शुक्रवार, 17 जून 2011

‘दूर हट ये फिरंगी, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’

सुबह के आठ बज रहे थे। उस दिन मैं जल्दी जाग गया था। चार बजे उठने वाले लड़के की नींद पत्रकारिता के पेशे में आने के बाद से औसतन 10 बजे खुलने लगी है। खैर, मैं नित्य की तरह शहर के खास समाचार-पत्र पढ़ रहा था। बाहर बच्चे खेल रहे थे। तभी एक जोर की आवाज आई-‘दूर हट ये फिरंगी, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।’ जैसी ही यह सुना, मन गदगद हो गया। मैं तुरंत ही बालकनी में पहुंचा। देखा कि एक छोटी सी बच्ची लकड़ी की तलवार से एक छोटे लड़के से लड़ाई कर रही है। उसके बाद में अपने कमरे में आ गया। अखबार पढ़ने का क्रम जारी रहा। इसी बीच रह-रह कर यह ख्याल जेहन में आ रहा था कि टेलीविजन पर जो प्रसारित हो रहा है उसका असर होता है। दरअसल, जी टीवी चैनल पर वीरांगना लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित कार्यक्रम का प्रसारण किया जा रहा है। मेरा भी यह पसंदीदा कार्यक्रम है। ‘दूर हट ये फिरंगी, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ उसी कार्यक्रम का प्रमुख डायलोग है। निश्चित तौर पर वह बालिका इस कार्यक्रम को देखती होगी।
     इस वाकये के बाद से उन लोगों की बात वजनदार दिख रही थी जो कहते हैं कि टेलीविजन पर अच्छे कार्यक्रम प्रसारित होने चाहिए। घटिया किस्म के कार्यक्रमों को देखने से समाज में विकृतियों का जन्म हो रहा है। वहीं वे लोग झूठे किस्म के लगे जो कहते हैं कि टेलीविजन पर प्रसारित कार्यक्रम तो समाज का ही आईना है। समाज में जो चल रहा है वही हम दिखा रहे हैं। अब भला इस बच्ची को देखकर तो झांसी की रानी के जीवन पर आधारित कार्यक्रम नहीं बनाया गया होगा। सत्य तो यही है कि झांसी की रानी सीरियल को देखकर उसने यह सीखा होगा। वैसे भी सदा से इसी बात पर जोर दिया जाता रहा है कि जो जैसा खाता है, देखता है, सुनता है और जैसा पढ़ता है उसके आचरण में वह झलकता है। परिवार छोटे हो गए हैं। घर में कहानी सुनाने को दादा-दादी है नहीं। मां-पिता दोनों ने अर्थ उपार्जन की जिम्मेदारी संभाल रखी है। ताकि इस महंगाई में गुजर हो सके। बच्चों के पालक मशीनी यन्त्र हो गए हैं। वे या तो कंप्यूटर गेम खेलकर अपना समय व्यतीत करते हैं या फिर टीवी से चिपके रहते हैं। क्या अच्छा है और क्या बुरा। इसकी उन्हें समझ नहीं होती। जो उनके बाल सुलभ मन को अच्छा लगता है वे उसे देखने लगते हैं। लगभग सभी चैनल पर फूहड़ता परोसी जा रही है। ऐसे में जिसे वो देख रहे होते हैं उसका उनके जीवन पर असर होता है। इसलिए टीवी कार्यक्रम निर्माताओं को कार्यक्रम बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका बच्चों और समाज के युवा वर्ग पर विपरीत प्रभाव न पड़े।
     वैसे आज झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की शहादत का दिन है। रानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी नगरी में मोरोपंत तांबे के घर में 19 नवम्बर 1835 को हुआ था। मां का नाम था भागीरथी। जन्म के समय लक्ष्मीबाई का नाम रखा मणिकर्णिका। 14 वर्ष की उम्र में झांसी नरेश गंगाधर राव नेवालकर से उनका विवाह हो गया। विवाह बाद ही उनका नाम रानी लक्ष्मीबाई रखा गया। रानी बचपन से ही अंग्रेजों का विरोध करती रहीं। अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए ही मनु ने बचपन में ही शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा ले ली थी। रानी का जीवन संघर्ष से बीता। लगभग हर एक भारतीय उनकी कहानी से परिचित है। अंग्रेजों के विरूद्ध 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अभूतपूर्व रहा। इसी बीच वह काला दिन आया जब रानी इस दुनिया से चली गईं। 17 जून 1857 को ग्वालियर में अंग्रेजों से युद्ध करते समय रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं। उस महान आत्मा को मेरी ओर से कोटिशः प्रणाम।

7 टिप्‍पणियां:

  1. अंग्रेज़ लुटेरों का सामना करते हुए अपने देश पर जान क़ुर्बान करने वाली रानी लक्ष्मी बाई को नमन!

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  2. लोकेन्द्र भाई सच कहा आपने...टीवी पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों का बाल पर ही नहीं अपितु वयस्क मानों पर भी प्रभाव पड़ता है...
    महारानी वीर लक्ष्मीबाई को कोटिश नमन:...

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  3. शानदार और उम्दा पोस्ट! महारानी लक्ष्मीबाई को मेरा शत शत नमन!

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  4. रानी लक्ष्मी बाई को नमन है ..
    खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी है ...

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  5. Thought I would comment and say neat theme, did you make it for yourself? It's really awesome!

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