बुधवार, 24 मई 2017

निंदक नियरे राखिए...

 केंद्र  सरकार के महत्वाकांक्षी अभियान 'खुले में शौच मुक्त भारत' पर अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' में लेख लिखकर विवादों में आईं आईएएस अधिकारी दीपाली रस्तोगी को मध्यप्रदेश सरकार ने क्लीनचिट दे दी है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत को खुले में शौच से मुक्त करने के लिए देशभर में प्रभावी ढंग से अभियान चला रहे हैं, वहीं मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में तैनात आदिवासी कल्याण विभाग की आयुक्त दीपाली रस्तोगी ने कुछ दिन पहले इस अभियान को लेकर कुछ सवाल उठाए थे। दीपाली रस्तोगी के अपने लेख में अभियान को लेकर सरकार के अतिउत्साह की आलोचना जरूर की थी, लेकिन यह सीधे तौर पर न तो केंद्र सरकार की आलोचना थी और न ही उन्होंने प्रदेश सरकार पर सवाल उठाए थे। अपने लेख में उन्होंने अभियान के क्रियान्वयन में आ रही दिक्कतों और पानी की कमी को लेकर शौचालय के औचित्य पर सवाल उठाए थे। उन्होंने अपने लेख में व्यावहारिक परेशानियों का जिक्र किया था। अपने लेख में एक जगह जरूर रस्तोगी थोड़ी अधिक नकारात्मक हो गईं थीं, जब उन्होंने अभियान की मंशा को अंग्रेजों की मानसिक गुलामी से जोड़ दिया था। जैसा कि होता है इस लेख को सरकार की आलोचना बताया गया। जमकर बहसबाजी शुरू हुई। सरकारी अधिकारी द्वारा सरकारी अभियान के खिलाफ इस प्रकार आलोचनात्मक लेख लिखना 'सेवा नियमों के विरुद्ध' बताया जाने लगा। बीच बहस में सामान्य प्रशासन विभाग ने रस्तोगी को नोटिस जारी कर जवाब माँग लिया था। जवाब में रस्तोगी ने कहा था कि उनकी भावना अभियान की आलोचना करने की कतई नहीं थी। उन्होंने तो सिर्फ उस व्यावहारिक परेशानी का जिक्र किया था, जो ग्रामीण क्षेत्र में जलसंकट की वजह से सामने आती है। यदि हम जमीन पर उतरकर देखें तब रस्तोगी के सवाल वाजिब दिखाई देते हैं। निसंदेह शौच मुक्त भारत आवश्यक है, लेकिन उससे पहले भारतीय समाज के सामने और भी बुनियादी जरूरतें हैं। बहरहाल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक यह मामला पहुँचा। अंतत: सरकार ने अभिव्यक्ति की आजादी को सम्मान देते हुए एक सराहनीय निर्णय लिया। सरकार की ओर से सामान्य प्रशासन विभाग के राज्यमंत्री लालसिंह आर्य ने कहा कि दीपाली रस्तोगी ने लेख में कुछ गलत नहीं लिखा है। हर एक को स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का अधिकार होना चाहिए। उनकी मंशा सरकार की खिलाफत करने की नहीं थी। यह निर्णय लेकर सरकार ने विचार प्रक्रिया और उसकी अभिव्यक्ति को अवरुद्ध होने से बचा लिया। 
          सरकार और सत्ता में शामिल राजनीतिक दलों को यह समझने की आवश्यकता है कि प्रत्येक असहमति 'सरकार का विरोध' नहीं होती है। यदि सरकारें सार्थक आलोचनाओं को भी अपने विरुद्ध मानकर उनका गला घोंटने लगेंगी, तब सुशासन कहीं दूर छिटक जाएगा। असहमतियों सरकारी डंडा चलाने की प्रवृत्ति यदि बढ़ जाएगी तब सरकार और लोक कल्याण के हित की बातों को कहने से भी लोग बचेंगे। और यह सत्य है कि 'हाँ जी- हाँ जी' से लोक कल्याणकारी शासन नहीं चलता है। सरकार के महत्त्वाकांक्षी अभियानों और योजनाओं को जमीनी स्तर तक ले जाने की जिम्मेदारी जिनके हाथों में होती है, उन्हें जमीनी कठिनाइयाँ भी मालूम होती हैं। यदि सरकार उन कठिनाइयों को जानने की कोशिश नहीं करेंगे, तब वह वांछित परिणाम भी प्राप्त नहीं कर सकती है। स्वस्थ आलोचनाओं का स्वागत किया जाना चाहिए। हालाँकि यह भी सही है कि बहुतायात में सार्वजनिक मंचों पर सरकारी योजनाओं की आलोचना सरकार की सेहत के लिए ठीक नहीं है। इसलिए सरकार को आंतरिक स्तर पर असहमतियों और आलोचनाओं के प्रकटीकरण के लिए कोई मंच बनाना चाहिए। ताकि किसी अधिकारी-कर्मचारी को अपनी राय, अनुभव और सुझाव सरकार के सामने रखने हो, तो वह रख सके। सरकार में शामिल राजनीतिक दल को भी इसी नीति का पालन करना चाहिए। क्योंकि उसी पार्टी की सत्ता लम्बे समय तक टिक सकती है, जिसने असहमतियों और आलोचनाओं को सुनने के लिए उचित मंच बनाया हो। प्रत्येक दल के भीतर अपने सामान्य से सामान्य कार्यकर्ता के मन की बात या उसके मन की पीड़ा सुनने की व्यवस्था होनी चाहिए। कार्यकर्ता और नेताओं को यदि पार्टी के भीतर अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलेगा, तब वे सार्वजनिक मंचों से अपना दर्द बयां करेंगे। वैसे भी आज सामाजिक माध्यमों (सोशल मीडिया) की अधिकता के कारण अपने विचार अभिव्यक्त करने का दायरा भी बढ़ गया है। 
          भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दिनों जिस तरह से अपने ही वरिष्ठ नेता एवं लेखक राज चढ्डा को प्रदेश सरकार में बढ़ रहे कथित भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करने के कारण निकाला है, उसकी आलोचना सब जगह हो रही है। पार्टी के भीतर अनुशासन बनाए रखना भाजपा का आंतरिक मसला है, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेताओं को इतना जरूर सोचना चाहिए कि राज चढ्डा ने जो सवाल खड़े किए हैं, वह सीधेतौर पर सरकार की आलोचना नहीं हैं। यह उनका आकलन और उनकी अभिव्यक्ति है। उन्होंने सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि अपनी पार्टी को सचेत करने का प्रयास किया था। भाजपा कह सकती है कि उनके यहाँ कार्यकर्ताओं को अपनी बात कहने और सुझाव देने के लिए बड़ा मंच है। प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में सभी कार्यकर्ता इसीलिए जुटते हैं। लेकिन, वास्तविकता में ऐसा होता है क्या? इस प्रकार की बैठकों में सुदूर क्षेत्रों से कार्यकर्ता आते हैं और नेताओं के भाषण सुनकर वापस लौट जाते हैं। अपना खून-पसीना देने वाले कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकालकर उन सवालों से नहीं बचा जा सकता, जो उसने उठाए हैं। सामान्य-सी आलोचनात्मक टिप्पणी करने पर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने की जगह ऐसे कार्यकर्ताओं को धैर्यपूर्वक सुना जाना चाहिए। उनके साथ संवाद का दायरा बढ़ाना चाहिए। आलोचनाएं ही तो कई बार सरकारों को पथ से भटकने से रोकती हैं। आलोचनाएं ही तो कई बार गलतियों को सुधारने में मदद करती हैं। आलोचनाएं ही तो किसी भी योजना की खामियों को दूर कर उसे अधिक कल्याणकारी बनाती हैं। आलोचना और आलोचकों के महत्त्व को समझकर बहुत पहले कबीरदास जी कह गए हैं- निंदक नियरे राखिए...। आईएएस अधिकारी दीपाली रस्तोगी के मामले में जिस प्रकार सरकार ने उदार हृदय दिखाकर उचित निर्णय लिया है, उसी प्रकार भाजपा संगठन को भी ग्वालियर के वरिष्ठ नेता राज चढ्डा के प्रकरण में विचार करना चाहिए।

