भारत के एक दाँव ने पाकिस्तान को चित कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गिलगित, बलूचिस्तान और पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर का मामला दुनिया के सामने लाकर न केवल पाकिस्तान को आईना दिखाया है बल्कि पाकिस्तान के अत्याचार से पीडि़त जनमानस को साहस दिया है। पाकिस्तान के कट्टरपंथी चरित्र से संघर्ष कर रहे लोगों में नया जोश आ गया है। ये लोग जहाँ हैं, वहीं से पाकिस्तान के दमनकारी चेहरे को विश्व के सामने ला रहे हैं। पड़ोसी देशों के आंतरिक मामलों में दखल देने वाले पाकिस्तान का पहली बार हकीकत से सामना हुआ है। भारत की जमीन पर कब्जा करने वाले और उसके टुकड़े करने का ख्वाब देखने वाले पाकिस्तान को अब अपनी ही जमीन बचाने के लाले पड़ रहे हैं। गिलगित, बलूचिस्तान और पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के नागरिक पाकिस्तान से आजादी की माँग कर ही रहे थे, अब सिंध प्रांत के लोगों ने भी अगल देश की माँग शुरू कर दी है। सिंध के मीरपुर खास में सोमवार को सड़कों पर उतरकर अनेक लोगों ने आजादी के नारे लगाते हुए सिंधुदेश की माँग की है। अमेरिका, लंदन से लेकर जर्मनी तक गिलगित, बलूचिस्तान, पीओके और सिंध की आजादी को लेकर प्रदर्शन होने शुरू हो गए हैं।
बुधवार, 31 अगस्त 2016
मंगलवार, 30 अगस्त 2016
मुलायम के बोल-वचन और वोट बैंक की राजनीति
उत्तर प्रदेश के चुनाव सिर पर आ गए हैं। इस बार समाजवादी पार्टी की नैया भंवर में दिखाई पड़ रही है। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव को 'मुस्लिम प्रेम' नजर आने लगा है। वह किसी भी प्रकार अपने वोटबैंक को खिसकने नहीं देना चाहते हैं। मुसलमानों को रिझाने के लिए उन्होंने फिर से 'बाबरी राग' अलापा है। मुलायम सिंह यादव ने अपने जीवन पर लिखी किताब 'बढ़ते साहसिक कदम' के विमोचन अवसर पर अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने के अपने फैसले को साहसिक बताया है। उनका कहना है कि देश की एकता को बचाने के लिए कारसेवकों पर गोली चलाने का उनका फैसला सही था। गोली नहीं चलती तो मुसलमानों का भरोसा उठ जाता। देश की एकता बचाने के लिए 16 की जगह 30 जान भी लेनी पड़ती तो ले लेता। गौरतलब है कि जनवरी, 2016 में भी मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने के अपने फैसले को सही ठहराया था।
शनिवार, 27 अगस्त 2016
राहुल गांधी तय कीजिए, संघ ने गांधीजी की हत्या की या नहीं
महात्मा गांधी की हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार ठहराने के अपने बयान पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी स्थिति तय नहीं कर पा रहे हैं। एक तरफ, सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में राहुल गांधी ने दावा किया है कि उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक संगठन के तौर पर कभी भी जिम्मेदार नहीं बताया है। उन्होंने संघ से जुड़े कुछ लोगों पर महात्मा गांधी की हत्या करने का आरोप लगाया था। वहीं दूसरी तरफ, न्यायालय के बाहर वह गर्जन-तर्जन कर रहे हैं कि संघ को लेकर दिए बयान पर वह कायम हैं और संघ की विचारधारा के खिलाफ उनकी लड़ाई जारी रहेगी। राहुल गांधी को समझना चाहिए कि विचारधारा की लड़ाई लडऩा अच्छा माना जा सकता है लेकिन गलत तथ्यों के आधार पर एक सम्मानित संगठन को बदनाम करना कतई उचित नहीं है। इसे राजनीतिक अपरिपक्वता ही कहा जाएगा कि पारदर्शिता के इस जमाने