शनिवार, 14 जनवरी 2012

बड़ा मुश्किल होता है अपनों से दूर होना

 ए क बरस और बीत गया। मैं 28 साल का हो गया। मेरे जीवन का 28वां साल उडऩ खटोले पर सवार होकर आया था। पता ही नहीं चला कब गुजर गया। मैं बस देखता रहा और वो तरसाकर चलता बना। इस साल बहुत कुछ पाया तो बहुत कुछ नहीं। कुछ पाकर भी नहीं पा सका। इस बहुत कुछ खोया भी तो बहुत कुछ खोकर भी नहीं खोया। कुल जमाकर कुछ नए पाठ सीखने को मिले। 28वें वसंत की शुरुआत में ही प्रणय सूत्र में बंध गया था। 21 जनवरी को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। तीन माह प्रेम से गुजरे ही थे कि विरह ने आकर घेर लिया। और अधिक ऊंचा पढऩे की ख्वाहिस से राजधानी भोपाल चला आया। राजधानी में पत्रकारिता करने की अदम्य लालसा भी थी। भोपाल ट्रांसफर करने के लिए कंपनी में अर्जी दे रखी थी। मई में फरमान आ गया-भोपाल जाना है। अद्र्धांगिनी को यह स्वीकार न था कि मैं उसे छोड़कर जाऊं और वह भरेपूरे परिवार को छोड़कर जाए। उस रात वह देर तक रोयी थी। मुझसे बात भी नहीं की थी। एक क्षण तो उसके आंसुओं ने मेरे पैरों में बेढिय़ां ही डाल दी थीं। अंततोगत्वा मेरा जाना तय हुआ। इधर, इन दिनों मेरी मां का भी बुरा हाल था। वो कई बार मुझसे पूछ चुकी थीं - तेरा जाना जरूरी है क्या? यहीं रहकर पढ़ाई नहीं हो सकती क्या? जैसे-तैसे करके मैं उन्हें समझा सका। विदा करते वक्त दरवाजे पर मां-पिता, दादा-दादी, भाई-बहिन सब थे।  शहर से दूर जाने का मेरा यह पहला मौका नहीं था। हर साल मैं 10 से 20 दिन के प्रवास पर घर से बाहर जाता ही था। लेकिन, इस बार मैं लम्बे समय तक वापस घर नहीं आने के लिए शहर छोड़ रहा था। दरवाजे से सटकर मेरी मां खड़ी थी। भाई स्कूटर लेकर तैयार था। मेरी और मां की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ रहा था। दोनों एक-दूसरे के सामने रोना नहीं चाहते थे। सब मुझे देख रहे थे, मैं बारी-बारी से सबको। आंसुओं की झीनी परत के कारण मुझे सबके चेहरे धुंधले नजर आ रहे थे। ठीक वैसे ही धुंध छाए कांच की दूसरी ओर देखने पर दिखता है। ठीक वैसे ही जैसे सर्द मौसम में हल्की धुंध में चीजें लिपटी हुई होती हैं। भाई स्टेशन तक छोडऩे आया था। मैं स्कूटर पर पीछे बैठा था। अब मां सामने नहीं थी। आंसुओं को और बांध न सका। बह गए सब।
      भोपाल के हर चौराहे से सफलता की सौ राहें फूटती हैं। लेकिन, शुरुआती दिनों में मुझे सिर्फ घर जाती राह ही नजर आती थी। मेरा व्यथित मन देख साथ देने के लिए श्रीमती जी भी भोपाल आ गईं। इधर, यहां भी आवोहबा मुझे भाने लगी। धीरे-धीरे ही सही लेकिन कब मैं भोपाली हो गया पता ही नहीं चल सका। भोपाल के ताल ने मेरा बड़ा साथ दिया। जब भी उदास हुआ या आनंद की अनुभूति हुई अपने अभिन्न मित्र दीपक सोनी के साथ पहुंच जाता था ताल के किनारे। घंटो उसे देखता रहता। सूरज की रोशनी में भी तो कभी चंद्रमा की चांदनी में ताल से बातें कीं। उसके पास सभी बातों का जवाब था। एक दिन उसने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहा- मुझे देखो गर्मी में कितना रीत जाता हूं। लेकिन, मुझे उम्मीद रहती है कि वक्त बदलता है। मन सकारात्मक रखो तो बुरे दिन भी मौज से कट जाते हैं। फिर बारिश के बाद में लबालब हो जाता हूं। और भी तमाम बातें वो मुझसे करता था। इस बीच भोपाल में मुझे कई अच्छे दोस्त भी मिल गए। कुछ पहले से ही थे तो माहौल बन गया।
     मेरे प्रेरणास्त्रोत युवा संत स्वामी विवेकानंद का जन्मदिवस मेरी जन्मतिथि (14 जनवरी) से दो दिन पहले (12 जनवरी) को पड़ता है। 'विवेक' से 'आनंद' लेता रहा इसलिए कभी भी निराशा को मन में घर नहीं करने दिया। हालांकि इस साल हमला तो नैराश्य ने कई बार किया था। कई बार उसने मेरे आत्मविश्वास और उत्साह पर हावी होना चाहा। लेकिन, धूल ही चाट सका बेचारा। मेरे पास स्वामी विवेकानंद के प्रेरणादायी विचारों की एक छोटी-सी पुस्तिका थी - 'शक्तिदायी विचार'। इस पढ़कर साहस बटोर लेता और भिड़ जाता अंधेरे से। उम्मीद की दो किरण तो फोड़ ही लाता था। बस फिर क्या चल रही है जिंदगी....

