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लोकेंद्र
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बुधवार, 27 जनवरी 2010
नहीं लडूंगा अब अकेले....
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समाज क्या होता है? क्यों समाज में उठना-बैठना चाहिए? क्यों एकांकी जीवन सदा आनंददायक नहीं होता? दो-तीन दिन में सही अर्थ समझा इन बातों का। हम...
सोमवार, 18 जनवरी 2010
आखिर कब तलक कहेंगे शहीदों को आतंकवादी....
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आज फिर से वो दिन याद आ गया। वही दिन जब मैंने पहली दफा दिल्ली में कदम रखा था। तब मैं सूर्या फाउंडेशन के सौजन्य से दिल्ली दर्शन कर रहा था। दि...
7 टिप्पणियां:
शुक्रवार, 15 जनवरी 2010
बहुत कुछ पाया २६ वें साल में...
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Lokendra Singh Rajput मकर संक्राति पर्व के दिन २६ बसंत पार कर चुका हूं। साथी पार्टी लेने की जिद पर अड़ गए। लेकिन, मुझे इस दफा पार्टी देने क...
3 टिप्पणियां:
मंगलवार, 12 जनवरी 2010
किधर जा रहा है युवा.....
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युवा दिवस पर विशेष - विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती , ...
1 टिप्पणी:
शुक्रवार, 1 जनवरी 2010
१० प्रतिनिधि कहानियां
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अभी हाल ही भीष्म साहनी की कहानियां पढ़ी। पुस्तक का शीर्षक था - १० प्रतिनिधि कहानियां, भीष्म साहनी। किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित ह...
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मंगलवार, 29 दिसंबर 2009
बस यूं ही बैठे-बैठे...
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रविवार की सुबह वही रोज की तरह देरी से उठा करीब 11 बजे। जब से पत्रकारिता के पेशे में कदम रखा है तब से देर तक जागना और देर सबेरे उठने की गंदी ...
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मंगलवार, 22 दिसंबर 2009
ये पाकिस्तान कहाँ से घुस आया
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रमैया- ये कक्का एक बात पूछें तुमसे.. चार-छ: दिन से बहुत ही परेशान हैं समझ ही नहीं आ रही। पंचू- पूछो का बात है जो तिहाए भेजा में ना घुस...
4 टिप्पणियां:
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