शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

अब लेनिन के बुत भी बर्दाश्त नहीं

 क भी रूस की ताकत का प्रतीक रहे कम्युनिस्ट लीडर ब्लादिमिर लेनिन की प्रतिमाएं भी लोग बर्दाश्त नहीं कर रहे हैं। हाल ही में मंगोलिया की राजधानी उलान बटोर में क्रेन की मदद से ब्रॉन्ज से बनी लेनिन की विशालकाय प्रतिमा हटा दी गई। लेनिन को मंगोलिया में (दुनियाभर में भी) दमन और हत्याओं का कारण माना जाता है। २०वीं शताब्दी में मंगोलिया कम्युनिस्ट शासन के तहत रहा। इस दौरान लेनिन ने मंगोलिया का भारी दमन और शोषण किया। लेनिन के बाद सोवियत तानाशाह जोसेफ स्टालिन के शासन में भी यहां के लोगों का जमकर उत्पीडऩ किया गया। मंगोलिया जाति ने शोषण के प्रतीक (लेनिन) का अपने देश की गलियों और चौराहों से सफाया कर दिया। यूं तो मंगोल जाति भी खूंखार मानी जाती रही है। इसका इतिहास भी रक्तरंजित है। लेकिन, यह शुभ संकेत है कि इस देश ने अन्य देशों को भी गर्व से खड़े होने की प्रेरणा दी है। गुलामी और शोषण के प्रतीकों को उखाड़ फेंकने का संदेश दिया है। यह देखने की बात है कि इस राह पर कौन-कौन बढ़ता है।
     मंगोल साम्राज्य की स्थापना १२०६ में क्रूर और अधर्मी लुटेरे चंगेज खान ने की थी। मंगोल को ही अरबी में मुगल कहते हैं। चंगेज खान के वंशजों ने भारतवासियों पर बहुत अत्याचार किए थे। स्वयं को दूसरा चंगेज खान मानने वाला तैमूर लंग एक तरह से राक्षस था। उसने दुनिया को लूटने की चाह में लाखों लोगों की हत्या की। तैमूर भारत लूटने भी आया था, तब उसने दिल्ली को सुल्तान विहीन कर दिया था। चंगेज खान और तैमूर लंग का वंशज ही था बाबर। आक्रांता बाबर भी अपने दादा-नानाओं की तरह वहशी था। उसने भारत की अस्मिता पर वार किया। बाबर के आदेश पर भारत के जन-जन के मन में बसने वाले राम का मंदिर ध्वस्त कर दिया गया। मंदिर की नींव पर ही मस्जिद बना दी गई। जिसे बाद में बाबरी मस्जिद के नाम से जाना गया। इस कलंक को धोने का प्रयास कुछ राष्ट्रभक्तों ने किया तो बवंडर खड़ा हो गया जो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। खैर बात मंगोलिया की करते हैं। मंगोलिया खानाबदोशों ने यहां-वहां से आकर बसाया था। जिसे विधिवत रूप से साम्राज्य का रूप खूंखार और बर्बर चंगेज खान ने दिया था। बाद के वर्षों में मंगोलिया इस्लामिक राष्ट्र हो गया। बौद्ध धर्म भी मंगोलिया तक पहुंचा। फिलहाल मंगोलिया में बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या अधिक है। मंगोलिया में वामपंथियों के शासनकाल में सन् १९२४ के आसपास करीब ३० हजार बौद्धों को कत्ल कर दिया गया था। इस तरह की कत्लोगारत के लिए कम्युनिज्म जाना जाता है। रूस में स्टालिन, रूमानिया में चासेस्क्यू, पोलैंड में जारू जेलोस्की, हंगरी में ग्रांज, पूर्वी जर्मनी में होनेकर, चेकोस्लोवाकिया में ह्यूसांक, बुल्गारिया में जिकोव और चीन में माओ-त्से-तुंग जैसे अधिनायकवादों ने भारी नरसंहार कर आतंक का राज किया। कम्युनिज्म का आर्विभाव १९१७ में रूस की बोल्शेविक क्रांति के साथ हुआ। लेकिन, कम्युनिज्म के प्रति लोगों का आकर्षण इसी शताब्दी में खत्म हो गया। रूस में ही १९९१ में व्यापक भ्रष्टाचार और देशव्यापी भुखमरी के बीच कम्युनिज्म ने दम तोड़ दिया। रूस में कम्युनिज्म के पैरोकारों की क्या स्थिति वहां की जनता ने की होगी उसे इस बात से समझें। कम्युनिस्ट शासन ने तंग हो चुकी जनता ने रूस में लेनिन और स्टालिन के शवों को भी बुरी तरह पीटा था। बाद में यहां लेनिनग्राद का नाम पुन: सेंट पीटर्सबर्ग और स्टालिनग्राद का नाम वोल्गोग्राद कर दिया था। कम्युनिस्टों के कारनामों से काले पृष्ठों का ही नतीजा है कि मंगोलियन भी अपने देश से एक-एक कर शोषण की निशानियां मिटा गर्वोन्मुक्त महसूस कर रहे हैं। जिस समय मंगोलिया की राजधानी उलान बटोर में लेनिन की विशालकाय प्रतिमा हटाई जा रही थी तब सडक़ों पर उत्साहित नौजवानों और वृद्धों की भीड़ जमा थी। सब जुट आए थे कंलक को मिटता देखने के लिए। 
      हिन्दू संस्कृति का मंगोलिया पर खासा असर देखने को मिलता है। यही कारण रहा कि समय के साथ यहां के बर्बर लोग सभ्य होते दिखे। भारतीय संस्कृति के प्रभाव में आने के बाद यहां सांस्कृतिक परिवर्तन देखे गए। मंगोलिया में भारत की तरह दोनों हाथ जोडक़र अभिवादन करने की परंपरा थी। यहां धार्मिक कृत्य एवं पूजा गंगाजल के बिना पूरी नहीं होती थी। यहां संस्कृत सहित अन्य भारतीय भाषाओं में ग्रंथ रचे गए और यहां के लोक-काव्य में रामायण की कथाएं प्रचलित हैं। इतना ही नहीं बैकल झील के चारों ओर विद्या के अनेक केन्द्र थे। जहां देवी सरस्वती के अनेक चित्र और मूर्तियां थीं। मंगोलिया ने सभ्य होने के भारत से बहुत कुछ सीखा तो भारत को मंगोलिया से अब सीख लेनी चाहिए। जिस तरह गर्व से मंगोलिया ने शोषण के प्रतिकों को उखाड़ा है भारत को भी अपने देश से गुलामी के प्रतीक चिह्नों को हटा देना चाहिए। चाहे वो किसी मुस्लिम आक्रांता के नाम पर भारत की धरती पर अब तक स्थापित हो या ब्रिटिश शासन काल की निशानियां हों। आक्रांताओं और अत्याचारियों के बुत उखाड़ फेंक दिए जाएं, उनके नाम से बने शहर, सडक़, गली और मोहल्लों के नाम बदल दिए जाएं। तभी युवा भारत गर्व की सांस ले सकेगा।

