मंगलवार, 24 मार्च 2015

अपनी जड़ों में लौटना होगा

ग्वालियर में नववर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम.
 वे लेन्टाइन डे (वीक) के रोज-डे और हग-डे से लेकर किस-डे तक की जानकारी रखने वाले आज के कूल डूड और हॉट बेबीज को भारतीय त्योहारों की न्यूनतम जानकारी है। यदि आप उनसे पूछ लें कि भारतीय नववर्ष कब है तो सबके सब 'आलिया भट्ट' नजर आएंगे। अभारतीय संस्कृति और बाजारवाद के 'डे' (त्योहार) मनाने में आज की पीढ़ी इतनी व्यस्त है कि अपनी संस्कृति के पन्ने पलटने की फुरसत उन्हें नहीं है। 31 दिसम्बर की रात से 'हुड़दंग' के साथ ग्रेगेरियन कैलेण्डर का स्वागत करना ही उनके लिए नववर्ष का उत्सव है। बहरहाल, आज की पीढ़ी को अपने नववर्ष का पता भी कैसे होगा? लम्बे समय से भारतीय मानस सुप्त अवस्था में है। उसे भान ही नहीं है कि उसके पूर्वजों ने भी कैलेण्डर बनाया था, वह भी अन्य की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक। अंग्रेजों की लिखीं इतिहास की किताबों या इन किताबों को पढ़कर तैयार हुए 'स्वतंत्र इतिहासकारों' ने हमेशा यही बताया कि विज्ञान का सूरज तो पश्चिम में ही उगा था, भारत के लोग तो सदैव गाय चराने में ही व्यस्त रहे। भारत लम्बे समय तक दासता में रहा है। उसका कुप्रभाव भारतीय मानस पर अब तक है। बार-बार चेताने पर भी वह सजग नहीं हो रहा है। यदि कोई व्यक्ति भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ पलटकर आज की पीढ़ी को अपने अतीत से प्रेरणा लेने की बात करता है तो उस व्यक्ति को 'स्वतंत्र इतिहासकार' ढकोसलावादी और भ्रम फैलाने वाला करार दे देते हैं। मुंबई में आयोजित राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस में विद्वान कैप्टन आनंद जे. बोडास और अमेय जाधव ने अपने शोधपत्र में तथ्यों के आधार पर बताया कि प्राचीन भारत का विज्ञान बहुत उन्नत था। उस समय की विमान तकनीक के आसपास भी आज की विमान तकनीक पहुंच नहीं सकी है। लेकिन, उनके शोध को वामपंथियों और दूसरी विचारधाराओं के लोगों ने लेख पर लेख लिखकर और भाषण दे-देकर कूड़ा साबित करने का प्रयास किया। बोडास और जाधव के शोध को आगे बढ़ाने की बात किसी ने नहीं की, जिसने की, उसे इन्होंने अवैज्ञानिक करार दे दिया। इसी तरह जब भी भारतीय कैलेण्डर की बात निकलती है, अंग्रेजियत से प्रभावित और भारतीय संस्कृति की चमक से पीडि़त बुद्धिजीवियों की बिरादरी उत्तेजित हो जाती है। वे इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते की भारत का अपना शानदार इतिहास रहा है। वे भारतीय नववर्ष और उसकी वैज्ञानिक गणना पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर देते हैं? भारतीय नववर्ष मनाने का आग्रह करने वालों की हँसी उड़ाने का प्रयास करते हैं।

मंगलवार, 17 मार्च 2015

जहां औंकार में विराजते हैं शिव


 दे वों के देव महादेव शिव अपने नाम के अनुरूप भोले हैं। बाबा मनमौजी भी हैं। उनका निवास और भेष दुनिया को संदेश देता है कि व्यक्ति अपने सामर्थ्य को पहचाने तो फिर वह प्रत्येक परिस्थिति में सुख से रह सकता है। बेफिक्र, निश्चिंत, परम आनंद में डूबा हुआ। कैलाश शिखर के वासी भोले भण्डारी ने औंकारेश्वर में भी एक पर्वत को ही अपना ठिया बनाया है। पर्वत पवित्र 'ऊँ' के आकार का है। इसीलिए यहां शिव का नाम पड़ा है- औंकारेश्वर। भोले भण्डारी को मधुर संगीत सुनाने के लिए पर्वत के नीचे माँ नर्मदा कल-कल बहती हैं। कावेरी भी उनका साथ देती नजर आती हैं। प्रकृति भी अपने पूरे सौंदर्य के साथ मौजूद है। माँ नर्मदा के घाट पर खड़े होकर औंकारेश्वर के शिखर को निहारना अलहदा अहसास है। शिखर पर पहुंचने की तीव्र लहरें मन में उठती हैं, लेकिन मान्धाता पर्वत उन्हें पीछे धकेल देता है, कहता है- 'शिखर पर बैठना है तो जाओ पहले शिव होकर आओ।' औंकारेश्वर के प्रांगण में खड़े होकर सदानीरा माँ नर्मदा को देखना भी अद्भुत है। माँ से प्रेरणा पाकर मन गंभीर हो जाता है-'मेरा, मेरे लिए कुछ भी नहीं, सब तुम्हारे लिए है।'  'नदिया न पिए कभी अपना जल, वृक्ष न खाए कभी अपना फल' जैसा गीत याद आता है। शिव के घर से आती घंटी की आवाज, नर्मदा के आंचल से होकर आई भीगी-ठण्डी बयार, शिव की स्तुति में पक्षियों का कलरव, कुछ क्षण के लिए आपको दुनिया के तमाम बंधनों-चिंताओं-परेशानियों से दूर लेकर चला जाएगा। तो आइए, औंकारेश्वर में चर-अचर, शिव के सब भक्त आपके स्वागत के लिए तैयार हैं।

मंगलवार, 10 मार्च 2015

गुजराती पत्रकारिता में है 'खुशबू गुजरात' की

 गु जराती पत्रकारिता की विशेषता है कि वे अपने अतीत को बहुत उज्ज्वल बताते हैं। उसे अपने अतीत पर गौरव है। यही कारण है कि गुजराती पत्रकारिता लम्बे समय तक परम्परागत पत्रकारिता की लकीर पर ही चलती रही है। नई सोच के कुछ अखबारों ने जब गुजरात की धरती पर कदम रखा तो परम्परावादी समाचार-पत्र और पत्रिकाओं ने भी अंगड़ाई ली है। बहरहाल, समय के साथ आ रहे बदलावों के बीच गुजराती पत्रकारिता में आज भी सौंधी 'खुशबू गुजरात' की ही है।

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