शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

कुछ तो इज्जत कर लो देश की...

भा रतीय संसद में बैठे कई लोग वाकई राजनीति के लायक नहीं हैं। उनकी हरकतें, बयानबाजी कुछ जाहिल किस्म की हैं। आचरण तो अशोभनीय है ही। गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा की ओर से संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के विरोध में कुछ सांसद और नेता बिना-विचारे किसी भी हद तक गिर रहे हैं, यह देखकर आश्चर्य है और कहीं न कहीं भारतीय जनमानस में आक्रोश भी। मोदी को अमरीका का वीजा नहीं देने की अपील करने वाली दो चिट्ठियां हाल ही में सामने आई हैं। इनके कारण भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जबर्दस्त थू-थू हुई है। क्षुब्ध भारतीय नेताओं के कारण देश का स्वाभिमान गर्त में मिला जा रहा है। चिट्ठी में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से अपील की गई है कि नरेन्द्र मोदी गुजरात दंगों के दोष से मुक्त नहीं हुए हैं। इसलिए उनको अमरीका वीजा नहीं दे, वर्तमान में मोदी के प्रति जो नीति है उसे बनाए रखा जाए। इस चिट्ठी पर १२ राजनीतिक पार्टियों के ६५ सांसदों के हस्ताक्षर हैं। इनमें कम्युनिस्ट पार्टियां, क्षेत्रीय दल और कांग्रेस तक के सांसदों के नाम शामिल हैं। इस पत्र के सूत्रधार हैं निर्दलीय सांसद मोहम्मद अदीब। अदीब की दिमाग की ही उपज थी यह डर्टी पॉलिटिक्स। हालांकि विवाद सामने आते ही ज्यादातर सांसदों ने ऐसी किसी चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया है। लेकिन अदीब इस बात पर टिके हैं कि सभी हस्ताक्षर असली हैं, लोग अब क्यूं पलट रहे हैं, यह समझ से परे है। यहां गौर करने लायक बात यह भी है कि हस्ताक्षर नहीं करने का दावा करने वाले किसी भी सांसद ने अब तक अदीब पर फर्जीवाड़े का केस दर्ज नहीं कराया है। बहरहाल हस्ताक्षर असली हों या फर्जी भारतीय राजनीति में अपरोक्ष रूप से अमरीकी हस्तक्षेप की मांग करके सांसद/सांसदों ने भारत की नाक तो कटा ही दी है। 
भारत की जनता घरेलू मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के दर्द को अच्छे से समझती है। जवाहरलाल नेहरू की गलती की सजा जम्मू-कश्मीर विवाद के रूप में हम आज तक भुगत रहे हैं। यदि नेहरू ने जम्मू-कश्मीर मामले को अंतरराष्ट्रीय पटल पर नहीं रखा होता तो संभवत: आज जम्मू-कश्मीर में कोई समस्या नहीं होती। खैर, नरेन्द्र मोदी का मसला जम्मू-कश्मीर से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है और न ही उसके समकक्ष  है। यह एकदम अलग मसला है, इसलिए दोनों की तुलना यहां नहीं करते हैं। लेकिन घरेलू मसलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना, भारतीय राजनीति में अमरीकी हस्तक्षेप की मांग करना पॉलिटिकली गलत है। नरेन्द्र मोदी को वीजा जारी करना या नहीं करना अमरीका का अंदरूनी मसला है। इसमें हमारे राजनेता को नहीं पडऩा चाहिए। हां, भारत सरकार को जरूर इस पर आपत्ति लेनी चाहिए कि अमरीका उसके एक लोकप्रिय नेता को वीजा क्यों नहीं जारी कर रहा? लेकिन जैसा कि स्पष्ट है कि यूपीए की सरकार में इतने साहसी लीडर शामिल नहीं हैं जो अपने सबसे करीबी विरोधी के पक्ष में कोई भी बात करें, चाहे बात देश के सम्मान की हो। अमरीका को मुंहतोड़ जवाब देने की हिम्मत तो हमारे नेताओं में तब भी नहीं होती जब अमरीकी एयरपोर्ट पर इन भारतीय राजपुरुषों के कपड़े उतरवा लिए जाते हैं।  
नरेन्द्र मोदी के वीजा के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से अमरीका जाकर अपील करना भी उचित नहीं है। हालांकि राजनाथ सिंह का कहना है कि वहां के कुछ लोगों ने ही उनके सामने नरेन्द्र मोदी के अमरीकी वीजा का मसला रखा था, जिस पर उन्होंने यह कहा था कि वे इस संबंध में अमरीकी सरकार से बात करेंगे। उन्होंने ओबामा के समक्ष किसी भी रूप में नरेन्द्र मोदी के वीजा मामले को नहीं उठाया है। खैर, विवाद होने के बाद किसी भी मामले से पल्ला झाड़ लेना भारतीय राजनेताओं के व्यवहार में शामिल हो गया है। 
माकपा के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी, भाकपा के एमपी अच्युतन और डीएमके के रामलिंगम ने चिट्ठी को फर्जी बताया है। सीताराम येचुरी ने तो इसे कट-पेस्ट का मामला बताया है। उनका कहना है कि उन्होंने कभी इस तरह के पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इस तरह के पत्र पर हस्ताक्षर करना उनके चरित्र और सिद्धांत के विपरीत है। उनका स्पष्ट मत है कि घरेलू मामलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना ही सरासर गलत है। उधर, चिट्ठी भेजने वाले सांसद मोहम्मद अदीब का दावा है कि पत्र पर सीताराम येचुरी के हस्ताक्षर असली हैं। अब वे मुकर रहे हैं तो मुझे ऐसे लोगों पर शर्म आती है। अदीब साहब, शर्म तो देश की आवाम को तुम पर और तुम जैसे नेताओं पर आ रही है। तुम्हारी ओछी राजनीति से देश शर्मिन्दा है, आश्चर्यचकित नहीं, क्योंकि देश अब तो आए दिन ऐसी डर्टी पॉलिटिक्स से दो-चार हो रहा है। आश्चर्यचकित तो अंतरराष्ट्रीय जगत है, जो भारत को उभरते हुए शक्ति के एक ध्रुव के रूप में देखता है। स्वाभिमानी होने की जगह भारतीय नेताओं का यह पिलपिला रूप देखकर अमरीका का प्रतिष्ठित समाचार-पत्र भी आश्चर्य से लिखता है कि किसी देश के अंदरूनी मामलों में अमरीकी राष्ट्रपति से दखल देने की मांग करना अजीब है। भारतीय सांसदों की ओर से ऐसी मांग आना तो अकल्पनीय है। बहरहाल, हमारे देश के नेताओं को इतना शऊर ही नहीं है कि वे अपनी ओछी हरकतों से देश का कितना नुकसान कराते हैं। पत्र पर किसके हस्ताक्षर असली हैं और किसके फर्जी, यह तो मोहम्मद अदीब जानते होंगे या फिर जिनके हस्ताक्षर हैं वे नेतागण। लेकिन, मामला देश के स्वाभिमान से जुड़ा है इसलिए भारतीय संसद को इस मामले पर संज्ञान लेना चाहिए। पत्र पर हस्ताक्षर फर्जी हैं तो मोहम्मद अदीब के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। यदि हस्ताक्षर असली हैं तो ६५ सांसदों से जवाब तलब किया जाए कि इस मसले को भारतीय स्तर पर उठाने की जगह अमरीकी राष्ट्रपति के दरवाजे पर क्यों ले जाया गया? वैसे ऐसे नेताओं को नसीहत तो मिलनी ही चाहिए ताकि ये अपनी न सही देश की तो कुछ तो इज्जत कर सकें। 

