रविवार, 20 नवंबर 2011

...आखिर गलती किसकी

  छो टा-सा बच्चा एक दिन घर-घर खेल रहा था। उसने अपने घर का डिजाइन बनाया। बच्चे ने एक छोटा-सा कमरा मुख्य भवन से दूर बनाया था। बालक के पिता ने डिजााइन देखा और बेटे को शाबासी देते हुए पूछा - वाह! सोनू, बहुत अच्छा घर बनाया है। यह कहकर उसने अपने बेटे को गोद में उठा लिया। फिर पिता ने पूछा कि - अच्छा बेटे, एक बात तो बताओ कि ये छोटा-सा कमरा क्यों बनाया है। तब उस बच्चे ने कहा - यह कमरा आपके और मम्मी के लिए है, जब आप बूढ़े हो जाएंगे। मैं और मेरी पत्नी इस घर में रहेंगे और आप उस कमरे में रहेंगे। जैसे अभी दादा-दादी रहते हैं। बाहर बने दूसरे कमरे में।
           बच्चे की बात सुनकर पिता को अपनी गलती का अहसास हुआ। फिर उसने अपनी गलती सुधारी या नहीं, पता नहीं। लेकिन, इस कहानी से साफ होता है कि हम अपने माता-पिता के साथ जैसा कर रहे हैं, वैसा ही बुढ़ापे में हमारे बेटे हमारे साथ करने वाले हैं।
         दरअसल, भेल की ओर से भोपाल में संचालित वृद्धाश्रम 'आनंदम्' के वाकये से यह कहानी याद आई। भेल प्रबंधन के एक फैसले से 'आनंदम्'  में रह रहे कई बुजुर्गों के माथे पर चिंता की रेखाएं उभर आईं। उन्हें खबर लगी थी कि 'आनंदम्' बंद होने वाला है। ऐसे में उन्हें यहां से जाना होगा। लेकिन, कहां जाएंगे? यह तय नहीं था। सभी बुजुर्गों को उनके अपनों ने घर से तो पहले ही बेदखल कर दिया था। इसलिए घर का रास्ता तो वे जानबूझकर याद करना नहीं चाहते थे। इन बुजुर्गों ने अपनी तमाम युवा अवस्था बच्चों की बेहतर परवरिश में खपा दी थी। एक आस थी कि बच्चे बुढ़ापे की लाठी बन जाएंगे और उनको खुश देखकर सुकून से जिंदगी बसर हो जाएगी। बच्चे बड़े भी हो गए और बड़े आदमी भी बन गए, लेकिन बुजुर्ग अब भी जिंदगी की जंग में हैं। अपने बेटों के आलीशान घरों, बंगलों और फ्लैटों में उन्हें इतनी सी भी जगह मयस्सर नहीं कि वे अपनी जिन्दगी की शाम वहां बिता सकें। यह भी संभव है कि बेटों ने अपने माता-पिता को बेदखल कर जिन भवनों पर कब्जा जमा रखा है उनकी नींव में इनकी पसीने की इक बूंद तक न हो। वह भी मां-बाप की कमाई हो।
      हालांकि भेल प्रबंधन ने 'आनंदम्' को बंद करने की बात को कोरी अफवाह बताया है। लेकिन, इस मसले से कई सवाल उपजे। उनमें सबसे महत्वपूर्ण है कि भारत और भारतवासियों की दशा और दिशा क्या हो गई हैं। उनकी प्राथमिकताएं ऐश-ओ-आराम है या सेवा और कर्तव्य। युवा सोच को क्या हो गया है? किस रास्ते पर चल निकले हैं ये? जिन मां-बाप ने तमाम कष्ट सहकर, अपनी इच्छाओं को तिलांजलि देकर पहले अपने बच्चे की ख्वाहिश पूरी की। आज उनके बच्चे उन्हें अपने साथ रखने को तैयार नहीं। ऐसी परिस्थितियों में जब कई बार मां-बाप बच्चों पर हक जताते हुए कहते हैं कि बेटे हमने अपना सारा जीवन तुम्हारी बेहतरी के लिए लगा दिया, क्या अब तुम्हारा इतना भी फर्ज नहीं बनता कि हमें बुढ़ापे में दो वक्त की रोटी और सिर छुपाने को छत दे सको। तब अधिकांश मामलों में बच्चों द्वारा जवाब दिया जाता है - 'यह तो आपका फर्ज था। इतना भी नहीं कर सकते थे तो हमें पैदा क्यों किया?' इन नालायक औलादों से पूछना चाहिए कि जिस तरह आज तुम अपना फर्ज भूल रहे हो वैसे ही यदि जब तुम इनकी तरह असहाय थे और ये अपना फर्ज भूल जाते तब तुम्हारा क्या होता? निश्चित ही कहीं सड़ रहे होते। दरअसल, ये लोग इस भ्रम में होते हैं कि हम जैसा कर रहे हैं वैसा हमें नहीं भोगना होगा। लेकिन, दोस्त पृकृति का नियम है जैसा करोगे वैसा भरोगे। आज नहीं तो कल।
      यह दास्तान सिर्फ भेल भोपाल के 'आंनदम्' में रहने वाले बुजुर्गों की नहीं है। देशभर में यह बीमारी फैली हुई है। इसका इलाज जरूरी है। कुछ दिन पहले ही खबर आई थी कि केरल के एर्नाकुलम में 88 वर्षीय वृद्ध भास्करन नायर ने बेटों द्वारा जबरन वृद्धाश्रम भेजे जाने से दुखी होकर आत्महत्या कर ली। वृद्ध के आठ बेटे थे। एक भी बेटा उन्हें अपने साथ रखने को तैयार नहीं हुआ। सोचो! कभी एक ने आठ को पाला था। आज आठ एक को नहीं पाल पा रहे हैं। वहीं मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर के एक बेटे ने एक प्लॉट को पाने के लिए अपनी जीवित मां को मृत घोषित कर दिया। दरअसल 62 वर्षीय रेशमा वेदी पाल के नाम से ग्वालियर में एक प्लॉट था। इसे हथियाने के लिए उसके बेटे नीरज ने कागजों में अपनी मां को मार दिया। गांव से उसने अपनी मां का फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाया। इसके बाद उस प्लॉट अपने नाम करवाकर बेच दिया। अब विधवा अबला न्याय की उम्मीद लिए नगर निगम और पुलिस अफसरों के दफ्तरों में चक्कर काट रही है। ऐसी दु:खद और शर्मनाक घटनाएं भरी पड़ी हैं। एक खोजो चार मिलेंगी। क्योंकि लोग अधिकारों की बात तो कर रहे हैं लेकिन जिम्मेदारी और कर्तव्य से बच रहे हैं। अपने लिए तो सम्मान की चाह है लेकिन दूसरे के सम्मान की फिक्र नहीं। एक और बात है घर से बुजुर्गों को दूर करना एक तरह से घर से छत हटाने जैसा है। बुजुर्ग घर में संस्कार की पाठशाला भी होते हैं। लेकिन, अब घर में उनके नहीं होने से नौनिहालों का लालन-पालन भी मशीनी हो गया है। इसीलिए उनमें संस्कारों की कमी साफ देखी जा रही है।
    आखिर में इतना ही, क्या इन वृद्ध दंपत्तियों ने भी कहानी के अनुसार गलती की थी। माना कि इन्होंने वह गलती की थी। अब इनके बच्चे उसी परंपरा पर चल निकले हैं। ऐसे में क्या यह माना जाना चाहिए कि यह परंपरा हमेशा के लिए बन जाएगी।

