मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

'बयान वापस लिए' कहानी जारी है...

अन्ना हजारे ने समेटे नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार की तारीफ के चंद लफ्ज, केन्द्र की यूपीए नीत सरकार के सामने भी समझौतावादी मुद्रा में
 लौ ह-सा दिखता वो वृद्ध पुरुष धीमे-धीमे पिघलने लगा है। आलोचना की गर्मी से या किन्ही और कारणों से... निश्चिततौर पर आलोचना की गर्मी से यह संभव नहीं। महाराष्ट्र के एक गांव रालेगन सिद्धि का यह जनयोद्धा दिल्ली आकर महान से महामानव, अन्ना हजारे से छोटा गांधी और भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए आमजन का सूरज बन गया था। जब अन्ना ने दिल्ली का रण संभाला था, उसी दिन मैंने सोचा था कुछ न कुछ तो जरूर होगा, क्योंकि यह आदमी विजयपथ पर निकलता है तो न रुकता है, न थकता है और न झुकता है। हुआ भी यही, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ इस जंग में जंतर-मंतर के रणक्षेत्र से सचिवालय में हुई संयुक्त कमेटी की पहली बैठक तक जो हुआ उससे मैं अचरज में हूं। चट्टान सा दिखने वाला पुरुष लगातार समझौतावादी होता जा रहा है। धीमे-धीमे  वे उन बातों को पीछे छोड़ते चले जा रहे हैं जिन पर जनता का समर्थन उन्हें मिला था। पहले कमेटी के अध्यक्ष पद पर समझौता, फिर शनिवार को बैठक में मसौदे पर समझौता। रविवार को तो हद हो गई उन्होंने संसद को सर्वोपरि बताते हुए कह दिया कि यदि प्रस्तावित बिल को संसद रिजेक्ट भी कर दे तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं। हालांकि मैं भी संसद को ही सर्वोपरि मानता हूं, लेकिन संसद के हिसाब से ही चलना था तो फिर इतना तामझाम क्यों फैलाया, क्यों लोगों की भावनाओं को उद्वेलित किया? क्यों लोगों का मजमा लगवाया? क्यों फोकट में अग्निवेश जैसे माओवादी और नक्सलियों के समर्थक को मंच साझा करने दिया? क्यों बेवजह प्रोफेसनल एनजीओ संचालकों को हीरो बनवा दिया? सबसे बड़ा सवाल आखिर क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा रामदेव के आंदोलन को छोटा साबित करने की कोशिश की गई? क्यों घोटालों के आरोपों से घिरी कांग्रेस नीत यूपीए सरकार से लोगों का ध्यान भटकाया? बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब भी अन्ना हजारे को ही देने पड़ेंगे। वे इन सवालों के जवाब दिए बिना अपने गांव रालेगन सिद्धि वापस नहीं लौट सकते।
    खैर, इसी दौरान अन्ना ने गुजरात के विकास प्रतीक मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार को जातिगत राजनीति से उबारने वाले नीतीश कुमार की तारीफ में चंद लफ्ज बयां किए थे। एक तो अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंक कर भ्रष्ट नेताओं  ने निशाने पर पहले ही चढ़ गए थे। ऊपर से मोदी और नीतीश की तारीफ कर बर के छत्ते में हाथ दे मारा। नेताओं के साथ-साथ तथाकथित सेक्यूलरों की जमात भी उनके पीछे पड़ गई। उनके अपने भी विरोधियों जैसे बयान जारी करने लगे। नरेन्द्र मोदी ने इस पर चिट्ठी लिखते हुए अन्ना को आगाह किया कि अब आपका का तीव्र विरोध होगा, क्योंकि आपने मेरी तारीफ कर दी है। मेरे धुर विरोधी और अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाले सेक्यूलर आपका कुर्ता खीचेंगे। आखिर में मोदी की शंका सत्य सिद्ध हुई। अन्ना हजारे पर लगातार भड़ास निकाली जाने लगी। आखिर उन्होंने अकरणीय कार्य (मोदी की तारीफ) जो कर दिया था। इसके बाद चर्चाओं का केन्द्र बिन्दु बदल गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ और जन लोकपाल विधेयक को पारित कराने के लिए अन्ना की आगे की रणनीति क्या होगी? इस पर बहुत ही कम बात होने लगी। बात हो रही थी तो इस पर कि क्या अन्ना हिन्दूवादी मानसिकता के हैं? क्या हजारे की विचारधारा हिन्दूवादी है? क्या अन्ना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता हैं या फिर