शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

...ऐसे तो ब्रिटेन के म्यूजियम खाली हो जाएंगे

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन अपनी पहली दो दिवसीय यात्रा पर भारत आए। सुना है कि ब्रिटेन को फांके पड़ रहे हैं। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था बदहाल है। प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की इस यात्रा मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन की डूबती नैया के लिए सहारा जुटाना था। कैमरन भारत के साथ व्यापार बढ़ाना चाहते हैं और 600 अरब रुपए के सौदे को भुनाने की ताक में थे।  जिसमें उन्हें कामयाबी हासिल हुई।
         चलिए शीर्षक से जुड़े विषय पर आते हैं। कैमरन ने एक अंग्रेजी खबरिया चैनल को साक्षात्कार दिया है। साक्षात्कार में डेविड कैमरन उस वक्त सोच में पड़ गए, जब साक्षात्कारकर्ता ने उनसे प्रश्न किया - 'भारत सरकार यदि ब्रिटेन से कोहिनूर मांगता है तो क्या ब्रिटिश सरकार कोहिनूर दे सकेगी?' प्रश्न सुनते ही जेम्स टेंशन में आ गए और सोच-विचारने वाली मुद्रा में बैठ गए। थोड़ी देर बाद बोले - 'यह तो संभव नहीं है, क्योंकि एक के लिए हां बोला तो ब्रिटेन का सारा म्यूजियम खाली हो जाएंगा।' उन्होंने ठीक ही कहा था, कहने से पहले सोचा भी था न। वैसे तो यह मुद्दे से इतर जाने का अच्छा जवाब था, लेकिन बहुत कुछ सच तो इसमें भी छुपा था। वो यूं कि, कैमरन का कहना था, यदि वह एक कोहिनूर को वापस करने के लिए हां बोलते है तो हो सकता है कि एक-एक कर सारी लूटी हुई वस्तुओं की मांग भारत करने लगे, फिर तो ब्रिटेन के  सारे म्यूजियम खाली होने ही हैं। क्योंकि ब्रिटेन के म्यूजियम लूटी हुई चीजों से ही भरे और सजे पड़े हैं। दो सौ साल बहुत होते हैं किसी देश को लूटने के लिए। ब्रिटेन  व्यापार का बहाना लेकर इस देश में घुसा और फिर धीमे-धीमे उसने लूटमार मचाना शुरू किया जो करीब दो सौ साल चला। उसी दो सौ साल में जो कुछ लूटा उसमें से आंशिक ही हिस्सा है जो ब्रिटेन के म्यूजियमों की शोभा बढ़ा रहा है। बाकी का बहुत सारा हिस्सा तो कहां, किस ब्रिटश कंपनी के अफसर के पेट में और अन्य जगह खप गया होगा पता नहीं।
          इतना ही नहीं सवाल और जवाब के बीच उन्होंने यह भी सोच लिया होगा कि अगर ब्रिटेन भारत के लिए हां करता है तो बाकि के वे देश भी तो अपनी चीजें वापस मांग सकते हैं, जो कभी अत्याचारी ब्रिटिश उपनिवेश के गुलाम हुआ करते थे। इस तंगहाली के दौर में अगर सबने अपनी-अपनी चीजें मांगनी शुरू कर दीं तो ब्रिटेन नंगा हो जाएगा।
इससे शायद महोदय पी. चिदंबरम की आंखे खुलें
    इस मामले से मुझे याद आया कि अक्टूबर 2007 में पी. चिदंबरम ने कहा था कि भारत तो कभी सोने की चिडिय़ा रहा ही नहीं। वे उस समय वित्त मंत्री हुआ करते थे। मुझे उस समय चिदंबरम की बुद्धि पर बड़ा आश्चर्य हुआ था कि पता नहीं इतना बड़ा सच पी. चिदंबरम साहब कहां से खोज लाए हैं? बचपन से तो हम यही पढ़ते आ रहे थे कि इस देश में अकूत संपदा थी जिसे समय-समय पर लुटेरों ने लूट लिया। हाथी, घोड़ों और ऊंटों पर लादकर ले गए। इतना ही नहीं कई आक्रांताओं ने तो बार-बार लूट मचाई। चिदंबरम द्वारा उद्घाटित यह सच तो उन वामपंथियों बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों की नजरों से भी औझल रहा, जो समय-बेसमय भारत को दीन-हीन और असभ्य बताते रहे हैं। चिदंबरम साहब को उस वक्त मैंने अपने शहर के एक प्रतिष्ठित अखबार में पत्र संपादक के नाम पत्र लिखकर पूछा था कि .....
- अगर भारत गरीब और कंगाल था तो क्यों विभिन्न आक्रांताओं ने इस देश पर बार-बार आक्रमण किया?
- क्यों बाबर (एक अत्याचारी जिसके तथाकथित मकबरे के लिए इस देश में खूब खून बहा है और राजनीति हुई है और हो री है। इतना ही नहीं इस देश के कई लोगों ने इस लुटेरे को अपना आदर्श बना रखा है।), तैमूर लंग और मुहम्मद गजनी, मुहम्मद गौरी आदि ने भारत में लूट मचाई?
- भारत गरीब था तो क्यों ईस्ट इंडिया कंपनी यहां व्यापार के लिए आई और नंगो-भिखारियों के देश में दो सौ साल तक क्या करती रही?
         इन सवालों की गूंज पी. चिदंबरम के कानों तक तो उस समय न पहुंची होगी, लेकिन उम्मीद करता हूं कैमरन ने जो कहा उस पर तो उन्होंने गौर किया ही होगा। आखिर महाशय भारत के गृह मंत्री हैं।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

