शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

अंतिम संस्कार


 'या र अखिल तेरे पास मैसेज आया क्या? समाजसेवी रूपेन्द्र गुप्ता की मां का निधन हो गया है। कल सुबह १० बजे शवयात्रा है।' सुनील शर्मा ने अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन के भीतर झांकते हुए कहा। 
         सब स्तब्ध रह गए। टीवी सेट के सीमित वोल्यूम के बावजूद न्यूज चैनल का वो दाड़ी और चोटी वाला एंकर जरूर चीख-चीखकर लोगों को चड्ढी-बनियान चोर गिरोह से सावधान कर रहा था। वरना तो दफ्तर के जिन कर्मचारियों के कानों तक सुनील की आवाज पहुंची, उनके सिर खामोशी से सुनील की ओर मुड़ गए। तमाम चेहरों ने प्रश्नवाचक चिह्न का आकार धारण कर लिया था। समाजसेवी रूपेन्द्र गुप्ता की मां की मृत्यु के समाचार पर जो सन्नाटा खिंच गया था, अमूमन ऐसा न्यू मीडिया चैनल के दफ्तर में दिखता नहीं था। कई लोगों को कुछ सूझ नहीं आ रहा था तो कई लोग कब, कैसे और कहां हुई रूपेन्द्र गुप्ता की मां की मौत, यह जानने के लिए सवाल उछालने ही वाले थे कि चार और साथियों के मोबाइल फोन पर मैसेज ट्यून की आवाज सुनाई दी। फिर चार-पांच और लोगों के मोबाइल फोन पर भी एसएमएस आया। थोड़ी ही देर में सभी के मोबाइल फोन के मैसेज इनबॉक्स में यही पहला संदेश था- रूपेन्द्र गुप्ता की मां की लंबी बीमारी की वजह से मृत्यु हो गई है। वे ७० वर्ष की थीं। कल सुबह १० बजे गुप्ता सदन से गोराघाट स्थित मुक्तिधाम के लिए शवयात्रा जाएगी। अब पूछने के लिए किसी के पास कोई सवाल नहीं था। हां, सब रूपेन्द्र गुप्ता के संबंध में अपनी-अपनी जानकारी एक-दूसरे से साझा करने की प्रक्रिया में लग गए। रूपेन्द्र गुप्ता शहर के बड़े व्यवसायी हैं। शहर के लगभग सभी पत्रकारों के साथ उनका उठना-बैठना है। शहर में समाजसेवी के रूप में भी उनकी पहचान है। उनका एनजीओ वरिष्ठ लोगों के हित में अच्छा काम कर रहा है। घर में पुरानी चीजों की तरह उपेक्षा के शिकार बुजुर्गों के मनोरंजन तक की चिंता भी उनका एनजीओ करता है। बुजुर्गों के सम्मेलन, हारी-बीमारी में मदद-देखभाल, शहर के आस-पास धार्मिक, ऐतिहासिक महत्व के स्थल के भ्रमण के लिए भी वरिष्ठ लोगों को ले जाने का उपक्रम उनका एनजीओ कर रहा है। अपनी बढ़ती लोकप्रियता के कारण वे पिछले काफी दिनों से राजनीति में भी खूब रुचि दिखा रहे हैं। कई लोग कहते हैं कि उपेन्द्र गुप्ता पंजा पार्टी से विधायक का चुनाव लडऩे की जुगाड़ लगा रहे हैं।
सीनियर कॉपी एडिटर अजय सिन्हा ने कहा - 'एक बार रूपेन्द्र गुप्ताजी से उनकी काफी लंबी बातचीत हुई थी। वे बेहद सुलझे हुए आदमी लगे। उन्हें बुजुर्गों की बेहद चिंता रहती है। वे कहते हैं, भौतिक जीवन का लुत्फ लेने के फेर में आजकल के बच्चे बुजुर्गों को बेसहारा छोड़कर अपनी अलग दुनिया बसा लेते हैं। नालायकों को इतना भी समझ नहीं आता कि बुजुर्गों का आश्रय कितना जरूरी है। अगर माता-पिता भी स्वकेंद्रित हो जाते तो क्या बच्चे आज जिस मुकाम पर हैं, वहां पहुंच सकते थे। अब मुझे ही लो। हम चार भाई हैं। चारों वेलसेटल्ड हैं। सबसे बड़ा यानी मैं, अच्छा खासा व्यापार है। मुझसे छोटे की प्रिंटिंग प्रेस बढिय़ा चल रही है। तीसरे नंबर का भाई सरकारी इंजीनियर हो गया है और सबसे छोटा भाई का तो प्राइवेट हॉस्पिटल है। उसकी पत्नी भी शहर की नामी डॉक्टर है। हमारे इस मुकाम के पीछे माता-पिता की मेहनत और त्याग है। तुमने देखा होगा, नए-नए माता-पिता बने महिला-पुरुष यह कहते हुए अकसर पाए जाते हैं कि देखो, अपने बच्चे के लिए अभी कितना कुछ करना पड़ रहा है हमें। अपने नन्हें के चक्कर में रातभर जागना पड़ता है। वह दिन में सो लेता है और रात को कई बार जागता है। इतना ही नहीं अभी तो सू-सू भी बिस्तर पर ही करता है। कितना ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं नन्हा गीले में न सो रहा हो। लेकिन, बड़ा होकर सब भूल जाएगा। अब अजय तुम ही बताओ, वो भला क्यों नहीं भूलेगा इन निपट गंवार लोगों को। इन्होंने कौन-से अपने माता-पिता को याद रखा है। आजकल के ज्यादातर युवा शादी के तत्काल बाद ही माता-पिता से अलग रहने लगते हैं। क्या है कि बेपरवाह सेक्स लाइफ में खलल पड़ता है, यदि घर में बुजुर्ग हों तो। फिजूलखर्जी और अनियमित दिनचर्या पर भी बुजुर्ग सलाह देते हैं, जो इन्हें महज टोका-टाकी लगता है। बुजुर्ग तो संयमित जीवन जीते हैं। सुबह पांच बजे ब्रह्म मुहूर्त में जाग जाते हैं। टहल भी आते हैं लेकिन तब तक भी हाईलाइफ की एडिक्ट हमारी युवा पीढ़ी बिस्तर में ही घुसी रहती है। बुजुर्गों का जल्दी जागना भी इन्हें रास नहीं आता।' 
'अब तो राजनीति में जाने का मन बना रहे हैं। उनके साथ लोग भी काफी आ गए हैं। चलो, अच्छा है कोई तो भला आदमी राजनीति में पहुंचे। वरना तो संसद और तमाम विधानसभाएं दुष्ट और बदमाश नेताओं से भरी पड़ी हैं।' अजय गुप्ता के संस्मरण पर कोई टिप्पणी आती इससे पहले ही क्राइम रिपोर्टर सुरेन्द्र ने सहज भाव में अपनी राय जाहिर की। 
'पिछले दिनों एक बुजुर्ग दंपति को सारी रात घर के बाहर काटनी पड़ी। हुआ यूं था कि यहीं विवेक विहार में विनोद चौपड़ा रहते हैं। उनकी उम्र होगी, यही कोई ६५ साल। स्टेट बैंक की नौकरी से रिटायर हैं। उनके पास बढिय़ा बंगला है। उनके इकलौते लड़के राहुल की हाल ही में धूमधाम से शादी हुई। श्रीमान चौपड़ा की पत्नी मंगला चौपड़ा ने अपनी खूबसूरत बहू का बड़े दुलार से घर में स्वागत किया। मेरा उनके घर आना-जाना है। मैंने हकीकत देखी है। मंगला जी और चौपड़ा जी कितना ही प्यार करते हों अपने बच्चों को लेकिन बच्चे बहुत ही नालायक हैं दोस्तो। ठीक से बात तक नहीं करते। बहू बाहर से जितनी गोरी है भीतर से उतनी की कलूटी। लड़का भी लल्लू है। एक दिन बहू और सास में किसी बात पर विवाद हो गया। उस दिन बहू और बेटे ने विनोद चौपड़ा जी और उनकी पत्नी को घर से बाहर निकाल दिया। कहा- जाओ किसी वृद्धाश्रम में जाकर बस जाओ, ताकि हम चैन से जी सकें। ठण्ड में रातभर बेचारे बूढ़े माता-पिता इधर-उधर भटकते रहे। थक-हार कर वापस लौटे। दरवाजा खट-खटाया लेकिन बहू-बेटे ने अनसुनी कर दी। बेचारे चौपड़ा दंपति रातभर दरवाजे के बाहर बैठे रहे। एक-दूसरे से टिककर थोड़ी-बहुत देर के लिए पलकें झपका लीं। सुबह दरवाजा खुला तो बहुत-सी हिदायतें देते हुए बहू ने दोनों को घर में घुसने दिया।'
