शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

जेएनयू की बीमारी, 'देशद्रोह' के प्रोफेसर

 जवाहरलाल  नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) अपने विद्यार्थियों और शिक्षकों के रचनात्मक कार्यों से कम बल्कि उनकी देश विरोधी गतिविधियों से अधिक चर्चा में रहता है। पिछले वर्ष जेएनयू परिसर देश विरोधी नारेबाजी के कारण बदनाम हुआ था, तब जेएनयू की शिक्षा व्यवस्था पर अनेक सवाल उठे थे। यह सवाल भी बार-बार पूछा गया था कि जेएनयू के विद्यार्थियों समाज और देश विरोधी शिक्षा कहाँ से प्राप्त कर रहे हैं? शिक्षा और बौद्धिक जगत से यह भी कहा गया था कि जेएनयू के शिक्षक हार रहे हैं। वह विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने में असफल हो रहे हैं। लेकिन, पिछले एक साल में यह स्पष्ट हो गया है कि जेएनयू के शिक्षक हारे नहीं है और न ही विद्यार्थियों के मार्गदर्शन में असफल रहे हैं, बल्कि वह अब तक जीतते रहे हैं और अपनी शिक्षा को विद्यार्थियों में हस्थातंरित करने में सफल रहे हैं। 

         यकीनन इन्हें शिक्षक कहना समूचे शिक्षक जगत का अपमान है। इनके लिए अध्यापन पवित्र कर्तव्य नहीं है, बल्कि मात्र आजीविका का साधन और अपने वैचारिक प्रदूषण से देश के युवाओं को बीमार करने का जरिया है। इसलिए यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि देश विरोधी गतिविधियों में विद्यार्थियों की सक्रियता और संलिप्तता के पीछे असल में जेएनयू के 'देशद्रोही प्रोफेसरों' का दिमाग है। जेएनयू के देशद्रोहियों का चेहरा और चरित्र एक बार फिर उजागर हुआ है। 
          तीन फरवरी को राजस्थान की जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर में आयोजित एक संगोष्ठी में जेएनयू की प्रोफेसर निवेदिता मेनन ने बड़ी बेशर्मी से देश विरोधी टिप्पणी ही नहीं की, अपितु देश के राष्ट्रीय ध्वज और मानचित्र का भी अपमान किया। देश के बहादुर सैनिकों के प्रति भी आपत्तिजनक टिप्पणी की। प्रोफेसर मेनन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसमें कहा गया है कि संगोष्ठी में उन्होंने अपनी प्रस्तुति में जानबूझकर देश का मानचित्र उल्टा दिखाया। उन्होंने 'भारत' को 'माता' कहने वाले करोड़ों भारतीयों की भावना का उपहास उड़ाते हुए कहा कि बताइए इस नक्शे (भारत के उल्टे नक्शे में) में भारत माता कहाँ दिख रही हैं?
         दरअसल, 'भारतमाता' के रूप में इस देश की वंदना करने वाले राष्ट्रीय विचारधारा के लोगों ने भारत के नक्शे को सिंह पर सवार और एक हाथ में ध्वज लिए देवी के रूप में चित्रित किया है। प्रोफेसर मेनन का इशारा इसी 'भारतमाता' की ओर था। उनके मुताबिक उन्होंने अपने विभाग में भी भारत का उल्टा नक्शा लगाया है, क्योंकि वह इस देश को मात्र एक भूखंड मानती हैं। वह कहती हैं कि दुनिया गोल है और उसे दूसरी तरफ से देखने पर भारत ऐसा ही (उल्टा) दिखता है। प्रो. मेनन यह भी कहती हैं- 'भारत माता की फोटो यह ही क्यों है? इसकी जगह दूसरी फोटो होनी चाहिए। मैं नहीं मानती इस भारत माता को।' बिल्कुल यह निहायत व्यक्तिगत मामला है कि आप भारत को माता माने या पिता, या फिर मात्र एक देश। लेकिन, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप भारतमाता के लाखों-करोड़ों बेटों की भावना को ठेस पहुँचाओ। 
         इस प्रकरण से प्रोफेसर मेनन और उनकी विचारधारा का पाखंड और दोगलापन भी उजागर होता है। एक तरफ प्रो. मेनन की विचारधारा के लोग पूरी ताकत के साथ यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राष्ट्रीय विचारधारा के लोग तिरंगे का सम्मान नहीं करते, उसको स्वीकार नहीं करते। वहीं, प्रो. निवेदिता मेनन इसी संगोष्ठी में राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करते हुए नजर आईं। उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को एक सिरे से अस्वीकार कर दिया। राष्ट्रीय ध्वज पर प्रश्न चिह्न उठाते हुए उन्होंने कहा- भारत माता के हाथ में जो झंडा है, वह तिरंगा क्यों है? यह झंडा देश के आजाद होने के बाद का है, पहले ऐसा नहीं था। पहले इसमें चक्र नहीं था।' आखिर प्रो. निवेदिता कहना क्या चाहती थीं? उन्हें भारतमाता के हाथ में तिरंगे से आपत्ति है या तिरंगे के तीन रंग से, या फिर तिरंगे में अशोक चक्र से? 
         प्रो. मेनन यहीं नहीं रुकती, अपनी प्रस्तुति में वह जम्मू-कश्मीर और सियाचीन को भारत का हिस्सा मानने से इनकार करती हैं। देश के वीर जवानों की निष्ठा का अपमान करते हुए कहती हैं कि सेना के जवान देश सेवा के लिए नहीं, बल्कि रोटी के लिए काम करते हैं। देश के सैनिकों को हतोत्साहित करने के लिए इससे अधिक नकारात्मक टिप्पणी और क्या हो सकती है? प्रो. मेनन को समझना चाहिए कि भारत के सैनिक रोटी के लिए नहीं, बल्कि देश की रक्षा के लिए अपनी जान लगा देते हैं। देश पर खतरा होता है, तब वह पीछे नहीं हटते, अपितु मुसीबत के सामने अपनी छाती अड़ा देते हैं ताकि हम सुख से रोटी खाते रहें। 
         बहरहाल, प्रो. निवेदिता मेनन अकेली नहीं हैं। अपितु, वह जेएनयू के उन तमाम प्रोफेसरों में से एक हैं, जिनकी आस्था और निष्ठा देश के प्रति रत्तीभर नहीं हैं। इससे पहले भी जेएनयू के प्रोफेसर देश विरोधी गतिविधियों में सक्रिय रहने के लिए अपने संस्थान को बदनाम कर चुके हैं। अपने संस्थान, समाज और देश से किंचित भी प्रेम है तब जेएनयू के इन प्रोफेसरों को अपनी हरकतों से बाज आना चाहिए। 

1 टिप्पणी:

  1. sachchi baat likhi hai aapne ji !kyaa main aapka lekh apne paathkon ki jaankaari badhane hetu apne blog par saabhaar share kar saktaa hoon ?kripya aagyaa dijiye !thanks !

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