और खूंखार हो गए सचिन

सचिन के बारे में सिद्ध हो चुका है कि वे अपने आलोचकों को जवाब माइक से नहीं बल्कि अपने बल्ले से देते हैं। सचिन के खेल पर जब-जब किसी ने ऊंगली उठाई है, तब-तब उन्होंने इसका करारा जबाव बल्ले से दिया है।  अभी-अभी 168 वें मैच में पांचवा दोहरा शतक ठोककर उन्होंने सुनील गावस्कर (टेस्ट में चार दोहरे शतक) को पीछे छोड़ते हुए राहुल द्रविड़ की बराबरी कर ली है। टेस्ट क्रिकेट में अब उनके 48 शतक हो गए हैं।  इसके साथ ही टेस्ट और वनडे में उनके कुल 94 शतक हो चुके हैं और वे शतकों के शतक से महज 6 कदम पीछे हैं।  पिछले तीन सालों से उन्होंने जो गति पकड़ी है उसे देखकर तो लगता है वे जल्द ही शतकों के शतक की चोटी पर होंगे। श्रीलंका के खिलाफ इस दूसरे मैच में सचिन ने 19 वीं बार 150 से या इससे अधिक रन बनाने का सर डान बै्रडमैन का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया। इम मामले में वे अब वेस्टइंडीज के लारा की बराबरी पर हैं।
.       उनका यह दोहरा शतक उन लोगों के लिए जवाब है जो उन्हें बूढ़ा (सचिन की दाड़ी के बाल सफेद पक गए हैं।) मानकर कह रहे थे कि श्रीलंका का यह दौरा सचिन का आखिरी दौरा होगा। सचिन के बल्ले ने लगातार रनों की बारिश कर जता दिया कि उनकी उम्र जरूर 37 हो गई है, लेकिन मन तो अभी बच्चा है जी!  पिछले तीन सालों से उनके खेल को देखकर तो लगता है कि वे जवानी के दिनों से अधिक खूंखार हो गए हैं। क्रिकेट का कोई-सा भी फोर्मेट हो, उनका जोश काबिल-ए-तारीफ है। वनडे, 20-20 और टेस्ट सभी में वे लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले तीन सालों में उनका टेस्ट क्रिकेट का औसत 97 रहा है। वर्ष 2010 में अब तक छह टेस्ट मैंचों में पांच शतक लगा चुके हैं। हम आशा और प्रार्थना करते हैं कि सचिन इससे भी बेहतर प्रदर्शन करते रहें। ताकि अन्य देश के गेंदबाजों के दिल में भारत के इस शेर का खौफ बना रहे।
.           चलते-चलते मित्रों को एक जानकारी और दे देता हूं। हालांकि वह पहले ही आप तक पहुंच गई होगी। सचिन की आत्मकथा की विशेष प्रतियों में उनके खून के प्रयोग की बात निराधार है। सचिन ने मीडिया को यह जानकारी दी है कि किताब के पृष्ठ तैयार करने के लिए उनके रक्त के उपयोग की जानकारी बेबुनियाद है। वे ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं। यदि प्रकाशन मंडल ऐसी कोई योजना बना रहा है तो वे इस बात का समर्थन नहीं करेंगे। सचिन के फैन्स को इस खबर से कुछ राहत मिली है। सुनने में आ रहा था कि कई फैंस को किताब में खून के प्रयोग की बात अच्छी नहीं लग रही थी। 
वनडे में सचिन के दोहरे शतक का आंखो देखा हाल पढऩे के लिए क्लिक करें........ 

