भ्रमण के लिए भी वरिष्ठ लोगों को ले जाने का उपक्रम उनका एनजीओ कर रहा है। अपनी बढ़ती लोकप्रियता के कारण वे पिछले काफी दिनों से राजनीति में भी खूब रुचि दिखा रहे हैं। कई लोग कहते हैं कि उपेन्द्र गुप्ता पंजा पार्टी से विधायक का चुनाव लडऩे की जुगाड़ लगा रहे हैं।
सीनियर कॉपी एडिटर अजय सिन्हा ने कहा - 'एक बार रूपेन्द्र गुप्ताजी से उनकी काफी लंबी बातचीत हुई थी। वे बेहद सुलझे हुए आदमी लगे। उन्हें बुजुर्गों की बेहद चिंता रहती है। वे कहते हैं, भौतिक जीवन का लुत्फ लेने के फेर में आजकल के बच्चे बुजुर्गों को बेसहारा छोड़कर अपनी अलग दुनिया बसा लेते हैं। नालायकों को इतना भी समझ नहीं आता कि बुजुर्गों का आश्रय कितना जरूरी है। अगर माता-पिता भी स्वकेंद्रित हो जाते तो क्या बच्चे आज जिस मुकाम पर हैं, वहां पहुंच सकते थे। अब मुझे ही लो। हम चार भाई हैं। चारों वेलसेटल्ड हैं। सबसे बड़ा यानी मैं, अच्छा खासा व्यापार है। मुझसे छोटे की प्रिंटिंग प्रेस बढिय़ा चल रही है। तीसरे नंबर का भाई सरकारी इंजीनियर हो गया है और सबसे छोटा भाई का तो प्राइवेट हॉस्पिटल है। उसकी पत्नी भी शहर की नामी डॉक्टर है। हमारे इस मुकाम के पीछे माता-पिता की मेहनत और त्याग है। तुमने देखा होगा, नए-नए माता-पिता बने महिला-पुरुष यह कहते हुए अकसर पाए जाते हैं कि देखो, अपने बच्चे के लिए अभी कितना कुछ करना पड़ रहा है हमें। अपने नन्हें के चक्कर में रातभर जागना पड़ता है। वह दिन में सो लेता है और रात को कई बार जागता है। इतना ही नहीं अभी तो सू-सू भी बिस्तर पर ही करता है। कितना ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं नन्हा गीले में न सो रहा हो। लेकिन, बड़ा होकर सब भूल जाएगा। अब अजय तुम ही बताओ, वो भला क्यों नहीं भूलेगा इन निपट गंवार लोगों को। इन्होंने कौन-से अपने माता-पिता को याद रखा है। आजकल के ज्यादातर युवा शादी के तत्काल बाद ही माता-पिता से अलग रहने लगते हैं। क्या है कि बेपरवाह सेक्स लाइफ में खलल पड़ता है, यदि घर में बुजुर्ग हों तो। फिजूलखर्जी और अनियमित दिनचर्या पर भी बुजुर्ग सलाह देते हैं, जो इन्हें महज टोका-टाकी लगता है। बुजुर्ग तो संयमित जीवन जीते हैं। सुबह पांच बजे ब्रह्म मुहूर्त में जाग जाते हैं। टहल भी आते हैं लेकिन तब तक भी हाईलाइफ की एडिक्ट हमारी युवा पीढ़ी बिस्तर में ही घुसी रहती है। बुजुर्गों का जल्दी जागना भी इन्हें रास नहीं आता।' 
'अब तो राजनीति में जाने का मन बना रहे हैं। उनके साथ लोग भी काफी आ गए हैं। चलो, अच्छा है कोई तो भला आदमी राजनीति में पहुंचे। वरना तो संसद और तमाम विधानसभाएं दुष्ट और बदमाश नेताओं से भरी पड़ी हैं।' अजय गुप्ता के संस्मरण पर कोई टिप्पणी आती इससे पहले ही क्राइम रिपोर्टर सुरेन्द्र ने सहज भाव में अपनी राय जाहिर की। 