सोमवार, 9 जनवरी 2012

अधूरे मंदिर के आंगन में आधा दिन

 भो जपुर अधूरे लेकिन विशाल शिवालय के लिए मशहूर है। बेतवा नदी किनारे 106 फीट लम्बे, 77 फीट चौड़े और 17 फीट ऊंचे चबूतरे पर शिवमंदिर बना है। इसमें दुनिया के विशालतम शिवलिंगों में शुमार है। योनिपट्ट सहित शिवलिंग की ऊंचाई 22 फीट है। इस विशाल मंदिर को उत्तर भारत का सोमनाथ कहा जाता है। परमार वंशीय राजा भोज (1010-1055 ई.) को सांस्कृतिक कार्यों, शिव भक्ति और सरस्वती उपासना के लिए इतिहास के पन्नों में जीवत रखा गया है। राजा भोज प्रकांड पण्डित और विद्याप्रेमी थे। ज्योतिष, राजनीति, दर्शन, वास्तु, व्याकरण और चिकित्सा शास्त्र के ज्ञाता थे। इन विषयों पर दो दर्जन से अधिक ग्रंथ उन्होंने लिखे थे। राजा भोज के राज्य के संबंध में 11 अभिलेख उज्जैन, देपालपुर, धार, बेटमा और भोजपुर सहित अन्य जगहों से मिले हैं। राजा भोज का राज्य चित्तौड़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, भिलसा (वर्तमान विदिशा), खानदेश, कोंकण, और गोदावरी की घाटी के उत्तरी भाग तक विस्तृत था। इस विशाल राज्य की राजधानी धारा नगरी (वर्तमान धार) थी। इन्हीं राजा भोज ने भोजपुर में विशाल शिव मंदिर का निर्माण कराया था। कहा जाता है कि गगन को चूमते इस शिवालय का निर्माण 24 घंटे में किया गया था। किन्हीं कारणों से मंदिर को पूरा नहीं बनाया जा सका। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी विधर्मी ने इसे तोड़ दिया हो। मंदिर अधूरा है लेकिन भव्य है।

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

उनका हिन्दू होना ही दुर्भाग्य है !