शनिवार, 20 जुलाई 2013

सुनहरे पन्नों का खजाना

सं वेदनाएं, सरलता और सहज भाव कहानी को हृदय में गहरे तक उतारने के लिए बेहद जरूरी हैं। कहानी सरस हो, उत्सुकता जगाती हो तो फिर वह आनंदित करेगी ही। फिर भले ही वे बाल कहानियां ही क्यों न हों। स्थापित कहानीकार गिरिजा कुलश्रेष्ठ का कहानी संग्रह 'मुझे धूप चाहिए' कुछ ऐसा ही है, बिल्कुल सरस और सुरुचिकर। मुझे धूप चाहिए में आठ कहानियां शामिल हैं। इसे प्रकाशित किया है एकलव्य प्रकाशन भोपाल ने। एकलव्य बच्चों की शिक्षा और उनके विकास को लेकर काम कर रही संस्थाओं में एक बड़ा नाम है। पुस्तक ११वीं की छात्रा सौम्या शुक्ला के बेहद खूबसूरत रेखाचित्रों से सजी हुई है। कहानी की विषय वस्तु और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सौम्या ने उम्दा चित्रांकन किया है। 'मुझे धूप चाहिए' ४२ पेज की पुस्तक है, जिसे एक बैठक में पढ़ा जा सकता है। खास बात यह है कि दो वक्त की दाल-रोटी को तरसाने वाली महंगाई के दौर में इस बेहतरीन किताब के दाम बेहद कम हैं। महज २५ रुपए।
  दुनिया की खूबसूरती रिश्तों में है और रिश्ते जरूरी नहीं, इंसान-इंसान और जीव-जीव के बीच ही बने। रिश्ते तो किसी के बीच भी पनप सकते हैं। मनुष्य-जीव-जानवर-पेड़-पौधे-सूरज-धरती आदि-आदि किसी के बीच भी। जहां प्रेम और संवेदना रूपी खाद-पानी हो, वहां तो ये बांस की तरह तेजी से बढ़ते हैं। संसार के सूत्रधार की अद्भुत और अद्वितीय कृति है मां। उसके हृदय में जितना प्रेम और करुणा भरी है, उतनी तो दुनिया के सात महासागरों में पानी भी नहीं होगा। त्याग की प्रतिमूर्ति, बच्चों के लिए तमाम कष्ट सह जाना, बच्चों की परवरिश और परवाह में जिन्दगी गुजार देना मां अपना धर्म समझती है और भले से निभाती भी है। मनुष्य जाति हो या फिर जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सबदूर मां की भूमिका समान है, उसका स्वभाव एकजैसा है, कोई भेद नहीं। गिरिजा कुलश्रेष्ठ की तीन कहानियां पूसी की वापसी, कुट्टू कहां गया और मां बड़ी खूबसूरती के साथ मां के धर्म और उसकी महानता को बयां करती हैं। इसी तरह इंतजार कहानी मां (गाय) के प्रति संतान (बछड़े) के प्रेम को बताती है। छुटपन में किसी भी बच्चे के लिए उसकी दुनिया मां ही होती है। सब उसके आसपास हों लेकिन मां दिखाई न दे तो उसका मन व्यथित रहता है। उसके लिए मां के आगे और सब गौण हैं। एक अन्य कहानी 'मीकू फंसा पिंजरे में' बाल मन की संवेदनाओं का शब्दचित्रण करती है। एक शैतान चूहे के पिंजरे में बंद होने के बाद कैसे एक छोटी-सी बच्ची का हृदय करुणा से भर जाता है। उसके हमउम्र भाई उस शैतान चूहे को कैदकर सताते हैं तो वह सुकोमल छोटी-सी बच्ची रो देती है। निरीह जीव को आजाद करने की गुहार लगाती है। 'मुझे धूप चाहिए' कहानी एक नन्हें पौधे के बड़े होने की कहानीभर नहीं है बल्कि यह एक बालक के किशोर और युवा होने की कहानी है। किसी भी क्षेत्र के स्थापित लोगों के बीच नए व्यक्ति को पैर जमाने में किस तरह की कठनाइयां आती हैं, 'मुझे धूप चाहिए' उसी बात को कहती है। सच ही तो है जैसे बड़े पेड़ों के झुरमुट में छोटे पौधे पनप नहीं पाते, कई पौधे तो अंगड़ाई लेते ही मर जाते हैं। बड़े पेड़ उन तक धूप ही नहीं पहुंचने देते। कहानी का मर्म यही है कि आपको स्थापित होना है तो जरा-से धूप के टुकड़े को पकड़ लीजिए और आगे बढ़ जाइए, बहुत से लोग विरोधकर तुम्हारा दमन करने को आतुर होंगे, बहुत से लोग निर्लज्जता से आपका उपहास उड़ाएंगे लेकिन आपको पूरे साहस और लगन से लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते जाना है। 
कथाकार गिरिजा कुलश्रेष्ठ का कहानी संग्रह 'मुझे धूप चाहिए' ऐसी पुस्तक है जो बच्चों को उनके जन्मदिन पर उपहार स्वरूप दी जानी चाहिए। पुस्तक क्या है यह बचपन की यादों के सुनहरे पन्नों का खजाना है। किशोरों, युवाओं और बड़ी उम्र के लोगों को भी ये कहानियां गुदगुदा कर, कुछ पलों में रुआंसा करके तो कई जगह रोमांचित कर बचपन की ओर खींच ले जाती हैं।

पुस्तक : मुझे धूप चाहिए
लेखिका : गिरिजा कुलश्रेष्ठ
मूल्य : २५ रुपए
प्रकाशक : ई-१०, शंकर नगर बीडीए कॉलोनी, 
शिवाजी नगर, भोपाल (मध्यप्रदेश) - ४६२०१६
फोन : ०७५५ - २५५०९७६, २६७१०१७

