रविवार, 6 मई 2012

संस्थागत हुआ मीडिया में भ्रष्टाचार

 मी  डिया में भ्रष्टाचार अब व्यक्तिगत भ्रष्टाचार नहीं रह गया है यह संस्थागत हो गया है। वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठकुरता यह बात अक्सर उठाते हैं। वैसे उनका आकलन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तकरीबन सच है। वे यूं ही इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं। इसके पीछे उनका शोध है। २००९ के लोकसभा चुनावों और कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में यह बात खुलकर सामने आ गई थी कि किस तरह उम्मीदवार या पार्टी को मीडिया के मार्फत मतदाताओं को बेचा जा रहा है। इस दौरान पेड न्यूज या पैकेज पत्रकारिता की शक्ल में बड़े पैमाने पर मीडिया में भ्रष्टाचार का मामला सामने आया। २००९ के चुनावों में हालात यह हो गए थे कि कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधि उम्मीदवारों और पार्टियों के पास कवरेज का रेट कार्ड तक लेकर पहुंचे और खबरों का सौदा किया। मीडिया में भ्रष्टाचार को लेकर लम्बे समय से चली आ रही छुटपुट बहस ने इसी दौरान आग पकड़ी। सबदूर पेड न्यूज की चर्चा और भत्र्सना होने लगी। लोग पत्रकारों और पत्रकारिता को संदिग्ध निगाह से देखने लगे। खबरों की विश्वसनीयत पर सवाल उठने लगे। पत्रकार और लेखक अपने-अपने स्तर पर मीडिया में पेड न्यूज और अन्य प्रकार के भ्रष्टाचार का विरोध करने लगे तो कई अपने को पाक-साफ साबित करने में जुट गए। इस हाल में प्रेस परिषद से अपेक्षा की गई की वह कुछ करे। लेकिन, प्रेस परिषद तो वैसे ही नख-दंतहीन संस्था है। फिर भी उससे जो बन सकता था उसने प्रयास करने शुरू कर दिए। पेड न्यूज को परिभाषित करते हुए पे्रस परिषद ने कहा कि 'कोई भी समाचार या विश्लेषण अगर पैसे या किसी और तरफदारी के बदले किसी भी मीडिया में जगह पाता है तो उसे पेड न्यूज की श्रेणी में माना जाएगा।' इसके साथ ही प्रेस परिषद ने स्वप्रेरणा से जांच के लिए एक समिति गठित की थी। वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठकुरता को इस समिति में शामिल किया गया। उनके साथ वरिष्ठ पत्रकार के. श्रीनिवास रेड्डी को भी समिति में रखा गया। कड़ी मेहनत के बाद समिति ने पेड न्यूज से संबंधित ७१ पृष्ठ की एक रिपोर्ट तैयार की थी। 'हाउ करप्शन इन द इंडियन मीडिया अंडरमाइंस डेमोक्रेसी' नाम से जैसे ही यह रिपोर्ट तैयार हुई, पे्रस परिषद में बैठे मीडिया घरानों के प्रतिनिधियों में खलबली मच गई। उन्होंने इस रिपोर्ट को बाहर न आने देने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। आखिरकार वे अपनी करतूत में सफल हुए। ७१ पृष्ठों की रिपोर्ट दबा दी गई। उसके बदले में ३० जुलाई को प्रेस परिषद ने सरकार को १२ पृष्ठों की एक संक्षिप्त रिपोर्ट सौंपी। इस संक्षिप्त रिपोर्ट में पेड न्यूज छापने वाले मीडिया घरानों के नाम नहीं दिए गए। इतना ही नहीं इस रिपोर्ट को भी परिषद ने अपनी वेबसाइट पर नहीं डाला। परंजॉय गुहा कहते हैं कि रिपोर्ट के सामने आने से कई दिग्गज मीडिया संस्थानों का काला-पीला सच सामने आ जाता। दुनिया को पता चल जाता कि उन्होंने कैसे और कब-कब पैसे लेकर खबरें बेचीं और खबरें दबाईं।
    मीडिया में बढ़ते कदाचार, भ्रष्टाचार और पेड न्यूज की बीमारी पर दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने भी खूब लिखा और कई मंचों से विरोध किया। प्रभाष जोशी १० मई २००९ को जनसत्ता के अपने कॉलम 'कागद कारे' में एक लेख लिखा। जिसके अंश हैं-
