शनिवार, 24 सितंबर 2011

क्या यही है जादुई छड़ी?

यो जना आयोग ने भारतीय गरीबी का जिस तरह मजाक बनाया है। उस पर हो-हल्ला होना लाजमी है। योजना आयोग की ओर से गढ़ी गई गरीबी की नई परिभाषा से भला कौन, क्यों और कैसे सहमत हो सकता है। २० सितंबर २०११ मंगलवार को आयोन ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामें में कहा है कि खानपान पर शहरों में ९६५ रुपए और गांवों में ७८१ रुपए प्रति माह खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब नहीं माना जा सकता। यानी शहर में ३२ रुपए और गांव में २६ रुपए रोज खर्च करने वाले व्यक्ति बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे) के तहत मिलने वाली कल्याणकारी सुविधाओं का लाभ नहीं उठा सकता। गरीबी की इस परिभाषा के अनुसार तो निश्चित ही रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर दिखाई देने वाली भिखारियों की भीड़ भी अमीर हो गई। धन्य है योजना आयोग, जिसने कितने करोड़ भारतीयों की किस्मत छूमंतर कह कर बदल दी। अभिशप्त गरीबी झेलने को मजबूर करोड़ों लोगों को अमीर कर दिया। जय हो उनकी जिन्होंने इस रिपोर्ट के मार्फत एक ही झटके में भयानक महंगाई (डायन) के दौर में गरीबों के आंसू पौंछ दिए।
       इस रिपोर्ट पर माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के हस्ताक्षर हैं। अर्थात् उन्होंने इसका ठीक ढंग से अवलोकन किया होगा। वैसे भी देश से महंगाई और गरीबी दूर करने के लिए लम्बे समय से प्रधानमंत्रीजी एक जादू की छड़ी ढूंढ़ रहे थे। शायद यह रिपोर्ट उन्हें वही जादू की छड़ी लगी और उन्होंने इस पर तपाक से अपने हस्ताक्षर ठोंक दिए। ताकि अगली बार जनता से कह सकें देखो मेरे प्यारे देशवासियों मैंने जादू की छड़ी घुमाकर देश से काफी हद तक गरीबी दूर कर दी। गौरतलब है कि योजना आयोग का अध्यक्ष देश का प्रधानमंत्री होता है। योजना आयोग का उद्देश्य आर्थिक संवृद्धि, आर्थिक व सामाजिक असमानता को दूर करना, गरीबी का निवारण और रोजगार के अवसरों में वृद्धि के लिए काम करना और योजनाएं बनाना है। इसके लिए उपलब्ध आर्थिक संसाधनों का ही बेहतर उपयोग करना है। वैसे भारत में आर्थिक आयोजन संबंधी प्रस्ताव सर्वप्रथम सन् १९३४ में 'विश्वेश्वरैया' की पुस्तक 'प्लांड इकोनोमी फॉर इंडिया' में आया था। इसके बाद सन् १९३८ में अखिल भारतीय कांग्रेस ने ऐसी ही मांग की थी। सन् १९४४ में कुछ उद्योगपतियों द्वारा 'बंबई योजना' के तहत ऐसे प्रयास किए गए। सरकारी स्तर पर स्वतंत्रता के बाद सन्  १९४७ में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में आर्थिक नियोजन समिति गठित हुई। बाद में इसी समिति की सिफारिश पर १५ मार्च १९५० को योजना आयोग का गठन असंवैधाकि और परामर्शदात्री निकाय के रूप में किया गया। भारत के प्रधानमंत्री को इसका अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद योजना आयोग ने भारत उक्त उद्देश्यों को ध्यान में रखकर कार्य करना शुरू किया था।
    कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने अपने दोनों चुनाव (२००४ और २००९) महंगाई को नियंत्रित करने और आम आदमी की दशा को सुधारने के नारे के साथ लड़े। जनता ने उसे इसी भरोसे दोनों बार संसद पहुंचाया। लेकिन, दोनों बार इस सरकार ने आम जनता के विश्वास को छला है। यूपीए के दूसरे कार्यकार्य ने तो साफ-साफ बता ही दिया कि वह आम आदमी की कितनी हमदर्द है। लगातार पेट्रो उत्पाद के महंगे कर जनता की कमर तोड़कर कर रख दी। उसे इस पर भी चैन नहीं मिली कि वह फिर से पेट्रोल के दाम बढ़ाने की तैयारी करने लगी है। एलपीजी सिलेंडर से सब्सिडी खत्म कर उसे भी महंगा करने की जुगत सरकार के कारिंदे भिड़ा रहे हैं। इस सब में बेचारे आम आदमी का जीना मुश्किल है। इधर, योजना आयोग को भी पता नहीं क्या मजाक सूझी की उसने गरीबी की यह परिभाषा गढ़ दी। योजना आयोग के इस हलफनामे और तर्कों पर सब ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आ रही है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे तुरंत वापस लेने की मांग की है। वहीं सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त खाद्य आयुक्त ने इसे असंवेदनशील बताया है। उन्होंने कहा है कि यह पैमाना तो उन परिवारों के लिए सही है जो भुखमरी के कगार पर हैं, गरीबों के लिए नहीं।
      योजना आयोग गरीबी पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहता है कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू, और चेन्नई जैसे महानगरों में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में ३८६० रुपए खर्च करता है तो उसे गरीब नहीं कहा जा सकता। अब भला इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले साहब लोगों को कौन बताए कि इतने रुपए में इन महानगरों में सिर छुपाने को ठिकाना भी मुश्किल है। इतना ही नहीं आयोग कहता है कि ५.५० रुपए दाल पर, १.०२ रुपए चावल व रोटी पर, २.३३ रुपए दूध पर, १.५५ रुपए तेल पर, १.९५ पैसे साग-सब्जी पर, ४४ पैसे फल पर, ७० पैसे चीनी पर, ७८ पैसे नमक व मसालों पर, ३.७५ पैसे ईंधन पर खर्च करें तो एक व्यक्ति स्वस्थ्य जीवनयापन कर सकता है। इतना ही नहीं योजना आयोग कहता है कि यदि आप ९९ पैसा प्रतिदिन शिक्षा पर खर्च करते हैं तो आपको शिक्षा के संबंध में कतई गरीब नहीं माना जा सकता। ऐसे में तो गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों के लिए बनी तमाम कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने से लाखों-करोड़ों लोग वंचित हो जाएंगे। सरकार का भारी भरकम बजट जो इन योजनाओं पर खर्च हो रहा है जरूर बच जाएगा। लेकिन, गरीबी में जी रहे लोगों को जीने के लाले पड़ जाएंगे।
      इन आंकड़ों के हिसाब से मुझे तो नहीं लगता कि देश में भुखमरी से पीडि़त को छोड़कर कोई गरीब मिलेगा।  इस तरह देखें तो वाकई यह रिपोर्ट जादुई है। जिसने भारत से कागजों में गरीबी दूर करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। योजना आयोग के अध्यक्ष और भारत के प्रधानमंत्री की जादुई छड़ी शायद यही रिपोर्ट है जिसे वो इतने दिन से ढूंढ़ रहे थे।