बुधवार, 10 जुलाई 2013

भाजपा के सेक्स लीडर

मध्यप्रदेश की राजनीति में कई बड़े सेक्स स्कैंडल हुए हैं, जिनके कारण ताकतवर नेताओं की राजनीति खत्म हो गई या उन्हें हाशिए पर जाना पड़ा और पार्टी की साख भी खराब हुई। संस्कारी नेताओं की फौज होने का दंभ भरने वाली भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों में सेक्स लीडर हैं। प्रदेश में पहला सेक्स स्कैंडल संभवत: १९६९ में चर्चा में आया था, तब कांग्रेसनीत प्रदेश सरकार में श्रम मंत्री गंगाराम तिवारी एक नर्स के साथ पाए गए थे। तब से अब तक कई नेताओं के उजले पाजामे के नाड़े खुल चुके हैं। फिलहाल तो मध्यप्रदेश की राजनीति में राघवजी सीडी काण्ड से बवंडर आया हुआ है। नौकर के साथ व्यभिचार में लिप्त राघवजी की सीडी फुल स्पीड से प्रदेश में चल रही है। मोबाइल-दर-मोबाइल राघवजी की नंगई ब्लूटूथ और व्हाट्अप से शेयर कर देखी जा रही है। नौकर ने पुलिस से शिकायत में राघवजी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसने कहा है कि राघवजी के एक अन्य कर्मचारी की पत्नी से भी १५ साल से शारीरिक संबंध हैं। राघवजी उस पर दबाव डालते थे कि उनकी खातिर वह गर्लफ्रेंड बनाए और शादी भी कर ले। आरोप और भी हैं। 
भाजपा के वयोवृद्ध नेता और प्रदेश सरकार में वित्तमंत्री राघवजी की घिनौनी हरकत पर भारतीय जनता पार्टी के चाल, चरित्र और चेहरे के सिद्धांत पर अंगुली उठाई जा रही है। ७९ वर्षीय राजनेता ने अपनी जमा पूंजी एक झटके में राजनीतिक ढलान पर चुका दी है। अपना मुंह तो काला किया ही पार्टी को भी परेशानी में डाल दिया। हालांकि राघवजी को पहले मंत्री पद से बर्खास्त करके और फिर दूसरे दिन पार्टी से निष्कासित कर भाजपा ने अपना चेहरा बचाने की कोशिश की है। इस त्वरित एक्शन से उसको अपना बचाव करने में मदद मिल रही है और आगे भी मिल सकती है। भाजपा कह सकती है पार्टी का चाल, चरित्र और चेहरा वही है जो पहले था। गलत कार्यों में लिप्त नेताओं के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि ५८ साल पार्टी की सेवा करने वाले राघवजी को घिनौने कृत्य पर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन, सवाल उठता है कि क्या पार्टी को यह कदम पहले नहीं उठा लेना चाहिए था? क्या पार्टी को अब तक राघवजी की रंगीन रातों और काले दिनों की खबर नहीं थी? दूसरे नेताओं के खाते में भी तो इस तरह के गंभीर आरोप हैं, उन्हें क्यों नहीं पार्टी से बाहर किया गया? क्या सिर्फ इसलिए कि उनकी सीडी बाहर नहीं आई है? क्या सीडी बाहर आना ही कार्रवाई के लिए जरूरी है? नेता में उच्च चारित्रिक गुणों की अपेक्षा रखने वाली भारतीय जनता पार्टी में आखिर सेक्स लीडर घुस कैसे जाते हैं? और जानकर भी क्यों पार्टी के आला नेता कार्रवाई से बचते हैं?
राघवजी के काले चेहरे को भाजपा के ही कार्यकर्ता शिवशंकर पटैरिया ने सीडी में कैद किया है। पटैरिया के मुताबिक उन्होंने राघवजी की २३ सीडी बनाई हैं। प्रदेश के अन्य नेताओं की सीडी होने का भी दावा पटैरिया ने किया है। उनका दावा है कि वे लम्बे समय से पार्टी में गंदे नेताओं की शिकायत करते रहे हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होते देख उन्होंने सीडी बनाने का फैसला किया। पटैरिया के इस दावे में सच्चाई है। प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री अरविन्द मेनन, मंत्री बाबूलाल गौर, कुंवर विजय शाह, नरोत्तम मिश्रा, अजय विश्नोई, विधायक ध्रुवनारायण सिंह जैसे कई नाम शामिल हैं, जिनके खिलाफ भाजपा में ऊपर तक चारित्रिक दोष की शिकायतें पहुंची हैं। मीडिया में आए दिन ऐसे मामलों को लेकर भाजपा के कई सेक्स लीडर सुर्खियों में रहे हैं। अरविन्द मेनन के खिलाफ जबलपुर की सुशीला मिश्रा ने शोषण के आरोप लगाए हैं। इस मामले में मानवाधिकार आयोग में भी शपथ-पत्र दायर किया गया है। लेकिन, भाजपा आरोप साबित नहीं होने के बहाने अपने संगठन मंत्री को बचाने में लगी है। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का नाम भी भाजपा की ही कार्यकर्ता शगुफ्ता कबीर के साथ जोड़ा गया। शगुफ्ता कबीर के पति ने प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाया था कि गौर उनकी गृहस्थी उजाड़ रहे हैं। इसके बाद पार्टी के अंदरखाने में काफी बवाल मचा और बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी। इतना सब होने के बाद भी उन्हें पार्टी से निष्कासित नहीं किया गया। विधानसभा में भी कांग्रेसी नेता महिलाओं के साथ गौर के आपत्तिजनक फोटो लहरा चुके हैं। आरटीआई कार्यकर्ता शहला मसूद मर्डर के बाद तो भाजपा के विधायक ध्रुवनारायण सिंह से लेकर सांसद व राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय का नाम सेक्स संबंधों में सामने आया। तरुण विजय के शहला मसूद से करीबी संबंध उजागर हुए तो शहला-ध्रुवनारायण-जाहिदा ट्रायएंगल लव के किस्से तो प्रदेशभर में नमक-मिर्च लगाकर सुने-सुनाए जाने लगे। लेकिन, राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया। जबकि गंभीर सबूत होने के बावजूद ध्रुवनारायण सिंह को पार्टी से निष्कासित न करके, दिखावे के लिए उनका प्रदेश उपाध्यक्ष का पद छीन लिया गया। कामक्रीड़ा में डूबे मंदसौर के जिलाध्यक्ष कारूलाल सोनी को जरूर बाजार में सीडी आने के कारण पार्टी से चलता कर दिया गया। ऐसे में कारूलाल सोनी और राघवजी का मामला यह स्पष्ट करता है कि जब तक सीडी बाजार में नहीं आ जाती, तब तक पार्टी खूब अय्याशी की छूट देती है। यही कारण है कि करीब एक साल पहले ही इन्हीं राघवजी की महिला के साथ सीडी बनने की चर्चा जोरों पर थी लेकिन बाजार में नहीं आने के कारण भाजपा ने कोई कार्रवाई नहीं की बल्कि मामले को दबा दिया। यदि तब ही राघवजी पर कार्रवाई हो जाती तो आज भाजपा को राघवजी के कारण लज्जित नहीं होना पड़ता। 
असल में पार्टी संगठन को सब जानकारी रहती है कि कौन सेक्स लीडर है। लेकिन, कार्रवाई करने वाले नेताओं के पाजामे के नाड़े भी उतने ही ढीले हैं। उनका नाड़ा भी किसी ने थाम रखा है, ऐसे में खुद के नंगे होने का भी डर रहता है। यही कारण है कि आला नेता भी सब हकीकत जानकर भी चुप रहते हैं। लेकिन भाजपा को खुद को कांग्रेस या कांग्रेस से भी गया बीता होने से बचाना है तो कठोर नियम बनाने होंगे। औरों से अलग दिखने की धारणा को साबित करने के लिए गंदगी तो रोकनी ही होगी। नेता-कार्यकर्ता के खिलाफ शुरुआती शिकायतों की पार्टी स्तर पर ही जांच करा लेनी चाहिए। शिकायतें सही पाए जाने पर तालाब गंदा हो, कमल मुरझाए उससे पहले ही सड़ी मछली को बाहर फेंक देना चाहिए। इसका असर यह होगा कि बीमार मानसिकता और नैतिक रूप से पतित नेता भाजपा में आने की सोच ही नहीं सकेंगे क्योंकि उन्हें ध्यान रहेगा कि भाजपा औरों से अलग है। यहां गंदे काम पर राजनीतिक करियर किसी भी मोड़ पर चौपट होने में देर नहीं लगेगी। राघवजी प्रकरण से भाजपा को सबक लेना चाहिए कि नेता का जनाधार, लोकप्रियता, सीट जिताऊ क्षमता और धन की नदी बहाने की काबिलियत के आधार पर कार्रवाई में पक्षपात न हो, देर न हो, इसकी भी पार्टी स्तर पर चर्चा की जाने की जरूरत है। नेता कोई भी हो कठोर नियम पूरी कठोरता से लागू किया जाए। 
गंदगी कहां से आ रही है : समस्या सिर्फ राजनीति की ही नहीं है। आम समाज भी सेक्स और पैसे के पीछे अंधे घोड़े की तरह भाग रहा है। उसी समाज के बीच से नेता चुनकर राजनीति में आ रहे हैं। हालांकि राजनीति में प्रवेश के समय सभी नेता सात्विक, चारित्रिक और सेवाभावी छवि का मुखौटा लगाए रहते हैं लेकिन सत्ता पाते ही औकात पर आ जाते हैं। चूंकि राजनेता मीडिया की निगाहों में रहते हैं इसलिए उनके सेक्स शौक के चर्चे आम आदमी की तुलना में बेहद चर्चित हो जाते हैं। यूं भी राजनेताओं से आम नागरिक की तरह व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जाती है। असल में समाज के नेता की भूमिका में बने रहने के लिए तपस्वी जीवन जरूरी है। लोकतांत्रिक राजनीति के विकास और विस्तार के लिए भी चरित्रवान लोगों का होना बुनियादी शर्त है। चूंकि भाजपा से जनमानस की अधिक अपेक्षाएं हैं, समाज भाजपा को भारतीय मूल्यों के प्रतिनिधि के रूप में देखता है, भाजपा की छवि राष्ट्रवादी पार्टी की है, ऐसे में भाजपा के बड़े लीडरान को इस मसले पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। 