मंगलवार, 23 मई 2017

मिशन बन गई है नर्मदा सेवा यात्रा

 सदानीरा  नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा है। मध्यप्रदेश की समृद्धि नर्मदा से ही है। नर्मदा के दुलार से ही देश के हृदय प्रदेश का दिल धड़कता है। मध्यप्रदेश के साथ-साथ माँ नर्मदा अपने अमृत-जल से गुजरात का भी पोषण करती है। नर्मदा का महत्त्व दोनों प्रदेश भली प्रकार समझते हैं। माँ नर्मदा का अधिक से अधिक स्नेह प्राप्त करने के लिए दोनों प्रदेश वर्षों तक आपस में झगड़े भी। यह संयोग ही है कि नर्मदा के तट पर पैदा हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उसके जल से आचमन करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, दोनों नर्मदा के उद्गम स्थल पर आकर उसके ऋण से उऋण होने का संकल्प लेते हैं। मध्यप्रदेश में 148 दिन से संचालित 'नमामि देवी नर्मदे : नर्मदा सेवा यात्रा' का पूर्णता कार्यक्रम वन प्रदेश अमरकंटक में 15 मई, 2017 को आयोजित किया गया। परंतु, वास्तव में यह पूर्णता कार्यक्रम कम था, बल्कि नदियों के महत्त्व के प्रति जन-जागरण की मजबूत नींव पर नदी संरक्षण के भव्य स्मारक के निर्माण कार्य का शुभारम्भ था। नर्मदा सेवा यात्रा की पूर्णता पर नर्मदा सेवा मिशन की घोषणा यहाँ की गई। कृषकाय हो रही नर्मदा को संवारने का संकल्प दोनों लोकप्रिय नेताओं ने स्वयं ही नहीं लिया, अपितु नर्मदा के लाखों पुत्रों को भी कराया। ऐसी मान्यता है कि यदि हमारे संकल्प शुभ हों, तब प्रकृति भी उनको पूरा करने में हमारी मदद करती है। पर्यावरण और नदी संरक्षण का यह शुभ संकल्प तो प्रकृति की गोद में बसे अमरकंटक की पावन धरती पर ही लिया गया है, इसलिए इसके फलित होने की संभावना स्वत: ही बढ़ गई है।

शनिवार, 20 मई 2017

सूना हो गया नदी का घर

 माँ  नर्मदा के सेवक और उसके सुयोग्य बेटे अनिल माधव दवे के देवलोक चले जाने की खबर ऐसी है कि सहसा उस पर भरोसा करना कठिन होता है। उनका नाम आते ही सदैव मुस्कुराता हुआ चेहरा, शांत चित्त और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर व्यक्तित्व हमारे सामने उपस्थित होता है। उनके जिक्र के साथ नकारात्मक भाव, उदासी और खालीपन मेल नहीं खाता। इसीलिए हृदयघात के कारण उनकी मृत्यु की खबर अविश्वसनीय प्रतीत होती है। लेकिन, सत्य यही है। अनेक संभावनाओं से भरा एक संत राजनेता भारतीय राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में रचनात्मकता की एक बड़ी लकीर खींचकर चला गया है। स्व. अनिल माधव दवे की पहचान आम राजनेता की नहीं थी। वह धवल राजनीति के पैरोकार थे। लिखने-पढ़ने वाले और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की गहरी समझ रखने वाले राजनेता के तौर पर उनको याद किया जाएगा। वह जब किसी गंभीर विषय पर बोल रहे होते थे, तब सभा/संगोष्ठी में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति ध्यानपूर्वक उनको सुनता था। उनकी वाणी में गजब का माधुर्य था। कर्म एवं वचन में समानता होने और गहरा अध्ययन होने के कारण, उनकी कही बातों का गहरा असर होता था। उनके प्रति एक बौद्धिक आकर्षण था। राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में एक ऊंचाई प्राप्त करने के बाद भी किसी फलदार वृक्ष की भांति उनका स्वभाव सदैव विनम्र ही रहता था। यही कारण था कि उनका सम्मान भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं, अपितु विरोधी राजनीतिक दल में भी था। सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय सभी विचारधारा के लोग और संगठन भी उनसे विचार-विमर्श करते थे। 

शनिवार, 13 मई 2017

धर्म की आड़ में अधर्म कब तक?

 तीन  तलाक के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने गुरुवार से सुनवाई शुरू कर दी है। तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन चला रही महिलाओं को उम्मीद है कि इस बार उन्हें न्यायालय से न्याय मिलेगा। (पढ़ें - महिलाओं के हित में आए निर्णय) मुस्लिम महिलाओं ने न्याय के लिए ईश्वर से प्रार्थना भी शुरू कर दी है। इस सिलसिले में उन्होंने हनुमान मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ भी किया है। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय भी महिला सम्मान और मुस्लिम धर्म से जुड़े इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहा है। पहले दिन की कार्यवाही यही बताती है। आश्चर्य है कि न्यायालय को मानवीय और संवैधानिक अधिकारों के मामले में धार्मिक तुष्टीकरण का ध्यान रखना पड़ रहा है। वरना क्या कारण था कि पाँच न्यायमूर्तियों की सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ को कहना पड़ा कि वह सबसे पहले यह तय करेगी कि क्या तीन तलाक की परंपरा इस्लाम धर्म का मूल तत्व है? पीठ ने यह भी कहा है कि हम इस मुद्दे पर भी विचार करेंगे कि क्या तीन तलाक सांस्कारिक मामला है और क्या इसे मौलिक अधिकार के रूप में लागू किया जा सकता है? हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय की आगे की कार्यवाही से उम्मीद बंध रही है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिलेगा। न्यायालय ने तीन तलाक के संबंध में अनेक कठोर टिप्पणियाँ की हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि 'तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं को जिंदा दफन करने जैसा है।' मुख्य न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि बहुविवाह मामले में फिलहाल बहस नहीं होगी। पीठ तीन तलाक की संवैधानिकता को परखेगी। कोर्ट ने कहा कि हम इस मुद्दे को देखेंगे कि क्या तीन तलाक इस्लाम धर्म का मूल हिस्सा है? क्या उसे मूल अधिकार के तौर पर लागू किया जा सकता है? कोर्ट ने कहा कि अगर यह साबित तय हो जाता है और कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचता है कि तलाक धर्म का मूल तत्व है तो वह इसकी संवैधानिक वैधता के सवाल को नहीं परखेगा।

