मंगलवार, 27 सितंबर 2022

समग्र पर्यटन का केंद्र है मध्यप्रदेश

 मध्यप्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर बिखरे हैं प्रकृति, वन्य जीवन, धरोहर और अध्यात्म के चटख रंग

भारत का ह्रदय ‘मध्यप्रदेश’ अपनी नैसर्गिक सुन्दरता, आध्यात्मिक ऊर्जा और समृद्ध विरासत के चलते सदियों से यात्रियों को आकर्षित करता रहा है। आत्मा को सुख देनेवाली प्रकृति, गौरव की अनुभूति करानेवाली धरोहर, रोमांच बढ़ानेवाला वन्य जीवन और विश्वास जगानेवाला अध्यात्म, इन सबका मेल मध्यप्रदेश को भारत के अन्य राज्यों से अलग पहचान देता है। इस प्रदेश में प्रत्येक श्रेणी के पर्यटकों के लिए कई चुम्बकीय स्थल हैं, जो उन्हें बरबस ही अपनी ओर खींच लेते हैं। यह प्रदेश उस बड़े ह्रदय के मेजबान की तरह है, जो किसी भी अतिथि को निराश नहीं करता है। 

वैभव की इस भूमि पर पराक्रम की गाथाएं सुनाते और आसमान का मुख चूमते दुर्ग हैं। भारत का जिब्राल्टर ‘ग्वालियर का किला’, महेश्वर में लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर का राजमहल, मांडू का जहाज महल, दतिया में सतखंडा महल, रायसेन का दुर्ग, दुर्गावती का मदन महल, जलमग्न रहनेवाला रानी कमलापति का महल और गिन्नौरगढ़ सहित अनेक किले हैं, जो मध्यप्रदेश के स्थापत्य की विविधता का बखान करते हैं। देवों के चरण भी इस धरा पर पड़े हैं। उज्जैन, जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण पढ़े। चित्रकूट, जहाँ प्रभु श्रीराम माता सीता और भ्राता लखन सहित वनवास में रहे। ओंकारेश्वर, जहाँ आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने आचार्य गोविन्द भगवत्पाद से दीक्षा ली। मध्यप्रदेश में दो ज्योतिर्लिंग- महाकाल और ओंकारेश्वर हैं। इसके साथ ही भगवान शिव ने कैलाश और काशी के बाद अमरकंटक को परिवार सहित रहने के लिए चुना है। एक ओर जहाँ द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण प्रतिवर्ष मुरैना में आकर ढ़ाई दिन रहते हैं तो वहीं ओरछा में राजा राम का शासन है। महारानी कुंवर गणेश के पीछे-पीछे श्रीराम अयोध्या से ओरछा तक चले आये थे। ओरछा राजाराम के मंदिर के लिए ही नहीं, अपितु अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी प्रसिद्ध है।

रविवार, 25 सितंबर 2022

अमरकंटक का प्राचीन मंदिर समूह ‘रंगमहला’

अमरकंटक दर्शन - 12


आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया शिवलिंग, अभिषेक करने आती हैं माँ नर्मदा



कोटि तीर्थ माँ नर्मदा उद्गम स्थल के समीप प्राचीन काल के मंदिरों का एक समूह है। ये मंदिर हमें अपने पास बुलाते हैं, नर्मदा के उद्गम की कहानी सुनाने के लिए। हम शांत चित्त से यहाँ बैठें तो पाएंगे कि थोड़ी देर में ये मंदिर हमसे बात करने लगते हैं। वे बताते हैं कि यहाँ जगतगुरु आदि शंकराचार्य आये थे। जगतगुरु आदि शंकराचार्य। मंदिर परिसर से सट कर बने आदि शंकराचार्य आश्रम की ओर इशारा करते हैं- देखिए वह है हिन्दू धर्म और हिंदुस्थान को एकसूत्र में पिरोने वाले भगवान का आश्रम। और फिर इसके बाद वह एक-एक करके अपने निर्माण की कथा सुनाते हैं। यहाँ पातालेश्वर मंदिर, कर्ण मंदिर, शिव मंदिर और एक पुरातन काल का सूर्य कुंड भी है। एक मंदिर में महावीर बजरंगबली भी विराजे हैं।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