सुरेन्द्र ने मार्मिक घटना का वर्णन जारी रखने से पहले एक क्षण के लिए सभी साथियों के चेहरों पर सरसरी नजरें दौड़ाई और बोला- 'जैसे ही मुझे यह बात मालूम हुई, मैंने रूपेन्द्र गुप्ता जी को सब हाल सुना दिया। रूपेन्द्र जी काफी संवेदनशील हो गए थे। उन्होंने तत्काल अपने एनजीओ के एक युवा को निर्देश दिए कि मेरी टीम को फोन और मैजेस करो, बुलाओ सबको यहां। जरा देखे इस नालायक राहुल को। इसके बाद वे बीस-पच्चीस वरिष्ठ नागरिकों को लेकर विनोद चौपड़ा जी के घर पहुंच गए। रविवार था तो सब घर पर ही मिल गए। राहुल, उसकी खूबसूरत पत्नी भी। चौपड़ा जी ने वरिष्ठ नागरिक मंडली का स्वागत किया। स्वयं फ्रिज से पानी की दो बॉटल और कुछ गिलास लेकर आए। सबको पानी पिलाया और पूछा कैसे आना हुआ आज। कहीं चलने का कार्यक्रम है क्या? मंडली के एक सदस्य ने कहा नहीं ऐसा कुछ नहीं है, बस आपका हाल-चाल जानने के लिए चले आए। रूपेन्द्र गुप्ता जी ने राहुल की तरफ इशारा किया और कड़क आवाज में उसे बोले- बच्चे घर से बाहर निकल लो। ये घर तुम्हारे बाप का है तुम्हारा नहीं। इसमें रहने का पहला हक विनोद चौपड़ा जी का है, तुम्हारा नहीं। शर्म नहीं आती तुम्हें अपने मां-बाप को घर से बाहर निकालने में।' 
'मेरे माता-पिता हैं। तुम क्यों आधी रोटी पर दाल लेने चले आए। हमारा परिवार कैसे भी रहे।' रूपेन्द्र जी की बातों से राहुल तिलमिला गया था। उसके बात करने के तरीके से यह साफ झलक रहा था। 
'अदब से बात किया करो राहुल। घर में तो मेरी रोज बेइज्जती करते हो। कम से कम सबके सामने तो मुझे जलील न करो।' चौपड़ा जी ने न जाने कितने दिन बाद राहुल को लताड़ लगाई होगी। रूपेन्द्र जी से राहुल का इस तरह बात करना चौपड़ा जी रास नहीं आया। 
इसके बाद सभी वरिष्ठ नागरिकों ने राहुल और उसकी पत्नी का समझाइश दी। समझाइश क्या चेतावनी दी कि आगे कभी अपने माता-पिता को परेशान किया तो हम सब कोर्ट जाएंगे और तुम लोग घर से बाहर तो जाओगे ही, जेल में भी जा सकते हो। 
सभी पत्रकार साथी बातचीत कर ही रहे थे कि इतने में सुनील शर्मा ने अपने स्मार्टफोन पर अंगुलियां घुमाते हुए उन्हें बताया - 'भाई लोगों फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग और गूगल प्लस सहित और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट पर रूपेन्द्र जी की मां की मृत्यु का समाचार प्रसारित हो गया है। अभी पंचायत स्थगित कर सब अपने-अपने काम में जुट जाएं। सुबह १० बजे चलेंगे मुक्तिधाम।'    
सुबह १०:३० बजे। गुप्ता सदन। बेहद ज्यादा भीड़। सुनील शर्मा और अखिल सिंह दोनों को लगा था कि उन्हें पहुंचने में देर हो गई। लेकिन, यहां तो अभी ठठरी बांधी जा रही है। शवयात्रा शुरू होने में कुछ वक्त बाकी है। सुनील और अखिल पत्रकार साथियों की मंडली की ओर बढ़ रहे थे कि तभी सामने से रूपेन्द्र जी के बहनोई साहब संजय माहेश्वरी चले आए। संजय माहेश्वरी से दोनों की अच्छी जान-पहचान थी। माहेश्वरी शहर ही नहीं प्रदेश के बड़े साहित्यकारों में शुमार होते हैं। बड़े मुंह फट हैं। सच उनके दिमाग और पेट में टिकता ही नहीं। जब तक बाहर न आ जाए, खदबदाता रहता है। सुनील और अखिल ने नमस्कार किया और रूपेन्द्र गुप्ताजी की मां के निधन पर संवेदना प्रकट की। 
'बड़े दु:ख की बात है, शहर के बुजुर्गों की चिंता करने वाले रूपेन्द्र जी के सिर से मां का साया हट गया।'
'अरे, दु:ख काहे का साहेब। यहां तो मां की मौत का भी अपनी पॉपुलरिटी बढ़ाने में इस्तेमाल किया जा रहा है। और आप हैं कि शोक संवेदना प्रकट कर रहे हो।' संजय जी ने तुनकते हुए कहा। 
'मतलब! क्या मतलब है आपका?' संजय जी के चेहरे के भाव और उनको इस तरह बात करते देख दोनों ने चौंककर एक साथ यह कहा।  
'मेरा मतलब तो कुछ नहीं है। मतलबी तो दुनिया हो गई है। सच जानो दोस्तो आज रूपेन्द्र की मां का अंतिम संस्कार नहीं होगा बल्कि रिश्तों का अंतिम संस्कार होगा। तुम समझोगे नहीं। पूरी कहानी नहीं पता ना तुम लोगों को। समाज में तो रूपेन्द्र का अच्छा-अच्छा चेहरा ही दिखता है न।' 
'आप कहना क्या चाहते हैं? सब साफ-साफ बताइए। तब तो कुछ समझ में आए।' सुनील ने मामले को समझने के लिए सीधे-सीधे संजय जी से पूछा। 
'दुनिया को सीख देते हैं कि माता-पिता की सेवा करो। खुद क्या करते हैं, जानते हो तुम। चार भाई हैं। चारों खूब कमाते हैं। चारों के पास बड़े घर हैं। लेकिन, मां-बाबूजी के लिए किसी भी घर में थोड़ी सी जगह नहीं है। चारों भाईयों ने माता-पिता को पुस्तैनी मकान में अकेले छोड़ रखा है। बुढिय़ा तो चल बसी। उसका जीवन तो सुधर गया। रोज का दु:ख था, बच्चे अपने साथ नहीं रखते। बेचारे बाबूजी का अब क्या होगा, मुझे तो यही चिंता सताए जा रही है। अकेले रह गए। अब पहाड़-से दिन और लम्बी रातें क्या दीवारों से बात करके काटेंगे? कौन सुनेगा उनका सुख-दु:ख? रूपेन्द्र की समाजसेवा भी दिखावे की है। सब ढकोसला है। लेकिन, मैंने जानबूझकर कभी इस मामले पर रूपेन्द्र की निंदा नहीं की। क्योंकि समाज को नहीं पता कि वह अपने माता-पिता को कैसे रखता है। समाज तो वृद्धों के लिए चलाए गए उसके अभियान से प्रेरणा पा रहा है। अच्छा है यह पहलू उजागर न हो, वरना समाज का विश्वास टूटेगा। भले ही वह स्वार्थवश यह अभियान चला रहा है लेकिन उसके कारण समाज का तो भला हो रहा है।' 
'लेकिन, दोस्तो रूपेन्द्र ने अब जो किया है उससे मेरा मन भर गया है। तुम दिखे तो लगा, मन को हल्का कर लिया जाए। रूपेन्द्र से घृणा करने लगोगे आप, जब मैं आपको बताऊंगा कि दोपहर में दो बजे मां का निधन होने के बाद भी कल क्यों अंतिम संस्कार नहीं किया गया। सिर्फ इसलिए कि कम समय में ज्यादा लोगों तक सूचना नहीं पहुंच सकेगी और अंतिम यात्रा में कम लोग आएंगे। लोग क्या कहेंगे, रूपेन्द्र की मां का अंतिम संस्कार है और श्मशान खाली दिख रहा है। दूसरे दिन शवयात्रा ले जाएंगे तो अखबार में खबर पढ़कर शहर के ज्यादा से ज्यादा लोग आएंगे। फेसबुक, ट्विटर और सोशल मीडिया पर भी तो सूचनाएं भेजी गईं। सब रूपेन्द्र का आइडिया था। ताकि शवयात्रा और श्मशान में लोगों का हुजूम दिखे।'
'ये भीड़ देख रहे हो तुम। इसी भीड़ के लिए रूपेन्द्र ने अंतिम संस्कार एक दिन टाल दिया।' घर के बाहर, गली में और मुख्य मार्ग तक तितरी-बितरी खड़ी भीड़ की ओर हाथ लहराते हुए संजय माहेश्वरी ने कहा। 
'मां के अंतिम संस्कार के बहाने रूपेन्द्र पार्टी के आलाकमान को अपनी लोकप्रियता दिखाना चाहता है। ताकि आने वाले विधानसभा चुनाव में टिकट मिल सके। घटिया है यह राजनीति। घटिया है यह सोच। संस्कारों का अंतिम संस्कार है।' इतना कहकर संजय खामोश हो गया। 
         उधर, चार लोगों ने शव को कांधे उठा लिया। रूपेन्द्र जी हांडी थामे आगे-आगे चले जा रहे हैं। श्मशान घाट की ओर, अंतिम संस्कार के लिए।
- साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'साहित्य परिक्रमा' में प्रकाशित कहानी । 

