शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

विश्व का अनूठा धार्मिक महापर्व कुम्भ


मेषराशिगते सूर्ये सिंहराशौ बृहस्पतौ।
उज्जयिन्यां भवेत्कुम्भ: सर्वसौख्य विवर्धन:।।
अर्थात् - सूर्य मेष राशि में एवं बृहस्पति सिंह राशि में जब आते हैं, तब उज्जयिनी (उज्जैन) में सभी के लिए सुखदायक कुम्भयोग आता है। चूंकि बृहस्पति सिंह राशि पर रहते हैं इसलिए सिंहस्थ कुम्भयोग के नाम से यह प्रसिद्ध है।
आज चैत्र शुक्ल पूर्णिमा का वह सुअवसर है जब महाकाल की नगरी उज्जयिनी में सिंहस्थ कुम्भ महापर्व शुरू होगा। भारत के चार कुम्भ पर्वों में उज्जैन का कुम्भ 'सिंहस्थ कुम्भ महापर्व' कहलाता है। प्राचीन ग्रन्थों में कुरुक्षेत्र से गया को दस गुना, प्रयाग को दस गुना और गया को काशी से दस गुना पवित्र बताया गया है, लेकिन कुशस्थली अर्थात उज्जैन को गया से भी दस गुना पवित्र कहा गया है। कहते हैं कि प्राचीन काल में हिमालय के समीप क्षीरोद नामक समुद्र तट पर देवताओं तथा दानवों ने एकत्र होकर फल प्राप्ति के लिए समुद्र-मन्थन किया। मन्थन में चौदह रत्न निकले। सबसे आखिर में अमृत का कुम्भ अर्थात घड़ा सबसे अन्त में निकला। दानवों से अमृत की रक्षा करने के लिए देवता जयन्त अमृत के कलश को लेकर आकाश में उड़ गए। अमृत-कलश को लेकर देवताओं और दानवों में 12 दिन तक संघर्ष चला। छीना-झपटी में कुम्भ से अमृत की बूँदें छलक कर जिन स्थानों पर गिरीं, वे हैं प्रयाग, हरिद्वार, नासिक तथा उज्जैन। इन चारों स्थानों पर जिस-जिस समय अमृत गिरा उस समय सूर्य, चन्द्र, गुरु आदि ग्रह-नक्षत्रों तथा अन्य योगों की स्थिति भी उन्हीं स्थितियों के आने पर प्रत्येक स्थान पर यह कुम्भ पर्व मनाये जाने लगे।
        हम चाहें तो इस कथा को महज पौराणिक मान सकते हैं। या फिर इस कथा के वैज्ञानिक और वैचारिक पहलुओं की ओर भी ध्यान दिया जा सकता है। कुम्भ मेलों के संबंध में यह भी धारणा है कि यह समाज के नियम-परंपराएं तय करने के लिए समय-समय पर देश के चार केन्द्रों पर आयोजित होते थे। कुम्भ आयोजन में भारतीय मनीषियों के खगोल विज्ञान की गहरी समझ भी दिखाई देती है। बहरहाल, आज आरम्भ स्नान के साथ के साथ कुम्भ महापर्व शुरू हो जाएगा। वैशाख शुक्ल पूर्णिमा तक यानी एक माह तक चलने वाले इस महापर्व में देश-दुनिया से श्रद्धालु आएंगे। पवित्र शिप्रा नदी में श्रद्धा की डुबकी लगाएंगे। निश्चित ही सभी सज्जन सिंहस्थ में आध्यात्मिक संतुष्टि पाएंगे, भारतीय ज्ञान-परंपरा से जुड़ेंगे और विभिन्न प्रयोजनों के जरिए आत्मिक शांति की अनुभूति करेंगे। यह ज्ञात तथ्य है कि सिंहस्थ महापर्व में लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों की संख्या में लोग आने वाले हैं। 
        सिंहस्थ सबके लिए सुखदायी साबित हो, सबकी यही मंगलकामना है। मध्यप्रदेश सरकार ने भी अपने अतिथियों के आतिथ्य के लिए भरपूर इंतजाम किया है। प्रदेश सरकार ने बारीक से बारीक बात पर ध्यान दिया है। लेकिन, कुम्भ में पुण्य लाभ लेने के लिए जा रहे हम सबकी भी जिम्मेदारी बनती है कि व्यवस्थाओं का पालन करें। प्रशासन द्वारा तय किए गए नियमों का उल्लंघन करने में अपनी शान नहीं समझें। नियम-अनुशासन का पालन करने में सबका भला है। प्रशासन कितनी भी चाक-चौबंद व्यवस्थाएं कर ले, लेकिन आमजन अपनी जिम्मेदारी न निभाए तो प्रत्येक प्रकार की व्यवस्थाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इसलिए इतने बड़े धार्मिक आयोजन में हम सबकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (23 -04-2016) को "एक सर्वहारा की मौत" (चर्चा अंक-2321) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. इसको दैनिक जागरण में पहले ही पढ़ चूका हूँ गुरु जी

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  3. इसको दैनिक जागरण में पहले ही पढ़ चूका हूँ गुरु जी

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