    'डायरी पढऩे के बाद इस दोस्त से मैंने कवरेज का तरीका पूछा। तो वह बताता है कि सबेरे सब हमारे दफ्तर आते हैं। उनके लिए नाश्ता, पीने का पानी और गाड़ी तैयार की जाती है। भोजन का पैसा नकद दिया जाता था। तय रेट के हिसाब से रोज का खर्चा-पानी अलग। चैनल वालों में छठे वेतन आयोग का वेतन पाने वाले दूरदर्शन के लोग भी होते थे। हमारी गाडिय़ों से निकलने से पहले वे दूसरे उम्मीदवारों से भी प्रबंध करते थे। किसी से पेट्रोल के पैसे लेते तो किसी से गाड़ी के। एक पत्रकार तो पैकेज का पैसा लेने के लिए रात दो बजे तक दरवाजे के बाहर बैठा रहा।'
उक्त विवरण से पता चलता है कि मीडिया में भ्रष्टाचार किस सीमा तक पहुंच चुका है। पत्रकार भोजन और पेट्रोल तक का पैसा ले रहे हैं। ऐसे में चिंता होना लाजमी है। प्रथम प्रवक्ता पत्रिका (१६ जुलाई २००९) में भी कई नेताओं ने अपने इंटरव्यू में पत्रकार और मीडिया घरानों पर खबरों के लिए पैसा लेने के आरोप लगाए। प्रथम प्रवक्ता में पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री हरमोहन धवन के हवाले से छपा है कि मैं २००९ का चुनाव बसपा के टिकट पर चंडीगढ़ से लड़ रहा था। प्रिंट मीडिया के एक प्रतिनिधि ने कवरेज के लिए मुझसे पैसे की मांग की। उसने कहा कि यदि आप हमसे डील करते हैं तो हम अपके समर्थन में अपने अखबार में खबरें छापेंगे। इसी अंक में आजमगढ़ से लोकसभा का चुनाव जीते भाजपा के रमाकांत यादव ने बताया कि एक अखबार ने कवरेज के लिए मुझसे १० लाख रुपए की मांग की। पैसे नहीं देने पर इस अखबार में मेरे खिलाफ एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें मेरे हारने का दावा किया गया था। आजमगढ़ से ही कांग्रेस के उम्मीदवार डॉ. संतोष सिंह ने बताया कि एक अखबार ने मुझसे दस लाख और पांच लाख रुपए के दो पैकेज में से एक खरीदने को कहा। प्रथम प्रवक्ता पत्रिका को उप्र के घोसी लोकसभा क्षेत्र के उम्मीदवार अरशद जमाल ने कहा कि अखबारों ने मुझसे पैसे मांगे। यहीं से भाजपा के राम इकबाल सिंह ने भी खबरों के लिए पैसे मांगे जाने की बात कही।
    भारतीय मीडिया में पेड न्यूज से उपजे भ्रष्टाचार की चर्चा अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्र 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में भी हुई। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने पेड न्यूज को मुख्य रूप से भारतीय भाषाओं के मीडिया की समस्या के तौर पर पेश किया। मीडिया साइट 'द हूट' ने भी 'साउंड ऑफ मनी' शीर्षक से संपादकीय लिखकर इस मसले पर चिंता जाहिर की। लेकिन, मेरा मानना है कि पेड न्यूज और भ्रष्टाचार की बीमारी सिर्फ भारतीय भाषाओं के मीडिया संगठनों में ही नहीं है। अंगे्रजी मीडिया में भी यह उतनी ही गहरी है। बल्कि पेड न्यूज के खेल में बड़े खिलाड़ी अंग्रेजी के अखबार और टीवी चैनल्स ही हैं। हालांकि अंग्रजी मीडिया पेड न्यूज और मीडिया में करप्शन को लेकर हो रही बहस-आलोचना के दायरे से इस समय लगभग बाहर है। जबकि न्यूज स्पेस बेचने की शुरुआत अंग्रेजी प्रकाशनों से ही हुई है। न्यूज बेचने का काम संस्थाबद्ध तरीके से सबसे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया ने किया। आज भी अंग्रेजी मीडिया संस्थान इस खेल में जमे और मंजे हुए बड़े खिलाड़ी हैं। ठीक राजनीति की तरह। राजनीति में जो पकड़ा जाए वो भ्रष्टाचारी बाकि सब पाक-साफ। जबकि कई वहां भी पुराने और जमे-जमाए खिलाड़ी हैं।
    भारत में पत्रकारिता कोई नई विधा नहीं है। यह तो प्राचीन काल से अलग-अलग रूपों में हर समय भारत में मौजूद रही है। ब्रिटिश शासन से संघर्ष से के दौर में यह एक मिशन रही। उसके बाद भी कुछ समय तक मिशन और समाजसेवा दोनों दायित्वों को भारतीय पत्रकारिता ने बखूबी निभाया। दरअसल मीडिया में भ्रष्टाचार का घुन लगा मीडिया हाउसों के विकसित होने के बाद। पत्रकारिता से मीडिया बनने के साथ। मिशन से व्यवसाय बनने के साथ। मीडिया में भी अर्थ का खेल बढऩे के बाद भ्रष्टाचार ने यहां अपनी जड़े रोपीं। भारत में आज ६० हजार से अधिक अखबार। १०० से अधिक खबरों के