शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

देश का प्रत्येक व्यक्ति विशिष्ट

 लाल  बत्ती की विदाई का निर्णय लेने के लिए केंद्र सरकार की सराहना की जानी चाहिए। यह निर्णय इसलिए और स्वागतयोग्य है कि किसी को भी लाल बत्ती का उपयोग करने की छूट नहीं दी गई। सरकार ने स्वयं से इसकी शुरुआत की है। यानी प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री भी बत्ती का उपयोग नहीं कर सकते। केंद्र सरकार के निर्णय के मुताबिक आगामी एक मई से विशिष्ट-अतिविशिष्ट व्यक्तियों के वाहनों पर बत्ती का उपयोग नहीं होगा। राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, राज्यों के मुख्यमंत्री, मंत्री, निगम मंडलों के पदाधिकारी तथा सभी सरकारी अफसरों के वाहन भी अब बत्ती विहीन हो जाएंगे। हालाँकि सेना, पुलिस, रुग्णवाहिका और अग्निशमन दल के वाहनों पर ही बत्ती का उपयोग किया जा सकता है। 
          केंद्र सरकार के निर्णय के अनुपालन में मध्यप्रदेश सरकार ने हमेशा की तरह पहल की है। बत्तीबंद का निर्णय एक मई से लागू होना है, लेकिन मध्यप्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री और मंत्रिगणों ने समाचार माध्यमों से सूचना प्राप्त होते ही अपने वाहनों बत्ती हटाना शुरू कर दिया। एक तरह से बत्ती हटाने की होड़ मच गई। यह सर्वविधित है कि लाल बत्ती केवल एक सुविधा नहीं रह गई थी, बल्कि एक ऐसी संस्कृति का प्रतीक बन गई थी जिसका लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। बत्ती विशिष्टा से भी कहीं अधिक रसूख का प्रतीक बन गई थी। लाल बत्ती वाहन से लैस व्यक्ति जनता को यही संदेश देते थे कि वे उनसे अलग और विशिष्ट हैं। उनके लिए सड़क पर अलग से चलने की व्यवस्था हो। जब वो लाल बत्ती के साथ आएं, तो उनके लिए रास्ता छोड़ा जाए। बत्ती बंद करने के बाद अब सरकार को तथाकथित विशिष्टजनों के काफिले को भी छोटा करने पर विचार करना चाहिए। यदि इस दिशा में इसी प्रकार की पहल सरकार करती है, तब वास्तव में 'वीआईपी कल्चर' खत्म हो सकेगा। 
          बहरहाल, बत्ती बंद करने का निर्णय करके सरकार ने देश की जनता को एक सकारात्मक संदेश देने का काम किया है कि भारत में कोई राजा और प्रजा नहीं हैं। विशिष्ट और सामान्य का भेद नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट करके कहा भी है- 'हर भारतीय विशेष है। हर भारतीय वीआइपी है। खुश हूं कि अब एक नई शुरुआत हुई है। न्यू इंडिया (नये भारत) की भावना से 'वीआइपी कल्चर' के यह प्रतीक खत्म हो गए हैं।' यकीनन इस निर्णय से जनता में यह संदेश गया है कि केंद्र में देश के सामान्य जन की हितैषी सरकार है। यहाँ विचार किया जाना चाहिए कि जो स्वयं को लोकतंत्र के सच्चे हिमायती कहते रहे हैं, जिन्होंने लम्बे समय तक देश के शासन को संभाला है, उन्होंने क्यों 'वीआईपी कल्चर' के प्रतीक हटाने की पहल नहीं की? जबकि लाल बत्ती हटाने के लिए देश में लंबे समय से माँग होती रही है। इस संबंध में न्यायालय तक के दरवाजे लोगों ने खटखटाए हैं। 
          लोकतंत्र में 'वीआईपी कल्चर' को खत्म करने के यह प्रयास यहीं थमने नहीं चाहिए। अभी ऐसी अनेक व्यवस्थाएं हैं, जिनसे भी 'वीआईपी कल्चर' पोषित होता है। उन व्यवस्थाओं पर भी चोट करना जरूरी है। मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल को देखकर इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि राजनीति और समाज में एक सार्थक परिवर्तन आएगा, जो आता हुआ दिखाई भी देने लगा है। 

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

तीन तलाक पर बोर्ड का ढोंग

 तीन  तलाक शुद्ध तौर पर मुस्लिम महिलाओं के शोषण की व्यवस्था है। तीन तलाक को खत्म करने के लिए देश में व्यापक बहस चल रही है। इस बहस के दबाव का ही परिणाम है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को तीन तलाक पर विचार करने और इस संबंध में एक आचार संहिता जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। क्योंकि मुस्लिम धर्म के तथाकथित ठेकेदारों को पता है कि महिलाएं जागरूक हो चुकी हैं, उनका शोषण अब और नहीं किया जा सकता। देश में मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में वातावरण बन गया है। हालाँकि तीन तलाक पर बोर्ड ने महिलाओं के हित की चिंता करने की अपेक्षा ढोंग ही किया है। बोर्ड के ढोंग से उसकी महिला विरोधी मानसिकता की पोल और अधिक खुलकर सामने आ गई है।