उसके किसी अनुसांगिक संगठन के। इन चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया। यह सब चल ही रहा था कि इसी बीच फिर वही कहानी दोहराई गई। कहानी गुजरात के प्रतीक पुरुष नरेन्द्र मोदी के बारे में जो भी शब्द कहे उन्हें वापस लेने की। मोदी की तारीफ से आलोचना के शिकार बने अन्ना ने मोदी की तारीफ में कहे तमाम लफ्जों को समेटना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि मोदी के आलोचकों के द्वारा मोदी पर लगाए गए आरोपों में सच्चाई है तो मैं अपना बयान वापस लेता हूं। उन्होंने यह भी कहा कि  मोदी और गुजरात के अच्छे कामों की तारीफ के बाद मुझे कई ई-मेल और पत्र आए। उनमें कहा गया कि गुजरात में कोई विकास नहीं हुआ है। मुझे नहीं मालूम कि इसमें सच्चाई क्या है, लेकिन अगर सच्चाई है तो मैं अपने बयान वापस लेता हूं। सामान्यतौर पर कोई भी साधारण आदमी अन्ना की इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता कि उन्हें इस बात का इल्म न होगा कि गुजरात और बिहार में विकास कार्य हुए हैं या नहीं। इस बात पर भी कोई यकीन नहीं करेगा कि अन्ना बिना जानकारी के कोई बयान दे सकते हैं। तो क्या इसके पीछे विरोधियों का लगातार विरोधी प्रचार-प्रसार एक कारण हो सकता है? जो भी हो एक बार फिर नरेन्द्र मोदी की तारीफ में प्रस्तुत फिल्म का दि एण्ड वही निकला... मैं अपने बयान वापस लेता हूं।
    नरेन्द्र मोदी के संदर्भ में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी कई लोग उनकी तारीफ करने के बाद अपने बयान वापस ले चुके हैं। प्रसिद्ध इस्लामिक संस्था दारुल उलूम देवबंद के नवनियुक्त कुलपति मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी ने भी पहले तो नरेन्द्र मोदी की उनके द्वारा गुजरात में कराए गए विकास कार्यों के लिए तारीफ की। इसके बाद तो कट्टरपंथी मुल्ला और सेक्यूलर जमात हाथ-पैर धोकर उनके पीछे ही पड़ गई। आखिर में मौलाना वस्तानवी को पीछे हटना पड़ा और उन्होंने भी मोदी की तारीफ में कहे शब्द वापस ले लिए। फिर कहानी में नया किरदार आया, भारतीय सेना में मेजर जनरल आईएस सिंघा। मेजर जनरल सिंघा ने अहमदाबाद में 'सेना को जानो' प्रदशनी के उद्घाटन भाषण के दौरान मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि मोदी में सेना का कमाण्डर बनने के सभी गुण हैं। मोदी की प्रशंसा मेजर जनरल साहब को महंगी पड़ गई। सेना के उच्चाधिकारियों ने उन्हें तलब कर लिया। वहीं माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद एपी अब्दुला कुट्टी को तो मोदी की प्रशंसा करने पर पार्टी से निष्कासन झेलना पड़ा। यह तो होना ही था, क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी के लिए तो नरेन्द्र मोदी वैसे भी राजनीतिक अछूत हैं। उनकी तारीफ करने पर निश्चित ही अब्दुला कुट्टी साहब अशुद्ध हो गए होंगे, तभी तो पार्टी ने उनसे कुट्टी कर ली, उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। गुजरात का ब्रांड एंबेसेडर बनने पर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की भी खूब किरकिरी हुई। दशों दिशाओं से एक ही आवाज आ रही थी अमिताभ को गुजरात का ब्रांड एंबेसेडर  नहीं बनना चाहिए। लेकिन अमिताभ बच्चन ने अपने कदम वापस नहीं लिए, पैसा इसके पीछे का एक कारण हो सकता है। खैर जो भी हुआ, इस मुद्दे पर अमिताभ पर कीचड़ तो खूब उछाली ही गई थी। 
         हाल ही 'बयान वापस लिए' नामक कहानी में नए किरदार की एंट्री हुई है। लेखन के क्षेत्र में खासा नाम कमाने वाले चेतन भगत ने उनकी प्रशंसा करने की जुर्रत की है। चेतन ने कहा कि नरेन्द्र मोदी को राजनीति के राष्ट्रीय मंच पर आकर कमान सम्भालनी चाहिए। वे अच्छे वक्ता हैं, अच्छे नेता हैं। मोदी ने चेतन को भी चेता दिया है कि सावधान रहना, अब तुम पर मेरे विरोधी निशाना साधेंगे। अब देखना बाकी है कि इस कहानी का अंत किस तरफ जाता है...