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

कठिन है ‘शब्द साधना’ की राह

lokendra singh/लोकेन्द्र
  अ पने ब्लॉग पर मैंने आखिरी पोस्ट (बड़ों के लिए किस्से बचपन के) २४ सितंबर को प्रकाशित की थी। तब से लेकर अब तक भारी व्यस्तता का दौर रहा। इस बीच पढऩे-लिखने का क्रम ही टूट गया। शिखा वाष्र्णेय की पुस्तक ‘स्मृतियों में रूस’ को रोज लालायित होकर देखता हूं लेकिन पढ़ नहीं पा रहा हूं। कारण एक ही है भारी व्यस्तता। १६ अक्टूबर को बालक पांच माह का हो गया। अपने नन्हें राजकुमार को भी समय देने में असमर्थ हूं। कल तो श्रीमती जी ने ताना मार ही दिया- तुम्हारे पास तो परिवार के लिए समय ही नहीं है। अपुन सुनकर रह गए। और कर भी क्या सकते थे। खैर, आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा कौन-सा मील चला रहा था? हमारे इधर कहावत है- मील चलाना। जो मनुष्य यह कहता हुआ पाया जाता है कि मेरे पास समय नहीं है। दूसरे मनुष्य उसे पलटकर यही कहावत सुना देते हैं- तुम कौन-सा मील चला रहे, जो तुम्हारे पास दो मिनट का भी समय नहीं है। कुछ नहीं दोस्तो अभी-अभी संस्थान बदला है। राजस्थान पत्रिका को विदा कह कर नईदुनिया (जागरण ग्रुप) आया हूं। नया माहौल, नया सिस्टम, थोड़ा सहज होने में समय तो लगता ही है। फिर अपुन तो महाआलसी राम हैं। जरा-सा बदलाव, थोड़ा देर से सोना, बहुत देर से उठना। समय कब निकल जाता है अपुन को पता ही नहीं चलता।
           खैर, अभी तक की कहानी शीषर्क से मेल नहीं खा रही न? चलो यू टर्न लेते हैं। गपशप छोडक़र मुद्दे की बात पर आते हैं। दरअसल, भारी व्यस्तता का एक और कारण है, जिसकी चर्चा मैं आप लोगों से करना चाहता हूं। इन दिनों में अपने पहले काव्य संग्रह के प्रकाशन को लेकर इधर-उधर हाथ-पैर मारने में लगा हूं। संग्रह तैयार है लेकिन प्रकाशक नहीं मिल रहा। मिले भी तो क्यों? अपुन कोई देश-विदेश में ख्याति अर्जित कवि हैं नहीं। अपुन कोई बेस्टसेलर बुक राइटर भी नहीं? साहित्य का कोई सामंत भी अपना मुंह बोला ताऊ नहीं। अपनी कविताओं से विवाद भी नहीं फैलने वाला। ‘लोकेन्द्र जी हम कविताएं नहीं छापते’। कई प्रकाशकों का यह जवाब सुनकर तो माथे पर चिंता की और लकीरें और बढ़ गईं। एक तो आटा कम था वह भी गीला हो गया। दोस्तो, इस भागम-भाग भरे डेढ़ माह में एक विद्वान ने अपुन को उम्मीद की लौ दिखाई कि लगे रहो बेटा जब तक सांस है, कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा। हारकर बैठ गए तो कुछ नहीं होना। उन्होंने यह मंत्र मुझे सीधे नहीं दिया। यह तो उन्होंने साहित्य जगत की बिडम्वना को लेकर कहा था। 
          हुआ यूं कि मैं गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की पुस्तकों के लोकार्पण कार्यक्रम में पहुंचा। कार्यक्रम में मंच पर देश के बड़े साहित्यकार जगदीश जी तोमर और दिवाकर विद्यालंकार जी विराजमान थे। विद्यालंकार जी ने अपने उद्बोधन में गिरिजा जी की पुस्तकों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसके बाद उन्होंने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में दो तरह की साधना होती है। एक तो भाव साधना और दूसरी शब्द साधना। भाव साधना पहली साधना है। शब्द साधना अगली सीढ़ी है। भाव साधना में साहित्यकार कितना भी पारंगत हो जाए लेकिन उसकी साधना तब तक अधूरी है जब तक शब्द साधना पूरी न हो जाए। शब्द साधना का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि शब्द साधना का मोटा-मोटा अर्थ है भावों का प्रकाशित हो जाना। किसी साहित्यकार की कृति प्रकाशित होने में बड़ा श्रम लगता है। हिन्दी साहित्य में प्रकाशक या तो स्थापित नामों को ही छाप रहे हैं या फिर जो उन्हें धन देता है उसे छाप देते हैं। अर्थात् भाव साधना से भी अधिक परिश्रम और महत्व की साधना है शब्द साधना। लेखक और कवि की बात समाज में जन-जन तक पहुंचे उसके लिए शब्द साधना बहुत जरूरी है। विद्यालंकार जी ने आगे कहा कि निराश होकर रचनाकार कभी-कभी सोचता है कि उसकी कृति स्तरीय नहीं है। यह सोचकर वह उसे किसी संदूक या किसी कोने में छुपा देता है। ऐसा करके वह भावों की हत्या करता है। अशुद्धियों और त्रुटियों के डर से साहित्य रचना को प्रकाशित नहीं कराना गलत कदम है। सबकी रचनाओं में कमियां रह जाती हैं, जिन्हें समालोचना, आलोचना और समीक्षा के बाद दूर किया जाता है।
            मित्रो उनके इस उद्बोधन ने अपने पिचकते फेंफड़ों में हवा भर दी। कार्यक्रम में ही जोश आ गया। मन ही मन तय किया कि अब और जोर-शोर से अपने काव्य संग्रह के प्रकाशन की तैयारी की जाएगी। शब्द साधना की कठिन डगर पर चल निकला हूं, देखते हैं कब पूरी होती है।
चलते-चलते : आप लोग भी बहुत दुष्ट हो। जरा ब्लॉग से दूर क्या हुआ? आप लोगों ने तो आना ही बंद कर दिया। दुष्टई की हद होती है, हाल-चाल तक नहीं पूछा मेरा। चलो छोड़ो अब आते रहिएगा। आभासी दुनिया के रिश्तों में भी थोड़ी संवेदनशीलता बनी रहनी चाहिए, वरना दुश्मनों के आरोपों को सच होते देर नहीं लगती।

