बुधवार, 10 अगस्त 2016

जरा याद करो कुर्बानी

 आजादी  की 70वीं सालगिरह से ठीक पहले महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जन्मभूमि भाबरा में 'आजादी 70 साल, याद करो कुर्बानी' अभियान की शुरुआत करने का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का निर्णय सराहनीय है। प्रधानमंत्री मोदी ने मध्यप्रदेश के अलीराजपुर स्थित चंद्रशेखर आजाद स्मारक जाकर उन्हें याद किया और देशवासियों से आह्वान किया कि आजादी के 70 साल और भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल पूरे होने के मौके पर हमारा कर्तव्य बनता है कि हम स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने वाले लोगों को याद करें। हम उन लक्ष्यों को पाने की कोशिश करें, जिन्हें पाने का सपना लेकर आजादी के नायकों ने अपना जीवन कुर्बान किया। कहने को हम कह सकते हैं कि हम स्वतंत्रता सेनानियों को भूले कब हैं, जो याद करें। लेकिन, कलेजे पर हाथ रखकर खुद से पूछिए कि सवा सौ करोड़ भारतवासियों में से कितनों को स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान याद है। कितने लोग हैं, जो कम से कम दस बलिदानियों के नाम भी बता पाएंगे? उससे भी जरूरी सवाल यह है कि स्वतंत्रता सेनानियों ने किस बात के लिए अपने प्राणों की आहूति दी?
         यह ऐसे सवाल हैं, जिन्हें बार-बार हमें खुद से ही पूछना चाहिए। इस प्रश्नों को लेकर आत्मचिंतन करना चाहिए कि हम बलिदानियों के सपनों को कितना साकार कर रहे हैं? स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जवानी आज के भारत के लिए दांव पर लगा दी, लेकिन आज के भारत की जवानी देश के लिए क्या दांव पर लगा रही है? क्या यह सच नहीं कि हम महान लोगों के बलिदान को व्यर्थ गंवा रहे हैं? क्या यह सच नहीं कि हमने अपने निर्लज्ज स्वार्थों की पूर्ति के लिए अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को मजाक बनाकर रख दिया है। जिसको जो मर्जी आती है, करता है और कहता है। खासकर, हमारे युवाओं को अपने ख्वाबों को टटोलना चाहिए कि उनमें देश कहाँ और कितना है? जिनकी आकांक्षाओं के अनुरूप देश चलना चाहिए था, वहीं जवानी किसी और के हाथों की कठपुतली बन गई है। जम्मू-कश्मीर का नौजवान चंद कट्टरपंथियों के बहकाबे में आकर अपने ही देश पर पत्थर उछाल रहा है। प्रधानमंत्री ने सच ही कहा कि जिन हाथों में लैपटॉप होना चाहिए, उन हाथों में पत्थर देखकर पीड़ा होती है। इसी तरह, वामपंथ के फेर में फंसा नौजवान, नक्सली बनकर बंदूक का बोझा ढो रहा है। कुछ नौजवानों की नसें जाकिर नाइक की जहरीली तकरीरों पर उत्तेजित होती हैं और वे इस्लामिक स्टेट का रास्ता चुनते हैं। शिक्षा संस्थानों में ज्ञानार्जन की जगह भारत का युवा अपने ही देश के टुकड़े-टुकड़े करने का नारा बुलंद कर रहा है। 
         आज जब इन परिस्थितियों को गौर से देखते हैं तब समूचे देश में राष्ट्रभक्ति का भाव जगाने के लिए 'आजादी के 70 साल, याद करो कुर्बानी' जैसे अभियान की प्रासंगिकता स्पष्टतौर पर नजर आती है। देश के नौजवानों को शहीदों के बलिदान और उनके विचारों की याद दिलाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने कितनी सुंदर बात कही है कि 'आज के हिंदुस्थान में ज्यादातर लोग आजादी के बाद पैदा हुए हैं। आजादी के बाद जन्म लेने वालों को स्वतंत्रता हासिल करने के लिए बलिदान देने का अवसर नहीं मिला। इसलिए हम संकल्प लें कि हम भी देश के गांव, गरीब, शोषित और वंचितों के लिए बेहतर करने का प्रयास करेंगे।' वाकई, यदि आज का नौजवान यह संकल्प कर ले, तब देश की तस्वीर बदलने में अधिक वक्त नहीं लगेगा। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति डेंगू निरोधक दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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  2. नमन है आज़ाद को ... उनकी कुर्बानी भूलना नामुमकिन है ...

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