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

चंबल के बीहड़ों में गूंजने दो बेटी की किलकारी

 मैं मध्यप्रदेश के ऐसे इलाके से ताल्लुकात रखता हूं, जो कई बातों के लिए सुविख्यात है और कुख्यात भी है। ग्वालियर का किला और यहां जन्मा ध्रुपद गायन ग्वालियर-चंबल संभाग को विश्वस्तरीय पहचान दिलाता है। वहीं मुरैना का 'पीला सोना' यानी सरसों से भी देशभर में इस बेल्ट की प्रसिद्धी है। बटेश्वर के मंदिर हों या कर्ण की जन्मस्थली कुतवार दोनों पुरातत्व और ऐतिहासिक महत्व के स्थल हैं। मुरैना पीले सोने के साथ ही राष्ट्रीय पक्षी मोरों की बहुलता के लिए भी जाना जाता है। ग्वालियर-चंबल इलाके की पहचान उसकी ब्रज, खड़ी और ठेठ लट्ठमार बोली के कारण भी है। बुराई भी इधर कम नहीं। चंबल के बीहड़ एक समय खतरनाक से खतरनाक डकैतों की शरणस्थली बने रहे। वह तो शुक्र है लोकनायक जयप्रकाश नारायण और अन्य गांधीवादियों का जिनके प्रयासों से बहुत से कुख्यात डकैतों ने आत्मसमर्पण कर दिया था। हालांकि उसके बाद भी अभी तक कुछ छोटे तो कुछ बड़े डकैत सिर उठाते रहे हैं। आकंडे बताते हैं कि इस इलाके में सबसे अधिक लाइसेंसी हथियार हैं। अवैध की तो खैर गिनती ही नहीं। भिण्ड के कई गांवों में अवैध हथियार बनाने के कारखाने हैं। यहां के लोग गुस्से के भी बहुत तेज हैं। कहते हैं कि धरती को क्षत्रिय विहीन कर इधर से परशुराम जी गुजर रहे थे और उन्होंने रक्तरंजित फरसा चंबल नदी में धोया था। खैर, इधर मिलावटी मावे के लिए भी यह इलाका देशभर में हाल ही में बदनाम होना शुरू हो गया है।
     इन सबसे अधिक बदनामी का कलंक ग्वालियर-चंबल संभाग के माथे पर है। यह बेहद शर्मनाक भी है। दरअसल यह संभाग कन्या शिशु हत्या के लिए कुख्यात रहा है। इस क्षेत्र में कन्या जनम पर उसे मारने के जो तरीके प्रचलित रहे वे बेहद ही घृणित हैं। कभी तो विश्वास ही नहीं होता कि कोई ऐसा भी कर सकता है क्या? कन्या पैदा होने पर ग्वालियर-चंबल संभाग के कुछ इलाकों में तंबाकू घिसकर उसके मुंह में रख दी जाती थी। इस पर भी वह बच जाए तो खाट के पांव के नीचे उसे दबा दिया जाता था। इसके अलावा उसके पैर या सिर पकड़कर जोर से झटककर मारने के बेहद घृणित तरीके प्रचलन में थे। इनसे संबंधित कई किस्से इधर प्रचलित हैं। जैसे ही जननी ने कन्या को जन्मा तो बाहर बैठा परिवार का पुरुष सदस्य जोर से दाई से पूछता- काए का भयो? मोड़ा कै मोड़ी? जैसे ही दाई बोलती कि लड़की पैदा हुई है तो उक्त पुरुष कहता- ला देखें तो बाकी नार (गर्दन) पक्की है कै कच्ची? पुरुष कन्या शिशु का सिर दोनों हाथों से थामता और जोर से झटका देता। इतने में बेचारी का दम निकल जाता। दुनिया में आते ही उसे दुनिया से रुखसत करना पड़ता। मां प्रसव कक्ष में प्रसव पीड़ा से अधिक अपने शरीर के अंश की इस दर्दनाक मौत से अधिक  तड़पती। प्रसव से पूर्व वह लगातार भगवान से यही प्रार्थना करती कि ये प्रभु या तो लड़का भेजना नहीं तो मेरी ही जान ले लेना। यह सिलसिला अब भी बदस्तूर जारी है। फर्क कन्या हत्या के  तरीकों में आया है। अब तो क्षणभर के लिए भी उसे यह दुनिया नहीं देखने दी जाती है। उसके लिए सबसे सुरक्षित जगह मां के पेट में ही उसकी हत्या कर दी जाती है। २०११ के जनगणना के आंकड़े भी यही बयां करते हैं कि २००१ की तुलना में लिंगानुपात में अंतर बढ़ा है। २०११ की जनगणना के मुताबिक मुरैना ही मध्य प्रदेश में सबसे कम लिंगानुपात वाला जिला है। यहां छह साल तक की उम्र के बच्चों में १००० लड़कों पर महज ८२५ लड़कियां हैं। जनगणना २००१ के मुताबिक यहां इस आयु वर्ग का लिंगानुपात ८३७ था। यानी एक दशक में यहां लिंगानुपात में १२ अंकों की गिरावट दर्ज हुई। जो निश्चिततौर पर चिंतनीय है। वैसे प्रदेश के हाल भी खराब ही हैं। जनगणना २०११ के आकंड़ों के मुताबिक प्रदेश में शून्य से छह वर्ष तक के आयु समूह का लिंगानुपात ९१२ है। यह २००१ की जनगणना के मुताबिक ९३२ था। यानी इस एक दशक में प्रदेश में भी २० अंक की गिरावट हुई।
     इस बात की चर्चा इसलिए कर रहा हूं क्योंकि हाल ही में सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने बेटी बचाओ अभियान शुरू किया है। वहीं नवदुर्गा महोत्सव के दौरान ढूंढऩे से भी नौ-नौ कन्याएं पूजने के लिए नहीं मिलीं। वैसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छवि लाड़ली लक्ष्मी योजना शुरू करने से ही बेटी हितैषी बन गई थी। बेटी बचाओ अभियान से उसमें बढ़ोतरी हुई है। अपनी इन लोक-लुभावन योजनाओं से सीएम शिवराज सिंह चौहान को राष्ट्रीय मंच पर भी खरी-खरी तारीफ मिली है। भारतीय जनता पार्टी में भी उनका कद ऊंचा हुआ है। वे भाजपा के टॉप सीएम की सूची में शामिल हैं। यूं तो अभियान के माध्यम से प्रदेशभर में बेटियों के प्रति लोगों के दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयास किए ही जाएंगे। फिर भी मेरी निजी राय है कि इस अभियान के एजेंडे में ग्वालियर-चंबल संभाग प्रमुखता से होना चाहिए। यहां अब भी लोगों की सोच में बदलाव लाने के लिए काफी प्रयास किए जाने हैं। अंत में आमजन से भी यही अपील है कि कोख में ही बेटी की कब्र बनाने की जगह उसका इस खूबसूरत जहां में भव्य स्वागत हो। उसके जनम पर विलाप न हों। बधाइयां गाईं जाएं। खील-बताशे बांटे। ढोल-ढमाके बजने दें।