बस कीमतें इधर-उधर हुई हैं
15 साल पहले एक समोसा 50 पैसे का और एक फोन कॉल 7 रुपए की। आज एक फोन कॉल 50 पैसे की और एक समोसा 7 रुपए का। महंगाई बढ़ी नहीं बस कीमतें इधर-उधर हुईं हैं। - मनमोहन सिंह

रविवार, 31 जुलाई 2011

बिट्टो

बीना स्टेशन। स्वर्णजयंती एक्सपे्रस। २७ जुलाई २०११। सार्थक ग्वालियर से भोपाल जा रहा था। उसकी भोपाल में पोस्टिंग हो गई थी। वह वहां एक अखबार में काम करता है। बीना स्टेशन पर ट्रेन को रुके हुए १५ मिनट से ज्यादा वक्त बीत गया था। सभी यात्री गर्मी और उमस से बेहाल थे। महीना तो सावन का था, लेकिन भीषण गर्मी और पसीने से तरबतर शरीर से चैत्र मास का अहसास हो रहा था। कई लोग उमस से परेशान हो कर डिब्बे से उतरकर प्लेटफार्म पर खड़े हो गए थे। जिसके हाथ जो था वह उसी से हवा करने की कोशिश में था। सब की एक ही चाह थी कि जल्द ही ट्रेन चल दे तो थोड़ी राहत मिले।
'अहा! ट्रेन चल दी।' एक हल्के से झटके से सार्थक को यह अहसास हुआ। उसने सुकून की लम्बी सांस खींची और सीट से अपनी पीठ टिका दी। ट्रेन ने हल्की गति भी पकड़ ली।
लेकिन तभी, 'उफ! यह क्या हुआ?'  प्लेटफार्म पर बदहवास चीखते-चिल्लाते ट्रेन के बराबर में एक महिला को भागते देखकर अनायस सार्थक के मुंह से निकला। वह जोर-जोर से बिट्टो-बिट्टो पुकार रही थी। बिट्टो शायद उसकी बेटी का नाम था। जो ट्रेन में अपने पिता के साथ सफर कर रही थी। हां, बिट्टो उसी की बेटी है। कोई १०-११ साल की लड़की। सार्थक को याद आया कि थोड़ी देर पहले ही तो वह मेरी खिड़की के पास खड़ी थी। वह अपने पति और बेटी को छोडऩे स्टेशन आई थी। उस समय गर्मी से परेशान सार्थक के कानों में भी उनकी बातें घुल रहीं थीं। वह अपने पति से कह रही थी-  'मुझे भी साथ चलना है।'
'हां बाबा। मैं जल्द ही तुम्हें ले जाऊंगा।' पति लाड़ से उसे समझाते हुए कह रहा था।
'जल्द ही मतलब जल्द ही मुझे ले जाना और हां ट्रेन में बिट्टो का ध्यान रखना। पानी की बोटल रख ली या नहीं। गर्मी बहुत है।' - महिला ने अपने पति को हिदायत देते हुए कहा।
इसके बाद सार्थक खुद अपने सुबह में खो गया। सुबह जब वह तैयार हो रहा था तो उसकी पत्नी के भी लगभग यही वाक्य थे। भारतीय नारियों के हृदय में कितना साम्य होता है। अगर वह पश्चिमी जीवन शैली की चपेट में न आई हो तो। खैर...
फिर अचानक इसे क्या हुआ? ये इस तरह क्यों चीख रही है? तरह-तरह के उलझे हुए सवाल सार्थक के दिमाग में दस्तक देने लगे। अच्छा खुद ही उनके तरह-तरह जवाब भी तलाश रहा था। ट्रेन जब तक रुकी थी बेटी और पति उसके पास थे, लेकिन जैसे ही गाड़ी ने चलना शुरू किया होगा उसकी ममता जाग उठी होगी। उसकी छाती बेटी से बिछडऩे के भय से बैठने लगी होगी। मां आखिर मां होती है। हां यही कारण तो मौजूं दिखता है। उसके इस तरह बेसुध होकर बिट्टो-बिट्टो पुकारते हुए भागने के लिए। बेटी से बिछडऩे की पीढ़ा उसके चेहरे से साफ झलक रही थी। पति से दूर रहने का गम एक बारगी भारतीय स्त्री सह सकती है, लेकिन अपने बच्चों से दूर उससे नहीं रहा जाता। हां, यही सच है।
गाड़ी तेज होती जा रही थी। वह अब भी और जोर लगाकर दौड़ रही थी। आंखों से आंसुओं की नदी बह रही थी। वह बिट्टो के अलावा और कुछ बोल भी नहीं पा रही थी। उस क्षण सार्थक के मन में एक ही बात ने जोर मारा। जल्दी से चेन खींचकर गाड़ी को रोका जाए। यह सोचते हुए सार्थक ने चेन पुलिंग के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि गाड़ी से कूदता हुआ उसका पति उसे दिखा। गाड़ी से इस तरह उतरते समय वह गिरते-गिरते बचा था।
'क्या हुआ? क्या बात है?' उसने अपनी पत्नी का चेहरा दोनों हाथों में भरकर उससे पूछा। ऐसी किसी स्थिति में पुरुष अक्सर क्रोधित हो जाते हैं। उसने विस्मय और परेशानी के लहजे में यह पूछा था। लेकिन, अब भी महिला के मुंह से सिवाय बिट्टो के कुछ नहीं निकला। वह और कुछ नहीं कह पाई। इस पर भागते हुए उस युवक ने गाड़ी से अपनी बेटी को उतारा। प्लेटफार्म पर तीनों मां-पिता और बेटी एक दूसरे से लिपटकर खड़े हो गए। महिला अभी भी सिसक-सिसक कर रो रही थी। उसके पति की भी आंखे नम हो गई थी। उसने पत्नी और बेटी को अपने कलेजे से ऐसे चिपका लिया जैसे सालों बाद उनसे मिला हो। सार्थक भी नम पलकों से उन्हें तब तक निहारता रहा। जब तक वे उसे नजर आए। इसके बाद भोपाल तक रास्ते भर वे उसके जेहन में बने रहे।