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

पत्थरबाजों का समर्थन करने से बाज आएं नेता

 जब  सेना के जवानों की पिटाई और उनके साथ बदसलूकी का वीडियो सामने आया, तब देश के ज्यादातर लोग खामोश थे। भारत और भारतीय सेना के लिए जिनके मन में सम्मान है, सिर्फ उन्हीं महानुभावों को वीडियो में अमानवीय हरकतें देखकर दु:ख हुआ। उन्होंने अपने-अपने ढंग से सेना के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट भी कीं। क्रिकेट में भारत का झंडा बुलंद करने वाले खिलाड़ी वीरेन्द्र सहभाग और गौतम गंभीर ने बहुत ही कठोर प्रतिक्रिया दीं। जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ के जवानों पर पत्थरबाजों ने जिस तरह लात-घूसे बरसाये, उसे देखकर निश्चिय ही देश के नागरिकों और सुरक्षा बलों के परिवारों को बहुत कष्ट हुआ होगा। लेकिन, इससे भी अधिक कष्ट पत्थरबाजों के समर्थकों के कुतर्क सुनकर हो रहा है। मतिभ्रम लोग जिस तरह आतंकियों की ढाल बने पत्थरबाजों के समर्थन के लिए सुरक्षा बलों को खलनायक बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं, उससे क्रोध ही उत्पन्न हो सकता है।

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

ईवीएम प्रकरण : पराजयवादी मानसिकता

 ईवीएम  में छेड़छाड़ का आरोप लगाकर संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग और देश की जनता के अभिमत पर प्रश्न खड़ा कर रहे लोगों को अब उनके ही सहयोगी आईना दिखा रहे हैं। कांग्रेस के तीन बड़े नेताओं ने ईवीएम पर अपनी ही पार्टी के मत की आलोचना की है। पंजाब में कांग्रेस को उम्मीद से अधिक बहुमत दिलाने वाले वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ईवीएम में छेड़छाड़ के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना उचित ही है कि यदि ईवीएम में छेड़छाड़ संभव होती, तब क्या कांग्रेस पंजाब में सत्ता में आ पाती? यदि ईवीएम में छेड़छाड़ होती तो वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठे होते बल्कि अकाली दल का कोई नेता वहाँ होता। पंजाब के मुख्यमंत्री के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी ईवीएम में छेड़छाड़ के मुद्दे को नकारा है। उन्होंने नानजांगुड और गुंडलूपेट विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस की दोबारा जीत का उदाहरण देकर यह बात कही है। इससे पूर्व कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने तो अन्य दलों के सुर में सुर मिलाकर ईवीएम का विरोध करने के अपने पार्टी के फैसले की कड़ी आलोचना की है। यहाँ तक कि उन्होंने इसे 'पराजयवादी मानसिकता' कह दिया।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

गौ-संरक्षण में गुजरात सरकार का अनुकरणीय प्रयास

 भारतीय  संस्कृति में गाय का बड़ा महत्व है। गाय के साथ इस देश का संबंध मात्र भावनात्मक नहीं है, वरन भारतीय समाज के पोषण में गौवंश का प्रमुख स्थान रहा है। भारत में गाय धार्मिक और आर्थिक, दोनों की बराबर प्रतीक है। यही कारण है कि प्राचीन समय में गौ-धन से सम्पन्नता देखी जाती थी। गाय के प्रति सब में बराबर सम्मान और श्रद्धा थी। फिर चाहे वह भारत में आक्रांता के रूप में आए समूह हों या फिर शरण लेने आए शरणार्थी, सभी गौ-हत्या से दूर रहते थे। परंतु, कालांतर में गोपालकों को चिढ़ाने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए गौ-हत्या प्रारंभ की गई। गाय को मां कहने वाला समाज गौ-वंश की हत्या बर्दाश्त नहीं कर सकता था। इसी पीड़ा से इस देश में गौ-हत्या के विरुद्ध गौ-संरक्षण आंदोलनों की शुरुआत होती है। भारतीय संस्कृति की धुरी गाय के संरक्षण के लिए भारत में कठोर कानून बनाने की मांग लम्बे समय से उठाई जाती रही है। इन्हीं मांगों के बीच गुजरात सरकार ने गौ-संरक्षण की दृष्टि से सख्त और सराहनीय कानून बनाया है। गुजरात देश का पहला राज्य है, जहां गौ-हत्या के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है।