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

सच्ची बात कही थी मैंने...

 उ स दिन ग्वालियर की गुलाबी ठंडी शाम थी। वाकया नवंबर २००४ का है। मौका था रूपसिंह स्टेडियम में आयोजित 'जगजीत नाइट' का। कार्यक्रम में काफी भीड़ पहुंची थी। मैंने 'भीड़' इसलिए लिखा है क्योंकि वे सब गजल रसिक नहीं थे। यह भीड़ गजल के ध्रुवतारे जगजीत सिंह को सुनने के लिए नहीं शायद देखने के लिए आई थी।  बाद में यह भीड़ जगजीत सिंह की नाराजगी का कारण भी बनी। दरअसल गजल के लिए जिस माहौल की जरूरत होती है। वैसा वहां दिख नहीं रहा था। लग रहा था कोई रईसी पार्टी आयोजित की गई है। जिसमें जाम छलकाए जा रहे हैं। गॉसिप रस का आनंद लिया जा रहा है। जगजीत सिंह शायद यहां उस भूमिका में मौजूद हैं, जैसे कि किसी शादी-पार्टी में कुछेक सिंगर्स को बुलाया जाता है, पाश्र्व संगीत देने के लिए। गजल सम्राट को इस माहौल में गजल की इज्जत तार-तार होते दिखी। आखिर गजल सुनने के लिए एक अदब और सलीके की जरूरत होती है। यही अदब और सलीका आज की 'जगजीत नाइट' से नदारद था। गजल के आशिक और पुजारी जगजीत सिंह से गजल की यह तौहीन बर्दाश्त नहीं हुई। उनका मूड उखड़ गया। उन्होंने महफिल में बह रहे अपने बेहतरीन सुरों को और संगीत लहरियों को वापस खींच लिया। इस पर आयोजक स्तब्ध रह गए। सभी सन्नाटे में आ गए। आयोजकों ने जगजीत जी से कार्यक्रम रोकने का कारण पूछा। इस पर गजल सम्राट ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि 'गजल मेरे लिए पूजा है, इबादत है। यहां इसका सम्मान होता नहीं दिख रहा है। अगर गजल सुननी है तो पहले इसका सम्मान करना सीखें और सलीका भी। मैं कोई पार्टी-शादी समारोह में गाना गाने वाला गायक नहीं हूं। गजल से मुझे इश्क है। मैं इसका अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकता। यहां उपस्थित अधिकांश लोग मुझे गजल श्रोता, गजल रसिक नहीं दिखते। संभवत: आप लोग यहां सिर्फ जगजीत सिंह को देखने के लिए आए हैं। ऐसे में मेरे गजल कहने का कोई मतलब नहीं है। मैं खामोश ही भला।
      उनका इतना कहना था कि आयोजकों के चेहरे देखने लायक थे। काफी अनुनय, विनय और माफी मांगने पर जगजीत सिंह फिर से गाने के लिए तैयार हुए। लेकिन, उन्होंने चिट्ठी न कोई संदेश... गाकर ही कार्यक्रम को विराम दे दिया। जगजीत सिंह की महफिलों में अक्सर यही आखिरी गजल होती है। यह घटनाक्रम दूसरे दिन शहर के सभी अखबारों की सुर्खियां बना। उस दिन ग्वालियरराइट्स के दिलों में गजल के लिए सम्मान के भाव जगा दिए थे। इस पूरे वाकए पर उनकी लोकप्रिय गजलों में से एक 'सच्ची बात कही थी मैंने...' सटीक बैठती है।
       गजल के प्रति यह समर्पण देखकर ही गुलजार साहब उन्हें 'गजल संरक्षक' कहते हैं। यह उनकी आवाज का ही जादू था कि इतने लम्बे समय तक गजल और जगजीत सिंह एक दूजे का पर्याय बने रहे। वर्ष २००४ के दौरान मैंने जब अपने पसंदीदा गजल गायक के बारे अधिक जानने की कोशिश की तो पता चला कि आपकी जीवनसंगिनी चित्रा सिंह भी बेहतरीन गजल गायिका हैं। चित्रा से जगजीत जी का विवाह १९६९ में हुआ था। दोनों ने १९७० से १९८० के बीच संगीत की दुनिया में खूब राज किया। बाद में सड़क दुर्घटना में बेटे विवेक की मौत के बाद चित्रा सिंह ने गाना छोड़ दिया। जबकि जगजीत सिंह बेटे के गम में डूबने से बचने के लिए गजल और आध्यात्म में और अधिक डूब गए। गजल को अधिक लोकप्रिय बनाने में जगजीत सिंह का योगदान अतुलनीय है। ऑर्केस्ट्रा के साथ गजल प्रस्तुत करने का सिलसिला भी इन्हीं की देन है। यह फॉर्मूला बेहद हिट हुआ। जगजीत सिंह गजल गायक, संगीतकार, उद्योगपति के साथ ही बेहतरीन इंसान भी थे। वे कई कलाकारों की तंगहाली में मदद करते रहे, क्योंकि उन्होंने भी शुरूआती दिनों में संघर्ष की पीड़ा का डटकर सामना किया। आखिर में इस महान गायक का जन्म ८ फरवरी  १९४१ को राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुआ था। ७० वर्ष का सफर तय कर मुंबई में १० अक्टूबर २०११ को निधन हो गया। पिता ने उनका नाम जगमोहन रखा था। उनके गुरु ने ही उन्हें जगजीत सिंह नाम दिया। गुरु का मान रखते हुए उन्होंने 'जग' से विदा लेते-लेते   इसे 'जीत' लिया था।