बुधवार, 21 जुलाई 2010

सचिन की आत्मकथा से करोड़ो प्रशंसकों को निराशा

 सचिन के प्रशंसको के एक वर्ग को खासी प्रसन्नता हो सकती है यह जानकर कि सचिन की आत्मकथा छपकर आने जा रही है। किताब के रूप में वे सचिन को अपने पास सहेजकर रख सकेंगे। महान खिलाड़ी के प्रशंसकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसे इस खबर से प्रसन्नता से अधिक निराशा हो रही है उसके अपने-अपने कारण हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि वे शायद ही सचिन की आत्मकथा को खरीद सके और तो और शायद ही उन्हें यह पढऩे को नसीब हो, क्योंकि सचिन की आत्मकथा की कीमत बहुत अधिक है। 
   ........ अद्भुत सचिन की तरह उनकी आत्मकथा को भी अद्भुत बनाया जा रहा है। किताब का नाम होगा तेंदुलकर ओपस (Tendulkar opus) आत्मकथा के प्रारंभिक दस संस्करण बहुत ही खास रहने वाले हैं। इनके हस्ताक्षर पृष्ठ में सचिन के खून के कतरे मिलाए जाएंगे। सचिन का खून कागज तैयार करते समय उसकी लुगदी में मिलाया जाएगा। इस पृष्ठ का रंग हल्का लाल रहेगा। उनके डीएनए की जानकारी भी इस किताब में शामिल रहेगी। इसमें 852 पृष्ठ होंगे। खास बात यह रहेगी कि इसमें सचिन से संबंधित ऐसे फोटोग्राफ्स होंगे जो पहले कहीं भी प्रकाशित नहीं हुए हैं। 2011 के क्रिकेट विश्वकप से पहले इसके बाजार में आने की उम्मीद है।
     ........ अब अगर आप इस खास किताब को खरीदने का मन बना रहे हैं तो आपको निराशा ही हाथ लगने वाली है। इसका कारण है कि इस खास संस्करण की एक प्रति की कीमत करीब 35 लाख रुपए है। अब 35 लाख रुपए एक किताब के लिए खर्च करना शायद आपके बस की बात न हो, मान लो आपके बस की है भी तो भी आप नहीं खरीद सकते क्योंकि ये सभी दस किताबों अभी से बुक हो चुकी हैं। इसके अलावा इस किताब करीब एक हजार सस्ते संस्करण निकाले जाने हैं। ये कितने सस्ते हैं यह तो इनकी कीमत सुनकर आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं। इनकी कीमत 90 हजार से लेकर सवा लाख रुपए तक रहने वाली है। अब ऐसे में सचिन के ऐसे करोड़ो लोगों के लिए तो इस खबर से निराशा ही होगी जो दो जून की रोटी की जुगाड़ बमुश्किल कर पाते हैं। हम-तुम जो उनसे थोड़े सी ठीक स्थिति में हैं, मन होते हुए भी किताब खरीदने की हैसियत में नहीं। अब आम पाठक यह सोचे की चलो किसी पुस्तकालय में बैठकर ही सचिन की आत्मकथा पढ़ लेंगे तो शायद यह भी संभव न हो, क्योंकि इतनी मंहगी किताब बेजार हो रहे पुस्तकालय शायद ही खरीद पाएं। सो दोस्तो सचिन की आत्मकथा पढऩे का खयाल दिल से निकालना ही बेहतर होगा।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

