शनिवार, 18 नवंबर 2017

कांग्रेस की दृष्टि में धर्मनिरपेक्षता अर्थात् हिंदू विरोध

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी नई किताब में लिखा, दीपावली पर हिंदू संत को गिरफ्तार कर लिया, परंतु क्या ईद पर मौलवी को पकडऩे का साहस किया जा सकता है?
 भारत  के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक 'कोअलिशन इयर्स 1996-2012' के एक अध्याय में कांग्रेस के हिंदू विरोध एजेंडे और छद्म धर्मनिरपेक्षता को उजागर किया है। वैसे तो यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है। दोनों आरोपों को लेकर कांग्रेस अकसर कठघरे में खड़ी दिखाई देती है। परंतु, जब प्रणब मुखर्जी इस संबंध में लिख रहे हैं, तब इसके मायने अलग हैं। वह खांटी कांग्रेसी नेता हैं। वह कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी राजनेता हैं। उन्होंने कांग्रेस को बहुत नजदीक से देखा है। कांग्रेस का उत्थान एवं पतन दोनों उनकी आँखों के सामने हुए हैं। आज कांग्र्रेस जिस गति को प्राप्त हुई है, उसके संबंध में भी उनका आकलन होगा। पूर्व राष्ट्रपति प्र्रणब मुखर्जी ने अपनी नई किताब में लिखा है- 'मैंने वर्ष 2004 में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी पर सवाल उठाए थे। एक कैबिनेट बैठक के दौरान मैंने गिरफ्तारी के समय को लेकर काफी नाराजगी जताई थी। मैंने पूछा था कि क्या देश में धर्मनिरपेक्षता का पैमाना केवल हिन्दू संतों महात्माओं तक ही सीमित है? क्या किसी राज्य की पुलिस किसी मुस्लिम मौलवी को ईद के मौके पर गिरफ्तार करने का साहस दिखा सकती है? '
          यदि इस प्रश्न के उजाले में उत्तर तलाशने का प्रयास करें तो हम पाएंगे कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में आने के बाद से कांग्रेस तुष्टीकरण से आगे बढ़ कर हिंदू विरोधी नीति पर आ गई। यह अकेली घटना नहीं है। 1998 से अब तक ऐसे अनेक प्रकरण हमारे सामने हैं, जो सिद्ध करते हैं कि कांग्रेस के लिए धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) हिंदू विरोध का पर्याय हो गई। हालाँकि कांग्रेस की नीति प्रारंभ से ही थोड़ी-बहुत हिंदू विरोध की रही है। स्वयं को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए सदैव ही हिंदू विरोधी नीति पर चलना कांग्रेस के लिए सुविधाजनक रहा है। बहरहाल, हम 1998 के बाद की कुछ प्रमुख घटनाओं की बात करते हैं, जिन्होंने कांग्रेस की हिंदू विरोधी नीति को प्रकट किया। 1998 से 2004 तक कांग्रेस ने सत्ता में वापसी के लिए एक विशेष समुदाय को आकर्षित किया। कांग्रेस ने भरोसा दिलाया कि उनकी सरकार में विशेष समुदाय की चिंता प्राथमिकता से की जाएगी। अवसर आने पर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने यह खुलकर कहा भी कि इस देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। बाटला मुठभेड़ (2008) में मारे गए दो आतंकवादियों की तस्वीर देख कर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी रो पड़ी थीं। यह बात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने यह दावा किया था। हालाँकि बाद में कांग्रेस ने किरकिरी होने पर इस बात को खुर्शीद का निजी बयान बता दिया था। 