सोमवार, 24 सितंबर 2012

बड़ों के लिए किस्से बचपन के

 गि रिजा कुलश्रेष्ठ का पहला कहानी संकलन है 'अपनी खिड़की से'। भले ही यह उनका पहला कहानी संग्रह है लेकिन उनकी लेखनी की धमक पहले से मौजूद है साहित्यकारों के बीच। हाल ही में अपने स्थापना के तीन सौ साल पूरे करने वाली बाल जगत की पत्रिका 'चकमक' में उनकी कहानियां प्रकाशित होती रही हैं। झरोका, पाठक मंच बुलेटिन  और सोशल मीडिया भी उनकी रचनाओं को लोगों तक पहुंचा चुका है। 'अपनी खिड़की से' में १५ बाल कहानियां हैं। हालांकि परंपरागत नजरिए से ये बाल कहानियां हैं लेकिन मेरे भीतर का मन इन्हें सिर्फ बाल कहानियां मानने को तैयार नहीं। इन १५ कहानियों का जो मर्म है, आत्मा है, संदेश है वह न सिर्फ बच्चों के लिए आवश्यक है बल्कि उनसे कहीं अधिक जरूरी बड़ों के लिए है। भाग-दौड़ के जीवन में अक्सर हमारा मन इतना थक जाता है कि हम अपने बच्चों की आवाज भी नहीं सुन पाते, उनकी संवेदनाओं को महसूस करना तो दूर की बात है। ऐसे में गिरिजा कुलश्रेष्ठ की कहानियां हमें ये सोचने पर मजबूर करती हैं कि अनजाने में ही सही कहीं हम अपने लाड़ले के बचपन के साथ नाइंसाफी तो नहीं कर रहे। हालांकि 'अपनी खिड़की से' की कहानियां खुलेतौर पर बड़ों को उनकी गलतियां नहीं बतातीं लेकिन कहानियों का मर्म यही है। ये कहानियां गुदगुदाती हैं, जिज्ञासा जगाती हैं, चाव बढ़ाती हैं, मुस्कान लाती हैं और हौले से जीवन की अनमोल सीख दे जाती हैं।
     संग्रह का शीर्षक पहली कहानी के शीर्षक से लिया गया है। पहली कहानी में साधारण परिवार का बालक वचन अपने घर की खिड़की से पड़ोस में रहने वाले अमीर परिवार के बालक नीलू की गतिविधियां देखकर अपना मन उदास करता रहता है। नीलू के कितने मजे हैं। उसके पास कितने खिलौने हैं। इकलौता होने के कारण मम्मी-पापा के प्रेम पर भी अकेले का अधिकार। लेकिन, जिस दिन वह मौका पाकर नीलू के घर उसके साथ खेलने जाता है और वहां उसकी जिंदगी से बावस्ता होता है तब उसे पता चलता है कि मजे तो नीलू के नहीं उसके हैं। उसके मां-पिता कहीं भी जाते हैं तो सब भाई-बहनों को लेकर जाते हैं। वह जी भरकर साइकिल चला सकता है। कपड़े मैले होने का डर नहीं, वह मैदान में खेल सकता है। लेकिन नीलू की मां तो कितनी रोक-टोक करती है। चुपके से यह कहानी बड़ों को भी समझाइश देती है कि बच्चों के मन को समझो और उन्हें तितली की तरह आजाद रहने दो। तमाम तरह की बंदिशों में बचपन को बांधकर उन पर जुल्म न किया जाए। बच्चों को महंगे खिलौनों से अधिक अपनों का स्नेह चाहिए होता है। इसलिए दुनियादारी के बीच से अपने मासूमों के लिए थोड़ा-सा वक्त तो निकाला जाए। दूसरी कहानी 'पतंग' बड़ी महत्वपूर्ण है। माता-पिता कई बार जबरन और कुतर्क के साथ अपने विचार अपने बच्चों पर थोप देते हैं। बच्चे की खुशी जाए भाड़ में। माता-पिता की यही गलतियां कई बार उन्हें और बच्चों को असहज स्थितियों में लाकर खड़ा कर देती हैं। अब इसी कहानी के पात्र सूरज को लीजिए, वह ईमानदार, सच बोलने वाला और माता-पिता का आज्ञाकारी बालक है। उसके पिता का मत है कि पतंग उड़ाने वाले लड़कों का भविष्य निन्यानवे प्रतिशत खराब है। वे सबके सामने यदाकदा घोषणा भी करते रहते हैं कि हमारा बेटा सूरज कभी पतंग नहीं उड़ाएगा। उसे तो एक अच्छा विद्यार्थी बनना है। अब भला पतंग न उड़ाने और अच्छे विद्यार्थी बनने का क्या विज्ञान है? सूरज का मन तो पतंगों के रंगीन ख्वाब सजाता है। एक दिन पतंग उड़कर खुद ही उसके करीब आ जाती है। अब वह पिता के डर से उसे छिपाता है, झूठ भी बोलता है, इस चक्कर में वह गिरकर चोटिल भी हो जाता है। हालांकि अंत में पिता को पता चल जाता है और बेटे की खुशी को भी वो समझ लेते हैं। 'रद्दी का सामान, इज्जत वाली बात, मां, बॉल की वापसी और आंगन में नीम' बेहद रोचक कहानियां हैं। ये बड़ों और छोटों के मनोविज्ञान को उकेरती हैं। बड़ों और छोटों के बीच किन बातों को लेकर उठापटक, खटपट और अनबन रहती है और इन्हें कैसे दूर करके दोनों एक-दूसरे के नजदीक आ सकते हैं, दोस्त बन सकते हैं, इन कहानियों में बेहद खूबसूरती से इसका शब्द चित्रण किया गया है।
    'कोयल बोली' निश्चित ही आपको भावुक कर देगी। आपको आपका छुटपन और छुटपन के खास दोस्त की याद दिला देगी। 'बिल्लू का बस्ता' स्कूल के शुरुआती वर्षों की यादों का पिटारा खोल देगा। स्कूल जाने की कैसी-कैसी शर्तें होती थी। मां-पिता भी कितने प्रलोभन देते थे स्कूल भेजने के लिए। हमारे बस्ते में किताबें कम खिलौने ज्यादा मिला करते थे। विद्या के नाम पर किताबों में किसी पक्षी के रंगीन पंख और पौधे की पत्तियां। कंचे, डिब्बे-डिब्बियां, किताबों से काटे गए कार्टून और फूल के चित्र न जाने क्या-क्या। उस वक्त तो यही हमारे लिए कुबेर का खजाना होता था। सबसे छिपाकर रखना पड़ता था अपना खजाना।
    'सूराख वाला गुब्बारा' और 'बादल कहां गया' बड़ी मजेदार कहानियां हैं। सूराख वाला गुब्बारा का आशय चंद्रमा से है। यह धरती, सूरज और चंद्रमा के संबंध में है। मनुष्य की गलतियों की वजह से 'बादल का अपहरण' हो गया है। हवा बालक बादल को अपने साथ ले गई है। उसने फिरौती के रूप में मांगे हैं पेड़, पौधे, जंगल और बगीचे। बादल चाहिए तो हमें धरती को हरी साड़ी से सुशोभित करना पड़ेगा। प्रकृति के संवद्र्धन का संदेश देती कहानी है यह।
    तो मित्रो गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने अपने पहले ही कहानी संग्रह में हमें एक भरी-पूरी फुलवारी सौंपी है। जिसके १५ पुष्पों से उठती तरह-तरह की भीनी खुशबू बेहतरीन है। लेखिका प्रस्तावना में उम्मीद व्यक्त करती हैं उनकी ये बाल-कहानियां बाल पाठकों में ही नहीं वरन् प्रबुद्ध पाठकों के बीच में भी अपना स्थान बनाएंगी। मेरा मत है कि कहानियां प्रबुद्ध पाठकों द्वारा निश्चित ही सराही जाएंगी। अपने मकान की 'अपनी खिड़की से' देखेंगे तो कहीं न कहीं ये कहानियां हमें अपने आस-पास ही बिखरी नजर आएंगी।
दो शब्द अलग से : संग्रह में 'अपराजिता' का एक ही अंश प्रकाशित हो सका है। पूरी कहानी होती तो अपना प्रभाव ठीक से छोड़ पाती। कई बार अंश कथा के मर्म को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर पाते। 'तनु को रोना क्यों आ गया' इस सवाल का जवाब तो मुझे नहीं सूझा। संभवत: कहानी का संदेश कहीं फंस-सा गया। एक और छोटी-सी खामी दिखी। संग्रह में कहीं-कहीं वर्तनी की मामूली-सी त्रुटियां भी दिखीं। हालांकि इन्हें मैं प्रकाशक की जिम्मेदारी ही मानता हूं। एक और सूचना - गिरिजा जी का एक खंडकाव्य 'ध्रुव गाथा' प्रकाशित होकर आ गया है. आप गिरिजा जी को यहाँ (ये मेरा जहाँ ) पढ़ सकते हैं.