चैनल। ६०० से अधिक टीवी चैनल हैं। यह परिवर्तन बहुत कम समय में हुआ है। इतने कम समय में दुनिया के किसी भी देश की संचार माध्यमों में परिवर्तन नहीं आया है। १९९१ में भारत में मात्र एक टेलीविजन ब्रॉडकॉस्टर था दूरदर्शन। आज ६०० से अधिक ब्रॉडकॉस्टर हैं। इससे पत्रकारिता में व्यवसाय बढ़ा है, पूंजी बढ़ी है और प्रतिस्पर्धा भी। मीडिया संस्थानों की ताकत बढ़ती जा रही है। पत्रकारों की ताकत घटती जा रही है। मीडिया में अर्थव्यवस्था के खेल ने पत्रकारिता को मिशन मानने वाले खांटी पत्रकारों को पीछे छोड़ दिया है। ऐसे लोग ताकत के साथ आगे आ गए हैं जो संस्था और मालिकों के लिए लॉबिंग कर सकें। नीरा राडिया काण्ड से यह उजागर हो चुका है। इस काण्ड से जाहिर हुआ कि जो मीडियाकर्मी आम समाज और युवा पत्रकारों के हीरो थे वे भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। बरखा दत्त, वीर सांघवी और प्रभु चावला सरीखे नाम भ्रष्टाचार में लिप्त मिले। ऐसे लोगों को पत्रकारिता के स्थापित मूल्यों से कोई लेने देने नहीं होता। इनका काम होता है स्वयं का और मालिकों का हित साधना।
    ऐसा भी नहीं है मीडिया में भ्रष्टचारा आज की देन है। यह पहले भी था। पाठक और दर्शक भले ही न जाने, लेकिन सरकार, राजनीतिक दल, एनजीओ और कॉरपोरेट सेक्टर से लेकर स्पोट्र्स और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री तक सब जानते हैं कि मीडिया को मैनेज करने की जरूरत पड़ती है, मीडिया को मैनेज किया जा सकता है और मीडिया को मैनेज किया जा रहा है। समाचार पत्र-पत्रिकाओं और न्यूज चैनल्स पर अचानक कुछ विशेष खबरों का आना और गायब हो जाना इसी ओर इशारा करता है। आठ-दस हजार वेतन पाने वाले पत्रकार कैसे चारपहिया वाहन मेंनटेन करते हैं। महंगी शराब-महंगे कपड़े व अन्य गैजेट्स कहां से आते हैं इस महंगाई के दौर में। ऐसे ही अनेक प्रश्न मीडिया में भ्रष्टाचार की ओर इंगित करते हैं। अब तक और आज भी निजी स्तर पर भी मीडियाकर्मियों में भारी भ्रष्टाचार मौजूद है। खबर छापने के पैसे, खबर नहीं छापने के पैसे, फोटो छापने के पैसे, नहीं छापने के पैसे। इतना ही नहीं कार्यक्रमों में शामिल लोगों के नाम तक छापने के पैसे मीडियाकर्मी वसूल लेते हैं। हालांकि पेड न्यूज और पैकेज के चलन से परिदृश्य में थोड़ा बदलाव आया है। खबरों और खबरों के पैकेज के क्रय-विक्रय में अब मीडिया संस्थान खुद ही उतर आए हैं। इसमें पत्रकारों की भूमिका सेल्समैन या बिचौलिए वाली ही बनकर रह गई है। खबर बेचने के धंधे की कमान अब प्रबंधन के हाथ में है। यही बात ज्यादा परेशान करने वाली है। व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के उतने नुकसान नहीं है जितने संस्थागत भ्रष्टचारा से हैं।
त्रैमासिक पत्रिका मीडिया क्रिटिक में प्रकाशित आलेख.
    पत्रकारिता में बढ़ते भ्रष्टाचार ने लोगों के मन में खबरों को लेकर संशय और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। आज का पाठक सोच में रहता है कि किस खबर को सच माने और किस खबर को प्रायोजित। खबर के सभी पहलुओं को ठीक से समझने के फेर में कई बार उसे तीन-चार अखबारों का सहारा लेना पड़ता है। दरअसल, बेहतर लोकतंत्र के लिए कथित चौथे खंबे (मीडिया) का ईमानदार होना अतिआवश्यक है। कम से कम मीडिया से संस्थागत भ्रष्टचार से निजात पाना बेहद जरूरी है। मीडिया और राजनीतिक गठजोड़ से उपजे भ्रष्टाचार में एक स्वस्थ्य लोकतंत्र सांस नहीं ले सकता। भारत में पत्रकारिता को पवित्र दृष्टि से देखा जाता है। भारतीय जनमानस की बड़ी उम्मीद रहती है पत्रकारिता से। जब वह सबदूर से निराश होता है तो न्याय और अपनी बात कहने का निष्पक्ष माध्यम उसे यही दीखता है। इसलिए एक ईमानदार कोशिश हो कि मीडिया संगठन पेड न्यूज और अन्य प्रकार के भ्रष्टाचार से दूर रहें।