शनिवार, 24 सितंबर 2011

क्या यही है जादुई छड़ी?

यो जना आयोग ने भारतीय गरीबी का जिस तरह मजाक बनाया है। उस पर हो-हल्ला होना लाजमी है। योजना आयोग की ओर से गढ़ी गई गरीबी की नई परिभाषा से भला कौन, क्यों और कैसे सहमत हो सकता है। २० सितंबर २०११ मंगलवार को आयोन ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामें में कहा है कि खानपान पर शहरों में ९६५ रुपए और गांवों में ७८१ रुपए प्रति माह खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब नहीं माना जा सकता। यानी शहर में ३२ रुपए और गांव में २६ रुपए रोज खर्च करने वाले व्यक्ति बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे) के तहत मिलने वाली कल्याणकारी सुविधाओं का लाभ नहीं उठा सकता। गरीबी की इस परिभाषा के अनुसार तो निश्चित ही रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर दिखाई देने वाली भिखारियों की भीड़ भी अमीर हो गई। धन्य है योजना आयोग, जिसने कितने करोड़ भारतीयों की किस्मत छूमंतर कह कर बदल दी। अभिशप्त गरीबी झेलने को मजबूर करोड़ों लोगों को अमीर कर दिया। जय हो उनकी जिन्होंने इस रिपोर्ट के मार्फत एक ही झटके में भयानक महंगाई (डायन) के दौर में गरीबों के आंसू पौंछ दिए।
       इस रिपोर्ट पर माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के हस्ताक्षर हैं। अर्थात् उन्होंने इसका ठीक ढंग से अवलोकन किया होगा। वैसे भी देश से महंगाई और गरीबी दूर करने के लिए लम्बे समय से प्रधानमंत्रीजी एक जादू की छड़ी ढूंढ़ रहे थे। शायद यह रिपोर्ट उन्हें वही जादू की छड़ी लगी और उन्होंने इस पर तपाक से अपने हस्ताक्षर ठोंक दिए। ताकि अगली बार जनता से कह सकें देखो मेरे प्यारे देशवासियों मैंने जादू की छड़ी घुमाकर देश से काफी हद तक गरीबी दूर कर दी। गौरतलब है कि योजना आयोग का अध्यक्ष देश का प्रधानमंत्री होता है। योजना आयोग का उद्देश्य आर्थिक संवृद्धि, आर्थिक व सामाजिक असमानता को दूर करना, गरीबी का निवारण और रोजगार के अवसरों में वृद्धि के लिए काम करना और योजनाएं बनाना है। इसके लिए उपलब्ध आर्थिक संसाधनों का ही बेहतर उपयोग करना है। वैसे भारत में आर्थिक आयोजन संबंधी प्रस्ताव सर्वप्रथम सन् १९३४ में 'विश्वेश्वरैया' की पुस्तक 'प्लांड इकोनोमी फॉर इंडिया' में आया था। इसके बाद सन् १९३८ में अखिल भारतीय कांग्रेस ने ऐसी ही मांग की थी। सन् १९४४ में कुछ उद्योगपतियों द्वारा 'बंबई योजना' के तहत ऐसे प्रयास किए गए। सरकारी स्तर पर स्वतंत्रता के बाद सन्  १९४७ में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में आर्थिक नियोजन समिति गठित हुई। बाद में इसी समिति की सिफारिश पर १५ मार्च १९५० को योजना आयोग का गठन असंवैधाकि और परामर्शदात्री निकाय के रूप में किया गया। भारत के प्रधानमंत्री को इसका अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद योजना आयोग ने भारत उक्त उद्देश्यों को ध्यान में रखकर कार्य करना शुरू किया था।
    कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने अपने दोनों चुनाव (२००४ और २००९) महंगाई को नियंत्रित करने और आम आदमी की दशा को सुधारने के नारे के साथ लड़े। जनता ने उसे इसी भरोसे दोनों बार संसद पहुंचाया। लेकिन, दोनों बार इस सरकार ने आम जनता के विश्वास को छला है। यूपीए के दूसरे कार्यकार्य ने तो साफ-साफ बता ही दिया कि वह आम आदमी की कितनी हमदर्द है। लगातार पेट्रो उत्पाद के महंगे कर जनता की कमर तोड़कर कर रख दी। उसे इस पर भी चैन नहीं मिली कि वह फिर से पेट्रोल के दाम बढ़ाने की तैयारी करने लगी है। एलपीजी सिलेंडर से सब्सिडी खत्म कर उसे भी महंगा करने की जुगत सरकार के कारिंदे भिड़ा रहे हैं। इस सब में बेचारे आम आदमी का जीना मुश्किल है। इधर, योजना आयोग को भी पता नहीं क्या मजाक सूझी की उसने गरीबी की यह परिभाषा गढ़ दी। योजना आयोग के इस हलफनामे और तर्कों पर सब ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आ रही है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे तुरंत वापस लेने की मांग की है। वहीं सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त खाद्य आयुक्त ने इसे असंवेदनशील बताया है। उन्होंने कहा है कि यह पैमाना तो उन परिवारों के लिए सही है जो भुखमरी के कगार पर हैं, गरीबों के लिए नहीं।
      योजना आयोग गरीबी पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहता है कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू, और चेन्नई जैसे महानगरों में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में ३८६० रुपए खर्च करता है तो उसे गरीब नहीं कहा जा सकता। अब भला इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले साहब लोगों को कौन बताए कि इतने रुपए में इन महानगरों में सिर छुपाने को ठिकाना भी मुश्किल है। इतना ही नहीं आयोग कहता है कि ५.५० रुपए दाल पर, १.०२ रुपए चावल व रोटी पर, २.३३ रुपए दूध पर, १.५५ रुपए तेल पर, १.९५ पैसे साग-सब्जी पर, ४४ पैसे फल पर, ७० पैसे चीनी पर, ७८ पैसे नमक व मसालों पर, ३.७५ पैसे ईंधन पर खर्च करें तो एक व्यक्ति स्वस्थ्य जीवनयापन कर सकता है। इतना ही नहीं योजना आयोग कहता है कि यदि आप ९९ पैसा प्रतिदिन शिक्षा पर खर्च करते हैं तो आपको शिक्षा के संबंध में कतई गरीब नहीं माना जा सकता। ऐसे में तो गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों के लिए बनी तमाम कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने से लाखों-करोड़ों लोग वंचित हो जाएंगे। सरकार का भारी भरकम बजट जो इन योजनाओं पर खर्च हो रहा है जरूर बच जाएगा। लेकिन, गरीबी में जी रहे लोगों को जीने के लाले पड़ जाएंगे।
      इन आंकड़ों के हिसाब से मुझे तो नहीं लगता कि देश में भुखमरी से पीडि़त को छोड़कर कोई गरीब मिलेगा।  इस तरह देखें तो वाकई यह रिपोर्ट जादुई है। जिसने भारत से कागजों में गरीबी दूर करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। योजना आयोग के अध्यक्ष और भारत के प्रधानमंत्री की जादुई छड़ी शायद यही रिपोर्ट है जिसे वो इतने दिन से ढूंढ़ रहे थे।