'पिछले दिनों एक बुजुर्ग दंपति को सारी रात घर के बाहर काटनी पड़ी। हुआ यूं था कि यहीं विवेक विहार में विनोद चौपड़ा रहते हैं। उनकी उम्र होगी, यही कोई ६५ साल। स्टेट बैंक की नौकरी से रिटायर हैं। उनके पास बढिय़ा बंगला है। उनके इकलौते लड़के राहुल की हाल ही में धूमधाम से शादी हुई। श्रीमान चौपड़ा की पत्नी मंगला चौपड़ा ने अपनी खूबसूरत बहू का बड़े दुलार से घर में स्वागत किया। मेरा उनके घर आना-जाना है। मैंने हकीकत देखी है। मंगला जी और चौपड़ा जी कितना ही प्यार करते हों अपने बच्चों को लेकिन बच्चे बहुत ही नालायक हैं दोस्तो। ठीक से बात तक नहीं करते। बहू बाहर से जितनी गोरी है भीतर से उतनी की कलूटी। लड़का भी लल्लू है। एक दिन बहू और सास में किसी बात पर विवाद हो गया। उस दिन बहू और बेटे ने विनोद चौपड़ा जी और उनकी पत्नी को घर से बाहर निकाल दिया। कहा- जाओ किसी वृद्धाश्रम में जाकर बस जाओ, ताकि हम चैन से जी सकें। ठण्ड में रातभर बेचारे बूढ़े माता-पिता इधर-उधर भटकते रहे। थक-हार कर वापस लौटे। दरवाजा खट-खटाया लेकिन बहू-बेटे ने अनसुनी कर दी। बेचारे चौपड़ा दंपति रातभर दरवाजे के बाहर बैठे रहे। एक-दूसरे से टिककर थोड़ी-बहुत देर के लिए पलकें झपका लीं। सुबह दरवाजा खुला तो बहुत-सी हिदायतें देते हुए बहू ने दोनों को घर में घुसने दिया।'
सुरेन्द्र ने मार्मिक घटना का वर्णन जारी रखने से पहले एक क्षण के लिए सभी साथियों के चेहरों पर सरसरी नजरें दौड़ाई और बोला- 'जैसे ही मुझे यह बात मालूम हुई, मैंने रूपेन्द्र गुप्ता जी को सब हाल सुना दिया। रूपेन्द्र जी काफी संवेदनशील हो गए थे। उन्होंने तत्काल अपने एनजीओ के एक युवा को निर्देश दिए कि मेरी टीम को फोन और मैजेस करो, बुलाओ सबको यहां। जरा देखे इस नालायक राहुल को। इसके बाद वे बीस-पच्चीस वरिष्ठ नागरिकों को लेकर विनोद चौपड़ा जी के घर पहुंच गए। रविवार था तो सब घर पर ही मिल गए। राहुल, उसकी खूबसूरत पत्नी भी। चौपड़ा जी ने वरिष्ठ नागरिक मंडली का स्वागत किया। स्वयं फ्रिज से पानी की दो बॉटल और कुछ गिलास लेकर आए। सबको पानी पिलाया और पूछा कैसे आना हुआ आज। कहीं चलने का कार्यक्रम है क्या? मंडली के एक सदस्य ने कहा नहीं ऐसा कुछ नहीं है, बस आपका हाल-चाल जानने के लिए चले आए। रूपेन्द्र गुप्ता जी ने राहुल की तरफ इशारा किया और कड़क आवाज में उसे बोले- बच्चे घर से बाहर निकल लो। ये घर तुम्हारे बाप का है तुम्हारा नहीं। इसमें रहने का पहला हक विनोद चौपड़ा जी का है, तुम्हारा नहीं। शर्म नहीं आती तुम्हें अपने मां-बाप को घर से बाहर निकालने में।' 
'मेरे माता-पिता हैं। तुम क्यों आधी रोटी पर दाल लेने चले आए। हमारा परिवार कैसे भी रहे।' रूपेन्द्र जी की बातों से राहुल तिलमिला गया था। उसके बात करने के तरीके से यह साफ झलक रहा था। 
'अदब से बात किया करो राहुल। घर में तो मेरी रोज बेइज्जती करते हो। कम से कम सबके सामने तो मुझे जलील न करो।' चौपड़ा जी ने न जाने कितने दिन बाद राहुल को लताड़ लगाई होगी। रूपेन्द्र जी से राहुल का इस तरह बात करना चौपड़ा जी रास नहीं आया। 