 को ई भी इंसान अपनी जमीन यूं ही नहीं छोड़ता। उसके साथ उसके पुरखों की याद जुड़ी होती है। लेकिन, पाकिस्तान में हिन्दू एक क्षण भी नहीं रहना चाहते। वे अपनी जमीन, जायदाद सबकुछ छोड़कर बस वहां से भाग जाना चाहते हैं। हाय री दुनिया! उनके लिए यह भी तो मुमकिन नहीं। हिन्दुओं के देश में ही उन्हें रहने को ठौर नहीं मिल रहा तो कहीं और का खयाल कैसे किया जाए। पाकिस्तान से आए १५१ हिन्दुओं पर बैरी सरकार की नजर है। इनका वीजा समाप्त हो गया है। इसलिए सरकार उन्हें यहां से घसीटकर फिर से पाकिस्तानी नर्क में धकेल देना चाहती है। जहां न उनकी इज्जत है न उनके काम की। उनके धर्म को तो वहां हिकारत की नजरों से देखा जाता है। उनकी नाबालिक और जवान बेटियों-बीवीयों पर पाकिस्तानी युवकों-बूढ़ों की नजर ठीक वैसे ही रहती है जैसे कुत्तों की नजर हड्डी पर। लड़कियों का अपहरण, जबरन धर्मांतरण, बेरोजगारी, मताधिकार पर प्रतिबंध, आए दिन प्रताडऩा.... पाकिस्तान में हिन्दुओं की महज २ फीसदी रह गई आबादी को आज यही सब हासिल हैं।
      इस सबसे आजिज आ चुके पाकिस्तानी हिन्दू अब पाकिस्तान में और नहीं रहना चाहते। भारत सरकार भी उनकी मदद नहीं करती। भारत सरकार की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान में हिन्दुओं की स्थिति सुधारने के लिए बात नहीं की जाती। आखिर क्यों...? क्या इसलिए कि वे हिन्दू हैं। शायद हां। ऑस्ट्रेलिया में आतंकवादी होने के शक में एक मुस्लिम डॉक्टर के पकड़े जाने पर भारत के प्रधानमंत्री को नींद नहीं आ सकी थी। जबकि पाकिस्तान में आए दिन हिन्दुओं के साथ दुराचार हो रहा है, वे और उनकी सरकार तान के चादर सो रही है। पाकिस्तान की स्थानीय एजेंसियों की ओर से किए गए शोध बताते हैं कि पाकिस्तान में हर माह औसत २५ लड़कियों का अपहरण होता है और जबरन उनका धर्मांतरण किया जाता है। नतीजा यह है कि विभाजन के समय पाकिस्तान में हिन्दुओं की आबादी करीब 15 फीसदी थी, जो वर्तमान में महज 2 फीसदी से भी कम रह गई है। हिन्दुओं के पूजा स्थल तोड़ दिए गए या फिर उन पर मुसलमानों ने कब्जा कर लिया। फिलवक्त पाकिस्तान में 428 मंदिरों में से सिर्फ 26 में ही पूजा-पाठ होता है। इतना ही नहीं उन्हें अंतिम संस्कार करने तक की आजादी नहीं है। वहां हिन्दू अपने धर्म के मुताबिक परिजन के शव को जला नहीं सकते। स्थानीय मुस्लिम आवाम दबाव बनाकर शव को दफन करवा देती है।
      ऐसी स्थितियों में भला कोई कैसे रह सकता है? जिन 151 हिन्दुओं को सरकार वापस पाकिस्तान भेजना चाह रही है वे ऐसी ही अपमानजनक स्थितियों से तंग आकर भारत आए हैं। उन्हें उम्मीद थी कि यह उनके अपने हिन्दू भाइयों का देश है। यहां उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने के लिए थोड़ी सी जगह मिल सकेगी। लेकिन, दुर्भाग्य कि वे वोट बैंक नहीं है, अल्पसंख्यक नहीं, भारत को अपना मानते हैं भारत विरोधी नहीं है, ऐसे में सरकार उन्हें सिरमाथे कैसे बैठा सकती है। हां, अगर ये हिन्दू नहीं होते तो बांग्लादेशी और पाकिस्तानी घुसपैठियों की तरह इनके राशनकार्ड बनवा दिए जाते, रहने और रोजगार की व्यवस्था कर दी जाती। पिछले दिनों यूपीए सरकार के केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री एम रामचंद्र ने संसद को लिखित बयान में कहा था कि इन पाकिस्तानी हिन्दुओं को वापस पाकिस्तान जाना होगा। इनका वीजा समाप्त हो चुका है। जब यह बात मीडिया के जरिए समाज में पहुंची तो कुछ संगठनों की संवेदनाएं जागी। उन्होंने जाकर उनके सुख-दु:ख को जानने की कोशिश की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारी व कार्यकर्ता, विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय जनता पार्टी और अन्य हिन्दू संगठनों के लोग वहां पहुंचे। संत श्री श्री रविशंकर, स्वामी स्वरूपानंद, स्वामी आनंदस्वरूप सहित अन्य साधु-संत की उनको दिलासा देने पहुंचे। इन पाकिस्तानी हिन्दुओं को भारत में शरण दी जानी चाहिए इस बात को लेकर अखिल भारत हिन्दू महासभा दिल्ली हाईकोर्ट में पहुंची। हिन्दू महासभा की याचिका पर बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यकारी चीफ जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ की बेंच ने विदेश और गृह मंत्रालय से इस मसले पर 29 फरवरी तक जवाब मांगा है। केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री एम. रामचन्द्र के बयान से घबराए हुए ये हिन्दू राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मानवाधिकार आयोग तक में गुहार लगा चुके हैं। मुसीबत के मारे हिन्दू करें भी तो क्या? यहां उनके अपने सुनवाई नहीं कर रहे बल्कि उन्हें जबरन पाकिस्तान भेजना चाह रहे हैं और वहां मुसलमान उन्हें जीने नहीं देंगे।
      आश्चर्य इस बात पर अधिक है कि पाकिस्तान से आए महज 151 हिन्दुओं को वापस पाकिस्तान भेजने के लिए केन्द्र सरकार कटिबद्ध दिख रही है जबकि सालों से पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में अवैध रूप से भारत आए मुसलमानों को उनके देश भेजने को कभी उत्सुक नहीं रही। आजादी के बाद के 60 सालों में कांग्रेस व अन्य तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों ने बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए घुसपैठियों को बसाने का ही काम किया है न की भगाने का। पश्चिम बंगाल, असम सहित पूर्वांचल के राज्यों में अवैध बांग्लादेशियों के चलते स्थितियां बिगड़ गईं हैं। केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री एम रामचंद्र राज्यसभा के एक प्रश्न के उत्तर में बताते हैं कि देश में करीब 70 हजार विदेशी अवैध तरीके से रह रहे हैं। इनमें 28 हजार से अधिक बांग्लदेशी हैं। इसके अलावा 13747 अफगानिस्तानी, 8319 पाकिस्तानी, 2461 अमरीकी, 1817 ब्रिटिश और 662 चीनी अवैध तरीके से भारत में रह रहे हैं। उक्त सभी आंकड़े सरकारी हैं। वास्तविकता इससे अलग है। देश में बांग्लादेश से और बांग्लादेश के रास्ते पाकिस्तान, अफगानिस्तान के लोग भारी संख्या में आए दिन घुसपैठ करते हैं। सरकार 151 हिन्दुओं को भगाने के लिए तो आतुर दिख रही है लेकिन अन्य के बारे में कोई कार्रवाई करने के मूड में नहीं दिखती। पिछले दिनों एक शोध में बताया गया कि बांग्लादेश, असम और पूर्वांचल के राज्यों में इन अवैध विदेशियों को वोट की खातिर राशनकार्ड, वोटर आईडी बनवा दिए गए। वैध तरीके से बने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कई बांग्लादेशियों ने तो नगरीय निकाय के चुनाव भी लड़े और जीत भी हासिल की। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान से आए लोगों का धर्म हिन्दू है इसलिए इनको सरकार से मदद की आशा नहीं रखनी चाहिए।