.... बुरे फंस गए यार

उफ! बड़े दिन बाद कुछ लिखने का मौका मिला है। थोड़ी राहत की सांस ले रहा हूं। पत्रकारिता में आकर बुरा फंस गया हूं, लेकिन जितना फंसा हूं उतना ही मजा भी आ रहा है। .... तो साहब अपनी फिलहाल तो यह स्थिति है कि रबड़ी खा भी रहे हैं और उसके दोष भी गिना रहे हैं। जब से पत्रकारिता के मैदान में कूदा हूं न खाने का वक्त बचा है, न सोने का कोई ठीक समय है। हमारे पुरखे कहते हैं कि ब्रह्म मूहूर्त में उठो, लेकिन हम उसी समय सोने के लिए बिस्तर टटोलते हैं। सुबह का सूरज चादर तले कभी सपने में दिख जाए तो ठीक नहीं तो जय रामजी की। मध्य प्रदेश का वासी हूं सो जब आँख  खुलती है तो जलता हुआ बल्ब भी नसीब नहीं होता। इसी बात पर एक चुटकुला याद आया- एक अंग्रेज आया हिन्दी सीखने, मप्र में रहने लगा और जब गया तो दो वाक्य सीखे हिन्दी के दो वाक्य सीखे एक बिजली आ गई और दूसरा बिजली चली गई।  हां तो कह रहा था कि सुबह का सूरज... और शाम का डूब जाता है ऑफिस में,  कम्प्यूटर के आगे गिटर-पिटर करते-करते।
...........सामाजिक रिश्तों से यूं  दूर हुआ कि मेरे पडोस में रहने वाला दोस्त भी कहता है कि कहां गया था यार, बहुत दिन से दिखा नहीं। किताबें पढऩे का शौक तो लगता है बहुत दूर छूटते जा रहा है। कई दोस्तों से किताबें ले रखी हैं पढऩे के लिए वक्त मिले तो पढूं। उनकी किताबें वापस न करने से अपनी तो साख पर बट्टा लग गया है। जिसे देखो कह देता है देखो लोकेन्द्र बदल गया है इसे किताबें न देना, मेरी अभी तक वापस नहीं की हैं। पहले अपन जिससे किताब लेते थे नियत समय पर वापस करते थे या फिर थोड़ी शेष रहने की स्थिति में उससे अनुमति लेकर कुछ दिन रख लेते थे।
...........मेरी होने वाली पत्नी की सौत हो गई है पत्रकारिता। वो जब भी फोन करती हैं तब या तो हम सो रहे होते हैं या फिर अखबार पढ़ रहे होते हैं। अक्सर यह कहकर फोन काट देती हैं कि-जब आपके अपने अखबारों से फुरसत मिल जाए तो इस सबला नारी को भी याद कर लेना, हम होंठ सिले सुनते रहते हैं और उनके फोन काटने का इंतजार करते हैं। ...........अरे यार मैं भी न.... समय मिला तो कुछ लिखने की जगह अपनी व्यथा सुनाने लगा आपको। चलो यार अब जैसी भी जिंदगी है इसे भी मजे से जीना है और जो भी लिख गया है आप उसे उतने ही मजे से पढ़ लीजिएगा। वैसे एक सलाह दूं (चेतावनी : मुफ्त की सलाह से बचो) - अगर कोई पत्रकारिता में आना चाह रहा हो तो न आना और न ही अपने बच्चों को भेजना ओके। रहने दो आप तो आ ही जाना बड़ा मजा आएगा शानदार करियर है इस क्षेत्र में बस आत्मविश्वास और जूझने की प्रवृत्ति हो आपके मन में, फिर कोई पंगा नहीं। पहले रखना पहले वाली मुफ्त की सलाह थी।

मंगलवार, 29 जून 2010

... तो क्या मुसलमान देशद्रोही है?