में वह न्यायालय में कुछ हलफनामा पेश करते हैं और न्यायालय से बाहर कुछ और बयानबाजी करते हैं। जनता उस व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखती है, जिसकी कथनी में बार-बार अंतर दिखाई देता है। राहुल गांधी यदि यह सोच रहे हैं कि जनता को भ्रमित किया जा सकता है, तब वह बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार हैं। संघ के लोग भी संचार माध्यमों का उपयोग करने लगे हैं, इसलिए संघ के खिलाफ किसी झूठ को गढऩा अब पहले की तरह आसान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में दिए माफीनामे जैसा हलफनामा प्रस्तुत करते समय राहुल गांधी को इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि समूचे देश तत्काल उनके 'यू-टर्न' की खबर फैल जाएगी। इस 'यू-टर्न' को लेकर बने माहौल ने ही उन्हें फिर से संघ के खिलाफ बोलने के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन, यहाँ भी राहुल गांधी गलत हैं। न जाने उन्हें क्यों लगता है कि उनका राजनीतिक करियर संघ को गरियाने से ही आगे बढ़ सकता है। न जाने क्यों उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि देश उनसे गंभीर राजनीति की अपेक्षा करता है, लेकिन वह प्रत्येक अवसर पर सबको निराश कर देते हैं।
शनिवार, 20 अगस्त 2016
बोफोर्स का सच इसलिए है दफ़न
बोफोर्स घोटाले का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है। देश के वरिष्ठ राजनेता और समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने बोफोर्स घोटाले के मामले में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनके बयान को आपराधिक स्वीकारोक्ति कहना अधिक उचित होगा। बुधवार को लखनऊ के राममनोहर लोहिया विधि विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस समारोह में उन्होंने कहा कि 'जब मैंने बोफोर्स तोप को देखा तो पाया कि वह ठीक से काम कर रही है। उस वक्त मेरे मन में पहला विचार यह आया कि राजीव गांधी ने बढिय़ा काम किया है, इसलिए मैंने उससे जुड़ी फाइलों को गायब कर दिया। लोगों का ऐसा मानना है कि बोफोर्स सौदा राजीव गांधी की गलती थी, लेकिन रक्षा मंत्री के तौर पर मैंने देखा कि यह सही सौदा था और राजीव ने अच्छा काम किया।' मुलायम सिंह यादव की इस स्वीकारोक्ति ने देश को बता दिया है कि देश में किस तरह बड़े घोटालों का सच छिपाया जाता है। जाँच को कैसे भटकाया जाता है। सबूत किस तरह नष्ट किए जाते हैं। हमारे जिम्मेदार राजनेता ही जब फाइलें गायब करा देते हैं, तब जाँच में क्या खाक साबित होगा? उल्लेखनीय है कि मुलायम सिंह यादव वर्ष 1996 से 98 के दौरान जब रक्षा मंत्री थे, तब राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में स्वीडन की एबी बोफोर्स कंपनी से 400 हॉविट्जर तोपों की खरीद में कथित घोटाले का मुकदमा अदालत में चल रहा था। केंद्रीय जाँच ब्यूरो वर्ष 1990 से ही इस मामले की जाँच कर रहा था, लेकिन ब्यूरो कोई ठोस सबूत नहीं जुटा सका। भला सबूत मिलते भी कैसे, स्वयं रक्षामंत्री ने फाइलें गायब करा दी थीं।
रविवार, 14 अगस्त 2016
लोकेन्द्र पाराशर के कंधों पर भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी : उनका संक्षिप्त परिचय