      पाकिस्तान में हिन्दुओं की दुर्दशा के गवाह हैं दिल्ली के मजनूं टीला में डेरा डाले 151 पाकिस्तानी हिन्दू : पाकिस्तान में हिन्दुओं की क्या स्थिति है, यह किसी से छिपी नहीं है। भारत सरकार भी इस बात से भली-भांति परिचित है। भारत में पर्याप्त आजादी के बाद भी अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए छाती पीटने वाले बुद्धिजीवी, सेक्यूलर और एक्टिविस्ट भी जानते हैं कि कैसे पाकिस्तान में 62 सालों में हिन्दू 15 फीसदी से महज 2 फीसदी रह गए। लेकिन, सवाल उठता है सब जानते हैं तो बोलते क्यों नहीं? भारत के अल्पसंख्यकों के हितों की चिंता तो अंतरराष्ट्रीय पटल तक करते हैं लेकिन पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की रक्षा पर घर में ही चुप्पी साध लेते हैं। मीडिया कई दफा पाकिस्तान में हिन्दुओं की क्या दुर्दशा हो रही है इसकी जानकारी देती रहती है। कुछ राष्ट्रवादी सोच के पत्र-पत्रिका भी समय-समय पर पाकिस्तान के हिन्दुओं के हितों की चिंता करते दिखती हैं। इनके दिए आंकड़ों को तो सरकार के लोग और बुद्धिजीवी सेक्यूलर झूठ का पुलिंदा करार दे देते हैं। मेरे ही एक आलेख पर दिल्ली के एक पत्रकार अंगुली उठाते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान में ऐसा नहीं होता आपकी जानकारी गलत है। पता नहीं किस ने आपको यह जानकारी मुहैया कराई है। वहां हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार, जबरन धर्मांतरण, टेरर टैक्स जैसी कोई बात नहीं। उन महाशय और उनके जैसे तमाम सेक्यूलरों को जवाब देने के लिए दिल्ली के मजनूं टीला में डेरा डाले 151 पाकिस्तानी हिन्दू मौजूद हैं।
इंडिया टुडे की रपट कहती है कि पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों का अपहरण आम बात है : हिन्दी की प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका इंडिया टुडे ने अपने 1 जून, 2011 के अंक में बताया है कि पाकिस्तान में हिन्दुओं का जीना मुहाल है। उनका हर दिन खौफ के साए में गुजरता है। मुसलमानों के लिए बने प्याऊ से हिन्दू पानी भी नहीं पी सकता। अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करने तक की आजादी उन्हें नहीं है। उन्हें मजबूरी में इस्लाम की शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती है क्योंकि वहां के सभी स्कूलों का इस्लामीकरण कर दिया गया है। हाल ही में अमरीका की एक सरकारी संस्था की रिसर्च बताती है कि पाकिस्तान के स्कूलों में भारत और हिन्दुओं के खिलाफ घृणा का पाठ पढ़ाया जाता है। इंडिया टुडे की रपट बताती है कि कराची की एक फैक्टरी में हिन्दू कर्मचारी जगदीश कुमार की हत्या फैक्टरी के ही मुसलिम साथियों ने कर दी। उस पर इस्लाम की निंदा करने का आरोप लगा दिया गया। पेशावर के जगदीश भट्टी इंडिया टुडे को बताते हैं कि नौकरी पाने के लिए उनके बेटे को मुसलिम नाम रखना पड़ा। पुलिस अधिकारियों ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर इंडिया टुडे को बताया कि कई हिन्दुओं से सुरक्षा के नाम पर हर माह वसूली की जाती है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की परिषद के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अमरनाथ मोटूमल इंडिया टुडे को बताते हैं कि अकेले कराची में ही हिन्दू लड़कियों का अपहरण आम बात है। आगे पत्रिका में लिखा है कि नगरपारकर इलाके की 17 साल की एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया जबकि आकली गांव की 15 साल की लड़की का अपहरण कर जबरन उसका धर्म परिवर्तन किया गया।
तहलका की विशेष खबर बताती है पाकिस्तान में हिन्दू होना गुनाह : स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के लिए प्रसिद्ध पत्रिका तहलका ने 31 दिसंबर 2011 के अपने अंक में पाकिस्तान से आए 151 हिन्दुओं के मुख से पाकिस्तान में हिन्दुओं के हालात का जिक्र किया है। तहलका के संवाददाता को इन हिन्दुओं में से 22 वर्षीय दयाराम बताते हैं कि वहां हिन्दुओं का धर्म नहीं है। हम लोगों को डराया धमकाया जाता है। धर्म बदलने को कहा जाता है। स्कूलों में सिर्फ इस्लाम की शिक्षा देते हैं। परेशानियां सह कर अगर हिन्दू पढ़ भी ले तो उसे नौकरी नहीं मिल पाती। एक नौजवान बताता है कि हम स्कूल में जवान लड़कियों को पढऩे नहीं भेजते थे क्योंकि वहां लोग हिन्दू लड़कियों को अगवा कर धर्म परिवर्तन करा कर निकाह करा लेते हैं। जैसे आपके यहां लड़कियां आराम से अकेले दिल्ली से मुंबई चली जाती हैं, वैसे हमारे यहां इतनी दूर अकेले नहीं जा सकतीं। 35 वर्षीय आशा देवी कहती है कि यहां हमने पहली बार दिवाली इतनी खुशी से मनाई। वहां तो पता ही नहीं चलता कि त्योहार है। मनाते भी थे तो अपने घर के अंदर एक कोने में एक-दो दिए जला कर। होली भी बाहर नहीं खेल सकते थे। सबसे अधिक दु:ख वाली बात है कि वहां अंतिम संस्कार भी आप अपने ढंग से नहीं कर सकते। इस बारे में सुनील ने तहलका को बताया कि वहां हिन्दुओं को मरने के बाद जलाने भी नहीं दिया जाता है। शव जलाने के वक्त लोग पुलिस लेकर आ जाते हैं कि जलाओ मत, हमें बदबू आती है। दो-तीन दिन तक लाश ऐसे ही पड़ी रहती है। फिर कुछ लोग दबाव में आकर दफना देते हैं।
      बहरहाल, इन सब बातों को जानने के बाद भी सरकार इन हिन्दुओं को पाकिस्तान भेजती है तो लानत है ऐसी सरकार पर। केन्द्र सरकार को चाहिए कि पाकिस्तान से आए इन हिन्दुओं बयानों को आधार बनाकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर मजबूती के साथ पाकिस्तान में रह रहे अन्य हिन्दुओं की हितों की रक्षा के लिए पाकिस्तान की सरकार पर दबाव बनाए। साथ पाकिस्तान में मानवाधिकारों की क्या स्थिति है इस बारे में दुनिया को बताया जाए।

