बुधवार, 30 दिसंबर 2015

सच से क्यों भाग रही है कांग्रेस?

 कां ग्रेस की मुंबई इकाई के मुखपत्र 'कांग्रेस दर्शन' में प्रकाशित लेखों में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सोनिया गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि लेखों के शीर्षक 'कांग्रेस की कुशल सारथी सोनिया गांधी' और 'पिता ने सबसे पहले सोनिया नाम से पुकारा था' से प्रथम दृष्टया यही प्रतीत होता है कि यह लेख कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की स्तुति में लिखे गए हैं। संभवत: लेख का शीर्षक देखकर ही 'कांग्रेस दर्शन' के कंटेंट एडिटर सुधीर जोशी गच्चा खा गए होंगे। कांग्रेस के मुखपत्र में नेहरू-गांधी परिवार के शीर्ष व्यक्तियों के खिलाफ सामग्री प्रकाशित होने की गलती पर सुधीर जोशी को उनके पद से हटा दिया गया है। हालांकि कांग्रेस के कई नेता कांग्रेस दर्शन के संपादक संजय निरुपम को जिम्मेदार मान रहे हैं। क्योंकि, उनकी देखरेख में ही 'कांग्रेस दर्शन' का प्रकाशन होता है।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

नमो-नवाज का मेल, कांग्रेस का क्यों जला दिल

 प्र धानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अप्रत्याशित तरीके से पाकिस्तान का दौरा करके दुनिया को चौंका दिया है। मोदी रूस से लौटते वक्त पहले अफगानिस्तान और फिर वहां से अचानक पाकिस्तान पहुंचे। लाहौर में 2 घंटे 40 मिनट रुके। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ उन्हें रिसीव कर जट्टी उमरा में अपने घर ले गए। मोदी करीब डेढ़ घंटे नवाज के घर थे। वहां नवाज की नातिन मेहरुन्निसा की शादी की रस्में चल रही थीं। नवाज शरीफ के जन्मदिन का भी अवसर था। करीब १२ साल बाद भारत के प्रधानमंत्री का पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को उनके घर पहुंचकर जन्मदिन की बधाई देना, नातिन को आशिर्वाद देना और माँ के चरण छूना, भारत-पाक संबंधों की नई इबारत लिखने जैसा है। 

नक्सलियों की क्रूरता के खिलाफ बच्चियों का आक्रोश

 ज ब कभी पुलिस के हाथों कोई नक्सली मारा जाता है, तब तमाम मानवाधिकारी और वामपंथी विचारक आसमान सिर पर उठा लेते हैं। लेकिन, नक्सलियों की क्रूरता के खिलाफ इनके होंठ सिल जाते हैं। धिक्कार है ऐसे वामपंथी विचारकों और मानवाधिकारियों के प्रति जिन्होंने एक दुधमुंही बच्ची की हत्या पर शर्मनाक तरीके से खामोशी की चादर ओढ़ रखी है। गौरतलब है कि बीजापुर जिले में क्रूर नक्सलियों ने चार माह की दुधमुंही बच्ची की जघन्य हत्या कर दी थी। आखिर कोई बता सकता है कि उस दुधमुंही बच्ची ने किसी का क्या बिगाड़ा होगा? नक्सलियों से उसकी क्या दुश्मनी रही होगी? कोई इतना निर्दयी कैसे हो सकता है कि एक नन्हीं कली को ही मसल दिया? इस तरह की हिंसा किस तरह के समाज का निर्माण करेगी? इस नक्सलवाद ने खूबसूरत बस्तर को नर्क बना दिया है। नक्सलियों की इस बर्बरता पर भले ही मीडिया, वामपंथी बुद्धिजीवियों और मानवाधिकारी खामोश रह गए हों लेकिन बस्तर की बच्चियों ने साहस दिखाया है। उन्होंने नक्सलवाद का घिनोना चेहरा दुनिया को दिखाने का प्रयास किया है। 

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

'सर्वसमावेशी है हिन्दुत्व' : उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी का स्वागत