12 टिप्‍पणियां:

  1. मीडिया को मैनेज किया जा सकता है और मीडिया को मैनेज किया जा रहा है। समाचार पत्र-पत्रिकाओं और न्यूज चैनल्स पर अचानक कुछ विशेष खबरों का आना और गायब हो जाना इसी ओर इशारा करता है।

    मीडिया के सन्दर्भ में आपका विश्लेषण बहुत सटीक है ....आपकी कही बातें प्रासंगिक हैं ......!

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  2. लोकेन्द्र जी,
    बहुत ही सटीक और तटस्थ विश्लेषण किया है आपने.. इस पूरे आलेख पर आपके पत्रकारिता ज्ञान की छाप दिखाई देती है.. जिन बातों को आपने उठाया है उसपर तो अब खुलकर चर्चाएं हो रही हैं.. किन्तु समस्या इतनी गंभीर हो चली है कि उपाय यदि शीघ्र न किया गया तो नुक्सान और भी गहरा होगा!
    बहुत ही सार्थक आलेख!!

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    1. सलिल जी, इस समस्या के समाधान के लिए भी जनजागरण की जरुरत है...

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  3. खबर खभरना बन्द कर, ना कर खरभर मित्र ।

    खरी खरी ख़बरें खुलें, मत कर चित्र-विचित्र ।


    मत कर चित्र-विचित्र, समझ ले जिम्मेदारी ।

    खम्भें दरकें तीन, बोझ चौथे पर भारी ।


    सकारात्मक असर, पड़े दुनिया पर वरना ।

    तुझपर सारा दोष, करे जो खबर खभरना ।।

    खबर खभरना = मिलावटी खबर

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    1. रवि जी, अपने इस लेख को पूर्ण कर दिया... धन्यवाद..

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  4. आज उसी दल की ख़बरें ज्यादा आती हैं जो मीडिया कों हेंडल कर ले ... यानी पैसा बाँट सके ... सच है मीडिया एक कारोबारी की तरह भष्ट हो चूका है ...

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  5. @ आज का पाठक सोच में रहता है कि किस खबर को सच माने और किस खबर को प्रायोजित। खबर के सभी पहलुओं को ठीक से समझने के फेर में कई बार उसे तीन-चार अखबारों का सहारा लेना पड़ता है।

    बात सही है और यही चिंता की बात है।
    मीडिया ही निष्पक्ष न रही तो फिर बाकी का क्या कहें।

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  6. अच्छा विश्लेषणात्मक आलेख। आपने सही कहा कि भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है, लेकिन समय बीतने के साथ-साथ यह बुराई संगठित भी होती जा रही है और उन व्यवसायों को जकड़ रही है जो पहले भद्र माने जाते थे।

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  7. यह अब कोई छुपी बात नहीं रही ! रोज ही इस बात के ढेरों प्रमाण मिल जायेंगे कि देश के तथाकथित बड़े मीडिया हाउस ही इस काम में सबसे ज्यादा लिप्त है! हिन्दुस्तान के तो क्या कहने मगर ज़रा टाइम्स ऑफ़ इंडिया की यह खबर देखिये यह उन्होंने जब चार मई को अपनी साईट पर पोस्ट कर दी थी तो आज फिर से उसे दिखलाना क्या साबित करता है ?

    Narendra Modi plants party man in IIM-Ahmedabad's board of governors

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  8. होता चर्चा मंच है, हरदम नया अनोखा ।

    पाठक-गन इब खाइए, रविकर चोखा-धोखा ।।

    बुधवारीय चर्चा-मंच

    charchamanch.blogspot.in

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  9. लोकतंत्र का चौथा खम्भा मजबूत होना चाहिए, कोई शक नहीं लेकिन ताकत का दुरूपयोग कहीं से भी उचित नहीं है और फिर मीडिया पर तो बाकी स्तंभों की चौकसी की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है|

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  10. मीडिया हो या अन्य कोई भी संस्था। बैठे तो उसमें भी मनुष्य ही हैं, मानवीय अवगुणों ( काम क्रोध, लोभादी) से युक्त होकर। व्यक्ति अपने विवेक का इस्तेमाल करके ही नीर-क्षीर विभाजन कर सकता है और सत्य को पहचान सकता है। अन्यथा अँधेरे में रहना ही उसकी नियति होगी।

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