असाधारण, कुशल एवं प्रभावी वक्ता-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

सार्वजनिक जीवन में संवाद कला का बहुत महत्व है। व्यक्तिगत स्तर और छोटे समूह में लोगों को आकर्षित करना एवं उन्हें अपने से सहमत करना अपेक्षाकृत आसान होता है। किंतु, जन (मास) को अपने विचारों से सहमत करना और अपने प्रति उसका विश्वास अर्जित करना कठिन बात है। सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले लोग किसी न किसी माध्यम से ही जन सामान्य तक अपनी पहुँच बनाते हैं। इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण है, व्यक्ति किस प्रकार अपने विचार प्रस्तुत करता है। आवश्यक है कि वह जिस रूप में सोच रहा है, वह उसी रूप में जनता के बीच पहुँचे। जो लोग इस प्रकार संवाद कला को साध लेते हैं, वह जनसामान्य से जुड़ जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसी संवाद कला को सिद्ध कर लिया है। वह असाधारण वक्ता और प्रभावी संचारक हैं। प्रधानमंत्री मोदी संचार के 7-सी के सिद्धांत को जीते हैं। संचार के विशेषज्ञ फ्रांसिस बेटजिन ने बताया है कि 7-सी के सिद्धांत का उपयोग कर संचारक बहुत ही सरलता और प्रभावी ढंग से जन (मास) के मस्तिष्क में अपनी बात (संदेश) को पहुंचा सकता है। बहुत बड़े जनसमुदाय से अपनत्व स्थापित कर सकता है। इस सिद्धांत की सातों सी- स्पष्टता (Clarity), संदर्भ (Context), निरंतरता (Continuty), विश्वसनीयता (Credibility), विषय वस्तु (Content), माध्यम (Channel) और पूर्णता (Completeness) प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में झलकती हैं।

देखें यह वीडियो : क्या है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाषण कला का राज

बुधवार, 14 सितंबर 2022

भारतीय भाषाओं के प्रति संघ का दृष्टिकोण


तुर्की जब स्वतंत्र हुआ, तब आधुनिक तुर्की के संस्थापक कमालपाशा ने जिन बातों पर गंभीरता से ध्यान दिया, उनमें से एक भाषा भी थी। कमालपाशा ने विरोध के बाद भी बिना समय गंवाए शिक्षा से विदेशी भाषा को हटा कर तुर्की को अनिवार्य कर दिया। क्योंकि, वह तुर्की के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का विस्तार करना चाहते थे, इसके लिए उन्हें अपनी भाषा की आवश्यकता थी। चूँकि उस समय तुर्की अरबी लिपि में लिखी जाती थी, इसलिए उन्होंने एक घोषणा और की जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे लोग सरकारी नौकरी से वंचित कर दिए जाएंगे, जिन्हें लैटिन लिपि का ज्ञान नहीं होगा। इसी प्रकार दुनिया भर में बिखरे यहूदियों को जब उनकी भूमि प्राप्त हुई, तो उन्होंने भी अपनी भाषा ‘हिब्रू’ को ही अपनाया। सोचिए, भूमिहीन यहूदियों की भाषा कहीं लिखत-पढ़त के व्यवहार में नहीं थी। इसके बाद भी जब यहूदियों ने इजराइल का नवनिर्माण किया तो राख के ढेर में दबी अपनी भाषा हिब्रू को जिंदा किया। आज जिस अंग्रेजी की अनिवार्यता भारत में स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, उसके स्वयं के देश ब्रिटेन में वह एक जमाने में फ्रेंच की दासी थी। बाद में ब्रिटेन के लोगों ने आंदोलन कर अपनी भाषा ‘अंग्रेजी’ को उसका स्थान दिलाया। अपनी भाषा में समस्त व्यवहार करने वाले यह देश आज अग्रणी पंक्ति में खड़े हैं। अपनी भाषा में शिक्षा-दीक्षा के कारण ही यहाँ के नागरिक अपने देश की उन्नति में अधिक योगदान दे सके। अपनी भाषा का महत्व दुनिया के लगभग सभी देश समझते हैं। इसलिए उनकी आधिकारिक भाषा उनकी अपनी मातृभाषा है। किंतु, हम अभागे लोग जब स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी मानसिक दासिता से मुक्ति नहीं पा सके। महात्मा गांधी के आग्रह के बाद भी अंग्रेजी का मोह नहीं छोड़ सके।