बुधवार, 19 जून 2013

महारथी की शह पर ही घोड़े ने छोड़ा रथ

 हा ल के दिनों में भारतीय राजनीति में भारी उथल-पुथल, नए अध्याय, नए समीकरण और कई विघटन देखे गए। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग/एनडीए) का टूटना 2014 के आम चुनाव के नजरिए से काफी अहम माना जा रहा है। राजग का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी करती है। भाजपा की 17 साल पुरानी सहयोगी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड)/जदयू गठबंधन से अलग हो गई है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जदयू के अलग होने से राजग कमजोर हो गया है। कांग्रेस को इसका फायदा मिल सकता है। तीसरे मोर्चे को ऑक्सीजन मिलने की उम्मीद है। चर्चा में यह भी है कि भाजपा और जदयू को अलग-अलग राहें चुनने से क्या मिलेगा? 2014 में गद्दी। नफा या नुकसान। मजबूती या कमजोरी। 
            जदयू ने जैसे ही एनडीए से अलग होने की घोषणा की तो इंदप्रस्थ (दिल्ली) से पाटलीपुत्र (पटना) तक दोनों ही पार्टियों के कार्यालयों में ढोल (फटे) बजाए गए। आतिशबाजी हुई। लड्डू भी बांटे गए। यानी दोनों खुश हैं। बेहद खुश हैं। मानो लोकसभा के चुनाव ही जीत लिया हो। इस जश्न को मनाने में दोनों पार्टियों ने इतना वक्त क्यों लिया? जाहिर तौर पर तो राजग परिवार में इस 'ब्रेकअप पार्टी' के कारण हैं गुजरात के शक्तिशाली मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनको भाजपा के गोवा अधिवेशन में और ताकत मिलना। हमें यह भी नहीं भूलना होगा कि मोदी को लोकसभा के चुनाव तक प्रचार की कमान मिलते ही गोवा से दिल्ली तक कैसा भूचाल आया था, कहीं यह भूचाल दिल्ली वाया बिहार तो नहीं पहुंचा? संभव है कि भाजपा के महारथी के इशारे पर काफी दिन से किनारे पर बैठे नीतीश कुमार नदी में कूद गए। राजनीति है, इसमें किसी भी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। खासकर, तब जबकि पार्टी विद डिफरेंस का तमगा लेकर घूमने वाली भाजपा में लोगों की महत्वाकांक्षाएं पार्टी और सिद्धांत से ऊपर हो गई हों। तमाम प्रयास और हथकंडों के बाद भी आडवाणी जब नरेन्द्र मोदी को पीछे नहीं धकेल सके तो संभव है उन्होंने मोदी पर दबाव बनाने के लिए यह खेल रचा हो। जदयू के राजग छोडऩे के बाद सबसे पहले नाराजगी जाहिर करने वाले नेता लालकृष्ण आडवाणी ही हैं। बाकीके भाजपा नेताओं ने तो इसे सकारात्मक नजरिए से लेना शुरू कर दिया है। आखिर अब नरेन्द्र मोदी के नाम पर राजग में रोज की चिल्ला-तौबा तो खत्म होगी।
         राजग-जदयू तलाक को समझने के लिए मोदी प्रकरण से जुड़े सभी पहलुओं को टटोलना जरूरी है। क्योंकि जदयू के महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नरेन्द्र मोदी की 'कट्टर' छवि से कोई समस्या नहीं है। वे तो दंगों के तुरंत बाद ही नरेन्द्र मोदी के समर्थन में थे और कई मौकों पर उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना भी जता चुके हैं। उन्हें अपनी सेक्यूलर छवि चमकानी होती तो तब ही राजग से अलग हो लिए होते, जब नरेन्द्र मोदी को सब दंगों का दोषी बता रहे थे। लेकिन, तब उन्हें बिहार में लालू से लोहा लेना था और प्रदेश की सत्ता हासिल करनी थी। ताकत बटोरनी थी। उनके मन में प्रधानमंत्री बनने की लालसा ने भी जन्म नहीं लिया था। अब स्थितियां उलट गईं हैं। नीतीश कुमार की राजनीति जम गई है। उन्होंने ताकत भी इतनी बटोर ली है कि जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव भी उनके खिलाफ नहीं जा सकते। जार्ज फर्नाडीज की भी उन्हें अब कोई फिक्र  नहीं हैं, जिन्होंने अटल-आडवाणी के साथ इस गठबंधन की नींव रखी थी। जदयू पर अब पूरी तरह नीतीश कुमार का कब्जा हो गया है। ऊपर से प्रधानमंत्री बनने का सपना भी पाल लिया है। राजग में रहते तो यह संभव नहीं था। तीसरे मोर्चे के रूप में उन्हें कुछ संभावना नजर आई है। लेकिन, तीसरे मोर्चे में शामिल होने के लिए जिन पार्टियों के नाम सामने आ रहे हैं, उनकी विचारधारा आपस में कतई मेल नहीं खाती। पिछले ढाई दशक के उदाहरण सामने है जो जाहिर तौर पर स्पष्ट करते हैं कि जब विचार समान न हों तो किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक साथ मिलकर नहीं चला जा सकता। भारतीय राजनीति में यूपीए और राजग गठबंधन इसके सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं। राजग तो पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी के सक्रिय राजनीति से दूर होने के बाद लगातार टूट ही रहा है। 
          राजनीति में कई घटनाक्रम बड़ी सीख देने वाले होते हैं। लेकिन, अहंकार और स्वार्थ की पट्टी आंखों पर चढ़ाए राजपुरुष कभी सीख नहीं लेते वरन एक और नजीर बन जाते हैं। भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी का बड़ा दबदबा कायम था। वे पार्टी की सींचने वाले वरिष्ठ नेता हैं। लेकिन, प्रधानमंत्री बनने की उनकी आकांक्षा ने मेनका बनकर वर्षों की तपस्या भंग कर दी। इसके बाद पार्टी के तमाम पदों से इस्तीफा देकर रही-सही इज्जत और गंवा दी। इस घटनाक्रम का नुकसान लम्बे समय तक पार्टी को उठाना पड़ेगा। कुछ इसी तरह जदयू की किरकिरी कराने पर नीतीश कुमार आमादा हैं। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव अच्छे से जानते हैं कि राजग या कहें भाजपा से अलग होना निश्चित तौर पर घाटे का सौदा है। लेकिन, अब उनके हाथ में बहुत कुछ नहीं है। यही कारण है कि वे चाहकर भी इस विघटन को रोक नहीं सके। भले ही जदयू ने अलग रास्ता अख्तियार कर लिया हो लेकिन बिहार की राजनीति उसके अकेले के बस की बात नहीं हैं। नीतीश कुमार डबल होकर भी लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान से अधिक मुस्लिम परस्त नहीं हो सकते। अभी हाल ही में आए नतीजे भी साफ जाहिर करते हैं कि लालू प्रसाद यादव फिर से ताकत हासिल कर रहे हैं। भाजपा और जदयू के अलग होने से कम से कम बिहार की राजनीतिक तस्वीर तो धुंधली हो गई है। भविष्य में सत्ता किसके हाथ लगेगी कहा नहीं जा सकता। बिहार में पहली बार भाजपा 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। भाजपा निश्चित ही यह प्रचारित करने से नहीं चूकेगी कि उनके पास दूसरी पंक्ति के ज्यादातर बड़े नेता ओबीसी से ताल्लुक रखते हैं, यहां तक कि प्रधानमंत्री पद के संभावित प्रबल दावेदार नरेंद्र मोदी भी गुजरात की पिछड़ी जाति से आते हैं। भाजपा के पाले में पिछड़े वर्ग का वोट बैंक नरेन्द्र मोदी के नाम पर और बढ़ सकता है। अपने परंपरागत वोट बैंक के साथ अगर भाजपा को ओबीसी वोट मिलता है तो बिहार में उसका और मजबूत होना तय माना जा रहा है। अगर यह तस्वीर बनी तो जदयू यानी नीतीश कुमार के हाथ में सिर्फ कूची रह जाएगी, रंग कहीं ओर सज रहे होंगे। वहीं 2014 के आमचुनाव में नरेन्द्र मोदी अपनी दम पर 230 से अधिक सीट एनडीए को दिलाने में कामयाब हो जाते हैं तो राष्ट्रीय राजनीति से भी जयदू यानी नीतीश कुमार का पत्ता साफ होना तय है। ऐसी स्थिति में जदयू वापस राजग में आकर भी अप्रासंगिक रहेगी। राजनीतिक संकेत बताते हैं कि इस बार नरेन्द्र मोदी एनडीए को 200 से अधिक सीट दिलाने में कामयाब रहेंगे। नीतीश का विकल्प भी मोदी ने ढूंढ़ लिया है। जाहिर तौर पर मोदी को जयललिता का समर्थन है। ऐसे में भाजपा को जदयू का राजग से जाना बहुत हद तक अखरेगा नहीं। कसक रहेगी तो शरद यादव के मन में। वैसे भी बड़े पेड़ से टहनी टूटती है तो अमूमन टहनी ही सूखती है पेड़ तो हरा-भरा रहता है। 
      आगे की तस्वीर - भाजपा के राष्ट्रीय फलक पर मोदी के सक्रिय होने के बाद जल्द ही एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अब तक एकला चलो की राह अपनाने वाले धुरंधर हिंदूवादी नेता और अर्थशास्त्री सुब्रह्मण्यम स्वामी मिशन- 2014 में भाजपा के लिए अहम रणनीतिकार के रूप में सामने आ सकते हैं। दक्षिण में भाजपा के लिए सहयोगी जोडऩे के लिए वे 1998 में भी गठबंधन को मजबूत करने में अपनी योग्यता दिखा चुके हैं। 