 उ च्चतम न्यायालय ने 'हिन्दुत्व' को सर्वसमावेशी बताया है। न्यायालय का मानना है कि हिन्दुत्व में सबके लिए जगह है। उच्चतम न्यायालय की इस राय का अध्ययन उन सब सेक्युलर बुद्धिजीवियों और राजनेताओं को करना चाहिए, जिन्होंने देश में हिन्दुत्व को बदनाम करने का अधिकतम प्रयास किया है। अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए वामपंथी और तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने प्रेरणास्पद दर्शन 'हिन्दुत्व' को विवादास्पद बना दिया है। गैर-ब्राह्मणों को मंदिरों में पुजारी बनाने की अनुमति देने वाला तमिलनाडु का एक नियम उच्चतम न्यायालय में समीक्षा के लिए लाया गया था। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने इस नियम की समीक्षा करने से इनकार कर दिया है। तमिलनाडु में मंदिरों के पुजारी एक खास जाति के लोग ही हो सकते थे। तमिलनाडु सरकार ने कानून बनाकर दूसरे जाति के लोगों के लिए भी मंदिर का पुजारी बनने का रास्ता खोल दिया है। अब किसी भी जाति का वह व्यक्ति मंदिर का पुजारी बन सकता है, जिसे परंपराओं और रीति-रिवाजों की सही जानकारी हो।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

माफी मांगी, लेकिन बाकि है अकड़

 त थाकथित असहिष्णुता के मसले पर अपने विवादास्पद बयान के लिए बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान ने माफी मांग ली है। उन्होंने कहा है कि देश में कोई असहिष्णुता नहीं है और अगर उन्होंने किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाई हो तो वह माफी मांगते हैं। गौरतलब है कि अपने ५०वें जन्मदिन के अवसर पर शाहरुख खान ने कहा था कि पिछले कुछ समय से देश में असहिष्णुता बढ़ रही है। देश का माहौल ठीक नहीं है। देश में तेजी से कट्टरता बढ़ रही है। शाहरुख खान ने अवार्ड वापस कर रहे लोगों का समर्थन भी किया था। उन्होंने कहा था कि यदि मुझसे कहा जाता है तो मैं भी प्रतीकात्मक सम्मान लौटा सकता हूँ। देश के बहुत बड़े वर्ग ने उनके इस बयान को देश की प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाला माना था। लोगों का मानना था कि शाहरुख खान को इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए। क्योंकि, देश में ऐसा कोई माहौल है नहीं। जनता ने शाहरुख खान से पूछा भी था कि देश के हालात जब बहुत खराब थे, तब वे चुप क्यों थे?

गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

भ्रष्टाचार का आरोपी कैसे बन गया केजरीवाल का प्रधान सचिव

 दे श की जनता को हैरानी है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के सहारे राजनीति में आने वाले अरविन्द केजरीवाल और उनका दल भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी को पाक-साफ साबित करने का प्रयास क्यों कर रहा है? आआपा और केजरीवाल प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार के साथ खड़े क्यों दिखाई दे रहे हैं? मान लीलिए कि राजेन्द्र कुमार पर लगे आरोप सही साबित हो जाएं, तब अरविन्द केजरीवाल अपने वर्तमान व्यवहार के लिए क्या जवाब देंगे? किससे माफी मांगेंगे? उस समय किस आधार पर यू-टर्न लेंगे? जनता ने अरविन्द केजरीवाल को शासन-प्रशासन में से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए चुना था, भ्रष्ट अधिकारियों का संरक्षण करने के लिए नहीं। इसलिए भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे प्रधान सचिव राजेन्द्र कुुमार के साथ खड़े होने से पहले अरविन्द केजरीवाल को ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए था। 

बुधवार, 16 दिसंबर 2015

ईमानदार को काहे का डर?