दो शब्द : यह एक सत्य घटना है। जिससे मैं बहुत प्रभावित हुआ। इसे मैंने एक लघुकथा का रूप देने की कोशिश की है। पता नहीं सफल रहा या असफल। इतना तो पता है कि मैं उस मां निश्चल प्रेम और अपनी बेटी के लिए उसकी तड़प अंकित करने में असफल रहा।

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

धमाके होते रहेंगे

 मुं बई में बुधवार (१३ जुलाई २०११) को तीन जगह बम विस्फोट हुए। मुम्बा देवी मंदिर के सामने झवेरी बाजार में। दूसरा ओपेरा हाउस के पास चेंबर प्रसाद में और तीसरा दादर में। तीनों विस्फोट १० मिनट में हुए। इनमें अब ३१ लोगों की मौत हो चुकी है १२० से अधिक गंभीर हालत में अस्पताल में मौत से संघर्ष कर रहे हैं।
          भारत में यह आश्चर्यजनक घटना नहीं है। इसलिए चौकने की जरूरत नहीं। शर्मनाक जरूर है। दु:खद है। देशवासियों को ऐसे धमाकों की आदत डाल लेनी होगी, क्योंकि जब तक देश की राजनैतिक इच्छाशक्ति गीदड़ों जैसी रहेगी तब तक धमाके यूं ही होते रहेंगे। हमारे (?) नेता गीदड़ भभकियां फुल सीना फुलाकर देते हैं। करते कुछ नहीं। एक तरफ अन्य देश हैं जो करके दिखाते हैं फिर कहते हैं। अमरीका को ही ले लीजिए। उसने देश के नंबर वन दुश्मन को एड़ीचोटी का जोर लगाकर ढूंढ़ा और उसे उसके बिल में घुसकर मार गिराया। इस घटना के वक्त भी हमारे (?) नेताओं ने आतंकियों को अमरीका अंदाज में मारने की गीदड़ भभकी दी थी। लेकिन, हुआ क्या? मुंबई में ये धमाके। हमारे खुफिया तंत्र को इनकी खबर ही नहीं थी। इसके अलावा देश के शीर्ष विभागों में क्या गजब का तालमेल है यह भी धमाकों के बाद उजागर हो गया। मृतकों की संख्या को लेकर मुंबई पुलिस कमिश्नर कुछ जवाब दे रहे थे, मुख्यमंत्री के पास कुछ दूसरे ही आंकड़े थे और गृहमंत्री अपना ही सुर आलाप रहे थे। किसी के पास कोई ठोस जानकारी नहीं। देश की जनता किसकी बात पर भरोसा करे। 
        भारत की राजनीति भयंकर दूषित हो चुकी है। वोट बैंक की घृणित राजनीति के चलते देशधर्म दोयम दर्जे पर खिसका दिया गया है। इसी वोट बैंक की राजनीति के चलते भारत की 'आत्मा' (संसद) और मुंबई के 'ताज' होटल पर हमला करने वाले आतंकियों को अब तक फांसी पर नहीं लटकाया जा सका है। कांग्रेस उन्हें मुस्लिम वोट बैंक के 'महाप्रबंधक' के रूप में देखती है। उनकी सुरक्षा व्यवस्था पर सरकार करोड़ों रुपए फूंक रही है। पिछले साल ही उजागर हुआ था कि अफजल और कसाब को जेल में 'रोटी और बोटी' की शानदार व्यवस्था है। बम फोड़कर निर्दोष लोगों की हत्या कर उन्हें जिस 'जन्नत' के ख्वाब दिखाए गए थे वह उन्हें भारतीय जेलों में ही नसीब हो गई। कितनी शर्मनाक स्थिति है कि देश ही नहीं वरन् मानवता के दो बड़े अपराधी इस देश में वोटों की तराजू पर तोले जाते हैं। नेता उनकी फांसी को ऐन केन प्रकारेण टालने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। जहां हत्यारों को इतनी सहूलियत और इज्जत बख्शी जाए वहां कौन मूर्ख बम नहीं फोडऩा चाहेगा। देश के वरिष्ठ नेता मानवता के दुश्मनों की मौत का मातम मनाते हैं। उन्हें 'जी' और 'आप' लगाकर संबोधित करते हैं। उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर देश के शहीदों का अपमान करते हैं। निरे बेवकूफ हैं जो चेन झपटते हैं, छोटी-मोटी लूट मार कर रहे हैं। उन्हें इस देश में इज्जत और शोहरत चाहिए तो बम फोडऩे होंगे। हो सकता है देश की राजनीति का यही हाल रहा तो देर सबेरे इन्हें अक्ल आ ही जाएगी। फिर ये भी हमारे माथे बम फोड़ेंगे। इसलिए इस देश में बम धमाके होते रहेंगे।
       धमाके वाकई रोकने हैं तो दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है। आतंकियों के दिलों में खौफ पैदा करने की जरूरत है। आतंकियों और उनके मनसूबों को कुचलना ही है तो वोट बैंक की राजनीति का त्याग करना होगा। राजनीति में देशधर्म और जनता के हित सर्वोपरि रखने होंगे। अब भी यदि आतंकियों से कैसे निपटना है देश के कर्णधारों को नहीं सूझ रहा हो। उनकी बुद्धि पर ताला पड़ गया हो तो ब्रिटेन और अमरीका से सीख ली जा सकती है। जिन्होंने अपने देश में आतंक की एक-दो घटनाओं के बाद उसे फिर सिर नहीं उठाने दिया। कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी धरती पर पनप रहे आतंक के भ्रूण की ही हत्या कर दी। उसे सपोला तक नहीं बनने दिया। इजराइल से भी प्रेरणा ली जा सकती है। जो चारों ओर से दुश्मनों से घिरा है। फिर भी मजाल है किसी की, इजराइल की तरफ आंख उठाकर भी देख ले। यहां आतंक इसलिए नहीं फनफना सका, क्योंकि यहां राष्टधर्म और राष्ट्रहित प्राथमिक हैं। यहां वोट बैंक की घृणित राजनीति नहीं। चंद वोटों की खातिर देश को बारूद के मुहाने खड़ा करने की सोच यहां की राजनीति में नहीं है। अपने नागरिकों को बेवजह मरने से बचाने के लिए बिखर रहा ब्रिटेन भी शेर हो गया। नतीजा आज उसके नागरिक बेफिक्र सोते हैं। अमरीका तो एक घटना के बाद से आज तक आतंकियों के पीछे 'तीर-कमान' लेकर पड़ गया है। वह अपने देश के नंबर एक दुश्मन का सफाया तो कर ही चुका है, उसके बाद भी शांत नहीं है। आतंक को पस्त करने की उसने ठान रखी है। वह अब भी आतंकियों को ओसामा बिन लादेन के पास भेज रहा है। इसके लिए उसने पाकिस्तान से भी बिगाड़ कर ली है। 
     ऐसा भी नहीं है कि भारत यह सब करने में समर्थ नहीं है। उसके पास आतंकियों से निपटने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं है। ये सब है उसके पास। बस नहीं है तो राजनैतिक इच्छाशक्ति। इसी राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव के चलते आतंकियों के हौसले बुलंद हैं। वे बार-बार देश के किसी न किसी हिस्से में धमाके करते रहते हैं। देश की सुरक्षा इंतजामों का हाल तो यह है कि हम मुंबई की सुरक्षा व्यवस्था ही पुख्ता नहीं रख पा रहे हैं। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में यह पहला धमाका नहीं है। मुंबई में पहली बार सिलसिलेबार धमाके १९९३ में हुए थे। उसके बाद २००२, २००३, २००६ और २००८ में भी धमाके होते रहे। १९९३ से अब तक मुंबई में ही करीब ७०० लोगों की जान हम गवां चुके हैं। इसके बाद भी हम सबक लेने को तैयार नहीं। बयानबाजी और वोट बैंक की परवाह छोड़कर हमें कुछ अमरीका और ब्रिटेन की नीति को अपनाना होगा। हमारी सेना में वो कुव्वत है। वे आतंक के सफाए के लिए अपनी मंशा भी जता चुके हैं। देश के कर्णधारों को आतंक को मिटाने के लिए कुछ ठोस नीति बनानी होगी। वरना तो यूं ही धमाके होते रहेंगे और हम अपने प्रियजनों को खोते रहेंगे।