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

जब गुंडा ही हीरो हो तो मुश्किल होती है


 हा ल ही में पहली बार मैंने दो फिल्म एक ही दिन में देखीं। एक डॉन-२ और दूसरी लेडीज वर्सेस रिक्की बहल। डॉन-२ में भारतीय सिनेमाई परंपरा के विपरीत कहानी है जबकि लेडीज वर्सेस रिक्की बहल में कहानी समाज की सोच के साथ ही बहती है। पैसा वसूल नजरिए से तो दोनों फिल्में मुझे पसंद आईं लेकिन विद्रोही मन ने इन्हें नहीं स्वीकारा। मेरे मन ने डॉन-२ में सिनेमाई परंपरा का उल्लंघन और लेडीज वर्सेस रिक्की बहल में समाज की सोच का फिल्मांकन स्वीकार नहीं किया। दरअसल, डॉन-२ के अंत में विलेन विजयी होता है। फिल्म में एक अंतरराष्ट्रीय बदमाश को हीरो की तरह प्रस्तुत किया गया है। यहां मेरा मन फिल्म निर्माता का विरोध करता है। साहित्य और सिनेमा समाज के शिक्षक-मार्गदर्शक होते हैं इस बात का मैं हिमायती हूं। ऐसे में डॉन-२ से क्या सीखा जा सकता है, अपराध जगत का बेताज बदशाह होना? कहानी में एक अपराधी को हीरो की जगह रखा गया है। फिल्म का अंत अच्छाई की जगह बुराई की जीत पर हुआ। एक गुंडा पुलिस-इंटरपोल सबको ठेंगा दिखाता हुआ उनकी गिरफ्त से दूर चला जाता है। अभी तक भारतीय सिनेमा में बहुत कम मौके आए होंगे की प्यार-रिश्ते-नाते दायित्व पर भारी पड़े हों। कर्तव्य को हमेशा भावनाओं के बंधन से ऊपर माना गया और दिखाया गया। हमारा सिनेमा अब तक सिखाता रहा है कि कर्तव्य मार्ग पर अगर अपने भी बाधा बनकर खड़े हों तो परवाह नहीं करनी चाहिए। कर्तव्य पहली प्राथमिकता है लेकिन फिल्म में कर्तव्य की मां-बहन एक कर दी गई। वरधान (बोमन ईरानी), रोमा (प्रियंका चोपड़ा) से कहता है कि डॉन (शाहरुख खान) को गोली मार दो। यहां रोमा के हाव-भाव देखकर ही दर्शक समझ जाता है भैंस गई पानी में। ये नहीं मारेगी गोली। हुआ भी यही। जिस गुंडे ने उसके भाई का कत्ल किया (डॉन-१ में) और जिसे दुनियाभर की पुलिस जिंदा या मुर्दा पकडऩा चाहती है रोमा उसके लिए खुद गोली खा लेती है। खैर, जो भी हो फरहान अख्तर ने बढिय़ा मसाला मूवी बनाई लेकिन माफ करना भाई अपुन को पसंद नहीं आई।
     वहीं, लेडीज वर्सेस रिक्की बहल में लड़कियों को बेवकूफ दिखाया गया है। दुनिया लड़कियों की प्रतिभा का लोहा मान रही है वहीं डायरेक्टर महाशय (मनीष शर्मा) ठग (रणवीर सिंह) के माध्यम से लड़कियों को कहानी के अंत तक आसानी से बेवकूफ बनाई जानी वाली 'गऊ' दिखा रहे हैं। रणवीर फिल्म में अगल-अलग जगह की लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फंसाता है फिर उनको 'स्टूपिड' (चूतिया) बनाकर उनका पैसा ऐंठकर दूसरे शिकार की तलाश में निकल जाता था। बाद में इशिका (अनुष्का शर्मा) की मदद से तीन लड़कियां रणवीर को 'कॉन' (छल से लूटना, ठगना) करने का प्लान बनाती हैं। धूर्त ठग इशिका के जाल में फंस भी जाता है लेकिन डायरेक्टर का पुरुष अहंकार जाग जाता है। उसने सोचा होगा कि लड़कियां कैसे लड़कों को 'कॉन' कर सकती हैं। दुनिया में 'स्टूपिड' होने का ठेका तो लड़कियों ने ही लिया है। भैय्ये जबकि यह सच नहीं है। डायरेक्टर महाशय अपने पुरुषार्थ को उच्च रखने के लिए कहानी को गर्त में धकेल देते हैं। किवाड़ के पीछे से ठग लड़कियों का प्लान जान लेता है। आखिर में लड़कियों को फिर से ठग लेता है। साबित कर देता है कि वे निरी बेवकूफ ही रहेंगी। पुरुषों से जीत की होड़ न लगाएं। अच्छी भली कहानी इसी मोड़ से सड़ान मारने लगती है। उसके बाद आगे के सीन दर्शक पहले ही गेस कर लेता है। 