क्या मुसलमान ऐसे हिन्दुओं का दिल जीत सकते हैं ?
इस लेख के बाद हो सकता है कुछ खास विचारधारा के ब्लॉगरों की जमात मुझे फास्सिट घोषित कर दे। हो सकता है मुझे कट्टरवादी, पुरातनंपथी, दक्षिणपंथी, पक्षपाती, ढकोसलावादी, रूढ़ीवादी, पुरातनवादी, और पिछड़ा व अप्रगतिशीस घोषित कर दिया जाए। इतना ही नहीं इस पोस्ट के बाद मुझ पर किसी हिन्दूवादी संगठन का एजेंट होने का आरोप भी मढ़ दिया जाए तो कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन मुझे डर नहीं, जो सच है कहना चाहता हूं और कहता रहूंगा। 

एक सीधा-सा सवाल आपसे पूछता हूं क्या देश के शत्रु को फांसी पर लटकाने से देश की स्थिति बिगड़ सकती है? क्या किसी देश की जनता लाखों लोगों के हत्यारे की फांसी के खिलाफ सड़कों पर आ सकती है? पूरी आशा है कि अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो आपका जवाब होगा-देश के गद्दारों को फांसी पर ही लटकाना चाहिए? लेकिन आपकी आस्थाएं इस देश से नहीं जुड़ी तो मैं आपकी प्रतिक्रिया का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।


एक खानदान है इस देश में जिसके पुरुखों ने हमेशा देश विरोधी कारनामों को ही अंजाम दिया। देश में सांप्रदायिकता कैसे भड़के, देश खण्ड-खण्ड कैसे हो? इसके लिए खूब षड्यंत्र किया। उन आस्तीन के सांपों की पैदाइश भी आज उसी रास्ते पर रेंग रहे हैं। मैं बात कर रहा हूं कश्मीर के अब्दुला खानदान की। शेख अब्दुल्ला और फारूख अब्दुल्ला के शासन काल में कश्मीर की कैसी स्थितियां रही सब वाकिफ हैं, कितने कश्मीरी पंडितों को बलात धर्मातरित किया गया, कितनों को उनके घर से बेघर किया गया सब बखूबी जानते हैं। बताने की जरूरत नहीं।
           इसी खानदान का उमर अब्दुल्ला कहता है कि - ''अफजल (देश का दुश्मन, संसद पर हमला और सुरक्षा में तैनात जवानों का हत्यारा) को फांसी न दो, वरना कश्मीर सुलग उठेगा और लोग विरोध में सड़कों पर उतर आएंगे। मकबूल बट्ट की फांसी के बाद कश्मीर में जो आग लगी थी। वह अफजल की फांसी के बाद और भड़क उठेगी।" पढ़ें.....
>>>>>बहुत दिनों बाद भारत भक्तों को सुकून मिला जब कांग्रेस के पंजे में दबी अफजल की फाइल बाहर निकली और उसकी फांसी की चर्चाएं तेज होने लगीं। लेकिन, कुछ देशद्रोहियों को यह खबर सुनकर बड़ी पीड़ा हुई। कुछ तो उसे बचाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं और बहुतेरे अभी रणनीति बना रहे हैं, मुझे विश्वास (किसी के विश्वास बरसों में जमा होता है) है वे भी कूदेंगे जरूर।