शुक्रवार, 12 मई 2017

उचित नहीं आआपा का 'राजनीतिक अभ्यास'

 आम  आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली विधानसभा के विशेष सत्र में जिस प्रकार से ईवीएम से छेड़छाड़ का प्रदर्शन किया है, उसे किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता है। आआपा सरकार ने दो संवैधानिक संस्थाओं (विधानसभा और चुनाव आयोग) का एक तरह से उपहास उड़ाया है। आम आदमी पार्टी के विधायक सौरभ भारद्वाज जब ईवीएम जैसी दिखने वाली मशीन पर मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रदर्शन कर रहे थे, तब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर सरकार के तमाम मंत्री-नेता सदन में हँस रहे थे। यह हँसी किसलिए थी? क्या इसलिए कि उन्होंने अपने दावे को सच करके दिखाया? क्या इसलिए कि उन्होंने भाजपा की जीत को धोखेबाजी सिद्ध कर दिया? क्या इसलिए कि उन्होंने चुनाव आयोग को झूठा साबित कर दिया? आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल और समूची पार्टी की इस हँसी में दंभ था, दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति थी, धूर्तता थी और नकलीपन था। भ्रष्टाचार के आरोपों का जवाब देने की जगह विधानसभा में खेले गए इस नाटक से आआपा की कलई पूरी तरह खुल कर सामने आ गई है।

सोमवार, 8 मई 2017

स्वच्छता की ओर बढ़ते कदम

 एक  बार फिर केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत किए गए सर्वे के परिणाम देश के सामने रखे हैं। सर्वे के आंकड़ों पर भरोसा करें, तब यह स्पष्ट है कि हम स्वच्छता की ओर बढ़ रहे हैं। दरअसल, स्वच्छता अभियान के परिणाम पर भरोसा करने का कारण मात्र आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हमने अनुभव किया है कि धीरे-धीरे स्वच्छता हमारी आदत होती जा रही है। अब हम यहाँ-वहाँ कचरा फेंकने से बचते हैं, जबकि पहले कहीं भी कचरा फेंकने में कोई संकोच नहीं होता था। स्वच्छता अभियान के कारण हमारे मन का संस्कार हुआ है। स्वच्छता के प्रति जागरूक करने वाले सार्वजनिक हित के विज्ञापन और लघु फिल्मों ने हमारे मन को चेताया है। स्वच्छ शहरों की रैंकिंग घोषित करने की सरकार की नीति का भी कहीं न कहीं प्रभाव पड़ रहा है। जागरूक नागरिक और शहर की सरकारें चाहती हैं कि उनके शहर के माथे पर 'अस्वच्छ शहर' का कलंक नहीं लगे। इस तथ्य को हम सर्वे के परिणाम में अनुभूत कर सकते हैं। पूर्व के सर्वेक्षणों में जो शहर स्वच्छता के मामले में बहुत पीछे थे, इस सर्वे में उन्होंने अपनी स्थिति सुधारी है। अर्थात् हम स्वच्छता की ओर बढ़ रहे हैं। हालाँकि हमें पूरी ईमानदारी से यह भी स्वीकार करना होगा कि तस्वीर जितनी उजली दिखाई जा रही है, उतनी है नहीं।

रविवार, 30 अप्रैल 2017

धूलिकण : चितेरों की दृष्टि में डॉक्टर साहब

 विश्व  के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पिछले वर्ष ही अपने 90 वर्ष पूर्ण किए हैं। हम जानते हैं कि वर्ष 1925 में विजयादशमी के अवसर पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने एक बीज बोया था, जो आज ऐसा वटवृक्ष बन गया है कि उसकी छाया में राष्ट्रीय विचार पोषित हो रहे हैं। भारतीयता से ओतप्रोत दूरदृष्टा डॉ. हेडगेवार का जन्म वर्ष प्रतिपदा के शुभ अवसर पर 1 अप्रैल, 1889 को हुआ था। तद्नुसार इस वर्ष उनकी 127वीं जयंती हैं। देशभर में स्वयंसेवक अपने प्रेरणा पुँज को अनूठे ढंग से स्मरण कर रहे हैं। इसी श्रृंखला में भोपाल की श्री कला संस्था ने चित्र प्रदर्शनी 'धूलिकण' का आयोजन किया। पाँच दिवसीय प्रदर्शनी का उद्घाटन 15 अप्रैल को अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति मोहनलाल छीपा, अभिनेता एवं संस्कार भारती मध्य भारत प्रांत के अध्यक्ष राजीव वर्मा और स्वदेश के प्रधान संपादक राजेन्द्र शर्मा ने किया। इस अवसर पर वरिष्ठ चित्रकार देवी दयाल धीमान और समाजसेवी शशिभाई सेठ भी उपस्थित रहे। राष्ट्रनिर्माता डॉ. साहब पर केंद्रित इस प्रदर्शन का उचित ही नामकरण किया गया। डॉ. साहब भारत भूमि के ऐसे धूलिकण थे, जिसमें समाज को पोषित करने की शक्ति निहित थी।

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

जीवित मनुष्य से बढ़कर हैं नदियाँ

 माँ  गंगा और यमुना के बाद अब नर्मदा नदी को भी मनुष्य के समान अधिकार प्राप्त होंगे। देवी नर्मदा भी अब जीवित इंसानों जैसी मानी जाएगी। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसकी घोषणा की है। जल्द ही विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर नर्मदा नदी को इंसान का दर्जा दे दिया जाएगा। यह शुभ घोषणा है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन, जीवनदायिनी नदियों को मनुष्य के समकक्ष स्थापित करने से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि हमारे ग्रंथों में नदियों का स्थान बहुत ऊँचा है। वेदों में नदियों को माँ और देवी माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने नदियों को लेकर यह मान्यता इसलिए स्थापित की थी, ताकि हम नदियों के प्रति अधिक संवेदनशील रहें। उनके प्रति कृतज्ञ रहें। नदियों के प्रति अतिरिक्त आदर भाव रहे। जब मनुष्य नदियों को माँ मानेगा और उन्हें दैवीय स्थान पर रखेगा, तब उसको नुकसान नहीं पहुँचाएगा। यह हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि हम अपने पुरखों की सीख को विसर्जित कर कर्मकांड तक सीमित होकर रह गए। सम्मान के सर्वोच्च स्थान 'माँ' के प्रति भी हम लापरवाह हो गए। हमारी यह लापरवाही नदियों के जीवन के लिए खतरा बन गई। आज न्यायालयों और सरकारों को नदियों को न्याय दिलाने के लिए उन्हें मनुष्य की तरह जीवंत मानने को मजबूर होना पड़ रहा है। जबकि हमारे यहाँ सदैव से नदियों को जीवंत ही माना गया है।