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

तुम्हें समझ नहीं आएंगे श्रीकृष्ण

 प्रख्यात  अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भगवान श्रीकृष्ण को 'ईव टीजर' कह कर अपने बौद्धिक स्तर का परिचय दिया है। श्रीकृष्ण के संदर्भ में प्रशांत भूषण का ट्वीट नि:संदेह निंदनीय और अशोभनीय है। यह सरासर देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाकर सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का हथकंडा है। प्रशांत भूषण के बयान को अभिव्यक्ति की आजादी कतई नहीं कहा जा सकता। यदि यह अभिव्यक्ति की आजादी है, तब कमलेश तिवारी जेल में क्यों है? आज यह प्रश्न देश के तमाम नागरिक पूछ रहे हैं। क्या इस देश में हिंदुओं की आस्थाओं का कोई मोल नहीं है? उनके आराध्य और प्रतीकों पर बेहूदा टिप्पणी करने पर कठोर सजा क्यों नहीं है? प्रशांत भूषण के कुतर्क पर देश में गहरी नाराजगी है। यह भूषण का सौभाग्य है कि उन्होंने उस समाज के आराध्य का अपमान किया है, जो न केवल सहिष्णु है बल्कि दूसरों का सम्मान करना जानता है। यदि इसी प्रकार की टिप्पणी वकील भूषण ने किसी और पंथ के पैगम्बर के संबंध में की होती, तब उन्हें समझ आता कि वास्तव में असहिष्णुता क्या है और अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा क्या है? जबकि बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाकर जनता के सामान्य से गुस्से को भी प्रशांत भूषण के समर्थक असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे की तरह देख रहे हैं। दरअसल, प्रशांत भूषण की विचारधारा वाला बुद्धिजीवी वर्ग अभिव्यक्ति की आजादी का ठेका सिर्फ अपने पास रखना चाहता है, वह देश के सामान्य नागरिकों को सहज प्रतिक्रिया भी देने से रोकने का पक्षधर है।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

महिलाओं के हित में आए निर्णय

 पिछले  ढाई साल में तीन तलाक का मसला काफी बड़ा हो गया है। तीन तलाक पर व्यापक बहस प्रारंभ हो चुकी है। हालाँकि, मुस्लिम महिलाओं की ओर से लम्बे समय से तीन तलाक को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है। लेकिन, अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला। अब तक की सरकारों ने मुस्लिम महिलाओं की आवाज को न तो सुना और न ही उनका समर्थन किया। वरन् शाहबानो प्रकरण में तो तत्कालीन कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटकर एक तरह से मुस्लिम महिलाओं को उनकी बदहाली पर छोड़ दिया था। महिलाओं के संघर्ष को उस वक्त ताकत और सफल होने की उम्मीद मिली, जब मई-२०१४ में केंद्र में भाजपानीत सरकार का गठन हुआ। क्योंकि, भारतीय जनता पार्टी सदैव से समान नागरिक संहिता और मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी के लिए तीन तलाक को खत्म करने की हिमायती रही है। भाजपा के शीर्ष नेता अकसर अपने भाषणों में मुस्लिम महिलाओं के हित में तीन तलाक को खत्म करने की मांग उठाते रहे हैं। हाल में सम्पन्न उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी तीन तलाक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना था। माना जा रहा है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा को जो प्रचंड बहुमत मिला है, उसमें मुस्लिम महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

अल्पसंख्यक कौन?

 भारत  के राज्य जम्मू-कश्मीर में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक का मुद्दा बड़ी बहस में तब्दील हो सकता है। इस मसले पर बहस होनी भी चाहिए। देश के उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा है कि केंद्र और राज्य सरकार को आपस में बातचीत करके इस मसले का हल खोजना चाहिए चाहिए कि राज्य में मुस्लिम समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलते रहने देना चाहिए या नहीं? उन्होंने चार सप्ताह में इस मुद्दे पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। ध्यान देने की बात यह है कि उच्चतम न्यायालय ने इस मुद्दे को महत्त्वपूर्ण माना है। यकीनन यह बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि देश के संदर्भ में भी इस पर व्यापक बहस की जानी चाहिए। आखिर किस सीमा तक किसी समाज को अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए? अल्पसंख्यक दर्जे को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। यह संवेदनशील मुद्दा है। इस पर बहस के अपने खतरे भी हैं। लेकिन, तमाम खतरों के प्रभाव को कम करने के उपाय खोजते हुए इस विषय पर एक गंभीर और सकारात्मक बहस की जरूरत है।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

नये भारत की बात

 प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी अपने बहुचर्चित रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में हर बार समाजहित और देशहित की बातों को उठाते रहे हैं। संभवत: वह समाज को भी राष्ट्र निर्माण की भूमिका में सक्रिय करना चाहते हैं। क्योंकि, उनका प्रशिक्षण उस वैचारिक पृष्ठभूमि में हुआ है, जिसका मानना है सार्थक बदलाव समाज को जागरूक और सक्रिय करके ही आ सकते हैं। स्थायी बदलाव के लिए समाज को उसकी भूमिका का भान करना और उस भूमिका में उसे सक्रिय करना आवश्यक है। सरकार के बूते समाज में स्थायी बदलाव संभव नहीं है। सरकार सुविधा प्रदान करने में सक्षम है, लेकिन राष्ट्र निर्माण की वास्तविक शक्ति तो नागरिकों के हाथ में निहित है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री 'मन की बात' में बार-बार समाज को उसकी जिम्मेदारियों का ध्यान दिलाते हैं और नागरिकों से आग्रह करते हैं कि वह भी सरकार के साथ कदमताल करें।

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