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

बात देश की है, बात आपके वोट की है

 लो कतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसकी सफलता और विफलता का दारोमदार आम जनता पर होता है। जनता अपने मताधिकार का उपयोग कर अच्छे लोगों को चुनकर सदन में भेज सकती है। ये अच्छे लोग अच्छी सरकार चलाएंगे। यदि जनता गलत लोगों के चुने जाने में मदद करेगी तो लोकतंत्र का मंदिर (संसद) अपवित्र होगा ही। गलत लोगों के चुने जाने में हम दो तरह से सहभागी होते हैं एक तो देश की न सोचकर निजी कारणों को ध्यान में रखकर किसी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करना और दूसरा तरीका है वोट ही न डालना। वोट नहीं डालकर हम खराब लोगों के चुने जाने में मदद करते हैं। क्योंकि समाज विरोध और राष्ट्र विरोधी ताकतें चाहती हैं कि समाज के प्रबुद्ध लोग वोट डालने घर से ही नहीं निकलें। जब स्वार्थ से ऊपर उठकर देशहित में मतदान करने वाले लोग पोलिंग बूथ तक नहीं पहुंचेंगे तो गलत व्यक्ति चुना जाना तय है। इसलिए अपना नेता, अपनी सरकार चुनने के लिए घरों से निकलिए। लोकतंत्र में एक-एक वोट का बड़ा महत्व है। एक-एक ईंट जोड़कर मजबूत इमारत खड़ी होती है। ठीक ऐसे ही आपके एक-एक वोट से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मजबूत होगा। आपको और हमें पांच साल में मौका मिला है। सकारात्मक परिवर्तन के लिए लम्बे समय से छटपटाहट है तो फिर सुशासन चुनने का मौका हाथ से क्यों जाने दें? आइए, लोकतंत्र के महायज्ञ में अपनी हिस्सेदारी निभाएं। अपना नेता चुने, अपनी सरकार चुने, अपना वोट दें। 
        किसे वोट दें : वोट जरूर दें। लेकिन सवाल उठता है कि वोट किसे दें। सही-गलत की पहचान कैसे करें? सही-गलत की पहचान बहुत आसान है। वोट देने से पहले जरा सोचिए बस। दरअसल, बात अब आपकी कॉलोनी की नहीं है। बात अब आपके शहर की नहीं है। बात अब आपके प्रदेश की भी नहीं है। बात देश की है। देश मजबूत होगा तो आपका प्रदेश मजबूत होगा, आपका शहर विकास करेगा। इसलिए अपने अधिकार से, अपनी ताकत से, अपने मत से देशहित में उसे चुनिए जो तर्कपूर्ण बात कर रहा हो। जिसने कुछ करके दिखाया हो, खाली बतोलेबाजी न की हो। जो गप मारने की जगह मुद्दों पर बात करना चाह रहा हो। हमें ऐसे आदमी को चुनना है, ऐसी सरकार लानी है जिसकी सोच में राष्ट्र पहले हो। 
      सशक्त नेतृत्व चुनिए : देश को चाहिए एक सक्षम और सशक्त नेतृत्व ताकि पाकिस्तान की नापाक हरकतों पर लगाम लग सके। ताकि हमारे जवानों के सिरों की तरफ बढऩे वाले हाथ पहले ही काट दिए जाएं। ऐसा नेता और सरकार हमें नहीं चुननी है जो हमारे सैनिकों के हत्यारों को अपने घर (देश) में बुलाकर बिरयानी खिलाए। हमें सशक्त नेतृत्व इसलिए भी चुनना है ताकि अमरीका हमारे राजनयिक का अपमान न कर सके। ताकि चीनी ड्रैगन भारत की तरफ फुफकार न सके। ताकि बांग्लादेश अपनी हद में रहे। ताकि इटली के नाविक हमारे मछुआरों की हत्या करके न भाग सकें। हमें साबित करना है कि प्यारे यह देश कोई मांस का लोथड़ा नहीं जो आस-पास के गिद्द आएंगे और नोंच-नोंच खाएंगे। ये देश मातृभूमि है हमारी। हमारा स्वाभिमान है। हमारा जमीर है। बहुत हुआ अब स्वाभिमान को दांव पर नहीं लगने देना है। दुनिया भारत की तरफ अदब से देखे और भारत के बढ़ते रुतबे को देखे। हमारा यह ख्वाब कोई कठपुतली सरकार पूरा नहीं कर सकती, इसके लिए तो हमें चुनना होगा सशक्त नेतृत्व। 
        राष्ट्रीय एकता चुनिए : अपने आपको सेक्युलर कहने वाली पार्टियों और नेताओं की ओर से बहुसंख्यकों की अनदेखी और अल्पसंख्यकों को अधिक महत्व देने से समाज को बांटने का काम किया जा रहा है। वोट बैंक की राजनीति के लिए देश की एकता और अखण्डता को दांव पर लगाया जा रहा है। यह घातक है। 'देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक है।' इस तरह का बयान बहुसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बताता है। यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। रंगनाथ आयोग और सच्चर कमेटी की सिफारिशें भी तुष्टीकरण की राजनीति की देन हैं। 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निरोधक अधिनियम' तो साफ तौर पर बहुसंख्यकों को ही दंगाई साबित करने के लिए तैयार किया गया है। राममंदिर को धर्म से जोडऩे वाले भूल जाते हैं कि राम देश का स्वाभिमान है। राम देश के महापुरुष हैं। देश के आदर्श राजनेता का चरित्र राम है। उनकी राज व्यवस्था (रामराज्य) की आज भी दुहाई दी जाती है। राम देशवासियों के रोम-रोम में हैं। फिर राम को सांप्रदायिक रूप देने का काम क्यों किया जा रहा है? क्यों उन्हें महज हिन्दुओं के साथ ही जोड़ा जा रहा है जबकि वे भारत के प्रतीक हैं। जब इस देश में छुटभैए नेताओं की आदमकद प्रतिमाएं लग सकती हैं, सड़कें-चौराहे उनको समर्पित हो सकते हैं, योजनाओं को उनके नाम पर शुरू किया जा सकता है, महत्वपूर्ण संस्थानों का नामकरण उनके नाम पर किया जा सकता है, यहां तक की कीमती और महंगी जमीनों पर उनकी समाधि और पार्क बनाए जा सकते हैं तो फिर राममंदिर पर क्या आपत्ति है? क्या सिर्फ इसलिए कि इसके बहाने ये पार्टियां और नेता एक विशेष समुदाय को भड़काकर उसके वोट अपनी झोली में डाल सकें? आपको तय करना है कि वोट किसे दें- जो राम के नाम पर आपको बांट रहे हैं या जो राम के नाम पर आपको जोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। जो तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं या फिर जो समान अधिकारों की बात करते हैं। जो जम्मू-कश्मीर को महज वोट बैंक की नजर से देखते हैं या फिर जो कश्मीर को इस देश का हिस्सा मानकर उसके विकास की बात करते हैं। हमें उसे चुनना है, जिसके पास देश की एकता और अखण्डता के लिए विजन हो, मिशन हो और एम्बीशन हो। जो यूनिटी फॉर नेशन की बात करे। जिसके लिए राष्ट्र सबसे पहले हो। 
       आर्थिक विकास चुनिए : पिछले दस सालों में महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़कर रख दी है। भारत में महंगाई लगातार बढ़ी है जबकि दुनिया में महंगाई घटी है। महंगाई और गरीबी पर देश का वर्तमान नेतृत्व लगातार आम आदमी का मजाक बनाता रहा है। सरकार में शामिल जिम्मेदार लोगों के बयान हास्यास्पद ही नहीं आपत्तिजनक भी हैं। दुनिया के जानेमाने अर्थशास्त्री और देश के मुखिया कहते हैं कि मेरे पास क्या जादू की छड़ी है, घुमाऊंगा और महंगाई दूर कर दूंगा। भारत का योजना आयोग गरीबी का उपहास कुछ यूं उड़ाता है कि ३२ रुपये शहर में और २६ रुपये गांव में खर्च करने वाला आदमी गरीब नहीं है। यूपीए सरकार के मंत्री पी. चिदम्बरम कहते हैं कि १५ रुपये की पानी की बॉटल और २० रुपये की आइसक्रीम खाने वाले लोग गेहूं के दाम में एक रुपये की बढ़ोतरी मंजूर नहीं कर सकते, हाय-तौबा मचाते हैं। क्या इनके रहते गरीबी दूर हो सकती है? क्या देश विकास के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है? क्या इन्हें देश की बड़ी आबादी का अपमान यूं करते रहने देना चाहिए? अब यहां जरा सोचिए, दुनिया जब भारत की ओर देख रही है तब हमें क्या तय करना है? ऐसी स्थिति में हमें देश के विकास का स्वप्न देख रहे लोगों को चुनना है, जिन्होंने मौका मिलने पर विकास करके दिखाया हो, जिन्होंने गरीबी नजदीक से देखी हो, जो भारत की नब्ज को समझते हों, जो संवेदनशाील हों। कुछ लोग साठ साल से अभी तक गरीबी दूर करने की सिर्फ बात ही कर रहे हैं लेकिन गरीबी अब भी ऐसे नेताओं और पार्टियों को वोट देकर ठगे गए मतदाताओं का मुंह चिढ़ा रही है। ६० साल से गरीबी खत्म करने का आश्वासन ही तो सुनते आ रहे हैं। तय कीजिए अब आश्वासन नहीं सुनना, नतीजा चाहिए। अब आर्थिक विकास की राह पर आगे बढऩा है इसलिए विकासपुरुष को चुनना है।
        शिक्षा के सुअवसर और रोजगार चुनिए : दुनिया के श्रेष्ठ २०० विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का एक भी विश्वविद्यालय शामिल नहीं है। शिक्षा संस्थानों में अध्ययन और अध्यापन की समुचित व्यवस्थाएं नहीं हैं। यह युवा भारत की स्थिति है। देश में लगभग आधी आबादी २५ साल से कम उम्र की है। इस आबादी को उचित शिक्षा नहीं मिलेगी तो रोजगार का संकट खड़ा होगा ही। इसी युवा शक्ति को ठीक शिक्षा मिले तो देश की तरक्की में कितनी गति आएगी, आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं। लेकिन अब तक हमारा नेतृत्व इस युवा शक्ति को नहीं पहचान सका है। इसलिए चुनिए ऐसी सरकार जो युवाओं को ध्यान में रखकर नीति बनाए। गुणवत्तायुक्त और मूल्य आधारित शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए और रोजगार के अवसर बढ़ाए।  
         इस बार चूक न हो, देश को सरदार चाहिए : सशक्त और सक्षम नेतृत्व क्यों जरूरी है? इसको समझने के लिए आइए इतिहास के पन्ने पलटें। १९४७ में देश चाहता था कि लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रधानमंत्री बनें लेकिन चंद स्वार्थी और सत्तालोलुप लोगों के कारण सरदार को पीछे धकेल दिया गया। देश का उसका असली नेता नहीं मिला। हैदराबाद और जूनागढ़ रियासत के विलय के विवाद को जिस तरह से सरदार ने सुलझाया, सोचो जम्मू-कश्मीर का मसला उन्हें सुलझाने दिया गया होता तो आज क्या स्थिति होती। तब कुछ लोगों के हाथ में फैसला करने की ताकत थी, इसलिए देश का पहला प्रधानमंत्री सरदार के रूप में नहीं मिला लेकिन अब १२५ करोड़ लोगों के हाथ में फैसला है। वोट करें और अपना सरदार चुने। आखिर में एक अपील, टीवी के सामने से हटिए, पिकनिक फिर कभी चलेंगे, घर से निकलिए, पांच साल में हमारी बारी आई है, वोट दीजिए और अपना नेता, अपनी सरकार चुनिए। 

