ग्वालियर: भूगोल एवं पर्यावरण
स्थिति- ग्वालियर भारत के हृदय प्रदेश-मध्यप्रदेश के उत्तरी-पश्चिमी भाग में स्थित है। वही दिल्ली मुंबई तथा दिल्ली-चैन्नई रेलमार्ग का एक महत्वपूर्ण स्टेशन हैं। ग्वालियर महानगर उक्त राजधानी नगरों को जोडऩे वाले सड़क मार्ग पर भी स्थित है। ग्वालियर संभाग की सीमाएं उत्तर प्रदेश के आगरा एवं झांसी तथा राजस्थान के धौलपुर जिले को छूती हैं। वैश्विक मानचित्र की दृष्टि से वह 26 डिग्री 12 सेंटीग्रेड उत्तरी आक्षांश और 76 डिग्री 18 सेंटीग्रेड पूर्वी देशान्तर पर स्थित है। उसकी समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 292 मीटर है।जलवायु- ग्वालियर शीतकाल में बहुत ठंडा और ग्रीष्म काल में अत्यधिक गर्म रहता है। दिसंबर-जनवरी में हाड़ कंपा देने वाली ठंड और मई-जून में पिघला देने वाली गर्मी पड़ती है। ग्वालियर में वर्षा सामान्य ही रहती है।
पर्यावरण- ग्वालियर चारों ओर से पहाडिय़ों से घिरा हुआ है। वे पहाडिय़ां प्राय: वृक्षहीन हैं, किन्तु शहर में पार्कों की संख्या पर्याप्त है। शहर के केन्द्र में स्थित फूलबाग, जिसमें चिडिय़ाघर भी है, पर्यावरण की दृष्टि से आदर्श उद्यान है। इस उद्यान का मनोहारी चित्रण अमृतलाल नागर की प्रसिद्ध पुस्तक 'आंखो देखा गदर' में किया गया है। यह पुस्तक विष्णुभट्ट गोडशे वरसईकर-कृत मराठी पुस्तक 'माझा प्रवास' का हिन्दी रूपान्तर है।
नदियां- ग्वालियर में अब केवल एक छोटी नदी रह गई है। वह मुरार नदी। दूसरी नदी है, या कहना चाहिए कि दूसरी नदी थी- स्वर्णरेखा। अब वह गंदे नाले का रूप ले चुकी है। वैसे, वह गिरवई गाँव से निकलती है जो ग्वालियर से ४-५ किलोमीटर की दूरी पर है। किन्तु जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती है, लश्कर की गंदगी और गंदे नाले उसमें मिलने लगते है। इस प्रकार बेचारी स्वर्णरेखा विकृत हो जाती है।
'स्वर्णरेखा' के नाम को लेकर एक जनश्रुति बहुप्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार श्रीमंत माधव राव सिंधिया (प्रथम) का हाथी स्वर्ण रेखा में नहाने उतर गया और जब वह बाहर आया तो उसके इधर-उधर लटकती लोहे की सांकलें सोने की हो चुकी थीं। लोग अनुमान लगाते हैं कि नदी में कहीं पारस था (और वह शायद आज भी है) जिस कार उक्त चमत्कार घटित हुआ। किन्तु अब तो वह जनश्रुति परी लोक की कथा ही समझ पड़ती है।
ग्वालियर से २० किलोमीटर दूर सांक नदी है। नगर के आसपास कुछेक झरने भी हैं, यथा कनेर झिर, देवखो आदि। वे वन भ्रमणार्थी सैलानियों को परम प्रिय हैं। कुछेक झरनों का आनंद मुगल बादशाह ने भी उठाया था। उसने उनका जिक्र अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' में भी किया है। नगर की जल आपूर्ति तिघरा जलाशय से होती है जो नगर से १२-१३ किलोमीटर की दूरी पर है।
आबादी- सन् १९०१ में ग्वालियर की आबादी एक लाख से कुछ कम ही थी। किन्तु अब उसकी आबादी १२ लाख से किंचित ऊपर पहुच रही है।
व्यापार- वाणिज्य- व्यापार-वाणिज्य की दृष्टि से ग्वालियर कभी बहुत आगे था। यहां से वस्त्र, चमड़े के जूते तथा अन्य चर्म वस्तुएँ, विक्की मोपेड व चीनी मिट्टी के बर्तन, बिस्कुट-चॉकलेट, शक्कर आदि का बड़ी मात्रा में निर्यात होता था। ग्वालियर के सामान की अमेरिका, ब्रिटेन, चीन आदि में भी मांग रहती थी। किन्तु आज उनके उत्पादन केन्द्र बन्द पड़े। कारखानों के मालिकों एवं श्रमिकों के बीच पनपे विवादों के कारण यह दुर्भाग्य उपस्थित हुआ। इन विवादों को श्रमिक संघों (यूनियनों) ने जन्माया तथा जमकर भड़काया था।
वर्तमान में ग्वालियर से 20 किलोमीटर की दूरी पर मालनपुर औद्योगिक क्षेत्र है। वहां केडबरी, गोदरेज, एमआरएफ (टायर कं .), हॉट लाइन आदि उत्पादक कंपनियां संचालित हो रही हैं। ग्वालियर से 15 किलोमीटर दूर बामौर (या बानमौर) है। वहां एक सीमेंट फैक्ट्री हैं। वहां दुग्ध वितरण केन्द्र भी है। इस नगर से 10 किलोमीटर की दूरी पर सिथौली है जहां रेलवे स्लीपर कोच के हिस्से तैयार किए जाते हैं। ग्वालियर से 35 किलोमीटर की दूरी पर डबरा है जहां शक्कर का कारखाना है