रविवार, 25 दिसंबर 2011

शराबी कवियों से छीन लिया था मंच

 भा रत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के ८७वें जन्मदिन पर उनके कुछ पुराने फोटोग्राफ्स प्रस्तुत कर रहा हूं। कविमना, सरल हृदय और ओजस्वी वक्ता की एक कविता भी प्रस्तुत है। उनका जन्म ग्वालियर में हुआ था। यहीं से उन्होंने राजनीति में कदम रखा। संयुक्त राष्ट्र सभा को हिन्दी में संबोधित करने वाले भारत के सपूत और प्रख्यात हिन्दी प्रेमी के संबंध में ग्वालियर में अनेक किस्से प्रचलित हैं। एक किस्सा जरूर बताना चाहूंगा। उन दिनों की बात है जब वे महाविद्यालयीन पढ़ाई कर रहे थे। ग्वालियर में एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि समय से सम्मेलन में नहीं पहुंच सके थे। कार्यक्रम में विलंब होते देख अटल बिहारी ने माइक संभाला और कॉलेज के नए-नए कवियों को मंच सौंप दिया। इसके बाद की बात और जबरदस्त है। कवि महोदय शराब के नशे में टुन्न होकर कार्यक्रम में पहुंचे। अटल बिहारी को जैसे ही मालूम हुआ उन्हें यह ठीक नहीं लगा। कविता का पाठ करते-करते कवि बहकने भी लगे थे। मामला बिगड़ता इससे पहले ही उन्होंने कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा कर दी।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उन्हें दीर्घ आयु और स्वास्थ्य मिले। ताकि वे फिर से नेताओं को मूल्य आधारित राजनीति का पाठ पढ़ा सकें।











झुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

विरोध का असल कारण कुछ और...