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

बौद्धिकता पर हमला पतन का संकेत

 लो कतंत्र की सबसे अनूठी बात यह है कि इसमें सबको समान रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। अन्य तरह की किसी भी शासन व्यवस्था में इस कदर आजादी नहीं है। दरअसल, लोकतंत्र की ताकत आम जनता में निहित है। लोकतंत्र के संचालन का सूत्र लोगों के हाथ में होता है। लोकतंत्र की सफलता और विफलता भी जनता के हाथ में ही है। इसलिए समय-समय पर अपने लोकतंत्र को ठोक-बजाकर देखते रहना जरूरी है। उसकी समालोचना और प्रशंसा दोनों ही जरूरी हैं। प्रबुद्धवर्ग अगर सरकार या फिर शासन व्यवस्था में शामिल किसी राजनीतिक दल की नीतियों की आलोचना करता है तो इसमें गलत क्या है? क्या राजनीतिक विमर्श करने वाले प्रबुद्ध लोगों पर राजनीतिक हमला उचित है? क्या बौद्धिक बहस और आवाज का गला घोंटने के प्रयास की निंदा नहीं की जानी चाहिए? मध्यप्रदेश में मुद्दों की राजनीति छोड़कर कांग्रेस इसी तरह की दोयम दर्जे की राजनीति कर रही है। मध्यप्रदेश के ही नहीं देश के जाने-माने पत्रकार, लेखक, राजनीतिक विचारक और मीडिया शिक्षक संजय द्विवेदी को मध्यप्रदेश कांग्रेस ने अपने निशाने पर लिया है। उनके एक लेख को प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला बताकर नाहक हंगामा खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। उन्हें एक खास विचारधारा के प्रभाव का लेखक बताने की बेहद छोटी हरकत की गई है। 
       कांग्रेस के आरोप पढ़-सुनकर समझा कि मध्यप्रदेश में अपना वजूद खो रही कांग्रेस या तो बहुत हड़बड़ी में है, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा, जो उल्लू की लकड़ी उसे किसी ने पकड़ा दी, उसी पर हंगामा खड़ाकर अपनी राजनीति की दुकान चलाने की कोशिश कर रही है। या फिर उन्हें अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं है। संजय द्विवेदी पर आरोप लगाने वाले और उन्हें नौकरी से हटाने की मांग करने वाले कांग्रेस के प्रवक्ता या तो लेखक संजय द्विवेदी को जानते नहीं है या फिर उन्होंने जानबूझकर यह खिलदंड किया है। पत्रकारिता में निष्पक्षता का नाम ही संजय द्विवेदी है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में दैनिक भास्कर, नवभारत, हरिभूमि और जी न्यूज के संपादक, समाचार संपादक और एंकर के रूप में देश ने उनके काम को जाना है, उनकी विश्वसनीयता को परखा है। आज तक उनकी लेखनी पर किसी ने अंगुली नहीं उठाई। संजय द्विवेदी जितने प्रिय राष्ट्रवादी विचारधारा के पैरोकारों के हैं, वामपंथी खालिस कॉमरेड भी उन्हें उतना ही प्रेम करते हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के शीर्षस्थ नेताओं से उनके आत्मीय ताल्लुक हैं। दोनों ही दल के गंभीर नेता उनका और उनकी लेखनी का सम्मान करते हैं। शिद्दत से उन्हें याद करते हैं। खास विचारधारा का लेखक होने के आरोप तो उनके काम के कुछ अध्याय देखने पर ही खाजिर हो जाते हैं। मध्यप्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह (भाजपा और राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग इनके धुर विरोधी हैं) के अभिनंदन ग्रंथ के संपादन में संजय द्विवेदी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बीआर यादव पर लिखी किताब 'कर्मपथ' का संजय द्विवेदी ने संपादन ही नहीं किया वरन उसके विमोचन में दिग्विजय सिंह (राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग अपने घोर शत्रु के रूप में दिग्विजय सिंह को देखते हैं) को सादर बुलाया। जब राहुल गांधी ने सकारात्मक राजनीति के प्रयास किए तो संजय जी ने खुलकर उनकी तारीफ में लिखा। अन्ना हजारे ने सामाजिक क्रांति की अलख जगाई तो उन्होंने अन्ना के समर्थन में जागरण पत्रिका तक प्रकाशित कर दी। अरविंद केजरीवाल ने जब तक आम आदमी को अभिव्यक्त किया श्री द्विवेदी उनके साथ थे, उनकी प्रशंसा में लिखा लेकिन अरविन्द जब राह भटके तो उनकी आलोचना भी शिद्दत से की। संजय द्विवेदी किसी के इशारे पर नहीं लिखते। जब मन उद्देलित होता है तो मनोभाव कागज पर उतरते हैं। वे समालोचक हैं, किसी के निंदक या प्रशंसक नहीं। 
        देश के प्रधानमंत्री और कांग्रेस की नीति की आलोचना पीएम के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू और पूर्व कोल सेक्रेटरी पीसी पारिख ने तथ्यों के आधार पर किताब लिखकर की है। दोनों किताबों पर खूब हंगामा हुआ। कांग्रेस ने विरोध किया। मनमोहन सिंह हमेशा की तरह चुप रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा क्योंकि वे सब जानते हैं। वे लोकतंत्र की मर्यादा भी समझते हैं। लेकिन शायद मध्यप्रदेश कांग्रेस ने राजनीति की अलग ही राह तय की है। इसीलिए महज एक समालोचना पर ही बिफर गए और एक बुद्धिजीवि पर राजनीतिक हमला कर दिया। लोकतंत्र में गलत कार्यों की आलोचना और अच्छे कार्यों की तारीफ करने का सबको अधिकार है। 
       किसी राष्ट्र और राज्य को पतन के मार्ग पर ले जाना बहुत आसान है, उस राष्ट्र और राज्य की बौद्धिक परंपरा-संपदा पर आघात करना शुरू कर दो। रामायण के किस्से सबके जेहन में होंगे। राक्षस किस तरह ऋषियों के आश्रम पर आक्रमण कर उनकी हत्याएं कर रहे थे। वे उस राज्य की बौद्धिक संपदा को खत्म कर हमेशा के लिए उस पर अपना अधिपत्य जमाना चाहते थे। राक्षस जानते थे कि जब तक बुद्धिजीवि जीवित रहेंगे किसी भी राज्य पर गलत ढंग से शासन करना संभव नहीं। बुद्धिजीवि गलत होता देख खामोश नहीं बैठते, वे वैचारिक क्रांति का बिगुल फूंकते हैं, स्वाभिमान और आत्मगौरव के लिए लडऩे के लिए समाज को जागृत करते हैं। विख्यात साहित्यकार नरेन्द्र कोहली भी कहते हैं कि कि राजा देश बनाते हैं और ऋषि राष्ट्र बनाते हैं। हमें ऋषियों की जरूरत है। समर्थ राष्ट्र के लिए चिंतनशील पत्रकारों और शिक्षकों की जरूरत है। ऐसे में लेखक संजय द्विवेदी पर कांग्रेस के राजनीतिक हमले को राष्ट्र पर हमले के रूप में क्यों नहीं देखा जाना चाहिए? कांग्रेस शायद भूल गई है कि इंदिरा गांधी जैसी सशक्त राजनेता के माथे पर महज एक कलंक है, आपातकाल का। यह भयंकर कलंक है। आपातकाल में भी कांग्रेस ने सबसे पहले बौद्धिक जगत पर हमला किया था। बौद्धिक जगत पर हमले की इस भयंकर गलती के कारण इंदिरा गांधी के तमाम अच्छे कार्यों पर पर्दा पड़ जाता है। अगर आपको देश की चिंता है तो मुद्दों की राजनीति करो। विचार करो कि संजय द्विवेदी ही नहीं देशभर के लेखकों को क्यों आपकी आलोचना करने पर विवश होना पड़ा है। संजय द्विवेदी जैसे लेखकों का तो काम ही है, आईना दिखाना। आईने में दिख रही तस्वीर गंदी है तो उसे सुधारने का दायित्व हमारा है। हमें अपने चेहरा धोने की जरूरत है न कि आईना दिखाने वाले को गरियाने की। 
      संजय द्विवेदी एक संतुलित लेखक हैं। उन्हें मैं कोई छह-आठ माह से नहीं जानता। लम्बे अरसे से उन्हें पढ़ता आ रहा हूं। 'की-बोर्ड के सिपाही' के नाते उनका लेखन की दुनिया में बड़ा सम्मान है। आदर के साथ उनको पढ़ा जाता है। वे सच को सच लिखते हैं। अपने लेखन से राजनीति ही नहीं समाज को दिशा देने का कार्य संजय द्विवेदी कर रहे हैं। उनकी लेखनी की धार को कुंद करने का कांग्रेस का यह कुत्सित प्रयास ठीक नहीं है। इस प्रयास की निंदा होनी चाहिए और विरोध भी।

