शनिवार, 18 दिसंबर 2010

मेरी कविता छपी स्वदेश में

 भी पिछले पखवाड़े मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। प्रसन्नता का कारण था स्वदेश का दीपावली विशेषांक हाथों में आना। मैं ही क्या शहर के अधिकतर पत्रकार स्वदेश को पत्रकारिता की पाठशाला मानता हूं। शहर से लेकर राष्ट्रीय स्तर के कई दिग्गज पत्रकार स्वदेश ने दिए हैं। मेरा स्वदेश से विशेष लगाव इसलिए है कि यहीं मैंने पत्रकारिता का कखग सीखा। स्वदेश की परंपरा रही है दीपावली विशेषांक निकालने की। यूं तो इस बार का दीपावली विशेषांक वाकई काबिले तारीफ है। शहर में स्वदेश के दीपावली विशेषांक की मांग उसके पंचाग के कारण भी होती है। इसका पंचाग (राशिफल) शहर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य ब्रजेश श्रीवास्तव तैयार करते हैं। मेरे लिए तो और भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि मेरी एक कविता 'जब से शहर आया हूं...' को इसमें स्थान मिला। अब वह कविता आपके समझ प्रस्तुत है।
जब से शहर आया हूं........
जब से शहर आया हूं
हरी साड़ी में नहीं देखा धरती को
सीमेंट-कांक्रीट में लिपटी है
जींस-पेंट में इठलाती नवयौवन हो जैसे
धानी चूनर में शर्माते,
बलखाते नहीं देखा धरती को
जब से शहर आया हूं।
गांव में ऊंचे पहाड़ से
दूर तलक हरे लिबास में दिखती वसुन्धरा
शहर में, आसमान का सीना चीरती इमारत से
हर ओर डामर की बेढिय़ों में कैद
बेबस, दुखियारी देखा धरती को
हंसती-फूल बरसाती नहीं देखा धरती को
जब से शहर आया हूं।

13 टिप्‍पणियां:

  1. छपास की बधाई! और अच्छी लगी कविताई... क्या से क्या बना दिया शहर कि इस धरती को मेरे भाई!!

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  2. सच ही तो है धरा की हरियाली तो जैसे खो गई है...केवल और केवल कंकरीट के जंगल बिखरे हैं
    बहुत-बहुत बधाई

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  3. लोकेन्द्र जी,
    मेरी बधाई स्वीकार करें !
    कविता बहुत अच्छी लगी !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  4. बहुत खूब लोकेन्द्र जी ... शहर और गावं का फर्क समझा दिया आपकी इस लाजवाब रचना नें ... बहुत बहुत बधाई इसके प्रकाशन पर ....

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  5. Dear Lokesh Ji,

    Its a very nice poem.
    We are just going to start a magazine on rural and developmental
    issues, we will publish your poem in the magazine named--Legacy India

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  6. पंकज कुमार झा21 दिसंबर 2010 को 6:04 pm

    वाह ...शानदार कविता....बधाई लोकेन्द्र जी.

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  7. सभी शुभचिंतको को धन्यवाद की उन्होंने मेरे काव्य प्रयास की सराहना की......
    सबका आभार....

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  8. हरेकृष्ण भाई ने मेल पर कहा-
    BAHUT KHOOB DOST
    SHABASH
    DIL KO CHHOONE WALI HAI KAVITA

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  9. lokendra singh rajput ji

    नमस्कार
    आपकी कविता में पर्यावरण के प्रति सजगता झलकती है ........पूरी कविता सुंदर भाव लिए है ..........शुक्रिया

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  10. शहर में, आसमान का सीना चीरती इमारत से
    हर ओर डामर की बेढिय़ों में कैद
    बेबस, दुखियारी देखा धरती को
    हंसती-फूल बरसाती नहीं देखा धरती को
    जब से शहर आया हूं।
    ...bahut sundar rachna....

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  11. साक्षात स्वदेश में ही पढ़ा. बधाई.

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