रविवार, 16 सितंबर 2012

ज्ञान है तो जहान हैं

 कौ न बनेगा करोड़पति का छठवां सीजन शुरू हो गया है। तीसरे ही एपिसोड में जम्मू कश्मीर के मनोज कुमार करोड़पति भी बन गए हैं। अमिताभ बच्चन ने केबीसी को और केबीसी ने अमिताभ बच्चन को, दोनों ने एक-दूसरे को नई ऊंचाई पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस बार केबीसी की टैग लाइन लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है। साथ ही एक सकारात्मक संदेश भी दे रही है। 'आपका ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है' वाकई हॉट सीट पर बैठे व्यक्ति को तो उसका ज्ञान ही रुपया जितवा सकता है। हमारे बड़े-बुजुर्ग भी कहते हैं- 'पढ़-लिख लो बेटा ज्ञान ही तुम्हारे काम आएगा। जमीन, मकान और दुकान सब बंट जाएगा लेकिन बुद्धि का बंटबारा नहीं होता। वह निजी संपत्ति है। सब कुछ छीना जा सकता है, लूटा जा सकता है, हड़पा जा सकता है लेकिन बुद्धि नहीं। बुद्धि के बल पर फिर से सब हासिल किया जा सकता है। ज्ञान है तो जहान है यानी ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है।' हालांकि यह एक अलग बात है कि केबीसी में हॉट सीट तक पहुंचने के लिए कहीं न कहीं किस्मत कनेक्शन की जरूरत होती है। अब मुझे ही लीजिए इस सीजन में मैंने करीब ५०० रुपए के मैसेज भेजे और हां सभी सही जवाब। लेकिन, हॉट सीट तक पहुंचना तो दूर एक बार पलट कर फोन भी नहीं आया। खैर, छोडि़ए अपनी बात में क्या रखा, कुछ बच्चन साहब की बात की जाए और कुछ केबीसी की।
    'आपका ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है' टैग लाइन का विचार कहां से आया? इस सवाल का जवाब है - सुशील कुमार। याद आया बिहार, मोतीहारी के सुशील कुमार, जिन्होंने पिछले सीजन में पांच करोड़ रुपए की रकम जीती थी। केबीसी के अब तक के इतिहास में इतनी बड़ी रकम कोई नहीं जीत सका। लेकिन, मोतीहारी के एक साधारण शिक्षक ने अपने ज्ञान के बूते पर यह कामयाबी हासिल करके दिखाई। अमिताभ बच्चन मीडिया को बताते हैं कि सुशील कुमार के उदाहरण से ही शो को थीम मिली। यह शो महज एक गेम शो नहीं है बल्कि इसके माध्यम से कहीं न कहीं अमिताभ या कहें शो निर्माता कंपनी सामाजिक मुद्दे भी उठाने की कोशिश करते हैं। बहरहाल, केबीसी-६ के अलग-अलग विज्ञापन कई संदेश देते दिखे। बेटा-बेटी में अंतर न किया जाए। खासकर सबको पढऩे के समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं। समाज में अकसर देखने को मिलता है कि लोग सोचते हैं बेटी को पढ़ाने से पैसा जाया हो रहा है क्योंकि कल तो यह ससुराल चली जाएगी। स्त्री इस देश की आधी शक्ति है, उसे उसका अधिकार मिलना ही चाहिए। एक और महत्वपूर्ण विज्ञापन है जो हिन्दी के महत्व को उजागर करता है। विज्ञापन साफ संदेश देता है कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होना ही श्रेष्ठता की पहचान नहीं है। एक भारतीय हिन्दी में कहीं अधिक सहजता से ज्ञार्नाजन करता है। ज्ञान किसी भाषा के बंधन में नहीं बंधा। शिक्षा की राष्ट्रीय परिचर्या-२००५ की रूपरेखा में भी इस बात को स्वीकारा गया है कि अपनी भाषा में इंसान बेहतर सीख सकता है। इसलिए हिन्दी को हीनभावना से देखने वाले निरे मूर्ख हैं। हिन्दुस्तान की बिन्दी है हिन्दी। इस बिन्दी पर हमें नाज होना चाहिए। भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां विदेशी भाषा को देशी भाषा से अधिक मान सरकारी स्तर पर दिया गया है। अध्ययन-अध्यापन, व्यापार, संवाद और लेखन अंग्रेजी में होता है। जबकि चीन, जापान, इजराइल और ब्रिटेन सहित दुनियाभर के तमाम देशों में वहीं की मूल भाषा में शिक्षा, संवाद से लेकर व्यापार तक होता है। कई बार देशभर में अमिताभ बच्चन की आलोचना होती है कि बच्चन ने देश और समाज को क्या दिया है? बाकी तो मुझे ज्ञात नहीं लेकिन बच्चन ने हिन्दी की बड़ी सेवा की है। शायद ही कोई बॉलीवुड सितारा होगा जो पर्दे के बाहर शुद्ध हिन्दी में बात करता हो। केबीसी के जितने भी सीजन बच्चन ने होस्ट किए हैं सबमें उनकी हिन्दी ने लोगों को खासा आकर्षित किया है।
     हिन्दी सिनेमा की १५० से अधिक फिल्मों अभिनय कर चुके अमिताभ बच्चन ११ अक्टूबर को ७० वर्ष को हो जाएंगे। इसके अगले दिन ही केबीसी-६ का १६वां एपिसोड होगा। निश्चित ही यह एपिसोड खास होगा। अमिताभ बच्चन को इस सदी का महानायक कहा जाता है। उनके होनेभर से केबीसी सफलता के शिखर चूम लेता है। केबीसी और बिग बी एक-दूसरे के पर्याय हो गए हैं। अमिताभ केबीसी को होस्ट करने के लिए काफी मेहनत भी करते हैं। केबीसी ही है जिसने लगभग कंगाल हो चुके अमिताभ बच्चन को भी करोड़पति बनाया बल्कि बच्चन की एक नई पारी को शुरुआत दी। और वह अमिताभ बच्चन ही हैं जो केबीसी की सफलता की अनिवार्य शर्त हैं। सभी जानते हैं एक बार शाहरूख खान भी गेम शो होस्ट कर चुके हैं जो बुरी तरह फ्लोप हुआ था। उम्मीद है कि कौन बनेगा करोड़पति-६ सफलता के नए प्रतिमान स्थापित करेगा। हॉट सीट तक पहुंचने वाले के ज्ञान का हक अदा करेगा।