>>>>>मैं पूछता हूं क्यों उतरेंगे लोग सड़कों पर एक देशद्रोही के लिए ?  क्या यह समझा जाए कि देश के मुसलमान देश के दुश्मनों के साथ हैं?  ये कौम इस तरह की हरकत करके जता देती है कि इन पर विश्वास न किया जाए। अगर इन्हें इस देश के बहुसंख्यकों के दिल में जगह पाना है और विश्वास कायम करना है तो इस तरह की घटनाओं का विरोध करना चाहिए, जैसा कि ये कभी नहीं करते। इन लोगों को तो इस बात के लिए सड़क पर आना चाहिए था कि देश के दुश्मनों (अफजल, कसाब आदि) को फांसी देने में इतनी देर क्यों? इन्हें तुरंत फांसी पर लटकाया जाए, लेकिन नहीं आए। ये लोग तब भी सड़कों पर नहीं उतरे जब पूरी कश्मीर घाटी को हिंदुओं के खून से रंग दिया गया, उन्हें उनकी संपत्ति से बेदखल कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया। अब तक कश्मीर में करीब २००० से अधिक हिंदुओं की इस्लामी आतंकी हत्या कर चुके हैं। यह दर्द कई लोगों को सालता रहता है। कश्मीर के इस खूनी खेल में अपने पिता को खो चुके बॉलीवुड के संजीदा अभिनेता संजय सूरी ने 'तहलका' के नीना रोले को दिए इंटरव्यू में कुछ इस तरह अपना दर्द बयां किया था- ''१९९० की एक मनहूस सुबह श्रीनगर में मेरे पिता को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी। आखिर उनकी गलती क्या थी? यही कि वो कश्मीर में रह रहे एक हिंदू थे।" उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीर से हिन्दुओं के पलायन के बाद यहां एक ही धर्म बचा है।

>>>>>क्यों करें इस देश के मुसलमानों पर विश्वास-
रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी अपनी प्रसिद्ध किताब 'संस्कृति के चार अध्याय'  में लिखा है - ''इस देश के मुसलमानों में इस्लाम के मौलिक स्वभाव, गुण और उसके ऐतिहासिक महत्व का ज्ञान बहुत ही छिछला रहा है। भारत में मुसलमानों का अत्याचार इतना भयानक रहा है कि सारे-संसार के इतिहास में उसका कोई जोड़ नहीं मिलता। इन अत्याचारों के कारण हिन्दुओं के हृदय में इस्लाम के प्रति जो घृणा उत्पन्न हुई, उसके निशान अभी तक बाकी हैं?"

जरा इनके व्यवहार पर नजर डालें तो-
अपनी छवि को ठीक करने के लिए देश के मुसलमानों को देशद्रोही घटनाओं में संलिप्त मुसलमानों का तीव्र विरोध करना चाहिए था, लेकिन ये उल्टे काम करते रहे।
- अफजल ने जब संसद पर हमला किया और कसाब ने होटल ताज पर तो ये लोग सड़कों पर विरोध करने नहीं आए, हजारों बेगुनाहों के हत्यारों को मौत की सजा हो ऐसी मांग इन्होंने नहीं की। लेकिन, उन्हें बचाने के लिए ये कश्मीर जला देंगे। (मतलब शेष बचे कश्मीरी पंडितों की हत्या कर देंगे)
- जब कहीं मीलों दूर किसी अखबार में किसी मोहम्मद का कार्टून छपा तो इस कौम ने देश-दुनिया और भारत के हर शहर गली-मोहल्ले में हल्ला मचाया। देश के एक पत्रकार आलोक तोमर ने जब इस कार्टून को छाप दिया तो उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया। पढें....  वहीं जब इसी कौम के एक भौंड़े कलाकार एमएफ हुसैन ने हिंदु देवी-देवताओं और भारतमाता का नग्न चित्र बनाया तो ये बिलों में दुबके रहे और हुसैन अपनी करतूतों से बाज नहीं आया, उसे किसी ने जेल नहीं भेजा। उस समय देश के मुसलमान सड़कों पर उतरते तो लाखों दिलों में घर बनाते। ये तो सड़कों पर उतरे भी तो हुसैन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए।
- एक ओर हिन्दू धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरू शंकराचार्य को देश के सबसे बड़े त्योहार दीपोत्सव पर उठाकर सींखचों के पीछे ढकेल दिया वहीं खुले मंच से 'मैं सबसे बड़ा आतंकवादी हूं, मुझे पकड़कर दिखाए कोईÓ कहने वाले का कोई बाल बांका नहीं कर सका।
- बाल ठाकरे की टीका-टिप्पणी से भी नाराजगी जबकि मंत्री पद पर बैठे हाजी याकूब द्वारा किसी की हत्या कर उसका सिर काटकर लाने के आह्वान की भी अनदेखी।
- नरेन्द्र मोदी के शासन में एक बच्चे का अपहरण भी राज्य की दुर्गति का प्रमाणिक उदाहरण, जबकि फारूख अब्दुल्ला के राज में दर्जनों सामूहिक नरसंहारों से भी कोई उद्वेलन नहीं।
- आप ही बताएं क्या इस तरह के दो तरह के व्यवहार से सांप्रदायिक एकता कायम हो सकती है?
- क्या इस तरह की घटनाओं में शामिल रहने पर हिन्दू, मुसलमानों पर भरोसा करें?