 रू स में कुछ मतिभ्रष्ट ईसाई मत के लोगों ने हिन्दुओं के ही नहीं वरन् संपूर्ण विश्व के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के धर्मग्रंथ गीता पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। वे इस मसले को रूस के साइबेरिया प्रांत में टोम्स्क की एक अदालत में घसीट ले गए। उनके इस कुप्रयास पर दुनियाभर से कड़ी आपत्तियां आईं। नतीजन अदालत ने मामले की सुनवाई टाल दी। रूस में गीता पर लिखे जिस भाष्य को लेकर विवाद शुरू हुआ, वह इस्कॉन के संस्थापक संत स्वामी प्रभुपाद जी की रचना है,  किताब का नाम है : भगवद गीता एज इट इज। इस्कॉन संस्था भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनके उपदेशों के लिए समर्पित ढंग से काम कर रही है। अनेक देशों में इस्कॉन ने भव्य मंदिर बनाए हैं। उनके माध्यम से श्रीकृष्ण और गीता के विचार को प्रचारित और प्रसारित किया। इस्कॉन के इसी समर्पण के चलते अन्य धर्म के लोग गीता और हिन्दू धर्म के करीब आए। वैसे भी विश्वभर में गीता के अनेक विद्वान मुरीद हुए हैं और वर्तमान में भी हैं। दुनिया में संभवत: गीता के अलावा कोई ऐसा ग्रंथ नहीं होगा, जिसकी सौ से ज्यादा व्याख्याएं होंगी। विरोध कर रहे लोगों ने आरोप लगाया है कि यह धर्म हिंसा सिखाता है। कट्टरवाद को बढ़ावा देता है। ईसाई मत से मेल नहीं खाता। तीनों ही तर्क अजीब  और बेबुनियाद हैं। देखा जाए तो ये तीनों तर्क तो अन्य धर्म (ईसाई और इस्लाम) के धर्मग्रन्थों पर सटीक बैठते हैं। खैर इस बात को यहीं छोड़ दिया जाए तो ठीक है।
     दरअसल, गीता के विरोध का कारण ईसाई धर्म से मेल खाना नहीं है। इसके पीछे कुछ और ही कारण है। वह कारण है इस्कॉन की ओर से किए जा रहे कार्यों के प्रभाव से कई ईसाई लोग गीता और हिन्दू धर्म के नजदीक आए हैं। वे सब कुछ छोड़कर कृष्ण के प्रेम में डूबे हैं। मैंने स्वयं देखा है कि इस्कॉन की ओर से स्थापित मंदिरों में किस तरह गोरे सबकुछ भूलकर कृष्ण की भक्ति में रमे रहते हैं। इससे ही ईसाईयों के पेट में पीर हो रही है। ईसाई इधर भारत में तमाम झूठे प्रलोभन दिखाकर और छल-कपट से हिन्दुओं को ईसाई बनाते हैं। उधर, बिना किसी प्रलोभन के ईसाई समाज इस्कॉन के सहारे हिन्दू धर्म में शामिल हो रहा है। हालांकि यह प्रक्रिया उतने स्तर पर नहीं है जितनी हिन्दुओं के ईसाई बनने की है। इसमें यह भी समझना होगा कि इस्कॉन लक्ष्य निर्धारित कर ईसाईयों को हिन्दू नहीं बनाता। न हीं उनका कभी भी धर्मांतरण करता है। वहां आने वाले सभी धर्म के लोग सिर्फ श्रीकृष्ण के भक्त ही होते हैं। संभवत: यही ईसाई मत के उन मतिभ्रष्ट लोगों की तकलीफ का कारण है। तमाम उदाहरण, घटनाएं और शोध रिपोर्ट जाहिर करती हैं कि बड़े पैमाने धर्मांतरण का काम ईसाईयों की ओर से ही किया जा रहा है। इस संबंध में पूर्व पोप बेनेडिक्ट ने तो खुली घोषणा की थी कि अब एशिया को ईसाई बनाना है। उसमें भी शुरुआत भारत से करनी है। जबकि न तो हिन्दू और न ही इस्कॉन संस्था इस तरह के कुकृत्य में संलिप्त है और न ही गीता ऐसा कोई संदेश देती है। गीता के बारे में विश्व के तमाम विद्वानों ने अपनी राय जाहिर की है। लेकिन, उसे हिंसा सिखाने वाला और कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाला किसी ने नहीं कहा। गीता तो जीवन का सत्य पथ प्रकाशित करती है। कर्म करने की प्रेरणा देनेवाला ग्रंथ है। गीता अध्यात्म नहीं जीवन दर्शन सीखती है। मनुष्य को हर परिस्थिति में सकारात्मक रहने की ऊर्जा गीता देती है।
विश्व की नज़र में श्रीमद् भगवत गीता ----
 अल्बर्ट आइन्स्टाइन - जब मैंने गीता पढ़ी और विचार किया कि कैसे इश्वर ने इस ब्रह्माण्ड कि रचना की है, तो मुझे बाकी सब कुछ व्यर्थ प्रतीत हुआ।
अल्बर्ट श्वाइत्जर - भगवत गीता का मानवता कि आत्मा पर गहन प्रभाव है, जो इसके कार्यों में झलकता है।
अल्ड्स हक्सले - भगवत गीता ने सम्रद्ध आध्यात्मिक विकास का सबसे सुवयाव्स्थित बयान दिया है। यह आज तक के सबसे शाश्वत दर्शन का सबसे स्पष्ट और बोधगम्य सार है, इसलिए इसका मूल्य केवल भारत के लिए नही, वरन संपूर्ण मानवता के लिए है।
हेनरी डी थोरो - हर सुबह मैं अपने ह्रदय और मस्तिष्क को भगवद गीता के उस अद्भुत और देवी दर्शन से स्नान कराता हूँ, जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और इसका साहित्य बहुत छोटा और तुच्छ जान पड़ता है।
हर्मन हेस - भगवत गीता का अनूठापन जीवन के विवेक की उस सचमुच सुंदर अभिव्यक्ति में है, जिससे दर्शन प्रस्फुटित होकर धर्म में बदल जाता है।
रौल्फ वाल्डो इमर्सन - मैं भागवत गीता का आभारी हूँ। मेरे लिए यह सभी पुस्तकों में प्रथम थी, जिसमे कुछ भी छोटा या अनुपयुक्त नहीं किंतु विशाल, शांत, सुसंगत, एक प्राचीन मेधा की आवाज जिसने एक - दूसरे युग और वातावरण में विचार किया था और इस प्रकार उन्हीं प्रश्नों को तय किया था, जो हमें उलझाते हैं।
थॉमस मर्टन- गीता को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित संस्कृति, भारत की महान धार्मिक सभ्यता के प्रमुख साहित्यिक प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है।
डा. गेद्दीज़ मैकग्रेगर - पाश्चात्य जगत में भारतीय साहित्य का कोई भी ग्रन्थ इतना अधिक उद्धरित नहीं होता जितना की भगवद गीता, क्योंकि यही सर्वाधिक प्रिय है.