 दि ल्ली सचिवालय में मंगलवार की सर्द सुबह जैसे ही सीबीआई ने छापा मारा, देश में राजनीतिक गर्माहट फैल गई। आनन-फानन में ट्विट करके दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने दावा किया है कि छापा उनके दफ्तर पर मारा गया है। जबकि सीबीआई ने स्पष्ट कर दिया है कि छापे की कार्यवाही प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार के दफ्तर में की गई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने आदतन सीबीआई के छापे को केन्द्र सरकार के इशारे पर की गई कार्रवाई बता दिया। सीबीआई के छापे पर राजनीति करने के लिए अरविन्द केजरीवाल इतने उतावले हो गए कि प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक भाषा का उपयोग करने से भी नहीं चूके। केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कायर और मनोरोगी कह दिया। अपनी भाषा पर खेद जताने की जगह केजरीवाल ने शाम को गाँवों को भी बदनाम कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे शब्द खराब हो सकते हैं क्योंकि हम गाँव के साधारण लोग हैं, लेकिन सरकार के तो कर्म ही खोटे हैं। यह कितना उचित है कि अपनी बदजुबानी पर पर्दा डालने के लिए केजरीवाल गाँव और गाँववालों को बदनाम करें? अरविन्द केजरीवाल को किसने बताया कि गाँव के लोगों की भाषा असभ्य और अमर्यादित होती है?

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

प्रतिपक्ष के प्रति गहराता अविश्वास, लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं

 कां ग्रेस खुद को सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी मानती है। यह सच भी है। आजादी के आंदोलन में शामिल कांग्रेस को छोड़ दें तब भी, आजाद भारत में कांग्रेस के पास भारतीय राजनीति का गहरा अनुभव है। लेकिन, इस समय संसद में और संसद के बाहर कांग्रेस का व्यवहार देखकर लगता नहीं कि वह अपनी विरासत को साथ लेकर चल रही है। जिस गंभीर राजनीति की अपेक्षा कांग्रेस से की जानी चाहिए, वह उतनी ही उथली राजनीति का प्रदर्शन कर रही है। संसद में मानसून सत्र से जारी हंगामे को शीतकालीन सत्र में सोमवार को भी कांग्रेसी सांसदों ने जारी रखा। कांग्रेसी सांसदों के व्यवहार को देखते हुए राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन को कहना पड़ गया है कि 'आपका यह बर्ताव अलोकतांत्रिक है।' उन्होंने यह भी कहा कि 'आपमें से कुछ लोग सदन को हाईजैक करना चाह रहे हैं। कुछ सदस्य अपनी मर्जी से सदन को चलाना चाहते हैं।' उपसभापति की यह टिप्पणी गंभीर है। यह टिप्पणी कांग्रेस के अलोकतांत्रिक व्यवहार पर करारी चोट है। लेकिन, शायद ही कांग्रेस इस टिप्पणी से संभले। 

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

यह कैसा विरोध प्रदर्शन, कहाँ गए सहिष्णुता के ठेकेदार

 उ त्तरप्रदेश में हिन्दू महासभा के एक नेता कमलेश तिवारी पर आरोप है कि उसने मोहम्मद पैगम्बर के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की है। टिप्पणी से मुसलमान इतने उद्देलित हैं कि देश के अलग-अलग शहरों में भारी संख्या में एकत्र होकर कमलेश तिवारी को फांसी पर चढ़ाने की मांग कर रहे हैं। तिवारी का सिर कलम करने के फतवे जारी किए जा रहे हैं। इन रैलियों में आईएसआईएस के समर्थन में नारे लगाए जा रहे हैं। मुसलमानों के धार्मिक नेता रक्तपात के लिए मुसलमानों को उकसा रहे हैं। दस-बीस हजार मुसलमानों की भीड़ जोरदार नारे लगाकर सांप्रदायिक हिंसा को भड़काने वाले भाषणों को अपना समर्थन दे रही है। इन रैलियों से लौटती भीड़ को हिंसक होते देखा जा रहा है। मध्यप्रदेश का इंदौर शहर इन जहरीली तकरीरों का असर देख चुका है। भला हो मध्यप्रदेश के शासन-प्रशासन का जिसने हिंसा पर तत्काल ही काबू पा लिया।