मंगलवार, 22 जून 2010

बिहारी बाबू लालू और उनकी लालटेन

अब आप और हम क्या लालूजी को कौन नहीं जानता, अब आप सब लोगों तक ये खबर भी पहुंच ही गई होगी कि लालू के राष्ट्रीय जनतादल (आरजेडी) से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा और चुनाव चिह्न के छिनने पर खतरा आ गया है। चुनाव आयोग ने इसके लिए लालू को नोटिस जारी किया है और उन्हें सफाई में कुछ कहने के लिए २ जुलाई तक का समय दिया है। पूरी खबर यहां पढें
.....   अब आप सोचो अगर बड़बोले लालू अपनी पार्टी का राष्ट्रीय दर्जा और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण चुनाव चिह्न लालटेन नहीं बचा सके तो क्या होगा? लालू ने इसी लालटेन के उजाले में बिहार की भोली-भाली जनता को खूब ch2so4 बनाया है। पिछले लम्बे समय से उनकी लालटेन का तेल चुक गया तो बेचारे अंधेरे में फडफ़ड़ाते रहते हैं, कुछ तो भी बड़बड़ाते रहते हैं। और तो क्या करें भई लालू, मैडम के छोरे (बाबा) ने भी लालू को लाल बत्ती दिखा दी है। सुना है इस बार बाबा की पार्टी उनके दिशा-निर्देश में बिहार में अपने बूते चुनाव लड़ेगी। भई ये सब तो ठीक नहीं है लालू बेचारे तो पहले से ही अंधेरे में जी रहे हैं ऊपर से ये नए लड़के ने और उनकी हवा खराब कर दी है। उनकी लालटेन भी मुसीबत में है और गांधी-नेहरू घराने की पार्टी ने भी उनका साथ छोड़ दिया है। वैसे तो लालू बहुत बड़े तिकड़मी हैं। तिकड़म भिड़ाने में पूरे भारत ही क्या वरन विश्वभर में उनकी कोई सानी नहीं है। जैसे-तैसे करके वो अपनी लालटेन को बुझने नहीं देंगे। वे चुनाव आयोग को भी ch2so4 बना सकते हैं। नहीं बना पाए तो तिकड़म बिठा सकते हैं। वे धन-लाभ के लिए चारा तक खा सकते हैं तो धन-बरसाने वाली कुर्सी को पाने के लिए कुछ न कुछ तो करेंगे ही। इतना तो पूरे देश की जनता को उन पर भरोसा है।
..........अब अपन रहे गणित के विद्यार्थी तो अपन 'माना कि' का भरपूर उपयोग करते हैं। तो मान लो कि लालू अपनी बुझती (करीब-करीब बुझ ही गई) लालटेन को नहीं बचा पाते तब क्या होगा? ...... क्या लालू का जादू चल पाएगा? ...... क्या लालू बिहार जीत का हार पहन सकेंगे? ..... क्या लालू फिर से लालटेन को पाने के लायक तेल जुटा सकेंगे? ....... कहीं फिर लालू दीपक को तो चुनाव चिह्न नहीं बना लेंगे?  ....नहीं-नहीं इसे नहीं बना सकते ये निशान सेक्यूलर नहीं होगा। ये तो हिन्दू धर्म का पवित्र प्रतीक है। इससे तो लालू के मुस्लिम वोटर रूठ (जो वैसे भी रूठ चुके हैं) जाएंगे। लालू संभवत: इसे चुनाव चिह्न नहीं बनाएंगे। हां चिराग को बना सकते हैं लेकिन उसका जिन्न भी कब का निकल भागा। इससे भी कोई फायदा नहीं।
...........और सोचो...... भला लालू बिना लालटेन के बिहार की उबड़-खाबड़ मार्गों पर चुनाव प्रचार के लिए कैसे निकलेंगे। और निकलेंगे भी तो बिना उजाले के लोगों को कैसे अपने शासन काल का विकास और नीतीश के मुख्यमंत्रित्वकाल में हुए विनाश को दिखाएंगे?
बहुत सवाल हैं भैया! पर जवाब नहीं मिल पा रहे हैं। आप हमारी कोई मदद करो, सॉरी हमारी नहीं उनकी..... कोई अच्छे से सुझाव हों लालू के लिए तो बताइयेगा जरूर... काश बात बन जाए।

