सोमवार, 11 मार्च 2013

समान अधिकार और सम्मान चाहिए, विशेषाधिकार नहीं

 बैं क में भारी भीड़ थी। लोग घंटों से लाइन में लगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। तभी कॉलेज की एक लड़की आती है। उम्र २०-२२ साल। तंग कपड़े पहने हुए और आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ाए हुए थी। भीड़ देखकर परेशान थी। लेडीज फर्स्ट जुमले का फायदा उठाने के लिए लाइन खड़ी न होकर काउंटर पर आगे चली गई। तभी एक युवक ने उसे आवाज दी- ओ दोस्त लाइन में आ जाओ। हम भी बहुत देर से यहां खड़े हैं। क्या हो जाएगा? यदि मैं तुमसे पहले ड्राफ्ट बना लूंगी तो। अकेली ही तो हूं, बस पांच मिनट का ही तो अंतर आएगा। अब दूसरा दृश्य देखिए रेलवे स्टेशन टिकट के लिए लंबी कतार। ठीक बैंक वाली लड़की जैसी ही टिप-टॉप लड़की यहां भी आती है। आगे की ओर खड़े लोगों से अपना टिकट लेने का निवेदन करती है। इस पर एक युवक ने उससे कहा - अरे बहन, तुम खुद ही पहले टिकट ले लो। कहां लड़कों के साथ लाइन में फंसोगी। लकड़ी मुस्काती हुई आगे जाती है और टिकट ले लेती है। एक और दृश्य देखिए। मल्टीप्लेक्स सिनेमा का टिकट काउंटर। टिकट लेने के लिए लंबी लाइन लगी है। यहां भी महिलाओं की अलग से लाइन नहीं है। वह दो पल के लिए खड़ी होकर सोच ही रही थी कि टिकट ले या नहीं। इसके बाद वह लाइन में लगने लगी। लाइन में खड़े एक-दो लड़कों ने कहा- अरे आप कहां लाइन में लग रही हो। आप तो लड़की हो, आगे चली जाओ। वह पहले टिकट मिल जाएगा। यहां लड़की का जवाब गौर करने लायक था। उसने कहा- मुझे जरूरत नहीं। लड़की होने के कोई विशेषाधिकार नहीं चाहिए। जितने विशेषाधिकार देने थे, ऊपर वाले ने दे दिए हैं। धरती पर तो बस सम्मान और समान अधिकार चाहिए।
    तीनों लड़कियों में आखिरी वाली लड़की ने पते की बात कही। विशेषाधिकार तो कमजोर होने की निशानी है। स्त्रियां सदैव से यह सिद्ध करती आई हैं कि कम से कम वे पुरुषों के मुकाबले किसी काम में कमजोर तो नहीं ही है। बल्कि की आगे ही हैं। व्यक्तिगत गुणों के मुकाबले भी पुरुष उनके सामने कहीं नहीं टिकता। अब देखें तो नारी आंदोलन के नाम पर हो उल्टा रहा है।  स्त्री के लिए विशेषाधिकार की मांग की जा रही है। जिसकी उसे कतई जरूरत नहीं है। उसके जीवन में कमी है तो समान अधिकार की। सम्मान की। ये उसे मिल जाए तो फिर किसी विशेषाधिकार की उसे जरूरत नहीं रह जाती। बलात्कार के खिलाफ दिल्ली में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ। कानून में भी फेरबदल किया गया। लेकिन, क्या इससे बलात्कार की घटनाओं में कमी आई। जवाब है नहीं। लड़कियों को उसी रफ्तार से रौंदा जा रहा है। महानगर से लेकर कस्बे तक एक जैसे हालात हैं। सवाल उठता है कि तो कैसे बदलाव आएगा? क्या कानूनों को कड़ा नहीं किया जाना चाहिए? जरूर आएगा बदलाव। कानून भी कड़े होने चाहिए सभी तरह के अपराधियों के लिए। यह अलग बात है कि बदलते दौर में कड़े कानून स्त्रियों के सहायक तो हो सकते हैं लेकिन उसके प्रति समाज की सोच नहीं बदल सकते। स्त्री को देखने, सोचने और समझने का नजरिया बदलना होगा। इसकी शुरुआत किसी कानून के बनने से नहीं हो सकती। मन बनाना होगा। समाज यानी स्त्री-पुरुष दोनों को खुद से करनी होगी शुरुआत। स्त्री को कदम-कदम पर क्षणिक लाभ लेने के लिए खुद को कमजोर साबित करने से बचना होगा। उसे लेडीज फर्स्ट के जुमले को छोडऩा होगा। मैं नारी हूं इसलिए मेरी मदद कीजिए, यह भी नहीं चलने देना होगा। पुरुष को भी यह खयाल दिल से निकालना होगा कि नारी को उसकी जरूरत है। देखने में आता है कि कोई लड़का गाड़ी धकेलकर ले जा रहा है तो कोई उससे नहीं