कांग्रेस का मनतंत्र

 कां ग्रेस ने जिस तरह से संसद को ठप करके रखा है, देश में उससे यही संदेश जा रहा है कि वह मनतंत्र से लोकतंत्र को चलाना चाह रही है। कांग्रेस का यह रवैया देश के साथ-साथ उसके लिए भी घातक साबित होगा। सत्तापक्ष और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसद को चलाने के सभी प्रयास कांग्रेस की मनमर्जी के आगे विफल साबित हो रहे हैं। कांग्रेस के साथ 'चाय पर चर्चा' भी काम नहीं आई। 'संविधान पर चर्चा' के साथ सकारात्मक संवाद के माहौल में संसद की शुरुआत भी विफल साबित होती दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रतिपक्ष से संवाद करना, संसद चलाने के लिए आग्रह करना, प्रतिपक्ष से सहयोग की अपील करना और सदन में सबके प्रति सम्मान प्रकट करने वाला भाषण भी प्रतिपक्ष की कठोरता को मोम नहीं बना सका है। प्रतिपक्ष के कई सुझावों को भी सत्तापक्ष ने स्वीकार कर लिया है, तब क्यों कांग्रेस महत्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने में बाधा खड़ी कर रही है? कारण, कांग्रेस पहले से ही तय करके बैठी है कि उसे तो हंगामा करना है, संसद को ठप करना है और सरकार को काम नहीं करने देना है। इसीलिए कांग्रेस गैरजरूरी और अप्रासंगिक मुद्दों को भी आधार बनाकर संसद में गतिरोध खड़ा कर रही है। 

जनभागीदारी ही असल लोकतंत्र

 प्र धानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक मीडिया समूह की ओर से आयोजित कार्यक्रम में 'समावेशी जनतंत्र' के संदर्भ में लोकतंत्र को स्पष्ट करने की कोशिश की है। वास्तव में लोकतंत्र की असली परिभाषा जनता के बीच ले जाना आज की आवश्यकता है। समाज में लोकतंत्र की कल्पना उसी तरह बन गई है, जैसी एक कथा के अनुसार हाथी की कल्पना नेत्रहीनों में थी। जिस नेत्रहीन बंधु ने सूंड को टटोला, उसके अनुसार हाथी मोटी रस्सी की तरह। जिसने उसकी पूंछ को पकड़ा, उसके लिए हाथी पतली रस्सी की तरह और जिसने उसके पैर को पकड़ा उसके लिए हाथी खम्बे की तरह है। इसी तरह आज के दौर में लोकतंत्र को सब अपनी-अपनी दृष्टि से देख रहे हैं।

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

राजनीतिक अपराध कर रही है कांग्रेस

 ने शनल हेराल्ड प्रकरण पर कांग्रेस राजनीतिक सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर रही है। लगातार संसद में अवरोध खड़े कर रही कांग्रेस ने मंगलवार को भी इस मसले पर संसद को ही ठप कर दिया। कांग्रेस का यह कदम राजनीतिक अपराध है। भारत में कानून का शासन है और कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं। नेहरू-गाँधी परिवार से संबंध रखने के कारण सोनिया और राहुल न्यायालय से ऊपर नहीं हैं। न्यायालय ने उनके खिलाफ समन जारी किया है, उन्हें न्यायालय में पेश होने के लिए कहा है तो इस पर हाय-तौबा मचाने की क्या जरूरत है? उन्हें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होकर अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए। व्यक्तिगत मामले को लेकर संसद को ठप करना देश की जनता के प्रति राजनीतिक अपराध नहीं तो क्या है? दरअसल, नेशनल हेराल्ड मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी की एक याचिका खारिज करते हुए दोनों को न्यायालय में पेश होने का फैसला सुनाया था। सोनिया और राहुल चाह रहे थे कि न्यायालय में उन्हें स्वयं पेश होने से छूट दी जाए? उनकी यह बात न्यायालय ने नहीं सुनी तो पूरी कांग्रेस असहिष्णु हो गई और संसद को अराजकता के हवाले कर दिया।