सोमवार, 7 जून 2010

ग्वालियर की शान महाराज बाड़े का वैभव खाक

महारानी लक्ष्मीबाई मार्केट हुई राख
महाराजबाड़ा स्थित ऎतिहासिक इमारत में संचालित विक्टोरिया मार्केट शनिवार तड़के लगी भीषण आग से जलकर खाक हो गया। इसमें सवा सौ दुकानों में रखा माल जलकर स्वाहा हो गया। आग बुझाने में 320 वाहन पानी लगा। इस कोशिश में दो सैनिक समेत 4 लोग घायल हो गए। लगभग दस करोड़ रूपए के नुकसान की खबर है।
मैं अधिक कुछ तो नहीं लिख सकता इस मामले पर... बस उस दर्दनाक मंजर को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिल रहे। कुछ तस्वीरें हैं मेरे पास जिन्हें मैं पोस्ट कर रहा हूं...... वे उस वीभत्स अग्निकांड का चित्र आपके दिमाग में उपस्थित कर देंगी। बस इतना कहूंगा कि इस इमारत में लगने वाले किताबों के बाजार से किताबें खरीदकर ही मैंने स्कूली और महाविद्यालयीन शिक्षा प्राप्त की। दोस्तों के साथ आते थे किताब खरीदते और बाहर बनी दुकान पर छोले भटूरा खाते थे। वैसे अपना आग से सीधा-सीधा बैर है इसने अपना प्रेरणा स्त्रोत छीना था।
महारानी लक्ष्मीबाई मार्केट (विक्टोरिया मार्केट ) आग की लपटों में

सब कुछ उजाड़ गया... अब क्या करेंगे

सुबह तक उठती रहीं आग की लपटें 

महराज बाड़े का वैभव ख़ाक
उमड़ा जनसैलाब
ग्वालियर का सबसे बड़ा अग्निकांड
ऐतिहासिक महत्व रखने वाली और 150 से अधिक व्यापारियों का घर चलाने वाली विक्टोरिया मार्केट एक चिनगारी से जलकर राख हो गई। यहां अधिकांश दुकानें किताबों और स्टेशनरी के व्यापारियों की थीं।
25-3० - करोड़ तक का नुकसान
1904-05 - में बनी थी विक्टोरिया मार्केट
02 - बजे के लगभग लगी थी आग
रात 10 - बजे तक भी नहीं बुझ पाई आग
352 - गाड़ी पानी फेंका गया
100 -  के करीब दुकानें जलकर खाक हुईं

106 साल पुराना निर्माण
- विक्टोरिया मार्केट का निर्माण 1904 में ग्वालियर के महाराज माधवराव प्रथम ने कराया था।
- 1905 में महारानी विक्टोरिया के भारत आगमन के उपलक्ष्य में इसका नामकरण विक्टोरिया मेमोरियल किया गया।
- सन् 1905 में ग्वालियर का पहला मेला भी इसी मार्केट में लगा।
- विक्टोरिया मार्केट, टाउनहॉल, रीजनल प्रेस, निगम मुख्यालय, पोस्ट ऑफिस बिल्डिंग के आर्किटेक्ट बलवंत भैया थे

- सन् 1911 में संपूर्ण महाराजबाड़े का सौंदर्यीकरण पूर्ण किया जा सका।
- इसके बाद जीवाजी राव की प्रतिमा स्थापित की गई।
- विक्टोरिया मार्केट की स्थापत्य कला इंडो-ब्रिटिश श्ौली की थी।