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

वोट बड़ा या नोट

 चु नाव, लोकतंत्र में हवन की तरह है। हवन के लिए हम पवित्र 'समिधा' का उपयोग करते हैं। हवन करते समय मन और बुद्धि भी सात्विक रखते हैं। जिस तरह की मर्यादा और आचरण हवन के लिए जरूरी है वैसी ही समझ और व्यवहार लोकतंत्र के हवन (चुनाव) के लिए आवश्यक है। चुनाव आयोग से लेकर तमाम सामाजिक संगठन तक निर्वाचन में स्वच्छ मतदान प्रतिशत को बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं। भारत में नोट के बदले वोट देने की बुराई व्याप्त है। सही मायने में इसे यूं कहना चाहिए कि भारत में नोट के बदले वोट खरीदने की बीमारी नेताओं में है। नोट के प्रभाव को खत्म करने के लिए चुनाव आयोग और सामाजिक संगठन खासी मेहनत कर रहे हैं। मतदाताओं से वोट के लिए नोट नहीं लेने की अपील की जा रही है। कोई नेता नोट तो नहीं बंटवा रहा, इस पर भी नजर रखी जा रही है। हम ऐसे लोगों को तो खूब गरियाते हैं जो शराब की बोतल और गांधी छाप नोट के बदले किसी प्रत्याशी को वोट देते हैं। लेकिन, क्या हम ऐसे लोगों की भर्त्सना नहीं करना चाहेंगे जो नोट कमाने की फिराक में वोट देना जरूरी नहीं समझते। नोट कमाना उनकी प्राथमिकता है, अपनी जिम्मेदारी का निर्वाहन करना नहीं। दोनों ही प्रकार के मनुष्य लालची हैं। दोनों के बीच एक बात कॉमन है कि वे नोट पाने के लिए बेताब हैं। एक प्रकार के लोग नोट पाने के लिए वोट बेच रहे हैं तो दूसरे प्रकार के लोग नोट कमाने के लिए वोट ही नहीं देना चाह रहे। बॉलीवुड के कई लोकप्रिय अभिनेता और अभिनेत्रियां २३ से २६ अप्रैल तक अमरीका के फ्लोरिडा शहर में आयोजित होने वाले आइफा समारोह में शामिल होने जा रही हैं। जबकि २४ अप्रैल को मुम्बई में मतदान है। लोकतंत्र के महापर्व में हिस्सेदारी करना इन हीरो-हीरोइन के लिए जरूरी नहीं है, जरूरी है तो आइफा में नाचकर पैसा कमाना। बॉलीवुड के ये कलाकार ऐसे वक्त में मतदान की अनदेखी करने वाले हैं जबकि चुनाव आयोग मतदान प्रतिशत बढ़ाने और मतदान में प्रत्येक मतदाता की भागीदारी को जोर-शोर से प्रोत्साहित कर रहा है। मतदान में हर कोई बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करे, इसके लिए सामाजिक संगठन जन-जागरण के कार्यक्रम चला रहे हैं। मतदाताओं को जागरूक करने के लिए कई व्यापारिक और उद्योग जगत की संस्थाएं एवं शख्सियत प्रयास कर रहे हैं। अमिताभ बच्चन और आमिर खान जैसे बॉलीवुड के कई दिग्गज भी मतदान में भाग लेने के लिए लोगों से अपील कर रहे हैं। ऐसे में सैफ अली खान, करीना कपूर, फरहान अख्तर, प्रियंका चौपड़ा, अनिल कपूर, दीपिका पादुकोण, ऋतिक रोशन, माधुरी दीक्षित नेने और विवेक ओबेराय सहित कई कलाकारों का मतदान से दूर रहना खटक रहा है। समाज में अच्छा संदेश नहीं जा रहा। सवाल खड़ा हो रहा है कि मायानगरी के इन महानुभावों की नजरों में वोट बड़ा है या नोट?  
         चुनाव आयोग और सामाजिक संगठनों की ओर से भारत के नागरिकों से अपील की जा रही है कि वे अपने अधिकार को, अपने कर्तत्व को और अपनी जिम्मेदारी को ठीक से पहचानें। मतदान अवश्य करें। मतदाता लोकतंत्र में मताधिकार की ताकत को पहचानें। मतदान नई सरकार के निर्वाचन की महज एक प्रक्रिया मात्र नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र में अपनी जिम्मेदारी के निर्वाहन का महत्वपूर्ण मौका है। अब जरा सोचिए, जब देश की सरकार चुनने का मौका आन पड़ा है तो हमारे हीरो-हीरोइन आइफा में नाचने के लिए मरे जा रहे हैं। क्या आइफा में जाना इतना जरूरी है? बॉलीवुड के ये कलाकार भारत सरकार के निर्वाचन की प्रक्रिया की अनदेखी कर रहे हैं। क्यों नहीं भारत की जनता इनके नाच का बहिष्कार करे? क्यों नहीं लोग लापरवाह और गैरजिम्मेदार कलाकारों को फॉलो करना बंद कर दें? क्यों नहीं इनके चहेते, इनकी फिल्मों को ही देखना बंद कर दें? जिनके लिए नोट कमाना प्राथमिकता हो, देश नहीं। ऐसे कलाकारों को हम सिर-माथे पर क्यों बैठाएं? क्यों इन्हें अपना हीरो-हीरोइन मानें? हमारे हीरो-हीरोइन वही होने चाहिए जो देश को अपनी प्राथमिकता में रखें। हमारे हीरो-हीरोइन वही होने चाहिए जो अपने कर्म से समाज को सही राह दिखाएं। हम उन्हें ही फॉलो करें, उन्हें ही अपने सिर-माथे पर सजाएं जो देश-समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का ठीक से निर्वाहन करें। 
सैफ अली खान और करीना कपूर मतदान के दिन यानी २४ अप्रैल को मुम्बई में नहीं रहेंगे, वे आइफा में शामिल होना जरूरी समझते हैं। फरहान अख्तर सदैव खुद को एक जागरूक और संवेदनशील भारतीय नागरिक की तरह प्रस्तुत करते रहे हैं। लेकिन जब मौका आया अपनी जिम्मेदारी निभाने का तो वे आइफा चले जाएंगे। फरहान अख्तर, शाहिद कपूर के साथ मिलकर आइफा समारोह की मेजबानी करेंगे। यानी फरहान और शाहिद दोनों ही वोट नहीं डालेंगे। विवेक ऑबेराय जैसे फ्री-फोकट बैठे कलाकर भी मतदान से गैर हाजिर रहेंगे। वोट डालने के लिए उनके पास भी वक्त नहीं है। उनके लिए भी मतदान से अधिक महत्वपूर्ण आइफा का भव्य समारोह है। अनिल कपूर जैसे वरिष्ठ कलाकार भी मतदान के एक दिन पहले अमरीका के लिए निकल जाएंगे। जब वरिष्ठ कलाकार ही अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाह हों तो उनके जूनियर क्या सीखेंगे? सोचने वाली बात है। इस साल कई हिट फिल्म देने वाली दीपिका पादुकोण भी आइफा की शोभा बढ़ाएंगी। ये वही दीपिका पादुकोण हैं जिन्हें अपने पिताजी के लिए भारत रत्न मांगना तो याद रहता है लेकिन जब भारत के महापर्व की बात आई तो अपनी जिम्मेदारी और अपना कर्तव्य ही भूल गईं हैं। मतदान से ज्यादा जरूरी दीपिका के लिए आइफा में शामिल होकर तमाम ट्रॉफियां और नोट बटोरना है। आईपीएल-६ में अंधाधुंध पैसा कमाने के फेर में सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग के आरोपी राज कुंद्रा की पत्नी शिल्पा शेट्टी सहित वाणी कपूर, बिपाशा बसु, दिया मिर्जा और नील नितिन मुकेश भी मतदान से दूर आइफा के ग्लैमरस माहौल का लुत्फ उठा रहे होंगे। 
        लोकतंत्र में एक-एक वोट का बड़ा महत्व होता है। एक वोट से कई दिग्गज चुनावी मैदान में चित हुए हैं। भाजपा की सरकार भी महज एक वोट से गिर गई थी। राजनीतिक पार्टियां और कार्यकर्ता एक-एक वोट को पोलिंग बूथ तक पहुंचाने की चिंता करते हैं। एक-एक वोट से अपने लिए वोट बैंक बनाते हैं। एक-एक वोट से पार्टी का जनाधार बनाते हैं। आपने गौर किया होगा, समाचार-पत्र हों या न्यूज चैनल्स, अभिनेता या अभिनेत्री को वोट डालने पर खूब कवरेज देते हैं। पोलिंग बूथ पर पहुंचने वाले कलाकारों को मीडिया खूब दिखाता है। इसके पीछे मनोविज्ञान है। दरअसल, बॉलीवुड के इन कलाकारों की तगड़ी फॉलोवर्स होती है। घर से निकलकर वोट डालने पोलिंग बूथ तक आए कलाकारों को कवरेज देने का यही उद्देश्य होता है कि उनके फॉलोवर भी मतदान के लिए प्रेरित हों। वे भी घर से निकलकर पोलिंग बूथ तक पहुंचे। मतदान में अपनी भागीदारी सुनिश्चत करें। आइफा समारोह में शामिल होने जा रहे बॉलीवुड के तमाम सितारों को अपनी भूमिका, अपनी जिम्मेदारी और अपनी प्राथमिकता समझनी चाहिए। अगर वे अपनी भूमिका और प्राथमिकता तय करने में अक्षम हैं तो फिर भारत की जनता, इन तमाम सितारों के फैन, फॉलोवर्स और सिनेप्रेमी तय करें कि गैरजिम्मेदार, लापरवाह इन सितारों को जमी कैसे दिखाई जाए।