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

देश का प्रत्येक व्यक्ति विशिष्ट

 लाल  बत्ती की विदाई का निर्णय लेने के लिए केंद्र सरकार की सराहना की जानी चाहिए। यह निर्णय इसलिए और स्वागतयोग्य है कि किसी को भी लाल बत्ती का उपयोग करने की छूट नहीं दी गई। सरकार ने स्वयं से इसकी शुरुआत की है। यानी प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री भी बत्ती का उपयोग नहीं कर सकते। केंद्र सरकार के निर्णय के मुताबिक आगामी एक मई से विशिष्ट-अतिविशिष्ट व्यक्तियों के वाहनों पर बत्ती का उपयोग नहीं होगा। राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, राज्यों के मुख्यमंत्री, मंत्री, निगम मंडलों के पदाधिकारी तथा सभी सरकारी अफसरों के वाहन भी अब बत्ती विहीन हो जाएंगे। हालाँकि सेना, पुलिस, रुग्णवाहिका और अग्निशमन दल के वाहनों पर ही बत्ती का उपयोग किया जा सकता है।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

तीन तलाक पर बोर्ड का ढोंग

 तीन  तलाक शुद्ध तौर पर मुस्लिम महिलाओं के शोषण की व्यवस्था है। तीन तलाक को खत्म करने के लिए देश में व्यापक बहस चल रही है। इस बहस के दबाव का ही परिणाम है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को तीन तलाक पर विचार करने और इस संबंध में एक आचार संहिता जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। क्योंकि मुस्लिम धर्म के तथाकथित ठेकेदारों को पता है कि महिलाएं जागरूक हो चुकी हैं, उनका शोषण अब और नहीं किया जा सकता। देश में मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में वातावरण बन गया है। हालाँकि तीन तलाक पर बोर्ड ने महिलाओं के हित की चिंता करने की अपेक्षा ढोंग ही किया है। बोर्ड के ढोंग से उसकी महिला विरोधी मानसिकता की पोल और अधिक खुलकर सामने आ गई है।

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

पत्थरबाजों का समर्थन करने से बाज आएं नेता

 जब  सेना के जवानों की पिटाई और उनके साथ बदसलूकी का वीडियो सामने आया, तब देश के ज्यादातर लोग खामोश थे। भारत और भारतीय सेना के लिए जिनके मन में सम्मान है, सिर्फ उन्हीं महानुभावों को वीडियो में अमानवीय हरकतें देखकर दु:ख हुआ। उन्होंने अपने-अपने ढंग से सेना के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट भी कीं। क्रिकेट में भारत का झंडा बुलंद करने वाले खिलाड़ी वीरेन्द्र सहभाग और गौतम गंभीर ने बहुत ही कठोर प्रतिक्रिया दीं। जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ के जवानों पर पत्थरबाजों ने जिस तरह लात-घूसे बरसाये, उसे देखकर निश्चिय ही देश के नागरिकों और सुरक्षा बलों के परिवारों को बहुत कष्ट हुआ होगा। लेकिन, इससे भी अधिक कष्ट पत्थरबाजों के समर्थकों के कुतर्क सुनकर हो रहा है। मतिभ्रम लोग जिस तरह आतंकियों की ढाल बने पत्थरबाजों के समर्थन के लिए सुरक्षा बलों को खलनायक बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं, उससे क्रोध ही उत्पन्न हो सकता है।

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

ईवीएम प्रकरण : पराजयवादी मानसिकता

 ईवीएम  में छेड़छाड़ का आरोप लगाकर संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग और देश की जनता के अभिमत पर प्रश्न खड़ा कर रहे लोगों को अब उनके ही सहयोगी आईना दिखा रहे हैं। कांग्रेस के तीन बड़े नेताओं ने ईवीएम पर अपनी ही पार्टी के मत की आलोचना की है। पंजाब में कांग्रेस को उम्मीद से अधिक बहुमत दिलाने वाले वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ईवीएम में छेड़छाड़ के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना उचित ही है कि यदि ईवीएम में छेड़छाड़ संभव होती, तब क्या कांग्रेस पंजाब में सत्ता में आ पाती? यदि ईवीएम में छेड़छाड़ होती तो वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठे होते बल्कि अकाली दल का कोई नेता वहाँ होता। पंजाब के मुख्यमंत्री के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी ईवीएम में छेड़छाड़ के मुद्दे को नकारा है। उन्होंने नानजांगुड और गुंडलूपेट विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस की दोबारा जीत का उदाहरण देकर यह बात कही है। इससे पूर्व कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने तो अन्य दलों के सुर में सुर मिलाकर ईवीएम का विरोध करने के अपने पार्टी के फैसले की कड़ी आलोचना की है। यहाँ तक कि उन्होंने इसे 'पराजयवादी मानसिकता' कह दिया।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

गौ-संरक्षण में गुजरात सरकार का अनुकरणीय प्रयास

 भारतीय  संस्कृति में गाय का बड़ा महत्व है। गाय के साथ इस देश का संबंध मात्र भावनात्मक नहीं है, वरन भारतीय समाज के पोषण में गौवंश का प्रमुख स्थान रहा है। भारत में गाय धार्मिक और आर्थिक, दोनों की बराबर प्रतीक है। यही कारण है कि प्राचीन समय में गौ-धन से सम्पन्नता देखी जाती थी। गाय के प्रति सब में बराबर सम्मान और श्रद्धा थी। फिर चाहे वह भारत में आक्रांता के रूप में आए समूह हों या फिर शरण लेने आए शरणार्थी, सभी गौ-हत्या से दूर रहते थे। परंतु, कालांतर में गोपालकों को चिढ़ाने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए गौ-हत्या प्रारंभ की गई। गाय को मां कहने वाला समाज गौ-वंश की हत्या बर्दाश्त नहीं कर सकता था। इसी पीड़ा से इस देश में गौ-हत्या के विरुद्ध गौ-संरक्षण आंदोलनों की शुरुआत होती है। भारतीय संस्कृति की धुरी गाय के संरक्षण के लिए भारत में कठोर कानून बनाने की मांग लम्बे समय से उठाई जाती रही है। इन्हीं मांगों के बीच गुजरात सरकार ने गौ-संरक्षण की दृष्टि से सख्त और सराहनीय कानून बनाया है। गुजरात देश का पहला राज्य है, जहां गौ-हत्या के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है।