15 टिप्‍पणियां:

  1. एकदम सही विश्लेषण ! भ्रष्ट भारी पड़ रहे है !

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  2. "....हालांकि मैं भी संसद को ही सर्वोपरि मानता हूं, लेकिन संसद के हिसाब से ही चलना था तो फिर इतना तामझाम क्यों फैलाया, क्यों लोगों की भावनाओं को उद्वेलित किया? क्यों लोगों का मजमा लगवाया? क्यों फोकट में अग्निवेश जैसे माओवादी और नक्सलियों के समर्थक को मंच साझा करने दिया? क्यों बेवजह प्रोफेसनल एनजीओ संचालकों को हीरो बनवा दिया? सबसे बड़ा सवाल आखिर क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा रामदेव के आंदोलन को छोटा साबित करने की कोशिश की गई?"

    ये वो पंक्तियाँ है जो है तो हर एक भारतीय के मन में पर निकली है आपकी कलम से...

    कुंवर जी,

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  3. सही कहा भाई आपने| बात तो यही है न कि कांग्रेस को बाबा रामदेव से खतरा है न कि अन्ना से| बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को कांग्रेस ने अन्ना हजारे तक सीमित कर दिया| जनता को भी यही लगने कि जन लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार पर रोक लग जाएगी और वह भी अब शांत है| कुछ तो वजह रही है कि मीडिया ने भी इस आन्दोलन को बेहतरीन कवरेज दिया जबकि बाबा रामदेव की रैली का प्रसारण आस्था चैनल को भी नहीं करने दिया|
    व्यक्तिगत रूप से अन्ना से कोई शिकायत नहीं है, किन्तु बात यह समझ नहीं आ रही कि अन्ना इतने ढीले क्यों पद रहे हैं? कहीं यह राजनीति एक रहस्य बनकर न रह जाए|

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  4. kay baatau yaar..... jisse se bhi ummid karte he.... wahi dokha de jata he...

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  5. इंजीनियर दिवस दिनेश गौर जी आपकी बात से सहमत हूं। मैं भी यही मानता हूं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा रामदेव का आंदोलन इस आंदोलन से कहीं अधिक गहरा और व्यापक है। उसका असर अधिक होगा। फिर भी कहीं न कहीं अन्ना जी के ढुलमुल रवैए से अच्छा संदेश नहीं जा रहा है।

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  6. आपकी बात से सहमत हूँ .. किसी दबाव में आकर अन्ना को ये सब करना पड़ा होगा ... पर फिर भी मेरा मानना है अगर अन्ना का अभियान सफल होता है तो ये सब बातें इतना महत्व नही रखतीं ... वैसे तो खुर बी जे पी भी मोदी के . खड़ी दिखाई नही देती ...

