रविवार, 3 मार्च 2013

सोने के दांत वाले लोगों का देश

 सो वियत संघ यानी रूस। लम्बे समय तक अमरीका का सीधा प्रतिद्वंद्वी रहा। अभी भी है। महाशक्ति रूस। १९९० में सोवियत संघ का विघटन शुरू हुआ। कम्युनिस्ट विचारधारा के कमजोर होने की शुरुआत। कम्युनिस्ट शासन के दौर में रूस विकास की दौड़ में काफी पीछे छूट रहा था। लोग आर्थिक सुधारों के लिए लोकतंत्र सरकार के प्रति विश्वास जता रहे थे। रूसी जनता कम्युनिस्ट शासन की तानाशाही से तंग आ चुकी थी। कुछ साल पहले दैनिक समाचार-पत्र में किसी लेखिका का आलेख पढ़ा था कि रूस में जब कम्युनिज्म का परचम फहरा रहा था, तब लोगों को बोलने की पूरी आजादी नहीं थी। खासकर कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ तो कोई कुछ बोल भी नहीं सकता था। यहां तक कि कम्युनिस्ट सरकार की बुराई सुनना भी गुनाह था। लेखिका लिखती है कि ट्रेन में सफर करते समय एक विदेशी यात्री किन्हीं अव्यवस्थाओं को लेकर सरकार की बुराई कर रहा था। सामने की सीट पर बैठा रूसी नागरिक विदेशी यात्री को चुप रहने को कह रहा था। इतने में ट्रेन में सवार दो सुरक्षाकर्मियों ने विदेशी और सामने की सीट पर बैठे रूसी नागरिक दोनों को गिरफ्तार कर लिया। विदेशी यात्री को थाने ले जाकर कड़ी हिदायत दी गई कि इस देश में यहां की सरकार (कम्युनिस्ट) की निंदा करने की आजादी नहीं है। आप चूंकि बाहरी हो, हमारे मेहमान हो इसलिए जाने दे रहे हैं। विदेशी व्यक्ति ने पुलिस से पूछा कि सामने बैठे आदमी का क्या दोष था? उसे क्यों गिरफ्तार किया। पुलिस के अफसर ने कहा, उसने सरकार की निंदा सुनी। यह उसका बहुत बड़ा अपराध है, उसे कड़ी सजा दी गई है। अभिव्यक्ति पर कुछ इस तरह ताला लगा रखा था साम्यवादी सत्ता ने रूस में। सोवियत संघ के १९९० में विघटन के साथ ही वहां के लोगों को बोलने की आजादी मिल गई। हालात बदल गए। लोग सरकार की नीतियों और व्यवस्था के खिलाफ विचार कर सकते थे और बोलने भी लगे।
     सोवियत संघ के इस दौर का जिक्र पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट शिखा वार्ष्णेय ने अपनी किताब 'स्मृतियों में रूस' में किया है। हालांकि किताब में इसकी विस्तृत चर्चा नहीं है। उन्होंने १९९० से १९९६ तक रूस में रहकर पत्रकारिता की पढ़ाई की। इस दौरान शिखा वार्ष्णेय के अनुभवों का ही संकलन है स्मृतियों में रूस। सहज और सरल भाषा में यादों को उकेरने के खूबसूरत प्रयास के लिए वे बधाई की पात्र हैं। उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात अगस्त २०१२ में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई। मीडिया एक्टिविस्ट और चरैवेति (भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश की पत्रिका) के संपादक अनिल सौमित्र के प्रयासों से भोपाल में मीडिया चौपाल का आयोजन किया गया था। इसी में शामिल होने के लिए शिखा वाष्र्णेय आई थीं। हालांकि हमारी पहचान सोशल मीडया पर पहले ही हो चुकी थी। मीडिया चौपाल में ही उन्होंने 'स्मृतियों में रूस' मुझे भेंट की। सुखद आनंद की अनुभूति हुई क्योंकि पुस्तक की रोचकता के बारे में अलग-अगल ब्लॉग पर समीक्षाएं पढ़ चुका था और पुस्तक को पढऩे की तीव्र इच्छा थी। 
        रूस और भारत के बीच बेहद करीबी रिश्ते रहे हैं। अब भी दोनों देश दोस्त हैं। भारतीय जनता और रशियन आवाम में एक-दूसरे के लिए प्रेम और सम्मान है। रूस में भारत के सिनेमा को खूब पसंद किया जाता है। यह तो मालूम था लेकिन इतना नहीं पता कि रूस के अधिकतर घरों में 'मेरा जूता है जापानी' और 'आई एम ए डिस्को डांसर' बजा करता था। सिनेमा हॉल में मिथुन चक्रवर्ती और अमिताभ बच्चन की कोई न कोई फिल्म का प्रदर्शित होते रहना। शिखा किताब के आखिरी हिस्से में लिखती भी हैं कि न जाने कितनी बार सिर्फ भारतीय होने के कारण टैक्सी वालों ने उनसे किराया नहीं लिया।
         शिखा वार्ष्णेय की लेखन शैली इतनी धाराप्रवाह है कि किताब पढ़ते समय अंतरमन में एक-एक कर सारे दृश्य दीख पड़ते हैं। मास्को से वेरोनिश की ट्रेन यात्रा, वोरोनिश रेलवे स्टेशन,  मास्को यूनिवर्सिटी की भव्य इमारत, सड़कों पर जमी बर्फ, खूबसूरत मॉस्को मेट्रो स्टेशन, क्रेमलिन, मक्सिम गोर्की और पुश्किन का घर। पुस्तक में इनके चित्र भी प्रकाशित किए गए हैं। हालांकि किताब में इनका सतही वर्णन है। दरअसल, किताब पर्यटक के नजरिए से लिखी भी नहीं है। यह तो एक मस्तमौला विद्यार्थी के संघर्ष के सुहावने पलों का दस्तावेज है। रूस के खान-पान, रहन-सहन और लोगों के व्यवहार को समझने में किताब बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। ठंड का तो बड़ा ही रोचक वर्णन है। रूस में १० महीने ठंड पड़ती है। ठंड इतनी कि खिड़की के बाहर थैला लटकाकर उससे डीप फ्रीजर का काम लिया जा सकता है। झील, तालाब सब जम जाते हैं और सड़कों पर सफेद मखमली चादर की तरह बर्फ फैल जाती है। जिस पर रूसी बच्चे जमकर आइस स्केटिंग करते हैं। रूस की राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर दिखाने के साथ-साथ शिखा वाष्र्णेय वहां के सामाजिक जीवन का भी शब्द चित्र खींचती हैं। रूस में परिवार व्यवस्था पुरुष प्रधान है। हालांकि वहां की औरतें मर्दों की तुलना में अधिक मेहनती हैं। जिस तरह भारत में लड़कियों के खिड़की और छज्जों पर बैठने पर घर की बुजुर्ग महिलाएं व पुरुष टोक दिया करते हैं वैसे ही रूस में लड़की को खिड़की के आसपास बैठा देख कोई न कोई महिला टोक दिया करती हैं। हिदायत दी जाती है कि लड़कियों को खिड़की पर नहीं बैठना चाहिए। लोग नियमों को स्वत: पालन करते हैं। सड़कें साफ-सुथरी हैं। चॉकलेट का रैपर भी रूसी नागरिक सड़क पर नहीं फेंकते हैं। अंधविश्वास भी बहुत है रूसियों में। आत्माएं बुलाने और उनसे अपना भविष्य जानने का बहुत प्रचलन है।
कुछ मजेदार और रोचक बातें :
- चाय को रूस में चाय ही कहते हैं। वहां जाओ और चाय मांगनी हो तो कहिएगा चाय दे दे मेरी मां/बाप!
- वहां कद्दू के आकार का पत्तागोभी और सेव मिलता है।
- रूस में स्कूलों के नाम नहीं नंबर होते हैं। खास और जरूरी बात है कि वहां बच्चे अपने ही इलाके के स्कूल में पढ़ते हैं।
- अधिकतर रूसियों की बत्तीसी में कम से कम एक दांत तो सोने या चांदी का होता ही है।
- क्रिसमस २५ दिसंबर को नहीं बल्कि ७ जनवरी को मनाया जाता है।
- अंधविश्वास : खाना बनाते समय चाकू गिर गया तो पति भन्नाया हुआ घर आएगा। काली बिल्ली का रास्ता काटना शुभ माना जाता है।
दो शब्द अलग से : जैसा कि मैंने बताया कि यह किताब मुझे अगस्त २०१२ में शिखा वार्ष्णेय ने भेंट की। इसको पढऩे की इच्छा पहले से थी। लेकिन, किताब हाथ आने के बाद से छह माह बाद मैं इसे पढ़ सका। शिखा जी का लेखन इतना रसदार है कि एक बैठक में ही 'स्मृतियों में रूस' को पढ़ गया। सलिल वर्मा, अनूप शुक्ल, संगीता स्वरूप, मनोज कुमार, वन्दना अवस्थी दुबे सहित कई वरिष्ठ साहित्यकारों ने भी पुस्तक के विषय में बढिय़ा टिप्पणी की है।
मक्सिम गोर्की टाउन और शिखा वार्ष्णेय अपने दोस्तों के साथ रूस में
पुस्तक : स्मृतियों में रूस
मूल्य : ३०० रुपए (सजिल्द)
लेखक : शिखा वार्ष्णेय
प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स
एक्स-३०, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-२, नईदिल्ली-११००२०