शनिवार, 25 जून 2011

देश बांट कर रहेगी कांग्रेस

'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण अधिनियम-२०११' की आग में जलेगा देश। कांग्रेस काटेगी वोटों की फसल। बहुसंख्यकों पर होगा अत्याचार।

 कां ग्रेस की नीतियां अब देशवासियों की समझ से परे जाने लगी हैं। संविधान की शपथ लेकर उसकी रक्षा और उसका पालन कराने की बात कहने वाली यूपीए सरकार संविधान विरुद्ध ही कार्य कर रही है। उसने देश को एकसूत्र में फिरोने की जगह दो फाड़ करने की तैयारी की है। वोट बैंक की घृणित राजनीति के फेर में कांग्रेस और उसके नेताओं का आचरण संदिग्ध हो गया है। हाल के घटनाक्रमों को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि कांग्रेस फिर से देश बांट कर रहेगी या फिर देश को सांप्रदायिक आग में जलने के लिए धकेलकर ही दम लेगी। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक-२०११' तैयार किया है। लम्बे समय से सब ओर से इस विधेयक का विरोध हो रहा है। लगभग सभी विद्वान इसे 'देश तोड़क विधेयक' बता रहे हैं। इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ माना जा रहा है। इसे कानूनी जामा पहनाना देश के बहुसंख्यकों को दोयम दर्जे का साबित करने का प्रयास है। इसके बावजूद कांग्रेस की सलाहकार परिषद ने बीते बुधवार को इसे संसद में पारित कराने के लिए सरकार के पास भेज दिया।
          'समानांतर सरकार' नहीं चलने देंगे। 'सिविस सोसायटी' को क्या अधिकार है विधेयक तैयार करने का। यह काम तो संसद का है। इस तरह के बहानों से लोकपाल बिल का विरोध करने वाले सभी कांग्रेसी इस विधेयक को पारित कराने के लिए जी जान से जुट जाएंगे। वह इसलिए कि इस विधेयक को उनकी तथाकथित महान नेता सोनिया गांधी के नेतृत्व में तैयार कराया गया है, किसी अन्ना या रामदेव के नेतृत्व में नहीं। इसलिए भी वे पूरी ताकत झोंक देंगे ताकि इस विधेयक के नाम से वे अल्पसंख्यकों के 'वोटों की फसल' काट सकें। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के सुझाव मानने से तो उनकी 'लूट' बंद हो जाती। जबकि यह विधेयक उन्हें भारत को और लूटने में मददगार साबित होगा। कांग्रेस की यह 'दादागिरी' कि हम पांच साल के लिए चुनकर आए हैं हम जो चाहे करेंगे। इससे देश का मतदाता स्वयं को अपमानित महसूस कर रहा है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन में बड़ी भारी संख्या में शामिल होकर उसने कांग्रेस को बताने का प्रयास किया कि उसकी नीतियां देश के खिलाफ हो रही हैं। वक्त है कांग्रेस पटरी पर आ जाए, लेकिन सत्ता के मद में चूर कांग्रेस आमजन की आवाज कहां सुनती है। आप खुद तय कर सकते हैं कि यह विधेयक देश में सांस्कृतिक एकता के लिए कितना घातक है। फिर आप तय कीजिए क्या ऐसे किसी कानून की देश को जरूरत है? क्या ओछी मानसिकता वाली कांग्रेस की देश को अब जरूरत है? क्या यूपीए सरकार की नीतियां और उसका आचरण देखकर नहीं लगता कि शासन व्यवस्था में 'देशबंधु' कम 'देशशत्रु' अधिक बैठे हैं? क्या कांग्रेस नीत यूपीए सरकार को पांच साल तक सत्ता में बने रहने का अधिकार है? क्या इस तरह देश में कभी चैन-अमन कायम हो सकेगा? क्या इससे 'बहुसंख्यक' अपने को कुंठित महसूस नहीं करेगा?

'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक-२०११' कहता है...