इसके बाद सभी वरिष्ठ नागरिकों ने राहुल और उसकी पत्नी का समझाइश दी। समझाइश क्या चेतावनी दी कि आगे कभी अपने माता-पिता को परेशान किया तो हम सब कोर्ट जाएंगे और तुम लोग घर से बाहर तो जाओगे ही, जेल में भी जा सकते हो। 
सभी पत्रकार साथी बातचीत कर ही रहे थे कि इतने में सुनील शर्मा ने अपने स्मार्टफोन पर अंगुलियां घुमाते हुए उन्हें बताया - 'भाई लोगों फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग और गूगल प्लस सहित और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट पर रूपेन्द्र जी की मां की मृत्यु का समाचार प्रसारित हो गया है। अभी पंचायत स्थगित कर सब अपने-अपने काम में जुट जाएं। सुबह १० बजे चलेंगे मुक्तिधाम।'    
सुबह १०:३० बजे। गुप्ता सदन। बेहद ज्यादा भीड़। सुनील शर्मा और अखिल सिंह दोनों को लगा था कि उन्हें पहुंचने में देर हो गई। लेकिन, यहां तो अभी ठठरी बांधी जा रही है। शवयात्रा शुरू होने में कुछ वक्त बाकी है। सुनील और अखिल पत्रकार साथियों की मंडली की ओर बढ़ रहे थे कि तभी सामने से रूपेन्द्र जी के बहनोई साहब संजय माहेश्वरी चले आए। संजय माहेश्वरी से दोनों की अच्छी जान-पहचान थी। माहेश्वरी शहर ही नहीं प्रदेश के बड़े साहित्यकारों में शुमार होते हैं। बड़े मुंह फट हैं। सच उनके दिमाग और पेट में टिकता ही नहीं। जब तक बाहर न आ जाए, खदबदाता रहता है। सुनील और अखिल ने नमस्कार किया और रूपेन्द्र गुप्ताजी की मां के निधन पर संवेदना प्रकट की। 
'बड़े दु:ख की बात है, शहर के बुजुर्गों की चिंता करने वाले रूपेन्द्र जी के सिर से मां का साया हट गया।'
'अरे, दु:ख काहे का साहेब। यहां तो मां की मौत का भी अपनी पॉपुलरिटी बढ़ाने में इस्तेमाल किया जा रहा है। और आप हैं कि शोक संवेदना प्रकट कर रहे हो।' संजय जी ने तुनकते हुए कहा। 
'मतलब! क्या मतलब है आपका?' संजय जी के चेहरे के भाव और उनको इस तरह बात करते देख दोनों ने चौंककर एक साथ यह कहा।  
'मेरा मतलब तो कुछ नहीं है। मतलबी तो दुनिया हो गई है। सच जानो दोस्तो आज रूपेन्द्र की मां का अंतिम संस्कार नहीं होगा बल्कि रिश्तों का अंतिम संस्कार होगा। तुम समझोगे नहीं। पूरी कहानी नहीं पता ना तुम लोगों को। समाज में तो रूपेन्द्र का अच्छा-अच्छा चेहरा ही दिखता है न।' 
'आप कहना क्या चाहते हैं? सब साफ-साफ बताइए। तब तो कुछ समझ में आए।' सुनील ने मामले को समझने के लिए सीधे-सीधे संजय जी से पूछा। 
'दुनिया को सीख देते हैं कि माता-पिता की सेवा करो। खुद क्या करते हैं, जानते हो तुम। चार भाई हैं। चारों खूब कमाते हैं। चारों के पास बड़े घर हैं। लेकिन, मां-बाबूजी के लिए किसी भी घर में थोड़ी सी जगह नहीं है। चारों भाईयों ने माता-पिता को पुस्तैनी मकान में अकेले छोड़ रखा है। बुढिय़ा तो चल बसी। उसका जीवन तो सुधर गया। रोज का दु:ख था, बच्चे अपने साथ नहीं रखते। बेचारे बाबूजी का अब क्या होगा, मुझे तो यही चिंता