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

प्रधान न्यायमूर्ति ने दिखाई देश की असली तस्वीर


 अ सहिष्णुता के झूठ पर भारत के प्रधान न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने करारी चोट की है। तथाकथित बढ़ती असहिष्णुता की मुहिम को प्रधान न्यायमूर्ति ने राजनीति से प्रेरित बताया है। उन्होंने कहा है कि देश में कहीं भी असहिष्णुता नहीं है। असहिष्णुता पर बहस के राजनीतिक आयाम हो सकते हैं, लेकिन कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए देश में न्यायालय है। जब तक उच्च न्यायालय है तब तक किसी को डरने की जरूरत नहीं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हम आपस में एक-दूसरे के प्रति प्रेम रखें और समाज में वैर भाव कम करके मिलजुल कर रहें। सरकार ने प्रधान न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर के बयान का स्वागत किया है। प्रधान न्यायमूर्ति के साथ-साथ देश के प्रसिद्ध उद्योगपति रतन टाटा भी यही बात कह रहे हैं कि देश में सब आपस में मिल-जुल कर रह रहे हैं। समाज में एकता है। असहिष्णुता सिर्फ मीडिया में दिखाई दे रही है। देश में भय का कोई माहौल नहीं है।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

प्रतिपक्ष है असहिष्णु

 लो कसभा में दो दिन असहिष्णुता पर जमकर बहस हुई। कांग्रेस और सीपीएम की मांग पर संसद में असहिष्णुता पर बहस कराई गई थी। आज से राज्यसभा में यह मुद्दा गर्माएगा। कांग्रेस और वामपंथी दल असहिष्णुता पर बहस के जरिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्र सरकार को घेरना चाहते थे। लेकिन, बहस के दौरान स्थितियां ऐसी बन गईं कि सरकार के लिए खोड़े गए गड्डे में ये खुद ही गिर गए। यूं तो देश पहले ही जान गया है कि असहिष्णुता का मुद्दा 'बनावटी' है। संसद में बहस से तस्वीर और साफ हो गई। बहस के दौरान देश ने देखा कि हकीकत में असहिष्णु कौन है? गलत बयानबाजी करने के बाद भी माफी मांगना तो दूर, सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम सरकार को ललकार रहे थे। क्या यही सहिष्णुता है? वामपंथियों के बारे में धारणा है कि ये 'आरोप लगाओ और भाग जाओ' की नीति का पालन करते हैं। मोहम्मद सलीम के असहिष्णु व्यवहार से यह भी साबित हो गया।

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

दस साल का शिव'राज'

 शि वराज सिंह चौहान ने 29 नवम्बर, 2005 को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब उनके सामने अनेक चुनौतियां थी। चुनौतियां, भीतर (भाजपा) और बाहर, सब जगह थीं। लेकिन, शिवराज सिंह ने सभी चुनौतियां का सूझबूझ के साथ सामना किया। संगठन में एक से एक दिग्गज मौजूद थे, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए भरोसा शिवराज पर दिखाया गया। उन्होंने संगठन के भरोसे को जीत लिया। बड़ों को आदर देकर, छोटों को स्नेह देकर और समकक्षों को साथ लेकर, बड़ी खूबसूरती से उन्होंने पार्टी में बढ़ती जा रही गुटबाजी पर काबू पाया। इस एकजुटता के कारण ही प्रदेश में भाजपा के सामने खांचों में बंटी कांग्रेस कहीं दिखती नहीं है। पार्टी-संगठन में खुद को मजबूत करते हुए उन्होंने प्रदेश में अपरिचित अपने चेहरे को लोकप्रिय बनाने का प्रयास शुरू कर दिया। अपने सरल, सहज और आम आदमी के स्वभाव के कारण शिवराज सिंह चौहान 'जनप्रिय' हो गए। प्रदेश की बेटियों के मामा, बुजुर्गों के लिए श्रवण कुमार, हमउम्रों के लिए पांव-पांव वाले भैया बन गए।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

असहिष्णुता पर चर्चा क्यों?