शुक्रवार, 10 मई 2013

कांग्रेस ने चलायी भारत में भ्रष्टाचार की रेल

 कां ग्रेसनीत यूपीए सरकार का कार्यकाल देखकर यह तो नहीं लगता कि इस सरकार के पास देश चलाने की जिम्मेदारी थी। जिस तरह बीते पांच साल में घोटालों की बाढ़ आई है उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि यूपीए की सरकार हजारों हाथ से देश को लूट रही है। मंत्री से सरकारी पद तक सब
नीलाम हो रहे हैं, बस खरीददार की जेब में दाम हो। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले ने बताया कि सरकार में मनचाहा मंत्रालय किस तरह बिकता है और अब रेल मंत्री पवन बंसल के भांजे विजय सिंगला ने संवैधानिक पद की भी दलाली खाकर बता दिया कि कांग्रेस के राज में सब बिकाऊ है। मामा-भांजे की जोड़ी ने महेश कुमार को वेस्टर्न रेलवे जीएम से रेलवे बोर्ड का सदस्य बनाने के लिए १० करोड़ की रिश्वत ली। सीबीआई ने भांजे को रंगेहाथ पकड़ा। बेशर्मी की हद है कि प्रधानमंत्री सहित पूरी कांग्रेस रेलमंत्री पवन बंसल के बचाव में आ खड़ी हुई। इसके लिए बेजोड़ तर्क दिया गया कि मंत्री जी का इसमें क्या दोष है, यह तो उनके रिश्तेदार की करतूत है। एक साधारण-सा आदमी भी इतना सहज ज्ञान रखता है कि पवन बंसल की शह के बिना भांजा विजय सिंगला इतना बड़ा कारनामा नहीं कर सकता था। अलबत्ता सीबीआई की रिपोर्ट भी पवन बंसल को इस रिश्वत काण्ड में लिप्त मानती है। कांग्रेस की बेशर्मी पर यहीं लगाम नहीं लगता, विपक्ष यानी भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस्तीफा मांगने पर कांग्रेस के प्रवक्ता कहते हैं कि भाजपा को तो इस्तीफा मांगने की बीमारी हो गई है। यूं तो विपक्ष अपने धर्म का निर्वहन कर रहा था। फिर भी मान लिया कि भाजपा को इस्तीफा मांगने की बीमारी हो गई। लेकिन, क्या कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता बता सकते हैं कि आए दिन प्रधानमंत्री और मंत्रियों के इस्तीफे मांगने का मौका भाजपा को कौन दे रहा है? क्या यह सच नहीं कि हर माह औसत एक बड़ा भ्रष्टाचार इन पांच सालों में सामने आया है। हालात ये हैं कि प्रधानमंत्री को भी ऐसी सरकार से शर्मिंदा होकर खुद ही इस्तीफा दे देना चाहिए। भांजे के रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद भी पवन बंसल मंत्री पद से इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। एक जमाना था जब रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री हुआ करते थे, उन्होंने एक रेल दुर्घटना पर ही इस्तीफा दे दिया था। क्योंकि उन्हें अपनी नैतिक जिम्मेदारी का भान था। कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के किसी भी मंत्री यहां तक कि सौम्यता और ईमानदारी का लबादा ओढ़े प्रधानमंत्री से भी इस स्तर की नैतिकता, शुचिता की राजनीति की अपेक्षा नहीं की जा सकती। जिस सरकार का ध्येय ही भ्रष्टाचार हो गया हो, उससे आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। कांग्रेस का हाथ भी अब गरीब के साथ नहीं बल्कि गरीब के गिरेबां पर है और भ्रष्टाचारियों के साथ है। जरा अतीत पर नजर डाली जाए तो स्पष्ट होता है कि आज भ्रष्टाचार की जो विशाल इमारत खड़ी दिख रही है, उसकी नींव कांग्रेस ने अपने पहले ही शासन काल में रख दी थी।
भारत में भ्रष्टाचार की पौध आजादी की तुरंत बाद ही कांग्रेस ने रोप दी थी। अनेक वीर स्वतंत्रता सेनानियों के प्राणों की आहुति देकर सन् १९४७ में भारत ने अंग्रेजों के चंगुल से शासन व्यवस्था छीनी। लेकिन, तत्कालीन कर्णधारों ने सुराज देने की जगह कुराज के बीज बो दिए। आजादी के बाद कांग्रेस के शासनकाल में ही भ्रष्टाचार का बीज अंकुरित हुआ बल्कि शनै-शनै बढ़ता भी गया। अलग-अलग समय सत्ता में रही कांग्रेस ने उस भ्रष्टाचार के पौधे को खूब खाद-पानी दिया, उसका खयाल रखा। आज वही पौधा विशाल वट वृक्ष बन गया है। उसके इस प्रिय पौधे पर जब भी कोई अंगुली उठाता है कांग्रेस उसकी खूब खिंचाई करती है। बाबा रामदेव ने वर्षों से विदेश में जमा होते आ रहे कालेधन की मांग की तो कांग्रेसनीत यूपीए सरकार उन पर डण्डा लेकर पिल पड़ी। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन करके रात में सो रही महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों पर आंसूगैस के गोले छोड़े गए। अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार का गला घोंटा गया। बाद में इस बर्बर घटना में घायल एक महिला ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था। जो कुछ समय पहले तक बाबा रामदेव के आश्रम में जाकर उनका आशीर्वाद लेते थे वे बाबा को ठग कहते नहीं थक रहे। वहीं कांग्रेस ने बाबा रामदेव के तमाम ट्रस्टों पर जांच बैठा दी। 
अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मजबूत लोकपाल की आवाज बुलंद की तो कांग्रेस ने उन्हें घेरना शुरू कर दिया। कांग्रेस के नेता अन्ना हजारे के साथ बदतमीज पर उतर आए। उनका चरित्रहनन करने के लिए अमर्यादित भाषा का जमकर इस्तेमाल किया गया। जिस आदमी के पास अपना खुद का घर नहीं उसे बेईमान ठहराने में पीछे नहीं रहे कांग्रेसी। अन्ना के दामन पर कीचड़ उछालते समय कांग्रेस भूल गई कि उसी ने अन्ना की ईमानदार और समाजसेवी छवि के लिए उन्हें पदम् विभूषण पद से सम्मानित किया था। किरण बेदी जैसी ईमानदार महिला को भी कांग्रेस ने निशाना बनाना शुरू कर दिया। दरअसल, कांग्रेस भ्रष्टाचार को रोकना ही नहीं चाहती। वह ऐसा चाहेगी भी क्यों? उसने तो आजादी के बाद ६४ वर्षों में भ्रष्टाचार को पनपने का अवसर दिया है, संरक्षण दिया है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) की १८३ देशों की सूची में भारत भ्रष्टाचार के मामले में ९५वें नंबर पर है। अगर कोई पानीदार सरकार होती तो भ्रष्टाचार के मामले में देश की यह रैंकिंग देखकर चुल्लूभर पानी में डूब मरती। स्विटजरलैण्ड बैंकिंग एसोसिएशन की रिपोर्ट भी कहती है कि स्विस बैंकों में जमा धन के मामले में भारत सबसे आगे है। यानी विदेशों भारत का कालाधन सबसे अधिक है। कालाधन भ्रष्टाचार से ही बनाया है। आजादी के बाद से लेकर अब तक भारत में करीब ९१ सौ खरब के घोटाले प्रकाश में आ चुके हैं और अभी भी नए-नए घोटालों का जन्म तेजी से होता जा रहा है।  
आजाद भारत का पहला ज्ञात घोटाला सन् १९४७ में हुआ था। सन् १९४८-४९ में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में जीप घोटाले को उनके चहेते वीके कृष्णा मेनन ने अंजाम दिया। वीके कृष्णा मेनन उस समय लंदन में भारत के हाई कमिश्नर थे। १९४८ में ही पाकिस्तान ने हमला कर दिया था। भारतीय सेना को जीपों की जरूरत आन पड़ी। जीप खरीदने की जिम्मेदारी जवाहरलाल नेहरू ने मेनन को सौंपी। मेनन ने विवादास्पद कंपनी से जरूरी औपचारिकताएं पूरी किए बिना २००० जीप खरीदने का सौदा कर लिया। इसके लिए उन्होंने कंपनी को एक लाख ७२ हजार पाउंड की राशि (८० लाख रुपए, उस समय) का भुुगतान भी कर दिया। ब्रिटेन से १५५ जीप की एक ही खेप पहुंची सकी थी। कृष्णा मेनन की करतूत से पर्दा उठ गया। १५५ जीप में से एक भी चलने की स्थिति में नहीं थी। उस समय नाममात्र के विपक्ष की मांग पर दिखाने के लिए एक जांच कमेटी बनाई गई। लेकिन, दोषी मेनन पर कार्रवाई तो दूर बल्कि उनका प्रमोशन कर दिया गया। १९५६ में वीके कृष्णा मेनन कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। यहीं से भ्रष्टाचार को बल मिला। अगर कांग्रेस वाकई देश को सुशासन देना चाहती थी तो उसी समय जीप घोटाले के दोषी वीके कृष्णा मेनन पर कड़ी कार्रवाई कर देती तो शायद आज भारत में भ्रष्टाचार की यह स्थिति नहीं होती। कांग्रेस और उसके वरिष्ठ नेता इसी एक घोटाले पर नहीं रुके। कांग्रेस के नेताओं में होड़-सी लग गई घोटाले करने की। जीप घोटाले को दो साल भी नहीं बीत पाए थे कि साइकिल घोटाला १९५१ में सामने आ गया। यह भ्रष्टाचार की यह काली सूची दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती गई। अब तो घोटालों में रकम का आंकड़ा करोड़ो-अरबों में पहुंच गया है। लाख रुपए के घोटाले को घोटाला ही नहीं माना जाता। सलमान खुर्शीद पर जब विकलांगों के उपयोग की सामग्री वितरण में कुछ लाख के घोटाले का आरोप लगा था तो कांग्रेस के प्रवक्ता यह कहते हुए पाए गए कि इस कदर मंत्री की औकात कम मत करो, भला मंत्री भी लाख का घोटाला करेगा क्या? यह राशि करोड़ में होती तो ही विश्वास किया जा सकता था। कांग्रेस को अपनी बची-खुची छवि बचानी है तो तत्काल भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे मंत्रियों को बर्खास्त कर देना चाहिए। वरना, यूं ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की बातों का क्या है, बातें तो सब करते हैं।