पूछता कि क्या दिक्कत है? मैं क्या मदद कर सकता हूं? लेकिन, स्थिति इसके उलट हो यानी जब कोई लड़की गाड़ी धकेलकर ले जा रही हो तो राह चलते सौ लोग रुककर उससे पूछते हैं, क्या हुआ? कोई मदद तो नहीं चाहिए? पुरुषों को हर काम में लड़कियों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाने की मानसिकता से भी पीछा छुड़ाना होगा। इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। अपनी बहन-बेटी को स्कूल-कॉलेज छोडऩे जाने की बजाय उसे स्वयं जाने दिया जाए। घर में बेटे के समान ही बेटी को भी पढ़ाई का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए। उसे सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ाना चाहिए कि ब्याह करने में दिक्कत न आए। उसे अच्छा नौकरीपेशा वर मिल सके। जिस तरह लड़के को अफसर बनाने के लिए पढ़ाई पर पैसा खर्च किया जाता है वैसी ही बिटिया को भी अफसर बनाने का सपना देखना चाहिए। घर की संपत्ति में भी पुत्र के बराबर पुत्री को हक देना चाहिए। इस मामले में अभी समाज बहुत रूढि़ है। घर की सबसे लाड़ली सदस्य से पिता, मां और भाई भी उस समय खपा हो जाते हैं, जब वह शादी के बाद पैतिृक संपत्ति में से अपना हिस्सा मांग ले। इस वक्त घरवालों का एक ही कहना होता है कि दहेज तो दे दिया, अब क्या भाइयों का हिस्सा भी चाहिए। खून के रिश्ते बिगडऩे से बचाने के लिए घर की बेटी छोटी-मोटी नौकरी करके गुजारा कर लेती है लेकिन किसी भी आपात स्थिति में वह पिता की संपत्ति में से हिस्सा नहीं मांगती। यहां समानता लाने के लिए काफी प्रयास करने होंगे। असमानता और विभेद की लकीर घर में बेटा और बेटी को दी जाने वाली अलग-अलग नैतिक शिक्षा से भी बनती है। बेटे के लिए भरपूर आजादी। बेटी को ये नहीं करना चाहिए, वो नहीं करना चाहिए, तमाम बंदिशें। जबकि नैतिकता और मर्यादा का पाठ लड़की के साथ-साथ लड़कों को भी पढ़ाया जाए तो ठीक बनेगा आने वाला समाज।
    दिक्कत कहां है? क्यों तमाम प्रयास के बावजूद हम वहीं के वहीं खड़े हैं? इसके लिए हम सबके साथ-साथ बहुत हद तक नारी को आधुनिक बनाने के नाम पर चल रहे तमाम नारी आंदोलन भी जिम्मेदार हैं। मशहूर नारीवादी चिंतक जर्मेन ग्रीयर का कथन याद आता है कि नारीवादी आंदोलनों ने भारतीय नारी को बस तीन चीजें दी हैं- लिपस्टिक, हाईहील सैंडल और ब्रा। हम सबकी नजर में भी आधुनिक स्त्री की छवि लाली-पाउडर पोते, स्टाइलिश बाल कटवाए और जींस-टीशर्ट पहनने वाली लड़की की है। इतना ही नहीं नारीवादी आंदोलनों से जुड़े लोग नारी की आजादी के नाम पर सिर्फ यौनिक आजादी की ही प्रमुखता से चर्चा करते हैं। जिसका खामियाजा स्त्री को ही उठाना पड़ रहा है। यौनिक आजादी की आड़ में बाजार ने उसे अपना गुलाम बना लिया है। बाजार ने आधुनिक नारी का समूचा व्यक्तित्व उसके शरीर पर केन्द्रित कर दिया है। नारी देह दिखाकर साबुन से लेकर सीमेंट तक बेचा जा रहा है। बाजार अपने मतलब के लिए नारी देह से सारे लिबास नोंच लेना चाहता है।
    बाजार और नारीवादी आंदोलन के नाम पर आए भटकाव से तो स्वत: नारी को ही बचना होगा। उसे तय करना चाहिए कि उसकी पहचान कैसे हो? उसे जरूरत नहीं पुरुषों की नजरों में सुंदर दिखने की। उसे ही तय करना होगा कि बाजार की ओर से सुझाए कपड़े उसे पहनने हैं या फिर देह और देश-काल के अनुरूप। उसे जरूरत नहीं किसी का सामान बेचने के लिए अपना शरीर बेचने की। उसे घर से लेकर बाजार तक स्वयं को मजबूत साबित करना होगा। कहीं भी अगर पुरुष उसे कमजोर समझ कर आगे जाने का अवसर दे या दया भाव दिखाए तो स्त्री को ताकत के साथ उसका प्रतिरोध करना चाहिए। बराबर ताकत वाले का सब सम्मान करते हैं।