बस कीमतें इधर-उधर हुई हैं
15 साल पहले एक समोसा 50 पैसे का और एक फोन कॉल 7 रुपए की। आज एक फोन कॉल 50 पैसे की और एक समोसा 7 रुपए का। महंगाई बढ़ी नहीं बस कीमतें इधर-उधर हुईं हैं। - मनमोहन सिंह

रविवार, 31 जुलाई 2011

बिट्टो

बीना स्टेशन। स्वर्णजयंती एक्सपे्रस। २७ जुलाई २०११। सार्थक ग्वालियर से भोपाल जा रहा था। उसकी भोपाल में पोस्टिंग हो गई थी। वह वहां एक अखबार में काम करता है। बीना स्टेशन पर ट्रेन को रुके हुए १५ मिनट से ज्यादा वक्त बीत गया था। सभी यात्री गर्मी और उमस से बेहाल थे। महीना तो सावन का था, लेकिन भीषण गर्मी और पसीने से तरबतर शरीर से चैत्र मास का अहसास हो रहा था। कई लोग उमस से परेशान हो कर डिब्बे से उतरकर प्लेटफार्म पर खड़े हो गए थे। जिसके हाथ जो था वह उसी से हवा करने की कोशिश में था। सब की एक ही चाह थी कि जल्द ही ट्रेन चल दे तो थोड़ी राहत मिले।
'अहा! ट्रेन चल दी।' एक हल्के से झटके से सार्थक को यह अहसास हुआ। उसने सुकून की लम्बी सांस खींची और सीट से अपनी पीठ टिका दी। ट्रेन ने हल्की गति भी पकड़ ली।
लेकिन तभी, 'उफ! यह क्या हुआ?'  प्लेटफार्म पर बदहवास चीखते-चिल्लाते ट्रेन के बराबर में एक महिला को भागते देखकर अनायस सार्थक के मुंह से निकला। वह जोर-जोर से बिट्टो-बिट्टो पुकार रही थी। बिट्टो शायद उसकी बेटी का नाम था। जो ट्रेन में अपने पिता के साथ सफर कर रही थी। हां, बिट्टो उसी की बेटी है। कोई १०-११ साल की लड़की। सार्थक को याद आया कि थोड़ी देर पहले ही तो वह मेरी खिड़की के पास खड़ी थी। वह अपने पति और बेटी को छोडऩे स्टेशन आई थी। उस समय गर्मी से परेशान सार्थक के कानों में भी उनकी बातें घुल रहीं थीं। वह अपने पति से कह रही थी-  'मुझे भी साथ चलना है।'
'हां बाबा। मैं जल्द ही तुम्हें ले जाऊंगा।' पति लाड़ से उसे समझाते हुए कह रहा था।
'जल्द ही मतलब जल्द ही मुझे ले जाना और हां ट्रेन में बिट्टो का ध्यान रखना। पानी की बोटल रख ली या नहीं। गर्मी बहुत है।' - महिला ने अपने पति को हिदायत देते हुए कहा।
इसके बाद सार्थक खुद अपने सुबह में खो गया। सुबह जब वह तैयार हो रहा था तो उसकी पत्नी के भी लगभग यही वाक्य थे। भारतीय नारियों के हृदय में कितना साम्य होता है। अगर वह पश्चिमी जीवन शैली की चपेट में न आई हो तो। खैर...
फिर अचानक इसे क्या हुआ? ये इस तरह क्यों चीख रही है? तरह-तरह के उलझे हुए सवाल सार्थक के दिमाग में दस्तक देने लगे। अच्छा खुद ही उनके तरह-तरह जवाब भी तलाश रहा था। ट्रेन जब तक रुकी थी बेटी और पति उसके पास थे, लेकिन जैसे ही गाड़ी ने चलना शुरू किया होगा उसकी ममता जाग उठी होगी। उसकी छाती बेटी से बिछडऩे के भय से बैठने लगी होगी। मां आखिर मां होती है। हां यही कारण तो मौजूं दिखता है। उसके इस तरह बेसुध होकर बिट्टो-बिट्टो पुकारते हुए भागने के लिए। बेटी से बिछडऩे की पीढ़ा उसके चेहरे से साफ झलक रही थी। पति से दूर रहने का गम एक बारगी भारतीय स्त्री सह सकती है, लेकिन अपने बच्चों से दूर उससे नहीं रहा जाता। हां, यही सच है।
गाड़ी तेज होती जा रही थी। वह अब भी और जोर लगाकर दौड़ रही थी। आंखों से आंसुओं की नदी बह रही थी। वह बिट्टो के अलावा और कुछ बोल भी नहीं पा रही थी। उस क्षण सार्थक के मन में एक ही बात ने जोर मारा। जल्दी से चेन खींचकर गाड़ी को रोका जाए। यह सोचते हुए सार्थक ने चेन पुलिंग के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि गाड़ी से कूदता हुआ उसका पति उसे दिखा। गाड़ी से इस तरह उतरते समय वह गिरते-गिरते बचा था।
'क्या हुआ? क्या बात है?' उसने अपनी पत्नी का चेहरा दोनों हाथों में भरकर उससे पूछा। ऐसी किसी स्थिति में पुरुष अक्सर क्रोधित हो जाते हैं। उसने विस्मय और परेशानी के लहजे में यह पूछा था। लेकिन, अब भी महिला के मुंह से सिवाय बिट्टो के कुछ नहीं निकला। वह और कुछ नहीं कह पाई। इस पर भागते हुए उस युवक ने गाड़ी से अपनी बेटी को उतारा। प्लेटफार्म पर तीनों मां-पिता और बेटी एक दूसरे से लिपटकर खड़े हो गए। महिला अभी भी सिसक-सिसक कर रो रही थी। उसके पति की भी आंखे नम हो गई थी। उसने पत्नी और बेटी को अपने कलेजे से ऐसे चिपका लिया जैसे सालों बाद उनसे मिला हो। सार्थक भी नम पलकों से उन्हें तब तक निहारता रहा। जब तक वे उसे नजर आए। इसके बाद भोपाल तक रास्ते भर वे उसके जेहन में बने रहे।