 कां ग्रेस और सीपीएम की मांग पर लोकसभा में 'असहिष्णुता' पर चर्चा कराई गई। जैसा कि पहले से ही तय था कि 'असहिष्णुता' के मुद्दे पर सदन में जमकर हंगामा होगा। क्योंकि, पक्ष-प्रतिपक्ष एक-दूसरे पर असहिष्णु होने का आरोप मढ़ेंगे। सरकार तो पहले ही कह चुकी है कि 'असहिष्णुता' का मुद्दा बनावटी है। जिस दादरी की घटना को आधार बनाकर 'असहिष्णुता' का मुद्दा उछाला जा रहा है, वैसी अनेक घटनाएं देश में पहले भी होती आईं हैं। बल्कि इससे भी अधिक गंभीर घटनाएं हो चुकी हैं। इसलिए सरकार यह स्वीकार करेगी नहीं कि देश का माहौल अचानक से डेढ़ साल में बिगड़ गया है। वहीं, कांग्रेस, कम्युनिस्ट और कुछ क्षेत्रीय पार्टियां किसी भी स्तर पर जाकर केन्द्र सरकार को झुकाना चाहती हैं। उनका कहना है कि जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की कमान संभाली है तब से देश में असहिष्णुता बढ़ गई है। 

दुरुपयोग के लिए ही जोड़ा था 'सेक्युलर'

 सं सद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत पहले 'संविधान दिवस' के साथ हो गयी है। गुरुवार को लोकसभा में संविधान पर सार्थक चर्चा हुई। राजनेताओं से आग्रह है कि पहले दिन की तरह ही आगे भी संसद की कार्यवाही संचालित करने में अपनी-अपनी सार्थक भूमिका का निर्वहन करें। पिछले सत्र की तरह शीतकालीन सत्र को हंगामे की भेंट न चढ़ाएं। प्रतिपक्षी दलों से इसका आग्रह सत्तापक्ष और लोकसभा अध्यक्ष भी कर चुकी हैं। बहरहाल, संविधान पर चर्चा करते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 'सेक्युलर' शब्द के दुरुपयोग का मामला उठा दिया है। उन्होंने कहा कि सेक्युलर शब्द का सबसे अधिक दुरुपयोग किया जा रहा है। गृहमंत्री की इस टिप्पणी पर कांग्रेस सहित कुछ प्रतिपक्षी दलों ने विरोध में अपनी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार, भाजपा और आरएसएस को घेरने का प्रयास किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने संविधान पर हमला किया है, वे ही आज संविधान पर चर्चा कर रहे हैं। सोनिया ने कहा कि आज संविधान खतरे में हैं। देश में जो कुछ चल रहा है, वह संविधान के खिलाफ है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सरकार, भाजपा और आरएसएस की तरफ अंगुली उठाते वक़्त संभवतः भूल गयी होंगी कि 'संविधान की आत्मा' पर कुठाराघात कांग्रेस ने ही किया है। 

आमिर बताएं कि उन्होंने पत्नी को अतुल्य भारत दिखाया या नहीं?

 अ सहिष्णुता का मुद्दा शांत होने की जगह रह-रहकर उठ रहा है। अब फिल्मी कलाकार आमिर खान ने असहिष्णुता को हवा दी है। आठवें रामनाथ गोयनका अवार्ड समारोह में आमिर खान ने यह कहकर निराधार बहस को फिर से तूल दे दिया है- 'पिछले 6-8 महीने से असुरक्षा और डर की भावना समाज में बढ़ी है। यहां तक कि मेरा परिवार भी ऐसा ही महसूस कर रहा है। मैं और पत्नी किरण ने पूरी जिंदगी भारत में जी है, लेकिन पहली बार उन्होंने मुझसे देश छोडऩे की बात कही। यह बहुत ही खौफनाक और बड़ी बात थी, जो उन्होंने मुझसे कही। उन्हें अपने बच्चे के लिए डर लगता है। उन्हें इस बात का भी डर है कि आने वाले समय में हमारे आसपास का माहौल कैसा होगा? वह जब अखबार खोलती हैं तो उन्हें डर लगता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अशांति बढ़ रही है।' 

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