रविवार, 4 सितंबर 2022

गुलामी के चिह्न मिटाकर ‘स्व’ की स्थापना

नया भारत विश्व क्षितिज पर अपनी उपस्थिति को मजबूत करने के साथ ही अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। अपनी जड़ों से जुड़कर ही भारत अनंत आकाश को नाप सकेगा। स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद जब भारतीय नौसेना को अपना प्रथम स्वदेशी विमान वाहक पोत मिला तब नया भारत एक नया इतिहास लिख रहा था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उसे कुछ इस तरह अभिव्यक्ति दी- ‘‘केरल के समुद्री तट पर पूरा भारत एक नए भविष्य के सूर्योदय का साक्षी बन रहा है। आईएनएस विक्रांत पर हो रहा यह आयोजन, विश्व क्षितिज पर भारत के बुलंद होते हौसलों की हुंकार है’’। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में विश्वास की गूंज है, जो अब दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को सक्षम बनाने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ का जो सपना देखा और दिखाया, अब हम उसकी ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

सोमवार, 15 अगस्त 2022

राष्ट्रध्वज तिरंगे की प्रतिष्ठा में संघ ने दिया है बलिदान

आरएसएस और तिरंगा : भाग-3

26 जनवरी 1963 को राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के समक्ष गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 3500 स्वयंसेवक.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के मन में राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर किसी प्रकार का भ्रम नहीं है। राष्ट्रीय गौरव के मानबिन्दुओं के लिए संघ के कार्यकर्ताओं ने अपना बलिदान तक दिया है। राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा भी ऐसा ही एक राष्ट्रीय प्रतीक है। चूंकि संघ ‘प्रसिद्धी पराङ्मुख’ के सिद्धांत पर चला है। जो मातृभूमि के लिए अनिवार्यरूप से करणीय कार्य हैं, उसका यश क्यों लेना? संघ का कार्यकर्ता इसलिए कोई काम नहीं करता है कि उसका नाम दस्तावेजों में लिखा जाये और उसको यश मिले। अपना स्वाभाविक कर्तव्य मानकर ही वह सारा कार्य करता है। अपने योगदान के दस्तावेजीकरण के प्रति संघ की उदासीनता का लाभ संघ के विरुद्ध दुष्प्रचार करनेवाले समूहों ने उठाया और उन्होंने संघ के सन्दर्भ में नाना प्रकार के भ्रम उत्पन्न करने के प्रयास किये। इस सबके बीच, जो निश्छल लोग हैं, उन्होंने संघ की वास्तविक प्रतिमा के दर्शन किये हैं किन्तु कुछ लोग राजनीतिक दुराग्रह एवं पूर्वाग्रह के कारण संघ को लेकर भ्रमित रहते हैं। ऐसा ही एक भ्रम है कि संघ के स्वयंसेवक राष्ट्रध्वज को मान नहीं देते हैं और तिरंगा नहीं फहराते हैं। इसी भ्रम में पड़कर कांग्रेस को भी संघ के दर्शन हो गए। वर्ष 2016 में जेएनयू में देशविरोधी नारे लगने के बाद यह बात निकलकर आई कि युवा पीढ़ी में देशभक्ति का भाव जगाने के लिए सभी शिक्षा संस्थानों में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लगाया जाना चाहिए। यह आग्रह कुछ लोगों को इतना चुभ गया कि वे आरएसएस और तिरंगे के संबंधों पर मिथ्याप्रचार करने लगे। इस मिथ्याप्रचार में फंसकर कांग्रेस ने 22 फरवरी, 2016 को मध्यप्रदेश के संघ कार्यालयों पर तिरंगा फहराने की योजना बनाई थी। कांग्रेस ने सोचा होगा कि संघ के कार्यकर्ता कार्यालय पर तिरंगा फहराने का विरोध करेंगे। तिरंगा फहराना था शिक्षा संस्थानों में लेकिन कांग्रेस निकल पड़ी संघ कार्यालयों की ओर।