दो शब्द : यह एक सत्य घटना है। जिससे मैं बहुत प्रभावित हुआ। इसे मैंने एक लघुकथा का रूप देने की कोशिश की है। पता नहीं सफल रहा या असफल। इतना तो पता है कि मैं उस मां निश्चल प्रेम और अपनी बेटी के लिए उसकी तड़प अंकित करने में असफल रहा।

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

धमाके होते रहेंगे

 मुं बई में बुधवार (१३ जुलाई २०११) को तीन जगह बम विस्फोट हुए। मुम्बा देवी मंदिर के सामने झवेरी बाजार में। दूसरा ओपेरा हाउस के पास चेंबर प्रसाद में और तीसरा दादर में। तीनों विस्फोट १० मिनट में हुए। इनमें अब ३१ लोगों की मौत हो चुकी है १२० से अधिक गंभीर हालत में अस्पताल में मौत से संघर्ष कर रहे हैं।
          भारत में यह आश्चर्यजनक घटना नहीं है। इसलिए चौकने की जरूरत नहीं। शर्मनाक जरूर है। दु:खद है। देशवासियों को ऐसे धमाकों की आदत डाल लेनी होगी, क्योंकि जब तक देश की राजनैतिक इच्छाशक्ति गीदड़ों जैसी रहेगी तब तक धमाके यूं ही होते रहेंगे। हमारे (?) नेता गीदड़ भभकियां फुल सीना फुलाकर देते हैं। करते कुछ नहीं। एक तरफ अन्य देश हैं जो करके दिखाते हैं फिर कहते हैं। अमरीका को ही ले लीजिए। उसने देश के नंबर वन दुश्मन को एड़ीचोटी का जोर लगाकर ढूंढ़ा और उसे उसके बिल में घुसकर मार गिराया। इस घटना के वक्त भी हमारे (?) नेताओं ने आतंकियों को अमरीका अंदाज में मारने की गीदड़ भभकी दी थी। लेकिन, हुआ क्या? मुंबई में ये धमाके। हमारे खुफिया तंत्र को इनकी खबर ही नहीं थी। इसके अलावा देश के शीर्ष विभागों में क्या गजब का तालमेल है यह भी धमाकों के बाद उजागर हो गया। मृतकों की संख्या को लेकर मुंबई पुलिस कमिश्नर कुछ जवाब दे रहे थे, मुख्यमंत्री के पास कुछ दूसरे ही आंकड़े थे और गृहमंत्री अपना ही सुर आलाप रहे थे। किसी के पास कोई ठोस जानकारी नहीं। देश की जनता किसकी बात पर भरोसा करे। 
        भारत की राजनीति भयंकर दूषित हो चुकी है। वोट बैंक की घृणित राजनीति के चलते देशधर्म दोयम दर्जे पर खिसका दिया गया है। इसी वोट बैंक की राजनीति के चलते भारत की 'आत्मा' (संसद) और मुंबई के 'ताज' होटल पर हमला करने वाले आतंकियों को अब तक फांसी पर नहीं लटकाया जा सका है। कांग्रेस उन्हें मुस्लिम वोट बैंक के 'महाप्रबंधक' के रूप में देखती है। उनकी सुरक्षा व्यवस्था पर सरकार करोड़ों रुपए फूंक रही है। पिछले साल ही उजागर हुआ था कि अफजल और कसाब को जेल में 'रोटी और बोटी' की शानदार व्यवस्था है। बम फोड़कर निर्दोष लोगों की हत्या कर उन्हें जिस 'जन्नत' के ख्वाब दिखाए गए थे वह उन्हें भारतीय जेलों में ही नसीब हो गई। कितनी शर्मनाक स्थिति है कि देश ही नहीं वरन् मानवता के दो बड़े अपराधी इस देश में वोटों की तराजू पर तोले जाते हैं। नेता उनकी फांसी को ऐन केन प्रकारेण टालने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। जहां हत्यारों को इतनी सहूलियत और इज्जत बख्शी जाए वहां कौन मूर्ख बम नहीं फोडऩा चाहेगा। देश के वरिष्ठ नेता मानवता के दुश्मनों की मौत का मातम मनाते हैं। उन्हें 'जी' और 'आप' लगाकर संबोधित करते हैं। उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर देश के शहीदों का अपमान करते हैं। निरे बेवकूफ हैं जो चेन झपटते हैं, छोटी-मोटी लूट मार कर रहे हैं। उन्हें इस देश में इज्जत और शोहरत चाहिए तो बम फोडऩे होंगे। हो सकता है देश की राजनीति का यही हाल रहा तो देर सबेरे इन्हें अक्ल आ ही जाएगी। फिर ये भी हमारे माथे बम फोड़ेंगे। इसलिए इस देश में बम धमाके होते रहेंगे।