सोमवार, 24 मार्च 2014

शिव मंदिरों का खजाना बटेश्वर

 ए क नहीं, दो नहीं, लगभग आधा सैकड़ा शिव मंदिर। एक ही जगह पर, एक ही परिसर में। आठवीं शताब्दी की कारीगरी का उत्कृष्ट नमूना। आसपास बिखरे पड़े तमाम अवशेष। पुरातत्व विभाग और सरकार ईमानदारी से प्रयास करते रहेंगे तो निश्चित ही चारों तरफ बिखरे पड़े इन्हीं अवशेषों में से और मंदिर जी उठेंगे। जैसे फीनिक्स पक्षी के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी ही राख से फिर जी उठता है। मुरैना जिले के बटेश्वर में अवशेषों के बीच खड़े मंदिरों को देखकर तो यही उम्मीद मजबूत होती कि भविष्य में यहां विशालतम मंदिर समूह होगा। पुरातत्वविद मानते हैं कि कभी यहां ३०० से ४०० मंदिर हुआ करते थे। इनमें ज्यादातर शिव मंदिर हैं। कुछेक विष्णु मंदिर भी हैं। श्रंखलाबद्ध खड़े करीब आधा सैकड़ा मंदिरों का समूह ही जब प्रखरता के साथ अपनी विरासत की कहानी बयान करता है तो सोचिए ३००-४०० मंदिरों का समूह कैसे भारतीय संस्कृति, सभ्यता और विरासत का परचम लहराएगा।