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

ऊंचे शिखरों पर रोमांच का सफर


 क ठिनाइयां आपको अंदर से मजबूत करती हैं। अचानक से आईं मुसीबतें आपको फटाफट निर्णय लेने का अनुभव देती हैं। अनजाने रास्ते और लंबे सफर आपके लिए नई राहें खोलते हैं। यह सब करने के लिए बस थोड़े-से साहस की जरूरत होती है।  उठाइए साइकिल और निकल जाइए, ऐसे रास्तों पर जहां जाने के लिए आपका जी मचल रहा हो। जिंदगी को ठाट से जीने के लिए साइकिलिंग से अच्छा विकल्प नहीं है। यह कहना है रोमांच के साथी युवा देवेन्द्र तिवारी का। मध्यप्रदेश के जिले ग्वालियर में कृषक परिवार में जन्मे देवेन्द्र तिवारी देश के कई दुर्गम क्षेत्रों को साइकिलिंग से जीत चुके हैं।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

मोदी, मोदी और मोदी


 भा रत की राजनीति इस समय मोदीमय है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी के जिक्र के बिना शायद ही कोई दिन बीतता हो। इसे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजरें जमाए नरेन्द्र मोदी की कुशल रणनीति कह सकते हैं। मोदीफोबिया से ग्रस्त कांग्रेस के नेता यहां तक कि राहुल गांधी भी
आए दिन मोदी का जिक्र कर ही देते हैं। भाजपा में वटवृक्ष बनते जा रहे नरेन्द्र मोदी से पार्टी के क्षत्रपों में भी भय है। उन्हें डर है कि 'मोदी बरगद' की छांव में वे मुरझा न जाएं। इसीलिए मैं प्रधानमंत्री-मैं प्रधानमंत्री का राग अलाप कर पार्टी के नेता मोदी बहस शुरू कर देते हैं। हाल के घटनाक्रम देखकर स्पष्ट होता है कि राजनीति के नए चाणक्य नरेन्द्र मोदी का ही कमाल है कि वे एक दिन भी खबरों से परे नहीं जाते। दिल्ली में फिक्की के महिला सम्मेलन को संबोधित करना हो या फिर कोलकाता में उद्योगपतियों के कार्यक्रम में भाषण देना हो, इस तरह के तमाम आयोजन और बहस को मोदी की रणनीति के ही एक हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
नरेन्द्र मोदी मंच लूटने में माहिर हैं। उनकी लोकप्रियता फिलहाल सिर चढ़कर बोल रही है। इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी का भाषण सुनने के लिए भीड़ इतनी अधिक थी कि फिक्की के महिला सम्मेलन का स्थान बदलकर एक पांच सितारा होटल करना पड़ा। फेसबुक और ट्विटर पर मोदी के भाषण के कुछ हिस्से बड़ी तेजी के साथ शेयर हुए और उतनी ही तेजी से उन पर कंमेट आए। मोदी ने फिक्की के महिला सम्मेलन में महिला सशक्तिकरण की बात बड़े जोरदार ढंग से रखकर महिलाओं का भरोसा भी जीत लिया। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या, बढ़ते लिंगानुपात की निंदा की। लड़कियों को समान अवसर उपलब्ध कराने की वकालत की। महिला उद्यमियों की तारीफ की और उन्हें सरकार की ओर से अधिक मदद उपलब्ध कराने की बात कही। फिक्की में महिलाओं से मुखातिब होने के मौके को नरेन्द्र मोदी ने खूब कैश कराया। इस बहाने उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि यदि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनकी सरकार महिला हितैषी होगी। महिला सशक्तिकरण की नीतियां नए सिरे से तय की जाएंगी। इसके लिए नीति निर्माण की प्रक्रिया में महिलाओं को शामिल किया जाएगा। ५० प्रतिशत महिला आरक्षण बिल का जिक्र कर नरेन्द्र मोदी ने सरकार में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने का भी संकेत दिया।
फिक्की में दिए भाषण पर बहस खत्म हो पाती उससे पहले ही नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस और मीडिया को एक और मसला पकड़ा दिया। कोलकाता में तीन बड़े व्यापारिक संगठनों भारत चेम्बर ऑफ कॉमर्स, इंडियन चेम्बर ऑफ कॉमर्स और मर्चेंट चेम्बर ऑफ कॉमर्स की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मोदी ने सीधे यूपीए पर हमला बोला और ममता बनर्जी को रिझाने के लिए वामपंथियों को भी लपेटे में ले लिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के किए गड्ढे मैं गुजरात में भर रहा हूं तो बंगाल में ३२ साल में वामपंथियों ने जो गड्ढे किए हैं उन्हें भरने का काम ममता बनर्जी कर रही हैं। राजग के विस्तार की योजना निश्चित ही मोदी के दिमाग में है। जयललिता से उनकी अच्छी बनती है। ममता जरूर नैनो प्रकरण के बाद से मोदी से नाराज हैं। लेकिन, ममता दीदी की पटरी कांग्रेस के साथ भी नहीं बैठ रही है। वे राजग में पहले भी शामिल रह चुकी हैं। इसीलिए मोदी ममता का पक्ष लेकर प्रधानमंत्री पद के लिए अपना पक्ष मजबूत करने की कोशिश में हैं। आखिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी विकल्प तो उन्हें ही ढूंढऩा है जो राजग में नीतिश की जगह ले सके। क्योंकि ज्यादा संभावना है कि मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए घोषणा होते ही नीतीश कुमार राजग से अलग हो जाएंगे। 