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

इश्क के सिक्के

Lokendra singh
सुनहरा समय सरक गया हाथों से
हम बाहर हो गए उसके ख्वाबों से।

निकले थे सफर पर वो हाथ थामकर
मृग मरीचिका ने भटका दिया राहों से।

जिसके दिल-ओ-दिमाग में थे हरदम
अब हम निकल गए उनकी यादों से।

यादों के ठूंठ रह गए जिन्दगी में
महकते सब फूल टूट गए बागों से।

साथ देने की कसम ली थी मुझसे
आज वो ही मुकर गए अपने वादों से।

पहुंच न सकूं उसके आंगन तक
पैरों के निशां मिटाते चले वो राहों से।

ठन-ठन गोपाल रह गए जिन्दगी के मेले में
इश्क के सिक्के सब टपक गए फटी जेबों से।
- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)



बुधवार, 29 अगस्त 2012

कठपुतलियों के हाथ में है देश

लोकेन्द्र सिंह/भारतवाणी
 दे श का वर्तमान परिदृश्य देखकर लगता नहीं हम आजाद हैं। आजादी के ६६वें सालगिरह पर मनाई पार्टी का भी खुमार नहीं चढ़ा। देश में लूट मची है। सरकार के मंत्री भ्रष्टाचार करके भी साफ मुकर रहे हैं। जबकि सब बेईमानी की कीचड़ में सिर तक सने हैं। अब तो कथित ईमानदार प्रधानमंत्री का झक सफेद कुर्ता भी कोयले से काला हो गया है। निर्लज्जता देखिए यूपीए के मंत्रियों की- वे कैग को ही गरिया रहे हैं, झुठला रहे हैं। विपक्ष और जनता सवाल उठा रही है लेकिन यूपीए-२ सरकार कंबल ओढ़ कर घी पी रही है। इतना ही नहीं एक और गंभीर दृश्य है देश के बुरे हाल का। देश बंधक है वंशवाद की राजनीति का। देश को कठपुतलियां चला रहीं है। जनता की पीड़ा पर प्रधानमंत्री चुप है। राष्ट्रपति सरकार की बोली बोल रहे हैं। गजब देखिए संसद का संचालन भी अध्यक्ष के विवेक से नहीं वरन किसी के इशारे से हो रहा है। इशारे कहां से हो रहे हैं? कौन कर रहा है? किसे नहीं पता! सबको पता है।
    भारतीय संसद के इतिहास की पुस्तक में काले पन्नों पर दर्ज होने वाला प्रकरण है राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन और केन्द्रीय मंत्री राजीव शुक्ला की कानाफूसी। वह तो शुक्र है कांग्रेस और यूपीए सुप्रीमो ने सबके दिमाग अपने पास गिरवी रख रखे हैं। वरना राजीव शुक्ला उपसभापति के कान में फुसफुसाने से पहले माइक बंद करना नहीं भूलते। उपसभापति के माइक ने राज्यसभा में उपस्थित सांसदों और राज्यसभा टीवी ने देश की आवाम को दिखा-सुना दिया कि राजीव शुक्ला ने पीजे कुरियन से कहा - कोयला घोटाले पर हंगामा थमेगा नहीं, आप कार्रवाई दिनभर के लिए स्थगित कर देना। इस पर कुरियन बोलते हैं - जी अच्छा। इसके बाद उपसभापति ने एकाएक सदन की कार्रवाई को स्थगित कर दिया। जबकि सदन का संचालन निष्पक्ष रूप से किया जाना चाहिए था। सभापति किसी न किसी पार्टी से जरूर होता है लेकिन वह पार्टी लाइन से ऊपर होता है। उस समय वह एक तरह से पंच परमेश्वर की कुर्सी पर बैठा होता है। पंच तो सबका होता है और किसी का नहीं। सदन में सभापति सर्वोच्च होता है। भारतीय संसदीय व्यवस्था में सभापति की महती भूमिका है। उनकी जिम्मेदारी है कि सदन का सफलता से संचालन हो ताकि जनता के करोड़ों रुपए हंगामे की भेंट न चढ़े। सदन की कार्रवाई से देशहित में कुछ न कुछ निकल कर आए। सदन का संचालन सभापति को स्वविवेक के आधार पर करना होता है किसी की इच्छानुसार नहीं। खैर, इस कानाफूसी काण्ड से पीजे कुरियन 'कु'नजीर बन गए। लोग वर्षों-बरस याद करेंगे कि एक थे कुरियन जो खाली दिमाग थे। सदन का संचालन सरकार के मंत्री के इशारे पर करते थे। एक क्षण रुकिए, क्योंकि यहां साफ कर दूं कि पीजे कुरियन को यह ज्ञान भी मिस्टर शुक्ला ने स्वविवेक से नहीं दिया। बल्कि इसके पीछे सौ फीसदी कांग्रेस सुप्रीमो के निर्देश होंगे।
    इधर, देश के प्रधानमंत्री की नाक के नीचे लगातार घोटाले हो रहे हैं और अब भी वे ईमानदारी का लबादा ओढ़े घूम रहे हैं। बोल तो उतना ही रहे हैं जितना उनको निर्देश है। देश में शायद ही कभी इतना लाचार, बेबस और कमजोर प्रधानमंत्री रहा होगा। भविष्य में भी शायद ही ऐसा कोई आए। बड़ी लज्जाजनक स्थिति है कि अब भारत के प्रधानमंत्री चुटकुलों का केन्द्रीय पात्र हो गए हैं। वर्ष २००४ में सेन्ट्रल हॉल से लेकर अब तक प्रधानमंत्री ने इतनी बेइज्जती सहन की है कि उनकी सहनशीलता का लोहा मानना पड़ेगा। असली लौहपुरुष हैं हमारे प्रधानमंत्री। सबको याद होगा सेन्ट्रल हॉल का नाटक। सोनिया गांधी 'त्याग' की मूर्ति बनी थी। सारे कांग्रेसी टसुए बहा रहे थे, साष्टांग दंडवत थे। वे सोनिया के अलावा किसी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना नहीं चाहते थे। मनमोहन सिंह के पक्ष में