गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

बात देश की है, बात आपके वोट की है

 लो कतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसकी सफलता और विफलता का दारोमदार आम जनता पर होता है। जनता अपने मताधिकार का उपयोग कर अच्छे लोगों को चुनकर सदन में भेज सकती है। ये अच्छे लोग अच्छी सरकार चलाएंगे। यदि जनता गलत लोगों के चुने जाने में मदद करेगी तो लोकतंत्र का मंदिर (संसद) अपवित्र होगा ही। गलत लोगों के चुने जाने में हम दो तरह से सहभागी होते हैं एक तो देश की न सोचकर निजी कारणों को ध्यान में रखकर किसी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करना और दूसरा तरीका है वोट ही न डालना। वोट नहीं डालकर हम खराब लोगों के चुने जाने में मदद करते हैं। क्योंकि समाज विरोध और राष्ट्र विरोधी ताकतें चाहती हैं कि समाज के प्रबुद्ध लोग वोट डालने घर से ही नहीं निकलें। जब स्वार्थ से ऊपर उठकर देशहित में मतदान करने वाले लोग पोलिंग बूथ तक नहीं पहुंचेंगे तो गलत व्यक्ति चुना जाना तय है। इसलिए अपना नेता, अपनी सरकार चुनने के लिए घरों से निकलिए। लोकतंत्र में एक-एक वोट का बड़ा महत्व है। एक-एक ईंट जोड़कर मजबूत इमारत खड़ी होती है। ठीक ऐसे ही आपके एक-एक वोट से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मजबूत होगा। आपको और हमें पांच साल में मौका मिला है। सकारात्मक परिवर्तन के लिए लम्बे समय से छटपटाहट है तो फिर सुशासन चुनने का मौका हाथ से क्यों जाने दें? आइए, लोकतंत्र के महायज्ञ में अपनी हिस्सेदारी निभाएं। अपना नेता चुने, अपनी सरकार चुने, अपना वोट दें। 
        किसे वोट दें : वोट जरूर दें। लेकिन सवाल उठता है कि वोट किसे दें। सही-गलत की पहचान कैसे करें? सही-गलत की पहचान बहुत आसान है। वोट देने से पहले जरा सोचिए बस। दरअसल, बात अब आपकी कॉलोनी की नहीं है। बात अब आपके शहर की नहीं है। बात अब आपके प्रदेश की भी नहीं है। बात देश की है। देश मजबूत होगा तो आपका प्रदेश मजबूत होगा, आपका शहर विकास करेगा। इसलिए अपने अधिकार से, अपनी ताकत से, अपने मत से देशहित में उसे चुनिए जो तर्कपूर्ण बात कर रहा हो। जिसने कुछ करके दिखाया हो, खाली बतोलेबाजी न की हो। जो गप मारने की जगह मुद्दों पर बात करना चाह रहा हो। हमें ऐसे आदमी को चुनना है, ऐसी सरकार लानी है जिसकी सोच में राष्ट्र पहले हो। 
      सशक्त नेतृत्व चुनिए : देश को चाहिए एक सक्षम और सशक्त नेतृत्व ताकि पाकिस्तान की नापाक हरकतों पर लगाम लग सके। ताकि हमारे जवानों के सिरों की तरफ बढऩे वाले हाथ पहले ही काट दिए जाएं। ऐसा नेता और सरकार हमें नहीं चुननी है जो हमारे सैनिकों के हत्यारों को अपने घर (देश) में बुलाकर बिरयानी खिलाए। हमें सशक्त नेतृत्व इसलिए भी चुनना है ताकि अमरीका हमारे राजनयिक का अपमान न कर सके। ताकि चीनी ड्रैगन भारत की तरफ फुफकार न सके। ताकि बांग्लादेश अपनी हद में रहे। ताकि इटली के नाविक हमारे मछुआरों की हत्या करके न भाग सकें। हमें साबित करना है कि प्यारे यह देश कोई मांस का लोथड़ा नहीं जो आस-पास के गिद्द आएंगे और नोंच-नोंच खाएंगे। ये देश मातृभूमि है हमारी। हमारा स्वाभिमान है। हमारा जमीर है। बहुत हुआ अब स्वाभिमान को दांव पर नहीं लगने देना है। दुनिया भारत की तरफ अदब से देखे और भारत के बढ़ते रुतबे को देखे। हमारा यह ख्वाब कोई कठपुतली सरकार पूरा नहीं कर सकती, इसके लिए तो हमें चुनना होगा सशक्त नेतृत्व। 