1- 'बहुसंख्यक' हत्यारे, हिंसक और दंगाई प्रवृति के होते हैं। (विकीलीक्स के खुलासे में सामने आया था कि देश के बहुसंख्यकों को लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की इस तरह की मानसिकता है।) जबकि 'अल्पसंख्यक' तो दूध के दुले हैं। वे तो करुणा के सागर होते हैं। अल्पसंख्यक समुदायक के तो सब लोग अब तक संत ही निकले हैं।
2- दंगो और सांप्रदायिक हिंसा के दौरान यौन अपराधों को तभी दंडनीय मानने की बात कही गई है अगर वह अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्तियों के साथ हो। यानी अगर किसी बहुसंख्यक समुदाय की महिला के साथ दंगे के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति बलात्कार करता है तो ये दंडनीय नहीं होगा।
3- यदि दंगे में कोई अल्पसंख्यक घृणा व वैमनस्य फैलता है तो यह अपराध नहीं माना जायेगा, लेकिन अगर कोई बहुसंख्यक ऐसा करता है तो उसे कठोर सजा दी जायेगी। (बहुसंख्यकों को इस तरह के झूठे आरोपों में फंसाना आसान होगा। यानी उनका मरना तय है।)
4- इस अधिनियम में केवल अल्पसंख्यक समूहों की रक्षा की ही बात की गई है। सांप्रदायिक हिंसा में बहुसंख्यक पिटते हैं तो पिटते रहें, मरते हैं तो मरते रहें। क्या यह माना जा सकता है कि सांप्रदायिक हिंसा में सिर्फ अल्पसंख्यक ही मरते हैं?
5- इस देश तोड़क कानून के तहत सिर्फ और सिर्फ बहुसंख्यकों के ही खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। अप्ल्संख्यक कानून के दायरे से बाहर होंगे।
6- सांप्रदायिक दंगो की समस्त जवाबदारी बहुसंख्यकों की ही होगी, क्योंकि बहुसंख्यकों की प्रवृति हमेशा से दंगे भडकाने की होती है। वे आक्रामक प्रवृति के होते हैं।
७- दंगो के दौरान होने वाले जान और माल के नुकसान पर मुआवजे के हक़दार सिर्फ अल्पसंख्यक ही होंगे। किसी बहुसंख्यक का भले ही दंगों में पूरा परिवार और संपत्ति नष्ट हो जाए उसे किसी तरह का मुआवजा नहीं मिलेगा। वह भीख मांग कर जीवन काट सकता है। हो सकता है सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का दोषी सिद्ध कर उसके लिए जेल की कोठरी में व्यवस्था कर दी जाए।
८- कांग्रेस की चालाकी और भी हैं। इस कानून के तहत अगर किसी भी राज्य में दंगा भड़कता है (चाहे वह कांग्रेस के निर्देश पर भड़का हो।) और अल्पसंख्यकों को कोई नुकसान होता है तो केंद्र सरकार उस राज्य के सरकार को तुरंत बर्खास्त कर सकती है। मतलब कांग्रेस को अब चुनाव जीतने की भी जरूरत नहीं है। बस कोई छोटा सा दंगा कराओ और वहां की भाजपा या अन्य सरकार को बर्खास्त कर स्वयं कब्जा कर लो।

सोनिया गांधी के नेतृत्व में इन 'देशप्रेमियों' ने 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक-२०११' को तैयार किया है।
१. सैयद शहबुदीन
२. हर्ष मंदर
३. अनु आगा
४. माजा दारूवाला
५. अबुसलेह शरिफ्फ़
६. असगर अली इंजिनियर
७. नाजमी वजीरी
८. पी आई जोसे
९. तीस्ता जावेद सेतलवाड
१०. एच .एस फुल्का
११. जॉन दयाल
१२. जस्टिस होस्बेट सुरेश
१३. कमल फारुखी
१४. मंज़ूर आलम
१५. मौलाना निअज़ फारुखी
१६. राम पुनियानी
१७. रूपरेखा वर्मा
१८. समर सिंह
१९. सौमया उमा
२०. शबनम हाश्मी
२१. सिस्टर मारी स्कारिया
२२. सुखदो थोरात
२३. सैयद शहाबुद्दीन
२४. फरह नकवी

शुक्रवार, 17 जून 2011

‘दूर हट ये फिरंगी, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’

सुबह के आठ बज रहे थे। उस दिन मैं जल्दी जाग गया था। चार बजे उठने वाले लड़के की नींद पत्रकारिता के पेशे में आने के बाद से औसतन 10 बजे खुलने लगी है। खैर, मैं नित्य की तरह शहर के खास समाचार-पत्र पढ़ रहा था। बाहर बच्चे खेल रहे थे। तभी एक जोर की आवाज आई-‘दूर हट ये फिरंगी, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।’ जैसी ही यह सुना, मन गदगद हो गया। मैं तुरंत ही बालकनी में पहुंचा। देखा कि एक छोटी सी बच्ची लकड़ी की तलवार से एक छोटे लड़के से लड़ाई कर रही है। उसके बाद में अपने कमरे में आ गया। अखबार पढ़ने का क्रम जारी रहा। इसी बीच रह-रह कर यह ख्याल जेहन में आ रहा था कि टेलीविजन पर जो प्रसारित हो रहा है उसका असर होता है। दरअसल, जी टीवी चैनल पर वीरांगना लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित कार्यक्रम का प्रसारण किया जा रहा है। मेरा भी यह पसंदीदा कार्यक्रम है। ‘दूर हट ये फिरंगी, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ उसी कार्यक्रम का प्रमुख डायलोग है। निश्चित तौर पर वह बालिका इस कार्यक्रम को देखती होगी।
     इस वाकये के बाद से उन लोगों की बात वजनदार दिख रही थी जो कहते हैं कि टेलीविजन पर अच्छे कार्यक्रम प्रसारित होने चाहिए। घटिया किस्म के कार्यक्रमों को देखने से समाज में विकृतियों का जन्म हो रहा है। वहीं वे लोग झूठे किस्म के लगे जो कहते हैं कि टेलीविजन पर प्रसारित कार्यक्रम तो समाज का ही आईना है। समाज में जो चल रहा है वही हम दिखा रहे हैं। अब भला इस बच्ची को देखकर तो झांसी की रानी के जीवन पर आधारित कार्यक्रम नहीं बनाया गया होगा। सत्य तो यही है कि झांसी की रानी सीरियल को देखकर उसने यह सीखा होगा। वैसे भी सदा से इसी बात पर जोर दिया जाता रहा है कि जो जैसा खाता है, देखता है, सुनता है और जैसा पढ़ता है उसके आचरण में वह झलकता है। परिवार छोटे हो गए हैं। घर में कहानी सुनाने को दादा-दादी है नहीं। मां-पिता दोनों ने अर्थ उपार्जन की जिम्मेदारी संभाल रखी है। ताकि इस महंगाई में गुजर हो सके। बच्चों के पालक मशीनी यन्त्र हो गए हैं। वे या तो कंप्यूटर गेम खेलकर अपना समय व्यतीत करते हैं या फिर टीवी से चिपके रहते हैं। क्या अच्छा है और क्या बुरा। इसकी उन्हें समझ नहीं होती। जो उनके बाल सुलभ मन को अच्छा लगता है वे उसे देखने लगते हैं। लगभग सभी चैनल पर फूहड़ता परोसी जा रही है। ऐसे में जिसे वो देख रहे होते हैं उसका उनके जीवन पर असर होता है। इसलिए टीवी कार्यक्रम निर्माताओं को कार्यक्रम बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका बच्चों और समाज के युवा वर्ग पर विपरीत प्रभाव न पड़े।
     वैसे आज झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की शहादत का दिन है। रानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी नगरी में मोरोपंत तांबे के घर में 19 नवम्बर 1835 को हुआ था। मां का नाम था भागीरथी। जन्म के समय लक्ष्मीबाई का नाम रखा मणिकर्णिका। 14 वर्ष की उम्र में झांसी नरेश गंगाधर राव नेवालकर से उनका विवाह हो गया। विवाह बाद ही उनका नाम रानी लक्ष्मीबाई रखा गया। रानी बचपन से ही अंग्रेजों का विरोध करती रहीं। अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए ही मनु ने बचपन में ही शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा ले ली थी। रानी का जीवन संघर्ष से बीता। लगभग हर एक भारतीय उनकी कहानी से परिचित है। अंग्रेजों के विरूद्ध 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अभूतपूर्व रहा। इसी बीच वह काला दिन आया जब रानी इस दुनिया से चली गईं। 17 जून 1857 को ग्वालियर में अंग्रेजों से युद्ध करते समय रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं। उस महान आत्मा को मेरी ओर से कोटिशः प्रणाम।