          बहरहाल, वर्ष 2004 में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने अपनी हिंदू विरोधी नीति का पालन प्रारंभ कर दिया। जिस प्रकरण की पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जिक्र किया है, उसकी कल्पना कभी 2004 से पहले किसी ने नहीं की थी। हिंदू बाहुल्य देश में, हिंदू समाज के सबसे बड़े संत को, हिंदुओं के सबसे बड़े त्योहारों में से एक दीपावली के दिन गिरफ्तार करने की बात क्या 2004 से पहले सपने में भी सोची जा सकती थी? परंतु, यह दुर्भाग्यपूर्ण दिन हिंदुस्थान ने देखना पड़ा। 11 नवम्बर, 2004 को हत्या के आरोप में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को आंध्रप्रदेश की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उस समय डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री और प्रणब मुखर्जी रक्षा मंत्री थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो कुछ नहीं बोले, परंतु प्रणब मुखर्जी ने इस प्रकरण में अपनी नाराजगी प्रकट की। (जैसा कि उन्होंने अपनी पुस्तक में लिख है।) परंतु, कांग्रेस सरकार पर उनकी नाराजगी का कोई असर नहीं हुआ। उनके इस प्रश्न का उत्तर भी किसी ने नहीं दिया कि क्या ईद के दिन इसी प्रकार किसी मौलवी को गिरफ्तार करने का साहस दिखाया जा सकता है। कांग्रेस ने इस गिरफ्तारी पर तमिलनाडु सरकार से कोई सवाल नहीं पूछा और न ही किसी प्रकार का विरोध ही किया। देश में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ही विरोध प्रदर्शन किया और शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती की रिहाई की माँग की। उस समय आम समाज ने यह मान लिया था कि हिंदू धर्मगुरु की गिरफ्तारी के मामले में जयललिता की सरकार को केंद्र की संप्रग सरकार का मौन समर्थन प्राप्त है। परंतु, हिंदू प्रतिष्ठान को बदनाम करने का यह षड्यंत्र असफल साबित हुआ। न्यायालय ने शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती एवं अन्य पर लगे सभी आरोप खारिज कर दिए। 
         बाद में, 'भगवा आतंकवाद' और 'हिंदू आतंकवाद' शब्द देकर कांग्रेस ने हिंदू विरोधी छवि को और अधिक पुष्ट किया। मालेगाँव और समझौता एक्सप्रेस विस्फोट में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि हिंदू आतंकवादी हो गए हैं। हालाँकि, कांग्रेस अपनी इस अवधारणा को कभी सिद्ध नहीं कर पाई। हिंदू आतंकवाद को सिद्ध करने के लिए उसने जो षड्यंत्र रचे थे, अब उनसे भी पर्दा उठ रहा है। देश यह जानकर स्तब्ध है कि कैसे इस्लामिक आतंकवाद का बचाव करने के लिए कांग्रेस के नेताओं ने 'भगवा' जैसे पवित्र रंग-शब्द को आतंकवाद से जोडऩे के लिए गहरी साजिशें रचीं। भारतीयता की पहचान 'भगवा' पर कालिख पोतने का प्रयास किया गया। आज भी देश में एक वर्ग भगवा शब्द का उपयोग हिंदुओं को गाली देने के लिए करता है। जाँच एजेंसियों पर दबाव बनाया गया कि वह ऐसी कहानी और तथ्य गढ़ें, जिनसे हिंदू आतंकवाद की थिअरी को सिद्ध किया जा सके। परंतु, हम सब जानते हैं कि झूठ के पाँव नहीं होते हैं। इसलिए उनका यह झूठ अधिक दूर तक चल नहीं सका।  
          वर्ष 2007 में रामसेतु प्रकरण में भी यही हुआ। भारत और श्रीलंका को जोड़ने वाले रामसेतु को तोड़ने की जिद कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने ठान ली थी। हिंदू समाज के तीव्र विरोध को भी दरकिनार कर कांग्रेस सरकार रामसेतु को तोडऩे के लिए आतुर दिखाई दे रही थी। लोकतंत्र में जनभावनाओं की अनदेखी और दुराग्रह के लिए कोई स्थान नहीं होता है। चूँकि आस्थाओं का प्रश्न हिंदू समाज का था, इसलिए सरकार को परवाह नहीं थी। जबकि इसी देश में दूसरे