नरेन्द्र मोदी ने कोलकाता के अपने इस भाषण में सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया। मोदी ने कहा कि कांग्रेस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोई अपना नेता ही नहीं मानता। यह तकरीबन सच भी है, जिससे पूरा हिंदोस्तान वाकिफ है। यह बयान देने के पीछे मोदी के गहरे निहितार्थ हैं, जिन्हें समझना जरूरी है। उन्होंने संकेत दिया है कि देश को कैसा नेता चाहिए रबर स्टम्प या फिर जिसका जनाधार हो यानी नरेन्द्र मोदी। मनमोहन सिंह के बहाने नरेन्द्र मोदी ने अप्रत्यक्ष रूप से एक फ्रेम आमजन को दी है कि आप ही फिट करके देखिए कि प्रधानमंत्री कुर्सी पर कौन जमेगा? 
अब नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी देखा जाए तो नरेन्द्र मोदी कहीं आगे दिखते हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़े गए चुनावों में कांग्रेस को कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी है जबकि नरेन्द्र मोदी अपनी दम पर तीसरी बार गुजरात में सरकार बनाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खम ठोंक रहे हैं। राहुल गांधी राष्ट्रीय बहस और संवेदनशील मुद्दों के दौरान राष्ट्रीय पटल से गायब रहते हैं जबकि मोदी हमेशा चर्चा में रहते हैं। हाल ही में राहुल गांधी का सीआईआई में दिया गया भाषण काफी सराहा गया लेकिन उतनी ही उसकी आलोचना भी हुई। ठीक यही स्थिति कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में दिए भाषण की रही। जिसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं को नई दिशा देने की जगह भावुक भाषण दिया। यहां तक की उन्होंने राजनीति को जहर का प्याला ही बता दिया। खैर, राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के सामने कहीं नहीं टिकते उसके कारण हैं। राहुल गांधी अपने भाषण में देश की समस्याएं तो बखूबी उठाते हैं लेकिन उनके पास समाधान नहीं है। उनके भाषण से सवाल तो बहुत उपजते हैं लेकिन जवाब राहुल गांधी के पास नहीं है। सीआईआई में दिए भाषण में राहुल कहते हैं कि भारत के सामने कई समस्याएं हैं। इन समस्याओं का समाधान जरूरी है। लेकिन, समाधान कैसे होगा? यह राहुल नहीं बता पाते हैं। राहुल कहते हैं कि युवाओं को सस्ती और बेहतर शिक्षा देने की जरूरत है। हकीकत यह है कि उनकी ही सरकार के दौरान शिक्षा महंगी होती जा रही है। हाल ही में केन्द्रीय विद्यालयों की फीस में भी बढ़ोतरी की गई है। निजी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय की मनमर्जी तो जग जाहिर है। शिक्षा सस्ती और सर्व सुलभ कैसे होगी? इसकी नीति राहुल गांधी नहीं बता सके। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार चंद लोग चला रहे हैं। सरकार चलाने के लिए आमजनता की भागीदारी की जरूरत है। सरकार में सबको कैसे, कहां और किस स्तर तक भागीदार बनाया जाएगा, इसका भी जवाब राहुल गांधी अपने भाषण में नहीं देते हैं। जबकि नरेन्द्र मोदी समाधान पर बात करते हैं। उनके पास हर सवाल का जवाब है। हाल ही में नरेन्द्र मोदी ने इंडिया टुडे कॉनक्लेव में शिरकत की थी। तब उनसे वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने पूछा था कि आप गुजरात दंगे के सवालों से बचते क्यों हैं? मोदी ने जवाब में कहा था कि मैं किसी भी सवाल से न तो डरता हूं और न ही बचता हूं। यदि मैं डरता तो यहां दिग्गज पत्रकारों के बीच नहीं आता। इस दौरान मोदी ने पूछे गए तमाम सवालों के जवाब तर्क के साथ रखकर अपना विजन देश के सामने रखा। विदेश नीति कैसी हो, देश के विकास की योजना क्या हो, एफडीआई को लागू किया जाए तो कैसे, भ्रष्टाचार दूर करने की योजना और सुरक्षा के मसले पर बेबाकी से अपना पक्ष रखा। इंडिया टुडे के एडिटर इन चीफ अरुण पुरी ने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से जुड़ा एक सवाल किया। जिसके जवाब में उन्होंने बड़ा सधा हुआ जवाब दिया, जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि सुरक्षा तो हर किसी को चाहिए, क्या मुस्लिम और क्या हिन्दू। इसलिए मेरी नीति है कि हर आदमी को उसके अधिकार और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए। कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि एक रणनीति के तहत आगे बढ़ रहे नरेन्द्र मोदी कॉनक्लेव, ऑनलाइन भाषण, छात्रों, फिक्की और उद्योगपतियों के आयोजनों में शिरकत कर अपना विजन देश के सामने रखते जा रहे हैं। बहस-मुहाबिस के बीच नमो बता रहे हैं कि वे देश के प्रधानमंत्री बने तो देश की तस्वीर क्या होगी?