गुरुवार, 16 जून 2011

कांग्रेस को भारी पड़ेगी यह गलती

कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों को चोट पहुंचाई
 बा बा रामदेव के अनशन को खत्म करने के लिए रात को सोए हुए निर्दोष लोगों पर जिस तरह से लाठियां बरसाई गईं उससे तो इमरजेंसी की याद ताजा हो गई। जलियावाला बाग जैसी घटना है यह। पुलिसिया बर्बरता और अत्याचार की हद हो है। ऐसा तो अंग्रेजों के जमाने में होता था। आखिर कांग्रेस तमाम समस्याओं से घिरे आमजन का दमन कर सिद्ध क्या करना चाहती है। हर ओर यही चर्चा आम है। चार-पांच जून की दरमियानी रात को दिल्ली के रामलीला मैदान में इस घटना को अंजाम दिया गया। मेरी छह-सात जून यानी दो दिन ट्रेन, बस, टेम्पो और आॅटो में सफर में बीते। तब मैंने देखा की हर ओर इस मसले पर कांग्रेस की निंदा हो रही है। सबके अपने-अपने सवाल हैं, जवाब हैं। लेकिन, जहां तक मेरा मानना है अनशन के पूर्व से सरकार जितना घबरा रही थी उससे कहीं अधिक अपने ही मूर्खतापूर्ण कृत्य से कांप रही है। कांग्रेस को इस दफा उसकी चतुराई महंगी पड़ती दिख रही है। बौराई कांग्रेस ने मामले पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए उन सभी राज्यों की सरकारों को बाबा रामदेव के खिलाफ हल्ला बोलने के निर्देश दे दिए, जहां उनकी सरकार है या उनके समर्थन की सरकार है। उनसे कह दिया कि बाबा रामदेव के भाजपा और आरएसएस के रिश्तों पर कुछ भी बोलो। चाहे रिश्ता हो या न हो, लेकिन तुम चीखो जितना चीख सकते हो। बाबा की संपत्ति, चरित्र पर अंगुली उठाओ। कांग्रेस के इस रुख को देखकर लगता है कि या तो कांग्रेस ने अपना आपा खो दिया है या फिर वह हिटलर के प्रोपागण्डा मिनिस्टर जोसेफ गोएबल्स के सूत्र- ‘एक झूठ को सौ बार पूरी ताकत से बोलो तो वह सच जैसा लगने लगता है।’ का पालन कर रही है। 
    कांग्रेस ने हजारों बेगुनाह लोगों पर लाठियां बरसवाकर संविधान का खुला मजाक बनाया है। भारत का संविधान अनुच्छेद 19 के तहत देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। हर किसी को लिखकर, बोलकर या अन्य किसी माध्यम से अपनी बात कहने का मौलिक अधिकार है। बस वह देशद्रोह और सांप्रदायिकता को बढ़ावा न देता हो। अनुच्छेद 19 बी के तहत शांतिपूर्ण और निशस्त्र सम्मेलन करने की आजादी भी दी गई है। इसके अलावा इसी अनुच्छेद के डी उपवर्ग के अनुसार भारत के नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में अबाध संचरण की आजादी मिली हुई है। ये सब व्यवस्थाएं इसलिए की गईं हैं कि ताकि आप अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से देश के किसी भी भू-भाग में जाकर कह सको। बाबा रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ किया शुरू किया गया आंदोलन और अनशन संविधान के मुताबिक जायज है उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता। भ्रष्टाचार की समस्या से आज देश का हर नागरिक परेशान है। हाल ही आई एक रिपोर्ट के मुताबिक देश का हर तीसरा आदमी कभी न कभी भ्रष्टाचार का शिकार होता है। यही कारण है कि बाबा रामदेव के आंदोलन को पूरे देश से इतना समर्थन मिल रहा था। बाबा रामदेव के मामले में सरकार ने इन मौलिक अधिकारों का खुलकर हनन किया है। हजारों उन लोगों के मौलिक अधिकार को चोट पहुंचाई गई है जो उस आंदोलन का हिस्सा हैं। रामदेव के दिल्ली में प्रवेश पर रोक लगाकर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 19 डी का हनन किया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहा यह आंदोलन शांतिपूर्ण था। संविधान अनुच्छेद 19 बी के तहत शांतिपूर्ण तरीके से आयोजन की इजाजत देता है। तब फिर क्यों सरकार ने पुलिस के माध्यम से आधी रात को लाठियां बरसाकर हजारों लोगों को रामलीला मैदान से खदेड़ा। जिनमें महिलाएं, बच्चे और वृद्ध शामिल थे। इसमें मानवाधिकारों और महिला अधिकारों का भी हनन हुआ।
    आंसू गैस के गोले खुले भाग में दागने का नियम है। लेकिन, तमाम नियमों को ताक पर रख पुलिस ने पांड़ाल के भीतर आंसू गैस के गोले छोड़े। इस दौरान मंच पर भी आग लग गई। पुलिस की इस लापरवाही से बड़ा हादसा भी हो सकता था। मैदान में हजारों लोगों की जान मुश्किल में आ सकती थी। धारा 144 भी उपद्रव होने या उसकी आशंका की स्थिति में लागू की जाती है। सवाल उठता है कि निहत्थे और सोते हुए लोग क्या उपद्रव कर सकते थे। कांग्रेस के इशारे पर हुई इस कार्रवाई ने पूरे देश को झझकोर कर रख दिया है। संविधान द्वारा देश के नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों को भी तार-तार कर दिया है। लोगों का आक्रोश देख कर लग रहा है कि भविष्य में कांग्रेस को यह गलती बहुत भारी पड़ेगी।