मत-संप्रदायों के विरोध पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय भी संसद मे पलट दिए गए। हद तो तब हो गई, जब 'सेतु' को तोडऩे पर उतावली कांग्रेस ने 'राम' पर ही चोट कर दी। कांग्रेस ने न्यायालय में हलफनामा देकर कहा कि राम का कोई अस्तित्व नहीं है। राम एक काल्पनिक पात्र हैं। यह राम के अस्तित्व पर और करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर चोट नहीं थी, तो क्या थी? यह कांग्रेस के हिंदू विरोधी स्वभाव का प्रकटीकरण ही तो था। राम इस देश का इतिहास ही नहीं, अपितु पहचान भी है। कांग्रेस ने उसी पहचान को मिटाने का दुस्साहस किया था।  
          कांग्रेस ने वर्ष 2011 में सांप्रदायिक हिंसा रोकने के नाम पर ऐसा कानून बनाने का प्रयास किया था, जिसकी चक्की में हर हाल में हिंदू समाज को ही पिसना था, भले ही वह सांप्रदायिक हिंसा के लिए दोषी हो या नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की सलाहकार परिषद ने 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण अधिनियम-2011' का मसौदा तैयार किया था। सोनिया गाँधी की इस परिषद में ज्यादातर हिंदू विरोधी व्यक्ति शामिल थे। यह कानून भी हिंदुओं के दमन के लिए तैयार कराया गया था और इस काम में परिषद के ज्यादातर सदस्य माहिर थे। उन्होंने ऐसा मसौदा तैयार किया, जो अगर लागू हो जाता, तब प्रत्येक सांप्रदायिक दंगे के लिए हिंदू को दोषी बनाया जाता। भाजपा, आरएसएस और हिंदू समाज ने इस विधेयक का इतना विरोध किया कि कांग्रेस को इसे ठण्डे बस्ते में डालना पड़ा। 
          यह कुछेक प्रकरण हैं, ऐसे और भी प्रकरण हैं। एक लेख में सबकी चर्चा करना संभव नहीं। कांग्रेस के हिंदू विरोधी व्यवहार को देख कर ही देश की जनता ने वर्ष 2014 में उसे मात्र 44 सीटों पर समेट दिया और बाद में राज्यों से भी विदा कर दिया। वर्ष 2014 की ऐतिहासिक और शर्मनाक पराजय के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता (ईसाई) एके एंटनी ने भी पराजय के कारणों की समीक्षा में माना कि 'हिंदू विरोधी छवि के कारण यह दुर्गति हुई है। तुष्टीकरण की नीति पर चलते-चलते कांग्रेस की जो हिंदू विरोध छवि बन गई है, उससे उसे मुक्त होना होगा।' परंतु, कांग्रेस ने इस रिपोर्ट को नहीं माना और वह बदस्तूर हिंदू विरोध की नीति पर चल रही है। हाल में पशुओं को बचाने के केंद्र सरकार के आदेश का विरोध करने के लिए कांग्रेस ने वीभत्स तरीका अपनाया। केरल में कांग्रेस ने खुलेआम हिंदू आस्था की प्रतीक गाय का गला काटा और चौराहे पर खड़े होकर गौमाँस खाया एवं वितरित किया। सोनिया गाँधी के बेटे एवं कांग्रेस के उपाध्यक्ष (जल्द ही अध्यक्ष होंगे) राहुल गाँधी भी अपने बयानों से बार-बार हिंदू समाज को लक्षित करते हैं। ऐसे अनेक अवसर समय-समय पर आते हैं, जब कांग्रेस स्पष्टतौर पर हिंदू विरोधी पाले में खड़ी नजर आती है। राष्ट्रीय राजनीतिक दल होने के नाते कांग्रेस को भी विचार करना चाहिए कि 'धर्मनिरपेक्षता' के नाम पर वह जिस प्रकार का व्यवहार करती है, क्या वह देशहित में है?
      (पांचजन्य, १२ नवम्बर, २०१७ में प्रकाशित लेख)


1 टिप्पणी:

  1. Perhaps Mr. Pransb Mukherji is is fool as compared to Soniya Gandhi, Rahul Gandhi and Mr. Manmohan Singh. The matter should be made clear my Indian people in next election through their voting rights

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