रविवार, 14 अगस्त 2022

आरएसएस में तिरंगे के प्रति पूर्ण निष्ठा, श्रद्धा और सम्मान

आरएसएस और तिरंगा : भाग-2

#HarGharTiranga हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत नागपुर की जिलाधिकारी आर. विमला जी ने सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत से भेंटकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा प्रदान किया।

राष्ट्रीय विचारधारा का विरोधी बुद्धिजीवी वर्ग अक्सर एक झूठ को समवेत स्वर में दोहराता रहता है– आरएसएस ने राष्ट्रध्वज तिरंगा का विरोध किया। संघ भगवा झंडे को तिरंगे से ऊपर मानता है। आरएसएस ने कभी अपने कार्यालयों पर तिरंगा नहीं फहराया। इस तरह के और भी मिथ्यारोप यह समूह लगाता है। हालांकि, इस संदर्भ में उनके पास कोई प्रामाणिक तथ्य नहीं है। वे एक–दो बयानों और घटनाओं के आधार पर अपने झूठ को सच के रंग से रंगने की कोशिशें करते हैं। जबकि जो भी व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से परिचित है, वह जानता है कि इन खोखले झूठों का कोई आधार नहीं। संघ के लिए राष्ट्रध्वज तिरंगा ही नहीं अपितु सभी राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान सर्वोपरि है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ‘भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण’ शीर्षक से दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला में पहले ही दिन यानी 17 सितम्बर, 2018 को कहा- “स्वतंत्रता के जितने सारे प्रतीक हैं, उन सबके प्रति संघ का स्वयंसेवक अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ समर्पित रहा है। इससे दूसरी बात संघ में नहीं चल सकती”। इस अवसर पर उन्होंने एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी सुनाया। फैजपुर के कांग्रेस अधिवेशन में 80 फीट ऊँचा ध्वज स्तंभ पर कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा झंडा (चरखा युक्त) फहराया। जब उन्होंने झंडा फहराया तो यह बीच में अटक गया। ऊंचे पोल पर चढ़कर उसे सुलझाने का साहस किसी का नहीं था। किशन सिंह राजपूत नाम का तरुण स्वयंसेवक भीड़ में से दौड़ा, वह सर-सर उस खंभे पर चढ़ गया, उसने रस्सियों की गुत्थी सुलझाई। ध्वज को ऊपर पहुंचाकर नीचे आ गया। स्वाभाविक ही लोगों ने उसको कंधे पर लिया और नेहरू जी के पास ले गये। नेहरू जी ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा कि तुम आओ शाम को खुले अधिवेशन में तुम्हारा अभिनंदन करेंगे। लेकिन फिर कुछ नेता आए और कहा कि उसको मत बुलाओ वह शाखा में जाता है। बाद में जब संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी को पता चला तो उन्होंने उस स्वयंसेवक का अभिनंदन किया। यह एक घटनाक्रम बताता है कि तिरंगे के जन्म के साथ ही संघ का स्वयंसेवक उसके सम्मान के साथ जुड़ गया था।

‘संघ और तिरंगे’ के सन्दर्भ में जो भी मिथ्याप्रचार किया गया है, उसके मूल में वे कम्युनिस्ट हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद सात दशक बाद तक अपने पार्टी कार्यालयों पर राष्ट्रध्वज नहीं फहराया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने 2021 में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाने और पार्टी कार्यालय में तिरंगा फहराने का निर्णय लिया। कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत की स्वतंत्रता को अस्वीकार करते हुए नारा दिया था- ‘ये आजादी झूठी है’। जरा सोचिये, किन लोगों ने अपनी सच्चाई छिपाने के लिए राष्ट्रभक्त संगठन के सन्दर्भ में दुष्प्रचार किया?