    कांग्रेस नीत यूपीए सरकार का इस कार्रवाई से दोगला चेहरा भी उजागर होता है। एक ओर सरकार दिल्ली में आकर देशद्रोह और अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले लोगों का संरक्षण करती दिखती है। वहीं दूसरी ओर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी परेशानी बयां सकते लोगों का दमन करते दिखती है। इसी सरकार ने कश्मीर को लेकर दिल्ली में ही जहर उगलते लोगों पर एक एफआईआर तक दर्ज नहीं की। कश्मीर के पत्थरबाजों को शांत करने के लिए 100 करोड़ का राहत पैकेज जारी किया। जबकि वे देशहित में पत्थर कतई नहीं बरसा रहे थे, भाड़े पर और आईएसआई के कहने पर सेना पर पत्थरबाजी कर रहे थे। इतना ही नहीं सरकार इससे भी चार कदम आगे चली गई। सुप्रीम कोर्ट में देशद्रोह का मामला विचाराधीन होने के बावजूद बिनायक सेन को राष्ट्रीय योजना आयोग की समिति में शामिल कर लिया गया। हमेशा नक्सलियों से वार्ता का आतुर सरकार ने इन निर्दोश लोगों पर लाठियां क्यों चलाईं समझ से परे है। इसी कांग्रेस के कुछ नुमाइंदे दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी ओसामा बिन लादेन की मौत पर विधवा विलाप करते हैं और उसे ‘आप’ व ‘जी’ लगाकर संबोधित करते हैं वहीं देशहित में आवाज उठा रहे बाबा रामदेव को ठग कह रहे हैं। आश्चर्य है।
    आश्चर्य इस पर भी है कि मानवता के पैरोकार और गरीबों के मसीहा राहुल गांधी पूरे एपीसोड में कहीं नजर नहीं आ रहे। जबकि भट्टा परसौल में महिलाओं पर हुए अत्याचार पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने खूब प्रलाप किया किया था। लेकिन, यहां आधी रात को हुई पुलिसिया कार्रवाई में महिलाओं और बच्चों की दुर्दशा पर एक आंसू तक नहीं टपकाया। एक लाइन बोलकर भी पूरे घटनाक्रम का विरोध नहीं किया। वहीं हमारे प्रधानमंत्री ने इस पर भी अपनी मजबूरी जाहिर कर दी। वैसे उनसे देश की जनता को और दूसरे बयान की उम्मीद भी नहीं थी।
    अनशन के प्रारंभ से लेकर इस काण्ड तक बाबा रामदेव की भी कुछ गलतियां रहीं। यथा: जब सरकार बाबा से बात करने स्वयं आ रही थी तो बाबा को उसके पास स्वयं जाने की जरूरत नहीं थी। बाबा को बातचीत के लिए एक प्रतिनिधि मंडल भेजना चाहिए था, खुद को हर काम में आगे नहीं रखना था। बाबा ने अन्ना हजारे की भी चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने साफ कह दिया था कि यह सरकार दगाबाज है। कभी भी सरकार पीठ में छुरा घोंप सकती है। बाबा भूल गए कि उनका मुकाबला सरकार की चालाक चौकड़ी से था। कपिल सिब्बल सरकार ऐसे चतुर वफादार सिपाही है जिसने दुनिया की आंखों में धूल झौंकने की पूरी कोशिश की थी। कपिल सिब्बल ने पता नहीं गणित के किस नायाब फार्मूला से सिद्ध कर दिया था कि 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ ही नहीं है। ऐसे चुतर लोगों की चाल में बाबा फंस गए थे। लेकिन, पता नहीं किसकी मति ने फेरी खाई और रात में सोते हुए लोगों पर आंसू गैस के गोले छुड़वा दिए, लाठियां चलवा दीं। इनमें हजारों की संख्या में महिलाएं और उनके साथ आए बच्चे शामिल थे। कल्पना करिए कि ऐसी अफरा-तफरी में वृद्धों, महिलाओं और बच्चों की क्या हालत हुई होगी। वह भी दिल्ली जैसे शहर में आधी रात को। बताया जा रहा है कि पांच हजार लोग अभी तक अपने सगे-संबंधियों से बिछड़े हुए हैं।
    लाख विरोध के बाद भी कांग्रेस अभी तक अपनी इस कार्रवाई को जायज ठहरा रही है। घटना के बाद कांग्रेस ने बाबा रामदेव की संपत्ति का हिसाब-किताब लगाने में, उनकी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी से संबंध की खोज-खबर लेने में ओर बाबा रामदेव के कारोबार को सूचीबद्ध करने में जितनी सक्रियता दिखाई है, अगर उतनी कालाधन वापस लाने में दिखाई होती तो देश का कुछ भला होता। भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में और भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई ठोस कानून बनाने में तत्परता दिखाई होती तो शायद लोगों को इतने बड़े आंदोलन में शामिल होने की नौबत ही नहीं आती। लेकिन, कांग्रेस की मंडली में जमा भ्रष्ट नेताओं की ऐसी मंशा है ही नहीं। खैर, अभी तो इसे आंदोलन की शुरुआत ही माना जाना चाहिए। अगर बाबा रामदेव सरकार को माफ करके अनशन वापस भी ले ले तो जल्द ही कोई न कोई एक नया अन्ना हजारे या बाबा रामदेव भ्रष्टाचार, महंगाई, बेलगाम होती कानून व्यवस्था से पीड़ित जनता का नेतृत्व करने आ सामने आ ही जाएगा। 
यह लेख भोपाल से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र एलएन स्टार के ११ जून को प्रकाशित अंक में भी पढ़ा जा सकता है.