एक भी संसद सदस्य नहीं था। मैडम ने पूरा होमवर्क करके प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह का नाम प्रस्तावित किया था। उन्हें मालूम था कि 'मिस्टर क्लीन' उनके आदेशों का अक्षरश: पालन करेंगे। साथ ही भ्रष्टाचार में ढाल का भी काम करेंगे। प्रधानमंत्री ने अपनी उपयोगिता समय-समय पर प्रदर्शित की। यूपीए-२ में हजारों करोड़ रुपए की लूट कथित ईमानदार पीएम की छवि के पीछे होने दी। मनमोहन सिंह सशक्त प्रधानमंत्री नहीं है इस बात का वे खुद प्रमाण देते हैं। जनता और विपक्ष ने जब भी प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगा, मनमोहन चुप्पी साध गए। कांग्रेस एकजुट होकर उनके बचाव में आ जाते हैं। माफ कीजिएगा, उनके नहीं ये सब अपने बचाव में एकजुट होते हैं क्योंकि इन्हें उनकी आड़ लेकर देश को और लूटना था। इसमें एक गजब की बात देखिए - जनता और विपक्ष के मांगने पर इस्तीफा नहीं देने वाले प्रधानमंत्री युवराज के लिए कुर्सी छोडऩे को दिन-रात तैयार रहते हैं। सार्वजनिक मंचों से इस बात को कह भी चुके हैं। जलालत झेलने को तैयार लेकिन चलेंगे रिमोट से ही, ऐसे हैं हमारे पीएम ऑफ इंडिया। यही हाल गृहमंत्री और वित्तमंत्री सहित अन्य के हैं।
    राष्ट्रपति देश का प्रथम और सर्वोच्च पद है। पद की गरिमा बहुत है। लेकिन, कांग्रेस ने अपने शासन काल में जिस तरह राज्यपाल व्यवस्था को तार-तार किया है, ठीक उसी तरह राष्ट्रपति पद की साख को भी नुकसान पहुंचाया है। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का चयन हो या फिर वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का। नि:संदेह प्रणव मुखर्जी एक कद्दावर और साफ छवि के नेता हैं। देश के सर्वोच्च पद के दावेदार भी। उनकी लोक ताकत को देखते ही कांग्रेस सुप्रीमो ने उन्हें कभी प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। हालांकि उनका भी मैडम ने विपरीत परिस्थितियों में जमकर उपयोग किया। प्रणव बाबू भी अनजाने में ही सही गांधी-नेहरू वंश की गोद में खेलते रहे। युवराज के सिंहासनरूढ़ होने का रास्ता साफ हो सके इसके लिए एक सुनियोजित षड्यंत्र रचा गया। यूपीए-२ के सशक्त नेता को उपकृत करके पंगु करने का षड्यंत्र। प्रणव बाबू को देश का प्रथम नागरिक बनवा दिया गया। हांलाकि इसमें कांग्रेस सुप्रीमों के पसीने जरूर छूट गए। सरकार ने पैकेज नहीं बांटे होते तो सहयोगियों ने सुप्रीमो का खेल बिगाडऩे का पूरा इंतजाम कर रखा था। सुप्रीमो के लिए प्रणव बाबू को राष्ट्रपति भवन पहुंचाना जरूरी था इसलिए पैकेज के दम पर थोक में वोट खरीदे गए। नतीजा ६६वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति भी सरकार के मंत्रियों की बोली बोलते नजर आए। यानी राष्ट्रपति के भेष में यूपीए का एक मंत्री। राष्ट्रपति ने कहा कि जन आंदोलनों से लोकतंत्र को खतरा है। सब जानते हैं कि खतरा किसको है, लोकतंत्र को, कांग्रेसनीत यूपीए सरकार को, कांग्रेस को या फिर वंशवाद की राजनीति को। इतिहास तो गवाही देता है कि जन आंदोलनों ने लोकतंत्र को मजबूत किया है, कमजोर नहीं। जन आंदोलनों ही देश की आजादी की राह सुगम की थी। हाल ही में विश्व पटल पर अन्य देशों में भी जन आंदोलनों से लोकतंत्र की बहाली हुई है। फिर क्यों देश के राष्ट्रपति जनता का मनोबल गिरा रहे थे। दरअसल, प्रणव बाबू की आवाज में कांग्रेस की मनस्थिति थी। उनका यह भाषण कांग्रेस सुप्रीमो के प्रति धन्यवाद था। 
    भारत की वर्तमान सरकार की आस्था जनता में न होकर किसी विशेष परिवार में हैं। ये सरकार तानाशाह भी है। घोटाले दर घोटाले उजागर हो रहे हैं। महंगाई बढ़ रही है। विकास दर घट रही है। देश में कानून व्यवस्था नाम की चीज नहीं। देश में अलगाव की आग सुलग रही है। अवैध घुसपैठियों की भरमार हो गई है। बांग्लादेशी घुसपैठियों के पक्षधर गृहयुद्ध जैसी स्थितियां बना रहे हैं। लेकिन, सरकार की चमड़ी की मोटाई और चिकनाहट बढ़ रही है। वह हर बार अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़कर आवाम की आंख में धूल झौंकने का काम कर रही है। जनता ने बड़ी उम्मीद से अपने नेता को संसद में चुनकर भेजा था। ताकि देश के सर्वोच्च सदन में नेता उनकी बात रख सकेगा। लेकिन, सब उम्मीदें ध्वस्त। वह तो दिल्ली में १० जनपथ की चाकरी करता दिख रहा है। कांग्रेस सुप्रीमों की अंगुलियों पर ता-ता थैय्या कर रहा है। जनता ने भी अब मन बना लिया है- २०१४ में देश कठपुतलियों को नहीं सौंपना।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

लोकजीवन के लिए 'समरसता के सूत्र'