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

तुम्हें समझ नहीं आएंगे श्रीकृष्ण

 प्रख्यात  अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भगवान श्रीकृष्ण को 'ईव टीजर' कह कर अपने बौद्धिक स्तर का परिचय दिया है। श्रीकृष्ण के संदर्भ में प्रशांत भूषण का ट्वीट नि:संदेह निंदनीय और अशोभनीय है। यह सरासर देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाकर सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का हथकंडा है। प्रशांत भूषण के बयान को अभिव्यक्ति की आजादी कतई नहीं कहा जा सकता। यदि यह अभिव्यक्ति की आजादी है, तब कमलेश तिवारी जेल में क्यों है? आज यह प्रश्न देश के तमाम नागरिक पूछ रहे हैं। क्या इस देश में हिंदुओं की आस्थाओं का कोई मोल नहीं है? उनके आराध्य और प्रतीकों पर बेहूदा टिप्पणी करने पर कठोर सजा क्यों नहीं है? प्रशांत भूषण के कुतर्क पर देश में गहरी नाराजगी है। यह भूषण का सौभाग्य है कि उन्होंने उस समाज के आराध्य का अपमान किया है, जो न केवल सहिष्णु है बल्कि दूसरों का सम्मान करना जानता है। यदि इसी प्रकार की टिप्पणी वकील भूषण ने किसी और पंथ के पैगम्बर के संबंध में की होती, तब उन्हें समझ आता कि वास्तव में असहिष्णुता क्या है और अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा क्या है? जबकि बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाकर जनता के सामान्य से गुस्से को भी प्रशांत भूषण के समर्थक असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे की तरह देख रहे हैं। दरअसल, प्रशांत भूषण की विचारधारा वाला बुद्धिजीवी वर्ग अभिव्यक्ति की आजादी का ठेका सिर्फ अपने पास रखना चाहता है, वह देश के सामान्य नागरिकों को सहज प्रतिक्रिया भी देने से रोकने का पक्षधर है।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

महिलाओं के हित में आए निर्णय

 पिछले  ढाई साल में तीन तलाक का मसला काफी बड़ा हो गया है। तीन तलाक पर व्यापक बहस प्रारंभ हो चुकी है। हालाँकि, मुस्लिम महिलाओं की ओर से लम्बे समय से तीन तलाक को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है। लेकिन, अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला। अब तक की सरकारों ने मुस्लिम महिलाओं की आवाज को न तो सुना और न ही उनका समर्थन किया। वरन् शाहबानो प्रकरण में तो तत्कालीन कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटकर एक तरह से मुस्लिम महिलाओं को उनकी बदहाली पर छोड़ दिया था। महिलाओं के संघर्ष को उस वक्त ताकत और सफल होने की उम्मीद मिली, जब मई-२०१४ में केंद्र में भाजपानीत सरकार का गठन हुआ। क्योंकि, भारतीय जनता पार्टी सदैव से समान नागरिक संहिता और मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी के लिए तीन तलाक को खत्म करने की हिमायती रही है। भाजपा के शीर्ष नेता अकसर अपने भाषणों में मुस्लिम महिलाओं के हित में तीन तलाक को खत्म करने की मांग उठाते रहे हैं। हाल में सम्पन्न उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी तीन तलाक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना था। माना जा रहा है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा को जो प्रचंड बहुमत मिला है, उसमें मुस्लिम महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

अल्पसंख्यक कौन?

 भारत  के राज्य जम्मू-कश्मीर में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक का मुद्दा बड़ी बहस में तब्दील हो सकता है। इस मसले पर बहस होनी भी चाहिए। देश के उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा है कि केंद्र और राज्य सरकार को आपस में बातचीत करके इस मसले का हल खोजना चाहिए चाहिए कि राज्य में मुस्लिम समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलते रहने देना चाहिए या नहीं? उन्होंने चार सप्ताह में इस मुद्दे पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। ध्यान देने की बात यह है कि उच्चतम न्यायालय ने इस मुद्दे को महत्त्वपूर्ण माना है। यकीनन यह बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि देश के संदर्भ में भी इस पर व्यापक बहस की जानी चाहिए। आखिर किस सीमा तक किसी समाज को अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए? अल्पसंख्यक दर्जे को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। यह संवेदनशील मुद्दा है। इस पर बहस के अपने खतरे भी हैं। लेकिन, तमाम खतरों के प्रभाव को कम करने के उपाय खोजते हुए इस विषय पर एक गंभीर और सकारात्मक बहस की जरूरत है।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

नये भारत की बात

 प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी अपने बहुचर्चित रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में हर बार समाजहित और देशहित की बातों को उठाते रहे हैं। संभवत: वह समाज को भी राष्ट्र निर्माण की भूमिका में सक्रिय करना चाहते हैं। क्योंकि, उनका प्रशिक्षण उस वैचारिक पृष्ठभूमि में हुआ है, जिसका मानना है सार्थक बदलाव समाज को जागरूक और सक्रिय करके ही आ सकते हैं। स्थायी बदलाव के लिए समाज को उसकी भूमिका का भान करना और उस भूमिका में उसे सक्रिय करना आवश्यक है। सरकार के बूते समाज में स्थायी बदलाव संभव नहीं है। सरकार सुविधा प्रदान करने में सक्षम है, लेकिन राष्ट्र निर्माण की वास्तविक शक्ति तो नागरिकों के हाथ में निहित है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री 'मन की बात' में बार-बार समाज को उसकी जिम्मेदारियों का ध्यान दिलाते हैं और नागरिकों से आग्रह करते हैं कि वह भी सरकार के साथ कदमताल करें।

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

हिंदू-मुस्लिम एकता की भव्य इमारत खड़ी करने का अवसर

 भारत  के स्वाभिमान और हिंदू आस्था से जुड़े राम मंदिर निर्माण का प्रश्न एक बार फिर बहस के लिए प्रस्तुत है। उच्चतम न्यायालय की एक अनुकरणीय टिप्पणी के बाद उम्मीद बंधी है कि हिंदू-मुस्लिम राम मंदिर निर्माण के मसले पर आपसी सहमति से कोई राह निकालने के लिए आगे आएंगे। राम मंदिर निर्माण पर देश में एक सार्थक और सकारात्मक संवाद भी प्रारंभ किया जा सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह राम मंदिर निर्माण के मसले पर मध्यस्थता करने को तैयार हैं, यदि दोनों पक्ष न्यायालय के बाहर सहमति बनाने को राजी हों। उन्होंने यह भी कहा कि यह एक संवेदनशील और भावनाओं से जुड़ा मसला है। अच्छा यही होगा कि इसे बातचीत से सुलझाया जाए। निश्चित ही मुख्य न्यायमूर्ति का परामर्श उचित है। दोनों पक्षों को उदार मन के साथ इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। मुख्य न्यायमूर्ति का विचार इस विवाद के समाधान की आदर्श पद्धति है। समूचा देश भी यही चाहता है भगवान राम का मंदिर अयोध्या में बिना किसी विवाद के बहुत पहले ही आपसी सहमति से बन जाना चाहिए था। लेकिन, यह राह इतनी आसान भी नहीं है। इस राह पर चलने में कुछ लोगों के कदम ठिठकेंगे, तो कुछ लोग इस राह आना ही नहीं चाहेंगे। उच्चतम न्यायालय के मंतव्य पर आईं प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट भी हो गया है कि कुछ लोगों को यह सुझाव रास नहीं आया है।

गुरुवार, 23 मार्च 2017

कौन हैं मुसलमानों को योगी का डर दिखाने वाले लोग?