रविवार, 5 जून 2011

आप को कुछ कहने का अधिकार नहीं!

 आ प अपना काम करें, देश की समस्याओं पर बोलने का कोई अधिकार आपको नहीं है। अगर आप डाक्टर हैं तो लोगों का इलाज करें। शिक्षिक हैं तो सिर्फ वही पढ़ाएं जो किताबों में लिखा है। इंजीनियर है तो बिल्डिंग बनाएं, देश निर्माण करने की आवश्यकता नहीं। यही संदेश दिया है कांग्रेस ने चार-पांच जून की दरमियानी रात रामलीला मैदान में योग गुरु बाबा रामदेव के अनशन पर बर्बर कार्रवाई कर। कांग्रेस और उनके नेताओं ने मीडिया के सामने खुलकर कहा कि हमने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन कर रहे इस देश के नागरिकों पर आंसू गैस के गोले दागकर और लाठियां भांज कर एकदम सही किया है। इतना ही नहीं उन्होंने उन तमाम लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई करने का मन बना लिया है, जिन्होंने बाबा रामदेव का साथ दिया है या जिन्होंने भ्रष्टाचार के विरोध में अपनी आवाज उठाने का प्रयास किया। पूरी कांग्रेस और उनके बड़बोले नेता बकबक करने में लगे हैं कि बाबा रामदेव योग गुरु हैं, उन्हें लोगों को सिर्फ योग सिखाने का काम ही करना चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश जागरण की जरूरत नहीं। उनकी मंशा साफ देश को लूटने की दिखती है। वे चाहते हैं कि हम आराम से भ्रष्टाचार करते रहें और कोई हमें कुछ न कहे। उन्हें पता है जनता जाग गई तो हमने देश में जो लूट-खंसोट मचा रखी है वह बंद करनी पड़ेगी। मुझे आज तक यह समझ नहीं आया कि यह कौन सा तर्क है कि आप जो काम कर रहे हैं वही करें। देश की समस्याओं के बारे में कुछ भी कहने का आपको अधिकार नहीं। अरे, इस देश के हर एक नागरिक का अधिकार है कि वह देश में चल रही गड़बड़ियों को उजागर कर सके, उनके खिलाफ आवाज बुलंद करे। इस देश में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में राजपाठ में साधु-संतो, शिक्षिकों और उपदेषकों ने हमेशा से मार्गदर्शन दिया है। इस देश के इतिहास में तो इसकी लम्बी परंपरा है।
          कांग्रेस और उसके नेताओं ने 60 सालों में इस देश को जमकर लूटा है। अब जनता जाग रही है तो उसे डर लग रहा है कि उसका गोरखधंधा कैसे जारी रहेगा। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ठग है, धोखेबाज, बर्बर है। उसने पहले अन्ना हजारे को धोखा दिया और अब बाबा रामदेव के अनशन पर बल प्रयोग किया है। वैसे हमेशा से ही कांग्रेस के शासनकाल में जनआंदोलनों का यही हश्र होता आया है। आपातकाल में भी लाखों लोगों पर अनगिनत अत्याचार किए गए। पांच जून की दरमियानी रात जो हुआ उसका सारे देश में सब ओर से विरोध हो रहा है। कांग्रेस के इशारे पर रात में सोते हुए लोगों पर लाठीचार्ज जैसी दमनात्मक कार्रवाई की गई। पांडाल में हजारों महिलाएं अपने छोटे बच्चों के साथ सो रहीं थीं। वृद्ध साधु-संन्यासी और देशभर से आए हजारों आमजन दिनभर की थकान के बाद गहरी नींद में थे। ऐसे वक्त की गई बर्बर पुलिया कार्रवाई की तुलना जलियांवाला बाग से की जा रही है। जो कि अतिश्योक्ति कतई नहीं। कल्पनामात्र से ही आंखें भर आती हैं कि अपरा-तफरी में छोटे-छोटे बच्चों की क्या हालत हुई होगी। गरीबों का मसीहा बनने का ढोंग करने वाला राहुल गांधी इन्हें देखने नहीं आया और न ही का बयान जारी किया कि यहां महिलाओं के साथ कांग्रेस के इशारे पर कितनी बर्बता बरती गई। लेकिन, उस दयालु, करुणा के प्रतीक, मानवता के रक्षक राहुल गांधी का कहीं कोई अता-पता नहीं।
...... ये कैसी सरकार है जो एक और तो भ्रष्टाचारियों और आतंकवादियों के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं कर रही है वहीँ निर्दोष और समस्याओं से घिरे लोगों पर आसू गैस के गोले दाग कर अत्याचार कर रही है... क्या ये सरकार समाजकंटकों के बचाव और देश भक्तों के विरोध में है...???


किसने क्या कहा -

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी - इस घटना को रामलीला मैदान में रावण लीला करार दिया।
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी - बाबा रामदेव की गिरफ्तारी और लोगों पर लाठीचार्ज की तुलना जलियांवाला बाग कांड और आपातकाल की।
गाधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे - बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर कल मध्यरात्रि को हुई पुलिस कार्रवाई देश की लोकशाही पर कलंक की तरह है और इस कार्रवाई के लिए सरकार को सबक सिखाने वाला आदोलन करने की जरूरत है।
भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी - शनिवार को बाबा रामदेव के खिलाफ की गई कार्रवाई इमर्जेंसी के दिनों की याद दिलाती है। पार्टी अध्यक्ष ने कहा, ' यह लोकतंत्र को कलंकित करने वाली घटना है , जिसे सोनिया गांधीऔर मनमोहन सिंह के इशारे पर अंजाम दिया गया। पुलिस और आरएएफ ने लोकतांत्रिक तरीके से अनशन कर रहे निहत्थे लोगों पर अत्याचार किया , जो दुखद है।
संतोष हेगड़े - कर्नाटक के लोकायुक्त और लोकपाल विधेयक मसौदा समिति में समाज की ओर से शामिल सदस्य संतोष हेगड़े ने कहा कि बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर की गई पुलिस कार्रवाई आपातकाल के दिनों की याद दिलाती है। पुलिस ने रामलीला मैदान पर धारा 144 लगा दी। धारा 144 तब लगाई जाती है जब कानून व्यवस्था से जुड़ी स्थिति बिगड़ने की आशंका होती है। लेकिन जब पुलिस कार्रवाई हुई तब रामदेव, उनके समर्थक, महिलाएं और बच्चे सो रहे थे। सोते लोग कैसे कानून व्यवस्था से जुड़ी स्थिति बिगाड़ सकते हैं।
शांति भूषण - पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई से आपातकाल की याद आ जाती है। उन्होंने कहा कि यह काफी निंदनीय है और प्रधानमंत्री को इस मुद्दे पर इस्तीफा देना चाहिए।
बीजेपी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर - सभी को इसका विरोध करना चाहिए। उन्होंने इसे आजादी और लोकतंत्र, दोनों पर हमला बताया है।
आरएसएस प्रवक्ता राम माधव - सरकार का रवैया हैरान करने वाला है। सरकार भ्रष्टाचारियों से डर गई है, जिस कारण आंदोलन को जबरन खत्म करवाया गया। स्वामी अग्निवेश ने भी पुलिस कार्रवाई की निंदा करते हुए कहा कि वे इसका विरोध करेंगे।
अरविंद केजरीवाल - केंद्र सरकार ने बाबा और अन्ना दोनों को धोखा दिया है।
बाबा रामदेव - हरिद्वार पहुंचने के बाद कहा कि यूपीए सरकार मेरे एन्काउंटर की साजिश कर रही थी। उन्होंने प्रेस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अनशन से पहले होटल में केंद्रीय मंत्रियों के साथ मीटिंग के दौरान भी उन्हें अनशन न करने के लिए धमकी दी गई थी। सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि यूपीए अध्यक्ष के निर्देश पर ही रामलीला मैदान में जमा महिलाओं और बच्चों बर्बर कार्रवाई की गई।