गुरुवार, 20 मार्च 2014

कुछ सवाल केजरीवाल से


लो कतंत्र में सवाल पूछने की पूरी आजादी है। यह अच्छा भी है। जिसे हमने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वाहन करने के लिए चुना है, उससे फीडबैक लेने के लिए सवाल पूछना जरूरी है। ताकि देश जान सके कि सरकार की गति ठीक है या नहीं। यह परंपरा विकसित होनी चाहिए लेकिन उत्तरदायित्व के साथ। हम जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछ रहे हैं तो कुछ सवालों के जवाब देने के लिए हमें भी तैयार रहना चाहिए। यह ठीक नहीं कि जब हमसे सवाल पूछे जाएं तो हम बिदक जाएं और सवाल पूछने वाले पर ही दोषारोपण करने लगें। आम आदमी पार्टी (आआपा) के महत्वपूर्ण चेहरे अरविन्द केजरीवाल के साथ यही दिक्कत है। देशभर में घूम-घूमकर अन्य पार्टियों के नेताओं से सवाल पूछ रहे दिल्ली के 49 दिन के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल तब उखड़ जाते हैं जब कोई उनकी तरफ सवाल उछाल देता है। उन्हें सवाल पूछने की तो आदत है लेकिन जवाब देना उन्हें शायद शोभनीय नहीं लगता। या फिर उनके पास सवालों के उचित जवाब नहीं होते। ऐसे में अन्य नेताओं की तरह अरविन्द भी चुप्पी साध जाते हैं या फिर घुमा-फिराकर सफाई देने की कोशिश करते हैं। मीडिया जब तक उन्हें स्थापित करता रहा, उन्हें स्पेस देता रहा, उनकी सुनता रहा तब तक सबकुछ ठीक था। लेकिन, दिल्ली की जिम्मेदारी से भाग खड़े अरविन्द केजरीवाल, अपने कई बयानों से पलट चुके अरविन्द केजरीवाल और दोहरे आचरण वाले अरविन्द केजरीवाल से जब मीडिया ने सवाल पूछने शुरू किए तो उन्होंने मीडिया को बिकाऊ बता दिया। कह दिया मीडिया मैनेज हो रही है। मीडिया को मैनेज करने के मामले पर तो अरविन्द केजरीवाल का चेहरा सबके सामने आ गया है। उनकी पोल खुल गई है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में अरविन्द केजरीवाल और पुण्यप्रसून वाजपेयी क्या कर रहे हैं? उनकी बातचीत से साफ जाहिर हो रहा है कि मीडिया को मैनेज किया जा रहा है। पत्रकारिता धर्म का उल्लंघन किया जा रहा है। सवाल पूछने की परंपरा का शुभारम्भ करने के लिए अरविन्द केजरीवाल प्रशन्सा के पात्र हैं। लेकिन केजरीवाल को समझना होगा कि उन्हें सिर्फ सवाल पूछने का ही अधिकार नहीं है, जवाब देने की जिम्मेदारी से वे भी नहीं बच सकते। राजनीतिक बदलाव की बात करने वाले अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के अब तक के सफर का आकलन करने पर कई सवाल बनते हैं। कुछ सवाल अरविन्द केजरीवाल से हैं, जिनके जवाब उन्हें देना चाहिए, क्योंकि जनता जानना चाहती है।
          आआपा के मुखिया अरविन्द केजरीवाल से सबसे पहला सवाल तो यही बनता है कि आपने अन्ना का साथ क्यों छोड़ा? जबकि आप कहते थे कि जो अन्ना कहेंगे वही होगा? फिर क्या कारण रहे कि अन्ना को छोड़कर राजनीतिक पार्टी बनाने की ठान ली? इस सवाल का गोलमोल जवाब अरविन्द कई बार देते हैं कि उन्हें राजनीति में आने के लिए बाध्य किया गया। लेकिन यह सम्पूर्ण जवाब नहीं है। जनता तो अब मानने लगी है कि आपने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए अन्ना हजारे का इस्तेमाल किया। भ्रष्टाचार के प्रति जनता के गुस्से को आपने कैश कराया। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ाकर राजनीति में पहुंचने के लिए रास्ता बनाया। अन्ना हजारे कहते हैं कि अरविन्द अब बदल गया है। वह सत्ता लोलुप हो गया है। क्या आप सत्ता लोलुप हैं? यदि नहीं तो मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए आप अपने बच्चों की सौंगध को कैसे भूल गए? ऐसा तो कोई कुटिल राजनीतिज्ञ ही कर सकता है। आपने तो जिस पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोला था, उसी पार्टी से समर्थन लेकर सरकार बना ली। आप मुख्यमंत्री बन गए। आखिर क्या कारण रहे इसके पीछे? 
         अरविन्द केजरीवाल से एक अहम सवाल। यह सवाल आजकल हरकोई उनसे पूछ रहा है लेकिन वे ईमानदारी भरा जवाब नहीं दे रहे। आपकी लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ है या फिर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ? केन्द्र की यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई लड़ाई आखिर नरेन्द्र मोदी के विरोध तक कैसे पहुंच गई? जबकि नरेन्द्र मोदी तो स्वयं ही भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे हैं। फिर आप नरेन्द्र मोदी के विरोध में हंगामा करके क्या जताना चाहते हैं? कहीं आप कांग्रेस के सहयोग से प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब तो नहीं देख रहे? जिस तरह दिल्ली विधानसभा से पूर्व कांग्रेस को भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी पार्टी बताकर आपने जीत हासिल की और चुनाव के बाद उसी पार्टी के कंधे पर सवार होकर दिल्ली की कुर्सी पर बैठ गए। मुख्यमंत्री बनने के लिए आपने अपने सिद्धांतों की बलि चढ़ा दी। तमाम घोटालों के लिए दोषी पार्टी का समर्थन ले लिया। इसके बाद 49 दिन तक जिस तरह से आपकी सरकार चली, उससे आपकी नेक-नीयत पर भी कई सवाल खड़े हुए। क्या कारण था कि सरकार में आने के बाद आपने कॉमनवेल्थ गेम में हुए भ्रष्टाचार के मामले में दोषी लोगों के खिलाफ एफआईआर नहीं कराई? जबकि अन्ना आंदोलन के दौरान आप माइक पर चीख-चीखकर कहते थे कि हमारे पास सुबूत हैं। हम एफआईआर कराएंगे इस मामले में। आपके मुताबिक शीला दीक्षित भ्रष्टाचार की पर्याय थीं तो क्या कारण रहे कि सरकार में आने के बाद भी आपने शीला दीक्षित को जेल नहीं भिजवाया? आपने सरकार में आने के बाद शीला दीक्षित के एक भी घोटाले की जांच के आदेश जारी क्यों नहीं किए? संभवत: मुख्यमंत्री बनने के लिए आपने कांग्रेस से समर्थन ही इन्हीं शर्तों पर लिया होगा कि आप कांग्रेस के भ्रष्टाचार को भूल जाएंगे।  
           अरविन्द केजरीवाल की नाटकीय और विरोधाभास से भरी राजनीति में बेचारी दिल्ली की जनता खुद को ठगा-सा महसूस कर रही है। उसकी उम्मीदों को जोर का झटका जोर से लगा है। दु:खों का पहाड़ छोटा होगा, इस आस में जिस पर भरोसा दिखाया वह तो जिम्मेदारी से भाग खड़ा हुआ। दरअसल केजरीवाल को भ्रम हो गया है कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव में उन्हें जिस तरह आशा के विपरीत सफलता मिली, उसी तरह आम चुनाव में भी वे अच्छी तादाद में सीटें जीत लेंगे। अब उनकी नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है। यही कारण है कि केजरीवाल ने दिल्ली की जनता को उसके हाल पर छोड़कर प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर दौड़ लगा दी है। दिल्ली की जनता की ओर से अरविन्द केजरीवाल से कुछ और सवाल हैं। आपने मुख्यमंत्री बनने से पूर्व घोषणा की थी कि आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो दिल्ली में ठेकाप्रथा को खत्म करेंगे। विभिन्न विभागों में ठेके पर काम कर रहे कर्मचारियों को स्थायी नौकरी देंगे? मुख्यमंत्री बनने के बाद कितने कर्मचारियों को स्थायी नौकरी दी? आपने दिल्लीवासियों से वादा किया था कि सरकार में आए तो बिजली के बिल माफ किए जाएंगे? क्या हुआ आपके इस वादे का? आपने वादा किया था दिल्लीवासियों से कि सबको पानी दिया जाएगा मुफ्त में। क्या हुआ आपके इस वादे का? दिल्ली के कई इलाके क्यों प्यासे रह गए?  
          अरविन्द केजरीवाल क्या आपका आचरण दोहरा है? आपकी ईमानदारी और नैतिकता के मापदण्ड अपने लोगों के लिए अलग हैं और दूसरी पार्टियों के नेताओं के लिए अलग। महिलाओं को प्रताडि़त करने का गंभीर आरोप आआपा के नेता सोमनाथ भारती पर लगा। वेबसाइट के माध्यम से अवैध तरीके से लोगों को ठगने का आरोप भी सोमनाथ भारती पर लगा। इसके बावजूद आपने क्यों नहीं सोमनाथ भारती को पार्टी से बाहर किया? क्यों नहीं आपने आरोपों की जांच कराई? क्यों नहीं आपने सोमनाथ भारती के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई? आम आदमी पार्टी के अन्य नेताओं के संबंध में भी आपका यही स्टैण्ड रहा। आपके ये दोहरे मापदण्ड आखिर क्या जाहिर करते हैं? क्या ऐसे राजनीतिक बदलाव आएगा? 
          अरविन्द केजरीवाल राजनीतिक बदलाव की बात करते हैं। उनकी वेबसाइट पर दावा किया गया है कि वे औरों से अलग हैं। उनकी राजनीति साफ-सुथरी है। उनकी पार्टी का एजेण्डा है भ्रष्टाचार को खत्म करना। देश के सामने सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है। लेकिन, हकीकत यह है कि आआपा कहीं से भी औरों से अलग नहीं है। अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी वोट बैंक की संकीर्ण राजनीति में कूद पड़ी है। मुस्लिम वोटों को अपनी झोली में करने के लिए आपकी पार्टी के एक जिम्मेदार नेता कश्मीर पर बेहद ओछा और आपत्तिजनक बयान देते हैं। लेकिन, आपने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि यह उनकी निजी राय है। यह तो बाकि की पार्टियां भी करती हैं। फिर आप सबसे अलग होने का दावा किस आधार पर करते हैं? किसी दूसरे की बात तो छोडि़ए जनाब आप तो खुद की ही बताइए।  'सांप्रदायिकता भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा है।' आपने मुस्लिमों के बीच इंडियन इस्लामिक कल्चर सेंटर में यह बयान देकर क्या मुस्लिमों का नया रहनुमा बनने की कोशिश की है? आपकी बदली हुई चाल देखकर शंका होती है कि आप कैसे देश को वैकल्पिक राजनीति देंगे? आपके बदलते रंग देखकर तो यही लग रहा है कि आप भी तुष्टीकरण की राजनीति को बढ़ावा देंगे।
          आखिर में बिना किसी भूमिका के कुछ सवाल अरविन्द केजरीवाल से हैं। आपकी ही पार्टी की एक महिला नेता ने आप पर आरोप लगाया कि बहुत से काम जनता की राय से करने वाले अरविन्द टिकट बांटने में क्यों जनता की राय नहीं मांगते? आपकी वेबसाइट पर लिखा है कि आआपा में कोई हाईकमान नहीं है। लेकिन, दुनिया को तो पता है कि आपकी मर्जी के बगैर कुछ भी नहीं होता? आम आदमी पार्टी की वेबसाइट पर 'हम औरों से अलग क्यों' सेक्शन में झूठों की भरमार है। जैसे आपके विधायक और मंत्री लालबत्ती नहीं लेंगे। सरकारी बंगले में नहीं रहेंगे। लेकिन आपके नेताओं ने सरकारी बंगले लिए। बत्ती लगाकर भी घूमे। आखिर क्यों? आपने भी तो अब तक सरकारी बंगला खाली नहीं किया। जबकि अब आप मुख्यमंत्री नहीं हैं। 
         आम आदमी होने का दंभ भरने और आम आदमी के जैसा दिखने के लिए आपने खूब ड्रामे किए हैं। संभवत: आप इसमें सिद्धहस्त हैं। माहिर हैं। धरना और प्रदर्शन में आपकी विशेषज्ञता है। खैर, सीधा सवाल है कि आप तो आम आदमी है। यदि गुजरात के पुलिसकर्मी ने कुछ पूछताछ के लिए आपको रोक लिया तो इतना हंगामा क्यों खड़ा कर दिया आपने और आपकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने? खुद को आम आदमी साबित करने के लिए गणतंत्र दिवस के मौके पर आपने कहा था कि आप जनता के बीच बैठकर परेड देखेंगे लेकिन टीवी पर आप यूपीए के मंत्रियों के साथ बैठे दिखाई दिए। यूपीए के मंत्रियों के साथ आपके क्या कनेक्शन हैं? जनता को मालूम है कि आप इन सवालों के जवाब नहीं देंगे। आप ही की पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते विनोद कुमार बिन्नी ने भी आपसे बहुत से सवाल पूछे थे लेकिन आपने उनके एक भी सवाल का जवाब आज तक नहीं दिया है। मीडिया के सवालों के भी जवाब नहीं दिए हैं। फिर आम जनता की आप क्यों सुनेंगे। लेकिन, ये पब्लिक है बॉस सब जानती है। 