सहजता, सरलता, सादगी और बेबाकी इन सबको मिला दिया जाए तो एक बेहद उम्दा इंसान आपके सामने होगा। लोकेन्द्र पाराशर। जो उनके भीतर है, वह ही बाहर भी। कथनी-करनी में किंचित भी अंतर नहीं। खरा-खरा कहना, चाहे किसी को बुरा लगे या भला। आपसे मित्रवत मिलेंगे और हर संभव आपकी मदद करने को हर पल तैयार। समाजकंटकों के लिए अपनी लेखनी की आग और समाजचिंतकों के लिए अपनी आंखों के पानी के लिए वे देशभर में ख्यात हैं। वे लम्बे समय तक पत्रकारिता की पाठशाला कहे जाने वाले दैनिक स्वदेश (ग्वालियर) के संपादक रहे हैं। उनका चिंतन राष्ट्रवादी है। वे समाज और देशहित से जुड़े मुद्दों पर गहरी पकड़ रखते हैं। ग्रामवासी होने के कारण भारत को औरों की अपेक्षा कहीं अधिक नजदीक से देखते और समझते हैं। उनका चिंतन, उनकी सोच और उनके विचार उनके लेखन में झलकता है।
गुरुवार, 11 अगस्त 2016
शोभा डे की अशोभनीय टिप्पणी
रियो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे खिलाडिय़ों के संबंध में विवादित लेखिका शोभा डे ने ट्वीटर पर अशोभनीय टिप्पणी करके अपनी ओछी मानसिकता का प्रदर्शन किया है। भारतीय दल के शुरुआती प्रदर्शन पर उन्होंने लिखा कि 'ओलंपिक में भारतीय खिलाडिय़ों के लक्ष्य हैं- रियो जाओ, सेल्फी लो, खाली हाथ वापस आओ, पैसे और मौकों की बरबादी।' जिस वक्त समूचा देश रियो में भारत के बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रार्थना कर रहा है, तब इन महोदया के दिमाग में इस घटिया विचार का जन्म होता है। शोभा डे की इस बेहूदगी की सब ओर से निंदा की गई। यहाँ तक कि ओलंपिक में हिस्सा ले रहे खिलाड़ी भी आहत होकर खुद को शोभा डे के विरोध में टिप्पणी करने से नहीं रोक सके। निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने नसीहत देते हुए कहा कि शोभा डे यह थोड़ा अनुचित है। आपको अपने खिलाडिय़ों पर गर्व होना चाहिए, जो पूरी दुनिया के सामने मानवीय श्रेष्ठता हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं। पूर्व हॉकी कप्तान वीरेन रसकिन्हा ने सही ही कहा कि हॉकी के मैदान में 60 मिनट तक दौड़कर देखिए, अभिनव और गगन की राइफल ही उठाकर देख लीजिए, आपको समझ आ जाएगा कि आप जैसा सोचती हैं, यह काम उससे कहीं अधिक कठिन है। कुछ मिलाकर सब जगह शोभा डे की भद्द पिट रही है।
बुधवार, 10 अगस्त 2016
जरा याद करो कुर्बानी
आजादी की 70वीं सालगिरह से ठीक पहले महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जन्मभूमि भाबरा में 'आजादी 70 साल, याद करो कुर्बानी' अभियान की शुरुआत करने का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का निर्णय सराहनीय है। प्रधानमंत्री मोदी ने मध्यप्रदेश के अलीराजपुर स्थित चंद्रशेखर आजाद स्मारक जाकर उन्हें याद किया और देशवासियों से आह्वान किया कि आजादी के 70 साल और भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल पूरे होने के मौके पर हमारा कर्तव्य बनता है कि हम स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने वाले लोगों को याद करें। हम उन लक्ष्यों को पाने की कोशिश करें, जिन्हें पाने का सपना लेकर आजादी के नायकों ने अपना जीवन कुर्बान किया। कहने को हम कह सकते हैं कि हम स्वतंत्रता सेनानियों को भूले कब हैं, जो याद करें। लेकिन, कलेजे पर हाथ रखकर खुद से पूछिए कि सवा सौ करोड़ भारतवासियों में से कितनों को स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान याद है। कितने लोग हैं, जो कम से कम दस बलिदानियों के नाम भी बता पाएंगे? उससे भी जरूरी सवाल यह है कि स्वतंत्रता सेनानियों ने किस बात के लिए अपने प्राणों की आहूति दी?
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