        राष्ट्रीय एकता चुनिए : अपने आपको सेक्युलर कहने वाली पार्टियों और नेताओं की ओर से बहुसंख्यकों की अनदेखी और अल्पसंख्यकों को अधिक महत्व देने से समाज को बांटने का काम किया जा रहा है। वोट बैंक की राजनीति के लिए देश की एकता और अखण्डता को दांव पर लगाया जा रहा है। यह घातक है। 'देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक है।' इस तरह का बयान बहुसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बताता है। यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। रंगनाथ आयोग और सच्चर कमेटी की सिफारिशें भी तुष्टीकरण की राजनीति की देन हैं। 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निरोधक अधिनियम' तो साफ तौर पर बहुसंख्यकों को ही दंगाई साबित करने के लिए तैयार किया गया है। राममंदिर को धर्म से जोडऩे वाले भूल जाते हैं कि राम देश का स्वाभिमान है। राम देश के महापुरुष हैं। देश के आदर्श राजनेता का चरित्र राम है। उनकी राज व्यवस्था (रामराज्य) की आज भी दुहाई दी जाती है। राम देशवासियों के रोम-रोम में हैं। फिर राम को सांप्रदायिक रूप देने का काम क्यों किया जा रहा है? क्यों उन्हें महज हिन्दुओं के साथ ही जोड़ा जा रहा है जबकि वे भारत के प्रतीक हैं। जब इस देश में छुटभैए नेताओं की आदमकद प्रतिमाएं लग सकती हैं, सड़कें-चौराहे उनको समर्पित हो सकते हैं, योजनाओं को उनके नाम पर शुरू किया जा सकता है, महत्वपूर्ण संस्थानों का नामकरण उनके नाम पर किया जा सकता है, यहां तक की कीमती और महंगी जमीनों पर उनकी समाधि और पार्क बनाए जा सकते हैं तो फिर राममंदिर पर क्या आपत्ति है? क्या सिर्फ इसलिए कि इसके बहाने ये पार्टियां और नेता एक विशेष समुदाय को भड़काकर उसके वोट अपनी झोली में डाल सकें? आपको तय करना है कि वोट किसे दें- जो राम के नाम पर आपको बांट रहे हैं या जो राम के नाम पर आपको जोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। जो तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं या फिर जो समान अधिकारों की बात करते हैं। जो जम्मू-कश्मीर को महज वोट बैंक की नजर से देखते हैं या फिर जो कश्मीर को इस देश का हिस्सा मानकर उसके विकास की बात करते हैं। हमें उसे चुनना है, जिसके पास देश की एकता और अखण्डता के लिए विजन हो, मिशन हो और एम्बीशन हो। जो यूनिटी फॉर नेशन की बात करे। जिसके लिए राष्ट्र सबसे पहले हो। 
       आर्थिक विकास चुनिए : पिछले दस सालों में महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़कर रख दी है। भारत में महंगाई लगातार बढ़ी है जबकि दुनिया में महंगाई घटी है। महंगाई और गरीबी पर देश का वर्तमान नेतृत्व लगातार आम आदमी का मजाक बनाता रहा है। सरकार में शामिल जिम्मेदार लोगों के बयान हास्यास्पद ही नहीं आपत्तिजनक भी हैं। दुनिया के जानेमाने अर्थशास्त्री और देश के मुखिया कहते हैं कि मेरे पास क्या जादू की छड़ी है, घुमाऊंगा और महंगाई दूर कर दूंगा। भारत का योजना आयोग गरीबी का उपहास कुछ यूं उड़ाता है कि ३२ रुपये शहर में और २६ रुपये गांव में खर्च करने वाला आदमी गरीब नहीं है। यूपीए सरकार के मंत्री पी. चिदम्बरम कहते हैं कि १५ रुपये की पानी की बॉटल और २० रुपये की आइसक्रीम खाने वाले लोग गेहूं के दाम में एक रुपये की बढ़ोतरी मंजूर नहीं कर सकते, हाय-तौबा मचाते