       धमाके वाकई रोकने हैं तो दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है। आतंकियों के दिलों में खौफ पैदा करने की जरूरत है। आतंकियों और उनके मनसूबों को कुचलना ही है तो वोट बैंक की राजनीति का त्याग करना होगा। राजनीति में देशधर्म और जनता के हित सर्वोपरि रखने होंगे। अब भी यदि आतंकियों से कैसे निपटना है देश के कर्णधारों को नहीं सूझ रहा हो। उनकी बुद्धि पर ताला पड़ गया हो तो ब्रिटेन और अमरीका से सीख ली जा सकती है। जिन्होंने अपने देश में आतंक की एक-दो घटनाओं के बाद उसे फिर सिर नहीं उठाने दिया। कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी धरती पर पनप रहे आतंक के भ्रूण की ही हत्या कर दी। उसे सपोला तक नहीं बनने दिया। इजराइल से भी प्रेरणा ली जा सकती है। जो चारों ओर से दुश्मनों से घिरा है। फिर भी मजाल है किसी की, इजराइल की तरफ आंख उठाकर भी देख ले। यहां आतंक इसलिए नहीं फनफना सका, क्योंकि यहां राष्टधर्म और राष्ट्रहित प्राथमिक हैं। यहां वोट बैंक की घृणित राजनीति नहीं। चंद वोटों की खातिर देश को बारूद के मुहाने खड़ा करने की सोच यहां की राजनीति में नहीं है। अपने नागरिकों को बेवजह मरने से बचाने के लिए बिखर रहा ब्रिटेन भी शेर हो गया। नतीजा आज उसके नागरिक बेफिक्र सोते हैं। अमरीका तो एक घटना के बाद से आज तक आतंकियों के पीछे 'तीर-कमान' लेकर पड़ गया है। वह अपने देश के नंबर एक दुश्मन का सफाया तो कर ही चुका है, उसके बाद भी शांत नहीं है। आतंक को पस्त करने की उसने ठान रखी है। वह अब भी आतंकियों को ओसामा बिन लादेन के पास भेज रहा है। इसके लिए उसने पाकिस्तान से भी बिगाड़ कर ली है। 
     ऐसा भी नहीं है कि भारत यह सब करने में समर्थ नहीं है। उसके पास आतंकियों से निपटने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं है। ये सब है उसके पास। बस नहीं है तो राजनैतिक इच्छाशक्ति। इसी राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव के चलते आतंकियों के हौसले बुलंद हैं। वे बार-बार देश के किसी न किसी हिस्से में धमाके करते रहते हैं। देश की सुरक्षा इंतजामों का हाल तो यह है कि हम मुंबई की सुरक्षा व्यवस्था ही पुख्ता नहीं रख पा रहे हैं। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में यह पहला धमाका नहीं है। मुंबई में पहली बार सिलसिलेबार धमाके १९९३ में हुए थे। उसके बाद २००२, २००३, २००६ और २००८ में भी धमाके होते रहे। १९९३ से अब तक मुंबई में ही करीब ७०० लोगों की जान हम गवां चुके हैं। इसके बाद भी हम सबक लेने को तैयार नहीं। बयानबाजी और वोट बैंक की परवाह छोड़कर हमें कुछ अमरीका और ब्रिटेन की नीति को अपनाना होगा। हमारी सेना में वो कुव्वत है। वे आतंक के सफाए के लिए अपनी मंशा भी जता चुके हैं। देश के कर्णधारों को आतंक को मिटाने के लिए कुछ ठोस नीति बनानी होगी। वरना तो यूं ही धमाके होते रहेंगे और हम अपने प्रियजनों को खोते रहेंगे।

शनिवार, 25 जून 2011

देश बांट कर रहेगी कांग्रेस

'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण अधिनियम-२०११' की आग में जलेगा देश। कांग्रेस काटेगी वोटों की फसल। बहुसंख्यकों पर होगा अत्याचार।