18 टिप्‍पणियां:

  1. sahamat hu aapki baat se aur is post se bhi.striyon ko kisi visheshdhikar ki jarurat nahi hai bas samaan adhikar de diye jae.devi banakar ya paav ki jooti samajhkar dono hi stithi me kaam nahi chalega.behtar hai samanta ka vyavhaar ho.

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  2. क्या लिखूँ यहाँ ये ही सोच नहीं पा रही हूँ ...पर इतना जानती हूँ की आपका लेख १००% सत्य पर आधारित है ....आज के वक्त में सही मायने में ये ही सोच और ऐसी ही नारी बन के रह गई है (सिर्फ और सिर्फ बाजारवाद )उसकी अपनी अहमियत आधुनिक आवरण में खो गई है और इसका विरोध भी नहीं हो रहा ..

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  3. बहुत बढ़िया विश्लेषण-
    सटीक उदहारण-
    तर्कों में दम-
    शुभकामनायें-

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  4. सहमत ... उस पर भरोसा करना सीखना ही होगा ...

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  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  6. sahi keh rahe hain lokendra ji........ hak mangne se nahi milta use kai bar chhinna padta hai...meri najar mai yahi ho sakta hai samasya ka samadhan ki ab upkar nahi hak chahiye apna.de sakte ho to do nahi to hum le lenge kisi bhi hal mai

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  7. सिद्ध होता है कि मल्टीप्लेक्स में जाकर लोग लुगाईयां पते की बात करते हैं :)

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  8. नारीवादी सोच की दिशा सही रहेगी तो ही सार्थक सिद्ध होगी..... सधा हुआ लेख

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  9. विशेष अधिकार नहीं , समान अधिकार और वह भी सम्मान के साथ !
    सही !

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  11. बाजार बाद ने नारी को बिकाऊ बना दिया ,आप भी मेरे ब्लोग्स का अनुशरण करें ,ख़ुशी होगी
    latest postअहम् का गुलाम (भाग तीन )
    latest postमहाशिव रात्रि

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  12. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें.

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  13. लड़कियों को आगे बढाने के लिए क्या क्या किया जाना चाहिए उससे सहमत , किन्तु समाज में आधुनिक लड़की के प्रति लोगो की क्या गलतफहमी है उस को देखिये ,

    @ आंखों पर धूप का चश्मा "चढ़ाए" हुए

    ये आप ने लिखा है शब्द बहुत छोटा है सामान्य सी बात ही लिखी है , हो सकता है आप ने लेख को चटपटा बनाने भर के लिए ही लिख दिया है किन्तु आप ने आधुनिक लड़की का एक गलत रूप दिखाने का प्रयास किया है सवाल ये की क्या घुप का चश्मा लगाना आधुनिकता है क्या लड़कीयो को ये नहीं लगाना चाहिए क्या ये फैशन की निशानी है , ज्यादातर लोग लड़कियों को लेकर ऐसी ही सोच रखते है । क्या किसी लडके की आधुनिकता का बयान करना हुआ तो ये शब्द लिखे जायेंगे । आप ये न सोचे की मै एक छोटी सी बात को लेकर बाढा चढ़ा रही हूँ मै बस ये बताने का प्रयास कर रही हूँ की कैसे हम सभी में ( आप में और मुझ में भी ) लड़कियों को लेकर ऐसे छोटे छोटे कितनी ही भ्रान्तिया फैली है , जो हम मन में रखते है और हमें पता ही नहीं चलती है की ऐसी बातो से हम लड़कियों और लड़को में फर्क कर रहे है , धुप से बचने के लिए किये गए उपाय में भी हम कुछ और देख रहे है , माडलिंग और बाजारवाद का असर सिर्फ लड़कियों के बदन तक नहीं है ये लड़को के भी कपडे उतार रहा है किन्तु चढ़ा हम बस लड़कियों के कपड़ो की ही करते है कभी लड़को के फैशन सेन्स और कम होते कपड़ो की बात नहीं करते है ।

    लड़किया कोई भी विशेषाधिकार नहीं चाहती है , यहाँ मुंबई में आइये आप को कभी भी लड़किया ट्रेन बस किसी भी टिकट की लाईन में आगे नहीं जाती है क्योकि उन्हें लाईन में खड़े होने पर पीछे से किसी पुरुष के धक्के और बदमीजी का डर नहीं होता है , केवल छोटे बच्चो वाली अकेली माँ को ये सुविधा सभी लोग अपनी तरफ से देते है वो भी जब बहुत भीड़ हो तब । बैंको में तो नंबर मिलता है अपने नंबर से पहले कोई जा ही नहीं सकता है ।

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    उत्तर
    1. अंशुमाला जी मैंने नहीं कहा कि धूप से बचने के लिए आँखों पर चश्मा लगाना किसी लड़की के लिए गलत है... न ही मैंने इसे आधुनिकता की निशानी बताया, दरअसल जो मुझे दिख वह मैंने लिखा है अब वो लड़की आधुनिक थी या पिछड़ी मुझे नहीं पता. वैसे भी दिखने से आधुनिक मैं किसी को मानता नहीं विचारों से आधुनिक और पिछड़ा मानता हूँ. और हाँ लड़के के सन्दर्भ में लिखना होगा तो लिखूंगा वैसा ही जैसा वो होगा. इधर मध्यप्रदेश में तो अभी भी सब जगह लाइन ही लगती है चाहे वो बैंक ही क्यों न हो...
      अच्छा लगा अपने अपना पक्ष साफगोई से रखा. आपके विचार का स्वागत है.

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