 स मरसता के सूत्र पुस्तक की प्रस्तावना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कुप्.सी. सुदर्शन ने लिखी है। इसके अलावा इस पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर दिए गए उनके भाषण को भी पुस्तक में शामिल किया गया है। श्री सुदर्शन लिखते हैं कि विश्व में हिन्दू चिंतन सबसे विशिष्ट और अनोखा है जो विश्व के अन्य किसी समाज के पास नहीं है। यह विश्व बंधुत्व की भावना का विकास करता है। इसमें चर-अचर सबके कल्याण की बात कही गई है। विदेशियों के हमले, समय के चक्र और कुरीतियों के बीच हिन्दू समाज में कुछ बुराइयां घर कर गईं। इनमें सर्वाधिक कष्ट इस बात का है कि जाति के आधार पर हिन्दू और हिन्दू के बीच भेदभाव एवं अस्पृश्यता घुसपैठ हो गई। समय के साथ यह बुराई विकराल हो गई। हिन्दू समाज को इन सब से मुक्त कर समरस, सजग, सचेत, सबल, समद्ध और स्वावलंबी समाज बनाने के कलए स्वामी विवेकानन्द, वीर सावरकर, ऋषि अरविन्द, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, श्री गुरुजी, शाहूजी महाराज, ज्योतिबा फुले, गाडगे महाराज, तुकड़ोजी महाराज और डॉ. अंबेडकर जैसे महापुरुषों का बड़ा योगदान रहा। लेकिन, समाज अभी भी जितना बदलना चाहिए, उतना नहीं बदला है। प्रतिदिन हमें जातिभेद के आधार पर होने वाले अत्याचारों, अन्याय और विद्रूपताओं का परिचय मिलता है। इस समस्या के निर्मूल निवारण के लिए अभी और काम किया जाना शेष है। श्री सुदर्शन जी ने 'समरसता सूत्र' के संपादन के लिए तत्कालीन पाञ्चजन्य के संपादक (वर्तमान में राज्यसभा सांसद) तरुण विजय और मराठी साप्ताहिक विवेक के संपादक रमेश पतंगे के लिए साधुवाद दिया। उन्होंने प्रस्तावना में लिखा है कि 'समरसता सूत्र' हिन्दू समाज को समरसता के मार्ग की ओर प्रेरित कर सकेगा, यह मुझे विश्वास है। पुस्तक में कुल ३५ आलेख हैं। इनमें श्री गुरुजी, दत्तोपंथ ठेंगड़ी, हो.वे. शेषाद्रि, महाशूद्र के साथ ही राजनाथ सिंह, गिरिलाल जैन, किशोर मकवाणा, प्रदीप कुमार, राजा माधव और रामनाथ सिंह के विचारों को स्थान दिया गया है। इसके अलाव पुस्तक में सत्येन्द्रनाथ दत्त, श्रीप्रकाश और रसिक बिहारी मंजुल की चार कविताओं को स्थान दिया गया।
    'समरसता के सूत्र' हिन्दू समाज में जाति भेदभाव और अस्पृश्यता के बीजारोपण से लेकर समस्या के विकराल बनने, समाज को हुए नुकसान और समस्या के निवारण के लिए हो रहे प्रयासों समझने का ग्रंथ है। पुस्तक के संपादक रमेश पतंगे अपने एक आलेख में समरसता शब्द के महत्व को स्पष्ट करते हैं। उन्होंने लिखा है कि कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो जनआकांक्षाओं को अभिव्यक्त करते हैं। १९४७ के पूर्व 'स्वतंत्रता या आजादी' एक ऐसा ही शब्द था जो सभी के अंत:करण के तार छेड़ देता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 'समाजवाद' यह शब्द आर्थिक, सामाजिक समता को अभिव्यक्त करने वाला था, इसलिए इसका चलन बहुत अधिक होता रहा। १९७० के दशक में 'समता' शब्द का भी प्रचुर मात्रा में उपयोग होने लगा। लेकिन, इन सबसे इतर 'समरसता' शब्द अति व्यापक अर्थ को व्यक्त करता है। सृष्टि के मनुष्य जीवन में एक ही चेतना होने के कारण मनुष्य-मनुष्य इस नाते से एकदूजे के समान हैं। भारतीय विचार परंपरा हमें यह सिखाती है कि सारी सृष्टि चेतन-अचेतन एक ही तत्व का आविष्कार है। इसीलिए परस्पर सामंजस्य और समरसता होना अत्यंत स्वाभाविक है। 'समरसता' शब्द नया नहीं है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानवदर्शन में पहली बार इसका उपयोग किया। श्री गुरुजी के 'सामाजिक विचार दर्शन' में अनेक बार इस शब्द का इस्तेमाल किया गया है। वहीं, १९७० के दशक में 'समरसता' शब्द का प्रयोग वैचारिक क्षेत्र में एक सिद्धांत के रूप में शायद पहली बार किया गया। इसका श्रेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी को देना चाहिए। रमेश पतंगे ने इसी आलेख में दत्तोपंथ ठेंगड़ी जी द्वारा स्थापित समरसता मंच के कार्यों का उल्लेख किया है। समसरता मच की स्थापना १९७३ को हुई, तब से मंच समाज में समरसता लाने के लिए सार्थक प्रयास कर रहा है। इसका असर भी हिन्दू समाज में अब दिखता है।
      इस पुस्तक के संपादक तरुण विजय अपने आलेख 'दलित दर्द-यह दर्द भारत का है' में मनुष्य-मनुष्य में भेद पर तीखा सवाल उठाते हैं। वे लिखते हैं कि हम राम और कृष्ण की उपासना करते हैं और कहते हैं कण-कण में राम हैं। हम पत्थर को भी ईश्वर बनाकर चंदन लगाते हैं, उस पर माला चढ़ाते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। हम पत्थर को तो भगवान बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन जीते जागते प्राणवान मनुष्य में प्रत्यक्ष ईश्वर बसता है, उस पर अपने घर में आने तक रोक लगाते हैं। हम होली दीवाली मनाते हैं पर तीज-त्योहार पर न तो इन वंचितों के घर जाते हैं और न ही इन्हें अपने घर बुलाते हैं। वे लिखते हैं सामाजिक भेदभाव की खाई पाटने और समाज में समरसता लाने सार्थक प्रयास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके स्वयंसेवकों में द्वारा किए जा रहे हैं। संघ में न तो किसी की जाति पूछी जाती है और न ही जाति का भेदभाव चलता है।