सताए जा रही है। अकेले रह गए। अब पहाड़-से दिन और लम्बी रातें क्या दीवारों से बात करके काटेंगे? कौन सुनेगा उनका सुख-दु:ख? रूपेन्द्र की समाजसेवा भी दिखावे की है। सब ढकोसला है। लेकिन, मैंने जानबूझकर कभी इस मामले पर रूपेन्द्र की निंदा नहीं की। क्योंकि समाज को नहीं पता कि वह अपने माता-पिता को कैसे रखता है। समाज तो वृद्धों के लिए चलाए गए उसके अभियान से प्रेरणा पा रहा है। अच्छा है यह पहलू उजागर न हो, वरना समाज का विश्वास टूटेगा। भले ही वह स्वार्थवश यह अभियान चला रहा है लेकिन उसके कारण समाज का तो भला हो रहा है।' 
'लेकिन, दोस्तो रूपेन्द्र ने अब जो किया है उससे मेरा मन भर गया है। तुम दिखे तो लगा, मन को हल्का कर लिया जाए। रूपेन्द्र से घृणा करने लगोगे आप, जब मैं आपको बताऊंगा कि दोपहर में दो बजे मां का निधन होने के बाद भी कल क्यों अंतिम संस्कार नहीं किया गया। सिर्फ इसलिए कि कम समय में ज्यादा लोगों तक सूचना नहीं पहुंच सकेगी और अंतिम यात्रा में कम लोग आएंगे। लोग क्या कहेंगे, रूपेन्द्र की मां का अंतिम संस्कार है और श्मशान खाली दिख रहा है। दूसरे दिन शवयात्रा ले जाएंगे तो अखबार में खबर पढ़कर शहर के ज्यादा से ज्यादा लोग आएंगे। फेसबुक, ट्विटर और सोशल मीडिया पर भी तो सूचनाएं भेजी गईं। सब रूपेन्द्र का आइडिया था। ताकि शवयात्रा और श्मशान में लोगों का हुजूम दिखे।'
'ये भीड़ देख रहे हो तुम। इसी भीड़ के लिए रूपेन्द्र ने अंतिम संस्कार एक दिन टाल दिया।' घर के बाहर, गली में और मुख्य मार्ग तक तितरी-बितरी खड़ी भीड़ की ओर हाथ लहराते हुए संजय माहेश्वरी ने कहा। 
'मां के अंतिम संस्कार के बहाने रूपेन्द्र पार्टी के आलाकमान को अपनी लोकप्रियता दिखाना चाहता है। ताकि आने वाले विधानसभा चुनाव में टिकट मिल सके। घटिया है यह राजनीति। घटिया है यह सोच। संस्कारों का अंतिम संस्कार है।' इतना कहकर संजय खामोश हो गया। 
         उधर, चार लोगों ने शव को कांधे उठा लिया। रूपेन्द्र जी हांडी थामे आगे-आगे चले जा रहे हैं। श्मशान घाट की ओर, अंतिम संस्कार के लिए।
- साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'साहित्य परिक्रमा' में प्रकाशित कहानी । 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बधाई ..। वैसे कहानी फेसबुक पर ही पढली थी ।

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  2. वाकई, बहुत ही बेहतरीन, जबरदस्त मसला उठाया ह,ै इस कहानी के माध्यम से..। अक्सर शादी-पार्टियाँ लोकप्रियता, शेखी बघारने के लिए की जातीं थी लेकिन ऐसी संस्कृति आज कहां ले जा रही है देश व समाज को..सोचनीय है। आप ध्यानाकर्षित करने के लिए बधाई के पात्र हैं।
    अंत में, आखिर आपने इसे किससे जोडक़र लिखा है।

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  3. पब्लिक लाईफ़ Vs पर्सनल लाईफ़..
    सच्चाई यही है आजकल.

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