मंगलवार, 11 मार्च 2014

ये लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं

 अ रविन्द केजरीवाल आहिस्ता-आहिस्ता संदिग्ध होते जा रहे हैं। उनका काम करने का तरीका भी ड्रामैटिक है। आम आदमी पार्टी के गठन के बाद देशवासियों को नई तरह की राजनीति की एक उम्मीद नजर आई थी। हालांकि सवाल तो आम आदमी पार्टी (आआपा) के गठन के साथ ही उठने लगे थे, अरविन्द केजरीवाल की मंशा पर। अन्ना का आंदोलन छोड़कर (कैश कराकर) राजनीतिक पार्टी बनाने की जरूरत क्या थी? अन्ना हजारे के विरोध के बाद भी केजरीवाल रुके क्यों नहीं? फिर भी आआपा से एक उम्मीद थी, जो अब धूमिल होती नजर आ रही है। अरविन्द केजरीवाल की नई तरह की राजनीति का आशय अगर हंगामा खड़ा करने से था तो यह विशाल लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। आआपा के राजनीतिक स्टंट और स्टैण्ड भी गड़बड़ा गए हैं। मुस्लिम वोटों के लालच में केजरीवाल के लिए सांप्रदायिकता बड़ा मसला हो गया है, भ्रष्टाचार कहीं पीछे छूट गया है। जिसके खिलाफ चुनाव लड़ा, चुनाव से पूर्व जिसे पानी पी-पीकर कोसा, उसी के कंधे पर सवार होकर दिल्ली सरकार की कुर्सी पर विराजमान हो गए। जिसे महाभ्रष्ट बताया, उसी के समर्थन से सरकार बना ली। 'हम किसी से समर्थन न लेंगे और न देंगे' सार्वजनिक मंच से बच्चों की सौगंध लेकर की गई इस घोषणा को सत्ता लोलुप आम आदमी पार्टी के कर्ताधर्ता अरविन्द केजरीवाल ने भूलने में ज्यादा वक्त नहीं लगाया। आम आदमी पार्टी के व्यवहार से आरोप सच साबित होते दिख रहे हैं कि यह कांग्रेस की 'बी' पार्टी है। ईश्वर से प्रार्थना है कि यह सच न हो वरना वैकल्पिक राजनीति की बात करने वाले किसी भी सद्चरित्र व्यक्ति पर कोई भरोसा नहीं करेगा। खैर, यह तो साफ दिखने लगा है कि यूपीए सरकार के महाभ्रष्ट आचरण के खिलाफ शुरू हुई आम आदमी पार्टी की मुहिम अब भाजपा और नरेन्द्र मोदी विरोध में तब्दील होती दिख रही है। कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई ये लड़ाई कम से कम अब तो भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं है।
आम चुनाव के नजदीक आते-आते अरविन्द केजरीवाल के प्रमुख टारगेट नरेन्द्र मोदी हो गए हैं, जबकि मोदी स्वयं भ्रष्ट सरकार को हटाकर व्यवस्था परिवर्तन की बात देशभर में कर रहे हैं। केजरीवाल भ्रष्ट सरकार को हटाने की मांग तो अब करते नहीं दिख रहे बल्कि भ्रष्ट सरकार को सत्ता से बेदखल करने वाले मोदी का विरोध करते जरूर दिख रहे हैं। इसका क्या आशय निकाला जाए? आआपा भ्रष्टाचार के खिलाफ है या नरेन्द्र मोदी के? अरविन्द केजरीवाल से यह सवाल पूछने वाले लोगों की खासी तादाद है। अन्य नेताओं के निजी विमान में यात्रा करने पर हंगामा खड़ा करते आए केजरीवाल इंडिया टुडे ग्रुप के आयोजन में निजी विमान से पहुंचे। इंडिया टुडे ग्रुप के इस कॉन्क्लेब में कई प्रबुद्ध लोगों ने केजरीवाल से यही सवाल पूछा। जिसका सटीक जवाब केजरीवाल नहीं दे सके। अन्य कई सवालों पर भी उनके पास कोई बहाना नहीं था। देशभर में सवाल पूछते घूम रहे केजरीवाल 'आपकी अदालत' में भी पत्रकार रजत शर्मा के सवालों के जवाब नहीं दे सके। अरविन्द केजरीवाल के सही-गलत के पैमाने भी अलग-अलग हैं। अपनों के लिए अलग और दूसरों के लिए अलग। किसी पार्टी के नेता पर भ्रष्टाचार या कानून तोडऩे का आरोप मात्र लगे तो केजरीवाल चाहते हैं कि उस पर तत्काल कार्रवाई की जाए। निश्चित ही कार्रवाई की जानी चाहिए, जरूर की जानी चाहिए। भ्रष्टाचार रोकने के लिए यह बेहद जरूरी है। तत्काल जांच कराने के बाद उक्त भ्रष्ट नेता को न केवल पार्टी से बाहर करना चाहिए बल्कि जेल भी भेजना चाहिए। भ्रष्टाचार की रकम भी वसूल करनी चाहिए। लेकिन, केजरीवाल की नीयत पर तब सवाल उठते हैं, जब उनकी पार्टी के नेताओं पर आरोप लगते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। महिलाओं को प्रताडि़त करने का गंभीर आरोप आआपा के नेता सोमनाथ भारती पर लगा। वेबसाइट के माध्यम से अवैध तरीके से लोगों को ठगने का आरोप भी सोमनाथ भारती पर लगा। लेकिन, नतीजा क्या हुआ। ४९ दिन की दिल्ली सरकार में आखिर तक सोमनाथ भारती कानून मंत्री के पद पर सुशोभित होते रहे। अरविन्द केजरीवाल के ये दोहरे मापदण्ड आखिर क्या जाहिर करते हैं? क्या ऐसे राजनीतिक बदलाव आएगा?
अरविन्द केजरीवाल आजकल एक आरोप नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी पर लगा रहे हैं कि दोनों अंबानी की जेब में हैं। उनका कहना है कि नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी अंबानी से चंदा ले रहे हैं। अगर इनकी सरकार केन्द्र में आई तो बदले में अंबानी को फायदा पहुंचाया जाएगा। असल में सरकार अंबानी के इशारे पर चलेगी। यानी अरविन्द कहना चाहते हैं कि जिससे चंदा लिया जाता है, सरकार उसके इशारे पर चलती है। फिर तो अरविन्द केजरीवाल से गंभीर सवाल बनता है। उनकी पार्टी को विदेशी लोगों और संस्थाओं से भारी मात्रा में चंदा मिल रहा है। विदेश से चंदा तो और अधिक संदिग्ध हो जाता है। अंबानी से चंदे पर सवाल उठाते अरविन्द यह क्यों नहीं बताते कि उनकी पार्टी किन शर्तों और संधि के आधार पर विदेशी नागरिकों और संस्थाओं से चंदा ले रही है? अगर अरविन्द सरकार में आते हैं तो इस विदेशी चंदे के बदले देश को क्या कीमत चुकानी पड़ेगी? आम आदमी पार्टी की वेबसाइट के मुताबिक ही आआपा को ७ मार्च २०१४ की तारीख तक ७३.६ प्रतिशत चंदा भारत के लोगों और संस्थाओं से मिला है। जबकि २६.४ प्रतिशत चंदा विदेशी लोगों और संस्थाओं से मिला है। सबसे अधिक ९.५ प्रतिशत यूनाईटेड स्टेट्स, ४.६ प्रतिशत यूनाईटेड अरब अमीरात इसके अलावा यूनाईटेड किंगडम सहित अन्य देशों से आम आदमी पार्टी को फंड मिल रहा है। अरविन्द केजरीवाल में दिल्ली की जनता ने भरोसा दिखाया था लेकिन केजरीवाल पहले तो कहे से पलटे और सरकार बनाई फिर जिम्मेदारी से भाग गए। दिल्ली की जनता से किए गए बिजली-पानी सहित अन्य वादे आज भी वहीं की वहीं हैं। बुजुर्ग कह गए हैं कि काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती। आम चुनाव में धोखे-धड़ाके से यदि काठ की हाड़ी चढ़ भी जाए तो क्या अरविन्द केजरीवाल बताएंगे कि अरब अमीरात और यूनाईटेड स्टेट्स सहित अन्य देशों की जेब में होगी सरकार? 
      अरविन्द केजरीवाल अपनी बात से इतनी अधिक बार पलटी मार चुके हैं कि उनके संबंध में एक लोकप्रचलित कहावत बन गई है - 'यू टर्न यानी केजरीवाल टर्न।Ó उनकी पार्टी का मुख्य एजेण्डा है भ्रष्टाचार को खत्म करना। अब तक आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया अरविन्द केजरीवाल के लिए भ्रष्टाचार ही देश का सबसे बड़ा मुद्दा था। इसी मुद्दे पर उन्हें दिल्ली में अभूतपूर्व सफलता हाथ लगी थी। लेकिन, अब वे मुस्लिम वोटों पर डोरे डालने लगे हैं। वोट बैंक की सस्ती राजनीति में अब आआपा भी कूद पड़ी है। आआपा सांप्रदायिकता का कार्ड खेल रही है। 'सांप्रदायिकता भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा है।' केजरीवाल ने मुस्लिमों के बीच इंडियन इस्लामिक कल्चर सेंटर में यह बयान देकर मुस्लिमों का नया रहनुमा बनने की कोशिश की है। आआपा के चोटी के नेता प्रशांत भूषण के कश्मीर मसले पर दिए गए बयान को भी इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है। राजनीतिक बदलाव की बात करने वाली पार्टी आआपा भारतीय राजनीति के उसी मार्ग पर आगे बढ़ रही है जिस पर अन्य पार्टियों के पग चिन्ह हैं। आम आदमी पार्टी जातिवादी की राजनीति से भी अछूति नहीं है। पूर्व पत्रकार आशुतोष गुप्ता को दिल्ली में चांदनी चौक से टिकट देना, जातिवाद की राजनीति का बेहतरीन नमूना है। अरविन्द केजरीवाल को लगता है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्हें जो हाईप मिली उसे आम चुनाव में भुना लेना चाहिए। लोकप्रियता बरकरार रखने, मीडिया में छाए रहने और चर्चा का विषय बने रहने के लिए वे राजनीति के नए-नए पैंतरे चल रहे हैं। टिपीकल राजनीतिज्ञ बनने की दिशा में अरविन्द बढ़ रहे हैं। आआपा के गठन से राजनीति में भले बदलाव न दिख रहा हो लेकिन अरविन्द केजरीवाल में आमूलचूल परिवर्तन दिख रहा है। यह भी कह सकते हैं कि अरविन्द के व्यक्तित्व, सोच और विचारधारा पर पड़ा आवरण अब हट रहा है। अरविन्द केजरीवाल अपने मूल में प्रकट हो रहे हैं। अन्ना हजारे भी कहते हैं कि अरविन्द अब सत्ता लोलुप हो गया है। उसकी नजर कुर्सी पर है। कुर्सी पाने में या नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने में अरविन्द केजरीवाल कितने सफल होते हैं, जल्द ही इसका फैसला हो जाएगा। आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल की राजनीति का आकलन करते समय हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि अरविन्द केजरीवाल एण्ड टीम ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए अन्ना हजारे का जमकर इस्तेमाल किया है। केजरीवाल एण्ड टीम ने भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए आंदोलन से राजनीति में आने की अपनी राह बनाई है। आम आदमी पार्टी के जन्म से लेकर अब तक के सफर से तस्वीर कुछ साफ हो गई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई यह लड़ाई अब कम से कम भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं दिखती।