 उत्तरप्रदेश  में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से जिन्हें प्रदेश में मुसलमानों के लिए संकट दिखाई दे रहा है, वे लोग पूर्वाग्रह से ग्रसित तो हैं ही, भारतीय समाज के लिए भी खतरनाक हैं। उनके पूर्वाग्रह से कहीं अधिक उनका बर्ताव और उनकी विचार प्रक्रिया सामाजिक ताने-बाने के लिए ठीक नहीं है। योगी आदित्यनाथ को मुस्लिम समाज के लिए हौव्वा बनाकर यह लोग उत्तरप्रदेश का सामाजिक सौहार्द बिगाडऩा चाहते हैं। योगी आदित्यनाथ सांप्रदायिक हैं, वह कट्टर हैं, मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा के बाद से ही मुस्लिम समुदाय के लोग दहशत में है, अब उत्तरप्रदेश में मुस्लिमों के बुरे दिन आ गए, उन्हें मारा-पीटा जाएगा और उनका शोषण होगा, इस प्रकार की निराधार आशंकाएं व्यक्त करने का और क्या अर्थ हो सकता है? दरअसल, मुसलमानों को योगी आदित्यनाथ का डर दिखाने वाले लोग राजनीतिक और वैचारिक मोर्चे पर बुरी तरह परास्त हो चुके हैं। योगी के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी और लिखत-पढ़त करके यह लोग अपनी हताशा को उजागर कर रहे हैं। राजनीतिक तौर पर निराश-हताश और विभाजनकारी मानसिकता के इन लोगों को समझ लेना चाहिए कि उत्तरप्रदेश की जनता क्या, अब देश भी उनके कुतर्कों को सुनने के लिए तैयार नहीं है। उत्तरप्रदेश के रण में पराजय का मुंह देखने वाली कांग्रेस, बसपा और सपा से कहीं अधिक बेचैनी कम्युनिस्ट खेमे में दिखाई दे रही है। कम्युनिस्ट खेमे के राजनेता, विचारक और पत्रकार ठीक उसी प्रकार के 'फ्रस्टेशन' को प्रकट कर रहे हैं, जैसा कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने पर किया गया था। उस समय इन्होंने नरेन्द्र मोदी के नाम पर देश के मुसलमानों को डराने और भड़काने का प्रयास किया, आज योगी आदित्यनाथ के नाम पर कर रहे हैं। देश के मुसलमानों पर न तो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से कोई खतरा आया है और न ही योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से कोई संकट खड़ा होने वाला है।

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

कट्टरपंथ की बुरी नजर से कला-संस्कृति को बचाना होगा

 असम  के 46 मौलवियों की कट्टरपंथी सोच को 16 वर्षीय गायिका नाहिद आफरीन ने करारा जवाब दिया है। नाहिद ने कहा है कि खुदा ने उसे गायिका का हुनर दिया है, संगीत की अनदेखी करना मतलब खुदा की अनदेखी होगा। वह मरते दम तक संगीत से जुड़ी रहेंगी और वह किसी फतवे से नहीं डरती हैं। इंडियन आइडल से प्रसिद्ध हुई नाहिद आफरीन ने हाल में आतंकवाद और आईएसआईएस के विरोध में गीत गाए थे। आशंका है कि कट्टरपंथियों को यह बात चुभ गई होगी। सुरीली आवाज का गला घोंटने के लिए कट्टरपंथियों ने 46 फरमान जारी करते हुए नाहिद को 25 मार्च को संगीत कार्यक्रम की प्रस्तुति नहीं देने के लिए धमकाया है। आफरीन के खिलाफ मंगलवार को मध्य असम के होजई और नागांव जिलों में कई पर्चे बांटे गए, जिनमें असमिया भाषा में फतवा और फतवा जारी करने वाले लोगों के नाम हैं। इन फतवों के अनुसार, 25 मार्च को असम के लंका इलाके के उदाली सोनई बीबी महाविद्यालय में 16 साल की नाहिद को गीत गाना है, जिसे पूरी तरह से शरिया के खिलाफ बताया गया है। फतवों की माने तो संगीत संध्या जैसी चीजें पूरी तरह से शरिया के खिलाफ हैं। दरअसल, इन मौलवियों के दिमाग में जहर भरा हुआ है। यही कारण है कि उन्हें एक बच्ची की प्रतिभा दिखाई नहीं दे रही। इन्हें भारत में इस्लाम और संगीत के रिश्ते की समझ भी नहीं है। 21वीं सदी में आगे बढ़ने की जगह इस्लाम के यह ठेकेदार अपनी कौम को पीछे धकेलने का निंदनीय कृत्य कर रहे हैं। अब भी यह कूपमंढूक बने रहना चाहते हैं।

गुरुवार, 16 मार्च 2017

हार की जिम्मेदारी ईवीएम पर

 उत्तरप्रदेश,  पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के इस्तेमाल पर बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। बसपा प्रमुख मायावती ने दूसरी बार प्रेसवार्ता आयोजित करके ईवीएम में छेड़छाड़ कर बेईमानी से चुनाव जीतने के आरोप भारतीय जनता पार्टी पर लगाए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा की जीत ईमानदारी की नहीं है, बल्कि ईवीएम में धांधली करके यह जीत हासिल की है। मायावती ने इस मामले पर उच्चतम न्यायालय जाने और आंदोलन करने की बात कही है। वहीं, बुधवार को ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी एक प्रेसवार्ता में यह आरोप लगाए कि ईवीएम में गड़बड़ी करके पंजाब चुनाव में उनके मत चुराकर अकाली दल और भाजपा के गठबंधन को हस्तांतरित किए गए हैं।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

लाल हिंसा के खिलाफ देशभर में जनाक्रोश

केरल में राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध लोगों की हत्या और कम्युनिस्ट अत्याचार के विरुद्ध देशभर में आम समाज ने बुलंद की आवाज
 केरल  में पिछले 50 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेविका समिति सहित अन्य सभी राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध संगठनों के सामान्य स्वयंसेवकों की हत्या की जा रही है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कार्यकर्ता नृशंसता से अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। दस माह पहले केरल में माकपा की सत्ता आने के बाद से लाल आतंक में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। मई, 2016 से अब तक 20 से अधिक स्वयंसेवकों की हत्याएं माकपा के गुण्डों ने की हैं। केरल राज्य के कन्नूर जिले मंअ स्थितियां और भी भयावह हैं। राज्य के मुख्यमंत्री पी. विजयन सहित माकपा पोलित ब्यूरो के अधिकतम सदस्य कन्नूर जिले से ही आते हैं। लेकिन, हैरानी की बात है कि देश का तथाकथित बौद्धिक जगत और मीडिया का बहुसंख्यक वर्ग इस आतंक पर खामोश है। दिल्ली से उठते अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता के नारे केरल क्यों नहीं पहुंचते? राष्ट्रभक्त लोगों के लहू से लाल हो रही देवभूमि क्यों किसी को दिखाई नहीं दे रही है? तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग और मीडिया की चुप्पी के बीच केरल में भयंकर रूप धारण कर चुके लाल आतंक के खिलाफ अब देश खड़ा हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आह्वान पर देशभर में नागरिक अधिकार, जनाधिकार और मानव अधिकार मंचों के तहत आम समाज एकजुट होकर लाल आतंक के खिलाफ जनाक्रोश व्यक्त कर रहा है। मार्च के पहले सप्ताह में एक, दो और तीन तारीख को देश के प्रमुख स्थानों पर समाज के संवेदनशील नागरिक बंधुओं ने 'संवेदना मार्च' निकाले और धरने आयोजित किए हैं।

बुधवार, 1 मार्च 2017

रामजस पर हल्ला, केरल पर चुप्पी क्यों?