      पुस्तक में तमाम विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि समाज में समरसता लाने के लिए कोई सही दिशा में काम कर रहा है तो वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। यह सच भी है। संघ के निर्माताओं का ध्येय भी यही रहा हिन्दू समाज का संगठन। संगठन भेदभाव की खाई पाटे बिना नहीं हो सकता इसलिए संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने कहा भी कि हिन्दवो सोदरा सर्वे न हिन्दू पतितो भवेत, मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र: समानता। श्री गुरुजी के प्रयासों से ही प्रयाग के कुंभ में संत-महात्माओं ने धर्म संसद में सभी हिन्दू समान है इस आशय की घोषणा की। संघ के प्रयासों से ही बेंगलूरु में स्वामी विश्वेश्वरा तीर्थ अनुसूचित जाति की बस्ती में गए , सहभोज किया। सन् १९८९ में अनुसूचित जाति के व्यक्ति कामेश्वर चौपाल ने रामजन्मभूमि की पहली शिला रखी। काशी में संतों ने डोमराजा के घर पहुंचकर प्रसाद ग्रहण किया। संघ के कार्य को स्पष्ट करते हुए श्री गुरुजी लिखते हैं कि हम तो समाज को ही भगवान मानते हैं, दूसरा हम जानते नहीं। समष्टिरूप भगवान की सेवा करेंगे। उसका कोई अंग अछूत नहीं, कोई हेय नहीं है। उसका एक-एक अंग पवित्र है, यह हमारी धारणा है। हम इस धारणा के आधार पर समाज बनाएंगे। भारत में जातीय भेदभाव पुरातन काल से नहीं है। पूर्व काल में तो समाज के सभी बंधुओं को समान अधिकार-समान सम्मान प्राप्त था। पंचायत व्यवस्था में हर तबके का प्रतिनिधि शामिल रहता था। प्रभु रामचंद्र की राज्य व्यवस्था का भी जो वर्णन है, उसमें चार वर्णों के चार प्रतिनिधि और पांचवां निषाद यानी वनवासी बंधुओं का प्रतिनिधि पंचायत में शामिल रहता था। परन्तु बीच कालखण्ड में वह व्यवस्था टूट गई।
      इस पुस्तक के एक आलेख में दत्तोपंत ठेंगडी लिखते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अपने सात वर्ष के कार्यकाल में ही १९३२ के नागपुर के विजयादशमी महोत्सव में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने घोषित किया था कि संघ क्षेत्र में जातिभेद और अस्पृश्यता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इस घोषणा की सत्यता की प्रतीति सन् १९३४ के वर्धा जिले के संघ शिविर में महात्मा गांधी को भी हुई थी। हो.वे. शेषाद्रि लिखते हैं कि हिन्दू समाज में समरसता के लिए काम करने वाले दो महापुरुषों का योगदान उल्लेखनीय है - डॉ. भीमराव अंबेडकर और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार। डॉ. हेडगेवार ने तो संघ की स्थापना के साथ ही मौन रूप से इस दिशा में कार्य प्रारंभ कर दिया था। उन्होंने अंबेडकर जी के प्रयासों की सराहना भी की। १९२४ में मुम्बई में आयोजित बहिष्कृत हितकारिणी सभा में डॉ. अंबेडकर ने भी कहा था कि अस्पृश्यों का उद्धार केवल अस्पृश्यों के बलबूते पर ही नहीं होगा, अपितु पूरे समाज को साथ लेकर आगे बढऩे से होगा। डॉ. अंबेडकर जब पुणे के संघ शिविर में आए थे तो उन्होंने पया कि यहां तो अस्पृश्यता नाम की चीज ही नहीं है। सभी लोग वहां पर समान थे। उच्च जाति, निचली जाति, ब्राह्मण आदि के साथ उन्होंने समान व्यवहार देखा।
      कई बार एक मिथ्या धारणा बड़े जोर-शोर से चिल्लाकर प्रचारित की जाती है कि संघ में तथाकथित उच्चवर्ग के लोगों की बाहुलता है। पूछा जाता है कि आखिरकार जिनको हरिजन या दलित अथवा अस्पृश्य जाति से संबंधित कहा जाता है, उनके बीच में संघ की सक्रियता कहां तक है और वे संघ कार्य की मुख्यधारा में कहां दिखाई देते हैं? तो जिसे हम मुख्यधारा कहते हैं उसका अर्थ हिन्दू एकता ही है। कार्यकर्ता किस जाति के हैं और किस घर में पैदा हुए हैं- यह जानना मुख्यधारा नहीं होती। संघ में यह नहीं देखा जाता कि कार्यकर्ता किस जाति का है। सभी का व्यवहार, मानसिकता समरसता की है। स्वयं गांधी जी भी जब संघ शिविर में आए थे तो उन्होंने यही पया था। द टाइम्स ऑफ इण्डिया के पूर्व संपादक गिरिलाल जैन और अमृतलाल नागर के उपन्यास की भूमिका के अंश स्पष्ट करते हैं कि किस तरह भारत में जाति का भूत खड़ा हुआ। जिन लोगों को आज अस्पृश्य, अछूत माना जा रहा है उन्होंने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए कितने कष्ट सहे हैं। एक और झूठ प्रचारित किया जाता है कि हिन्दू धर्म में तथाकथित शूद्रों को वेद अध्ययन या पूजा-पाठ का अधिकार नहीं दिया गया। इस झूठ से पर्दा उठाते हुए राजा जाधव लिखते हैं कि याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि शूद्रों को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। शम-दम-सत्य का पालन और धर्माचरण करने वाला शूद्र भी ब्राह्मण कहलाता है ऐसा वेदव्यास ने महाभारत में कहा है। पराशर, वशिष्ठ, व्यास, कणाद, मंदपाल, मांडव्य आदि सारे ऋषि शूद्र ही थे। धीवर, चांडाल, गणिका, आदि कनिष्ठ जातियों की संतान भी उस काल में गुरुकुल में पढ़ती थीं। ऐतरेय महिदास शुद्रपुत्र ही था। वह वेदवेत्ता बन गया। ऐतरेय ब्राह्मण यह ग्रंथ उसी ने रचा है।
     राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई अनुषांगिक संगठन समाज में समरसता लाने के लिए जुटे हैं। विश्व हिन्दु परिषद और सेवा भारती उन्हीं में से हैं। सेवा भारती के माध्यम से आज देशभर में तमाम निचली जाति की बस्तियों के सेवा कार्य और शिक्षा के प्रकल्प चलाए जा रहे हैं। गुजरात की मासिक पत्रिका नमस्कार के संपादक किशोर मकवाणा लिखते हैं कि विगत दस वर्षों से संघ कार्य को निकट से देखकर, शाखाओं में घुल-मिलकर स्वयंसेवकों के व्यवहार को देखकर, आज यह सब पढऩे को मिलता है कि - संघ दलित विरोधी है। तब ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने गाल पर चांटा मार दिया हो और मन में भयंकर वेदना उठती है। कितना सफेद झूठ। समाज के तथाकथित दलितोद्धार के ठेकेदारों ने वर्षों से दलित समाज में जो विष भरा है, उसे निकालना काफी कठिन कार्य है। इस दिशा में संघ की शक्ति और कार्य अभी भी बढऩा चाहिए। जितेन्द्र तिवारी अपने आलेख 'कले थे अछूत आज बने पण्डित' में बताते हैं कि किस प्रकार संघ प्रेरणा से समाज में बदलाव आए। जिन्हें अछूत माना जाता था वे पढ़-लिखकर पूजा-पाठ कार्य भी संपन्न करा पा रहे हैं।
     समरसता के सूत्र समाज को एकजुट करने और हिन्दू-हिन्दू में भेदाभेद को खत्म करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से किए जा रहे कार्यों का ग्रंथ तो है ही यह समाज में अन्य महानुभावों द्वारा इस दिशा में किए गए और किए जा रहे कार्यों की जानकारी भी देती है। अंत में एक बात कहना चाहूंगा जो पुस्तक का ध्येय भी है- देश और समाज के विकास के लिए समरसता जरूरी है। इसलिए हिन्दू-हिन्दू के बीच का भेद खत्म करने के लिए सार्थक प्रयास किए जाने चाहिए।
पुस्तक : समरसता के सूत्र
मूल्य : ३५० रुपए (सजिल्द)
संपादक : रमेश पतंगे, तरुण विजय
प्रकाशक : मचान,
सी-३७५, सेक्टर-१०, नोएडा (उत्तरप्रदेश) - २०१३०१