7 टिप्‍पणियां:

  1. शिखा जी की इस पुस्तक के विषय में पहले भी पढ चुकी हूँ अब इसे मँगाने का जरिया भी मिल गया । अब तो पढनी ही होगी ।

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  2. बढ़िया परिचर्चा-
    लेखिका को भी शुभकामनायें-

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  3. सुन तो बहुत रखा था इस पुस्तक के विषय में..और शिखा मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी हैं...लेकिन किताब पढ़ने का ख्याल नहीं आया था ...पर आपकी समीक्षा पढ़कर अब ज़रूर यह किताब खरीदूंगी और पढूंगी ...आभार एक अच्छी कृति से परिचय करवाने का ...!!

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  4. बहुत बढ़िया समीक्षा लोकेन्द्र जी ...!!
    ....शिखा जी की किताब के बारे में बहुत पढ़ा और सुना भी है ...!सभी प्रशंसा करते हैं |उनके सुरुचिपूर्ण लेखन से तो हम सभी वाकिफ हैं ही |ब्लॉग नियमित पढ़ते हैं |आज समीक्षा पढ़ कर किताब मँगवाने की बात ताज़ा हो आई |मँगवाते हैं और पढ़ते हैं .....!!

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  5. बहुत अच्छी समीक्षा की है आपने. काफी कुछ पढ़ा है इस पुस्तक के बारे में. शिखा जी की लेखन शैली बहुत प्रभावशाली है. पुस्तक पढने की इच्छा बढ़ गई. अच्छी समीक्षा के लिए बधाई.

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  6. वहा बहुत खूब बेहतरीन

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में

    तुम मुझ पर ऐतबार करो ।

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