 रामजस  महाविद्यालय प्रकरण से एक बार फिर साबित हो गया कि हमारा तथाकथित बौद्धिक जगत और मीडिया का एक वर्ग भयंकर दोगला है। एक तरफ ये कथित धमकियों पर भी देश में ऐसी बहस खड़ी कर देते हैं, मानो आपातकाल ही आ गया है, जबकि दूसरी ओर बेरहमी से की जा रही हत्याओं पर भी चुप्पी साध कर बैठे रहते हैं। वामपंथ के अनुगामी और भारत विरोधी ताकतें वर्षों से इस अभ्यास में लगी हुई हैं। अब तक उनका दोगलापन सामने नहीं आता था, लेकिन अब सोशल मीडिया और संचार के अन्य माध्यमों के विस्तार के कारण समूचा देश इनके पाखण्ड को देख पा रहा है। इस पाखण्ड के कारण आज पत्रकारिता जैसा पवित्र माध्यम भी संदेह के घेरे में आ गया है। पिछले ढाई साल में अपने संकीर्ण और स्वार्थी नजरिए के कारण इन्होंने असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी को मजाक बना कर रख दिया है। रामजस महाविद्यालय का प्रकरण भी इसकी ही एक बानगी है।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

हिंदू आबादी घटने पर विवाद नहीं चिंता करनी चाहिए

 अरुणाचल  प्रदेश में हिंदू जनसंख्या के सन्दर्भ में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के बयान पर कुछ लोग विवाद खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि उनका बयान एक कड़वी हकीकत को बयां कर रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि उनके बयान पर वो लोग हायतौबा मचा रहे हैं, जो खुद को पंथनिरपेक्षता का झंडाबरदार बताते हैं। हिंदू आबादी घटने के सच पर विवाद क्यों हो रहा है, जबकि यह तो चिंता का विषय होना चाहिए। जनसंख्या असंतुलन आज कई देशों के सामने गंभीर समस्या है, लेकिन हमारे नेता इस गम्भीर चुनौती को भी क्षुद्र मानसिकता के साथ देख रहे हैं।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

हिन्दू सम्मलेन का सन्देश

 मध्यप्रदेश  के वनवासी समाज बाहुल्य जिले बैतूल में संपन्न हिन्दू सम्मलेन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संगठित हिन्दू से समर्थ भारत का सन्देश दिया है। अर्थात भारत के विकास और उसे विश्वगुरु बनाने के लिए उन्होंने हिन्दू समाज में समरसता एवं एकता को आवश्यक बताया। उनका मानना है कि दुनिया जब विविध प्रकार के संघर्षों के समाधान के लिए भारत की ओर देख रही है और भारत को विश्वगुरु की भूमिका में भी देख रही है, तब भारत को विश्वगुरु बनाने की जिम्मेदारी इस देश हिन्दू समाज की ही है। यह सही भी है इस देश की संतति ही संगठित नहीं होगी तो देश कैसे विश्व मंच पर ताकत के साथ खड़ा होगा।

जेएनयू की बीमारी, 'देशद्रोह' के प्रोफेसर

 जवाहरलाल  नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) अपने विद्यार्थियों और शिक्षकों के रचनात्मक कार्यों से कम बल्कि उनकी देश विरोधी गतिविधियों से अधिक चर्चा में रहता है। पिछले वर्ष जेएनयू परिसर देश विरोधी नारेबाजी के कारण बदनाम हुआ था, तब जेएनयू की शिक्षा व्यवस्था पर अनेक सवाल उठे थे। यह सवाल भी बार-बार पूछा गया था कि जेएनयू के विद्यार्थियों समाज और देश विरोधी शिक्षा कहाँ से प्राप्त कर रहे हैं? शिक्षा और बौद्धिक जगत से यह भी कहा गया था कि जेएनयू के शिक्षक हार रहे हैं। वह विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने में असफल हो रहे हैं। लेकिन, पिछले एक साल में यह स्पष्ट हो गया है कि जेएनयू के शिक्षक हारे नहीं है और न ही विद्यार्थियों के मार्गदर्शन में असफल रहे हैं, बल्कि वह अब तक जीतते रहे हैं और अपनी शिक्षा को विद्यार्थियों में हस्थातंरित करने में सफल रहे हैं। 

कांग्रेस से लोकतंत्र है या लोकतंत्र से कांग्रेस

 संसद  में कांग्रेस की ओर से दावा किया गया है कि उसके कारण भारत में लोकतंत्र बचा हुआ है। कांग्रेस की ओर से संसद में उसके नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने कहा कि कांग्रेस को देश में लोकतंत्र बनाए रखने का श्रेय मिलना चाहिए, जिसके कारण एक गरीब परिवार से आने वाले नरेंद्र मोदी भी भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा पाए। संसद में यह भाषण करते वक्त खडग़े भूल गए कि कांग्रेस ने १९७५ में लोकतंत्र का गला घोंटने की पूरी कोशिश की थी। आजादी के आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाली कलम पर पहरा बैठा दिया गया था। विरोधी विचारधारा के लोगों को पकड़-पकड़ कर जेलों में ठूंसा गया और उनको यातनाएं दी गईं। लेकिन, जनशक्ति के सामने कांग्रेस की तानाशाही टिक नहीं सकी और इस देश में लोकतंत्र को खत्म करने के षड्यंत्र में कांग्रेस कामयाब नहीं हो सकी। आजादी के बाद से अब तक ७० साल में कांग्रेस ने जितने घोटाले किए हैं, उनके आधार पर उसे सत्ता मिलनी ही नहीं चाहिए, लेकिन यह लोकतंत्र है कि देश में भ्रष्टाचार का नाला बहाने के बाद भी कांग्रेस आज न केवल अस्तित्व में है, बल्कि कुछेक राज्यों में सत्तासीन भी है। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को समझना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र उनके कारण नहीं बचा है, बल्कि लोकतंत्र के कारण वह बची हुई है। 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

'भगवान के घर' में वामपंथ का आतंक

 'ईश्वर  का अपना घर' कहा जाने वाला प्राकृतिक संपदा से सम्पन्न प्रदेश केरल लाल आतंक की चपेट में है। प्रदेश में लगातार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है। केरल वामपंथी हिंसा के लिए बदनाम है, लेकिन पिछले कुछ समय में हिंसक घटनाओं में चिंतित करने वाली वृद्धि हुई है। खासकर जब से केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) सरकार आई है, तब से राष्ट्रीय विचार से जुड़े निर्दोष लोगों और उनके परिवारों को सुनियोजित ढंग से निशाना बनाया जा रहा है। संघ और भाजपा का कहना है कि प्रदेश में मार्क्सवादी हिंसा को मुख्यमंत्री पी. विजयन का संरक्षण प्राप्त है। अब तक की घटनाओं में स्पष्टतौर पर माकपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं की संलिप्तता उजागर हुई है। लेकिन, राज्य सरकार ने हिंसा को रोकने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठाए हैं, बल्कि घटनाओं की लीपापोती करने का प्रयास जरूर किया है। इसलिए मुख्यमंत्री पी. विजयन सहित समूची माकपा सरकार संदेह के घेरे में है।