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  7. संसद के हिसाब से ही चलना था तो फिर इतना तामझाम क्यों फैलाया, क्यों लोगों की भावनाओं को उद्वेलित किया? क्यों लोगों का मजमा लगवाया? क्यों फोकट में अग्निवेश जैसे माओवादी और नक्सलियों के समर्थक को मंच साझा करने दिया? क्यों बेवजह प्रोफेसनल एनजीओ संचालकों को हीरो बनवा दिया? सबसे बड़ा सवाल आखिर क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा रामदेव के आंदोलन को छोटा साबित करने की कोशिश की गई?

    सही सवाल उठाये हैं..... इस देश की जनता को गुमराह करने की कहानी न बन यह आन्दोलन भी .......

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  8. .

    नरेंद्र मोदी किसी प्रशंसा के मोहताज नहीं । लोग ब्यान दें या फिर वापस ले लें ,उनका प्रभुत्व अटल है।

    कोई भी अच्छा काम करने के लिए , बहुत strategy की आवश्यकता होती है । दुश्मन की चालों को सोचकर पहले से ही उसका निदान रखना चाहिए। अच्छे कार्यों में लोग ईर्ष्यावश विघ्न उत्पन्न करते ही हैं। इसलिए भ्रष्टाचारियों के खिलाफ solid निति अपनानी चाहिए।

    "शठे शाठ्ये समाचरेत"

    बेहतरीन आलेख के लिए साधुवाद।

    .

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  9. आपने बहुत सी विचारणीय बातों की तरफ ध्यान आकर्षित किया है .....आपका आभार

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  10. आदरणीय लोकेंदर सिंह राजपूत जी
    आपका आभार मेरे ब्लॉग का अनुसरण करने के लिए ....आशा है आपका मार्गदर्शन यूँ ही अनवरत मिलता रहेगा ....आपका शुक्रिया ..!

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  11. दोस्त, इस देश में आप चाहे कितने ही बड़े भ्रष्टाचारी, दुराचारी या निकम्मे-कमीने हो, अगर आप सेकुलर (पहले नेहरू द्वारा और अब मुल्ला-मिशनरी द्वारा परिभाषित सेकुलरिज्म) हो तो आपके सात खून माफ़ हैं. दूसरी तरफ आप कितने ही ईमानदार, सच्चे और कर्मठ हो लेकिन सेकुलर (हिन्दू-द्वेषी) नहीं हो तो आपकी कुछ भी पूछ नहीं है.
    इन सेकुलरो के दिमाग को पढ़कर घिन्न आती है. लेकिन इनका कमीनापन इस हद तक फ़ैल गया है कि यह सिर्फ राजनीति में ही नहीं, बल्कि मुख्य धारा के मीडिया से लेकर साहित्य, NGO कैंसर की तरह फ़ैल गया है और आम जनमानस को गुमराह करने की स्थिती में है. अब तो न्यायालय को भी दूषित-प्रभावित करने के सेकुलर कारनामे जारी हैं.
    इस देश में अगर आप सेकुलर हो, तो सब सवालों से ऊपर हो जाते हैं.

    धारदार लेखन के लिए धन्यवाद. प्लीज इस धार को बनाए रखे. क्योंकि आपके जैसा हटाकर लिखने वाले अब दुर्लभ हो गए हैं.

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  12. बहुत दिन बाद एक अच्छा लेख मिला पढ़ने को आप को बंधाई लोकेन्द्र जी।
    कभी हमारे ब्लॉग पर दस्तखत करे हमे अच्छा लागेगा

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  13. एकदम सही विश्लेषण| भ्रष्ट भारी पड़ रहे है|

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