 कां ग्रेस की नीतियां अब देशवासियों की समझ से परे जाने लगी हैं। संविधान की शपथ लेकर उसकी रक्षा और उसका पालन कराने की बात कहने वाली यूपीए सरकार संविधान विरुद्ध ही कार्य कर रही है। उसने देश को एकसूत्र में फिरोने की जगह दो फाड़ करने की तैयारी की है। वोट बैंक की घृणित राजनीति के फेर में कांग्रेस और उसके नेताओं का आचरण संदिग्ध हो गया है। हाल के घटनाक्रमों को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि कांग्रेस फिर से देश बांट कर रहेगी या फिर देश को सांप्रदायिक आग में जलने के लिए धकेलकर ही दम लेगी। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक-२०११' तैयार किया है। लम्बे समय से सब ओर से इस विधेयक का विरोध हो रहा है। लगभग सभी विद्वान इसे 'देश तोड़क विधेयक' बता रहे हैं। इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ माना जा रहा है। इसे कानूनी जामा पहनाना देश के बहुसंख्यकों को दोयम दर्जे का साबित करने का प्रयास है। इसके बावजूद कांग्रेस की सलाहकार परिषद ने बीते बुधवार को इसे संसद में पारित कराने के लिए सरकार के पास भेज दिया।
          'समानांतर सरकार' नहीं चलने देंगे। 'सिविस सोसायटी' को क्या अधिकार है विधेयक तैयार करने का। यह काम तो संसद का है। इस तरह के बहानों से लोकपाल बिल का विरोध करने वाले सभी कांग्रेसी इस विधेयक को पारित कराने के लिए जी जान से जुट जाएंगे। वह इसलिए कि इस विधेयक को उनकी तथाकथित महान नेता सोनिया गांधी के नेतृत्व में तैयार कराया गया है, किसी अन्ना या रामदेव के नेतृत्व में नहीं। इसलिए भी वे पूरी ताकत झोंक देंगे ताकि इस विधेयक के नाम से वे अल्पसंख्यकों के 'वोटों की फसल' काट सकें। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के सुझाव मानने से तो उनकी 'लूट' बंद हो जाती। जबकि यह विधेयक उन्हें भारत को और लूटने में मददगार साबित होगा। कांग्रेस की यह 'दादागिरी' कि हम पांच साल के लिए चुनकर आए हैं हम जो चाहे करेंगे। इससे देश का मतदाता स्वयं को अपमानित महसूस कर रहा है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन में बड़ी भारी संख्या में शामिल होकर उसने कांग्रेस को बताने का प्रयास किया कि उसकी नीतियां देश के खिलाफ हो रही हैं। वक्त है कांग्रेस पटरी पर आ जाए, लेकिन सत्ता के मद में चूर कांग्रेस आमजन की आवाज कहां सुनती है। आप खुद तय कर सकते हैं कि यह विधेयक देश में सांस्कृतिक एकता के लिए कितना घातक है। फिर आप तय कीजिए क्या ऐसे किसी कानून की देश को जरूरत है? क्या ओछी मानसिकता वाली कांग्रेस की देश को अब जरूरत है? क्या यूपीए सरकार की नीतियां और उसका आचरण देखकर नहीं लगता कि शासन व्यवस्था में 'देशबंधु' कम 'देशशत्रु' अधिक बैठे हैं? क्या कांग्रेस नीत यूपीए सरकार को पांच साल तक सत्ता में बने रहने का अधिकार है? क्या इस तरह देश में कभी चैन-अमन कायम हो सकेगा? क्या इससे 'बहुसंख्यक' अपने को कुंठित महसूस नहीं करेगा?

'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक-२०११' कहता है...

1- 'बहुसंख्यक' हत्यारे, हिंसक और दंगाई प्रवृति के होते हैं। (विकीलीक्स के खुलासे में सामने आया था कि देश के बहुसंख्यकों को लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की इस तरह की मानसिकता है।) जबकि 'अल्पसंख्यक' तो दूध के दुले हैं। वे तो करुणा के सागर होते हैं। अल्पसंख्यक समुदायक के तो सब लोग अब तक संत ही निकले हैं।
2- दंगो और सांप्रदायिक हिंसा के दौरान यौन अपराधों को तभी दंडनीय मानने की बात कही गई है अगर वह अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्तियों के साथ हो। यानी अगर किसी बहुसंख्यक समुदाय की महिला के साथ दंगे के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति बलात्कार करता है तो ये दंडनीय नहीं होगा।
3- यदि दंगे में कोई अल्पसंख्यक घृणा व वैमनस्य फैलता है तो यह अपराध नहीं माना जायेगा, लेकिन अगर कोई बहुसंख्यक ऐसा करता है तो उसे कठोर सजा दी जायेगी। (बहुसंख्यकों को इस तरह के झूठे आरोपों में फंसाना आसान होगा। यानी उनका मरना तय है।)
4- इस अधिनियम में केवल अल्पसंख्यक समूहों की रक्षा की ही बात की गई है। सांप्रदायिक हिंसा में बहुसंख्यक पिटते हैं तो पिटते रहें, मरते हैं तो मरते रहें। क्या यह माना जा सकता है कि सांप्रदायिक हिंसा में सिर्फ अल्पसंख्यक ही मरते हैं?
5- इस देश तोड़क कानून के तहत सिर्फ और सिर्फ बहुसंख्यकों के ही खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। अप्ल्संख्यक कानून के दायरे से बाहर होंगे।
6- सांप्रदायिक दंगो की समस्त जवाबदारी बहुसंख्यकों की ही होगी, क्योंकि बहुसंख्यकों की प्रवृति हमेशा से दंगे भडकाने की होती है। वे आक्रामक प्रवृति के होते हैं।
७- दंगो के दौरान होने वाले जान और माल के नुकसान पर मुआवजे के हक़दार सिर्फ अल्पसंख्यक ही होंगे। किसी बहुसंख्यक का भले ही दंगों में पूरा परिवार और संपत्ति नष्ट हो जाए उसे किसी तरह का मुआवजा नहीं मिलेगा। वह भीख मांग कर जीवन काट सकता है। हो सकता है सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का दोषी सिद्ध कर उसके लिए जेल की कोठरी में व्यवस्था कर दी जाए।
८- कांग्रेस की चालाकी और भी हैं। इस कानून के तहत अगर किसी भी राज्य में दंगा भड़कता है (चाहे वह कांग्रेस के निर्देश पर भड़का हो।) और अल्पसंख्यकों को कोई नुकसान होता है तो केंद्र सरकार उस राज्य के सरकार को तुरंत बर्खास्त कर सकती है। मतलब कांग्रेस को अब चुनाव जीतने की भी जरूरत नहीं है। बस कोई छोटा सा दंगा कराओ और वहां की भाजपा या अन्य सरकार को बर्खास्त कर स्वयं कब्जा कर लो।

सोनिया गांधी के नेतृत्व में इन 'देशप्रेमियों' ने 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक-२०११' को तैयार किया है।
१. सैयद शहबुदीन
२. हर्ष मंदर
३. अनु आगा
४. माजा दारूवाला
५. अबुसलेह शरिफ्फ़
६. असगर अली इंजिनियर
७. नाजमी वजीरी
८. पी आई जोसे
९. तीस्ता जावेद सेतलवाड
१०. एच .एस फुल्का
११. जॉन दयाल
१२. जस्टिस होस्बेट सुरेश
१३. कमल फारुखी
१४. मंज़ूर आलम
१५. मौलाना निअज़ फारुखी
१६. राम पुनियानी
१७. रूपरेखा वर्मा
१८. समर सिंह
१९. सौमया उमा
२०. शबनम हाश्मी
२१. सिस्टर मारी स्कारिया
२२. सुखदो थोरात
२३. सैयद शहाबुद्दीन
२४. फरह नकवी