सोमवार, 30 जनवरी 2017

इतिहास को विकृत करने की जिद

 भारतीय  फिल्म उद्योग में जब भी किसी ऐतिहासिक घटना या व्यक्तित्व पर फिल्म बनाने का विचार प्रारंभ होता है, तब उसके साथ विवाद भी उत्पन्न हो जाते हैं। दरअसल, हमारे निर्देशकों में एक बड़ी बीमारी है कि वह इतिहास को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत न करके अपने ढंग से छेड़छाड़ करके प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। जहाँ मान्य सत्य के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास किया जाता है, वहीं विवाद खड़ा होता है। निर्देशक अपने चश्मे से इतिहास को देखने और दिखाने की जिद में समाज को आहत करने की गलती कर बैठते हैं। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक-निर्माता संजय लीला भंसाली को थप्पड़ मारने की घटना इसी आहत समाज के आक्रोश का प्रकटीकरण है। करणी सेना के लोगों ने जयपुर में 'पद्मावती' फिल्म के शूटिंग स्थल पर पहुंच कर विरोध किया और भंसाली को थप्पड़ मार दिया। करणी सेना के इस कृत्य की निंदा की जानी चाहिए। लेकिन, जितनी निंदा करणी सेना की करना जरूरी है, उससे कहीं अधिक निंदा और आलोचना संजय लीला भंसाली की भी करना  आवश्यक है।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

जायज है समान नागरिक संहिता की माँग

 प्र ख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन ने जयपुर साहित्य उत्सव (जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल) के मंच से एक महत्त्वपूर्ण बहस को हवा दी है। सदैव चर्चा में रहने वाली बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने साहित्य उत्सव में माँग की है कि देश में तुरंत समान नागरिक संहिता लागू की जाए। तसलीमा बेबाकी से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर अपनी बात रखने के लिए जानी जाती हैं। इस कारण वह मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर भी रहती हैं। समान नागरिक संहिता की माँग करते वक्त उन्होंने कहा भी कि जब वह हिंदुत्व का विरोध करती हैं तब किसी को कोई परेशानी नहीं होती है, लेकिन जब इस्लाम की आलोचना करती हैं या फिर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करती हैं, तब उन्हें जान से मारने की धमकी दी जाती है। उन्हें खत्म करने के लिए गैरकानूनी फतवा तक जारी कर दिया जाता है।

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

केरल में जंगलराज

 केरल  में बढ़ती हिंसा इस बात का सबूत है कि वामपंथ से बढ़कर हिंसक विचार दूसरा कोई और नहीं है। वामपंथी विचार घोर असहिष्णु है। असहिष्णुता इस कदर है कि वामपंथ को दूसरे विचार स्वीकार्य नहीं है, अपितु उसे अन्य विचारों का जीवत रहना भी बर्दाश्त नहीं है। इस विचारधारा के शीर्ष विचारकों ने अपने जीवनकाल में हजारों-लाखों निर्दोष लोगों का खून बहाकर उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। जिस वामपंथी नेता ने विरोधियों का जितना रक्त बहाया, उसे उतना ही अधिक महत्त्व दिया गया है। दरअसल, वामपंथी विचारधारा के मूल में हिंसा है, जिसका प्रकटीकरण वामपंथ को मानने वालों के व्यवहार में होता है। तानाशाह प्रवृत्ति की इस विचारधारा ने भारत में मजबूरी में लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया है। यही कारण है कि लोकतांत्रिक मूल्यों में इनकी आस्था दिखाई नहीं देती है। भारत के जिस हिस्से में यह विचार ताकत में आया, वहाँ हिंसा और तानाशाही का नंगा नाच खेला। केरल के वर्तमान हालात इस बात के गवाह हैं।

सोमवार, 23 जनवरी 2017

सीमारेखा लांघते केजरीवाल

 देश  में रचनात्मक राजनीति का दावा करने वाले आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल निरंतर अमर्यादित राजनीति के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका राजनीतिक आचरण किसी भी प्रकार रचनात्मक और सकारात्मक दिखाई नहीं देता है। यह कहना अधिक उचित ही होगा कि कई अवसर पर उनका आचरण निंदनीय ही नहीं, अपितु आपत्तिजनक भी होता है। यह भी स्थापित हो चुका है कि केजरीवाल की राजनीति आरोपों से शुरू होकर आरोपों पर ही खत्म होती है। आरोप दागने की अपनी तोप के निशाने पर वह किसी को भी ले सकते हैं, क्योंकि उन्हें यह भी गुमान है कि समूची भारतीय राजनीति में उनके अलावा कोई दूसरा नेता ईमानदार नहीं है। यहाँ तक कि वह संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ भी मुँह खोलने से पहले विचार नहीं करते हैं। चुनाव आयोग की फटकार से सबक सीखने की बजाय आयोग को ही न्यायालय में चुनौती देने का दंभ उनके इसी आचरण की बानगी है।

सोमवार, 16 जनवरी 2017

तस्वीर की जगह गांधी विचार पर बहस होनी चाहिए

 कैलेंडर  और डायरी पर महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर से उत्पन्न विवाद बेवजह है। यह इसलिए, क्योंकि भारत में इस बात की कल्पना ही नहीं की जा सकती है कि किसी कागज के टुकड़े पर चित्र प्रकाशित नहीं होने से गांधीजी के व्यक्तित्व पर पर्दा पड़ जाएगा। यह तर्क तो हास्यास्पद ही है कि गांधीजी के चित्र की जगह प्रधानमंत्री का चित्र इसलिए प्रकाशित किया गया है, ताकि गांधी की जगह मोदी ले सकें। गांधीजी की जगह वास्तव में कोई नहीं ले सकता। आश्चर्य की बात यह है कि गांधीजी के चित्र को लेकर सबसे अधिक चिंता उन लोगों को हो रही है, जिन्होंने 70 साल में गांधीजी के विचार को पूरी तरह से दरकिनार करके रखा हुआ था। सिर्फ राजनीति की दुकान चलाने के लिए ही यह लोग गांधी नाम की माला जपते रहे हैं। वास्तव में आज जरूरत इस बात की है कि गांधीजी के विचार पर बात की जाए। इस बहस में इस पहलू को भी शामिल किया जाए कि आखिर इस देश में गांधीजी के विचार को दरकिनार करने में किसकी भूमिका रही है? आखिर अपने ही देश में गांधीजी कैलेंडर, डायरी, नोट और दीवार पर टंगे चित्रों तक ही सीमित क्यों रह गए? उनके विचार को व्यवहार में लाने की सबसे पहले जिम्मेदारी किसके हिस्से में आई थी और उन्होंने क्या किया?

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