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

अफजल बनाम कश्मीर की आग

 13  दिसंबर 2001 को देश के सर्वोच्च मानबिन्दु पर हमला हुआ था। दस बरस बीत गए लेकिन इस हमले को नाकाम करने में शहीद हुए वीरों के परिजनों की पीढ़ा कम नहीं हुई। उन्हें मलाल है कि संसद पर हमले और कई जवानों की हत्या का दोषी अफजल अब तक जिन्दा है। जेल में बिरयानी और सींक कबाब उड़ा रहा है। मलाई चाट रहा है। उसके ऐशो-ओ-आराम में पैसा देश की जेब से जा रहा है। इधर, कुछ सिरफिरे लोग उसको फांसी देने का जमकर विरोध कर रहे हैं। खुद कांग्रेसनीत यूपीए सरकार सालों से फाइल इधर से उधर कर रही है। पिछले साल जून में जम्मू-कश्मीर के लाटसाहब उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि - अफजल को फांसी न दो वरना कश्मीर सुलग उठेगा और लोग सड़कों पर उतर आएंगे। मकबूल बट्ट की फांसी के बाद जो आग कश्मीर में लगी थी वही आग अफजल को फांसी देने पर लग जाएगी.... (पढ़ें - ... तो क्या मुसलमान देशद्रोही है?)  साल भर भी नहीं बीता कि सैयद अब्दुल रहमान गिलानी ने भी यही राग अलापा। गिलानी ने कहा है कि अफजल दोषी नहीं है। उसे फांसी नहीं होनी चाहिए। अगर अफजल को फांसी होती है तो कश्मीर में आग लग जाएगी। कश्मीर में अशांति फैल जाएगी। अफजल की फांसी बड़ी परेशानी का कारण बनेगी।
    ऐसा नहीं है कि राष्ट्रविरोधी बातें करने वालों की यह सिर्फ धमकियां हैं। २००६ में बकायदा अफजल की फांसी के विरोध में श्रीनगर और जम्मू के कई इलाकों में हिंसक प्रदर्शन किए गए। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के वरिष्ठ नेता यासीन मलिक ने इन प्रदर्शनों का नेतृत्व किया।  इसी साल जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विधायक शेख अब्दुल रशीद ने अफजल गुरु की फांसी की सजा माफी के लिए एक प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का मुख्य विपक्षी पार्टी पीपुल्स डेमोके्रटिक पार्टी (पीडीपी) ने भी अफजल की क्षमादान याचिका का समर्थन किया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विट कर इसे अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिया।  देश की राष्ट्रीय अस्मिता पर हाथ डालने वाले अफजल गुरु की तरफदारी एक तरह से देशद्रोह है। शर्म की बात तो यह भी है कि देश की कथित १२५ साल पुरानी राजनीतिक पार्टी के कथित वरिष्ठ नेता अफजल को 'जी' लगाकर संबोधित करते हैं।
      मुझे ठीक-ठीक याद है कि हमले के छह-सात महीने बाद मैं संसद गया था। साथ में और भी दोस्त थे। वहां के प्रबंधन ने दो जवानों को हमें संसद घुमाने की जिम्मेदारी सौंपी। सुगठित शरीर के ऊंचे-पूरे जवान हमारे साथ हो लिए। मेरे एक दोस्त ने संसद की बाहरी दीवार में एक गहरा गड्ढा देखते हुए कहा-क्या यह गोली का निशान है। जवान का खून खौल गया। उसने हां में जवाब दिया। साथ ही कहा कि हमलावरों में से एक कुत्ता बच गया है। हमारे देश की राजनीति उसे लम्बे समय तक जिंदा रखेगी। पीढ़ा इसी बात की है। यह पीढ़ा दस बरस बाद १३ दिसंबर २०११ को भी दिखी। उस वक्त आतंकियों से लड़ते-लड़ते खेत रहे वीर जवानों के घरवालों ने दसवीं बरसी पर सरकार की ओर से आयोजित श्रद्धांजलि समारोह का बहिष्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारी एक ही मांग है कि देश के दुश्मन को जल्द ही फांसी पर लटकाया जाए। अब उसका जीवित रहना हमसे सहन नहीं होता। शहीदों के परिजन ही क्या हर देशभक्त उस वक्त ठगा-सा महसूस करता है जब खबरें आती हैं कि अफजल और कसाब की सुरक्षा में करोड़ों रुपए सरकार फूंक चुकी है। जेल में अफजल और कसाब बिरयानी खा रहा हैं। लगता है कि वे बिरयानी नहीं खा रहे हमारी बोटी नोंच-नोंच कर खा रहे हैं और हमारा उपहास उड़ा रहे हैं। जवानों को ऐसी थोती श्रद्धांजलि मत दो मेरे देश के कर्णधारो। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना है तो देश के गद्दारों को फांसी दे दो। राजनीति किसी ओर मुद्दे पर कर लेना। राजनीति के लिए ढेर मुद्दे हैं।