हैं। क्या इनके रहते गरीबी दूर हो सकती है? क्या देश विकास के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है? क्या इन्हें देश की बड़ी आबादी का अपमान यूं करते रहने देना चाहिए? अब यहां जरा सोचिए, दुनिया जब भारत की ओर देख रही है तब हमें क्या तय करना है? ऐसी स्थिति में हमें देश के विकास का स्वप्न देख रहे लोगों को चुनना है, जिन्होंने मौका मिलने पर विकास करके दिखाया हो, जिन्होंने गरीबी नजदीक से देखी हो, जो भारत की नब्ज को समझते हों, जो संवेदनशाील हों। कुछ लोग साठ साल से अभी तक गरीबी दूर करने की सिर्फ बात ही कर रहे हैं लेकिन गरीबी अब भी ऐसे नेताओं और पार्टियों को वोट देकर ठगे गए मतदाताओं का मुंह चिढ़ा रही है। ६० साल से गरीबी खत्म करने का आश्वासन ही तो सुनते आ रहे हैं। तय कीजिए अब आश्वासन नहीं सुनना, नतीजा चाहिए। अब आर्थिक विकास की राह पर आगे बढऩा है इसलिए विकासपुरुष को चुनना है।
        शिक्षा के सुअवसर और रोजगार चुनिए : दुनिया के श्रेष्ठ २०० विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का एक भी विश्वविद्यालय शामिल नहीं है। शिक्षा संस्थानों में अध्ययन और अध्यापन की समुचित व्यवस्थाएं नहीं हैं। यह युवा भारत की स्थिति है। देश में लगभग आधी आबादी २५ साल से कम उम्र की है। इस आबादी को उचित शिक्षा नहीं मिलेगी तो रोजगार का संकट खड़ा होगा ही। इसी युवा शक्ति को ठीक शिक्षा मिले तो देश की तरक्की में कितनी गति आएगी, आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं। लेकिन अब तक हमारा नेतृत्व इस युवा शक्ति को नहीं पहचान सका है। इसलिए चुनिए ऐसी सरकार जो युवाओं को ध्यान में रखकर नीति बनाए। गुणवत्तायुक्त और मूल्य आधारित शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए और रोजगार के अवसर बढ़ाए।  
         इस बार चूक न हो, देश को सरदार चाहिए : सशक्त और सक्षम नेतृत्व क्यों जरूरी है? इसको समझने के लिए आइए इतिहास के पन्ने पलटें। १९४७ में देश चाहता था कि लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रधानमंत्री बनें लेकिन चंद स्वार्थी और सत्तालोलुप लोगों के कारण सरदार को पीछे धकेल दिया गया। देश का उसका असली नेता नहीं मिला। हैदराबाद और जूनागढ़ रियासत के विलय के विवाद को जिस तरह से सरदार ने सुलझाया, सोचो जम्मू-कश्मीर का मसला उन्हें सुलझाने दिया गया होता तो आज क्या स्थिति होती। तब कुछ लोगों के हाथ में फैसला करने की ताकत थी, इसलिए देश का पहला प्रधानमंत्री सरदार के रूप में नहीं मिला लेकिन अब १२५ करोड़ लोगों के हाथ में फैसला है। वोट करें और अपना सरदार चुने। आखिर में एक अपील, टीवी के सामने से हटिए, पिकनिक फिर कभी चलेंगे, घर से निकलिए, पांच साल में हमारी बारी आई है, वोट दीजिए और अपना नेता, अपनी सरकार चुनिए। 

4 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ अब हमें नतीजा चाहिए।

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  2. जो सबसे बडी बात है वही सारी समस्याओं का हल है वह है सशक्त नेतृत्त्व और उसमें समझ के साथ दायित्त्व बोध ..।

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  3. आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि बुलेटिन वोट और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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